सोमवार, 27 दिसंबर 2010

क्यों नजर नहीं आई गिरिजाघरों पर नेता मंडली?

ईद के मौके पर ईदगाह के बाहर लाइन लगा कर मुस्लिम भाइयों को बढ़-चढ़ कर मुबारकबाद देने वाले और मुस्लिम दोस्तों के घर जा कर नॉनवेज का लुत्फ उठाने वाले नेता ईसाई समुदाय के सबसे बड़े धार्मिक पर्व क्रिसमस पर गिरिजाघरों पर नजर नहीं आए।
अलबत्ता पूर्व विधायक डॉ. श्रीगोपाल बाहेती व दरगाह नाजिम अहमद रजा ने जरूर आगरा गेट स्थित रॉबसन मेमारियल केथेडल चर्च पर जा कर कौमी एकता की मिसाल पेश की, मगर शहर के दीगर नेताओं को ख्याल ही नहीं आया कि ईसाई समुदाय भी कोई अहमियत रखता है। उसकी भी इस शहर को एक कदीमी शहर बनाने में अहम भूमिका रही है।
असल बात तो ये है कि दरगाह और पुष्कर को छोड़ कर अगर अजमेर कुछ है तो उसमें अंग्रेज ईसाई अफसरों का योगदान है। सीपीडब्ल्यूडी, सेन्ट्रल बोर्ड ऑफ सेकण्डरी एज्युकेशन, कलेक्ट्रेट बिल्डिंग, सेन्ट्रल जेल, पुलिस लाइन, टीचर्स ट्रेनिंग कॉलेज, लोको-केरिज कारखाने, डिविजन रेलवे कार्यालय बिल्डिंग, मार्टिन्डल ब्रिज, सर्किट हाउस, अजमेर रेलवे स्टेशन, क्लॉक टावर, गवर्नमेन्ट हाई स्कूल, सोफिया कॉलेज व स्कूल, मेयो कॉलेज बिल्डिंग, लोको ग्राउण्ड, केरिज ग्राउण्ड, मिशन गल्र्स स्कूल, अजमेर मिलिट्री स्कूल, नसीराबाद छावनी, सिविल लाइंस, तारघर, आर.एम.एस., गांधी भवन, नगर निगम भवन, जी.पी.ओ., विक्टोरिया हॉस्पिटल, मदार सेनीटोरियम, फॉयसागर, भावंता से अजमेर की वाटर सप्लाई, पावर हाउस की स्थापना, रेलवे हॉस्पिटल, दोनों रेलवे बिसिट आदि का निर्माण ब्रिटिश सरकार के ईसाई अधिकारियों के विजन का ही परिणाम था, जिससे अजमेर के विकास की बुनियाद पड़ी। आज अजमेर का जो स्वरूप है, उस पर अंग्रेजों की छाप स्पष्ट देखी जा सकती है। अजमेर में शिक्षा के विकास में जितना आर्य समाज का योगदान है, उससे कहीं अधिक ईसाई मिशनीज की भूमिका है। सच्चाई तो ये है कि ऊंचे-ऊंचे ओहदों पर पहुंचे अनेक हिंदू व मुसलमानों की शिक्षा में ईसाई मिशनरीज की स्कूलों का रोल रहा है। आज भी हालत ये है कि अधिसंख्य संपन्न घराने अपने बच्चों को ईसाई मिशनरीज में पढ़ाने के लिए एडी-चोटी का जोर लगा देते हैं। मोटा-मोटा चंदा देने तक को राजी रहते हैं। यहां तक कि महान भारतीय संस्कृति के झंडाबरदार और ईसाई मिशनरीज के खिलाफ समय-समय पर आंदोलन छेडऩे वाले नेताओं के बच्चे भी मिशनरी स्कूलों में ही पढ़ते हैं। और तो और कौमी एकता के नाम पर ईसाई फादर्स को साथ लेकर जलसे करने वाले भी क्रिसमस के मौके पर सार्वजनिक रूप से नजर नहीं आए। इनमें से अधिकतर वे हैं जो फादर्स और सिस्टर्स से दोस्ती रखते ही इस कारण हैं, ताकि उनके परिजन व मित्रों को मिशनरी स्कूलों में आसानी से दाखिला मिल जाए। कई नेताओं ने तो एडमिशन की दुकान तक खोल रखी है।
असल में ये सब वोटों का चक्कर है। मुसलमानों के वोट काफी तादाद में हैं, इस कारण उनकी मिजाजपुरसी करनी पड़ती है। कांग्रेसी इस कारण करते हैं क्यों कि उन्हीं के वोट बैंक की बदौलत राज करते हैं और भाजपाई इस उम्मीद में कि कांग्रेस ने नाराज और शॉर्ट कट से आगे आने के इच्छुक मुसलमान उनकी ओर कभी तो आकर्षित होंगे। मगर चूंकि ईसाइयों के वोट ज्यादा नहीं हैं, इस कारण उन्हें नजरअंदाज करने से कोई फर्क नहीं पडऩे वाला है। बहरहाल, आज जब केवल नोट और वोट का ही जमाना है तो अकेले अपने ईसाई समुदाय की तरफदारी करने से क्या होने वाला है? अपना तो सिर्फ इतना कहना है कि इस शहर को दुनिया में सांप्रदायिक सौहार्द्र की मिसाल बता कर सीना चौड़ा करना पर्याप्त नहीं है, सांप्रदायिक सौहाद्र्र दिखाना भी चाहिए।

ऊंट पर बैठे अश्फाक को काट खाया कुत्ता

कहते जब बुरा वक्त आता है तो ऊंट पर बैठे आदमी को भी कुत्ता काट खाता है। आप कहेंगे कि ऊंट पर बैठे आदमी को कुत्ता कैसे काट सकता है? असल में जब कुछ बुरा वक्त आता है तो ऊंट जमीन पर बैठ जाता है और उसी वक्त मौका देख कर कुत्ता काट खाता है। ऐसा ही कुछ हो रहा है इन दिनों नगर सुधार न्यास के सचिव अश्फाक हुसैन के साथ।
कभी तेज-तर्रार अफसर के रूप में ख्यात रहे अश्फाक दोधारी तलवार से गुजरने वाले दरगाह नाजिम पद पर बिंदास काम कर चुके हैं। दरगाह दीवान और खादिमों के साथ तालेमल बैठाने के अलावा दुनियाभर से आने वाली तरह-तरह की खोपडिय़ों से मुकाबला करना कोई कठिन काम नहीं है। पिछले कुछ नाजिम तो बाकायदा भी कुट चुके हैं, मगर अश्फाक ने बड़ी चतुराई से इस पद को बखूबी संभाला। किसी के कब्जे में न आने वाले कई तीस मार खाओं को तो उन्होंने ऐसा सीधा किया कि वे आज भी उनके मुरीद हैं।
इन दिनों अश्फाक ज्यादा उखाड़-पछाड़ नहीं करते, शांति से अफसरी चला रहे हैं, मगर वक्त उन्हें चैन से नहीं रहने दे रहा। सबसे ज्यादा परेशानी संभागीय आयुक्त अतुल शर्मा से ट्यूनिंग नहीं हो पाने की वजह से है। आए दिन उनके गुस्से का शिकार होते हैं। शर्मा ने अवमानना के मामले में अश्फाक के लिए सजा का प्रस्ताव कर दिया, जिसे अश्फाक ने हाईकोर्ट में चुनौती दे दी है। इन दो अधिकारियों के बीच क्यों नहीं बन रही, खुदा जाने। और तो और, कांग्रेसी भी उनके पीछे पड़ गए हैं। न्यास की पृथ्वीराज नगर योजना में पात्र आवेदकों को भूखंड नहीं देने और भूमि के बदले भूमि का आवंटन न करने को लेकर पहले तो एक अखबार में लंबी-चौड़ी खबर छपवाई और फिर दूसरे ही दिन उनके चैंबर में जा धमके। पहले तो वे कांग्रेसियों के गुस्से को पीते रहे, मगर जैसे ही उनके मुंह से निकला कि वे तो प्रस्ताव बना कर कई बार जयपुर के चक्कर लगा चुके हैं, सरकार आपकी है, वहीं मामले अटके हुए हैं तो कांग्रेसी भिनक गए। उन्होंने इसे अपनी तौहीन माना। सरकार से तो लड़ नहीं सकते, अश्फाक पर ही पिल पड़े। हालात इतने बिगड़ गए कि कांग्रेसियों ने उन्हें इस कुर्सी पर नहीं बैठने देने की चेतावनी तक दे डाली। कांग्रेसियों व उनके बीच टकराव की असल वजह क्या है, अपुन को नहीं पता, मगर लगता है मामला प्रॉपर्टी डीलरों से टकराव का है।
खैर, कांग्रेसियों के हमले पर अपुन को याद आया कि ये वही अश्फाक हुसैन हैं, जिनकी गोपनीय रिपोर्ट के आधार पर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के अपेक्षित एक सौ एक नानकरामों में से एक नानकराम को कांग्रेस का टिकट मिला था। गहलोत उनसे इतने खुश हुए कि अपने गृह जिले जोधपुर ले गए। आज भी उन पर गहलोत का आशीर्वाद है। उनके एक खासमखास अधिकारी गहलोत के पास ही लगे हुए हैं। ऐसे में कांग्रेसियों की तड़ी कामयाब होगी, इसमें अपुन को तो थोड़ा डाउट ही लगता है। खैर, अपुन को एक ही ख्याल आता है। अगर कांग्रेसी न्यास सचिव के कामकाज से इतने ही खफा हैं तो क्यों नहीं अपना अध्यक्ष न्यास में बैठा देते। मुख्यमंत्री पर तो जोर चलता नहीं है और अफसर पर अफसरी गांठते हैं।

शनिवार, 25 दिसंबर 2010

पुलिस तंत्र फेल, अब केवल मुखबिरों पर भरोसा

पुष्कर इलाके में स्कूली छात्र सूरज व महंत सेवापुरी की हत्या से पर्दा उठा पाने में नाकाम पुलिस को थक-हार कर मुखबिरों का ही सहारा लेना पड़ रहा है। उसने इन दोनों हत्याकांडों का सुराग बताने वालों के लिए इनाम की घोषणा की है। मतलब साफ है। पुलिस तंत्र ने हाथ खड़े कर दिए हैं। न तो उसे फिंगर प्रिंटों से कुछ पता लगा और न ही मोबाइल कॉल डिटेल से।
असल में इन हत्याकांडों की बला पिछले पुलिस कप्तान हरिप्रसाद शर्मा के गले आई हुई थी, जिनके गले में जाते-जाते कुछ संस्थाओं ने मालाओं का ढेर लगा दिया था। ऐसे विदा किया मानो कोई बहुत बड़ा बहादुरी काम करके जा रहे हैं। ये ही समझ में नहीं आता कि उनका अभिनंदन इस कारण किया गया कि वे सफलतम एसपी थे, या फिर इस कारण कि ऐसे नाकाम एसपी को विदा करते हुए खुशी हो रही थी। सब जानते हैं कि यदा-कदा मुखबिर की सहायता से कोई मामला खोलने में कामयाबी मिल भी जाती थी तो वे संबंधित थानाधिकारी को श्रेय देने की की बजाय खुद ही क्रेडिट लेने की कोशिश करते थे। यहां तक की छोटे-मोटे मामलों के खुलासे की ब्रीफिंग भी खुद ही करने में रुचि रखते थे।
बहरहाल, दस्तूर के मुताबिक उन्होंने जाते-जाते अपनी बला नए एसपी बिपिन कुमार पांडे के गले डाल दी। पांडे जी आए तो पता लगा कि वे बहुत बड़े तीस मार खान हैं। राजनीतिक माफियाओं के गढ़ बिहार राज्य के आईपीएस हैं और राजस्थान में भी काफी घूम चुके हैं। आते ही जादू की छड़ी घुमा कर पर्दाफाश कर देंगे। मगर कुछ दिन की मशक्कत के बाद उन्होंने भी हथियार डाल दिए। वैसे भी वे अकेले क्या कर सकते थे? उनको टीम तो वही मिली न जिसकी मुस्तैदी से मुंबई ब्लास्ट के मास्टर माइंड व देश में आतंकी हमले करने का षड्यंत्र रचने के आरोप में अमेरिका में गिरफ्तार डेविड कॉलमेन हेडली उसके चेहरे पर कालिख पोत कर जा चुका है।
पुलिस की नाकामी को बयां करने वाले अकेले ये सूरज व सेवापुरी हत्याकांड ही नहीं हैं। वह अनेक हत्याकांडों की गुत्थियां नहीं सुलझ पाई हैं। आशा व सपना हत्याकांड जैसे कुछ कांड तो भूले-बिसरे हो गए हैं, जिन्हें पुलिस ने अपनी अनुसंधान सूची से ही निकाल दिया है। अब तो हालत ये है कि उनकी फाइलों पर ही धूल की परतें चढ़ गई हैं। वो तो रावत समाज ने एकजुट हो कर दबाव बना रखा है, वरना सूरज व सेवापुरी हत्याकांडों को भी भुलाये जाने की स्थिति आ चुकी थी।
अपुन ने तो पहले ही कहा था कि कई चैलेंज पांडे साहब का स्वागत करने को मुंह बाये खड़े हैं। चैन स्नेचिंग के मामले तो इस कदर बढ़े हैं, महिलाएं खुद को असुरक्षित महसूस करने लगी हैं। पुलिस डाल-डाल है तो चोर पात-पात। नकली पुलिसकर्मी बन कर ठगने वाले असली पुलिस को मुंह चिढ़ा रहे हैं। वाहन चोरी की तो इंतहा हो चुकी है। जुए-सट्टे पुलिस थानों की नाक के नीचे चल रहे हैं। अवैध शराब और मादक पदार्थों की तस्करी में तो अजमेर रिकार्ड बना चुका है। कच्ची शराब का धंधा पुलिस वालों की देखरेख में होता रहा है, इसका सबसे बड़ा सबूत ये है कि शराब तस्करों को छापों से पूर्व जानकारी देने की शिकायत के आधार पर दो पुलिस कर्मियों को लाइन हाजिर करना पड़ा। पुलिस की मिलीभगत का अंदाजा क्या इससे भी नहीं लगता कि अपराधी जेल से ही अपने गिरोह संचालित करते हैं। ऐसे में स्वाभाविक सा है कि पुलिस कप्तान अपने तंत्र पर कैसे भरोसा करें, मुखबिरों का ही सहारा लेना पड़ेगा।

शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

भरत सिंह की बात दूर तलक जाएगी

संभाग मुख्यालयों पर जिला परिषदों में आईएएस अधिकारियों की तैनाती व ग्राम पंचायतों में निविदा प्रक्रिया पर मुंह खोल कर विवाद में फंसे प्रदेश के पंचायतीराज मंत्री भरतसिंह का मामला दूर तक जाता दिखाई देता है। हालांकि शुरुआत जिला सरपंच संघ के अध्यक्ष भूपेन्द्र सिंह राठौड़ ने लंबा-चौड़ा बयान जारी कर की थी, लेकिन अब जिले के कांग्रेसी विधायकों ने भी ठान ली है कि वे भरत सिंह का पीछा नहीं छोड़ेंगे। हालांकि विधायक डॉ. रघु शर्मा व श्रीमती नसीम अख्तर के हवाले से शिकायत करने की खबरें भी शाया हुई हैं, मगर जानकारी मिली है कि मामला इतने तक रुकने वाला नहीं है। जानकारी मिली है कि जिले के सभी कांग्रेसी विधायकों का जमीर जगा कर उन्हें लामबंद किया जा रहा है और सीधे मुख्यमंत्री अशोक गहलोत व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सी. पी. जोशी से मिल कर शिकायत दर्ज करवाने की योजना बनाई जा रही है। जाहिर है मामला शिक्षा मंत्री मास्टर भंवरलाल तक भी गया होगा। वे कौन से छोडऩे वाले हैं?
यहां उल्लेखनीय है कि भरतसिंह ने जो बयान दिया था, वह चंद दिन पहले अजमेर आ कर निर्देश दे गए शिक्षा मंत्री मास्टर भंवरलाल मेघवाल के ठीक खिलाफ था। इतना ही नहीं वह मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की ओर से दी गई व्यवस्था की मुखालफत भी जाहिर कर रहा था। दो मंत्रियों के इस प्रकार एक ही जगह पर आ कर परस्पर विरोधी बयानबाजी करने से सरकार की कितनी किरकिरी हुई, इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है।
बहरहाल, कांग्रेसी विधायकों की मुहिम क्या रंग लाती है, यह तो वक्त ही बताएगा।
यानि मुफ्त में बदनाम हो गई सुरजीत कपूर
जगत में बदनाम करने के बाद जा कर एडवोकेट दिनेश राठौड़ को ख्याल आया है कि जिस सुरजीत कपूर के साथ उसके बेहतरीन संबंध थे, उसे उसने लोगों के भडक़ाने पर मुफ्त ही बदनाम कर दिया है। उल्लेखनीय है कि राठौड़ ने आत्महत्या की कोशिश कर अपने सुसाइड नोट में इसके लिए सुरजीत को जिम्मेदार बताया था। उसने तब साफ कहा था कि उसने सुरजीत के साथ खोड़ा गणेश में शादी की थी। इतना ही नहीं यह आरोप तक लगाया था कि सुरजीत के एक पुलिस अफसर के साथ अवैध संबंध थे। उनके इन आरोपों की वजह से न केवल वे खुद गिरफ्तार हुए, अपितु सुरजीत को भी गिरफ्तार होना पड़ा। बाद में दोनों जमानत पर रिहा हो गए। यानि सुरजीत केवल बदनाम ही नहीं हुई, बल्कि पुलिस केस में भी फंसी। इतना ही नहीं, उन्होंने शहर महिला कांग्रेस अध्यक्ष का पद तक खो दिया। माल भी गया और माजना भी गया। अब जा कर राठौड़ ने पलटी खाई है और सुरजीत के परिवार वालों और प्रदेश महिला कांग्रेस अध्यक्ष विजय लक्ष्मी विश्नोई को पत्र लिख कर मांगी है। एक महिला पर चरित्र संबंधी आरोप लगने के बाद उसके परिवार की क्या हालत होती है, इसका दंश कितना दर्दीला होता है, यह तो सुरजीत ही जान सकती हैं। इससे परिवार में जो दरार आई होगी, उसे पाटना कितना कठिन है, इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है। रहा सवाल प्रदेश महिला कांग्रेस अध्यक्ष से माफी मांगने का तो अब पछतावत होत क्या, जब चिडिय़ा चुग गई खेत। यह सर्वविदित ही है कि जब विश्नोई ने उन्हें पद से हटाया था, तब यह भी कहा था कि सुरजीत के खिलाफ पहले से शिकायतें आ रही थीं, इस कारण उन्हें हटाना जरूरी हो गया था। अब देखना ये है कि विश्नोई ताजा प्रकरण में आरोप लगाने वाले के पलटने के बाद क्या पुरानी शिकायतों को भी भूल कर सुरजीत को फिर से पद पर काबिज करती हैं या नहीं। कुल मिला कर राठौड़ की नादानी से शहर महिला कांग्रेस को शानदार तरीके से चलाने वाली दबंग व बिंदास सुरजीत इस प्रकरण में जो खोया है, उसे फिर पाना नितांत असंभव है। बड़े बुजर्गों ने सच ही कहा है- नादान की दोस्ती जी का जंजाल।

गुरुवार, 23 दिसंबर 2010

क्या आंदोलन के बिना नहीं होगा सावित्री कॉलेज का उद्धार?

एक ओर केन्द्र व राज्य सरकार महिला सशक्तिकरण और नारी शिक्षा पर विशेष जोर देते हुए करोड़ों रुपए का प्रावधान कर रही है, तो दूसरी ओर पूरे उत्तर भारत में सर्वप्रथम घोषित संपूर्ण साक्षर अजमेर में वर्षों से नारी शिक्षा की अलख जगा रहा सावित्री कॉलेज बंद होने के कगार पर है। अफसोसनाक बात ये है कि सरकार और जनप्रतिनिधियों को कॉलेज की खराब माली हालत के बारे में पूरी जानकारी है, इसको अधिग्रहित करने का प्रस्ताव भी भेजा जा चुका है, बावजूद इसके जानबूझ कर आंखें फेरी जा रही हैं और कॉलेज की शिक्षिकाएं व छात्राएं आंदोलन करने को मजबूर हैं।
प्रदेश में शैक्षिक राजधानी के रूप में विख्यात अजमेर में नारी शिक्षा की लौ आजादी से बहुत पहले ब्रिटिश शासनकाल में ही प्रज्ज्वलित हो गई थी। इस कॉलेज की शुरुआत 1914 में प्राथमिक कन्या विद्यालय के रूप में हुई थी। क्रमश: 1933, 1943, 1951 और 1968 में हाई स्कूल, इंटरमीडिएट, स्नातक और स्नातकोत्तर कॉलेज के रूप में क्रमोन्नत इस कॉलेज ने अनगिनत युवतियों को शिक्षित किया, जो आज देश-विदेश में अनेक क्षेत्रों में उच्चस्थ पदों पर स्थापित हैं। संगीत व ड्राइंग की शिक्षा के क्षेत्र में तो इसकी विशेष पहचान है और यहां से शिक्षित युवतियों ने चित्रकला व संगीत के क्षेत्र में कीर्तिमान स्थापित किए हैं। बदलते युग के साथ यहां एम. कॉम. बिजनिस एडमिनिस्ट्रेशन व बीसीए की शिक्षा भी दी जा रही है। नारी शिक्षा के क्षेत्र में हालांकि सोफिया स्कूल व कॉलेज की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है, मगर वहां मात्र उच्च आय वर्ग की युवतियों ने ही शिक्षा पाई है, जबकि सावित्री कॉलेज ने शहर के बहुसंख्यक मध्यम व निम्न मध्यम वर्ग की युवतियों को शिक्षित करने का दायित्व निभाया है। मौजूदा परिदृश्य पर नजर डालें तो इस कॉलेज में वे सब सुविधाएं हैं, जो कि सरकार द्वारा स्थापित राजकीय कन्या महाविद्यालय के पास नहीं हैं। सरकारी कॉलेज के पास न तो अपना भवन है और न ही पर्याप्त प्रवक्ता। यहां तक कि राजस्थान में इकलौते सावित्री कॉलेज को नेवल विंग से युक्त होने का गौरव हासिल है। यूजीसी की भी सभी सुविधाएं मिल रही हैं।
यह एक सर्वविदित तथ्य है कि जिस समाज की महिलाएं शिक्षित होती हैं, उसकी नई पीढ़ी शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी होती है। ऐसे में यदि यह कहा जाए कि तीन पीढिय़ों की महिलाओं को शिक्षित करने वाले इस संस्थान की बदौलत ही आज अजमेर संपूर्ण साक्षर बन सका है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। कितने दु:खद आश्चर्य की बात है कि जिस जमाने में नारी शिक्षा के प्रति कोई खास जागृति नहीं थी, तक इस संस्थान ने अग्रणी भूमिका निभाई और आज जब नारी शिक्षा पर सर्वाधिक जोर दिया जा रहा है, उसके लिए पर्याप्त फंड भी जारी किया जाता है, तब अजमेर में शिक्षा का आधार स्तम्भ रहा यह संस्थान आज अंतिम सांसें गिन रहा है।
यह तो गनीमत है कि तीर्थराज पुष्कर व दरगाह ख्वाजा साहब की बदौलत अजमेर विश्व मानचित्र पर अंकित है, वरना राजनीतिक जागरुकता के अभाव में हमारा शैक्षिक राजधानी का ओहदा लगभग छिन सा गया है। आजादी के बाद अजमेर राज्य के राजस्थान में विलय के समय जरूर इस महत्व को बरकरार रखा गया। तत्कालीन केन्द्रीय गृहमंत्री सरदार वल्लभाई पटेल के नीतिगत निर्णय के तहत यहां राजस्थान लोक सेवा आयोग व माध्यमिक शिक्षा बोर्ड खोला गया, मगर उसके बाद पर्याप्त ध्यान नहीं दिए जाने के कारण उच्च शिक्षा के क्षेत्र में जयपुर सहित कोटा व जोधपुर आगे निकल गए। इतिहास के झरोखे में जरा और पीछे झांके तो साफ नजर आता है कि सन् 1936 में स्थापित राजकीय महाविद्यालय और सन् 1875 में स्थापित मेयो कॉलेज हमारे गौरव स्तम्भ रहे हैं। इतना ही नहीं बिसलदेव विग्रहराज के काल में स्थापित संस्कृत महाविद्यालय के अवशेष आज भी ढ़ाई दिन के झौंपड़े में देखे जा सकते हैं। सन् 1925 में पुष्कर में स्थापित संस्कृत महाविद्यालय भी हमारी गौरव यात्रा बखान करता है। ऐसे ऐतिहासिक शहर में महिला शिक्षा अलग जगाने में अहम भूमिका निभाने वाला सावित्री कॉलेज यदि बंद होता है तो यह यहां के राजनेताओं, बुद्धिजीवियों और व्यवसाइयों के लिए बेहद शर्मनाक होगा।