अजमेर नगर निगम के नए सीईओ सी. आर. मीणा ने निगम की चर्रमर्र कर रही चूलों की ढ़ेबरी टाइट करना शुरू कर दिया है। जैसे ही उन्होंने सफाई ठेके वार्डों में श्रमिकों की तैनाती कर हाजरी भरने और वेतन भुगतान करने पर पाबंदी लगाई, सफाई निरीक्षकों व जमादारों में खलबली मच गई। सफाई व्यवस्था को पहली बार तरीके से खांचे में लाने पर पार्षदों को भी तकलीफ हुई। सभी ने मिल कर अपने तेवर दिखाने की कोशिश की तो मीणा ने भी आंखें तरेर कर उनकी क्लास ले डाली। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि पाबंदी उन्होंने सफाई ठेका कंपनी के कहने पर नहीं लगाई है, बल्कि यह कदम शहर के हित में उठाया है। रहा सवाल नौकरी का तो न तो उन्हें सीट का मोह है और न ही किसी के दबाव की परवाह। गलत काम और गलत बात बर्दाश्त नहीं करूंगा।
असल में जैसे ही मीणा ने यह कदम उठाया तो सफाई कर्मचारी संघों का खुद-ब-खुद लगा कि ठेका कंपनी के कहने पर ही ऐसा हुआ है और ऐसा करके कंपनी उन्हें चोर व भ्रष्ट बता कर बदनाम कर रही है। हुआ भी कुछ ऐसा कि अखबार वालों ने मीणा के निर्णय को फर्जी हाजरी खाने पर काबू पाने के संदर्भ में इसका प्रकाशन किया। जाहिर तौर पर इससे निरीक्षकों, जमादारों व सफाई कर्मचारियों की भद्द पिटी। इस पर मीणा ने स्पष्ट कर दिया कि ऐसा कुछ भी नहीं है। जब निगम के किसी अधिकारी ने भ्रष्ट या चोर नहीं कहा है, तो उन्हें कैसे लग रहा है कि उन्हें चोर माना जा रहा है। उनके तेवर देख कर सबको सांप सूंघ गया। गर्मागर्मी तो बहुत हुई। बस यूं समझें कि उनके मुंह से यह नहीं निकला कि चोर की दाढ़ी में तिनका क्यूं नजर आ रहा है। पार्षदों को भी तकलीफ हुई कि इस कदम से उन पर अप्रत्क्ष रूप से फर्जी हाजरी खाने का आरोप आ रहा है, इस कारण वे भी बौखलाए, मगर मीणा ने साफ कर दिया कि उनका कोई भी हित नहीं है, उन्हें तो केवल शहर की बहबूदी का ख्याल है और इसमें पार्षदों को भी सहयोग करना चाहिए।
अपुन ने मीणा के निगम में लगते ही कह दिया था कि वे एक सुलझे हुए और व्यावहारिक प्रशासनिक अधिकारी हैं। कहां ठंडा होना है और कहां गर्म, उन्हें सब कुछ पता है। उन्हें अजमेर की नब्ज भी अच्छी तरह पता है। उम्मीद है कि वे ठीक वैसे ही कामयाब होंगे, जैसे किसी जमाने में उन्हीं के नाम राशि सी. आर. चौधरी कामयाब हुए थे। और सबसे बड़ी बात ये है कि जब निगम महापौर कमल बाकोलिया के आग्रह पर निगम में मीणा को तैनात किया है तो दोनों में पटनी ही है। ताजा प्रकरण में भी वे खुल कर मीणा के साथ दिखाई दिए। ऐसा लगता है कि मीणा के प्रयासों से शहर के हालात तो सुधरेंगे ही, निगम का ढ़ांचा भी सुधरेगा और किसी अधिकारी का मुंह काला करने या थप्पड़ मारने की जुर्रत कोई नहीं कर पाएगा।
जाते-जाते कैसे तय कर गए पत्रकारों के प्लॉट?
लो जाते-जाते जिला कलेक्टर व नगर सुधार न्यास अध्यक्ष राजेश यादव पत्रकारों की अरसा पुरानी मांग पूरी कर के उस पर ठप्पा लगा गए। बताया जाता है कि तकरीबन 55 पत्रकारों को प्लाट देना तय कर लिया गया है, अब केवल लॉटरी निकालना बाकी है।
यूं तो पत्रकारों में इस बात को लेकर बड़ी खुशी है कि आखिर न्यास प्रशासन ने उनकी सुध तो ली, लेकिन इसी के साथ इस सवाल पर भी कानाफूसी हो रही है कि जाते-जाते आखिरी दिन मेहरबानी करने का राज क्या है? जिन हालात में उनका सीएमओ में तबादला हुआ है, कुछ लोग इसको इससे जोड़ कर देख रहे हैं।
सर्वविदित ही है कि इन दिनों न्यास के भ्रष्टाचार को लेकर हंगामा मचा हुआ है। विपक्षी दल भाजपा तो फिर भी देर से जागा, मगर सत्तारूढ़ कांग्रेस ने ही आसमान सिर पर उठा लिया। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के जांच के आदेश दिए जाने के बाद जा कर कांग्रेसी चुप हुए हैं। ऐसा माना जा रहा है कि भले ही कांग्रसियों ने न्यास सचिव अश्फाक हुसैन और विशेषाधिकारी अनुराग भार्गव पर हमला किया, मगर उसकी आंच राजेश यादव पर भी पहुंच रही थी। स्वाभाविक सी बात है कि अकेले न्यास सचिव अपने स्तर पर थोड़े ही घपला कर सकते हैं। कदाचित यादव का कोई लेना-देना न हो तो भी न्यास के पदेन अध्यक्ष के नाते उनकी भी जिम्मेदारी तो बनती ही है। ईमानदारी से जांच हुई तो सब कुछ सामने आ जाएगा। बताते हैं कि सरकार ने इस प्रकरण को गंभीर माना है। फौरी तौर पर भले ही यादव को सीएमओ में लगाए जाने को उनका कद बढऩे के रूप में माना जा सकता है, लेकिन बताते हैं कि उन्हें काफी सोच-समझ कर ही वहां लगाया गया है। सीएमओ में पहले से सीनियर आईएएस बैठे हैं। ऐसे में जूनियर आईएएस की हालत एक बड़े बाबू से ज्यादा नहीं होती।
बहरहाल, माना ये जा रहा है कि यादव ने जाते-जाते पत्रकारों को खुश इसलिए किया ताकि वे उनके जाने के बाद पीछे से गड़े मुर्दे ज्यादा न उखाड़ें। इसकी दूसरी वजह ये मानी जाती है कि पहले वे इस कारण रुचि नहीं ले रहे थे, क्योंकि पत्रकारों के बीच प्लॉटों को लेकर विवाद चल रहा था। उनकी सोच ये रही होगी कि पत्रकारों के पचड़े में कौन पड़े। लेकिन जाते-जाते उन्हें लगा कि एक तो पत्रकारों को खुश कर दें और दूसरा ये कि अगर विवाद हुआ भी तो नया कलेक्टर निपटेगा।
शुक्रवार, 7 जनवरी 2011
गुरुवार, 6 जनवरी 2011
खादिमों की गुटबाजी से पिटे सैयद गुलाम ख्वाजा
पुलिस कप्तान बिपिन कुमार पांडे के चैंबर के बाहर अंजुमन सैयद जादगान प्रतिनिधिमंडल के एक सदस्य सैयद गुलाम ख्वाजा की पिटाई केवल उनके और पीटने वाली महिला के बीच का मामला नहीं था। इसमें अंजुमन की गुटबाजी की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। तभी तो इस वाकये के बाद अंजुमन में बवाल हो गया है और विपक्षी गुट ने सामूहिक इस्तीफा दे दिया है। विपक्षी गुट के नेता सैयद वाहिद हुसैन अंगारा के नेतृत्व में अंजुमन सदर को दिए गए पत्र में साफ तौर पर लिखा है कि सदर अगर राजनीति नहीं करते और कौमियत को सामने रखकर पहले ही खादिमों के दोनों पक्षों में कोई फैसला करवा देते तो सार्वजनिक स्थल पर एक जिम्मेदार खादिम की पिटाई नहीं होती।
असल में विरोधी गुट को तकलीफ इस कारण नहीं कि आपसी विवाद में एक खादिम सार्वजनिक रूप से पिट गया, बल्कि इस बात से है कि पिटने वाला खादिम उस प्रतिनिधिमंडल में शामिल था, जो पुलिस कप्तान पांडे का इस्तकबाल करने गया था और प्रतिनिधिमंडल के सामने ही सार्वजनिक रूप से पिटाई हो गई। जाहिर तौर पर इससे खादिम कौम के साथ अंजुमन भी बदनाम हुई। इससे खादिम समुदाय का उत्तेजित होना स्वाभाविक सा है। एक अरसे से सदर सैयद गुलाम किबरिया के कामकाज के तरीके से खफा विरोधी गुट ने मौके का भरपूर फायदा उठाया और सीधे सदर पर ही हमला बोल दिया है। उसने आगे-पीछे का पूरा हिसाब-किताब बराबर करते हुए सदर के कार्यकाल में भ्रष्टाचार के बोलबाले का आरोप तक जड़ दिया। इतना ही नहीं इज्रराइल के राजनयिक को दरगाह बुलाने से हुई खादिम कौम की बदनामी का मामला भी उछाल दिया है। सदर पर ये भी आरोप लगाया है कि वे केवल मीडिया में फोटो छपवा कर वाहवाही लूटने की फिराक में रहते हैं और कौम के हित में कुछ नहीं करते।
जहां तक अंजुमन प्रतिनिधिमंडल के एक सदस्य की सरे-आम पिटाई को लेकर कोई कार्यवाही न करने का सवाल है, ऐसा प्रतीत होता है कि सदर सैयद किबरिया की मजबूरी ये है कि पिटने वाले सैयद गुलाम ख्वाजा पर ऑन द रिकार्ड कोई आरोप नहीं है। अंदर का सच जो कुछ भी हो, मगर पुलिस मामले में एफआर लगा चुकी थी।
रहा सवाल इतने बड़े वाकये का, ऐसा प्रतीत होता है कि अकेली महिला की यह हिम्मत नहीं हो सकती कि वह इस बात का ध्यान रखे कि कब प्रतिनिधिमंडल एसपी से मिलने जा रहा है और उसके बाहर आते ही पिटाई शुरू कर दे। जरूर इसमें किसी न किसी जिम्मेदार शख्स की शह है, जिसके दम पर महिला ने सरे-राह इतनी बड़ी नौटंकी खड़ी कर दी। शक ये भी है कि इस नौटंकी को अंजाम देने के लिए बाकायदा षड्यंत्र रचा गया, ताकि अंजुमन सदर पर हमला बोला जा सके।
बहरहाल, अब जब कि मामले ने तूल पकड़ लिया है, बात दूर तक जाने का पूरा अंदेशा है। विरोधी गुट को अंजुमन सदर के खिलाफ आगामी चुनाव का मुद्दा बनाने का मौका मिल गया है। इतना ही नहीं अंजुमन सदर पर अब चुनाव समय पर कराने का दबाव भी बन गया है। इस सिलसिले में अंजुमन के तीसरे गुट ने भी मोर्चा खोल दिया है और साफ तौर पर मांग कर डाली है कि सदस्यों का कार्यकाल आगे न बढ़ाया जाए और 1 मार्च को कार्यकाल समाप्त होने को ध्यान में रखते हुए चुनाव कराए जाएं। लब्बोलुआब, यह साफ संकेत मिल रहे हैं कि आने वाले दिनों में होने वाले अंजुमन चुनाव और भी हंगामाखेज होंगे। उल्लेखनीय है कि तकरीबन तीन साल पहले जब अंजुमन के चुनाव हुए थे तो बड़ा विवाद और जबरदस्त परचेबाजी हुई थी और पूर्व सचिव सैयद सरवर चिश्ती ने बैक फुट पर आकर किंग मेकर की भूमिका निभाई थी। और नतीजतन अंजुमन को हाईटैक व खादिमों को शिक्षित जमात बनाने का उनका सपना अधूरा ही रह गया।
धर्मेश जैन के सवाल को चबा गए डॉ. बाहेती
हालांकि नगर सुधार न्यास के पूर्व अध्यक्ष डॉ. श्रीगोपाल बाहेती ने हाल ही सीडी कांड से पाक साफ हो कर निकले पूर्व अध्यक्ष धर्मेश जैन के हमले जवाब देते हुए उनकी चुनौती को तो स्वीकार कर लिया है कि भले ही उनके कार्यकाल की जांच करवाई जाए, मगर वे जैन के उस सवाल को तो चबा ही गए कि जो सीडी उन्होंने विधानसभा के पटल पर रखी थी, वह उनके पास कहां से आई थी। ज्ञातव्य है कि जैन ने न केवल उस सीडी के स्रोत पर सवाल किया था, अपितु संदेह भी जाहिर किया था कि कहीं सीडी बनवाने में उनका हाथ तो नहीं था। इस पर डॉ. बाहेती का सिर्फ ये कहना है कि सीडी में जैन पर गंभीर आरोप लगे थे और उन्होंने विपक्ष की भूमिका निभाते हुए उसे विधानसभा में पेश किया था। सीडी उनके पास कहां से आई, यह बात कोई मायने नहीं रखती।
असल में सीडी सीआईडी सीबी द्वारा संदिग्ध करार दिए जाने के बाद जैन को एक बहुत बड़ी राहत मिल गई है, लेकिन ने केवल जैन के लिए अपितु आमजन के सामने भी यह एक बड़ा सवाल है कि उस सीडी को किसने बनाया? षड्यंत्र किसने रचा? सीआईडी ने सीडी की एफएसएल जांच कर यह तो साफ कर दिया कि रिकार्डिंग की आवाज में कई अवरोध व जोड़ हैं, जिससे आवाज का प्रवाह जोड़-जोड़ कर बनाया गया है। सीआईडी सीबी ने सीडी बनाने वाले का पता लगाना असंभव माना है, लेकिन इस बात का खुलासा नहीं किया है कि पता लगाना संभव क्यों नहीं है। असल में उसने जांच केवल सीडी की सामग्री की ही की, न कि उसके स्रोत की। ऐसे में यह सवाल आज भी मौजूद है कि विधानसभा के पटल पर रखी गई सीडी डॉ. बाहेती के पास आखिर आई कहां से। यूं सीडी अखबार वालों के पास भी आई थी, लेकिन खुद सीआईडी सीबी ने ही मान लिया कि उन्होंने स्रोत उजागर न करने के विशेषाधिकार का इस्तेमाल कर यह बताने से इंकार कर दिया कि उनके पास सीडी कहां से आई। ऐसे में अकेले डॉ. बाहेती ही वह सूत्र हैं, जिनसे पता लग सकता है कि वह सीडी उनको किसने दी।
हालांकि यह सही है कि डॉ. बाहेती ने तो जो कुछ उनके पास आया, वह विधानसभा के समक्ष रख दिया, और उसी के आधार पर जैन को तत्काल इस्तीफा देना पड़ा, लेकिन अब जब कि वह फर्जी साबित हो गई है, यह सवाल ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है कि उसका स्रोत क्या था। उनका यह कहना उस वक्त की परिस्थिति में तो ठीक था, जब कि मामले से पर्दा नहीं हटा था, मगर सीडी फर्जी साबित होने के बाद यह कहना कि सीडी कहां से आई, यह बात कोई मायने नहीं रखती है, बड़ी हास्यास्पद लगती है।
असल में विरोधी गुट को तकलीफ इस कारण नहीं कि आपसी विवाद में एक खादिम सार्वजनिक रूप से पिट गया, बल्कि इस बात से है कि पिटने वाला खादिम उस प्रतिनिधिमंडल में शामिल था, जो पुलिस कप्तान पांडे का इस्तकबाल करने गया था और प्रतिनिधिमंडल के सामने ही सार्वजनिक रूप से पिटाई हो गई। जाहिर तौर पर इससे खादिम कौम के साथ अंजुमन भी बदनाम हुई। इससे खादिम समुदाय का उत्तेजित होना स्वाभाविक सा है। एक अरसे से सदर सैयद गुलाम किबरिया के कामकाज के तरीके से खफा विरोधी गुट ने मौके का भरपूर फायदा उठाया और सीधे सदर पर ही हमला बोल दिया है। उसने आगे-पीछे का पूरा हिसाब-किताब बराबर करते हुए सदर के कार्यकाल में भ्रष्टाचार के बोलबाले का आरोप तक जड़ दिया। इतना ही नहीं इज्रराइल के राजनयिक को दरगाह बुलाने से हुई खादिम कौम की बदनामी का मामला भी उछाल दिया है। सदर पर ये भी आरोप लगाया है कि वे केवल मीडिया में फोटो छपवा कर वाहवाही लूटने की फिराक में रहते हैं और कौम के हित में कुछ नहीं करते।
जहां तक अंजुमन प्रतिनिधिमंडल के एक सदस्य की सरे-आम पिटाई को लेकर कोई कार्यवाही न करने का सवाल है, ऐसा प्रतीत होता है कि सदर सैयद किबरिया की मजबूरी ये है कि पिटने वाले सैयद गुलाम ख्वाजा पर ऑन द रिकार्ड कोई आरोप नहीं है। अंदर का सच जो कुछ भी हो, मगर पुलिस मामले में एफआर लगा चुकी थी।
रहा सवाल इतने बड़े वाकये का, ऐसा प्रतीत होता है कि अकेली महिला की यह हिम्मत नहीं हो सकती कि वह इस बात का ध्यान रखे कि कब प्रतिनिधिमंडल एसपी से मिलने जा रहा है और उसके बाहर आते ही पिटाई शुरू कर दे। जरूर इसमें किसी न किसी जिम्मेदार शख्स की शह है, जिसके दम पर महिला ने सरे-राह इतनी बड़ी नौटंकी खड़ी कर दी। शक ये भी है कि इस नौटंकी को अंजाम देने के लिए बाकायदा षड्यंत्र रचा गया, ताकि अंजुमन सदर पर हमला बोला जा सके।
बहरहाल, अब जब कि मामले ने तूल पकड़ लिया है, बात दूर तक जाने का पूरा अंदेशा है। विरोधी गुट को अंजुमन सदर के खिलाफ आगामी चुनाव का मुद्दा बनाने का मौका मिल गया है। इतना ही नहीं अंजुमन सदर पर अब चुनाव समय पर कराने का दबाव भी बन गया है। इस सिलसिले में अंजुमन के तीसरे गुट ने भी मोर्चा खोल दिया है और साफ तौर पर मांग कर डाली है कि सदस्यों का कार्यकाल आगे न बढ़ाया जाए और 1 मार्च को कार्यकाल समाप्त होने को ध्यान में रखते हुए चुनाव कराए जाएं। लब्बोलुआब, यह साफ संकेत मिल रहे हैं कि आने वाले दिनों में होने वाले अंजुमन चुनाव और भी हंगामाखेज होंगे। उल्लेखनीय है कि तकरीबन तीन साल पहले जब अंजुमन के चुनाव हुए थे तो बड़ा विवाद और जबरदस्त परचेबाजी हुई थी और पूर्व सचिव सैयद सरवर चिश्ती ने बैक फुट पर आकर किंग मेकर की भूमिका निभाई थी। और नतीजतन अंजुमन को हाईटैक व खादिमों को शिक्षित जमात बनाने का उनका सपना अधूरा ही रह गया।
धर्मेश जैन के सवाल को चबा गए डॉ. बाहेती
हालांकि नगर सुधार न्यास के पूर्व अध्यक्ष डॉ. श्रीगोपाल बाहेती ने हाल ही सीडी कांड से पाक साफ हो कर निकले पूर्व अध्यक्ष धर्मेश जैन के हमले जवाब देते हुए उनकी चुनौती को तो स्वीकार कर लिया है कि भले ही उनके कार्यकाल की जांच करवाई जाए, मगर वे जैन के उस सवाल को तो चबा ही गए कि जो सीडी उन्होंने विधानसभा के पटल पर रखी थी, वह उनके पास कहां से आई थी। ज्ञातव्य है कि जैन ने न केवल उस सीडी के स्रोत पर सवाल किया था, अपितु संदेह भी जाहिर किया था कि कहीं सीडी बनवाने में उनका हाथ तो नहीं था। इस पर डॉ. बाहेती का सिर्फ ये कहना है कि सीडी में जैन पर गंभीर आरोप लगे थे और उन्होंने विपक्ष की भूमिका निभाते हुए उसे विधानसभा में पेश किया था। सीडी उनके पास कहां से आई, यह बात कोई मायने नहीं रखती।
असल में सीडी सीआईडी सीबी द्वारा संदिग्ध करार दिए जाने के बाद जैन को एक बहुत बड़ी राहत मिल गई है, लेकिन ने केवल जैन के लिए अपितु आमजन के सामने भी यह एक बड़ा सवाल है कि उस सीडी को किसने बनाया? षड्यंत्र किसने रचा? सीआईडी ने सीडी की एफएसएल जांच कर यह तो साफ कर दिया कि रिकार्डिंग की आवाज में कई अवरोध व जोड़ हैं, जिससे आवाज का प्रवाह जोड़-जोड़ कर बनाया गया है। सीआईडी सीबी ने सीडी बनाने वाले का पता लगाना असंभव माना है, लेकिन इस बात का खुलासा नहीं किया है कि पता लगाना संभव क्यों नहीं है। असल में उसने जांच केवल सीडी की सामग्री की ही की, न कि उसके स्रोत की। ऐसे में यह सवाल आज भी मौजूद है कि विधानसभा के पटल पर रखी गई सीडी डॉ. बाहेती के पास आखिर आई कहां से। यूं सीडी अखबार वालों के पास भी आई थी, लेकिन खुद सीआईडी सीबी ने ही मान लिया कि उन्होंने स्रोत उजागर न करने के विशेषाधिकार का इस्तेमाल कर यह बताने से इंकार कर दिया कि उनके पास सीडी कहां से आई। ऐसे में अकेले डॉ. बाहेती ही वह सूत्र हैं, जिनसे पता लग सकता है कि वह सीडी उनको किसने दी।
हालांकि यह सही है कि डॉ. बाहेती ने तो जो कुछ उनके पास आया, वह विधानसभा के समक्ष रख दिया, और उसी के आधार पर जैन को तत्काल इस्तीफा देना पड़ा, लेकिन अब जब कि वह फर्जी साबित हो गई है, यह सवाल ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है कि उसका स्रोत क्या था। उनका यह कहना उस वक्त की परिस्थिति में तो ठीक था, जब कि मामले से पर्दा नहीं हटा था, मगर सीडी फर्जी साबित होने के बाद यह कहना कि सीडी कहां से आई, यह बात कोई मायने नहीं रखती है, बड़ी हास्यास्पद लगती है।
बुधवार, 5 जनवरी 2011
शहर भाजपा अध्यक्ष के लिए पनपा एक और दावेदार
काफी दिनों तक शहर भाजपा के नए अध्यक्ष के रूप में पूर्व सांसद प्रो. रासासिंह रावत के प्रति आम सहमति के बाद उनके विकल्प के रूप में हालांकि प्रो. बी. पी. सारस्वत का नाम उभर कर आया है, लेकिन जैसे ही नगर सुधार न्यास के पूर्व अध्यक्ष सीडी के लंका दहन कांड से निकल कर सुंदरकांड में पहुंचे हैं, वे एक और दावेदार के रूप में माने जा रहे हैं। हालांकि सारस्वत के लिए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने लगभग आम सहमति बना ली है, लेकिन जैन के पाक साफ साबित होने के बाद समीकरणों में कुछ बदलाव तो आया ही है।
वैसे जैन स्वयं तो अध्यक्ष बनने में कोई रुचि नहीं ले रहे, मगर समझा जाता है कि उनके समर्थक इस बात पर जोर दे सकते हैं कि उन्हें फिर से प्रतिष्ठित किया जाए। उन्होंने न्यास अध्यक्ष के रूप में अपनी प्रशासकीय क्षमता तो दिखाई ही है, संगठन में भी काम करने का लंबा अनुभव है। कदाचित पार्टी हाईकमान उनकी वरिष्ठता और संपन्नता का लाभ उठाना चाहे। हालांकि जैन एक बार मौका पडऩे पर नगर सुधार न्यास के अध्यक्ष रह लिए, लेकिन उनकी वर्षों पुरानी इच्छा यही है कि वे सांसद का चुनाव लड़ें। पिछले दो चुनावों में उन्होंने इसके लिए प्रयास भी किया था, लेकिन सीडी कांड की चपेट में आने के बाद उनके राजनीतिक कैरियर में बेरियर लग गया था। अब जब कि उनका पुनर्जन्म हो गया है, समझा जाता है कि वे जल्द ही सक्रिय हो जाएंगे और पहले से भी ज्यादा जोश के साथ मैदान में आएंगे। असल में वे आरोप मुक्त होने के बाद काफी उत्साहित हैं।
जहां तक शहर भाजपा अध्यक्ष पद का सवाल है, कदाचित उनकी रुचि इस कारण न हो कि इस पद से प्रतिष्ठा तो मिलती है, लेकिन है ये काफी खर्चीला। विशेष रूप से विरोधी दल का होने के कारण आए दिन होने वाले खर्च को वहन करना कुछ कठिन काम है। यूं पार्टी की सेवा तो वे वर्षों से करते रहे हैं, मगर पद पर रहने पर सेवा एक ड्यूटी के रूप में हो जाती है। और अभी तो नया चुनाव होने में पूरे तीन साल बाकी हैं। फायदा सिर्फ इस रूप में माना जा सकता है कि अध्यक्ष होने के नाते टिकट वितरण में भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। वैसे पिछले नगर निगम चुनाव में जिस प्रकार विधायकों को ज्यादा तवज्जो मिली और मौजूदा अध्यक्ष शिवशंकर हेड़ा की जो दुर्गति हुई, उससे शहर अध्यक्ष बनना अब उतना लाभदायक नहीं माना जाता। एक बात और है, यदि लक्ष्य लोकसभा चुनाव पर हो तो व्यर्थ ही इस पद में उलझना शायद न चाहें। बहरहाल, फिलवक्त उनका नाम उभरा तो है, देखते हैं क्या होता है। उम्मीद है कि आगामी मकर संक्रांति के बाद जनवरी माह में ही नए अध्यक्ष की नियुक्ति हो जाएगी।
पुलिस कप्तान की नाक के नीचे मारपीट शर्मनाक
सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती की दरगाह में खादिमों की महत्वपूर्ण संस्था के सदस्य की पिटाई पुलिस कप्तान के कक्ष के बाहर एक महिला द्वारा होना, उस सदस्य के लिए उतनी शर्मनाक नहीं रही, जितनी कि पुलिस के लिए रही।
मंगलवार को कलेक्ट्रेट परिसर में पुलिस कप्तान के चैंबर के बाहर हुई इस वारदात ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि जब सर्वाधिक सुरक्षित जगह पर ही इस प्रकार की हरकत हो सकती है तो जिलेभर में पुलिस का नियंत्रण क्या होगा? इससे यह बात भी साफ हो गई है कि आदतन अपराधियों की तो छोड़ो, एक आम व्यक्ति में भी पुलिस का खौफ नहीं रहा कि वह पुलिस कप्तान के कक्ष के बाहर ही मारपीट को उतारु हो जाता है। मामला या आपसी रंजिश कैसी भी हो, मगर कलेक्ट्रेट में इस प्रकार की घटना होना साबित करता है हमलावरों के हौसले इतने बुलंद थे कि उन्होंने इतना तक इंतजार नहीं किया कि वे अपनी दुश्मनी निकालने के लिए कोई और स्थान चुन लें। हालांकि इस वारदात से मारपीट करने वालों का सुर्खियां पाने का मकसद तो पूरा हो गया, लेकिन पुलिस की तो नाक ही कट गई। अफसोसनाक बात ये रही कि अचानक हुए इस पूरे घटनाक्रम के दौरान पुलिस के कर्मचारी मूकदर्शक से खड़े रहे। बतातेे तो इतना भी हैं कि जैसे ही हंगामा हुआ, पुलिस कप्तान ने भी अपने चैंबर का दरवाजा खोल देखा और उसके तुरंत बाद चुपचाप अंदर जा कर बैठ गए। माना कि उन्हें खुद को कोई हाथ-पैर चलाने की जरूरत नहीं थी, लेकिन कम से कम तुरंत कार्यवाही तो कर ही सकते थे। कुल मिला कर इस पूरे प्रकरण से पीडि़त महिला ने भले ही अपने मन की पूरी कर ली हो और अंजुमन सदस्य की इज्जत तार-तार हो गई हो, मगर नए साल के पहले हफ्ते में ही पुलिस कप्तान के मिजाज से पर्दा हट गया है।
वैसे जैन स्वयं तो अध्यक्ष बनने में कोई रुचि नहीं ले रहे, मगर समझा जाता है कि उनके समर्थक इस बात पर जोर दे सकते हैं कि उन्हें फिर से प्रतिष्ठित किया जाए। उन्होंने न्यास अध्यक्ष के रूप में अपनी प्रशासकीय क्षमता तो दिखाई ही है, संगठन में भी काम करने का लंबा अनुभव है। कदाचित पार्टी हाईकमान उनकी वरिष्ठता और संपन्नता का लाभ उठाना चाहे। हालांकि जैन एक बार मौका पडऩे पर नगर सुधार न्यास के अध्यक्ष रह लिए, लेकिन उनकी वर्षों पुरानी इच्छा यही है कि वे सांसद का चुनाव लड़ें। पिछले दो चुनावों में उन्होंने इसके लिए प्रयास भी किया था, लेकिन सीडी कांड की चपेट में आने के बाद उनके राजनीतिक कैरियर में बेरियर लग गया था। अब जब कि उनका पुनर्जन्म हो गया है, समझा जाता है कि वे जल्द ही सक्रिय हो जाएंगे और पहले से भी ज्यादा जोश के साथ मैदान में आएंगे। असल में वे आरोप मुक्त होने के बाद काफी उत्साहित हैं।
जहां तक शहर भाजपा अध्यक्ष पद का सवाल है, कदाचित उनकी रुचि इस कारण न हो कि इस पद से प्रतिष्ठा तो मिलती है, लेकिन है ये काफी खर्चीला। विशेष रूप से विरोधी दल का होने के कारण आए दिन होने वाले खर्च को वहन करना कुछ कठिन काम है। यूं पार्टी की सेवा तो वे वर्षों से करते रहे हैं, मगर पद पर रहने पर सेवा एक ड्यूटी के रूप में हो जाती है। और अभी तो नया चुनाव होने में पूरे तीन साल बाकी हैं। फायदा सिर्फ इस रूप में माना जा सकता है कि अध्यक्ष होने के नाते टिकट वितरण में भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। वैसे पिछले नगर निगम चुनाव में जिस प्रकार विधायकों को ज्यादा तवज्जो मिली और मौजूदा अध्यक्ष शिवशंकर हेड़ा की जो दुर्गति हुई, उससे शहर अध्यक्ष बनना अब उतना लाभदायक नहीं माना जाता। एक बात और है, यदि लक्ष्य लोकसभा चुनाव पर हो तो व्यर्थ ही इस पद में उलझना शायद न चाहें। बहरहाल, फिलवक्त उनका नाम उभरा तो है, देखते हैं क्या होता है। उम्मीद है कि आगामी मकर संक्रांति के बाद जनवरी माह में ही नए अध्यक्ष की नियुक्ति हो जाएगी।
पुलिस कप्तान की नाक के नीचे मारपीट शर्मनाक
सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती की दरगाह में खादिमों की महत्वपूर्ण संस्था के सदस्य की पिटाई पुलिस कप्तान के कक्ष के बाहर एक महिला द्वारा होना, उस सदस्य के लिए उतनी शर्मनाक नहीं रही, जितनी कि पुलिस के लिए रही।
मंगलवार को कलेक्ट्रेट परिसर में पुलिस कप्तान के चैंबर के बाहर हुई इस वारदात ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि जब सर्वाधिक सुरक्षित जगह पर ही इस प्रकार की हरकत हो सकती है तो जिलेभर में पुलिस का नियंत्रण क्या होगा? इससे यह बात भी साफ हो गई है कि आदतन अपराधियों की तो छोड़ो, एक आम व्यक्ति में भी पुलिस का खौफ नहीं रहा कि वह पुलिस कप्तान के कक्ष के बाहर ही मारपीट को उतारु हो जाता है। मामला या आपसी रंजिश कैसी भी हो, मगर कलेक्ट्रेट में इस प्रकार की घटना होना साबित करता है हमलावरों के हौसले इतने बुलंद थे कि उन्होंने इतना तक इंतजार नहीं किया कि वे अपनी दुश्मनी निकालने के लिए कोई और स्थान चुन लें। हालांकि इस वारदात से मारपीट करने वालों का सुर्खियां पाने का मकसद तो पूरा हो गया, लेकिन पुलिस की तो नाक ही कट गई। अफसोसनाक बात ये रही कि अचानक हुए इस पूरे घटनाक्रम के दौरान पुलिस के कर्मचारी मूकदर्शक से खड़े रहे। बतातेे तो इतना भी हैं कि जैसे ही हंगामा हुआ, पुलिस कप्तान ने भी अपने चैंबर का दरवाजा खोल देखा और उसके तुरंत बाद चुपचाप अंदर जा कर बैठ गए। माना कि उन्हें खुद को कोई हाथ-पैर चलाने की जरूरत नहीं थी, लेकिन कम से कम तुरंत कार्यवाही तो कर ही सकते थे। कुल मिला कर इस पूरे प्रकरण से पीडि़त महिला ने भले ही अपने मन की पूरी कर ली हो और अंजुमन सदस्य की इज्जत तार-तार हो गई हो, मगर नए साल के पहले हफ्ते में ही पुलिस कप्तान के मिजाज से पर्दा हट गया है।
बेदाग होते ही डॉ. बाहेती को ललकारा धर्मेश जैन ने
सीडी के लंका दहन कांड से निकल कर सुंदरकांड में पहुंचते ही नगर सुधार न्यास के पूर्व अध्यक्ष धर्मेश जैन ने उन्हें शहीद करवाने में अहम भूमिका अदा करने वाले पूर्व विधायक डॉ. श्रीगोपाल बाहेती को ललकार दिया है। इतना ही नहीं उन्होंने खुद के कार्यकाल के साथ डॉ. बाहेती और पिछले दो साल के कार्यकाल की जांच करवाने की चुनौती दे दी है। समझा जाता है कि आने वाले दिनों वे न्यास को लेकर अन्य अनेक मामलों में ताबड़तोड़ हमले कर सकते हैं।
नए साल में बदली ग्रह दशा से उत्साहित जैन ने यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि यहा पता लगाया जाए कि आखिर सीडी आई कहां से थी। एक संवाददाता सम्मेलन में उन्होंने कहा कि जिस ऑडियो सीडी की वजह से उन्होंने नैतिकता के आधार पर अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था, उस सीडी को सीआईडी सीबी ने जांच में संदिग्ध करार दे दिया है, जिससे यह स्पष्ट हो गया है कि वह सीडी उनके खिलाफ एक बड़ा षड्यंत्र था। सीडी बनाने वालों ने न केवल उन्हें अपितु प्रदेश की श्रीमती वसुंधरा राजे सरकार को भी बदनाम करने की साजिश रची थी। उन्होंने कहा कि कदाचित भाजपा शासन काल में जांच रिपोर्ट पेश होती तो उस पर संदेह की गुंजाइश होती, मगर कांग्रेस शासन काल में ही जांच रिपोर्ट रखे जाने से साफ हो गया है कि उनके खिलाफ कितना बड़ा षड्यंत्र किया गया था।
जैन ने कहा कि सीआईडी सीबी ने साफ तौर पर माना है कि एफएसएल रिपोर्ट के अनुसार रिकार्डिंग की आवाज में कई अवरोध व जोड़ हैं, जिससे आवाज का प्रवाह जोड़-जोड़ कर बनाया गया है, अत: सीडी संदिग्ध प्रतीत होती है। हालांकि सीआईडी सीबी ने सीडी बनाने वाले का पता लगाना असंभव माना है, लेकिन यह सवाल आज भी मुंह बाये खड़ा है कि विधानसभा के पटल पर रखी गई सीडी आखिर आई कहां से? सरकार ने इसकी जांच क्यों नहीं की? सरकार से आग्रह है कि वह यह जांच कराए कि विधानसभा के में पेश की गई सीडी का मूल स्रोत क्या है? सरकार कांग्रेस के तत्कालीन पुष्कर विधायक डॉ. श्रीगोपाल बाहेती से भी जवाब-तलब करे कि वे सीडी कहां से ले कर आए? कहीं इसमें वे स्वयं तो संलिप्त नहीं हैं? आज जब कि वह सीडी संदिग्ध करार दे दी गई है, वह कहां से आई, इसका जवाब देने के लिए सर्वाधिक जिम्मेदार हैं कांग्रेस के तत्कालीन पुष्कर विधायक डॉ. श्रीगोपाल बाहेती व अन्य विधायक, जिन्होंने बिना किसी ठोस आधार के विधानसभा की कार्यवाही को तुरंत रोक कर चर्चा करने का प्रस्ताव रखा। उन्होंने न केवल झूठ का सहारा लेकर स्थगन प्रस्ताव के जरिए विधानसभा की कार्यवाही बाधित की, अपितु तत्कालीन भाजपा सरकार और उन्हें बदनाम करने की साजिश भी रची। हालांकि सीआईडी सीबी ने सीडी बनाने वाले का पता लगाना असंभव माना है, लेकिन जब तक सीडी के मूल स्रोत का पता नहीं लग जाता, तब तक यह खुलासा होना कठिन है कि उस षड्यंत्र में शामिल कौन था?
जैने ने कहा कि जैसे ही सीडी उजागर हुई, उन्होंने स्वयं पहल कर नैतिकता के आधार पर पद त्याग दिया और उनके कार्यकाल की जांच कराने का आग्रह किया। अब मौजूदा कांग्रेस सरकार को खुली चुनौती है कि वह न केवल उनके कार्यकाल, अपितु सीडी प्रकरण को उछालने वाले तत्कालीन विधायक डॉ.श्रीगोपाल बाहेती के न्यास के अध्यक्षीय कार्यकाल के साथ पिछले दो साल के कार्यकाल की भी जांच कराए, ताकि यह खुलासा हो सके कि न्यास में किस हद तक भ्रष्टाचार किया जा रहा है और आम जनता कितनी पीडि़त है।
उन्होंने कहा कि बिना किसी ठोस आधार पर सीडी प्रकरण को उछालने का परिणाम ये हुआ कि उन्होंने नैतिकता के आधार पर इस्तीफा दे दिया और उनके द्वारा शुरू किए गए सारे विकास कार्य ठप हो गए, जिसके लिए अजमेर की जनता डॉ. बाहेती को कोस रही है। कांग्रेस के सत्ता में आने बाद तो विकास कार्य पूरी तरह से बंद ही कर दिए गए हैं। अर्थात अकेले डॉ. बाहेती की वजह से अजमेर के तकरीबन तीन साल खराब हो गए हैं और कितना बड़ा नुकसान हुआ है। क्या बाहेती यह जवाब देंगे कि उनकी पार्टी की सरकार के बनने के बाद विकास कार्य क्यों बंद कर दिए और प्रशासन को भ्रष्टाचार करने की खुली छूट क्यों दी हुई है, जिससे आम जनता त्रस्त है? हालात ये है कि कांग्रेस सरकार दो साल बाद तक भी न्यास में जनता के प्रतिनिधित्व वाला बोर्ड गठित नहीं कर पाई है। इन दो सालों में न्यास में किस प्रकार भ्रष्टाचार का नग्न तांडव हो रहा है, इसका खुलासा खुद कांग्रेस के ही जिम्मेदार पदाधिकारी ही कर रहे हैं। क्या यह इस बात का संकेत नहीं है कि सरकारी संरक्षण में ही प्रशासनिक अधिकारियों को भ्रष्टाचार करने की छूट दे रखी गई है?
जैन ने कहा कि अकेले एक मामले से ही स्पष्ट हो रहा है कि कांग्रेस केवल झूठ पर ही टिकी हुई है। कांग्रेस ने आम जनता को बरगला कर पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे सरकार पर भ्रष्टाचार के अनेक आरोप लगाए। वे बार-बार खुली चुनौती दे रही हैं कि आरोपों को साबित करके दिखाएं, मगर आज दो साल बाद तक एक भी आरोप को वह सच साबित नहीं कर पाई है। आम जनता अच्छी तरह से जान गई है कि कांग्रेस को आम जनता के हित और विकास से कोई लेना-देना नहीं है और वह खुद भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी हुई है।
न्यास में व्याप्त भ्रष्टाचार पर अब भाजपा भी करेगी हमला
अजमेर नगर सुधार न्यास में व्याप्त भ्रष्टाचार को लेकर सत्तारूढ़ दल ने तो आसमान सिर पर उठा ही रखा है, अब भाजपा भी इस मामले में न्यास को घेरने जा रही है। हालांकि पूर्व में बुधवार को ही प्रदर्शन कर ज्ञापन देने की योजना थी, मगर उस दिन पूर्व राज्यपाल बलिराम भगत के निधन की वजह से अवकाश घोषित होने के कारण उसे टाल दिया गया। अब समझा जाता है कि नई जिला कलेक्टर मंजू राजपाल के कार्यभार संभालने के बाद ही भाजपा हल्ला बोलेगी। लंबे समय की चुप्पी के बाद भाजपा भी चाहती है कि सक्रियता दिखाई जाए, वरना आम जनता में गलत संदेश जाएगा कि कांग्रेस सत्ता में होते हुए भी जनहित के मुद्दे को उठा रही है, जबकि भाजपा चुप बैठी है। समझा जाता है कि न्यास पर हमले की जिम्मेदारी मौटे तौर पर न्यास के पूर्व सदर धर्मेश जैन को सौंपी जा सकती है, क्यों कि उनकी न्यास के मामलों में अच्छी जानकारी है।
जानकारी के अनुसार भाजपा ने भी न्यास में हो रहे करोड़ों रुपए के भ्रष्टाचार के तथ्य जुटा लिए हैं और साथ ही उन कामों को भी सूचीबद्ध किया जा रहा है, जिनको भाजपा शासनकाल में शुरू किया गया, लेकिन कांग्रेस ने सत्ता में आते ही उन्हें बंद कर दिया।
मामले का दिलचस्प पहलु ये है कि कांग्रेस ने भले ही केवल न्यास सचिव अश्फाक हुसैन व विशेषाधिकारी अनुराग भार्गव को निशाना बनाया है, मगर न्यास के पदेन अध्यक्ष होने के नाते जिला कलेक्टर राजेश यादव पर भी इसकी जिम्मेदारी है। उनका तबादला कर मुख्यमंत्री कार्यालय में लगाए जाने पर भी कई तरह की चर्चाएं हैं। कुछ लोग कह रहे हंै कि यादव को बचाने के लिए सरकार ने ऐसा किया है, जबकि कुछ लोग मानते हैं कि उन्हें इसी कारण हटाया गया है, क्यों कि यादव तक भी आंच वाली थी। सच क्या है यह सरकार ही जाने, मगर चर्चा है कि कांग्रेस के विरोध प्रदर्शन के बाद भी कोई कार्यवाही न होने के कारण अब भ्रष्टाचार के मामलों की सूची बना कर तथ्यों के साथ एसीबी को देने की रणनीति भी बनाई जा रही है। इसके अतिरिक्त सीबीआई जांच भी कराने पर जोर डाला जाएगा। समझा जाता है कि जिस प्रकार के प्रमाण हैं, न केवल जिम्मेदार अधिकारी अपितु कुछ प्रमुख भूमि दलाल शिकंजे में आ सकते हैं।
नए साल में बदली ग्रह दशा से उत्साहित जैन ने यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि यहा पता लगाया जाए कि आखिर सीडी आई कहां से थी। एक संवाददाता सम्मेलन में उन्होंने कहा कि जिस ऑडियो सीडी की वजह से उन्होंने नैतिकता के आधार पर अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था, उस सीडी को सीआईडी सीबी ने जांच में संदिग्ध करार दे दिया है, जिससे यह स्पष्ट हो गया है कि वह सीडी उनके खिलाफ एक बड़ा षड्यंत्र था। सीडी बनाने वालों ने न केवल उन्हें अपितु प्रदेश की श्रीमती वसुंधरा राजे सरकार को भी बदनाम करने की साजिश रची थी। उन्होंने कहा कि कदाचित भाजपा शासन काल में जांच रिपोर्ट पेश होती तो उस पर संदेह की गुंजाइश होती, मगर कांग्रेस शासन काल में ही जांच रिपोर्ट रखे जाने से साफ हो गया है कि उनके खिलाफ कितना बड़ा षड्यंत्र किया गया था।
जैन ने कहा कि सीआईडी सीबी ने साफ तौर पर माना है कि एफएसएल रिपोर्ट के अनुसार रिकार्डिंग की आवाज में कई अवरोध व जोड़ हैं, जिससे आवाज का प्रवाह जोड़-जोड़ कर बनाया गया है, अत: सीडी संदिग्ध प्रतीत होती है। हालांकि सीआईडी सीबी ने सीडी बनाने वाले का पता लगाना असंभव माना है, लेकिन यह सवाल आज भी मुंह बाये खड़ा है कि विधानसभा के पटल पर रखी गई सीडी आखिर आई कहां से? सरकार ने इसकी जांच क्यों नहीं की? सरकार से आग्रह है कि वह यह जांच कराए कि विधानसभा के में पेश की गई सीडी का मूल स्रोत क्या है? सरकार कांग्रेस के तत्कालीन पुष्कर विधायक डॉ. श्रीगोपाल बाहेती से भी जवाब-तलब करे कि वे सीडी कहां से ले कर आए? कहीं इसमें वे स्वयं तो संलिप्त नहीं हैं? आज जब कि वह सीडी संदिग्ध करार दे दी गई है, वह कहां से आई, इसका जवाब देने के लिए सर्वाधिक जिम्मेदार हैं कांग्रेस के तत्कालीन पुष्कर विधायक डॉ. श्रीगोपाल बाहेती व अन्य विधायक, जिन्होंने बिना किसी ठोस आधार के विधानसभा की कार्यवाही को तुरंत रोक कर चर्चा करने का प्रस्ताव रखा। उन्होंने न केवल झूठ का सहारा लेकर स्थगन प्रस्ताव के जरिए विधानसभा की कार्यवाही बाधित की, अपितु तत्कालीन भाजपा सरकार और उन्हें बदनाम करने की साजिश भी रची। हालांकि सीआईडी सीबी ने सीडी बनाने वाले का पता लगाना असंभव माना है, लेकिन जब तक सीडी के मूल स्रोत का पता नहीं लग जाता, तब तक यह खुलासा होना कठिन है कि उस षड्यंत्र में शामिल कौन था?
जैने ने कहा कि जैसे ही सीडी उजागर हुई, उन्होंने स्वयं पहल कर नैतिकता के आधार पर पद त्याग दिया और उनके कार्यकाल की जांच कराने का आग्रह किया। अब मौजूदा कांग्रेस सरकार को खुली चुनौती है कि वह न केवल उनके कार्यकाल, अपितु सीडी प्रकरण को उछालने वाले तत्कालीन विधायक डॉ.श्रीगोपाल बाहेती के न्यास के अध्यक्षीय कार्यकाल के साथ पिछले दो साल के कार्यकाल की भी जांच कराए, ताकि यह खुलासा हो सके कि न्यास में किस हद तक भ्रष्टाचार किया जा रहा है और आम जनता कितनी पीडि़त है।
उन्होंने कहा कि बिना किसी ठोस आधार पर सीडी प्रकरण को उछालने का परिणाम ये हुआ कि उन्होंने नैतिकता के आधार पर इस्तीफा दे दिया और उनके द्वारा शुरू किए गए सारे विकास कार्य ठप हो गए, जिसके लिए अजमेर की जनता डॉ. बाहेती को कोस रही है। कांग्रेस के सत्ता में आने बाद तो विकास कार्य पूरी तरह से बंद ही कर दिए गए हैं। अर्थात अकेले डॉ. बाहेती की वजह से अजमेर के तकरीबन तीन साल खराब हो गए हैं और कितना बड़ा नुकसान हुआ है। क्या बाहेती यह जवाब देंगे कि उनकी पार्टी की सरकार के बनने के बाद विकास कार्य क्यों बंद कर दिए और प्रशासन को भ्रष्टाचार करने की खुली छूट क्यों दी हुई है, जिससे आम जनता त्रस्त है? हालात ये है कि कांग्रेस सरकार दो साल बाद तक भी न्यास में जनता के प्रतिनिधित्व वाला बोर्ड गठित नहीं कर पाई है। इन दो सालों में न्यास में किस प्रकार भ्रष्टाचार का नग्न तांडव हो रहा है, इसका खुलासा खुद कांग्रेस के ही जिम्मेदार पदाधिकारी ही कर रहे हैं। क्या यह इस बात का संकेत नहीं है कि सरकारी संरक्षण में ही प्रशासनिक अधिकारियों को भ्रष्टाचार करने की छूट दे रखी गई है?
जैन ने कहा कि अकेले एक मामले से ही स्पष्ट हो रहा है कि कांग्रेस केवल झूठ पर ही टिकी हुई है। कांग्रेस ने आम जनता को बरगला कर पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे सरकार पर भ्रष्टाचार के अनेक आरोप लगाए। वे बार-बार खुली चुनौती दे रही हैं कि आरोपों को साबित करके दिखाएं, मगर आज दो साल बाद तक एक भी आरोप को वह सच साबित नहीं कर पाई है। आम जनता अच्छी तरह से जान गई है कि कांग्रेस को आम जनता के हित और विकास से कोई लेना-देना नहीं है और वह खुद भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी हुई है।
न्यास में व्याप्त भ्रष्टाचार पर अब भाजपा भी करेगी हमला
अजमेर नगर सुधार न्यास में व्याप्त भ्रष्टाचार को लेकर सत्तारूढ़ दल ने तो आसमान सिर पर उठा ही रखा है, अब भाजपा भी इस मामले में न्यास को घेरने जा रही है। हालांकि पूर्व में बुधवार को ही प्रदर्शन कर ज्ञापन देने की योजना थी, मगर उस दिन पूर्व राज्यपाल बलिराम भगत के निधन की वजह से अवकाश घोषित होने के कारण उसे टाल दिया गया। अब समझा जाता है कि नई जिला कलेक्टर मंजू राजपाल के कार्यभार संभालने के बाद ही भाजपा हल्ला बोलेगी। लंबे समय की चुप्पी के बाद भाजपा भी चाहती है कि सक्रियता दिखाई जाए, वरना आम जनता में गलत संदेश जाएगा कि कांग्रेस सत्ता में होते हुए भी जनहित के मुद्दे को उठा रही है, जबकि भाजपा चुप बैठी है। समझा जाता है कि न्यास पर हमले की जिम्मेदारी मौटे तौर पर न्यास के पूर्व सदर धर्मेश जैन को सौंपी जा सकती है, क्यों कि उनकी न्यास के मामलों में अच्छी जानकारी है।
जानकारी के अनुसार भाजपा ने भी न्यास में हो रहे करोड़ों रुपए के भ्रष्टाचार के तथ्य जुटा लिए हैं और साथ ही उन कामों को भी सूचीबद्ध किया जा रहा है, जिनको भाजपा शासनकाल में शुरू किया गया, लेकिन कांग्रेस ने सत्ता में आते ही उन्हें बंद कर दिया।
मामले का दिलचस्प पहलु ये है कि कांग्रेस ने भले ही केवल न्यास सचिव अश्फाक हुसैन व विशेषाधिकारी अनुराग भार्गव को निशाना बनाया है, मगर न्यास के पदेन अध्यक्ष होने के नाते जिला कलेक्टर राजेश यादव पर भी इसकी जिम्मेदारी है। उनका तबादला कर मुख्यमंत्री कार्यालय में लगाए जाने पर भी कई तरह की चर्चाएं हैं। कुछ लोग कह रहे हंै कि यादव को बचाने के लिए सरकार ने ऐसा किया है, जबकि कुछ लोग मानते हैं कि उन्हें इसी कारण हटाया गया है, क्यों कि यादव तक भी आंच वाली थी। सच क्या है यह सरकार ही जाने, मगर चर्चा है कि कांग्रेस के विरोध प्रदर्शन के बाद भी कोई कार्यवाही न होने के कारण अब भ्रष्टाचार के मामलों की सूची बना कर तथ्यों के साथ एसीबी को देने की रणनीति भी बनाई जा रही है। इसके अतिरिक्त सीबीआई जांच भी कराने पर जोर डाला जाएगा। समझा जाता है कि जिस प्रकार के प्रमाण हैं, न केवल जिम्मेदार अधिकारी अपितु कुछ प्रमुख भूमि दलाल शिकंजे में आ सकते हैं।
मंगलवार, 4 जनवरी 2011
यादव सीएमओ में, हासानी की बल्ले-बल्ले
अजमेर के जिला कलेक्टर राजेश यादव को सीएमओ में लगाने के राजनीतिक हलकों में जो भी अर्थ लगाए जा रहे हों, मगर इससे कांग्रेस के उन नेताओं के सीने पर सांप लौटने लगे हैं, जिनको यादव ने कभी नहीं गांठा। वे कई बार इसकी शिकायत मौखिक रूप से मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से करते रहे, मगर यादव का बाल भी बांका नहीं हुआ। इस कारण कई कांग्रेसी इसी का इंतजार करते रहे कि कब यादव साहब यहां से रुखसत होंगे। वैसे भी आईएएस का बाल इतना कडक़ होता है कि उसे बांका किया ही नहीं जा सकता। एक अर्थ में देखा जाए तो यादव ने यहां राजा बन कर ही काम किया। अर्थ तो इसके भी लगाए जा रहे हैं कि सीएमओ में पहले से दो आईएएस होने के बावजूद यादव सहित दो और युवा आईएएस को क्यों लगाया गया है।
खैर, जहां तक यादव का सवाल है, शिकायतों के कारण बाल बांका होना तो दूर, उलटे यादव का कद और बढ़ गया है। यादव का कद तो बढ़ा सो बढ़ा, राजनीतिक हलकों में माया मंदिर वाले दीपक हासानी की भी अहमियत बढ़ गई। जैसे ही यह खबर आई कि यादव साहब सीएमओ में लगाए गए हैं, हासानी को भी बधाइयां मिलने लगीं। असल में हासानी की यादव से गहरी दोस्ती है। बताया जा रहा है कि जब से वे यूआईटी में अध्यक्ष पद के लिए हाथ मार रहे हैं, यादव भी उनकी मदद कर रहे हैं। इसे यूं भी कहा जा सकता है कि प्रशासन से जो रिपोर्ट गई है, उसमें हासानी को इस पद के लिए सर्वाधिक अनुकूल माना गया है। एक तो वे संपन्न हैं, इस कारण पद पर बैठते ही खाने के लिए नहीं टूट पड़ेंगे, और दूसरा ये कि इससे कांग्रेस से खफा सिंधी समाज भी राजी हो जाएगा। अब जबकि यादव खुद ही सीएमओ में पहुंच गए हैं तो यूं समझो कि हासानी की बल्ले-बल्ले हो गई है। जाहिर तौर पर हासानी के लिए अब और बेहतर तरीके से लॉबिंग होगी। अकेले यूआईटी सदर के लिए क्यों और कई मामलों में भी हासानी के लिए यादव का सीएमओ में पहुंचना काफी महत्वपूर्ण है। सबको पता है कि हासानी की अफसरों में खासी उठ-बैठ है। यादव के सीएमओ में होने पर यह और भी बढ़ जाएगी।
खैर, जहां तक यादव का सवाल है, शिकायतों के कारण बाल बांका होना तो दूर, उलटे यादव का कद और बढ़ गया है। यादव का कद तो बढ़ा सो बढ़ा, राजनीतिक हलकों में माया मंदिर वाले दीपक हासानी की भी अहमियत बढ़ गई। जैसे ही यह खबर आई कि यादव साहब सीएमओ में लगाए गए हैं, हासानी को भी बधाइयां मिलने लगीं। असल में हासानी की यादव से गहरी दोस्ती है। बताया जा रहा है कि जब से वे यूआईटी में अध्यक्ष पद के लिए हाथ मार रहे हैं, यादव भी उनकी मदद कर रहे हैं। इसे यूं भी कहा जा सकता है कि प्रशासन से जो रिपोर्ट गई है, उसमें हासानी को इस पद के लिए सर्वाधिक अनुकूल माना गया है। एक तो वे संपन्न हैं, इस कारण पद पर बैठते ही खाने के लिए नहीं टूट पड़ेंगे, और दूसरा ये कि इससे कांग्रेस से खफा सिंधी समाज भी राजी हो जाएगा। अब जबकि यादव खुद ही सीएमओ में पहुंच गए हैं तो यूं समझो कि हासानी की बल्ले-बल्ले हो गई है। जाहिर तौर पर हासानी के लिए अब और बेहतर तरीके से लॉबिंग होगी। अकेले यूआईटी सदर के लिए क्यों और कई मामलों में भी हासानी के लिए यादव का सीएमओ में पहुंचना काफी महत्वपूर्ण है। सबको पता है कि हासानी की अफसरों में खासी उठ-बैठ है। यादव के सीएमओ में होने पर यह और भी बढ़ जाएगी।
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