शुरू से ही तीन के आंकड़े का अजमेर से काफी पुराना रिश्ता-नाता रहा है। आइएं इसको देखते हैं:-पृथ्वीराज चौहान के नाना महाराजा अजयपाल द्वारा बसाई गई और भोगौलिक रूप से राजस्थान की हृदयस्थली अजमेर, ऐतिहासिक धार्मिक एवं पर्यटन, तीनों ही दृष्टियों से बहुत ही अहम है। मुगलों के समय से ही यहां तीन के अंक का बड़ा महत्व रहा है। उस समय यहां तीन प्रसिद्ध स्थान थे, 1. ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह, 2. ढ़ाई दिन का झौंपड़ा और 3. अकबर का किला, जिसे आजकल मेगजीन के नाम से जाना जाता है। यही वह ऐतिहासिक स्थान है जहां ईस्ट इंडिया कम्पनी के सर टॉमस रो ने मुगल सम्राट जहांगीर को अपने प्रमाण-पत्र सौंप कर हिन्दुस्तान में व्यापार करने की इजाजत मांगी थी।
अजमेर की भौगोलिक बसावट तिकोनी है, जो तीन तरफ पहाड़ों 1. नाग पहाड़, 2. मदार पहाड़ और 3. तारागढ से घिरा हुआ है। यहां तीन ही झीलें हैं- 1. आनासागर, 2. फॉयसागर और पुष्कर। जहांगीर-शाहजहां के समय ही यहां आनासागर के किनारे बारहदरी एवं खामखा के तीन दरवाजों का निर्माण हुआ। यह तीन दरवाजे ख्वामख्वाह ही बनाये गये हैं या किसी खामेखां नामक मुगल सरदार के नाम पर बने हैं, यह खोज का विषय है, परन्तु दरवाजे तीन ही हैं, कोई भी देख सकता है। जिले के ब्यावर के पास ही खरवा नामक जगह है। वहां के ठाकुर गोपाल सिंहजी प्रसिद्ध क्रंातिकारी थे। उन्ही के राज में मोरसिंह नामक डाकू हुआ, जिनके लिए प्रसिद्ध था कि वह भी सिर्फ तीन कौमों 1. बनिया, 2.सुनार और 3.कलाल को ही लूटता था।
अजमेर को इस बात का गौरव है कि ब्रिटिश समय में यहां तीन प्रसिद्ध क्रंातिकारी 1.स्वामी कुमारानन्द 2.विजयसिंह पथिक, बिजौलिया किसान आन्दोलन के नेता एवं 3.अर्जुनलाल सेठी हुए, जिन्होंने अंग्रेज सरकार की नाक में दम कर दिया था।
यूं तो हिंदी पत्रकारिता के लिए अजमेर राजस्थान का अग्रणी स्थान है, लेकिन शुरू में मुख्य रूप से तीन साप्ताहिक थे, 1. पं. विश्वदेव शर्मा का न्याय 2. कैलाश वर्णवाल का राष्ट्रवाणी और गोपाल भैया का भभक। बाद में न्याय दैनिक हो गया और साप्ताहिक में घीसूलाल जी का आजाद जुड़ गया। उस समय यहां हिन्दी के तीन ही प्रमुख दैनिक पढे जाते थे, 1. कप्तान दुर्गाप्रसाद चौधरीजी का दैनिक नवज्योति 2. न्याय और 3. हजारीलाल शर्मा, जयपुर का राष्ट्दूत।
आजादी के बाद पहले राजपुताना एवं फिर राजस्थान के निर्माण के समय अजमेर को सी स्टेट यानि तीसरी श्रेणी का राज्य बनाया गया, जिसके प्रथम कमिश्नर ए.डी. पंडित थे। प्रथम आम चुनाव, 1952 के समय यहां तीन प्रमुख राजनीतिक दल 1. कांग्रेस, 2. हिन्दू महासभा और 3. साम्यवादी थे। चुनाव के बाद इस राज्य के प्रथम कांग्रेसी मंत्रीमंडल में तीन ही मंत्री थे, 1. मुख्यमंत्री श्री हरीभाऊ उपाध्याय 2. गृहमंत्री श्री बालकृष्ण कौल एवं 3. शिक्षा मंत्री बृजमोहन लाल शर्मा। उस समय इस राज्य में तीन ही मुख्य शहर थे, 1. अजमेर 2. ब्यावर एवं 3. किशनगढ। नसीराबाद तो छावनी, बिजयनगर कस्बा और पुष्कर धार्मिक स्थल के रूप में जाना जाता था। नवम्बर 1956 में राजस्थान में विलय के समय ऐतिहासिक, धार्मिक एवं राजनीतिक तीनों की महत्वता थी, लेकिन फिर भी इसे राजस्थान की राजधानी नहीं बनाया गया और मजे की बात देखिये कि उस समय भी इसे तीन संस्थान 1.रेवन्यू बोर्ड, 2.राजस्थान लोक सेवा आयोग एवं 3. शिक्षा बोर्ड देकर बहला दिया गया। यहां से तीन तरफ रेलवे लाइनें जाती थीं, जो पहले बीबी एंड सीआई एवं बाद में पश्चिम रेलवे के अंर्तगत होती थी। यहां रेलवे के तीन बड़े कारखाने 1. लोको 2. कैरिज तथा 3. सिगनल्स हुआ करते थे। दिलचस्प बात यह है कि उस समय यहां से तीन ओर ही मुख्य मुख्य सडक़ें जाती थी, 1.जयपुर-दिल्ली, 2.ब्यावर-अहमदाबाद और 3.नसीराबाद-रतलाम-इंदौर। उस समय अजमेर में तीन मुख्य कॉलेज थे, 1. मेयो कॉलेज 2. गर्वनमेंट कॉलेज और 3. डीएवी कॉलेज। शहर में मुख्य रूप से तीन व्यापारिक स्थल थे, 1. नयाबाजार 2. मदारगेट और 3. केसरगंज और नगर में तीन जगहों से पानी आता था, 1. गनाहेड़ा 2. फॉयसागर और 3. भांवता। मजे की बात देखिये कि शहर में तीन ही सिनेमा हॉल थे, 1. न्यू मैजिस्टिक 2. प्लाजा और 3. प्रभात और तीन ही नाटक-थियेटर इत्यादि के स्थल थे, 1. रेलवे बिसिट 2. रेलवे का ही कैरिज स्पोर्ट्स क्लब और 3. डिग्गी बाजार में रामायण मंडल। अजमेर शहर धार्मिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण स्थान रहा है। यहां हिन्दुओं, मुसलमानों एवं जैनियों के पूजनीय स्थल तो हैं ही इसके अतिरिक्त पारसियों, सिक्खों एवं ईसाइयों के पूजा स्थल भी हैं। हिन्दुओं के देवी- देवताओं के पहाडिय़ों पर तीन प्रमुख मन्दिर 1. चामुन्डा माता, 2. बजरंगगढ एवं 3. बाबूगढ हैं। उस जमाने में यहां तीन ही चिकित्सालय, 1. विक्टोरिया अस्पताल, 2. कस्तूरबा अस्पताल और 3. लौंगिया अस्पताल थे। तीन ही सब्जी मंडियां, 1. ईदगाह 2. रामगंज और 3. आगरागेट थीं। अजमेर शहर का दिलचस्प इतिहास सबसे पहले हमें उर्दू में लिखित मीर मुश्ताक अली की डायरी, जिसे फुलेरा के मनसब ने हिन्दी में अनुवाद किया और जिसका कुछ अंश राजस्थान पत्रिका ने छापा था, में मिलता है। लेकिन अजमेर पर ही एक ऐतिहासिक पुस्तक कर्नल टॉड ने लिखी, दूसरी श्री हरविलास शारदा ने और अब तीसरी पुस्तक ‘अजमेर एट ए ग्लांस’ नाम से अजमेर के ही तीन व्यक्तियों, प्रसिद्ध पत्रकार श्री गिरधर तेजवानी एवं अन्य दो विद्वानों डा. सुरेश गर्ग एवं कंवल प्रकाश ने लिखी है। इससे स्पष्ट है कि राजस्थान की राजधानी का मामला हो, कमजोर राजनीतिक नेतृत्व का मसला हो या रेलवे का इतना महत्वपूर्ण कार्यस्थल होने के बावजूद उसको पीछे ढकेल दिया गया हो, यहां जनता का कोई वर्ग तीन तेरह नहीं करता और जैसा मिला, जितना मिला है, सन्तुष्ट रहता है।
यह लेख जनस्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग के सेवानिवृत्त अधिशाषी अभियंता ई. शिव शंकर गोयल ने लिखा है। वे मूलत: व्यंग्य लेखक हैं, लेकिन हाल ही उन्होंने यह लेख लिख कर मुझे भेजा है। आशा है आपको पसंद आएगा।
वे आजकल दिल्ली में रहते हैं। उनका संपर्क सूत्र है:- फ्लैट न. 1201, आई आई टी इंजीनियर्स सोसायटी, प्लाट न. 12, सैक्टर न.10, द्वारका, दिल्ली-75.
मो. 9873706333
मंगलवार, 8 मार्च 2011
रविवार, 6 मार्च 2011
अजमेर को बार-बार क्यों याद कर रही हैं वसुंधरा

पूर्व मुख्यमंत्री व विधानसभा में विपक्ष की नेता श्रीमती वसुंधरा राजे जब से विधिवत फॉर्म में आई हैं, बार-बार अजमेर का नाम लेकर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पर निशाना साध रही हैं। उनका कहना है कि अजमेर में हुए भूमि घोटालों में कुछ और नाम सामने आएंगे। ऐसा प्रतीत होता है कि उनको किसी बम की बत्ती हाथ लग गई है, जिसको माचिस की तिल्ली दिखा कर विस्फोट करेंगी। हालांकि छोटे गहलोत का तो जिक्र कर ही चुकी हैं, मगर और नामों की ओर भी इशारा कर रही हैं, उससे ऐसा लगता है कि उनके हाथ कोई बड़ा रहस्य लग गया है, जिसका उद्घाटन समय पर करेंगी। वैसे यह तो तय है कि अजमेर के दोनों भाजपा विधायकों प्रो. वासुदेव देवनानी व श्रीमती अनिता भदेल के पास तो बारूद का कोई सामान नहीं है, वरना वे कभी का ब्लास्ट कर देते। देवनानी के पास तो महज एक पर्चा था, जिसमें अशोक गहलोत के बेटे वैभव का नाम था, उसे वे विधानसभा के पटल पर रख चुके हैं और उस पर गृहमंत्री शांति धारीवाल जांच करवा रहे हैं। इसके अतिरिक्त वे कुछ भी नहीं कर पाए। दोनों विधायकों को तो क्या पूरी शहर भाजपा के पास भी कोई मसाला नजर नहीं आता है, वरना जब कांग्रेस की तर्ज पर न्यास के खिलाफ उसने ज्ञापन दिया तो उसमें भी कुछ खास इशारा नहीं कर पाए। केवल भाजपा राज में शुरू हुए कामों के ठप होने का हवाला था। न्यास पर हमला किया भी है तो कांग्रेस ने। पूर्व विधायक डॉ. राजकुमार जयपाल, रमेश सेनानी और शहर उपाध्यक्ष डॉ. सुरेश गर्ग ने। उन्हीं की शिकायतों पर कार्यवाही हुई है।
रही बात पर्चे की तो लगता है जिसने उसे बनाया, उसी ने वसुंधरा राजे का मसाला प्रोवाइट करवाया है, तभी वे बार-बार अजमेर का नाम ले रही हैं। यूं वसुंधरा खुद के ही हाथ काफी लंबे हैं। जमीनों के बारे में उनकी जानकारी भी तगड़ी रहती है। उन्होंने ही अपने सूत्रों के जरिए मसाला जुटा लिया होगा। अब देखते हैं कि वे क्या गुल खिलाती हैं?
कांग्रेस ने खुद ही तो प्रशासन से कहा था-आ बैल मुझे मार !
जैसे ही जिला प्रशासन ने सफाई, अतिक्रमण और यातायात व्यवस्था पर शिकंजा कसना शुरू किया है तो कांग्रेसी पार्षदों को उसका दखल खलने लगा है। असल में प्रशासन का दखल तो तभी नजर आने लगा था, जब उसने नगर निगम को नकारा मानते हुए शहर की सफाई व्यवस्था को सुचारू बनाने तथा उस पर पूरी निगरानी रखने के साथ-साथ सडक़ों के रख-रखाव के बारे में पूरी नजर रखने हेतु 9 अतिरिक्त प्रशासनिक अधिकारियों को जिम्मेदारी दी थी। अपुन ने तो तभी इशारा कर दिया था कि सफाई और अतिक्रमण सीधे तौर पर निगम की ही जिम्मेदारी है, जिला प्रशासन को तो कोई मतलब ही नहीं। लेकिन जब नगर निगम खुद के काम करने में विफल साबित हो रहा था तो जिला प्रशासन को शहर की सुध लेनी ही पड़ी।
निगम अपने काम के प्रति कितना लापरवाह है, इसके लिए क्या सबूत कम है कि कांग्रेस को ही खुद के मेयर पर भरोसा नहीं। तभी तो शहर कांग्रेस के प्रवक्ता महेश ओझा ने मेयर को कहने की बजाय जिला कलेक्टर को पत्र लिख कर 15 अवैध कॉम्पलैक्सों की सूची देते हुए कार्यवाही की मांग करनी पड़ी। जिला कलेक्टर को दखल देने को कहना पड़ा। इसी से साफ हो गया था कि उसे निगम पर से भरोसा उठ गया है। कितने अफसोस की बात है कि कांग्रेस ने ही भाजपा के बीस साल के शासन को उखाड़ फैंकने के लिए उस पर कॉम्पलैक्सों की फसल उगाने का आरोप लगा कर जनता से वोट हासिल किए, और आज वह अपना मेयर होते हुए भी अवैध कॉम्पलैक्सों के खिलाफ कार्यवाही करने में उसको को नकारा मानते हुए जिला कलेक्टर से अनुरोध कर रहा है। जब आप खुद ही अपने मेयर को नकारा मानते हैं तो अगर प्रशासन ने भी उसे नकारा मान लिया तो क्या गलत कर दिया। आज प्रशासन के दखल पर ऐतराज करने वाले कांगे्रसी पार्षदों ने अपनी ही पार्टी के प्रवक्ता पर सवाल नहीं उठाये कि वे क्यों प्रशासन को दखल देने का न्यौता दे रहे हैं? क्यों प्रशासन से कह रहे हैं कि आ बैल मुझे मार।
निगम के कामों में प्रशासन के दखल पर सवाल उठाने वाले कांग्रेसी पार्षद नीतिगत दृष्टि से भले ही सही हों, क्यों कि निगम एक स्वायत्तशासी संस्था है, मगर क्या उनके पास इस बात का कोई जवाब है कि एक ओर तो पार्षद इस बात की शिकायत करते हैं कि अतिक्रमण के खिलाफ उनकी शिकायत पर कार्यवाही नहीं होती और दूसरी ओर निगम के अधिकारी कार्यवाही करते हैं तो वे कार्यवाही को रुकवाने को पहुंच जाते हैं। ये कैसी स्वायत्तता है, इस पर पार्षदों को ही विचार करना होगा। क्या हाल ही घटित वह किस्सा याद नहीं है कि जब दो पार्षद नगर निगम कर्मियों पर केवल इसी कारण चढ़ बैठे कि उन्होंने अतिक्रमण की शिकायत के मामले में उनके नाम उजागर कर दिए। यानि कि कार्यवाही करवाना भी चाहते हैं और बुरे भी नहीं बनना चाहते। ऐसा कैसे हो सकता है? पार्षद होने का एडवांटेज भी उठाना चाहते हैं, अच्छे काम की क्रेडिट भी लेना चाहते हैं, लेकिन बुराई नहीं लेना चाहते। पार्षदों की इसी फितरत को जान कर जब प्रशासन ने निगम का काम अपने हाथ में ले लिया है तो उन्हें बुरा लग रहा है। आज पार्षद कह रहे हैं कि वे पार्किंग सहित अन्य सभी व्यवस्थाओं से वे सहमत हैं, लेकिन प्रशासन अपने स्तर पर निर्णय करने की बजाय निगम को सुझाव भेजे, निगम अपने हित व शहर के हित के अनुरूप कार्यवाही कर लेगा। अव्वल तो निगम को खुद ही कार्यवाही करने से रोका किसने था? सवाल ये भी है कि अगर निगम खुद ही निर्णय कर लेना शुरू करता तो प्रशासन को दखल क्यों देना पड़ता?
रहा सवाल मेयर बाकोलिया की नाकामी का तो ये उन्हें ही विचार करना होगा कि उनके पद की गरिमा क्या है? वे कितने अधिकार संपन्न हैं? ऐसा प्रतीत होता है कि वे हनुमान की फितरत में हैं। उन्हें उनकी शक्तियों के बारे में जगाने वाला कोई जाम्वंत होना चाहिए। वैसे मेयर के नकारा सिद्ध होने के पीछे भी अपने अलग कारण हैं। ऐसा नहीं कि उन्होंने पहल नहीं की। उन्होंने भी अवैध कॉम्पलैक्सों के खिलाफ अभियान छेड़ा था, लेकिन भाजपा के विरोध, समाज विशेष की नाराजगी और कांग्रेस के असहयोग के कारण सहम गए और राजनीति में नए-नए होने के कारण चुप करके बैठ गए। उन्होंने भी संभागीय आयुक्त अतुल शर्मा की प्रेरणा से आवारा जानवरों को पकडऩे का अभियान छेड़ा था, मगर पशुपालकों के सचिन पायलट तक पहुंच जाने के कारण मन मसोस कर रह जाना पड़ा।
बहरहाल, सब जानते हैं कि इस मामले में विशेष रुचि ले रहे संभागीय आयुक्त अतुल शर्मा अजमेर के ही रहने वाले हैं और जिला कलेक्टर श्रीमती मंजू राजपाल के भी अजमेर से संबंध हैं, इस कारण उनमें अजमेर के प्रति विशेष दर्द है। इसी दर्द की वजह से वे शहर पर विशेष ध्यान दे रहे हैं। उनकी इस कारण तारीफ भी हो रही है। इस पर अपना तो सिर्फ इतना कहना है कि उन्हें तात्कालिक और अस्थाई समाधान निकालने की बजाय स्थाई व्यवस्था पर भी ध्यान देना चाहिए। अगर निगम के पास संसाधनों का अभाव है तो पहल करके राज्य सरकार से दिलवाने चाहिए। यह तो स्पष्ट ही है कि जिला प्रशासन के पास और भी महत्वपूर्ण काम हैं। वह बारहों महीने तो नगर निगम के काम पर ध्यान दे नहीं सकता। ताजा अभियान भी एक अस्थाई अभियान है। अभियान समाप्त होने पर हालात के जस के तस हो जाने वाले हैं। ऐसे में बेहतर यही है कि वह नगर निगम को अपने पैरों पर खड़ा होने में मदद करे। आखिर वह कब तक प्रशासन की बैसाखियों के सहारे चलेगा? वैसे भी यदि प्रशासनिक अधिकारियों ने सारा ध्यान निगम के कामों पर दिया तो आम जनता को उन कार्यों से वंचित होना पड़ेगा, जो कि प्रशासन के खाते में आते हैं। शहर तो साफ हो जाएगा, सुंदर हो जाएगा, मगर और किस्म की परेशानियां भुगतने लगेगा।
निगम अपने काम के प्रति कितना लापरवाह है, इसके लिए क्या सबूत कम है कि कांग्रेस को ही खुद के मेयर पर भरोसा नहीं। तभी तो शहर कांग्रेस के प्रवक्ता महेश ओझा ने मेयर को कहने की बजाय जिला कलेक्टर को पत्र लिख कर 15 अवैध कॉम्पलैक्सों की सूची देते हुए कार्यवाही की मांग करनी पड़ी। जिला कलेक्टर को दखल देने को कहना पड़ा। इसी से साफ हो गया था कि उसे निगम पर से भरोसा उठ गया है। कितने अफसोस की बात है कि कांग्रेस ने ही भाजपा के बीस साल के शासन को उखाड़ फैंकने के लिए उस पर कॉम्पलैक्सों की फसल उगाने का आरोप लगा कर जनता से वोट हासिल किए, और आज वह अपना मेयर होते हुए भी अवैध कॉम्पलैक्सों के खिलाफ कार्यवाही करने में उसको को नकारा मानते हुए जिला कलेक्टर से अनुरोध कर रहा है। जब आप खुद ही अपने मेयर को नकारा मानते हैं तो अगर प्रशासन ने भी उसे नकारा मान लिया तो क्या गलत कर दिया। आज प्रशासन के दखल पर ऐतराज करने वाले कांगे्रसी पार्षदों ने अपनी ही पार्टी के प्रवक्ता पर सवाल नहीं उठाये कि वे क्यों प्रशासन को दखल देने का न्यौता दे रहे हैं? क्यों प्रशासन से कह रहे हैं कि आ बैल मुझे मार।
निगम के कामों में प्रशासन के दखल पर सवाल उठाने वाले कांग्रेसी पार्षद नीतिगत दृष्टि से भले ही सही हों, क्यों कि निगम एक स्वायत्तशासी संस्था है, मगर क्या उनके पास इस बात का कोई जवाब है कि एक ओर तो पार्षद इस बात की शिकायत करते हैं कि अतिक्रमण के खिलाफ उनकी शिकायत पर कार्यवाही नहीं होती और दूसरी ओर निगम के अधिकारी कार्यवाही करते हैं तो वे कार्यवाही को रुकवाने को पहुंच जाते हैं। ये कैसी स्वायत्तता है, इस पर पार्षदों को ही विचार करना होगा। क्या हाल ही घटित वह किस्सा याद नहीं है कि जब दो पार्षद नगर निगम कर्मियों पर केवल इसी कारण चढ़ बैठे कि उन्होंने अतिक्रमण की शिकायत के मामले में उनके नाम उजागर कर दिए। यानि कि कार्यवाही करवाना भी चाहते हैं और बुरे भी नहीं बनना चाहते। ऐसा कैसे हो सकता है? पार्षद होने का एडवांटेज भी उठाना चाहते हैं, अच्छे काम की क्रेडिट भी लेना चाहते हैं, लेकिन बुराई नहीं लेना चाहते। पार्षदों की इसी फितरत को जान कर जब प्रशासन ने निगम का काम अपने हाथ में ले लिया है तो उन्हें बुरा लग रहा है। आज पार्षद कह रहे हैं कि वे पार्किंग सहित अन्य सभी व्यवस्थाओं से वे सहमत हैं, लेकिन प्रशासन अपने स्तर पर निर्णय करने की बजाय निगम को सुझाव भेजे, निगम अपने हित व शहर के हित के अनुरूप कार्यवाही कर लेगा। अव्वल तो निगम को खुद ही कार्यवाही करने से रोका किसने था? सवाल ये भी है कि अगर निगम खुद ही निर्णय कर लेना शुरू करता तो प्रशासन को दखल क्यों देना पड़ता?
रहा सवाल मेयर बाकोलिया की नाकामी का तो ये उन्हें ही विचार करना होगा कि उनके पद की गरिमा क्या है? वे कितने अधिकार संपन्न हैं? ऐसा प्रतीत होता है कि वे हनुमान की फितरत में हैं। उन्हें उनकी शक्तियों के बारे में जगाने वाला कोई जाम्वंत होना चाहिए। वैसे मेयर के नकारा सिद्ध होने के पीछे भी अपने अलग कारण हैं। ऐसा नहीं कि उन्होंने पहल नहीं की। उन्होंने भी अवैध कॉम्पलैक्सों के खिलाफ अभियान छेड़ा था, लेकिन भाजपा के विरोध, समाज विशेष की नाराजगी और कांग्रेस के असहयोग के कारण सहम गए और राजनीति में नए-नए होने के कारण चुप करके बैठ गए। उन्होंने भी संभागीय आयुक्त अतुल शर्मा की प्रेरणा से आवारा जानवरों को पकडऩे का अभियान छेड़ा था, मगर पशुपालकों के सचिन पायलट तक पहुंच जाने के कारण मन मसोस कर रह जाना पड़ा।
बहरहाल, सब जानते हैं कि इस मामले में विशेष रुचि ले रहे संभागीय आयुक्त अतुल शर्मा अजमेर के ही रहने वाले हैं और जिला कलेक्टर श्रीमती मंजू राजपाल के भी अजमेर से संबंध हैं, इस कारण उनमें अजमेर के प्रति विशेष दर्द है। इसी दर्द की वजह से वे शहर पर विशेष ध्यान दे रहे हैं। उनकी इस कारण तारीफ भी हो रही है। इस पर अपना तो सिर्फ इतना कहना है कि उन्हें तात्कालिक और अस्थाई समाधान निकालने की बजाय स्थाई व्यवस्था पर भी ध्यान देना चाहिए। अगर निगम के पास संसाधनों का अभाव है तो पहल करके राज्य सरकार से दिलवाने चाहिए। यह तो स्पष्ट ही है कि जिला प्रशासन के पास और भी महत्वपूर्ण काम हैं। वह बारहों महीने तो नगर निगम के काम पर ध्यान दे नहीं सकता। ताजा अभियान भी एक अस्थाई अभियान है। अभियान समाप्त होने पर हालात के जस के तस हो जाने वाले हैं। ऐसे में बेहतर यही है कि वह नगर निगम को अपने पैरों पर खड़ा होने में मदद करे। आखिर वह कब तक प्रशासन की बैसाखियों के सहारे चलेगा? वैसे भी यदि प्रशासनिक अधिकारियों ने सारा ध्यान निगम के कामों पर दिया तो आम जनता को उन कार्यों से वंचित होना पड़ेगा, जो कि प्रशासन के खाते में आते हैं। शहर तो साफ हो जाएगा, सुंदर हो जाएगा, मगर और किस्म की परेशानियां भुगतने लगेगा।
शुक्रवार, 4 मार्च 2011
साबित हो गई राजेश यादव की मुख्यमंत्री से नजदीकी

पिछले दिनों जब अजमेर के तत्कालीन जिला कलेक्टर राजेश यादव को सीएमओ में मुख्यमंत्री के विशिष्ट सचिव के रूप में तैनात किया गया था, तभी यह तथ्य स्थापित हो गया था कि वे मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के खासमखास हैं। कुछ लोग इसे अजमेर यूआईटी के घपले से जोड़ कर सजा के रूप में गिना रहे थे, जब कि अपुन ने तभी कह दिया था कि उनका कद इससे बढ़ गया है। उस वक्त मीडिया ने भी इस बात पर आश्चर्य जताया था कि सीएमओ में पहले से दो आईएएस होने के बावजूद यादव सहित दो युवा आईएएस क्यों लगाए गए हैं। कुछ लोगों का मानना था कि सीएमओ का अफसर एक बड़े बाबू जैसा होता है, क्योंकि उसके पास स्वयं में कोई अधिकार निहित नहीं होता और केवल मुख्यमंत्री व उच्चाधिकारियों के आदेश का पालन करना मात्र होता है। यादव को सीएमओ में लगाने के राजनीतिक हलकों में जो भी अर्थ लगाए गए, मगर इससे अजमेर में कांग्रेस के उन नेताओं के सीने पर सांप लौटने लगे थे, जिनको यादव ने अपने कार्यकाल में कभी नहीं गांठा। वे कई बार इसकी शिकायत मौखिक रूप से मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से करते रहे, मगर यादव का बाल भी बांका नहीं हुआ। बाल बांका होना तो दूर, उलटे यादव का कद और बढ़ गया।
हाल ही जब जयपुर नगर निगम की महापौर ज्योति खंडेलवाल और निगम में तैनात चार आरएएस के बीच टकराव हुआ तो सरकार सकते में आ गई। ज्योति खंडेलवाल ने सार्वजनिक रूप से आरएएस अफसरों को अतिक्रमण किंग करार दिया तो अफसरों ने भी लामबंद हो कर विरोध जता दिया। नगरीय विकास मंत्री शांति धारीवाल तक भौंचक्के रह गए। गुत्थी इतनी उलझ गई कि मुख्यमंत्री को संकटमोचक के रूप में राजेश यादव ही याद आए और गुरुवार की देर रात उन्हें निगम का सीईओ बनाने के आदेश जारी कर दिए। जयपुर नगर निगम का सीईओ होना कोई छोटी-मोटी बात नहीं। एक तो जयपुर नगर निगम प्रदेश के मुख्यालय का स्थानीय निकाय है, जिस पर पूरे प्रदेश की नजर रहती है। दूसरा वहां मेयर तो कांगे्रस की ज्योति खंडेलवाल तो सदन में भाजपा का बहुमत होने के कारण आए दिन सिर फुटव्वल होती है। फिर यदि मेयर व आरएएस अफसरों में सीध टकराव हो जाए तो समझा जा सकता है कि वह जंग का कैसा मैदान बना हुआ है। ऐसे में उसमें सरकार के प्रतिनिधि के तहत सीईओ के पद पर काम करने वाला कितना महत्वपूर्ण हो जाता है, इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है। बहरहाल, अब तो यह पूरी तरह साफ हो गया है कि यादव मुख्यमंत्री के खासमखास हैं।
नगर सुधार न्यास को लगा हुआ है ग्रहण
अजमेर नगर सुधार न्यास विवादों और भ्रष्टाचार का अड्डा बनता जा रहा है। वहां आए दिन कोई न कोई फफूंद होती ही है। कांग्रेस के पिछले शासनकाल में डॉ. श्रीगोपाल बाहेती को तो अध्यक्ष बना दिया गया, लेकिन सरकार न्यासियों की नियुक्ति करने का साहस नहीं जुटा पाई। भाजपा शासनकाल में धर्मेश जैन को सीडी कांड के कारण इस्तीफा देना पड़ गया, हालांकि बाद में पता लगा कि सीडी फर्जी थी। कुछ माह पूर्व संभागीय आयुक्त अतुल शर्मा व सचिव अश्फाक हुसैन के बीच टकराव चर्चा का विषय रहा, जो हुसैन के तबादले के बाद जा कर थमा। मजे की बात है कि विपक्षी दल भाजपा तो दूर सत्तारूढ़ दल कांग्रेस तक वहां व्याप्त अनियमितता के लेकर पिछले दिनों हमले कर चुका है। न्यास सचिव हुसैन व पूर्व विधायक डॉ. राजकुमार जयपाल के बीच हुई खींचतान किसी से छिपी नहीं है। इसी के चलते कांग्रेस की युवा सेना ने न्यास पर हमला बोल दिया था। इसके चलते पंचशील नगर योजना में दीपदर्शन सोसायटी को जमीन आवंटन के रद्द कर दिया गया। चंद वरदायी नगर योजना की जमीन और खेल मैदान आरसीए को देने के मामले भी अभी गर्म हैं। आरसीए के प्रकरण में अंडर द टेबल हुई सौदेबाजी को आज तक मीडिया वाले सूंघ रहे हैं। इसी बीच सूचना के अधिकार के एक मामले में भी न्यास प्रशासन की किरकिरी हुई। अब ठेकेदारों व एक्सईएन के बीच टकराव उभर कर आया है। ठेकेदार प्रकाश रांका ने तो एक्सईएन महावीर सिंह मेहता पर बिल भुगतान के एवज में चार लाख रुपए मांगने का आरोप खुले आम लगा दिया है। ऐसा प्रतीत होता है कि न्यास को ग्रहण लग चुका है। प्रशासन को चाहिए कि वह न्यास की कुंडली चैक करवाए कि कहीं उसमें काल सर्प योग तो नहीं है और उसका निवारण करने के लिए कोई शांति अनुष्ठान करवाए।
बोर्ड अध्यक्ष व संघ के हाथ में आ गई तराजू
राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड में कर्मचारी संघ को हाशिये पर रख कर समता मंच की ओर से कामय दबाव की वजह से अध्यक्ष डॉ. सुभाष गर्ग ने पदावनत कर्मचारियों को पुन: पुरानी सीटों पर तो भेज दिया, लेकिन परिणाम में बोर्ड कर्मचारी खुल कर दो खेमों में बंट गए हैं। एक वर्ग समता मंच से जुड़े कर्मचारियों के उपसचिव छगनलाल के साथ की गई कथित बदसलूकी के कारण लामबंद हो गया है। छगनलाल ने भी बदसूलकी करने वाले कर्मचारियों के खिलाफ एससी एसटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज करवा दिया है। ऐसे में अपनी मांग मनवा लेने के बाद भी समता मंच के कर्मचारी रक्षात्मक मुद्रा में आ गए हैं। जाहिर तौर पर ऐसे में अब एक बार फिर ट्यूनिंग बैठा कर चल रहे बोर्ड अध्यक्ष डॉ. गर्ग व कर्मचारी संघ के हाथ में तराजू आ गई है।
यहां उल्लेखनीय है कि समता मंच के कर्मचारियों ने बोर्ड अध्यक्ष डॉ. गर्ग व कर्मचारी संघ की ट्यूनिंग के कारण संघ पर अविश्वास रखते हुए उसकी मध्यस्थता को नकार कर बोर्ड प्रशासन पर सीधे दबाव बनाया। बोर्ड सचिव मिरजूराम शर्मा के आग्रह के बावजूद कर्मचारियों ने यह कह कर संघ की मध्यस्थता से इंकार कर दिया कि संघ की ही माननी होती तो वे सीधे क्यों आते। उन्होंने बोर्ड अध्यक्ष डॉ. गर्ग को भी घेर लिया। चूंकि समता मंच की मांग सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुरूप थी, इस कारण डॉ. गर्ग को झुकना पड़ा। मगर बोर्ड सचिव मिरजूराम शर्मा के घेराव के दौरान अप्रत्याशित रूप से मौके पर आए उप सचिव छगनलाल के साथ कथित तौर पर आई गाली-गलौच की नौबत समता मंच पर भारी पड़ गई है। सच्चाई क्या है, ये तो घटनास्थल पर मौजूद कर्मचारी व अधिकारी ही जानें, मगर अब वे अपना बचाव करते हुए कह रहे हैं कि छगनलाल ने अनाप-शनाप बकते हुए एससी एसटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज करवाने की धमकी दी थी। उनका ये भी कहना है कि इसके बारे में एसपी को ज्ञापन देने के बाद छगनलाल ने मुकदमा दर्ज करवाया है, अत: पुलिस के जांच अधिकारी को समता मंच के खिलाफ दर्ज मुकदमे की निष्पक्षता का ध्यान रखना चाहिए। साफ है कि वे ये कह कर मुकदमे की हवा निकालना चाहते हैं कि वह झूठा है और एससी एसटी एक्ट का दुरुपयोग करने का षड्यंत्र रचा जा रहा है। कुल मिला कर बोर्ड कर्मचारी समता मंच व आरक्षण मंच के बैनरों पर आमने-सामने आ गए हैं। यह स्थिति पूरे देश में अपनी विशिष्ट पहचान रखने वाले शिक्षा बोर्ड के लिए शर्मनाक हो गई है।
दूसरी ओर समता मंच के दबाव में मजबूरी में कर्मचारी संघ को एक तरफ रखने की परेशानी में आए बोर्ड अध्यक्ष डॉ. सुभाष गर्ग बोर्ड कर्मचारियों में उभरी नई गुटबाजी के कारण राहत में आ गए हैं। समता मंच के जिन कर्मचारियों के आगे उन्हें झुकना पड़ा था, उनका ही कानूनी पेंच में उलझना डॉ. गर्ग के लिए सुकून भरा माना जा सकता है। जाहिर तौर पर उन्हें अब दोनों गुटों के बीच तराजू रखने का मौका मिल गया है। इतना ही नहीं जिस कर्मचारी संघ को ताजा मसले पर उपेक्षा सहनी पड़ी थी वह भी अब मध्यस्थता करने की स्थिति में आ गया है। लब्बोलुआब एक बार फिर कूटनीति में माहिर डॉ. गर्ग को किस्मत से कूटनीतिक सफलता हाथ लगने जा रही है। इसके अतिरिक्त समता मंच के दबाव की वजह से डॉ. गर्ग व कर्मचारी संघ की ट्यूनिंग पर जो खतरा था, वह भी फिलहाल टलता नजर आ रहा है।
गुरुवार, 3 मार्च 2011
मजीद साहब, इतना आसान भी नहीं है नाजिम का पद
दरगाह की अंदरूनी व्यवस्थाओं को अंजाम देने वाली दरगाह कमेटी के नए नाजिम जनाब अब्दुल मजीद खान साहब ने गुरुवार को कुर्सी संभालने से पहले एक बयान में कहा कि चुनौतियों के बिना कार्य करने का उन्हें मजा ही नहीं आता। जाहिर है उनको पदभार संभालने से पहले ही दरगाह में मौजूद कुछ चुनौतियों की जानकारी दी गई होगी, तभी प्रतिक्रिया में उन्होंने यह दिलेरी दिखाई है। ऐसे शेर बहादुर की ही जरूरत है, जो दरगाह में व्याप्त समस्याओं का बहादुरी से मुकाबला कर सके। लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि नए नाजिम साहब को वास्तविक चुनौतियों के बारे में जानकारी हुई नहीं होगी।
असल में दरगाह शरीफ में काम की चुनौतियां तो हैं ही, जो कि हर जगह पर स्वाभाविक रूप से होती हैं, मगर यहां कुछ बिना काम की चुनौतियां भी हैं। सरकार की ओर से तय की गई नाजिम की ड्यूटी से जुड़े काम तो हैं ही, बिना तय किए हुए काम भी करने होते हैं। जैसे सबसे बड़ी चुनौती है दरगाह में धार्मिक रस्में अदा करवाने के हकदार खुद्दाम हजरात और सुप्रीम कोर्ट की ओर से माने गए ख्वाजा साहब के निकटतम उत्तराधिकारी दरगाह दीवान के बीच तालमेल रखना। अमूमन इन्हीं के बीच तालमेल बैठाने के चक्कर में नाजिम उलझ जाते हैं। अब तक नियुक्त लगभग सभी नाजिम विवाद की चपेट में आए ही हैं। कुछ नाजिम तो पिट भी चुके हैं। पिछले नाजिम भी पिटे थे। यह एक बड़ी चुनौती है। थोड़ी सी चूक हुई नहीं कि पिटने की नौबत आ जाती है। थोड़ी गलती हुई नहीं कि विवाद उठ खड़ा होता है। और विवाद पैदा करने वाले भी मौके की तलाश में ही रहते हैं। कुछ तत्त्व तो ऐसे भी हैं, जो नाजिमों के साथ भिड़ंत कर-कर के इलाके में छाये हुए हैं। अकेले आरएएस अफसर अश्फाक हुसैन ही ऐसे थे, जो सर्वाधिक कामयाब रहे और अमूमन सभी को साथ लेकर चलते रहे। असल में उन्होंने आदतन हंगामा करने वालों से ही दोस्ती कर ली, इस कारण उनके कार्यकाल में हंगामे कम ही हुए।
दूसरी सबसे बड़ी चुनौती कुछ अलग किस्म की है। हालांकि सरकार की ओर से दरगाह के अंदर की व्यवस्थाएं करने की जिम्मेदारी नाजिम को दी हुई है, लेकिन उन सभी व्यवस्थाओं में कहीं न कहीं खादिमों से टकराव की नौबत आ ही जाती है। असल बात तो ये है कि यदि नाजिम नियमानुसार ही चले तो कदम-कदम पर टकराव हो जाए और वह काम ही नहीं कर पाए। अधिसंख्य नियम खादिमों के सर्वाधिकार में बाधा बनते हैं। वस्तुत: नाजिम तो नियुक्त किए हुए हैं और कुछ समय के लिए आते हैं, जबकि खादिमों को खिदमत का जन्मसिद्ध अधिकार है। नाजिम साहब को खिदमत का कितना मौका मिलेगा, पता नहीं, लेकिन खादिमों को खिदमत का अधिकार तो पीढ़ी-दर-पीढ़ी चला आ रहा है और कायनात रहने तक चलता रहेगा। इस कारण दरगाह के भीतर उनका रुतबा लाजवाब है। इतना लाजवाब कि वर्दी का रुतबा गालिब करते ही कानून के रखवाले पुलिस वाले तक पिट जाते हैं। पुलिस अफसर तक अपने मातहतों के पिटने पर समझौता करने में ही अपनी भलाई समझते हैं। असल में धार्मिक लिहाज से खादिमों की दरगाह में अहम भूमिका है ही, वे संपन्न होने के साथ-साथ ऊंचे रसूखात वाले हैं। बड़े-बड़े राजनीतिकों व वीवीआईपी से उनके संबंध हैं। इस कारण जो नाजिम चतुराई से उनकी मिजाजपुर्सी करके चलता है वह तो शांति से समय काट लेता है और अगर थोड़ी भी अड़ाअड़ी करता है तो लपेटे में आ जाता है।
इन दो चुनौतियों के अतिरिक्त भी अनेक चुनौतियां हैं, मगर उनसे पार पाया जा सकता है। जैसे कि दरगाह के अंदर अतिक्रमण है। उसे हटाने की हर नाजिम कोशिश करता है, मगर आज तक कोई भी सफल नहीं हो पाया है। ऐसे में उनके बेहतर ये ही होता है कि अपनी आंखें ही मूंद लें। बस इसी प्रकार जगह-जगह पर आंख मूंद लीजिए, मजीद साहब, आपको कोई दिक्कत नहीं आएगी।
असल में दरगाह शरीफ में काम की चुनौतियां तो हैं ही, जो कि हर जगह पर स्वाभाविक रूप से होती हैं, मगर यहां कुछ बिना काम की चुनौतियां भी हैं। सरकार की ओर से तय की गई नाजिम की ड्यूटी से जुड़े काम तो हैं ही, बिना तय किए हुए काम भी करने होते हैं। जैसे सबसे बड़ी चुनौती है दरगाह में धार्मिक रस्में अदा करवाने के हकदार खुद्दाम हजरात और सुप्रीम कोर्ट की ओर से माने गए ख्वाजा साहब के निकटतम उत्तराधिकारी दरगाह दीवान के बीच तालमेल रखना। अमूमन इन्हीं के बीच तालमेल बैठाने के चक्कर में नाजिम उलझ जाते हैं। अब तक नियुक्त लगभग सभी नाजिम विवाद की चपेट में आए ही हैं। कुछ नाजिम तो पिट भी चुके हैं। पिछले नाजिम भी पिटे थे। यह एक बड़ी चुनौती है। थोड़ी सी चूक हुई नहीं कि पिटने की नौबत आ जाती है। थोड़ी गलती हुई नहीं कि विवाद उठ खड़ा होता है। और विवाद पैदा करने वाले भी मौके की तलाश में ही रहते हैं। कुछ तत्त्व तो ऐसे भी हैं, जो नाजिमों के साथ भिड़ंत कर-कर के इलाके में छाये हुए हैं। अकेले आरएएस अफसर अश्फाक हुसैन ही ऐसे थे, जो सर्वाधिक कामयाब रहे और अमूमन सभी को साथ लेकर चलते रहे। असल में उन्होंने आदतन हंगामा करने वालों से ही दोस्ती कर ली, इस कारण उनके कार्यकाल में हंगामे कम ही हुए।
दूसरी सबसे बड़ी चुनौती कुछ अलग किस्म की है। हालांकि सरकार की ओर से दरगाह के अंदर की व्यवस्थाएं करने की जिम्मेदारी नाजिम को दी हुई है, लेकिन उन सभी व्यवस्थाओं में कहीं न कहीं खादिमों से टकराव की नौबत आ ही जाती है। असल बात तो ये है कि यदि नाजिम नियमानुसार ही चले तो कदम-कदम पर टकराव हो जाए और वह काम ही नहीं कर पाए। अधिसंख्य नियम खादिमों के सर्वाधिकार में बाधा बनते हैं। वस्तुत: नाजिम तो नियुक्त किए हुए हैं और कुछ समय के लिए आते हैं, जबकि खादिमों को खिदमत का जन्मसिद्ध अधिकार है। नाजिम साहब को खिदमत का कितना मौका मिलेगा, पता नहीं, लेकिन खादिमों को खिदमत का अधिकार तो पीढ़ी-दर-पीढ़ी चला आ रहा है और कायनात रहने तक चलता रहेगा। इस कारण दरगाह के भीतर उनका रुतबा लाजवाब है। इतना लाजवाब कि वर्दी का रुतबा गालिब करते ही कानून के रखवाले पुलिस वाले तक पिट जाते हैं। पुलिस अफसर तक अपने मातहतों के पिटने पर समझौता करने में ही अपनी भलाई समझते हैं। असल में धार्मिक लिहाज से खादिमों की दरगाह में अहम भूमिका है ही, वे संपन्न होने के साथ-साथ ऊंचे रसूखात वाले हैं। बड़े-बड़े राजनीतिकों व वीवीआईपी से उनके संबंध हैं। इस कारण जो नाजिम चतुराई से उनकी मिजाजपुर्सी करके चलता है वह तो शांति से समय काट लेता है और अगर थोड़ी भी अड़ाअड़ी करता है तो लपेटे में आ जाता है।
इन दो चुनौतियों के अतिरिक्त भी अनेक चुनौतियां हैं, मगर उनसे पार पाया जा सकता है। जैसे कि दरगाह के अंदर अतिक्रमण है। उसे हटाने की हर नाजिम कोशिश करता है, मगर आज तक कोई भी सफल नहीं हो पाया है। ऐसे में उनके बेहतर ये ही होता है कि अपनी आंखें ही मूंद लें। बस इसी प्रकार जगह-जगह पर आंख मूंद लीजिए, मजीद साहब, आपको कोई दिक्कत नहीं आएगी।
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