बुधवार, 5 मार्च 2025

अजमेर शहर को बडे रंगमंच की दरकार

अजमेर में हालांकि सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए जवाहर रंगमंच है, जिसकी सिटिंग केपिसिटी तकरीबन आठ साढे आठ सौ है, मगर वह ताजा जरूरतों के मुताबिक बहुत छोटा है। षहर को 1500 से 2000 सीटों वाले रंगमंच की सख्त दरकार है। असल में अरसे पहले जब वरिश्ठ वकील राजेष टंडन ने रंगमंच की मांग उठाई थी, उसके भी दस साल बाद वह पूरी हुई। जब जवाहर रंगमंच बन कर पूरा हुआ तो महसूस किया गया कि यह अपेक्षा से छोटा है, मगर फिर भी जैसे तैसे कार्यक्रम होने लगे। मगर छोटी-मोटी संस्थाओं के लिए वह सपना है। केवल संपन्न संस्थाएं ही उसमें कार्यक्रम का पा रही हैं। आजकल तो वह भी बंद है। उसका रिनोवेषन हो रहा है। इस कारण आठ सौ-हजार दर्षकों का कार्यक्रम करने वाली संस्थाएं परेषान हैं। उन्हें मजबूरी में कम दर्षक संख्या वाले स्थलों का विकल्प के रूप में चुनना पड रहा है। पिछले साल आचार संहिता के कारण जवाहर रंगमंच संस्थाओं के लिए उपलब्ध नहीं था, इस कारण उन्हें मेडिकल कॉलेज के हॉल में कार्यक्रम करना पडा। वह भी बहुत महंगा है। सीटें भी रंगमंच से कम हैं। इस बार फिर वही स्थिति है। माध्यमिक षिक्षा बोर्ड स्थित राजीव सभागार भी महंगा है। उसमें सीटें और भी कम हैं। हालांकि जीसीए का सभागार सीटों के लिहाज से ठीक-ठाक है, मगर साधन सुविधाएं कम हैं। सतगुरू ग्रुप का हॉल आधुनिक है, मगर षहर से इतनी दूर है कि कोई भी संस्था वहां कार्यक्रम करने का सोच भी नहीं सकती। सूचना केन्द्र में ओपन थियेटर में सिटिंग केपेसिटी कम है। पहले जरूर केपेसिटी ठीक-ठाक थी, मगर नया बनने के बाद केपेसिटी कम हो गई है। कुल जमा हालत ये है कि अच्छा व बडा कार्यक्रम करने के लिए अजमेर में जगह ही नहीं है। जो हैं, वे सामान्य संस्थाओं के बजट से बाहर। ऐसे में इस षहर को ऐसे बडे रंगमंच की सख्त जरूरत है, जिसमें सांस्कृतिक संस्थाएं रियायती दर पर कार्यक्रम कर सकें। उसके अभाव में अजमेर में सांस्कृतिक गतिविधियां कम होती जा रही हैं। अफसोसनाक है कि स्मार्ट सिटी के नाम पर करोडों-अरबों के काम तो हुए, मगर बडा रंगमंच बनाने की न तो किसी राजनेता ने सोची न ही अफसरों ने। 

सोमवार, 3 मार्च 2025

नागौर के मूंडवा में भरता था अंतरराष्ट्रीय गधा मेला

पिछले दिनों ये डंकी रूट क्या है, शीर्षक से एक न्यूज आइटम दिया तो दूसरा दशक के डायरेक्टर सुपरिचित बुद्धिजीवी जनाब प्रिंस सलीम ने प्रसंगवश नई जानकारी साझा की है। उन्होंने बताया कि राजस्थान के नागौर जिले के मूंडवा नामक गांव में 18 वीं शताब्दी से पहले अंतरराष्ट्रीय स्तर का गधा मेला आयोजित किया जाता रहा था। यह मेला गधों की खरीद-फरोख्त के लिए जाना जाता था और यहां दूर-दूर से व्यापारी और किसान आते थे। इस मेले में अलग-अलग नस्लों के गधे लाए जाते थे, और उनकी विशेषताओं के आधार पर उनकी कीमत तय की जाती थी। यह विभिन्न प्रकार की मार्केटिंग सुप्रबंधन के जरिए तत्कालीन व्यापारिक आवश्यकता की पूर्ति करता था। मध्य एशिया सेन्ट्रल एशिया आदि से हुंडी व्यापार का उदाहरण इस मेले के रिकार्डों में दिखाई देगा। हालांकि, समय के साथ इस मेले का महत्व कम होता गया और अब यह उतनी धूमधाम से नहीं लगता। अब नागौर का मुख्य पशु मेला, जो फरवरी में लगता है, ऊंटों, घोड़ों और मवेशियों के व्यापार के लिए अधिक प्रसिद्ध हो गया है। इस मेले में पशुओं के साथ-साथ लोक संगीत, नृत्य और अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन किया जाता है।

https://ajmernama.com/chaupal/428029/


रविवार, 2 मार्च 2025

जिलाधीश नहीं, जिला कलेक्टर कहिये

आपको जानकारी होगी कि जिले के प्रशासनिक मुखिया को जिला कलेक्टर कहा जाता है। पहले इसका नाम जिलाधीश हुआ करता था। हालांकि जिनको इसकी जानकारी नहीं है, वे अब भी जिलाधीश शब्द का उपयोग किया करते हैं।

असल में जिलाधीश शब्द पारंपरिक भारतीय प्रशासनिक प्रणाली से जुड़ा हुआ है और इसका अर्थ होता है जिले का न्यायाधीश। यह ब्रिटिश शासन से पहले के समय में उपयोग किया जाता था, जब जिले का प्रमुख अधिकारी मुख्य रूप से न्यायिक कार्यों को देखता था। ब्रिटिश शासन के दौरान जिला प्रशासन का ढांचा बदला और जिले के सर्वोच्च अधिकारी को कलेक्टर कहा जाने लगा। कलेक्टर शब्द अंग्रेजी के कलेक्टर ऑफ रेवेन्यू से आया, जिसका अर्थ था राजस्व संग्रह करने वाला अधिकारी। ब्रिटिश काल में इस पद को न्यायिक से अधिक प्रशासनिक और राजस्व-संबंधी कार्यों का भार सौंपा गया। इसके बाद न्यायिक और प्रशासनिक कार्यों को अलग कर दिया गया और न्यायिक जिम्मेदारियां न्यायालयों को सौंप दी गईं।

आजादी के बाद भी ब्रिटिशकालीन प्रशासनिक व्यवस्था बनी रही। जिला कलेक्टर को विकास योजनाओं, कानून व्यवस्था, आपदा प्रबंधन और प्रशासनिक कार्यों कर जिम्मेदारी दी गई, जिससे यह केवल न्यायिक अधिकारी न रह कर एक बहुआयामी प्रशासनिक अधिकारी बन गया। इसलिए जिलाधीश शब्द की जगह जिला कलेक्टर या जिलाधिकारी शब्द का उपयोग किया जाता है। 

जिला कलेक्टर एक प्रशासनिक पद है, जो किसी जिले के सर्वोच्च अधिकारी को दर्शाता है। इसे जिलाधिकारी भी कहा जाता है। जिला कलेक्टर राज्य सरकार का प्रतिनिधि होता है और जिले में शासन से जुड़ी विभिन्न जिम्मेदारियों को संभालता है।

जिला कलेक्टर राजस्व प्रशासन, भूमि रिकॉर्ड, कर संग्रहण, भूमि अधिग्रहण आदि, पुलिस और प्रशासन के सहयोग से जिले में शांति बनाए रखना, लोकसभा, विधानसभा और पंचायत चुनावों का आयोजन, बाढ़, सूखा, भूकंप जैसी आपदाओं में राहत और पुनर्वास कार्य, सरकारी योजनाओं और नीतियों का क्रियान्वयन और जिले के अन्य सरकारी विभागों का समन्वय और निगरानी आदि कार्य करता है।

जिलाधीश की जगह जिला कलेक्टर शब्द का इस्तेमाल इसलिए भी किया जाता है कि जिलाधीश शब्द से अधिनायकवाद की बू आती है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जिला कलेक्टर शब्द को उपयुक्त माना गया है।

तेजवाणी गिरधर 7742067000

मंगलवार, 25 फ़रवरी 2025

इसे कहते हैं लोकप्रियता

 दैनिक भास्कर के 25 फरवरी 2025 के अंक में देखा कि एक साथ एक ही शख्स के प्रति ढेर सारे श्रद्धांजलि संदेष छपे हैं। चकित रह गया। मैने अपनी समझ में आज तक ऐसा साथ इतने लोगों की ओर से श्रद्धांजलि संदेश नहीं देखे। वह भी पांचवी पुण्यतिथि पर। निश्चित ही वे बहुत लोकप्रिय हैं। वे हैं स्वर्गीय श्री परशोत्तम दास गिदवानी उर्फ पषु भाई। सुपरिचित व्यवसायी। विरले ही ऐसे होते हैं, जिन्हें इतनी शिद्दत से लोग याद किया करते हैं। अजमेरनामा न्यूज पोर्टल भी उनको भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है।

गुरुवार, 20 फ़रवरी 2025

125 साल पहले बना था अजमेर का गांधी भवन

अजमेर में स्थित गांधी भवन प्रसिद्ध स्मारक है। गांधी भवन 125 साल पहले ट्रैवर टाउन हॉल के नाम से बनवाया गया था! बताया जाता है कि 1895 ई. से 1900 ई. के बीच अजमेर मेरवाड़ा के चीफ कमिश्नर जी एच ट्रेवर की याद में गांधी भवन का निर्माण करवाया गया था। उस वक्त उसका नाम ट्रैवर टाउन हॉल रखा गया था। 1905 में पुरातत्वविद श्री गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने विक्टोरिया हॉल पुस्तकालय नाम से पुस्तकालय की स्थापना की। आजादी के बाद इसका नाम गांधी भवन पुस्तकालय रखा गया। प्रदेश के 88 दानदाताओं ने धन इकट्ठा करके गांधी भवन का निर्माण करवाया था। उस वक्त 5 रुपए की भी बहुत कीमत थी। गांधी भवन के लिए चंदा देने वालों की सूची में 5 रुपए का चंदा देने वालों के भी नाम हैं। 88 दानदाताओं ने कुल बीस हजार की रकम इकट्ठा करके गांधी भवन का निर्माण कराया था। सर्वाधिक 3 हजार रुपए दो महाराजाओं ने दिए, जिनमें उदयपुर के महाराणा और जोधपुर के तत्कालीन शासकों के नाम शामिल हैं। अलवर और बीकानेर के तत्कालीन शासकों ने भी 15-15 सौ रुपए का दान दिया था। साथ ही जैसलमेर के शासक ने 1 हजार और किशनगढ़ के शासक ने 5 सौ रुपए दिए थे।

अजमेर के इतिहास के बारे खासी जानकारी रखने वाले श्री नारायण सिंह के अनुसार इस भवन के लिए भूमि अजमेर के प्रसिद्ध जनाब अल्लाहरखा साहब ने दान में दी थी। नगर पालिका ने भवन और बगीचा बनवाया। इस बगीचे में महात्मा गांधी की मूर्ति स्थापित है। गांधी भवन के पीछे एक सरकारी स्कूल बना हुआ है। गांधी भवन में वाचनालय में देश में प्रकाशित विभिन्न दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और पत्रिकाएं निशुल्क पढऩे की सुविधा उपलब्ध कराई गई। गांधी भवन के बड़े हॉल में कई गणमान्य व्यक्ति व्याख्यान देने आते थे। मैंने यहां एक मर्तबा फिल्म अभिनेता महिपाल (पारसमणि, वीर भीमसेन में अभिमन्यु का रोल करने वाले) को हूबहू सामने देखा था। वर्ष 1960-70 के दशकों में गांधी भवन का बगीचा बड़ी साइज का था, जो अब छोटा कर दिया गया है। संभवत सड़क चौड़ी करने का ही उद्देश्य रहा होगा।
गांधी भवन में शाम को आठ बजे बच्चों वाली लायब्रेरी वाले कमरे की खिड़की पर बड़ा सा लाउडस्पीकर लगा कर आकाशवाणी के समाचारों का प्रसारण किया जाता था। इन समाचारों को सुनने के लिए जन साधारण की भीड़ से बगीचा भर जाता था।
गांधी भवन के बगीचे में एक बार वार्ड मेम्बरों की लंबी हड़ताल चली थी और पूरा शहर देखने आता था, जैसे कोई मेला लगा हो। अब भी यह शहर का सर्वाधिक व्यस्त रहने वाला चौराहा है।