शहर महिला कांग्रेस की कार्यकारिणी ने अब जा कर सामूहिक इस्तीफा देते हुए शहर अध्यक्ष सुरजीत कपूर को हटाने का विरोध दर्ज करवाया है। और उससे भी मजेदार बात ये है कि उन्होंने सुरजीत को बिना जांच-पड़ताल के पद से हटाने की वजह बताते हुए इस्तीफा दिया है।
सवाल ये है कि जब एडवोकेट दिनेश राठौड़ ने आत्महत्या करने की कोशिश के लिए सुरजीत कपूर को जिम्मेदार ठहराया था और प्रदेश महिला कांग्रेस अध्यक्ष विजयलक्ष्मी विश्राई ने उन्हें तुरंत हटाया था, तब पूरी कार्यकारिणी की एक भी सदस्या को यह ख्याल क्यों नहीं आया कि सुरजीत को बिना जांच-पड़ताल के हटाया जा रहा है। तब तो सबकी सब चुपचाप तमाशा देखती रहीं और अब जब कि वकील दिनेश राठौड़ ने यह स्वीकार कर लिया है कि सुरजीत के साथ उसके बेहतरीन संबंध थे, उसे उसने लोगों के भडक़ाने पर मुफ्त ही बदनाम कर दिया था, सुरजीत की संगिनियों को याद आया है कि सुरजीत को हटाने का विरोध दर्ज करवाया जाए। यानि कि वह उक्ति वाकई सही है कि सुख में सब साथी, दुख में न कोय।
उल्लेखनीय है कि राठौड़ ने पूर्व में कहा था कि उसने सुरजीत के साथ खोड़ा गणेश में शादी की थी। यह आरोप तक लगाया था कि सुरजीत के एक पुलिस अफसर के साथ अवैध संबंध थे। आत्महत्या की कोशिश करने पर न केवल वे खुद गिरफ्तार हुए, अपितु सुरजीत को भी गिरफ्तार होना पड़ा। बाद में दोनों जमानत पर रिहा हो गए। सुरजीत न केवल बदनाम हुई, बल्कि पुलिस केस में भी फंसी। इतना ही नहीं, उन्होंने शहर महिला कांग्रेस अध्यक्ष का पद तक खो दिया। बाद में राठौड़ ने विजय लक्ष्मी विश्नोई को पत्र लिख कर मांगी, तो यह उम्मीद की जा रही थी कि सुरजीत का दाग मिटने पर वे उन्हें फिर से पद पर काबिज कर देंगी, लेकिन हुआ कुछ भी नहीं। ऐसा लगता है कि काफी दिन के इंतजार के बाद न केवल सुरजीत, बल्कि उनकी साथिनों को भी विचार आया है कि फिर से अध्यक्ष बनाए जाने के लिए दबाव बनाया जाए, सो सामूहिक इस्तीफे की रणनीति बनाई गई है। वैसे कायदे से होना भी यह चाहिए कि आरोप से मुक्त होने के बाद उन्हें फिर से पदारूढ़ किया जाना चाहिए, क्योंकि इसी आरोप की वजह से उन्हें हटाया गया था, लेकिन कार्यकारिणी का यह कहना की वे तो सुरजीत को बिना जांच-पड़ताल के हटाने के कारण इस्तीफा दे रही हैं तो ये सवाल उठता ही है कि अब जब कि सुरजीत आरोप मुक्त हुई हैं, तब क्यों हिमायती बन रही हैं, उसी वक्त यह कह कर साथ क्यों नहीं खड़ी हो गई थीं कि सुरजीत को फंसाया गया है। कहीं इस कारण तो नहीं कि उन्हें सुरजीत के फिर से पद पर काबिज होने के कोई संकेत मिल रहे हैं और लगता है कि सुरजीत दुबारा बनीं तो कार्यकारिणी के पदों को ताश के पत्तों की तरह फैंट सकती हैं। या फिर इस कारण कि उन्हें ये लग रहा है कि अगर कोई और अध्यक्ष बनी तो वह उन्हें हटा कर नई टीम का गठन करेगी। बहरहाल, देखते हैं इस सामूहिक इस्तीफे की रणनीति काम करती है या नहीं।
ऊपर वाले को इनाम, नीचे वाले को दंड?
कैसी विडंबना है कि हमारे प्रशासनिक तंत्र में अच्छा काम करने पर तो ऊपर के अधिकारी को इनाम दिया जाता है, जबकि गलती या लापरवाही करने पर नीचे वाले कर्मचारी की खाल खींची जाती है।
वाकया देखिए। चुनाव ड्यूटी पर लगे कर्मचारियों को ऑनलाइन पेमेंट करने के नवप्रयोग में उत्तर भारत में अजमेर को पहला स्थान मिलने पर अजमेर के पूर्व जिला कलेक्टर और सीएमओ में तैनात विशिष्ट शासन सचिव राजेश यादव को आगामी 25 जनवरी को दिल्ली में राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल 25 हजार रुपए के नकद इनाम व ट्रॉफी से नवाजेंगी। तस्वीर का दूसरा रुख देखिए कि उन्हीं के कलेक्ट्रत्व में चुनाव में लापरवाही बरत कर पचास हजार मतदाताओं को मतदान से वंचित कर दिए जाने का दंड बीएलओ लेवल पर देने की कवायद चल रही है।
इसमें कोई दोराय नहीं कि लोकसभा, विधानसभा व पंचायत चुनाव में नवाचार के लिए यादव बधाई के पात्र हैं। जाहिर तौर पर उन्हीं नेतृत्व में यह नवाचार अंजाम दिया गया, लेकिन इसे लागू करने में निश्चित रूप से पूरी टीम का भी योगदान रहा होगा। परंपरा यही है कि टीम लीडर को ही इनाम के लिए बुलाया जाता है, लेकिन यदि टीम गलती करे तो टीम लीडर की खिंचाई करने की बजाय यह तलाशने की कोशिश की जा रही है कि आखिर किस स्तर पर लापरवाही बरती गई। सवाल ये उठता है कि यदि टीम की कामयाबी पर लीडर को सम्मानित किया जाता है तो उसी लीडर की अनदेखी की वजह से टीम गलती करती है तो उसे दंडित क्यों नहीं किया जाता। सम्मान और दंड को एक ही तराजू पर क्यों नहीं तोला जाता?
यहां उल्लेखनीय है कि नगर निगम चुनाव में मतदाता सूचियों में बड़े पैमाने पर लापरवाही और गड़बड़ी के मामले में बड़े अधिकारी तो बड़ी सफाई से बच और जिन बीएलओ को दोषी माना गया था, उनके खिलाफ कार्यवाही की कवायद की जा रही है। हकीकत तो ये है कि जिस प्रकार कार्यवाही की जा रही है, उससे लीपापोती की संभावना ज्यादा ही नजर आती है। दोषी पाए गए बीएलओ के खिलाफ कार्यवाही करने के लिए संबंधित विभागों को कहा गया था, लेकिन उन्होंने ध्यान ही नहीं दिया। वस्तुत: मतदाता सूचियों में गड़बड़ी इतनी बड़ी थी कि अनुमानत: पचास हजार मतदाता वोट देने से वंचित रह गए थे। तकनीकी रूप से भले ही प्रशासन इस कारण बच रहा था कि उसने तो बाकायदा समय-समय पर लोगों को चेताया, मगर सवाल ये था कि जिसने पिछलेे लोकसभा चुनाव में वोट दिया था, वह भला क्यों जा कर देखेगा कि उसका नाम मतदाता सूची में है या नहीं। इस मामले को लेकर एक-दो दिन तो बड़ा हंगामा हुआ और अखबार वालों ने भी पूरे के पूरे पेज रंग दिये। मीडिया बार-बार मामले को उछाल रहा था, इस कारण मजबूरी में प्रशासन ने बीएलओ को ही बली का बकरा बनाने की सोची। असल में धरातल पर तो वे ही दोषी थे, क्योंकि मतदाता सूचियां बनवाने का काम सीधे तौर पर उन्होंने ही किया था। जिला निर्वाचन अधिकारी और रिटर्निंग ऑफिसर इस कारण दोषी थे कि भले ही सीधे तौर पर उन्होंने कोई गड़बड़ी नहीं की, मगर यह सवाल तो था ही कि उन्हीं के देखरेख में इतनी बड़ी लापरवाही कैसे हो गई।
कुल मिला कर जब तक हमारे तंत्र में दोहरे पैमाने होंगे, सुधार की की गुंजाइशें उतनी ही कम हो जाएंगी।
मंगलवार, 18 जनवरी 2011
गुरुवार, 13 जनवरी 2011
यह तो अभी शुरुआत है बाकोलिया जी
करीब बीस साल के कथित कुशासन और भ्रष्टाचार को समाप्त करने की दुहाई दे कर नगर निगम के मेयर पद पर काबिज कमल बाकोलिया अभी निगम की कार्यप्रणाली को समझ ही रहे थे कि खुद उनकी ही पार्टी के पार्षदों की ओर से उन्हें चुनौती मिलने लगी है। भले ही बाकोलिया यह कह एक बार बच लें कि उन्हें पता नहीं कि लौंगिया मोहल्ले में श्रवण खटीक के अवैध मकान का उन्हें पता नहीं, मगर यह तो जानकारी हो ही गई है कि अगर निगम प्रशासन ने कांग्रेसी कार्यकर्ताओं की ओर भी आंख उठाई तो तो कांग्रेस के पार्षद उनकी तरफदारी में लामबंद हो जाने वाले हैं। खटीक वाले मामले में तो एक हो ही गए हैं। भले ही मकान के कागजात देखने से पता लगेगा कि वह अवैध है या नहीं, मगर कांग्रेसी पार्षदों ने तो उसे वैध करार दे दिया है, क्योंकि वह कांग्रेसी कार्यकर्ता का है। इतना ही नहीं, उन्होंने लामबंद हो कर निगम परिसर में प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी भी की। कहने भर को यह भले ही एक सामान्य सी घटना होगी क्यों कि निगम में इस प्रकार आए दिन होता रहता है, मगर बाकोलिया के लिए यह एक बड़ा सिरदर्द बनने वाली है।
अफसोसनाक बात ये है कि अखबारों में खुल कर इस शीर्षक से खबरें छप रही हैं कि अवैध निर्माण के पक्ष में और कांग्रेसी पार्षद जुटे, इसके बावजूद अवैध निर्माण के पक्ष में लामबंद होने वालों को कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। वे तो उलटा इस पर मलाल कर रहे हैं कि सत्ता में आते ही नेताओं ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं के हितों को भुला दिया है। यानि निगम के कानून-कायदे जाएं भाड़ में, चूंकि मेयर पद पर कांग्रेस के बाकोलिया काबिज हंै, तो कांग्रसी कार्यकर्ताओं के हितों का तो ध्यान रखा ही जाना चाहिए। उन्हें इस बात से भी तकलीफ है कि निगम के अधिकारी बाकोलिया को कोई जानकारी दिए बिना ही फैसले ले रहे हैं। अर्थात वे यह कहना चाहते हैं कि जब भी किसी अवैध निर्माण को तोड़ा जाए तो पहले बाकोलिया से पूछा जाए कि वह तोड़ा जाए या नहीं। और अगर एक-एक बात पूछ कर ही काम करने लगे तो हो गया शहर का उद्धार। इसका एक अर्थ और भी है, वो यह कि बाकोलिया पर यह जिम्मेदारी बिना कहे ही लादी जा रही है कि वे कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के हितों के ध्यान रखें और निगम अधिकारियों को निर्देश दें कि वे कम से कम किसी कांग्रेसी का अवैध निर्माण तोडऩे से पहले उन्हें जानकारी दे दें। खैर, अभी तो शुरुआत है। बाकोलिया के सामने एक नहीं, ऐसे अनेक मामले आने वाले हैं। खटीक का मकान तो केवल एक परखी है। ऐसे में बाकोलिया की परीक्षा के दिन आ चुके हैं। नए-नए बने थे तो बधाइयों का तांता लगा और उसके कारण अब तक खुशनुमा दिन बिता लिए, मगर अब ऐसे-ऐसे उलझे हुए मामले सामने आते जाएंगे। ऐसे में बाकोलिया चुनाव के समय किए वादे को ध्यान में रखते हैं या फिर खुद भी हथियार डाल कर बहती धारा के साथ बहने लगते हैं। भले ही वे कुछ दिन शर्माशर्मी में खुद बहने से बचते रहें, मगर उनके साथी तो बहने को तैयार नजर आते हैं। बहुत जल्द ही वे दिन भी आ जाएंगे कि उन्हें भी बहने को मजबूर किया जाएगा। मजबूर इसलिए होंगे क्योंकि वे देखेंगे कि वे भले ही खुद भ्रष्टाचार नहीं कर रहे, मगर और तो जम कर कर रहे हैं। और उनकी बुराई का ठीकरा उनके ही सिर गिर रहा है। देखना ये होगा कि बाकोलिया शहर को कुछ नया देने की खातिर भ्रष्टाचार से मुकाबला करते हैं या फोकट की बदनामी की बजाय खा-पी कर बदनाम होना पसंद करते हैं।
सवाल दानपेटी में आग लगने का नहीं है
लो सांप्रदायिक सौहार्द्र का संदेश देने वाले सूफी सिलसिले के दुनिया के सबसे बड़े मरकज दरगाह ख्वाजा साहब में हुआ एक और वाकया इन दिनों नाजिम और खादिमों के बीच विवाद का विषय बना हुआ है। पिछले दिनों किसी शरारती तत्त्व में दरगाह शरीफ में रखी दानपेटी में आग लगा दी, जिससे उसमें रखे नोट जल गए। अब विवाद ये है कि यह आग आखिर किसने लगाई? अंजुमन को तकलीफ ये है कि नाजिम ने इस बारे में जिस तरह का बयान दिया है, उससे यह संकेत मिलता है कि वे इसके लिए खादिमों पर संदेह व्यक्त कर रहे हैं। और नाजिम इस तकलीफ में हैं कि खादिम इस घटना के लिए दरगाह कमेटी प्रशासन को जिम्मेदार मान रहे हैं। नाजिम का संदेह तो फिर भी संदेह ही है, मगर यह तो सही ही है कि इस आग के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार कमेटी प्रशासन है, जो कि दरगाह परिसर की अंदरुनी व्यवस्थाओं को अंजाम देता है। इस जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता। आग भले ही नाजिम ने नहीं लगाई हो, मगर उनकी व्यवस्था में खामी की वजह से ही तो यह घटना हुई है। रहा सवाल खादिमों का तो वे ख्वाजा साहब की खिदमत करने के अलावा परंपरागत रूप से जायरीन को जियारत करवाते हैं।
खैर, आग भले ही किसी ने भी लगाई हो, मगर कड़ाके की सर्दी में दोनों ही पक्ष इससे हाथ तपते दिखाई दे रहे हैं। और होना भी आखिर ये है कि ये कभी पता नहीं लगेगा कि आग किसने लगाई, और जैसे हालात हैं आगे भी इस तरह आग लगती रही तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए, मगर समस्या उससे कहीं बड़ी है। नोटों की आग तो फिर भी बुझाई जा सकती है। आगे न हो, इस पर रोक के इंतजाम भी हो सकते हैं, मगर दोनों पक्षों के बीच जो आग लगी हुई है, वह कब बुझेगी, इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। असल में यह आग है ही ऐसी इसके बुझने की कोई संभावना नहीं है। दरगाह कमेटी व नाजिम कहने भर को दरगाह के अंदरुनी इंतजामों को देखते हैं, असल में दरगाह परिसर में सिक्का खादिमों का ही चलता है। एक तो उन्हें जियारत की धार्मिक रस्म अदा करवाने का हक है, दूसरा वे साधन-संपन्न होने के साथ रसूखदार भी हैं। बड़े-बड़े नेता उनके हाथ चूमते हैं। दरगाह कमेटी के कर्मचारी उनके सामने कहीं नहीं ठहरते। कर्मचारी क्या नाजिम तक नहीं ठहरते। यही वजह है कि वे हर वक्त तलवार की धार पर चलते रहते हैं। पता नहीं कब वे धार की चपेट में आ जाएं। एक अर्थ में देखा जाए तो नाजिम इतने कमजोर अधिकारी हैं कि सदैव निशाने पर रहते हैं। जब देखो, उनकी शिकायत होती रहती है। ताजा मामले में भी वे निशाने पर आ गए हैं। होना जाना कुछ नहीं है। केन्द्रीय अल्पसंख्यक मामलात विभाग भी जानता है कि यहां की हकीकत क्या है। उसके पास नाजिम को और अधिकार संपन्न बनाने के न जाने कितने प्रस्ताव जा चुके हैं, मगर उस पर कोई ध्यान नहीं दिया गया।
बहरहाल, इन सब सियासी दाव-पेचों को ताक पर रख कर विचार किया जाए तो अहम मुद्दा ये है कि खादिमों व नाजिम के बीच होने वाले इन विवादों से इस कदीमी मरकज के बारे में जो छवि बन रही है, उसकी किसी को फिक्र नहीं है। और जब तक इस दिशा में नहीं सोचा जाएगा, तब तक यूं ही छोटी-मोटी आगें लगती-बुझती रहेंगी और दोनों पक्षों के बीच भी लगी हुई अखंड आग प्रज्ज्वलित रहेगी।
अफसोसनाक बात ये है कि अखबारों में खुल कर इस शीर्षक से खबरें छप रही हैं कि अवैध निर्माण के पक्ष में और कांग्रेसी पार्षद जुटे, इसके बावजूद अवैध निर्माण के पक्ष में लामबंद होने वालों को कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। वे तो उलटा इस पर मलाल कर रहे हैं कि सत्ता में आते ही नेताओं ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं के हितों को भुला दिया है। यानि निगम के कानून-कायदे जाएं भाड़ में, चूंकि मेयर पद पर कांग्रेस के बाकोलिया काबिज हंै, तो कांग्रसी कार्यकर्ताओं के हितों का तो ध्यान रखा ही जाना चाहिए। उन्हें इस बात से भी तकलीफ है कि निगम के अधिकारी बाकोलिया को कोई जानकारी दिए बिना ही फैसले ले रहे हैं। अर्थात वे यह कहना चाहते हैं कि जब भी किसी अवैध निर्माण को तोड़ा जाए तो पहले बाकोलिया से पूछा जाए कि वह तोड़ा जाए या नहीं। और अगर एक-एक बात पूछ कर ही काम करने लगे तो हो गया शहर का उद्धार। इसका एक अर्थ और भी है, वो यह कि बाकोलिया पर यह जिम्मेदारी बिना कहे ही लादी जा रही है कि वे कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के हितों के ध्यान रखें और निगम अधिकारियों को निर्देश दें कि वे कम से कम किसी कांग्रेसी का अवैध निर्माण तोडऩे से पहले उन्हें जानकारी दे दें। खैर, अभी तो शुरुआत है। बाकोलिया के सामने एक नहीं, ऐसे अनेक मामले आने वाले हैं। खटीक का मकान तो केवल एक परखी है। ऐसे में बाकोलिया की परीक्षा के दिन आ चुके हैं। नए-नए बने थे तो बधाइयों का तांता लगा और उसके कारण अब तक खुशनुमा दिन बिता लिए, मगर अब ऐसे-ऐसे उलझे हुए मामले सामने आते जाएंगे। ऐसे में बाकोलिया चुनाव के समय किए वादे को ध्यान में रखते हैं या फिर खुद भी हथियार डाल कर बहती धारा के साथ बहने लगते हैं। भले ही वे कुछ दिन शर्माशर्मी में खुद बहने से बचते रहें, मगर उनके साथी तो बहने को तैयार नजर आते हैं। बहुत जल्द ही वे दिन भी आ जाएंगे कि उन्हें भी बहने को मजबूर किया जाएगा। मजबूर इसलिए होंगे क्योंकि वे देखेंगे कि वे भले ही खुद भ्रष्टाचार नहीं कर रहे, मगर और तो जम कर कर रहे हैं। और उनकी बुराई का ठीकरा उनके ही सिर गिर रहा है। देखना ये होगा कि बाकोलिया शहर को कुछ नया देने की खातिर भ्रष्टाचार से मुकाबला करते हैं या फोकट की बदनामी की बजाय खा-पी कर बदनाम होना पसंद करते हैं।
सवाल दानपेटी में आग लगने का नहीं है
लो सांप्रदायिक सौहार्द्र का संदेश देने वाले सूफी सिलसिले के दुनिया के सबसे बड़े मरकज दरगाह ख्वाजा साहब में हुआ एक और वाकया इन दिनों नाजिम और खादिमों के बीच विवाद का विषय बना हुआ है। पिछले दिनों किसी शरारती तत्त्व में दरगाह शरीफ में रखी दानपेटी में आग लगा दी, जिससे उसमें रखे नोट जल गए। अब विवाद ये है कि यह आग आखिर किसने लगाई? अंजुमन को तकलीफ ये है कि नाजिम ने इस बारे में जिस तरह का बयान दिया है, उससे यह संकेत मिलता है कि वे इसके लिए खादिमों पर संदेह व्यक्त कर रहे हैं। और नाजिम इस तकलीफ में हैं कि खादिम इस घटना के लिए दरगाह कमेटी प्रशासन को जिम्मेदार मान रहे हैं। नाजिम का संदेह तो फिर भी संदेह ही है, मगर यह तो सही ही है कि इस आग के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार कमेटी प्रशासन है, जो कि दरगाह परिसर की अंदरुनी व्यवस्थाओं को अंजाम देता है। इस जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता। आग भले ही नाजिम ने नहीं लगाई हो, मगर उनकी व्यवस्था में खामी की वजह से ही तो यह घटना हुई है। रहा सवाल खादिमों का तो वे ख्वाजा साहब की खिदमत करने के अलावा परंपरागत रूप से जायरीन को जियारत करवाते हैं।
खैर, आग भले ही किसी ने भी लगाई हो, मगर कड़ाके की सर्दी में दोनों ही पक्ष इससे हाथ तपते दिखाई दे रहे हैं। और होना भी आखिर ये है कि ये कभी पता नहीं लगेगा कि आग किसने लगाई, और जैसे हालात हैं आगे भी इस तरह आग लगती रही तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए, मगर समस्या उससे कहीं बड़ी है। नोटों की आग तो फिर भी बुझाई जा सकती है। आगे न हो, इस पर रोक के इंतजाम भी हो सकते हैं, मगर दोनों पक्षों के बीच जो आग लगी हुई है, वह कब बुझेगी, इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। असल में यह आग है ही ऐसी इसके बुझने की कोई संभावना नहीं है। दरगाह कमेटी व नाजिम कहने भर को दरगाह के अंदरुनी इंतजामों को देखते हैं, असल में दरगाह परिसर में सिक्का खादिमों का ही चलता है। एक तो उन्हें जियारत की धार्मिक रस्म अदा करवाने का हक है, दूसरा वे साधन-संपन्न होने के साथ रसूखदार भी हैं। बड़े-बड़े नेता उनके हाथ चूमते हैं। दरगाह कमेटी के कर्मचारी उनके सामने कहीं नहीं ठहरते। कर्मचारी क्या नाजिम तक नहीं ठहरते। यही वजह है कि वे हर वक्त तलवार की धार पर चलते रहते हैं। पता नहीं कब वे धार की चपेट में आ जाएं। एक अर्थ में देखा जाए तो नाजिम इतने कमजोर अधिकारी हैं कि सदैव निशाने पर रहते हैं। जब देखो, उनकी शिकायत होती रहती है। ताजा मामले में भी वे निशाने पर आ गए हैं। होना जाना कुछ नहीं है। केन्द्रीय अल्पसंख्यक मामलात विभाग भी जानता है कि यहां की हकीकत क्या है। उसके पास नाजिम को और अधिकार संपन्न बनाने के न जाने कितने प्रस्ताव जा चुके हैं, मगर उस पर कोई ध्यान नहीं दिया गया।
बहरहाल, इन सब सियासी दाव-पेचों को ताक पर रख कर विचार किया जाए तो अहम मुद्दा ये है कि खादिमों व नाजिम के बीच होने वाले इन विवादों से इस कदीमी मरकज के बारे में जो छवि बन रही है, उसकी किसी को फिक्र नहीं है। और जब तक इस दिशा में नहीं सोचा जाएगा, तब तक यूं ही छोटी-मोटी आगें लगती-बुझती रहेंगी और दोनों पक्षों के बीच भी लगी हुई अखंड आग प्रज्ज्वलित रहेगी।
बुधवार, 12 जनवरी 2011
बोर्ड चेयरमैन ने उठाया दुस्साहसी कदम
राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के चेयरमैन डॉ. सुभाष गर्ग ने बहुत ही दुस्साहसी कदम उठाया है। उन्होंने उन बोर्ड कर्मियों की नाक में नकेल कसने की ठानी है, जिन्हें आज तक न तो कोई बोर्ड चेयरमैन ठीक कर पाया और न ही कोई प्रशासक। उन्होंने लेटलतीफ कर्मचारियों की ढ़ेबरी टाइट करने के लिए हाजिरी रजिस्टर सुबह दस बज कर दस मिनट पर सील करने के आदेश जारी किए हैं। एक तरह से उन्होंने बर्र के छत्ते में हाथ डाल दिया है।
असल में बोर्ड में लेटलतीफी एक आम समस्या रही है। कई छोटे-मोटे अफसरों से लेकर चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी तक किसी के कब्जे में नहीं रहते। हालत ये है कि लेटलतीफी के अतिरिक्त कई कर्मचारी काम के समय में कैंटीन अथवा बोर्ड भवन के बाहर चाय की थडिय़ों पर नजर आया करते हैं। उनको कोई भी चेयरमैन दुरुस्त नहीं कर पाया। कई बार यह बात अखबारों में छप कर रिकार्ड पर आ चुकी है कि बोर्ड में ओवरटाइम का खेल होता ही इस कारण था कि कर्मचारी काम के वक्त तो काम करते ही नहीं थे। इसको लेकर कई बार विवाद हो चुके हैं, जो कि सबको पता है। बोर्ड में चल रहा ब्याज का धंधा भी कई बार अखबारों की सुर्खियों का हिस्सा बन चुका है। एक कर्मचारी तो इसी चक्कर में फंस भी गया था। हालांकि यह सही है कि स्टाफ की भारी कमी के बावजूद बोर्ड कर्मचारी हर साल लाखों की तादाद वाले परीक्षार्थियों की परीक्षा को अंजाम देने का नायाब उदाहरण पेश करते रहे हैं, लेकिन साथ ही कामचोरी की समस्या भी बड़ी भारी रही है। यह एक विरोधाभास ही है कि एक ओर जहां इन्हीं बोर्ड कर्मचारियों की कार्य कुशलता की वजह से यह बोर्ड पूरे देश के सभी बोर्डों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है, वहीं दूसरी ओर लेटलतीफी आम समस्या है, जिसको काफी दिन की वॉच के बाद डॉ. गर्ग ने निपटाने की सोची है।
सच्चाई तो ये है कि कर्मचारियों की यूनियन इतनी तगड़ी रही है कि अनेक बोर्ड चेयरमैनों को उनका मुकाबला करने में पसीने छूट जाते थे। पूर्व चेयरमैन पी. सी. व्यास की तो हालत ये थी कि उनके मुंह पर ही कर्मचारी नेता भद्दी-भद्दी गालियां बक कर जलील करते थे। और कोई होता तो ऐसी जलालत की बजाय पद छोड़ कर जाना पसंद करता। मगर कांग्रेसी कल्चर के व्यास इतने ढ़ीठ और मोटी चमड़ी वाले थे कि उनको कोई फर्क ही नहीं पड़ता था। उनके अतिरिक्त अन्य चेयरमैनों का भी कर्मचारियों से टकराव का सामना करना पड़ता था। कुल मिला कर यहां वही चेयरमैन शांति से कार्यकाल पूरा कर पाया, जो कर्मचारी नेताओं को विश्वास में लेकर चला। ऐसा प्रतीत होता है कि डॉ. गर्ग ने भी कर्मचारी नेताओं को नमस्ते करके राजी कर रखा है। तभी तो पिछले दिनों जब बोर्ड के विखंडन की दिशा में एक कदम उठाया गया तो कोई कुछ नहीं बोला। विधायक प्रो. वासुदेव देवनानी भौंकते ही रह गए और बोर्ड का जयपुर में बोर्ड के एक भवन का शिलान्यास मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कर दिया। यह कर्मचारियों का दबाव ही था कि उन्हें बोर्ड विखंडन की बात से कहीं कर्मचारी न भडक़ जाएं, पहले ही साफ कर दिया था कि यहां से कोई भी शाखा और कोई भी कर्मचारी स्थानांतरित किया जा रहा है। इस कदम से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले कर्मचारी वर्ग ने जब चुप्पी साधी तो यही कयास लगाया गया कि बोर्ड चेयरमैन ने संघ के नेताओं को सैट कर लिया है। सवाल ये है कि क्या लेटलतीफी पर सख्ती के मामले में भी उन्होंने कर्मचारी नेताओं को सैट किया है। थर्ड आई को तो यही लगता है, वरना इतना दुस्साहसी कदम उठाना कत्तई असंभव था। बहरहाल, देखना ये है कि डॉ. गर्ग को अपने मकसद में कामयाबी मिलती है या नहीं।
अमोलक छाबड़ा की कमी पूरी कर रहे हैं सत्यावना
नगर निगम के मौजूदा बोर्ड में सबको पूर्व पार्षद अमोलक छाबड़ा की कमी खल रही है, मगर संतोष की बात ये है कि पार्षद नरेश सत्यावना उनकी कमी पूरी करने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं। जैसे जहां छाबड़ा होते थे, वहां हंगामा सुनिश्चित माना जाता था, वैसे ही अब ये आशंका सत्यावना को देखने पर भी होती है। जैसे निगम के अधिकारी छाबड़ा से कांपते थे, कमोबेश सत्यावना से भी कांपते हैं। ये तो गनीमत है कि वे कांग्रेस के हैं और मेयर भी कांग्रेस के, वरना उनसे बेहतर विपक्षी नेता की भूमिका कोई अदा नहीं कर सकता। सत्यावना जब तक निगम में रहते हैं, अफसरों व कर्मचारियों में धुकधुकी रहती है कि कब किस मुद्दे पर वे बिफर न जाएं। उनके साथी पार्षदों की टोली भी धाडफ़ाड़ है, जिसे काबू में करना किसी के बस की बात नहीं। चंद लफ्जों में कहा जाए तो यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा कि निगम में जितनी सक्रियता मेयर कमल बाकोलिया की मौजूदगी से नहीं होती, उससे कहीं अधिक सत्यावना के निगम परिसर में रहने पर होती है।
निगम ही क्यों, शहर में जहां कहीं भी कोई समारोह या सभा हो, और अगर वहां सत्यावना एंड कंपनी भी है तो समझिये कोई न कोई फफूंद हो कर रहेगी। पिछले दिनों अजमेर के प्रभारी मंत्री महिपाल मदेरणा की ओर से की जा रही जनसुनवाई में भी ऐसा ही हुआ। वहां ढ़ेर सारे नेता जुटे और अपनी-अपनी समस्या ले कर आए। किसी को कुछ मिला तो कोई लॉलीपॉप ले कर चुपचाप चलता बना, मगर सत्यावना ने दिखा दिया कि वे अजमेरीलाल नहीं हैं। भले ही अपनी ही पार्टी की सरकार के मंत्री हों, मगर यदि उनकी ओर से लाई गई जन समस्या का समाधान नहीं होता वे चुप बैठने वाले नहीं हैं। उन्होंने जैसी खरी-खोटी सुनाई, वैसी सुनाने का माद्दा फिलहाल तो किसी भी नेता में नहीं है। पहले तो उन्होंने प्यार से समझाने की कोशिश की, लेकिन जैसे ही उन्हें लगा कि उन्हें हल्के में लिया जा रहा है तो वे बिफर गए। बिफरे भी ऐसे कि अपनी ही सरकार के मंत्री को चेता दिया कि टालमटाले का रवैया बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। कल यदि वे हजारों की भीड़ ले कर आएंगे तो संभालना भारी पड़ जाएगा। जोधपुर के खुर्रांट जाट नेता मदेरणा तो हक्के-बक्के ही रह गए। उन्हें भी लगा होगा कि अजमेर के सारे नेता लल्लो-चप्पो करने वाले अजमेरीलाल नहीं हैं। सत्यावना ने जो रोल अदा किया, उससे एकबारगी तो लगा कि उन्होंने अपनी पार्टी की सारी मर्यादाओं को ताक पर रख दिया है, मगर उसका दूसरा पक्ष ये नजर आया कि अजमेर को ऐसे ही नेताओं की जरूरत है, जो जनता के अधिकार प्रशासन से छीनने का माद्दा रखते हों। ऐसे अगर दो-चार सत्यावना और पैदा हो जाएं तो शहर का उद्धार हो जाए, बस भगवान से एक ही प्रार्थना है कि उनकी एनर्जी पॉजिटीव डायरेक्शन में काम आए।
असल में बोर्ड में लेटलतीफी एक आम समस्या रही है। कई छोटे-मोटे अफसरों से लेकर चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी तक किसी के कब्जे में नहीं रहते। हालत ये है कि लेटलतीफी के अतिरिक्त कई कर्मचारी काम के समय में कैंटीन अथवा बोर्ड भवन के बाहर चाय की थडिय़ों पर नजर आया करते हैं। उनको कोई भी चेयरमैन दुरुस्त नहीं कर पाया। कई बार यह बात अखबारों में छप कर रिकार्ड पर आ चुकी है कि बोर्ड में ओवरटाइम का खेल होता ही इस कारण था कि कर्मचारी काम के वक्त तो काम करते ही नहीं थे। इसको लेकर कई बार विवाद हो चुके हैं, जो कि सबको पता है। बोर्ड में चल रहा ब्याज का धंधा भी कई बार अखबारों की सुर्खियों का हिस्सा बन चुका है। एक कर्मचारी तो इसी चक्कर में फंस भी गया था। हालांकि यह सही है कि स्टाफ की भारी कमी के बावजूद बोर्ड कर्मचारी हर साल लाखों की तादाद वाले परीक्षार्थियों की परीक्षा को अंजाम देने का नायाब उदाहरण पेश करते रहे हैं, लेकिन साथ ही कामचोरी की समस्या भी बड़ी भारी रही है। यह एक विरोधाभास ही है कि एक ओर जहां इन्हीं बोर्ड कर्मचारियों की कार्य कुशलता की वजह से यह बोर्ड पूरे देश के सभी बोर्डों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है, वहीं दूसरी ओर लेटलतीफी आम समस्या है, जिसको काफी दिन की वॉच के बाद डॉ. गर्ग ने निपटाने की सोची है।
सच्चाई तो ये है कि कर्मचारियों की यूनियन इतनी तगड़ी रही है कि अनेक बोर्ड चेयरमैनों को उनका मुकाबला करने में पसीने छूट जाते थे। पूर्व चेयरमैन पी. सी. व्यास की तो हालत ये थी कि उनके मुंह पर ही कर्मचारी नेता भद्दी-भद्दी गालियां बक कर जलील करते थे। और कोई होता तो ऐसी जलालत की बजाय पद छोड़ कर जाना पसंद करता। मगर कांग्रेसी कल्चर के व्यास इतने ढ़ीठ और मोटी चमड़ी वाले थे कि उनको कोई फर्क ही नहीं पड़ता था। उनके अतिरिक्त अन्य चेयरमैनों का भी कर्मचारियों से टकराव का सामना करना पड़ता था। कुल मिला कर यहां वही चेयरमैन शांति से कार्यकाल पूरा कर पाया, जो कर्मचारी नेताओं को विश्वास में लेकर चला। ऐसा प्रतीत होता है कि डॉ. गर्ग ने भी कर्मचारी नेताओं को नमस्ते करके राजी कर रखा है। तभी तो पिछले दिनों जब बोर्ड के विखंडन की दिशा में एक कदम उठाया गया तो कोई कुछ नहीं बोला। विधायक प्रो. वासुदेव देवनानी भौंकते ही रह गए और बोर्ड का जयपुर में बोर्ड के एक भवन का शिलान्यास मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कर दिया। यह कर्मचारियों का दबाव ही था कि उन्हें बोर्ड विखंडन की बात से कहीं कर्मचारी न भडक़ जाएं, पहले ही साफ कर दिया था कि यहां से कोई भी शाखा और कोई भी कर्मचारी स्थानांतरित किया जा रहा है। इस कदम से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले कर्मचारी वर्ग ने जब चुप्पी साधी तो यही कयास लगाया गया कि बोर्ड चेयरमैन ने संघ के नेताओं को सैट कर लिया है। सवाल ये है कि क्या लेटलतीफी पर सख्ती के मामले में भी उन्होंने कर्मचारी नेताओं को सैट किया है। थर्ड आई को तो यही लगता है, वरना इतना दुस्साहसी कदम उठाना कत्तई असंभव था। बहरहाल, देखना ये है कि डॉ. गर्ग को अपने मकसद में कामयाबी मिलती है या नहीं।
अमोलक छाबड़ा की कमी पूरी कर रहे हैं सत्यावना
नगर निगम के मौजूदा बोर्ड में सबको पूर्व पार्षद अमोलक छाबड़ा की कमी खल रही है, मगर संतोष की बात ये है कि पार्षद नरेश सत्यावना उनकी कमी पूरी करने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं। जैसे जहां छाबड़ा होते थे, वहां हंगामा सुनिश्चित माना जाता था, वैसे ही अब ये आशंका सत्यावना को देखने पर भी होती है। जैसे निगम के अधिकारी छाबड़ा से कांपते थे, कमोबेश सत्यावना से भी कांपते हैं। ये तो गनीमत है कि वे कांग्रेस के हैं और मेयर भी कांग्रेस के, वरना उनसे बेहतर विपक्षी नेता की भूमिका कोई अदा नहीं कर सकता। सत्यावना जब तक निगम में रहते हैं, अफसरों व कर्मचारियों में धुकधुकी रहती है कि कब किस मुद्दे पर वे बिफर न जाएं। उनके साथी पार्षदों की टोली भी धाडफ़ाड़ है, जिसे काबू में करना किसी के बस की बात नहीं। चंद लफ्जों में कहा जाए तो यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा कि निगम में जितनी सक्रियता मेयर कमल बाकोलिया की मौजूदगी से नहीं होती, उससे कहीं अधिक सत्यावना के निगम परिसर में रहने पर होती है।
निगम ही क्यों, शहर में जहां कहीं भी कोई समारोह या सभा हो, और अगर वहां सत्यावना एंड कंपनी भी है तो समझिये कोई न कोई फफूंद हो कर रहेगी। पिछले दिनों अजमेर के प्रभारी मंत्री महिपाल मदेरणा की ओर से की जा रही जनसुनवाई में भी ऐसा ही हुआ। वहां ढ़ेर सारे नेता जुटे और अपनी-अपनी समस्या ले कर आए। किसी को कुछ मिला तो कोई लॉलीपॉप ले कर चुपचाप चलता बना, मगर सत्यावना ने दिखा दिया कि वे अजमेरीलाल नहीं हैं। भले ही अपनी ही पार्टी की सरकार के मंत्री हों, मगर यदि उनकी ओर से लाई गई जन समस्या का समाधान नहीं होता वे चुप बैठने वाले नहीं हैं। उन्होंने जैसी खरी-खोटी सुनाई, वैसी सुनाने का माद्दा फिलहाल तो किसी भी नेता में नहीं है। पहले तो उन्होंने प्यार से समझाने की कोशिश की, लेकिन जैसे ही उन्हें लगा कि उन्हें हल्के में लिया जा रहा है तो वे बिफर गए। बिफरे भी ऐसे कि अपनी ही सरकार के मंत्री को चेता दिया कि टालमटाले का रवैया बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। कल यदि वे हजारों की भीड़ ले कर आएंगे तो संभालना भारी पड़ जाएगा। जोधपुर के खुर्रांट जाट नेता मदेरणा तो हक्के-बक्के ही रह गए। उन्हें भी लगा होगा कि अजमेर के सारे नेता लल्लो-चप्पो करने वाले अजमेरीलाल नहीं हैं। सत्यावना ने जो रोल अदा किया, उससे एकबारगी तो लगा कि उन्होंने अपनी पार्टी की सारी मर्यादाओं को ताक पर रख दिया है, मगर उसका दूसरा पक्ष ये नजर आया कि अजमेर को ऐसे ही नेताओं की जरूरत है, जो जनता के अधिकार प्रशासन से छीनने का माद्दा रखते हों। ऐसे अगर दो-चार सत्यावना और पैदा हो जाएं तो शहर का उद्धार हो जाए, बस भगवान से एक ही प्रार्थना है कि उनकी एनर्जी पॉजिटीव डायरेक्शन में काम आए।
बिना वीजा के कैसे चले आते हैं पाकिस्तानी?
अजमेर में सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती की दरगाह की जियारत के नाम पर बिना वीजा के पाकिस्तानियों के आने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। गत रविवार की देर रात एक और पाकिस्तानी उन्नीस वर्षीय रजमान खां पकड़ा गया और जैसा कि उसने बताया है उसका एक साथी बिलाल आया तो उसके साथ था, लेकिन जयपुर आ कर उनका साथ छूट गया। हालांकि अभी वह पुलिस को तरह-तरह की कहानियां बता कर घुमा रहा है और जांच के बाद ही साफ हो पाएगा कि असलियत क्या है, मगर यह तो साफ ही है कि लाख कोशिशों के बाद भी घुसपैठियों को रोका नहीं जा पा रहा है। पाकिस्तान को ही हम सबसे बड़ा दुश्मन मानते हैं और उसी से लगती सीमा को पार करके घुसपैठिये भारत आ रहे हैं। इतना ही नहीं, वे लंबा रास्ता पार कर दरगाह जियारत के बहाने अजमेर तक आ जाते हैं और खुफिया एजेंसियों को हवा तक नहीं लगती।
कितने अफसोस की बात है कि एक ओर बम विस्फोट के बाद दरगाह को और अधिक संवेदनशील माना जा रहा है और सुरक्षा के कड़े इंतजाम करने के दावे किए जा रहे हैं, दूसरी ओर पाकिस्तानी घुसपैठिये बड़ी आसानी से यहां चले आते हैं। रविवार की रात पकड़ा गया रमजान भी सीआईडी या पुलिस की मुस्तैदी की वजह नहीं, बल्कि लोगों के बताने पर ही शिकंजे में आया। कदाचित वह निजाम गेट पर दहाड़ मार कर नहीं रोता और लोग पुलिस को सूचित नहीं करते तो पता ही नहीं लगता कि वह बिना वीजा-पासपोर्ट के अजमेर चला आया है। यह घटना अपने आप में सबसे ज्वलंत उदाहरण है कि हमारी सीआईडी का तंत्र कितना मुस्तैद है। यह इस बात का भी सबूत है कि दावे चाहे जो किए जाएं, मगर न तो हमने दरगाह बम विस्फोट से सबक लिया है और न ही मुंबई ब्लास्ट के मास्टर माइंड व देश में आतंकी हमले करने का षड्यंत्र रचने के आरोप में अमेरिका में गिरफ्तार डेविड कॉलमेन हेडली के सीआईडी की आंख में सुरमा डालने से कुछ सीखा है। बिना वीजा-पासपोर्ट के अजमेर आने वालों का सिलसिला काफी लंबा है। अब तक अनेक पाकिस्तानी व बांग्लादेशी पकड़े जा चुके हैं, मगर इस समस्या का कोई समाधान नहीं निकाला जा सका है। पकड़े गए घुसपैठिये तो रिकार्ड पर हैं, पर जो नहीं पकड़े जा सके हैं, उनका तो अनुमान ही लगाना कठिन है। ज्यादा चौंकाने वाली बात तो ये है कि अपराधी किस्म के या मकसद विशेष के लिए अजमेर आने वाले तो चलो शातिर हैं, मगर केवल जियारत के मकसद से भी यहां बड़ी आसानी से पहुंच रहे हैं। स्पष्ट है कि न तो सीमा पर पूरी चौकसी बरती जा रही है और न ही अजमेर जैसे संवेदनशील स्थान के बारे में पुलिस गंभीर है। रहा सवाल सरकार का तो वह भी सख्त नजर नहीं आती है। जरूर इस प्रकार बिना वीजा-पासपोर्ट के पाकिस्तान या बांग्लादेश से आने वालों पर अंकुश लगाने के लिए प्रावधान लचीले हैं, तभी तो घुसपैठियों में कोई खौफ नहीं है।
बहरहाल, इस प्रकार लगातार बढ़ती जा रही धुसपैठ की घटनाओं से अंदेशा यही है कि अजमेर में कभी भी कोई बड़ा हादसा हो सकता है। कोई आतंकी भी इस प्रकार बिना पासपोर्ट व वीजा के अजमेर या पुष्कर पहुंच जाएगा और वह कोई हरकत कर गायब हो जाएगा और पुलिस हाथ ही मलती रह जाएगी।
चरम पर पहुंच चुका है यूआईटी सदर का मामला
अजमेर यूआईटी सदर पद पर नियुक्ति का मामला पूरी तरह से गरमा गया है। ऐसा माना जा रहा है कि चंद दिनों में ही नए सदर की नियुक्ति होने ही जा रही है। अनुमान है कि मकर संक्रांति पर मलमास की समाप्ति के साथ ही नए सदर को नियुक्त कर दिया जाएगा। यही वजह है कि जितने भी दावेदार पिछले दो साल से प्रयासरत थे, वे यकायक फिर से सक्रिय हो गए हैं और जयपुर, दिल्ली के सारे संपर्कों के दरवाजे खडख़ड़ा रहे हैं।
कांग्रेसी खेमे में यह चर्चा है कि संभवत: सरकार सिद्धांतत: यह तय कर चुकी है कि चाहे जो भी सदर बनाया जाए, मगर जातिगत दृष्टि से सिंधी समाज को खुश करने के लिए किसी सिंधी को ही मौका दिया जाएगा। अन्य समाजों के प्रमुख दावेदारों डॉ.श्रीगोपाल बाहेती, महेन्द्र सिंह रलावता, डॉ. सुरेश गर्ग आदि को स्पष्ट कर दिया गया है कि सरकार विधानसभा चुनाव से नाराज चले आ रहे सिंधी समाज को पटाना चाहती है। जहां तक सिंधी दावेदारों का सवाल है, निश्चित रूप से नरेन शहाणी भगत पहले नंबर पर ही हैं। अर्थात यदि भगत की नियुक्ति होती है तो वह कोई आश्चर्यजनक घटना नहीं कही जाएगी। आश्चर्यजनक घटना ये कही जाएगी कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के पुत्र वैभव गहलोत के दोस्त दीपक हासानी को सदर बना दिया जाए। बताया जाता है कि उन्होंने काफी कुछ मैनेज भी कर लिया है। यहां तक कि खुद की नियुक्ति न होने की संभावना के मद्देनजर और भगत को लंगी मारने के लिए डॉ. बाहेती ने हासानी के नाम पर सहमति दे दी है। उन्हें आईएएस लॉबी भी सपोर्ट कर रही है। हासानी का नाम तो फिर भी उजागर हो चुका है कि वे दावेदारी कर रहे हैं, मगर अब राजस्थान सिंधी अकादमी के पूर्व अध्यक्ष व डिप्टी सीएमएचओ डॉ. लाल थदानी का नाम भी उभर आया है। फिलहाल डॉ. थदानी के सदर बनने की संभावनाएं बहुत ज्यादा तो नहीं हैं, लेकिन जैसी की उनकी जलजला करने की फितरत है, वे मीडिया से दोस्ती के कारण अपना नाम चलाने में कामयाब तो हो ही गए हैं। तस्वीर बदले न बदले, हंगामा करना उनका मकसद होता है, सो वे करने में कामयाब हो गए हैं। इससे कम से कम भगत व हासानी की नींद तो हराम हो ही गई कि आखिर थदानी ने कौन सी गोटी फिट की है। बहरहाल, चंद दिनों में ही यह खुलासा हो जाएगा कि तकदीर की टोपी किसे मिलती है।
कितने अफसोस की बात है कि एक ओर बम विस्फोट के बाद दरगाह को और अधिक संवेदनशील माना जा रहा है और सुरक्षा के कड़े इंतजाम करने के दावे किए जा रहे हैं, दूसरी ओर पाकिस्तानी घुसपैठिये बड़ी आसानी से यहां चले आते हैं। रविवार की रात पकड़ा गया रमजान भी सीआईडी या पुलिस की मुस्तैदी की वजह नहीं, बल्कि लोगों के बताने पर ही शिकंजे में आया। कदाचित वह निजाम गेट पर दहाड़ मार कर नहीं रोता और लोग पुलिस को सूचित नहीं करते तो पता ही नहीं लगता कि वह बिना वीजा-पासपोर्ट के अजमेर चला आया है। यह घटना अपने आप में सबसे ज्वलंत उदाहरण है कि हमारी सीआईडी का तंत्र कितना मुस्तैद है। यह इस बात का भी सबूत है कि दावे चाहे जो किए जाएं, मगर न तो हमने दरगाह बम विस्फोट से सबक लिया है और न ही मुंबई ब्लास्ट के मास्टर माइंड व देश में आतंकी हमले करने का षड्यंत्र रचने के आरोप में अमेरिका में गिरफ्तार डेविड कॉलमेन हेडली के सीआईडी की आंख में सुरमा डालने से कुछ सीखा है। बिना वीजा-पासपोर्ट के अजमेर आने वालों का सिलसिला काफी लंबा है। अब तक अनेक पाकिस्तानी व बांग्लादेशी पकड़े जा चुके हैं, मगर इस समस्या का कोई समाधान नहीं निकाला जा सका है। पकड़े गए घुसपैठिये तो रिकार्ड पर हैं, पर जो नहीं पकड़े जा सके हैं, उनका तो अनुमान ही लगाना कठिन है। ज्यादा चौंकाने वाली बात तो ये है कि अपराधी किस्म के या मकसद विशेष के लिए अजमेर आने वाले तो चलो शातिर हैं, मगर केवल जियारत के मकसद से भी यहां बड़ी आसानी से पहुंच रहे हैं। स्पष्ट है कि न तो सीमा पर पूरी चौकसी बरती जा रही है और न ही अजमेर जैसे संवेदनशील स्थान के बारे में पुलिस गंभीर है। रहा सवाल सरकार का तो वह भी सख्त नजर नहीं आती है। जरूर इस प्रकार बिना वीजा-पासपोर्ट के पाकिस्तान या बांग्लादेश से आने वालों पर अंकुश लगाने के लिए प्रावधान लचीले हैं, तभी तो घुसपैठियों में कोई खौफ नहीं है।
बहरहाल, इस प्रकार लगातार बढ़ती जा रही धुसपैठ की घटनाओं से अंदेशा यही है कि अजमेर में कभी भी कोई बड़ा हादसा हो सकता है। कोई आतंकी भी इस प्रकार बिना पासपोर्ट व वीजा के अजमेर या पुष्कर पहुंच जाएगा और वह कोई हरकत कर गायब हो जाएगा और पुलिस हाथ ही मलती रह जाएगी।
चरम पर पहुंच चुका है यूआईटी सदर का मामला
अजमेर यूआईटी सदर पद पर नियुक्ति का मामला पूरी तरह से गरमा गया है। ऐसा माना जा रहा है कि चंद दिनों में ही नए सदर की नियुक्ति होने ही जा रही है। अनुमान है कि मकर संक्रांति पर मलमास की समाप्ति के साथ ही नए सदर को नियुक्त कर दिया जाएगा। यही वजह है कि जितने भी दावेदार पिछले दो साल से प्रयासरत थे, वे यकायक फिर से सक्रिय हो गए हैं और जयपुर, दिल्ली के सारे संपर्कों के दरवाजे खडख़ड़ा रहे हैं।
कांग्रेसी खेमे में यह चर्चा है कि संभवत: सरकार सिद्धांतत: यह तय कर चुकी है कि चाहे जो भी सदर बनाया जाए, मगर जातिगत दृष्टि से सिंधी समाज को खुश करने के लिए किसी सिंधी को ही मौका दिया जाएगा। अन्य समाजों के प्रमुख दावेदारों डॉ.श्रीगोपाल बाहेती, महेन्द्र सिंह रलावता, डॉ. सुरेश गर्ग आदि को स्पष्ट कर दिया गया है कि सरकार विधानसभा चुनाव से नाराज चले आ रहे सिंधी समाज को पटाना चाहती है। जहां तक सिंधी दावेदारों का सवाल है, निश्चित रूप से नरेन शहाणी भगत पहले नंबर पर ही हैं। अर्थात यदि भगत की नियुक्ति होती है तो वह कोई आश्चर्यजनक घटना नहीं कही जाएगी। आश्चर्यजनक घटना ये कही जाएगी कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के पुत्र वैभव गहलोत के दोस्त दीपक हासानी को सदर बना दिया जाए। बताया जाता है कि उन्होंने काफी कुछ मैनेज भी कर लिया है। यहां तक कि खुद की नियुक्ति न होने की संभावना के मद्देनजर और भगत को लंगी मारने के लिए डॉ. बाहेती ने हासानी के नाम पर सहमति दे दी है। उन्हें आईएएस लॉबी भी सपोर्ट कर रही है। हासानी का नाम तो फिर भी उजागर हो चुका है कि वे दावेदारी कर रहे हैं, मगर अब राजस्थान सिंधी अकादमी के पूर्व अध्यक्ष व डिप्टी सीएमएचओ डॉ. लाल थदानी का नाम भी उभर आया है। फिलहाल डॉ. थदानी के सदर बनने की संभावनाएं बहुत ज्यादा तो नहीं हैं, लेकिन जैसी की उनकी जलजला करने की फितरत है, वे मीडिया से दोस्ती के कारण अपना नाम चलाने में कामयाब तो हो ही गए हैं। तस्वीर बदले न बदले, हंगामा करना उनका मकसद होता है, सो वे करने में कामयाब हो गए हैं। इससे कम से कम भगत व हासानी की नींद तो हराम हो ही गई कि आखिर थदानी ने कौन सी गोटी फिट की है। बहरहाल, चंद दिनों में ही यह खुलासा हो जाएगा कि तकदीर की टोपी किसे मिलती है।
रविवार, 9 जनवरी 2011
बो गए राजेश यादव, काटें मंजू राजपाल
भीलवाड़ा से अजमेर स्थानांतरित हो कर आईं जिला कलेक्टर श्रीमती मंजू राजपाल को आते ही अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। जाहिर तौर पर ये सभी निवर्तमान कलेक्टर राजेश यादव के कार्यकाल में हुए कार्यकलापों से उत्पन्न हुई हैं। कानून व्यवस्था की समस्याओं को केवल नए एसपी बिपिन कुमार पांडे पर ही छोड़ दिया जाए तो भी अकेले नगर सुधार न्यास को लेकर इतने बवाल हैं, जिनसे निपटना बेहद कठिन काम है। यदि जल्द ही न्यास अध्यक्ष पद पर किसी की राजनीतिक नियुक्ति नहीं होती तो उनसे पदेन अध्यक्ष मंजू राजपाल को ही जूझना होगा।
न्यास को लेकर सबसे बड़ा विवाद तो ये है कि खुद सत्तारूढ़ दल कांग्रेस ने ही वहां बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार होने को लेकर सर्दी के इस मौसम में गरमाहट पैदा कर रखी है। पूर्व विधायक डॉ. राजकुमार जयपाल के नेतृत्व में बोले गए हमले के बाद अभी सरकार ने एक मामले की जांच कराने के आदेश जारी किए ही हैं कि उन्होंने अब दीप दर्शन सोसायटी का मामला उठा दिया है। उनके इस ताबड़तोड़ हमलों से तो यही लगता है कि वे जल्द शांत होने वाले नहीं हैं। यूं हमला तो बाद में भाजपा ने भी किया, मगर वह औपचारिकता भर रहा। भाजपा ने जब देखा कि उसकी भूमिका का निर्वाह तो कांग्रेस करके वाहवाही लूट रही है तो उसने भी औपचारिक विरोध प्रदर्शन किया। हालांकि उसने भी भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाया, मगर उसका ज्यादा जोर भाजपा शासनकाल में शुरू किए गए विकास कार्यों के ठप्प देने पर एतराज जताने पर था, जो वाकई सही नजर आता है। कुल मिला कर मंजू राजपाल को न्यास में व्याप्त भ्रष्टाचार से तो निपटना है ही, ठप हो चुके विकास कार्यों को फिर शुरू करवाने का दबाव भी रहेगा। इनमें पृथ्वीराज नगर योजना, दीपक नगर योजना, दीनदयाल उपाध्याय पुरम, गौरव पथ, माकड़वाली रोड, पुष्कर रोड से माकड़वाली पुष्कर बाई पास की दौ सौ फीट रोड़, महाराणा प्रताप स्मारक, सांझा छत, विवेकानन्द स्मारक, जयपुर रोड से नाका मदार को जोडऩे वाली सडक़ तथा नाका मदार से आदर्श नगर को जोडऩे वाली सडक़ आदि की उपेक्षा पर सवाल उठाये जा रहे हैं। इसके अतिरिक्त विभिन्न क्षेत्रों में मूलभूत सुविधाओं जैसे सडक़, नालियां, पेवर ब्लॉक, पार्कों एवं श्मशानों के विकास कार्यों के लिए जारी कि गई निविदाओं के कार्य या तो अधूरे पड़े है अथवा प्रारम्भ ही नहीं हुए हैं, जबकि लागत लगातार बढ़ती जा रही है। न्यास द्वारा बजरंगगढ़ सर्किल चौराहा तथा जिनदतसुरी सर्किल, मेयो कॉलेज के विकास जस के तस अधूरे पड़े हैं। यूनिर्वसिटी तिराहे से जयपुर रोड़ बाईपास को जोडऩे वाली सडक़ तथा नौ नम्बर पेट्रोल पम्प से परबतपुरा तक की सडक़ का काम अधूरा ही पड़ा है। फॉयसागर से चामुण्डा माता मन्दिर तक की सडक़ का काम प्रारम्भ ही नहीं हुआ है तथा चामुण्डा माता मन्दिर वाली सडक़ में खर्च की जाने वाली राशि में कटौती कर दी है। इसी प्रकार वाल्मिकी अम्बेडकर मलीन बस्ती योजना के 109 क्वाटरों का निर्माण कार्य प्रारम्भ ही नहीं हो सका है। जवाहरलाल नेहरू चिकित्सालय सौन्दर्यीकरण का कार्य भी जहां था, वहीं रुका हुआ है। जवाहर लाल नेहरू अरबन नवीनीकरण मिशन योजना के अन्तर्गत किये जाने वाले सभी कार्य, जैसे पार्किंग स्थलों का विकास, आनासागर झील संरक्षण, दरगाह शरीफ विकास योजना, जयपुर रोड पर वीडियोकोच बस स्टैंड विकास की विभिन्न योजनाएं भी ठप्प पड़ी हैं।
इसी प्रकार सीवरेज लाइन के प्रथम चरण के कार्य अधूरे पड़े हैं, जबकि न्यास योजनाओं में प्रारम्भ किये जाने वाले द्वितीय चरण के सिवरेज के कार्य अभी तक प्रारम्भ ही नहीं हो पाये हैं। इसी प्रकार नये सामुदायिक भवन के कार्य प्रारम्भ नहीं हुए हैं। कच्ची बस्तियों के विकास कार्य हाथ में नहीं लिये गये हैं। सम्राट अशोक उद्यान, राजीव गांधी उद्यान एवं विभिन्न योजनाओं में लगभग चालीस पार्कों का विकास कार्य प्रारम्भ हुआ था, वे कार्य सब ठप्प पड़े हैं।
इसी प्रकार करोड़ों रुपए की लागत के चंद वरदायी स्टेडियम को नगर सुधार न्यास द्वारा राजस्थान क्रिकेट संघ को सौंपे जाने को लेकर भी विवाद हो गया है। खिलाड़ी और खेल संघों के पदाधिकारी इसका कड़ा विरोध कर रहे हैं। इस मुद्दे पर कांग्रेस व भाजपा नेता भी एक सुर में बोल रहे हैं। असल में यह मुद्दा राजेश यादव के जाते-जाते उठा और मंजू राजपाल के आते ही मीडिया ने इसे मुद्दा बना दिया है।
दरगाह बाजार में एलिवेटेड ब्रिज को लेकर भी विरोध मुखर हो गया है। हालांकि राजेश यादव के समय में भी व्यापारियों ने काफी विरोध किया, लेकिन उन्होंने उस पर कोई ध्यान नहीं दिया, इस कारण उसके निर्माण पर प्रशासनिक स्तर पर सैद्धांतिक स्वीकृति हो चुकी है। अब व्यापारी मंजू राजपाल से उम्मीद कर रहे हैं कि इस पर पुनर्विचार किया जाए।
इसी प्रकार पत्रकारों के प्लाट आवंटन को लेकर भी विरोध की सुगबुगाहट है। राजेश यादव पूरे दो साल तक तो इस मामले में चुप रहे और और अपने कार्यकाल के आखिरी दिन आनन-फानन में पत्रकारों के आवेदनों की छंटनी करवा कर उस पर मुहर लगा गए। अब केवल लॉटरी निकालना ही बाकी रहा है। जिन पत्रकारों के आवेदन पत्र निरस्त हुए हैं, वे कुनमुना रहे हैं और चाहते हैं कि फार्मों की जांच नए सिरे से हो। ज्ञातव्य है कि निरस्त किए गए आवेदनों में अधिसंख्य वे हैं, जिनमें पांच हजार रुपए प्रति माह से कम की आय अंकित की गई है। पत्रकारों का कहना है कि यदि इसी आधार पर ही आवेदन पत्र निरस्त करने थे तो पूरे चार साल तक उनको क्यों लटकाए रखा गया। आवेदन करते ही उसे निरस्त कर देते, कम से कम उनके दस-दस हजार रुपए तो ब्लॉक नहीं होते।
हालांकि यह सही है कि मंजू राजपाल ने अपना आईएएस का प्रोबेशनरी कार्यकाल यहीं पर सहायक कलेक्टर के रूप में बिताया है, इस कारण उन्हें अजमेर के मिजाज का अच्छी तरह से पता है, लेकिन अधिकतर समस्याएं नई हैं, जिन्हें समझने में उन्हें समय लगेगा। देखते हैं वे इनसे कैसे निपटती हैं और राजनीतिक दलों की दखलंदाजी के बीच वे कितनी कामयाब हो पाती हैं।
राजनीतिक खींचतान का परिणाम है डॉ. गार्गिया का तबादला
आखिरकार हॉट सीट बनी मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी यानि सीएमएचओ की कुर्सी से डॉ. जवाहर गार्गिया को मुक्ति मिल ही गई। वे जब से इस कुर्सी पर बैठे थे, उनका ब्लड पे्रशर बढ़ गया था। इस कारण उन्होंने पिछले दिनों चिकित्सा मंत्री दुर्रू मियां से मुक्ति की गुहार लगाई थी।
असल में यह एक राजनीतिक घटनाक्रम का पटाक्षेप है। पूर्व मंत्री लक्ष्मण सिंह रावत के करीबी डॉ. गार्गिया के लिए परेशानी तब से ही बढ़ी, जब से स्वास्थ्य महकमा जिला परिषद के अधीन किया गया। सरकार ने जिला परिषदों को ज्यादा अधिकार देते हुए महकमे को उसके अंतर्गत तो कर दिया, लेकिन उससे उत्पन्न समस्याओं से निपटने का कोई रास्ता नहीं तलाशा। यही वजह रही कि जब शेरगढ़ सब सेंटर पर नर्सिंग स्टाफ की कमी पर केकड़ी विधायक डॉ. रघु शर्मा ने डॉ. गार्गिया से जवाब-तलब किया तो उन्हें मजबूरी में कहना पड़ा कि नर्सिंग स्टाफ जिला परिषद के सीईओ के क्षेत्राधिकार में है। यह जवाब शर्मा को नागवार गुजरा। उन्होंने न तो इस बारे में सीईओ से कहा और न ही सरकार से असमंजस दूर करने का आग्रह किया, उलटे डॉ. गार्गिया की ही शिकायत कर दी। बस तभी से डॉ. गार्गिया ने यह तय कर लिया कि ऐसी फफूंद वाली कुर्सी को छोड़ देंगे। भला कोई चिकित्सा अधिकारी सरकार द्वारा उत्पन्न की गई पेंडुलम वाली स्थिति को कब तक बर्दाश्त करेगा। इसका साफ मतलब है कि एक ओर तो सरकार योग्य चिकित्सकों की कमी से परेशान है और दूसरी ओर उनकी समस्याओं को दूर करने पर कोई ध्यान नहीं दे रही है। तभी तो लंबे समय से पटरी से उतरे हुए महकमे को पटरी पर लाने वाले डॉ. गार्गिया को ही पटरी से उतरना पड़ा। यह सरकार और जनप्रतिनिधियों की मनमानी और लापरवाही का ही परिणाम है कि दो साल में चार सीएमएचओ बदले जा चुके हैं। सबसे ज्यादा पीडि़त हुए डॉ. बी.एल. फानन। पूर्व सीएम वसुंधरा राजे ने उन्हें लापरवाही के आरोप में एपीओ हटाया। दुबारा लगाया तो कांग्रेसियों ने जीना मुहाल कर दिया। वे आए दिन उनके चैंबर में हंगामा करते थे।
बहरहाल, अब सबकी नजर इस पर है कि इस हॉट सीट पर कौन बैठता है। यूं दोवदार तो आरसीएएचओ डॉ. मधु विजयवर्गीय, नागौर सीएमएचओ डॉ. अखिलेश कुमार माथुर व डिप्टी सीएमएचओ डॉ. लाल थदानी को माना जा रहा है, लेकिन सबसे तगड़ी दावेदारी डॉ. लाल थदानी की मानी जा रही है। इसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि वे राजनीति में सिद्धहस्त हैं और वे ही चिकित्सा महकमे व जिला परिषद के बीच झूल रही इस सीट को संभाल सकते हैं। देखते हैं अब कौन इस सीट का स्वाद चखता है।
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