बुधवार, 9 फ़रवरी 2011

अपने ही मंत्री की तौहीन की रघु व सिनोदिया ने

जिले के दो कांग्रेसी विधायक डॉ. रघु शर्मा व नाथूराम सिनोदिया मंगलवार को हुई जिला परिषद की साधारण सभा का महज इस कारण बायकाट कर गए क्योंकि एक घंटे के इंतजार के बाद भी बैठक शुरू नहीं हुई। बैठक शुरू होने में देरी पर भले ही उन्होंने भाजपा की जिला प्रमुख श्रीमती सुशील कंवर पलाड़ा पर यह आरोप लगा कि उन्होंने जिला परिषद को घर की दुकान बना रखा है, मगर सच्चाई ये है कि खुद उनकी ही सरकार के मंत्री रणवीर सिंह गुड्ढ़ा के विलंब से आने की वजह से बैठक देरी से शुरू हुई थी, न कि जिला प्रमुख ने अपनी ओर से देरी की थी। भाजपा की होने के बावजूद कांग्रसी मंत्री के विलंब हो जाने पर उन्होंने तो ऐतराज नहीं किया और विलंब को सहजता से लिया। मगर कांग्रेस के विधायकों को यह बर्दाश्त नहीं हुआ।
मौका-ए-हालात से यह भी स्पष्ट है कि बैठक में देरी होने का कारण वे भलीभांति जानते थे और ये उन्हें ये भी पता था कि जिस वक्त बायकाट कर रहे हैं, उस वक्त गुड्ढ़ा जिला प्रमुख के चैंबर में बैठे हैं, इसके बावजूद उनसे मिलने नहीं गए। ऐसा करके उन्होंने जिला प्रमुख की नहीं, बल्कि अपने ही मंत्री की तौहीन की है। उनका जिला प्रमुख पर लगाया गया आरोप प्रत्यक्षत: राजनीतिक था, मगर सच्चाई ये है कि उन्हें यह बात नागवार गुजरी कि उनकी बजाय मंत्री जी जिला प्रमुख को ज्यादा तवज्जो दे रहे हैं। इसको सीधे तौर पर तो कह नहीं सकते थे, क्योंकि ऐसा कहने पर खुद उनकी ही तौहीन होती, इस कारण बायकाट का आरोप जिला प्रमुख को निशाने पर लेकर मढ़ दिया।
असल में सबको पता है कि गुड्ढ़ा श्रीमती पलाड़ा के मुंह बोले भाई बने हुए हैं और जिला प्रमुख चुने जाने पर भी बधाई देने आए थे। तब ही उन्होंने साफ कर दिया था कि यूं भले ही वे प्रतिद्वंद्वी पार्टियों का प्रतिनिधित्व करते हैं, मगर दुनिया में रिश्तों की भी कोई अहमियत होती है। भाई-बहन के रिश्ते के कारण ही कदाचित वे बैठक में आने से पहले औपचारिकता में सीधे जिला प्रमुख के चैंबर में चले गए। और जिला प्रमुख ने भी औपचारिकता व सम्मान की खातिर में बैठक देरी से शुरू करवाई। बस इसी बात को दोनों विधायक सहन नहीं कर पाए, और बैठक का बायकाट कर दिया। उनके जिला प्रमुख पर जिला परिषद को घर की दुकान बनाने का भी यही तात्पर्य है कि उन्हें पारिवारिक रिश्ता बर्दाश्त नहीं हुआ।
यदि रघु व सिनोदिया की बात को सही मानें तो क्या वे इस प्रकार पूर्व में भी महत्वपूर्ण बैठकों में देरी होने पर बायकाट कर चुके हैं? क्या अतिथियों के विलंब होने पर बैठक व कार्यक्रम आदि देरी से शुरू होना सामान्य बात नहीं है? क्या वे खुद समय के इतने पाबंद हैं और खुद मुख्य अतिथी होने पर ठीक समय पर पहुंचते हैं? सवाल ये भी है कि अगर वे खुद भी किसी बैठक या समारोह के मुख्य अतिथी हों और उन्हें किसी कारण से विलंब हो जाए तो क्या इस प्रकार किसी के बायकाट को बर्दाश्त कर पाएंगे?
रघु व सिनोदिया वाकई इतने ही खरे हैं तो क्या उनके पास इस बात का जवाब है कि बैठक की अध्यक्षता मंत्रीजी के करने पर उठे विवाद पर वे चुप क्यों हो गए? विशेष रूप से रघु तो बेबाक बयानी के लिए प्रसिद्ध हैं, इसके बावजूद यह कह कर प्रतिक्रिया देने से मुकर गए कि नियमों की जानकारी सभी को है, मेरे से प्रतिक्रिया न लें

यानि कांग्रेस ने मान लिया है कि सरकारी तंत्र भ्रष्ट है

अगर वर्तमान में विपक्ष की भूमिका निभा रही भाजपा ये कहे कि वह सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान छेड़ेगी तो समझ में आता है, मगर यही बात अगर कांग्रेस करे तो आश्चर्य के साथ अफसोस भी होता है। कैसी विडंबना है कि प्रदेश में कांग्रेस की सरकार है, प्रशासनिक तंत्र उसी के इशारे पर चल रहा है और शहर कांग्रेस विधि विभाग ये कह रहा है कि प्रत्येक थाना क्षेत्र के लिए विधि सहायता कमेटी का गठन करके सरकारी कार्यालयों में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम छेड़ेगा। स्पष्ट है कि कांग्रेस के इस संगठन ने मान ही लिया है कि सरकारी तंत्र इतना भ्रष्ट हो चुका है कि विपक्ष तो क्या अब सत्तारूढ़ दल को ही अभियान चलाना पड़ेगा।
सवाल ये उठता है कि यदि अधिकारी और कर्मचारी इतने ही भ्रष्ट हो चुके हैं तो सरकार पिछले दो साल से कर क्या रही है? क्या यह संभव है कि सरकार तो मुस्तैद हो और उसका तंत्र भ्रष्ट हो जाए? मंत्री तो ईमानदार हों और अधिकारी बेईमान हो जाएं? यदि अधिकारी भ्रष्ट हैं तो मंत्री आखिर क्या कर रहे हैं? ये अधिकारी भाजपा ने तो आयातित किए नहीं हैं। ये ही अधिकारी भाजपा के शासनकाल में भी काम कर रहे थे, बस सीटों का ही फर्क हो सकता है। अगर वे भ्रष्ट हैं तो भाजपा के शासनकाल में भी भ्रष्ट रहे होंगे। तब विपक्ष में बैठी कांग्रेस क्या कर रही थी? और अगर अधिकारी अब भ्रष्ट हुए हैं तो जरूर दाल में कुछ काला है। सच्चाई तो ये है कि पूरी दाल ही काली नजर आने लगी है। तभी तो खुद सत्ताधारी दल को प्रशासनिक तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए अभियान चलाने की नौबत आ गई है। इससे हालात की गंभीरता का पता चलता है। स्थानीय कांग्रेसियों की छोडिय़े, खुद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी प्रशासनिक तंत्र में व्याप्त लापरवाही का सियापा करते रहते हैं।
सवाल ये भी उठता है कि अगर सत्तारूढ़ कांग्रेस विकास की बातें छोड़ कर भ्रष्टाचार दूर करने की बात कर रही है तो विपक्षी भाजपा कर क्या रही है? वह चुप क्यों बैठी है? क्या वह आगामी विधानसभा चुनाव का इंतजार कर रही है? कि चलो अभी कांग्रेसियों को लूटने दो, हम बाद में देख लेंगे। क्या उन्हें पता नहीं कि विपक्ष की भूमिका क्या होनी चाहिएï? अजमेर में तो कम से कम ऐसा ही नजर आ रहा है। वरना क्या वजह है कि नगर सुधार न्यास में करोड़ों के घोटाले हों और भाजपा चुप बैठी रहे। कांग्रेस के कुछ नेता अगर सतर्क नहीं होते तो मामले उजागर ही नहीं होते। भाजपा ने तो तब जा कर औरपचारिक ज्ञापनबाजी की, जब कांगे्रस ने काफी हंगामा खड़ा कर दिया और आम जनता भाजपाइयों की लानत देने लगी। भाजपा ने भी जो ज्ञापन दिया, उसमें भ्रष्टाचार संबंधी आंकड़े और जानकारियां नहीं थीं। उसमें तो केवल उनकी सरकार के दौरान शुरू हुए विकास कार्यों के ठप होने का हवाला था। यानि स्थानीय भाजपाइयों की हालत ये है कि उन्हें पता ही नहीं लग रहा कि भ्रष्टाचार कैसे और कहां-कहां किया जा रहा है। ऐसे में अगर ये प्रतीत होता है कि भाजपाई हार के बाद चैन की नींद सो गए हैं, तो गलत नहीं है। यकीन न हो तो किसी भी चाय-पानी की थड़ी और पान की दुकान पर जा सुन लीजिए भाजपा मानसिकता के लोगों की लफ्फाजी कि वे अभी से कहने लगे हैं कि जैसे हालात हैं, और जितनी जनता तंग है, अगली सरकार उन्हीं की होगी। और जब अगली सरकार उनकी ही होगी तो वे काहे को अभी मेहनत करें। सब के सब अभी निजी धंधे में लगे हुए हैं। जनता जाए भाड़ में। तंग आ कर खुद की तख्ता पलट देगी। वैसे भी उसके पास भाजपा के अलावा कोई विकल्प नहीं है। एक बार कांग्रेस को लूट मचाने का मौका देती है और दूसरी बार भाजपा को।

तो आवभगत स्वीकार करते ही क्यों हैं पत्रकार?
सोमवार को केकड़ी कस्बे में शुद्ध के लिए युद्ध अभियान के दौरान एक फर्म के विरुद्ध की गई रसद विभाग की कार्यवाही के दौरान फर्म मालिक और मीडिया कर्मियों के बीच खबर उजागर न करने को लेकर नौंक-झौंक हो गई। असल में हुआ ये कि जैसे ही मीडिया कर्मियों को पता लगा कि रसद विभाग का दल वहां पहुंच रहा है तो वे भी वहां रिपोर्टिंग करने को पहुंच गए। फर्म मालिक ने सभी की खूब आवभगत की और स्वागत-सत्कार किया। मीडिया कर्मियों ने भी खुशी-खुशी आवभगत ऐसे स्वीकार किया, मानो यह उनका जन्मसिद्ध अधिकार हो। आखिरकार हम जमीन से दो फुट ऊपर चलते हैं, स्वागत तो लोगों को करना ही होगा। और अगर वह अपराधी भी है तो फिर उसे जरूर करना होगा। लेकिन जैसे ही उसने खबर न छापने का आग्रह किया तो मीडिया कर्मी मुकर गए। इस पर नौंक-झोंक हो गई। नौंक-झोंक तो होनी ही थी। जो व्यक्ति आपकी चापलूसी कर रहा है तो इसका मतलब साफ है कि वह आपकी हैसियत को जानता है और खुश करके अपना काम निकालना चाहता है। आवभगत करवाते समय तो हमने सोचा नहीं कि इतना सम्मान क्यों मिल रहा है और जैसे ही उसने अपना मन्तव्य रखा तो हम बिगड़ गए। और लगे उससे उलझने। और जब फर्म मालिक ने देख लेने की धमकी दी तो हमें बर्दाश्त नहीं हुआ। हमारे पास चूंकि खबर छापने का अधिकार है, इस कारण हमने नौक-झोंक की खबर भी छाप ली। अहम सवाल ये है कि ऐसी नौबत ही क्यों आती है? न तो हम छापे की कार्यवाही के दौरान स्वागत-सत्कार स्वीकार करें और न ही बाद में कोई हमारे साथ बुरा सलूक करे। यदि हमें बुरा सलूक पसंद नहीं तो स्वागत-सत्कार से भी बचना चाहिए। और उससे भी बड़ी बात ये कि पूरे वृतान्त को हम उजागर करके जनता की हमदर्दी की उम्मीद करते हैं तो वह बेमानी है। ये पब्लिक है सब जानती है।

मंगलवार, 8 फ़रवरी 2011

रावत पर नई बोतल में पुरानी पेप्सी डालने का दबाव

शहर के दोनों भाजपा विधायकों प्रो. वासुदेव देवनानी व श्रीमती अनिता भदेल के एक-दूसरे की लॉबी का अध्यक्ष बर्दाश्त न करने के चक्कर में सर्वसम्मति के रूप में प्रो. रासासिंह रावत शहर भाजपा अध्यक्ष पर काबिज होने से जहां पार्टी में उत्साह का संचार हुआ है, वहीं प्रो. रावत की फ्री हैंड नहीं मिलने की आशंका बरकरार है। एक तो दोनों विधायक अपने-अपने शागिर्दों को एडचस्ट करने का दबाव बना रहे हैं, वहीं वर्षों से संगठन पर काबिज नेता भी कुर्सी नहीं छोडऩे की जिद किए हुए हैं। ऐसे में प्रो. रावत के सामने नई बोतल में पुरानी पेप्सी डालने की नौबत आती दिखाई दे रही है। और अगर ऐसा हुआ तो शिव शंकर हेड़ा वाली शहर भाजपा और प्रो. रावत की भाजपा में कोई फर्क नहीं होगा। उस पर लेबल तो प्रो. रावत के नाम से नया होगा, मगर माल पुराना ही होगा। और सब जानते हैं कि पुराने माल की सारी गैस निकली हुई होती है। बोतल का ढक्कन खुलने पर उसमें से झाग नहीं निकलेंगे। और अगर विपक्ष की भूमिका निभाने वाली भाजपा में झाग नहीं आए शहर भाजपा के लिए की गई लंबी कवायद बेकार चली जाएगी।
सब जानते हैं कि हेड़ा वाली भाजपा की हालत क्या थी। दोनों विधायकों ने ही इतनी दादागिरी कर रखी थी कि वे खुद ही लुंज-पुंज हो गए थे। इस लाचारी का इजहार उन्होंने पिछले नगर निगम चुनाव में किया था, जब प्रत्याशियों का चयन तो उनकी अध्यक्षता में हुआ, मगर खुद उनकी नहीं चली। इतना ही नहीं उनकी कार्यकारिणी में ऐसे कई पदाधिकारी थे, जो कि केवल विज्ञप्तियों के जरिए अखबारों में दिखाई देते थे, मगर उनका जनाधार कुछ नहीं था। इसी वजह से भाजपा के अनेक विरोध प्रदर्शन फीके ही रहते आए। जानकारी के अनुसार पुराने पदाधिकारी नई कार्यकारिणी में भी शामिल होने के लिए एडी चोटी का जोर लगा रहे हैं। इसके लिए वे प्रदेश भाजपा नेताओं का दबाव बना रहे हैं। इस तरह से प्रो. रावत पर तिहरा दबाव बना हुआ है। हालांकि वे दावा तो पार्टी में नई जान फूंकने का करते हैं, मगर देखना ये है कि वे इस दबाव के बीच अपनी कितनी पसंद मनवा पाते हैं। अगर वे नए और जनाधार वाले नेताओं को नहीं उभार पाए तो सांसद के साथ-साथ संगठन अध्यक्ष के रूप में भी नाकामयाब नेता माना जाएगा।
कांग्रेसियों से ही मिल रही है कलेक्टर को चुनौती
गणतंत्र दिवस समारोह के फीके होने पर पर्यटन मंत्री श्रीमती बीना काक की नाराजगी का शिकार हो चुकी जिला कलेक्टर श्रीमती मंजू राजपाल एक बार फिर कांग्रेसी नेता व सरपंच संघ के नेता भूपेन्द्र सिंह राठौड़ के निशाने पर हैं। राठौड़ ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है और बाकायदा अजमेर के सांसद व केन्द्रीय संचार राज्य मंत्री सचिन पायलट को लिखित में शिकायत कर दी है। हालांकि उन्हें अन्य सरपंचों के दबाव में ऐसा करना पड़ रहा है, मगर माना तो यही जा रहा है कि कांग्रेसी ही अपने राज की खिलाफत कर रहे हैं। चौंकाने वाली बात ये है कि जिला कलेक्टर के राज्य सरकार के अधीन होने के बावजूद उन्होंने जिले की जनता से सीधे जुड़े कांग्रेसी विधायकों का सहयोग लेने की बजाय केन्द्रीय मंत्री से दखल देने की गुहार लगाई है। ऐसा नहीं है कि राठौड़ सरकार के खिलाफ पहली बार मुखर हुए हैं। वे पूर्व में सरपंचों के प्रांतव्यापी आंदोलन में भी खुल कर भाग ले चुके हैं। तब एक बार तो उत्तेजना में सरकार के खिलाफ क्रीज से काफी बाहर आ कर खेले थे, मगर अपने कृत्य पर कांग्रेस विरोधी होने की छाप लगने के डर से दूसरे ही दिन पैर पीछे खींच लिए।
हालांकि यह सही है कि सरपंच का चुनाव पार्टी के आधार पर नहीं होता, इस कारण किसी सरपंच को सीधे तौर पर कांग्रेसी या भाजपाई नहीं कहा जा सकता, मगर राठौड़ कांग्रेसी हैं, यह किसी ने छिपा हुआ नहीं है। वे केकड़ी विधायक डॉ. रघु शर्मा के शागिर्द हैं। इतना ही नहीं सूचना तो यहां तक है कि वे आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का टिकट हासिल करने की जाजम तक बिछा रहे हैं।

सोमवार, 7 फ़रवरी 2011

पांच दिन पहले ही उजागर कर दिया था प्रो. रावत का नाम


शहर भाजपा अध्यक्ष पद पर काबिज प्रो. रासासिंह रावत का नाम च्न्याय सबके लिएज् ने पांच दिन पहले उजागर कर दिया था कि काफी विचार-विमर्श और दावों-प्रतिदावों के बाद आखिरकार पूर्व सांसद प्रो. रासासिंह रावत को ही शहर भाजपा अध्यक्ष पद के काबिल माना गया है और उनकी नियुक्ति की घोषणा होना मात्र शेष रह गया है। उसके बाद जा कर अन्य समाचार पत्रों ने इस खबर को शाया किया, मगर वह भी संभावना जताते हुए।
वस्तुत: जैसे ही च्न्याय सबके लिएज् में यह खबर उजागर हुई, संघ प्रमुख मोहन भागवत की अजमेर में मौजूदगी का लाभ उठाते हुए एक बार फिर प्रो. बी. पी. सारस्वत के लिए पूरी ताकत लगा दी गई। ऐसा होते देख पूर्व सांसद औंकार सिंह लखावत के कान खड़े हो गए और सभी लोगों को समझाने लगे कि प्रो. रावत के नाम पर लंबी खींचतान के बाद समहति बनाई जा सकी है, इस कारण अब घोषणा से पहले खलल न डालें। प्रदेश अध्यक्ष अरुण चतुर्वेदी भी जानते थे कि संघ का दबाव आ जाएगा, तुरंत प्रो. रावत सहित अन्य शहर अध्यक्षों की घोषणा कर दी, ताकि कोई फेरबदल की स्थिति न आए। शहर में चल रहे संघ के जलसे का लाभ उठाते हुए विधायक प्रो. वासुदेव देवनानी भी प्रो. सारस्वत के समानांतर पूर्व महापौर धर्मेन्द्र गहलोत का नाम फिर से उछाल दिया। मगर इस मुहिम को कामयाबी हासिल नहीं हुई। अब वे उन्हें शहर महामंत्री बनाने की जुगत करेंगे।
हालांकि यह सही है कि छत्तीस का आंकड़ा बने प्रो. देवनानी व विधायक श्रीमती अनिता भदेल के प्रो. रावत के प्रति सहमति देने के कारण दोनों ही गुटों में तालमेल बैठाया जाएगा, मगर अंतत: शहर भाजपा पर प्रो. देवनानी विरोधी लॉबी हावी रहेगी। देवनानी को कमजोर करने के लिए लखावत सहित अन्य सभी नेता लामबंद हो जाएंगे। कदाचित इस बात का अहसास देवनानी को भी हो, मगर उनके पास कोई चारा नहीं बचा था।
भाजपा और मजबूत, कांग्रेस बेपरवाह
हाल ही पंचायतीराज उप चुनाव में भाजपा को मिली सफलता के बाद शहर भाजपा अध्यक्ष के रूप में पांच बार सांसद रहे प्रो. रासासिंह रावत की नियुक्ति के साथ ही भाजपा और मजबूत हो गई है। यह स्थिति कांग्रेस के लिए चिंताजनक है, मगर वह बेपरवाह बनी हुई है। कांग्रेस की यह बेपरवाही काफी दिन से चल रही है। लोकसभा चुनाव में भले ही मजबूरी में सभी कांग्रेसी एक हुए और सचिन पायलट जीत गए, मगर उसके बाद स्वयं पायलट ने ही संगठन पर ध्यान नहीं दिया। इसका परिणाम ये हुआ कि जिला परिषद पर भाजपा का कब्जा हो गया। जिला परिषद सदस्य के लिए हाल ही हुए चुनाव में भी उन्होंने रुचि नहीं ली, इसका परिणाम ये हुआ भाजपा के ओमप्रकाश भड़ाणा जीत गए, जबकि उनकी छाप ले कर घूम रहे सौरभ बजाड़ को हार का मुंह देखना पड़ा। इससे जिला प्रमुख श्रीमती सुशील कंवर पलाड़ा के पति युवा भाजपा नेता भंवर सिंह पलाड़ा और मजबूत हुए हैं। आने वाले दिनों वे अपने नेटवर्क को और भी मजबूत कर लेंगे। भाजपा ने शहर में भी ऐसा अध्यक्ष नियुक्त कर दिया है, जिसे कि दोनों की गुटों का समर्थन है। स्वयं प्रो. रावत भी काफी अनुभवी हैं और विपक्षी नौटंकी में माहिर हैं। वैसे भी वे फुल टाइम पॉलिटीशियन हैं। ऐसे में उसकी तुलना में मौजूदा कांग्रेस संगठन कमजोर प्रतीत होता है। संयोग से सचिन पायलट व संगठन के बीच भी कोई खास तालमेल नहीं बैठ पाया है। तालमेल क्या शहर कांग्रेस पर काबिज गुट तो उनके खिलाफ ही चलता है। ऐसे में आगे चल कर पायलट के लिए दिक्कत पेश आ सकती है।

शनिवार, 5 फ़रवरी 2011

तो फिर बाबा रामदेव की रैली को सहयोग क्यों नहीं किया?


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्षेत्रीय प्रचार प्रमुख सुनील कुमार ने अखबार वालों से बात करते हुए कहा कि संघ का योग गुरू बाबा रामदेव के भ्रष्टाचार के खिलाफ छेड़ गए अभियान में पूरा सहयोग रहेगा। मगर सच्चाई ये है कि पिछले दिनों अजमेर में जो रैली हुई थी, उससे अधिसंख्यक स्वयंसेवकों और भाजपा नेताओं व कार्यकर्ताओं ने जानबूझ कर दूरी बना रखी थी। इक्का-दुक्का हिंदूवादी नेता जरूर रैली में दिखाई दिए, लेकिन योजनाबद्ध रूप से संघ का रैली को कोई योगदान नहीं रहा। हालांकि यह सही है कि रैली के आयोजकों ने जो तैयारी बैठक बुलाई थी, उसमें अधिसंख्य संघनिष्ठ लोग ही शामिल थे, लेकिन जैसे उन्हें यह लगा कि बाबा रामदेव अपने इस अभियान व ताकत का बाद में राजनीतिक इस्तेमाल करेंगे, तो उन्होंने दूरी कायम कर ली। हकीकत तो ये है उस बैठक में ही संघ के स्वयंसेवकों ने कह दिया कि ऊपर से आदेश मिलने पर ही सहयोग दिया जा सकता है। इससे आयोजकों में तनिक मायूसी भी रही। परिणाम भी सामने आ गया। यदि वाकई संघ और भाजपा रैली का सहयोग करते तो वह रैली ऐतिहासिक होती। यूं रैली ठीक ठाक थी, मगर वह केवल आर्यसमाजियों की वजह से। ऐसा प्रतीत होता है कि संघ की पूर्व में बाबा रामदेव को सहयोग करने की कोई योजना नहीं थी और अब जा कर सहयोग का मानस बनाया है। या फिर ये भी हो सकता है कि जब पत्रकारों ने यह पूछा कि क्या भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान को संघ सहयोग करेगा तो औपचारिकतावश उन्होंने यह कह दिया होगा कि संघ का पूरा समर्थन है।
वैसे यह सच्चाई है कि आज भले ही संघ बाबा रामदेव को सहयोग करने की बात करे, मगर आगे चल कर जब बाबा रामदेव लोकसभा चुनाव में अपने प्रत्याशी खड़े करेंगे तो भाजपा को उससे भारी परेशानी होगी, क्यों वे भाजपा के ही वोट काटेंगे।
क्या डॉ. जयपाल लॉबी ने ठान रखी है भ्रष्टाचार मिटाने की?
विपक्ष के नाते भाजपा को जो भूमिका अदा करनी चाहिए, वह अजमेर में कांग्रेस के नेता अदा कर रहे हैं। एक दृष्टि से देखा जाए तो यह वाकई बड़े साहस की बात है कि अपनी ही सरकार के होते हुए प्रशासन के खिलाफ जम कर अभियान चला रखा है। हाल ही पूर्व विधायक डॉ. राजकुमार जयपाल के शागिर्द रमेश सैनानी ने प्रॉपर्टी डीलर्स एसोसिशन के बैनर पर आवासन मंडल के अधिकारियों की खाट खड़ी कर दी।
आइये, जरा पीछे चलते हैं। पिछले दिनों पूर्व विधायक डॉ. राजकुमार जयपाल के नेतृत्व में नगर सुधार न्यास में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ जो अभियान चलाया गया, वह किसी से छिपा हुआ नहीं है। वे न केवल न्यास सचिव अश्फाक हुसैन को चुनौती दे कर आए, बल्कि उन्हीं की पार्टी के युवा कार्यकर्ताओं ने ठीक वैसा हंगामा किया जो कि भाजपा को शोभा देता। बहरहाल, जहां तक भूमिका का सवाल है, वह जरूर विपक्ष जैसी नजर आती है, मगर उनके अभियान का परिणाम ये रहा कि न केवल दीपदर्शन सोसायटी को कथित रूप से अवैध रूप से आवंटित जमीन का आवंटन रद्द हुआ, अपितु कहीं न कहीं लिप्त जिला कलेक्टर राजेश यादव, न्यास सचिव अश्फाक हुसैन व विशेषाधिकारी अनुराग भार्गव अजमेर से रुखसत हो गए। इस लिहाज से भ्रष्टाचार के खिलाफ चलाये अभियान के लिए वे साधुवाद के पात्र हैं। ठीक इसके विपरीत विपक्षी पार्टी भाजपा पूरी तरह से नकारा साबित हुई है। कांग्रेस जब काफी आगे निकल गई, और लोगों ने विपक्षी दल भाजपा के लोगों का मुंह काला किया कि आप बैठे-बैठे क्या कर रहे हो, तब जा कर उसे होश आया और औपचारिक रूप से न्यास प्रशासन के खिलाफ ज्ञापन दिया। उसमें भी भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई खास सबूत नहीं दिए, केवल भाजपा शासन काल में शुरू हुए विकास कार्यों के ठप्प होने की शिकायत की। डॉ. जयपाल के नेतृत्व में चंद वरदायी नगर की जमीन के मामले में भी उनकी शिकायत भी जोर-शोर से उठाई गई और उस पर जांच चल रही है। न्यास से जुड़े ये मामले अभी शांत ही नहीं हुए कि एक दिन पहले डॉ. जयपाल के खासमखास सेनानी ने आवासन मंडल पर धावा बोल दिया और वहां व्याप्त अव्यवस्थाओं को लेकर अधिकारियों को जम कर खरी खोटी सुनाई। अमूमन अपने राज में किसी भी पार्टी के लोग प्रशासन की पोल नहीं खोलते कि इससे सरकार बदनाम होगी, मगर डॉ. जयपाल लॉबी ने उस अवधारणा को समाप्त कर दिया है। उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि सरकार उन्हीं की है और उसी की छत्रछाया में काम कर रहे प्रशासन को खींच कर रख रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि उन्हें प्रशासन को ठीक से चलाने का राज समझ में आ गया है।