बुधवार, 6 जुलाई 2011

आखिर सचिन पायलट ने कर लिया शहर कांग्रेस पर कब्जा



अध्यक्ष पद पर महेन्द्र सिंह रलावता के काबिज होने के साथ ही निवर्तमान शहर कांग्रेस अध्यक्ष जसराज जयपाल व पूर्व उप मंत्री ललित भाटी की खींचतान से एक लंबे अरसे से पीडि़त शहर कांग्रेस दो के कब्जे से मुक्त हो गई है, वहीं सांसद बनने के बाद लगातार अपना कब्जा बनाने को आतुर स्थानीय सांसद व केन्द्रीय संचार राज्य मंत्री सचिन पायलट को एक बड़ी सफलता हासिल हो गई है।
यह सर्वविदित ही है कि गुटबाजी के कारण ही कांग्रेस को बहुत पिछले बीस साल में काफी नुकसान उठाना पड़ा है। अजमेर पूर्व विधानसभा सीट, जो कि अब अजमेर दक्षिण है, केवल इसी गुटबाजी के कारण कांग्रेस को तीन बार गंवानी पड़ी। दोनों ही गुटों के प्रमुख डॉ. राजकुमार जयपाल व ललित भाटी इसका शिकार हुए। इसी प्रकार स्थानीय निकाय के चुनाव में भी कांग्रेस को लगातार हार का सामना करना पड़ा। निगम चुनाव में मेयर भले ही कांग्रेस का बन गया, मगर बोर्ड पर तो भाजपा ने ही कब्जा कर लिया। हालांकि लोकसभा के चुनाव में इसी गुटबाजी को दबा कर सचिन पायलट जीतने में कामयाब हो गए थे, मगर संगठन पर फिर भी उनकी विरोधी जयपाल लॉबी ही काबिज थी। यद्यपि पायलट ने ऊपर से दबाव डाल कर अपने कुछ चहेतों को संगठन में प्रवेश करवा दिया, मगर फिर भी अपने मन के मुताबिक जाजम बिछाने का उन्हें बेसब्री से इंतजार था। पिछले दिनों जब संगठन चुनाव की प्रक्रिया शुरू हुई तो एक बारगी शहर अध्यक्ष पद पर नियुक्ति का अधिकार सर्वसम्मति से पायलट को दे दिया गया, लेकिन जयपाल लॉबी बाद में इससे मुकर गई। इस घटना से पायलट को बड़ा झटका लगा है। वे यह सोच रहे थे कि बड़ी आसानी ने सभी गुट उनकी छतरी के नीचे आ जाएंगे, लेकिन सब कुछ गड़बड़ हो गया।
हुआ दरअसल यूं कि नगर निगम चुनाव में स्थानीय कांग्रेसियों को जीत के आसार कम नजर आ रहे थे। इस कारण उन्होंने उस वक्त शहर अध्यक्ष का नाम तय करने का मसला पायलट पर छोड़ दिया, ताकि परिणाम आने के बाद हार का ठीकरा पायलट पर यह कह कर फोड़ा जा सके कि स्थानीय स्तर पर कांग्रेस में कोई मतभेद नहीं था। जैसे ही चुनाव में कांग्रेस के कमल बाकोलिया मेयर बने तो जीत का पूरा श्रेय पायलट को दिया जाने लगा। खुद बाकोलिया ने भी पायलट का ही अहसान माना। पायलट का इस प्रकार मजबूत होना जयपाल लॉबी को रास नहीं आया। उसने अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए शहर अध्यक्ष पद के लिए पायलट को दिए गए अधिकार पर बनाई गई आमराय को उखाड़ फैंका। उन्होंने कांग्रेस पर्यवेक्षकों के सामने साफ कह दिया कि विधिवत चुनाव कराए जाएं। बहरहाल, स्थानीय खींचतान के अतिरिक्त नए प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति के विवाद की वजह से नियुक्ति अटकी रही। जैसे ही डॉ. चंद्रभान प्रदेश अध्यक्ष बने, जिला अध्यक्ष की नियुक्ति का रास्ता भी खुल गया। समझा यही जा रहा था कि अजमेर संगठन पर पकड़ रखने के लिए मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अपने चहेते पूर्व विधायक डॉ. श्रीगोपाल बाहेती को ही नियुक्त करवा लेंगे, मगर पायलट की हाईकमान से नजदीकी के चलते उन्हें अपने चहेते रलावता को कब्जा दिलवाने में कामयाबी हासिल हो गई। इसमें कुछ भूमिका स्वयं रलावता की कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह से करीबी की भी रही।
निर्गुट की शुरुआत की थी राठौड़ ने
हालांकि शहर को जयपाल-भाटी लॉबी से मुक्त करवाने की सफलता पायलट के जरिए रलावता को हासिल हो गई है, मगर इसकी पृष्ठभूमि काफी पहले ही बनने लगी थी। कांग्रेस के अनेक कार्यकर्ता दोनों गुटों से मुक्ति चाहते थे। देहात जिला युवक कांग्रेस के अध्यक्ष रहे भूपेन्द्र सिंह राठौड़ ने उन्हें एक जाजम पर बैठा कर शहर व इस दिशा में प्रयास शुरू किए। उन्होंने किसान कांग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष के नाते एक जलसा कर पायलट का जवाहर रंगमंच पर शानदार स्वागत किया। उनका मकसद था कि अपनी ताकत दिखा कर वे शहर कांग्रेस अध्यक्ष पद हासिल कर लें। मगर बाद में हालात को भांप कर उन्होंने अपने आप को दौड़ से अलग कर लिया। असल में राठौड़ ने तीसरी लॉबी बना कर शहर कांग्रेस पर कब्जा करने की कोशिश तो काफी पहले ही कर ली थी, लेकिन उनकी चतुराई काम न आई। विधिवत चुनाव प्रक्रिया के दौरान हकीकत में रिकार्ड पर तो वे शहर अध्यक्ष लगभग बन ही चुके थे, लेकिन उस वक्त चुनाव प्रक्रिया को दफ्तर दाखिल कर दिए जाने के कारण उनके मनसूबे पूरे नहीं हो पाए थे।
अब न्यास अध्यक्ष की कुर्सी पर नजर
रलावता के शहर कांग्रेस अध्यक्ष बनने के साथ ही अब सबकी निगाहें नगर सुधार न्यास के अध्यक्ष पद पर टिक गई है। रलावता की प्राथमिकता न्यास सदर बनने की थी, मगर आखिरकार वे संगठन की जिम्मेदारी को संभालने को राजी हो गए। एक प्रमुख दावेदार के मैदान से बाहर होने के साथ ही न्यास सदर बनने के लिए खींचतान तेज हो जाएगी। जाहिर तौर पर शेष दावेदारों में सबसे ताकतवर मुख्यमंत्री गहलोत के खासमखास पूर्व विधायक डॉ. श्रीगोपाल बाहेती ही हैं, मगर चूंकि उन्हें बीस सूत्री कार्यक्रम क्रियान्वयन समिति का उपाध्यक्ष बनाया जा चुका है, इस कारण कई लोगों को मानना है कि उनको मौका नहीं दिया जाएगा। वैसे भी न्यास में हुए घोटालों में उनके पुत्र वैभव गहलोत का नाम घसीटे जाने से वे बेहद खिन्न हैं। कदाचित इसी कारण अपने चहेते को सदर बना कर नई मुसीबत मोल लेना नहीं चाहेंगे। एक कयास ये भी है कि विधानसभा चुनाव में सिंधी-गैर सिंधीवाद से चोट खाई कांग्रेस सिंधियों को खुश करने के लिए किसी सिंधी को मौका दे सकती है। इस लिहाज से नरेन शहाणी का दावा सबसे मजबूत है, मगर सुना है कि सूचना आयुक्त एम.डी. कोरानी के पुत्र शशांक कोरानी ने भी इस कुर्सी पर नजर टिका रखी है। अन्य प्रबल दावेदारों में जसराज जयपाल अथवा डॉ. राजकुमार जयपाल भी माने जा रहे हैं, ताकि शहर अध्यक्ष पद से बेदखली से नाराज उनकी लॉबी को संतुष्ट किया जा सके। यूं ललित भाटी, राजेश टंडन, प्रकाश गदिया, डॉ. लाल थदानी व मुकेश पोखरणा के नाम भी चर्चा में हैं।
बाकोलिया होंगे मजबूत
रलावता के शहर अध्यक्ष बनने से मेयर कमल बाकोलिया को सर्वाधिक राहत मिली है। सचिन पायलट लॉबी का होने के कारण शहर अध्यक्ष जयपाल की लॉबी उन्हें कोई तवज्जो नहीं दे रही थी। हाल ही जब उनकी जानकारी में लाए बिना ही प्रशासन ने माधव नगर कॉलोनी में जमीन का कब्जा लिया तो वे काफी कसमसाए। उनके कुछ समर्थकों ने संगठन की बैठक कर निगम सीईओ सी. आर. मीणा के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया, मगर जयपाल लॉबी ने सरकार के निर्णय के खिलाफ उनका साथ देने से इंकार कर दिया। इससे बाकोलिया काफी आहत हुए। अब जबकि उनके सबसे ज्यादा करीबी रलावता शहर अध्यक्ष बन गए हैं तो वे काफी सुकून महसूस कर रहे हैं। वे समझते हैं कि नए समीकरणों में संगठन के साथ होने पर उनके कब्जे में नहीं आ रहे कांग्रेस पार्षदों पर कुछ तो अंकुश लगेगा। देखते हैं अब तक कमजोर साबित हो रहे बाकोलिया कैसा परफॉर्म कर पाते हैं।

शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

राजस्व मंडल के मामले में अंधेरे में रख रही है सरकार


विखंडन का नाम लिए बिना की गई है विखंडन की तैयारी
संभागीय आयुक्तों को राजस्व मंडल का सदस्य बना कर उसका विखंडन करने के प्रस्ताव के विरोध में एक ओर जहां अजमेर आंदोलित है, वहीं राज्य सरकार इसे हल्के में ले रही है और स्थिति स्पष्ट करने की बजाय उलझाए जा रही है। अजमेर वासियों के लिए आशा की किरण कहलाने वाले केन्द्रीय संचार राज्य मंत्री सचिन पायलट तक की हालत ये है उन्हें राज्य सरकार साफ-साफ कुछ नहीं बता रही। वे भी राजस्व मंत्री हेमाराम चौधरी की भाषा ही बोल रहे हैं कि मंडल के विखंडन जैसा कोई प्रस्ताव सरकार के पास विचाराधीन नहीं है। अफसोसनाक बात ये है कि एक ओर बार के वकील पिछले 24 दिन से आंदोलनरत हैं और मंडल में कामकाज ठप है, जिससे काश्तकारों व पक्षकारों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है, वहीं राजस्व मंत्री हेमाराम चौधरी साफ तौर पर यह कहने की बजाय कि मंडल का विखंडन नहीं किया जाएगा, यह कह कर अपना पिंड छुड़वा रहे हैं कि उनके पास इस प्रकार की कोई भी फाइल नहीं आई है। साफ नजर आ रहा है कि वे जान-समझ सब रहे हैं, मगर जानबूझ कर अनजान बने हुए हैं। उनकी लापरवाही और हठधर्मिता का नमूना देखिए कि एक ओर राजस्व मंडल का कामकाज बंद पड़ा है और वे कह रहे हैं कि यदि इस प्रकार की कोई फाइल है भी तो वे क्यों मंगवाएं, अपने आप आ जाएगी। अर्थात उन्हें अजमेर के वजूद के साथ हो रहे छेड़छाड़ व उसकी वजह से हो रहे आंदोलन से कोई सरोकार नहीं है।
आइये जरा समझें कि माजरा क्या है? वस्तुत: विवाद शुरू ही इस बात से हुआ कि राजस्व महकमे के शासन उप सचिव ने संभागीय आयुक्तों को राजस्व मंडल के सदस्य की शक्तियां प्रदत्त करने संबंधी पत्र मंडल के निबंधक को लिखा है। पत्र की भाषा से ही स्पष्ट है कि सरकार मंडल को संभाग स्तर पर बांटने का निर्णय कर चुकी है, बस उसे विखंडन का नाम देने से बच रही है। शासन उपसचिव के पत्र से ही स्पष्ट है कि गत 1 अप्रैल 2011 को अतिरिक्त मुख्य सचिव विकास की अध्यक्षता में हुई बैठक में ही निर्णय कर यह निर्देश जारी कर दिए थे कि संभागीय आयुक्तों को मंडल सदस्य के अधिकार दे दिए जाएं। तभी तो शासन उपसचिव ने निबंधक को साफ तौर निर्णय की नोट शीट भेज कर आवश्यक कार्यवाही करके सूचना तुरंत राजस्व विभाग को देने के लिए कहा है। ऐसे में राजस्व मंत्री चौधरी का यह बयान बेमानी हो जाता है कि उनके पास तो ऐसी कोई फाइल नहीं आई है। सवाल ये उठता है कि क्या राजस्व मंत्री की जानकारी में लाए बिना ही अतिरिक्त मुख्य सचिव विकास की अध्यक्षता में निर्णय कर लिया गया? उससे भी बड़ा सवाल ये कि अगर अधिकारियों के स्तर पर निर्णय ले भी लिया था तो उसे कार्यान्वित किए जाने के लिए उनके अधीन विभाग के शासन उप सचिव ने राजस्व मंत्री को जानकारी दिए बिना ही मंडल के निबंधक को पत्र कैसे लिख दिया? माजरा साफ है कि या तो वाकई मंत्री महोदय को जानकारी दिए बिना ही पत्र व्यवहार चल रहा है, या फिर वे झूठ बोल रहे हैं। यदि झूठ नहीं बोल रहे हैं तो इसका अर्थ ये है कि विभाग पर मंत्री महोदय का कोई नियंत्रण ही नहीं है, तभी तो पत्र व्यवहार होने के बाद भी वे अभी तक अनभिज्ञ हैं।
मंत्री महोदय की दयनीय हालत देखिए कि वे कह रहे हैं कि उनके पास ऐसी कोई फाइल नहीं आई है, उनके पास आएगी तो उस पर विचार करेंगे। दूसरी ओर स्थिति ये है कि अधिकारी स्तर पर निर्णय किया जा चुका है और उसे क्रियान्वित करने की बात हो रही है। कितने अफसोस की बात है कि मंत्री महोदय अभी इसी भुलावे में हैं कि पहले फाइल उनके पास आएगी, वे सीएस से बात करेंगे, फिर फाइल मुख्यमंत्री के पास जाएगी, कानून में संशोधन के लिए विधानसभा में रखा जाएगा और राज्यपाल की भी मंजूरी लेनी होगी। यदि इस मामले में इतनी लंबी प्रक्रिया से गुजरना होता तो शासन उप सचिव के पत्र में इतना स्पष्ट कैसे लिखा हुआ होता कि अतिरिक्त मुख्य सचिव विकास के निर्देशों पर आवश्यक कार्यवाही की जाए? यानि कि मंत्री महोदय को ये गलतफहमी है कि इसके लिए कानून पारित करना होगा, जबकि अधिकारी अपने स्तर पर व्यवस्था को अंजाम देने जा रहे हैं।
इसका एक मतलब ये भी है कि अजमेर के वकील, बुद्धिजीवी व प्रबुद्ध नागरिक जिस व्यवस्था को विखंडन मान कर आंदोलित हैं, सरकार की नजर में वह एक सामान्य प्रक्रिया मात्र है। और यही वजह है कि जैसे ही सरकार से ये पूछा जाता है कि क्या राजस्व मंडल का विखंडन किया जा रहा है तो वह साफ कह देती है कि ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं है। यानि कि बाकायदा विखंडन तो किया जा रहा है, मगर उसे विखंडन का नाम देने से बचा जा रहा। इसी शाब्दिक चतुराई के बीच मामला उलझा हुआ है। अजमेर वासी चाहते हैं कि सरकार साफ तौर पर कह दे कि विखंडन नहीं किया जाएगा, जबकि वह यह कह कर कि उसके पास विखंडन का कोई प्रस्ताव ही विचाराधीन नहीं है, अपना पिंड छुड़वाना चाहती है।
यहां उल्लेखनीय है कि अजमेर वासियों को स्थानीय सांसद व केन्द्रीय संचार राज्य मंत्री सचिन पायलट से बड़ी उम्मीदें हैं, मगर वे भी सरकार से यह स्पष्ट जवाब लेने में अब असफल रहे हैं कि अजमेर-मेरवाड़ा राज्य के राजस्थान में विलय के वक्त अजमेर के वजूद के मद्देनजर राव कमीशन की सिफारिश के आधार पर स्थापित राजस्व मंडल का विखंडन नहीं किया जाएगा।
-तेजवानी गिरधर, अजमेर

रविवार, 26 जून 2011

मुख्यमंत्री की बची न बची, मेयर की प्रतिष्ठा तो मिट्टी में मिल गई



दीप दर्शन हाउसिंग सोसायटी की ओर से बसाई गई माधव नगर कॉलोनी में 59 लोगों के प्लॉट का आवंटन रद्द करने और 10 दुकानों को सीज करने की कार्यवाही जिस प्रकार ताबड़तोड़ की गई, उससे मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की प्रतिष्ठा बची या नहीं, पता नहीं, मगर अजमेर के मेयर कमल बाकोलिया की तो मिट्टी में ही मिल गई। यहां उल्लेखनीय है कि दीप दर्शन सोसायटी के कथित जमीन घोटाले में गहलोत के पुत्र वैभव गहलोत का नाम जोड़े जाने के बाद जैसे ही गहलोत की कुर्सी पर आंच आने लगी, उन्होंने पहले पंचशील कॉलोनी में दीप दर्शन सोसायटी के नाम नगर सुधार न्यास की ओर से आवंटित 63 बीघा जमीन के आवंटन व लीज को रद्द कर दिया गया। इसके बाद इसी सोसायटी की माधव नगर कॉलोनी को भी लपेटे में ले लिया गया।
कानून के जानकार ही नहीं बल्कि आम आदमी भी समझ रहा है कि गहलोत ने अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए सारे नियम-कायदे ताक पर रख कर कार्यवाही कर दी और कोर्ट से आवंटियों को राहत मिलने की पूरी उम्मीद है, लेकिन इससे अजमेर नगर निगम के मेयर कमल बाकोलिया की प्रतिष्ठा के तो पलीता लग ही गया। माधव नगर में बाकोलिया का भी मकान है। अफसोसनाक पहलु ये है कि जमीन पर कब्जा लेने को नगर निगम के ही सीईओ सी. आर. मीणा दल-बल के साथ गए और निगम स्थित चैंबर में बैठे बाकोलिया को हवा तक नहीं लगी। जाहिर है ऊपर से इशारा था कि उन्हें पता नहीं लगना चाहिए, वरना वे रोड़ा अटका सकते हैं। सरकार के इस रवैये से जहां यह साफ हो गया है कि उनकी प्राथमिकता गहलोत की प्रतिष्ठा बचाना था, मेयर की जाए तो जाए, वहीं यह भी स्पष्ट हो गया है कि मेयर की सरकार में कितनी पहुंच है। सरकार में छोडिय़े, स्थानीय स्तर पर भी उनका तंत्र कितना कमजोर है, इसकी भी पोल पट्टी खुल गई। वे निगम में ही बैठे थे और मीणा सहित निगम के दल के मौके पर रवाना हो कर कार्यवाही करने तक उन्हें हवा तक नहीं लगी। साफ है कि वे मेयर बनने के बाद उसकी कुर्सी पर बैठ कर इतराना भर सीख पाए हैं, मेयर वाली प्रशासनिक योग्यता और रुतबा हासिल नहीं कर पाए हैं। कुछ लोगों का मानना है कि सरकार चाहती तो बाकोलिया को यह कह कर पहले विश्वास में ले सकती थी कि कार्यवाही करना उनकी मजबूरी है, मगर उसने बाकोलिया को इस योग्य भी नहीं समझा। रहा मीणा का तो उन्हें तो सरकार का हुक्म बजाना था, तनख्वाह तो वही देती है। हालांकि बाकोलिया ने मीणा को पत्र लिख कर उन्हें अंधेरे में रखने का कारण पूछा है, मगर जिस अधिकारी पर सरकार का हाथ हो, उसके लिए ऐसे पत्र के कोई मायने ही नहीं हैं।
ताजा घटनाक्रम से यह भी साबित हो गया है कि बाकोलिया को अभी तक राजनीतिक समझ नहीं आ पाई है। वे चाहते तो यह कह कर अपनी प्रतिष्ठा बचा सकते थे कि उन्हें सरकारी आदेश की जानकारी थी। भले ही उन्होंने कायदे-कानून के मुताबिक जमीन ले कर मकान बनाया था, लेकिन चूंकि सरकार के आदेश हैं, इस कारण उन्होंने कार्यवाही होने दी। रहा सवाल अपने मकान का, उसे कानूनी तरीके से ही वैध करवा लेंगे। मगर न तो उनमें खुद की इतनी सूझबूझ है और न ही उनके सलाहकारों में। उलटे अंधेरे में रख कर कार्यवाही करने पर ऐतराज जता कर उन्होंने अपनी प्रतिष्ठा ही मिट्टी में मिला ली। इतना ही नहीं इस मामले को मुद्दा बनाने की मजबूरी के चलते यह भी पोल खुलवा ली कि न तो पूरे कांग्रेसी पार्षद उनके साथ हैं और न ही कांग्रेस संगठन। बाकोलिया के समर्थक कांग्रेसियों ने तो मीणा के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पारित कर दिया, जबकि मूल धड़ा अलग ही बना रहा। हालत ये हो गई कि उनके चैंबर में ही कांग्रेसी आपस में भिड़ लिए।
इस मामले का रोचक पहलु ये है कि कांग्रेस संगठन का मूल धड़ा इस कारण भी दूर खड़ा रहा क्यों कि उसके प्रमुख सिपहसालार डॉ. जसराज जयपाल व डॉ. सुरेश गर्ग ने ही तो जमीन घोटाले की शिकायत की थी। अब जब कि सरकार ने कार्यवाही कर दी है तो वे उस पर सवाल कैसे खड़ा कर सकते थे, भले ही उसमें कांग्रेसी मेयर का भी मकान हो।
वैसे एक बात तो है बाकोलिया के इस तर्क में जरूर दम है कि इसी प्रकार यदि सरकार और प्रशासन को ही सब कुछ अपने स्तर पर करने का अधिकार है तो लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए निगम मेयर व बोर्ड का कोई मतलब ही नहीं है। इससे तो बेहतर है कि निगम में प्रशासक ही नियुक्त कर दिया जाए। लेकिन दूसरे अर्थ में यह सियापा मात्र ही है, क्योंकि इससे मेयर की बहुत किरकिरी हुई है। काश वे अजमेर और जयपुर में अपनी पकड़ बनाते तो कम से कम ये दिन तो नहीं देखने पड़ते। यहां भी चंद लोगों से घिरे रहने और जयपुर में लिंक नहीं बनाने का नतीजा है अजमेर के प्रथम नागरिक को जीवन का सबसे बुरा दिन देखना पड़ गया।
रहा सवाल वैभव गहलोत के बहाने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को घेरने का तो ताजा कार्यवाही के बाद मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे व वैभव गहलोत के नाम वाले विवादित परचे को विधानसभा के पटल पर रखने वाले अजमेर उत्तर के भाजपा विधायक प्रो. वासुदेव देवनानी अब चुप हैं। जैसे ही माधव नगर की जमीन सरकार ने हथियाई, ये खबरें छन-छन कर सामने आ रही हैं कि जमीन का आवंटन भाजपा राज में ही हुआ था। हालांकि तत्कालीन जिला कलेक्टर करणी सिंह ने ऐतराज किया, मगर सरकार ने उसे नजरअंदाज कर आवंटन करने के आदेश दे दिए। मजे की बात ये है कि उस वक्त नगर परिषद (तब निगम नहीं बनी थी) पर भाजपा का कब्जा था। बताते हैं कि नियमों की अनदेखी कर जमीन आवंटन करने की एवज में कुछ लोग उपकृत भी हुए थे। उन्हीं में एक ने अपना प्लॉट बाकोलिया को बेच दिया था।
राजनीति से अलग हट कर देखें तो सरकार की यह कार्यवाही उन निर्दोष आवंटियों पर तो कहर ही है, जिन्होंने बाकायदा नियमानुसार जारी जमीन के भूखंड लिए। उनके पास फिलहाल सिर पीटने के अलावा कोई चारा नहीं है।

मंगलवार, 21 जून 2011

दूसरे दिन ही पलट गए संभागीय आयुक्त


संभागीय आयुक्त अतुल शर्मा ने सोमवार को यातायात पुलिस व परिवहन विभाग के अधिकारियों की संभाग स्तरीय बैठक में अवैध वाहनों की धरपकड़, गलत पार्किंग करने वाले वाहन चालकों व ओवर लोडिंग गतिविधियों पर प्रभावी कार्यवाही करने के साथ-साथ जैसे ही यह भी कहा कि दुपहिया वाहन में पीछे बैठने वाले व्यक्ति भी हैलमेट पहनें, तो जाहिर तौर पर सभी को अचरज हुआ। विरोध तो होना ही था।
असल बात तो ये है कि अजमेर शहर में व्यस्ततम यातायात की स्थिति और वाहनों की धीमी गति को लेकर पहले से ही दुपहिया वाहन चालक के लिए हेममेट जरूरी कर दिए जाने से लोग खफा हैं, ऐसे में जब उन्होंने पीछे बैठने वाले के लिए भी हेलेमेट पहनने के आदेश दिए तो उसका तुरंत विरोध हुआ। शर्मा भी समझ गए कि बैठक में उनसे गलती से यह निकल गया था कि पीछे बैठने वाले को भी हेलमेट पहनना होगा, जबकि अभी तक यातायात महकमे ने इस प्रकार का नियम अजमेर पर लागू नहीं किया है, दूसरे ही दिन विरोध के मद्देनजर अपना बयान वापस ले लिया। वे जानते थे कि इसको लेकर हंगामा हो जाएगा। मजे की बात ये रही कि विपक्षी दल भाजपा तो चुप रहा, जबकि सत्तारूढ़ दल कांग्रेस ने ही विरोध दर्ज करवा दिया। ऐसे में उन्होंने दूसरे ही दिन सूचना व जनसंपर्क कार्यालय के माध्यम से यह खबर जारी करवाई कि अजमेर संभाग के शहरी क्षेत्रों में केवल दुपहिया वाहन चालक के लिए हेलमेट पहनना जरूरी है, पीछे बैैठने वाले व्यक्ति के लिए हेलमेट पहनना जरूरी नहीं है। खबर में यह भी बताया गया है कि संभागीय आयुक्त कार्यालय में मंगलवार को प्राप्त यातायात विभाग की अधिसूचना की प्रति के आधार पर यह स्पष्ट किया जा रहा है कि केवल जयपुर में दुपहिया वाहन चालक के साथ-साथ पीछे बैठने वाले व्यक्ति के लिए भी हेलमेट पहनना जरूरी किया गया है।
सवाल ये उठता है कि जब यातायात विभाग की ओर से पीछे बैठने वाले के लिए हेलमेट पहनना जरूरी नहीं किया गया था तो उन्होंने किस आधार पर नया आदेश जारी कर दिया? इसने जिम्मेदार अधिकारी का बिना किसी आधार पर नया नियम लागू करने की बात कहना सचमुच अफसोसनाक है। यह भी साफ है कि अपनी गलती का अहसास होते ही उन्होंने यातायात विभाग से अधिसूचना की प्रति मंगवाई और उसके आधार पर अपने आदेश में संशोधन कर दिया।
एक सवाल ये भी है कि चलो संभागीय आयुक्त से तो चलो भूल हो गई, लेकिन बैठक में यातायात विभाग के नियम-कायदे जानने वाले क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी सत्येन्द्र नामा, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक बी.एस.मीना, जिला परिवहन अधिकारी अजमेर सुधीर बंसल सहित डीडवाना के बी.एल.मीना, नागौर के ओमप्रकाश मारू, ब्यावर के रमेश पांडे, टोंक के जे.पी.बैरवा, यातायात निरीक्षक अनवर खान व सुरेन्द्र सिंह(मेड़ता) तथा भीलवाड़ा जिले के यातायात पुलिस के अधिकारियों व उपनिदेशक श्रीमती वीना वर्मा भी मौजूद थे, उन्होंने क्यों नहीं उस वक्त उन्हें यह जानकारी दी कि वे गलत बात कह रहे हैं? जाहिर है, उनकी हालत तो ये थी कि बिल्ली के गले में घंटी बांधे कौन?
खैर, अब आइये उनके एक और बयान पर नजर डालें, जिसमें उन्होंने कहा कि सड़क के किनारों पर हैलमेट बेचने वाले दुकानदारों को भी पाबन्द करना जरूरी है कि वे निर्धारित मानदंडों के अनुसार बनाये गये हैलमेट ही बेचें। सवाल ये उठता है कि संभागीय आयुक्त को अचानक अब जा कर यह बात कैसे सूझी? अजमेर में हेलमेट लागू किए अरसा हो गया है और सड़क किनारे हेलमेट बेचने वाले निर्धारित मानदंडों वाले हेलमेट की बजाय घटिया हेलमेट बेचते रहे हैं और अब तक तो अधिसंख्य दुपहिया वाहन चालक उनसे वे हेलमेट खरीद भी चुके हैं। ऐसे में अब नए आदेश देने के क्या मायने हैं? सवाल ये भी है कि क्या वाकई प्रशासन को उन दुकानदारों के खिलाफ कार्यवाही का अधिकार है? और यह मान भी लें कि प्रशासन को अधिकार है व संभागीय आयुक्त को अब जा कर ख्याल आया है, तो यह भी नाई नाई बाल कितने, यजमान अभी सामने आ जाएंगे। देखते हैं क्या वाकई उन दुकानदारों के खिलाफ कार्यवाही होती है?

गुरुवार, 16 जून 2011

लो अब बीसलपुर के पानी पर टौंक का भी हक जताया जा रहा है


राजस्व मंडल के विखंडन को रुकवाने को लेकर अभी जद्दोजहद चल ही रही है कि अजमेर के एक और हक पर भी हाथ मारने के संकेत मिलने लगे हैं। हाल ही नियुक्त प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डॉ. चंद्रभान ने बीसलपुर के पानी पर टौंक का पहला हक जता दिया है। जाहिर सी बात है ऐसा बयान उन्होंने अपने क्षेत्र के लोगों को खुश करने के लिए दिया है, मगर इससे अजमेर की इस जीवनदायिनी परियोजना पर तो संकट का इशारा हो ही गया है। पहले जयपुर ने जबरन पानी लिया और अब टौंक
असल में यह सब इस कारण है कि अजमेर का कोई धणी-धोरी नहीं है। और जो धणी-धोरी कहे जाने योग्य हैं, उनमें वो ताकत नहीं कि अजमेर के हितों की रक्षा कर सकें। चाहे कांग्रेस हो या भाजपा, दोनों के ही नेता इतने कमजोर हैं कि अजमेर की अस्मिता पर हो रहे हमलों से रक्षा करने के काबिल नहीं हैं। सब जानते हैं कि बीसलपुर परियोजना बनी ही अजमेर के लिए थी और इसकी पहल पूर्व राजस्व मंत्री स्वर्गीय किशन मोटवानी ने की थी। हालांकि बाद में पूर्व विधायक डा. राजकुमार जयपाल, ललित भाटी, श्रीकिशन सोनगरा आदि ने भी पूरा ध्यान दिया, मगर दुर्भाग्य से श्रीमती वसुंधरा राजे के कार्यकाल में प्रो. सांवरलाल जाट के जलदाय विभाग का केबीनेट मंत्री बनने के बावजूद वे बीसलपुर परियोजना का पानी जयपुर को दिए जाने के नीतिगत फैसले का वे विरोध नहीं कर पाए। इस मामले दोनों ही दलों के नेता फिसड्डी साबित हुए।
अजमेर का राजनीतिक वजूद कमजोर होने का ही परिणाम है कि समुचित विकास तो दूर यहां स्थापित अनेक दफ्तर ही धीरे-धीरे अन्यत्र स्थानांतरित हो गए। माध्यमिक शिक्षा बोर्ड और राजस्व मंडल के विखंडन को लेकर अनेक बार उठापटक हो चुकी है। इसी प्रकार वसुंधरा राजे ने तो जाते-जाते राजस्थान लोक सेवा आयोग का विखंडन कर अधीनस्थ एवं मंत्रालयिक सेवा चयन बोर्ड गठन कर दिया था, मगर हमारे राजनेता चुप्पी साध गए। यह संयोग ही है कि मौजूदा कांग्रेस सरकार ने उसे भंग कर दिया, मगर उसको श्रेय स्थानीय नेताओं को नहीं दिया जा सकता। इसी प्रकार अंग्रेजों के जमाने में रेलवे की दृष्टि से खास अहमियत रखने वाले अजमेर के हर दृष्टि से पात्र होने के बावजूद रेलवे का जोन मुख्यालय यहां स्थापित नहीं किया गया। यहां की आर्थिक उन्नति के आधार कारखाने पर कई बार हथोड़े चल चुके हैं।
अलबत्ता राजस्व मंडल के विखंडन को रुकवाने के मामले में जरूर एक मंच पर आ कर संघर्ष करते दिखाई दे रहे हैं, मगर उसमें भी सच्चाई ये है कि दोनों पार्टियों के कुछ प्रमुख नेता वकील हैं, इस कारण अपने वकील समुदाय का साथ देने को मजबूर हैं। जहां भाजपा के पूर्व सांसद औंकारसिंह लखावत, पूर्व शहर भाजपा अध्यक्ष पूर्णाशंकर दशोरा, पूर्व महापौर धर्मेन्द्र गहलोत आदि वकील हैं, वहीं शहर कांग्रेस अध्यक्ष जसराज जयपाल और वरिष्ठ कांगे्रस नेता राजेश टंडन सरीखे कई नेता भी वकालत करते हैं। इतना ही नहीं कांग्रेस विचारधारा के पूर्व जिला प्रमुख सत्यकिशोर सक्सैना भी वकील हैं। राजस्व मंडल के मामले में एकजुटता की एक प्रमुख वजह यही है। इन सब ने तब कोई एकजुटता नहीं दिखाई, जब राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड का एक दफ्तर जयपुर में खोला जा रहा था। एकजुटता तो दूर कोई बोला तक नहीं। अकेले भाजपा विधायक प्रो. वासुदेव देवनानी चिल्लाते रहे, मगर उनकी आवाज नक्कारखाने में तूती के समान साबित हुई। विपक्ष के नाते न तो उनका साथ अजमेर दक्षिण की विधायक श्रीमती अनिता भदेल ने दिया और न ही शहर भाजपा संगठन ने। नतीजा ये हुआ कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने उस दफ्तर की आधारशिला जयपुर के शिक्षा संकुल में रख दी। वह भी बोर्ड का एक प्रकार का विखंडन ही था, मगर देवनानी के अलावा किसी को नजर नहीं आया। बाद में सब को तब समझ में आया जब शिक्षा मंत्री मास्टर भंवरलाल ने शिक्षा बोर्ड का मुख्यालय अजमेर में होने के बावजूद एक परीक्षा परिणाम जयपुर में जारी कर दिया। उसकी कोई जरूरत नहीं थी, फिर भी यह हरकत की गई, अजमेर को चिढ़ाने के लिए। अगर शिक्षा मंत्री को परिणाम जारी करने का ही शौक था तो अजमेर में आकर कर देते, लेकिन ऐसा कैसे कर सकते थे, अजमेर का महत्व जो बढ़ जाता।
बहरहाल, राजस्व मंडल के विखंडन के मामले में विरोध के दौर में ही बीसलपुर पर टौंक का हक जताया जाना यह साबित करता है कि अजमेर को गरीब की जोरू माना जा रहा है। देखते हैं कि इस मामले में विरोध करने में माहिर भाजपाई क्या करते हैं और कांग्रेसी अपने प्रदेश अध्यक्ष के खिलाफ बोल भी पाते हैं या नहीं। देखना ये भी है कि उम्मीद की आखिरी किरण अजमेर के सांसद व केन्द्रीय संचार राज्य मंत्री सचिन पायलट क्या रुख अख्तियार करते हैं। बताते हैं कि राजस्व मंडल के मामले में उन्होंने रुचि लेना शुरू कर दिया है, मगर अभी उसमें कुछ सफलता मिले, इससे पहले ही अजमेर के हक पर एक और हमला करने की साजिश होने लगी है।