मंगलवार, 15 मई 2012

भ्रूण मौजूद है दरगाह विकास योजना का तो खाद-पानी दीजिए

आठ सौवें उर्स की तैयारियों की समीक्षा करते मैथ्यू
आखिर राज्य के मुख्य सचिव सी के मैथ्यू ने खुलासा कर ही दिया कि दरगाह विकास योजना पर काम चल रहा है और आने वाले समय में इसे पूरा किया जाएगा। अलबत्ता समय जरूर लगेगा। अजमेर वासियों के लिए यह एक सुखद खबर है।
असल में पिछले दिनों अजमेर फोरम की बैठक में जब सरकारी मुख्य सचेतक डा. रघु शर्मा ने यह कह कर कि इस प्रकार की कोई योजना है नहीं, अजमेर के हितचिंतकों को चिंता में डाल दिया था। हुआ भी कुछ ऐसा ही। केन्द्र और राज्य सरकारों के बीच पत्रावलियों में झूलती योजना के तकरीबन तीन सौ करोड़ रुपए के मद में से एक भी रुपया नहीं मिला तो यह अंदेशा हुआ कि योजना को गाय खा गई या उसकी भ्रूण हत्या हो गई। अब जब कि राज्य सरकार के मुख्य सचिव ने ही इसकी पुष्टि कर दी है कि योजना पर काम चल रहा है और यह जरूर लागू होगी तो अजमेर वासियों ने राहत की सांस ली है। इसी के साथ वह भ्रम समाप्त हो गया है, जो कि अजमेर फोरम की ओर से इंडोर स्टेडियम में आयोजित नगर चौपाल में राज्य सरकार के मुख्य सचेतक डॉ. रघु शर्मा यह कह पैदा किया था कि इस प्रकार की कोई योजना थी ही नहीं और मीडिया को इस प्रकार का भ्रम नहीं फैलाना चाहिए। बहरहाल, अब जब कि यह दिलासा मिला है कि योजना को गाय नहीं खा गई या उसकी भू्रण हत्या नहीं हुई है, अजमेर के जनप्रतिनिधियों, समाजसेवकों, बुद्धिजीवियों व हित चिंतकों का यह फर्ज है कि वे खाद व पानी से सिंचन करते रहें, ताकि योजना पल्लवित-पुष्पित हो सके।
असल में होता ये है कि सरकार के सामने प्रस्ताव तो बहुत पेश होते हैं और सरकार की ओर से बनाए भी जाते हैं, मगर जब तक उन पर अमल के लिए जरूरी दबाव नहीं बनाया जाता, वे कभी पूरे नहीं हो पाते। इसे यूं भी समझा जा सकता है कि जहां योजना के लिए प्रशासनिक और वित्तीय स्वीकृति मिलती है, वहां वे ही फायदे में रहते हैं, जो कि मजबूती से अपना पक्ष रख पाते हैं, वरना ऐसी कई योजनाएं सालों तक फाइलों में ही पड़ी रहती हैं। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि योजना लागू करने के लिए दरगाह से जुड़े पक्षों, मीडिया और अजमेर फोरम ने भरपूर दबाव बनाए रखा, मगर जनप्रतिनिधियों की लापरवाही अथवा अप्रभावी भूमिका और प्रशासन की बेरुखी के चलते यह अधर में ही लटकी रही। हालत ये थी कि ये पता ही नहीं लग रहा था कि आखिर योजना कहां गायब हो गई। वो तो मुख्य सचिव ने पत्रकारों के पूछने पर जानकारी दी, वरना यही माना जाता कि योजना दफ्तर दाखिल हो चुकी है।
खैर, अब भी वक्त है। सभी को मिल कर इस योजना की मंजूरी के दबाव बनाए रखना होगा, वरना सरकारी तंत्र की गति तो नौ दिन चले अढ़ाई कोस वाली होती है।
यहां आपकी जानकारी के लिए बता दें कि मोटे तौर पर इस योजना में वर्षों से अपेक्षित बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य कराने सहित अतिक्रमणों को हटाये जाने का प्रस्ताव है। जायरीन की सुरक्षा और सुविधा के लिए पानी, बिजली सड़क, टॉयलेट जैसी सुविधाओं पर पूरा जोर दिया गया है। इसके तहत विद्युत ट्रांसफार्मर और विद्युत तार भूमिगत किए जाने हैं और आवागमन को सुविधाजनक बनाने के लिए सड़कों को चौड़ा करने का प्रस्ताव है। इतना ही नहीं 115 दुकानों का अधिग्रहण व दरगाह के चारों ओर 15 फीट चौड़े कॉरिडोर निर्माण का चुनौतीपूर्ण कार्य भी शामिल किया गया है।
आइये, एक विहंगम नजर डालते हैं इस योजना पर:-
दरगाह शरीफ की ओर जाने वाली सड़कों के ड्रेनेज सिस्टम को डवलप करने के लिए देहली गेट से निजाम गेट तक 27 लाख, निजाम गेट से मदार गेट तक 35 लाख, ढाई दिन के झोंपड़े से निजाम गेट तक 19.50 लाख, कॉरिडोर के चारों ओर 17.50 लाख रुपए का प्रस्ताव है। इसी प्रकार दरगाह के चारों ओर 7 किलोमीटर क्षेत्र में सीवरेज कार्य केलिए 3 करोड़ रुपए प्रस्तावित हैं। विद्युत व्यवस्था में सुधार पर 102.90 लाख खर्च होंगे। इसमें 11 केवी और एलटी केबल का अंडरग्राउंड कार्य पर 109 लाख और कॉरिडोर की स्ट्रीट लाइटों पर 20 लाख रुपए का प्रावधान है। दरगाह इलाके में जायरीन के लिए सार्वजनिक शौचालय की कमी अरसे से महसूस की जाती रही है। अढ़ाई दिन के झोंपड़ा क्षेत्र में पुरुषों के लिए 16 व महिलाओं के लिए 12, सोलह खंभा क्षेत्र में पुरुषों के लिए 25 व महिलाओं के लिए 19, बाम्बे होटल क्षेत्र में पुरुषों के लिए 28 व महिलाओं के लिए 17, झालरा क्षेत्र में पुरुषों के लिए 18 व महिलाओं के लिए 14 टॉयलेट व शौचालयों का निर्माण कराया जाना है। कुल 139 शौचालयों पर 85.17 लाख रुपए खर्च होगा।
दरगाह आने वाले जायरीन के जूते और चप्पलों के लिए निजाम गेट के सामने शू कलैक्शन सेंटर का प्रस्ताव है। करीब 6 दुकानों को अधिगृहीत कर बनाए जाने वाले इस सेंटर पर 775 लाख रुपए खर्च किए जाएंगे।
दरगाह में हर जायरीन पर पैनी नजर रखने के लिए सुरक्षा इंतजामों के तहत 74 कैमरों का प्रस्ताव है, जिनमें 16 फंक्शनल व 58 अन्य कैमरे होंगे। इस पर 70 लाख की राशि खर्च होगी।
वर्षों से पार्किंग की समस्या भोग रहे शहर के लिए 7 स्थानों पर पार्किंग हब की योजना है। इसके तहत जयपुर रोड से हाथी भाटा के बीच 11.74 लाख, कचहरी रोड पर आई हॉस्पिटल के पीछे 60.89 लाख, महावीर सर्किल पर 83.82 लाख, नसीराबाद रोड पर नौ नंबर पेट्रोल पंप के पीछे 214.16 लाख, सुभाष गार्डन में वीआईपी पार्किंग पर 9.50 लाख, सुभाष उद्यान के बेसमेंट में 580 लाख, प्राइवेट बस स्टैंड में मल्टी स्टोरी पार्किंग पर 846 लाख, लौंगिया मोहल्ले में 1148.89 लाख रुपए खर्च किए जाएंगे। जायरीन के ठहरने के लिए कायड़ में 230 बीघा जमीन पर 202 करोड़ 15 लाख रुपए खर्च कर विशेष इंतजाम किए जाने हैं। ईदगाह विश्राम स्थली में प्लेटफार्म, स्नानघर और टॉयलट सुविधाओं के निमार्ण कार्य पर 200 लाख रुपए खर्च किए जाने प्रस्तावित हैं। तारागढ़ तक जाने वाले रास्ते की सीढिय़ों के दोनों और रेलिंग पर 20 लाख रुपए खर्च होंगे।
शहर के 34 स्थानों की सड़क मरम्मत और निर्माण पर 128.98 लाख खर्च होंगे। दरगाह से वाया देहलीगेट, मदार गेट और त्रिपोलिया गेट वाया ढ़ाई दिन का झोंपड़े तक की सड़क नवीनीकरण प्रस्तावित है। देहलीगेट से तांगा स्टैंड तक की सड़क का विस्तार और नवीनीकरण करने के लिए 80 दुकानों को अधिगृहीत किया जाना है।
दरगाह के भीतर व्यवस्थित रूप से जियारत करने के लिए स्टील ग्रिल की बैरिकेडिंग की जाएगी। दरगाह परिसर के फर्श पर कोटिंग होगी। दरगाह परिसर का समतलीकरण किया जाएगा। जायरीन के आने और जाने के लिए गेट की चौड़ाई बढ़ाई जाएगी। लंगर खाना को अधिक व्यवस्थित करने और सराय चिश्ती चमन और ईदगाह को विकसित करने का भी प्रस्ताव है। दरगाह के 11 ऐतिहासिक गेट और 8 भवनों के जीर्णोद्धार के लिए 435.62 लाख रुपए की आवश्यकता बताई गई है।

-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com

रविवार, 13 मई 2012

पहली बार दिखाई होटल मालिकों ने पुलिस के खिलाफ हिम्मत

उर्स मेले में बेगारी का करेंगे विरोध
अजमेर के होटल वालों ने पहली बार पुलिस की बेगारी के खिलाफ बोलने की हिम्मत जुटाई है। होटल एसोसिएशन आफ अजमेर के नाम से गठित संस्था ने बाकायदा प्रेस विज्ञप्ति जारी कर अपना विरोध दर्ज कराया है। होटल आराम के मालिक दिनेश अग्रवाल की अध्यक्षता में हुई आपात बैठक में होटल व्यवसाइयों ने अपना दुखड़ा तो रोया ही कि किस प्रकार पुलिस ने राठौड़ी कर रखी है तो साथ ही पुलिस की बेगारी को बर्दाश्त न करने का जज्बा भी दिखाया है।
असल में पिछले कुछ दिनों से होटल मालिकों में यह सुगबुगाहट थी कि 800 वें उर्स के मद्देनजर अन्य जिलों से आने वाले पुलिस अधिकारियों के ठहरने की व्यवस्था के लिए एसपी राजेश मीणा ने मेला क्षेत्र में आने वाली सभी होटलों में दो-दो कमरे आरक्षित रखने का जो फरमान जारी किया है, उसका क्या किया जाए? अजमेर में एक तो उर्स मेले के चक्कर में होटलों की बाढ़ आई हुई है, इस कारण पूरे साल धंधा मंदा ही रहता है। कंपीटीशन इतना अधिक है कि टैक्सी वालों को पच्चीस से चालीस प्रतिशत तक कमीशन देना पड़ता है। कमाई होती भी है तो केवल उर्स मेले के दौरान ही। एक तरह से देखा जाए तो उर्स मेले के दौरान ही पूरे साल की कमाई करनी होती है। ऐसे में यदि उर्स मेले के दौरान दो कमरे पुलिस को दे दिए जाएंगे तो जाहिर है कमाई मारी जाएगी। समझा जा सकता है कि मेले के दौरान कमरों का किराया मनमानी दर से वसूला जाता है। अव्वल तो होटल मालिकों की हिम्मत होती ही नहीं कि पुलिस वालों से किराया वसूल सकें, अगर किसी ने ईमानदारी से दे भी दिया तो क्या देगा, केवल न्यूनतम दर। वैसे भी उर्स की बुकिंग करीब एक माह पूर्व ही कर ली गई थी। ऐसे में पुलिस के लिए दो-दो कमरों की व्यवस्था करना मुश्किल है। इससे बुकिंग कराने वाले जायरीन को असुविधा का सामना करना पड़ेगा।
बहरहाल, एसपी के फरमान को लेकर होटल मालिक परेशान थे, मगर पुलिस के गले में घंटी बांधे कौन, इसी चक्कर में कोई बोल नहीं रहा था। कई तो इस असमंजस में थे कि पुलिस का यह फरमान राठौड़ी हैं फिर बाकायदा नियम के तहत हो रहा है। फिर किसी ने समझाया कि प्रशासन व सरकार को यह इख्तियार है कि वह व्यवस्था के लिए इस प्रकार होटल के कमरे आरक्षित कर सकती है। जैसे चुनाव के वक्त वाहनों का अधिग्रहण किया जाता है और बाकायदा सरकारी दर से किराया दिया जाता है। ठीक उसी प्रकार से होटलों के दो-दो कमरों का अधिग्रहण किया जा सकता है। बात केवल इतनी है कि नियमानुसार पुलिस को भी उसका किराया देना चाहिए। आखिरकार एसोसिएशन ने बीड़ा उठाया और साफ कर दिया कि बिना किराये के पुलिस वालों के लिए कमरा बुक नहीं किया जाएगा। साथ ही यह भी तय किया गया कि इस मसले को निपटाने के लिए पांच सदस्यों का प्रतिनिधिमंडल एसपी से बात करेगा।
असल में यह पहला मौका नहीं है कि एसपी ने फरमान जारी किया हो। इससे पहले भी हर उर्स मेले के दौरान यह कवायद चलती रही है। मगर पुलिस से पंगा मोल किसी ने नहीं लिया। जहां तक बेगारी का सवाल है, केवल उर्स मेले के दौरान ही क्यों, सालभर भी थोड़ी बहुत बेगारी तो करनी ही पड़ती है। वजह साफ है। कानून-कायदे इतने अधिक हैं कि उनकी पालना संभव नहीं है। ऐसे में पुलिस को राजी रखना ही पड़ता है, ताकि वह परेशान न करे। यह पहला मौका है कि बेगारी के खिलाफ होटल मालिकों ने मुंह खोला है। देखना ये है कि वे आखिर किस हद तक अपने विरोध पर कामय रह पाते हैं। क्या वे अन्य यात्रियों की तरह पुलिस वालों के आईडी प्रूफ ले कर बाकायदा बुकिंग का रिकार्ड रख पाते हं या नहीं? क्या उस बुकिंग के आधार पर किराया वसूल कर पाते हैं या नहीं?
ज्ञातव्य है कि पुलिस अधीक्षक कार्यालय से 4 मई को जारी किए गए पत्र क्रमांक 6155 में एसपी ने समस्त थाना प्रभारियों को मेला क्षेत्र में आने वाली होटलों को पुलिस अधिकारियों के लिए दो-दो कमरों की व्यवस्था करने के लिए कहा था।

-तेजवानी गिरधर
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शुक्रवार, 11 मई 2012

300 करोड़ गाय खा गई, 3 करोड़ पर हो रहा है हंगामा

तैयारियों पर चिंतन करते शहर कांग्रेसअध्यक्ष रलावता व अन्य
डाक्टर बाहेती के बोलते ही नसीम अख्तर समर्थक उबले
अजमेर। ख्वाजा गरीब नवाज के 800वें सालाना उर्स की तैयारियों को लेकर इन दिनों राजनीति गरमाई हुई है। एक ओर जहां इस मसले पर कांग्रेसी आपस में टकरा रहे हैं, वहीं कुछ कांग्रेसी अजमेर उत्तर के विधायक प्रो. वासुदेव देवनानी को निष्क्रियता के नाम पर निशाना बना रहे हैं। उधर हाल ही बार अध्यक्ष बने वरिष्ठ कांग्रेसी राजेश टंडन ने भी अपने पुराने फोर्म में आते हुए मोर्चा खोल रखा है। बेशक जब इतना बवाल मचा हुआ है तो इसकी वाजिब वजह भी है। मेला क्षेत्र में इंतजामात ठीक से नहीं हो पाए हैं। इन सबके बीच प्रशासन को किसी की परवाह नहीं है। वह अपने चिर परिचित तरीके से काम को निपटा रहा है।
इन सबसे हट कर विचार करें तो यह बेहद अफसोसनाक है कि यह वही उर्स है, जिसको लेकर तीन सौ करोड़ रुपए की योजना बनी, मगर उसे गाय खा गई और ये ही नेता व प्रशासन मूक दर्शक बने ऐसा व्यवहार कर रहे थे, मानो अजमेर का कोई धणीधोरी ही नहीं हो। ज्ञातव्य है कि उर्स मेले में जब चंद दिन रह गए तो मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने बड़ी मेहरबानी करते हुए तीन करोड़ रुपए मंजूर किए, जो कि ऊंट के मुंह में जीरे के बराबर भी नहीं है।
चलो, सबसे पहले बात करते हैं कांग्रेसियों के बीच हो रही नुक्ताचीनी की। शिक्षा मंत्री श्रीमती नसीम अख्तर खेमे के चंद कांग्रेसियों को तकलीफ है कि पूर्व विधायक डॉ. श्रीगोपाल बाहेती मेले को लेकर क्यों बोल रहे हैं, मानो उनको अब बोलने का कोई हक ही नहीं रहा। कहने की जरूरत नहीं है कि ये वे ही बाहेती हैं, जिनकी जाफरी में बैठ कर नसीम अख्तर के मियां जनाब इंसाफ अली ने राजनीति का ककहरा सीखा था। मगर अब चूंकि उनकी बेगम मंत्री बन गई हैं तो बाहेती बौने नजर आने लगे हैं। नसीम अख्तर खेमे के कांग्रेसियों ने डा. बाहेती की सक्रियता को राजनीतिक स्वार्थ करार दिया है। तारागढ़ दरगाह कमेटी के अध्यक्ष सरवर सिद्दीकी, गरीब नवाज सूफी मिशन सोसायटी के अध्यक्ष शेखजादा जुल्फिकार चिश्ती, पार्षद सैयद अस्मत बीबी, सैयद आले हुसैन, अब्दुल नईम खान, सैयद एनुद्दीन चिश्ती ने बयान जारी कर आरोप लगाया है कि डा. बाहेती ने चुनाव हारने के साढ़े तीन साल बाद सार्वजनिक बैठक लेकर लोगों को प्रशासन के खिलाफ उकसाने, भड़काने एवं गुमराह करने का काम किया है। इससे पहले हुए तीन उर्स में उन्होंने केवल विज्ञप्ति ही जारी की। सरकार ने पहली बार मंत्री को उर्स की जिम्मेदारी सौंपी है। इसके अलावा सुविधाओं के लिए धन भी दिया है। जाहिर सी बात है कि उन्हें तकलीफ ये है कि जब मंत्री महोदया को जिम्मेदारी दे दी गई है तो बाहेती बीच में कैसे बोल रहे हैं। मानो मंत्री महोदया के नाम पर ठेका छूट गया हो और अब किसी और को बोलने का हक ही नहीं रहा। असल में पूर्व विधायक डा. बाहेती बिलकुल ठीक कह रहे हैं। उनका कहना है कि उर्स के लिए की जा रही तैयारियां पर्याप्त नहीं हैं। उर्स व्यवस्थाओं को लेकर मुख्यमंत्री गंभीर हैं, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर सरकार की मंशा के अनुरूप गंभीरता नहीं दिखाई जा रही है। डा. बाहेती ने दरगाह क्षेत्र का दौरा कर बैठक आयोजित की, जिसमें वक्ताओं ने शिक्षा राज्यमंत्री नसीम अख्तर तथा गृह राज्यमंत्री वीरेंद्र बेनीवाल के खिलाफ यह कह दिया कि उन्होंने अधिकारियों की एक-एक बैठक लेकर अपने फर्ज की इतिश्री कर ली है। बस इसी बात को लेकर नसीम अख्तर के समर्थकों को तकलीफ हो गई।
उधर मंत्री महोदया को जिम्मेदारी दिए जाने के बाद भी शहर कांग्रेस को उर्स मेले की चिंता ने सताया तो शहर अध्यक्ष महेन्द्र सिंह रलावता की अध्यक्षता में अल्पसंख्यक नेताओं, संबंधित पार्षदों तथा कमेटी के पदाधिकारियों बैठक आयोजित की गई। रलावता ने जायरीन की सुविधाओं से जुड़े काम उर्स से पहले कराने के लिए अधिकारियों से बातचीत की। यानि कि यह बात सही है कि तैयारियां संतोषजनक नहीं हैं, इसी कारण उन्हें बात करनी पड़ी। अब देखना ये होगा कि कहीं रलावता की इस पहल पर तो विवाद खड़ा नहीं होता।
रहा सवाल नगर निगम मेयर कमल बाकोलिया व नगर सुधार न्यास सदर नरेन शहाणी भगत का तो वे अपने-अपने हिसाब से तैयारियों पर निगरानी रखे हुए हैं, मगर प्रशासन उनको कितनी तवज्जो देता है, सब जानते हैं।
उधर कुछ कांग्रेसियों ने अपनी पार्टी की ही सरकार के होते हुए भाजपा विधायक प्रो. वासुदेव देवनानी को इस बात के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया कि उर्स में बरती जा रही प्रशासनिक लापरवाही उनकी निष्क्रियता के कारण है। अखिल भारतीय राजीव गांधी ब्रिगेड और कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने दरगाह के निजाम गेट बाहर देवनानी का पुतला भी जलाया। ब्रिगेड के अध्यक्ष मोबिन चिश्ती ने कहा कि प्रशासन तैयारियों के नाम पर लिपापोती कर रहा है। बात तो उनकी सही है, मगर इसके लिए सीधे तौर पर या तो प्रशासन जिम्मेदार है या फिर उन पर निगरानी कर रहे दो मंत्री। मगर न जाने किस की प्रेरणा से उन्होंने देवनानी के सिर ठीकरा फोड़ दिया।
बहरहाल, देवनानी की नींद भी खुली और उन्होंने भारतीय जनता पार्टी अल्पसंख्यक मोर्चा के कार्यकर्ताओं के साथ जिला कलेक्टर अजमेर को ज्ञापन सौंप कर कोताही व लापरवाही बरते जाने का आरोप लगाया। उन्होंने इस बात पर रोष प्रकट किया कि उर्स प्रारम्भ होने में बहुम कम दिन शेष रहे हैं, परन्तु प्रशासनिक स्तर पर इसकी तैयारियों को लेकर गंभीरता नहीं बरती जा रही है।
जब सब हंगामा कर रहे हों तो भला बार अध्यक्ष राजेश टंडन चुप कैसे बैठ सकते हैं। वे भी दरगाह इलाके पर नजर रखे हुए हैं। वैसे भी उन्होंने इन दिनों जिला कलेक्टर मंजू राजपाल के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। वे उन्हें नेगेटिव सोच की लेडी मानते हुए अजमेर फोरम की बैठक में सरकारी मुख्य सचेतक डॉ. रघु शर्मा से उनका तबादला करवाने की मांग कर चुके हैं।
उधर संभागीय आयुक्त अतुल शर्मा को लगा कि माहौल बिगड़ रहा है तो उन्होंने प्रशासनिक बैठक बुला कर जायरीन की सुविधा के सारे इंतजाम पुख्ता करने के निर्देश दिये। इस पर जिला कलेक्टर श्रीमती मंजू राजपाल, नगर निगम के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सी.आर.मीना, नगर सुधार न्यास के सचिव श्रीमती पुष्पा सत्यानी, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक लोकेश सोनवाल तथा अतिरिक्त कलेक्टर शहर जे.के.पुरोहित, सार्वजनिक निर्माण विभाग के अधिशासी अभियंता अशोक अग्रवाल आदि ने कोई कोर कसर बाकी न होने की दुहाई दी। उनके दावों में जो सच्चाई है, उसे तो जायरीन ही भुगतेगा।
खैर, कुल मिला कर उर्स की सरगरमी शुरू होने से पहले ही अजमेर की राजनीति गरमाई हुई है। अफसोस इसी बात का है कि यही खून तब ठंडा क्यों पड़ा था, जब तीन सौ करोड़ रुपए की योजना धीरे-धीरे फाइलों में दफन होती जा रही थी।

-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com

गुरुवार, 10 मई 2012

अनिता भदेल की चुप्पी से बढ़ रहा है असमंजस

वसुंधरा के बीच छिड़ी जंग के बीच अजमेर दक्षिण की विधायक श्रीमती अनिता भदेल को लेकर असमंजस अब भी बरकरार है। उनकी चुप्पी से यह असमंजस और भी बढ़ गया है।
असल में जयपुर की डेटलाइन से छपे समाचारों में उनका नाम वसुंधरा राजे के समर्थन में इस्तीफा देने वाले विधायकों की सूची आ गया था। यहीं से असमंजस शुरू हुआ। चूंकि श्रीमती भदेल संघ पृष्ठभूमि से हैं और वर्तमान में भी संघ लॉबी के प्रदेश भाजपा उपाध्यक्ष औंकार सिंह लखावत खेमे में हैं, इस कारण किसी को भी विश्वास नहीं हुआ कि उन्होंने इस्तीफा दिया होगा। चर्चा ये भी रही कि उनका नाम गलती से छप गया होगा। कदाचित नगर-भरतपुर विधायक श्रीमती अनिता सिंह की जगह उनका नाम छप गया हो। इन्हीं कयासों के बीच उम्मीद यही की जा रही थी कि वे खुद ही खुलासा कर देंगी कि उन्होंने इस्तीफा दिया है या नहीं, मगर वे तो गायब ही हो गईं।
हालत ये हो गई कि पिछले दिनों भाजपा पार्षद दल की बैठक के सिलसिले में भी जब पार्टी पदाधिकारियों ने उनसे संपर्क करने की कोशिश की तो उनका मोबाइल स्विच आफ बताया गया। मीडिया वालों को भी उनका मोबाइल स्विच आफ ही मिला। कुछ लोगों ने उनके घर जा कर पता करने की कोशिश की, मगर यही बताया गया कि वे बाहर गई हुई हैं। वैसे बताते ये हैं कि वे घर में ही हैं। संयोग से इन दिनों ऐसा कोई कार्यक्रम भी नहीं हुआ, जिसमें कि वे शिरकत करतीं और मीडिया उनसे पूछ लेता कि वास्तविकता क्या है? ऐसी स्थिति में यह असमंजस बरकरार है कि आखिर उन्होंने इस्तीफा दिया अथवा नहीं? ऐसा तो है नहीं कि अनिता को यह पता ही नहीं होगा कि उनके नाम की बड़ी चर्चा है, मगर आश्चर्य इस बात का है कि खुद वे भी इसका खुलासा करने की बजाय गायब हो गई हैं। इसी से संशय होता है कि आखिर उन्हें डर किस बात का है? कई सवाल उठते हैं। उनका नाम अखबारों में कैसे आ गया? क्या वे किसी के दबाव में गलती से टाइपशुदा इस्तीफे पर साइन कर चुकी हैं? क्या उन्हें लग रहा था कि इस जंग में वसुंधरा की जीत सुनिश्चित है और अगर अभी उनका साथ नहीं दिया तो बाद में टिकट वितरण के दौरान दिक्कत आएगी? या फिर वे ही अखबार में नाम आने के बाद असमजंस ही बनाए रखना चाहती हैं ताकि न तो ये खुलासा हो कि वे वसुंधरा के साथ हैं और न ही ये कि उनके विरोधी गुट में हैं? अलबत्ता उनके आका औंकार सिंह लखावत और वसुंधरा को जरूर पता होगा कि सच्चाई क्या है।
हालांकि यही सवाल अजमेर उत्तर के विधायक प्रो. वासुदेव देवनानी को लेकर भी उठना स्वाभाविक है, मगर चूंकि उनका नाम कहीं नहीं आया, इस कारण उनके बारे में कोई चर्चा भी नहीं है। हालांकि वे गायब तो नहीं हुए हैं, मगर उन्होंने भी यह खुलासा करने की जरूरत नहीं समझी है कि ताजा विवाद में वे किस ओर हैं। सर्वविदित है कि वे भी संघ पृष्ठभूमि से हैं, यह बात दीगर है कि उनका औंकार सिंह लखावत से छत्तीस का आंकड़ा है। संघ में उनकी अपनी पकड़ है। इस मामले में वे लखावत पर निर्भर नहीं हैं। जिले के तीसरे भाजपा विधायक भाजपा के शंकर सिंह रावत चूंकि मीडिया की पकड़ में आ गए, इस कारण यह पता लग गया कि उनकी मंशा क्या है? उन्होंने यह कहा था कि उनसे वसुंधरा जी ने इस्तीफा मांगा नहीं है, मांगेंगी तो दे देंगे।
बहरहाल, इन तीनों की वास्तविक स्थिति क्या है, कुछ पता नहीं। वैसे भी यह उनका विशेषाधिकार है कि वे खुलासा करें या नहीं। वे यह भी कह सकते हैं कि यह पार्टी के अंदर का मामला है, सार्वजनिक रूप से कुछ नहीं कहेगे। बहरहाल, अजमेर की जनता असमंजस में है कि भाजपा में आए तूफान में उनके जनप्रतिनिधियों का रुझान किस ओर है?

-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com

सोमवार, 7 मई 2012

कांग्रेसियों में असंतोष बढ़ रहा है सचिन पायलट के प्रति

हालांकि अजमेर के कांग्रेस सांसद व केन्द्रीय सूचना प्रौद्योगिकी व संचार राज्य मंत्री सचिन पायलट अपने संसदीय क्षेत्र पर पूरा ध्यान दे रहे हैं और यहां के विकास के प्रति गंभीर नजर आते हैं, बावजूद इसके छोटे कांग्रेसी नेताओं व कार्यकर्ताओं में उनके प्रति असंतोष बढ़ता जा रहा है। आम जनता से भी उनका जुड़ाव नहीं हो पा रहा और यही आम धारणा बनती जा रही है कि वे आते तो हैं, मगर उनके दौरे आमतौर पर हवाई ही होते हैं। उनसे मिलना बेहद कठिन काम है। पायलट के लिए यह खबर चौंकाने वाली हो सकती है, मगर धरातल की सच्चाई यही है।
असल में छोटे नेताओं व कार्यकर्ताओं को तकलीफ ये है कि वे पायलट से सीधे जान-पहचान नहीं बना पा रहे हैं। वे पायलट के कार्यक्रमों में होते तो हैं, मगर नजदीक जा कर मिल नहीं पाते। या यूं कहिए कि जता नहीं पाते कि वे उनके स्वागत के लिए हाजिर हुए हैं। यदि मिल भी पाते हैं तो मात्र माला पहनाने जितना वक्त ही मिलता है। अपनी बात कहने अथवा व्यथा सुनाने का मौका नहीं मिलता। जाहिर तौर पर चंद चेहरों को छोड़ कर अधिसंख्य को वे पहचानते ही नहीं। हालांकि एक केन्द्रीय मंत्री के लिए इतना सब संभव नहीं है कि हर छोटे-मोटे नेता या कार्यकर्ता को समय दे सकें, मगर कार्यकर्ता इस बात को समझने को तैयार नहीं हैं। उन्हें तो यही लगता है कि वे मंत्री से पहले उनके सांसद हैं और उनसे नजदीकी कायम किए बिना कोरी नारेबाजी करने या माला पहनाने से क्या फायदा। छोटे नेताओं की छोडिय़े, कुछ ठीक-ठाक नेताओं तक को भी यही पीड़ा है कि तीन साल बाद भी वे उनसे नजदीकी नहीं बना पाए हैं। नजदीकी की छोडि़ए, कई छोटे नेताओं को तो यही तकलीफ है कि वे कईं बार तुनक मिजाजी में झिड़क देते हैं। कुछ एक प्रकरण तो मीडिया में भी आ चुके हैं। और यही वजह है ऐसे अनेक छोटे नेता व कार्यकर्ता यह कहते हुए मिल जाएंगे कि चुनाव के वक्त तो अजमेर ही आएंगे ना, तब हिसाब चुकता कर लेंगे।
जानकारों की मानें तो बड़े व नामी नेताओं तक की हालत ये है कि वे अजमेर आने पर जरूर उनके साथ हो पाते हैं, मगर उनके दिल्ली होने पर वे सीधे उनसे बात नहीं कर पाते। किसी भी मसले पर उनकी बात उनके पीए विकास शर्मा अथवा खटाणा जी या निरंजन से ही हो पाती है। कुछ नेताओं ने इन तीनों के नंबर अपने मोबाइल पर पायलट के नाम से ही फीड कर रखे हैं। जब कभी बात होती है तो अपने साथियों को यही जताते हैं कि पायलट साहब से बात हुई है। इन तीनों के जरिए ही पायलट फीड बैक लेते हैं और इन्हीं के जरिए निर्देश देते हैं। एक केन्द्रीय मंत्री के लिए यह संभव भी नहीं कि वे स्थानीय नेताओं की आए दिन की रामायण व महाभारत को सुनें, मगर यह दूरी स्थानीय नेताओं में कसक तो पैदा करती ही है।
जहां तक जनता का सवाल है, हकीकत ये है कि उसका एक सांसद से सीधे कोई खास काम नहीं होता। उसकी समस्याएं आम तौर पर स्थानीय होती हैं, जिनके समाधान की उम्मीद सांसद करना बेमानी ही है। फिर भी उसकी यह अपेक्षा तो होती ही है कि वे उनकी समस्याओं के समाधान के लिए संबंधितों को कहें। यही वजह है कि यह अपेक्षा की जाती रही है कि पायलट को अजमेर में हर माह कम से कम दो दिन वक्त देना चाहिए और दरबार लगा कर जनसुनवाई करनी चाहिए, तभी उनका जनता से सीधा संवाद कायम हो पाएगा। इसके अतिरिक्त एक मांग यह भी उठती रही है कि वे अजमेर में अपना एक दफ्तर खोलें, जहां जा कर कोई भी अपनी समस्या के बारे में बात कर सके।
असल में अजमेर वासियों को ऐसे सांसद की आदत पड़ गई है, जो कि हर वक्त अजमेर में ही उपलब्ध हो। हर छोटे-मोटे कार्यक्रम में शिरकत करें और उन्हें व्यक्तिगत रूप से जानता हो। फिर भले ही विकास के नाम पर कुछ न कर पाए। ऐसा नहीं कि जनता को इस बात का मलाल नहीं कि उनके पूर्व सांसद प्रो. रासासिंह रावत अजमेर के लिए कुछ खास नहीं कर पाए, मगर उन्हें इस बात की संतुष्टि है कि वे कम से कम हर वक्त उनके पास ही रहते थे। यह कुछ वैसा ही है जैसे एक मां अपने बेटे को बड़े पद व मोटे वेतन के लिए बाहर जाने देने की बजाय अपने पास ही रखना चाहती है, भले ही वह स्थानीय स्तर पर छोटे पद व कम वेतन पर काम करता हो। मां रूपी जनता की इस भावना को कदाचित पायलट समझते हों, मगर उनका सारा ध्यान अजमेर को विकास की राह पर ले जाना है। वे जनता से दूर भले ही हों, मगर अजमेर पर ध्यान नहीं दे रहे, यह आरोप तो कम से कम उन पर नहीं लगाया जा सकता। विपक्षी नेता भले ही राजनीतिक कारणों से उनका विरोध करते हों, मगर मन ही मन वे भी जानते हैं कि पायलट के मंत्री बनने के कारण अजमेर की अहमियत बढ़ी है।
जहां तक पायलट की मजबूरी का सवाल है, यह साफ है कि उनके लिए एक सांसद की तरह अधिकतर समय अजमेर में ही देना संभव नहीं है, चूंकि उनके पास बड़ी जिम्मेदारी है। दूसरा ये कि अजमेर की कांग्रेस में इतने फिरके हैं और इतने विवाद हैं कि उन पर आए दिन माथापच्ची करना खुद कीचड़ में फंसना है। कदाचित इसी वजह से वे दूरी रखते हैं। मगर जानकारों का मानना है कि यही दूरी आगे चल कर उनके लिए दिक्कत बन जाएगी। माना कि उनकी ओर से कराया गया विकास काउंट होगा, मगर यदि अपनी मजबूत टीम नहीं बना पाए तो वह आगामी चुनाव में परेशानी बन सकती है। 

-तेजवानी गिरधर
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