शुक्रवार, 22 जून 2012

आईपीएस ने पोत दी पुलिस के चेहरे पर कालिख

अब तक तो चोर और उठाईगिरे ही आए दिन वारदातों को अंजाम देकर पुलिस के चेहरे पर कालिख पोत रहे थे, मगर अब एक आईपीएस अफसर ने ही यह काम अंजाम दे दिया है। अपने रीडर रामगंज थाने में एएसआई प्रेमसिंह के हाथों घूस मंगवाने के आरोप में गिरफ्तार आईपीएस अफसर अजय सिंह को घर भरने की इतनी जल्दी थी कि नौकरी की शुरुआत में ही लंबे हाथ मारना शुरू कर दिया। अफसोनाक बात ये है कि उनकी कारगुजारियों की चर्चाएं बाजार में तो आम थीं, मगर अजमेर के पुलिस कप्तान राजेश मीणा ने आंखें मूंद रखी थीं। परिणाम ये रहा कि पाप का घड़ा जल्द ही फूट गया। आश्चर्य तो इस बात का है कि एक आईपीएस के मामले में एसीडी ने इतनी मुस्तैदी कैसे दिखाई। बेशक इसके लिए वह बधाई की पात्र है।
हालांकि अजय सिंह रिश्वत के केवल एक ही मामले में पकड़े गए हैं, मगर सरकार ठीक से विधिवत जांच करवाए तो पता लग सकता है कि ऐसे ही कितने और मामलों में वे तोड़बट्टा कर रहे थे। जानकारी के अनुसार आईपीएस अजयसिंह जिस मार्स बिल्ड होम एंड डवलपर्स की मल्टीलेवल मार्केटिंग कंपनी की जांच कर रहे थे, उसमें आरोपियों के साथ-साथ गेनर्स पर भी नजर रखे हुए थे। उनका इतना खौफ था कि कई गेनर्स अंडरग्राउंड हो गए कि कहीं उन्हें भी झूठा न फंसा दिया जाए। जाहिर सी बात है कि उनसे भी तोड़बट्टे की बातें चल रही होगी। बेहतर तो यही होगा कि केवल रिश्वत के एक ही मामले तक सीमित न रह कर उनके पास चल रही सभी जांचों की भी पड़ताल करवाई जाए। वरना इन आईपीएस अफसर ने तो ऐसी कालिख पोती है, जिसे साफ करना आसान काम नहीं होगा।
आईपीएस अजय सिंह कितने बेखौफ थे, इसका अंदाजा इसी बात से हो जाता है कि वे अपने भाई हेमंत कुमार के साथ जिस गाडी में जाते हुए पकड़े गए, उसमें अवैध शराब की दो पेटियां व 47 हजार रुपए पाए गए। इस पर कानोता थाने में मामला दर्ज कर हेमंत कुमार को भी गिरफ्तार कर लिया गया।
ऐसा नहीं है कि अजय सिंह की वर्दी पर यह पहला दाग लगा है। इससे पहले भी वे विवादों में रहे हैं। जानकारी के अनुसार अलवर के शिवाजी पार्क थाने में वर्ष 2009 में एक युवती ने छेड़छाड़ व मारपीट का मामला दर्ज कराया था। जांच में अजयसिंह और उनके दोस्त का नाम भी सामने आया, लेकिन इस बीच अजय सिंह का आईपीएस में चयन होने के कारण मामले में एफआर लगा दी गई थी।
इसी प्रकार अजय सिंह को प्रोबेशन पीरियड के दौरान जोधपुर कमिश्नरेट से प्रशिक्षण पूरा होने से पहले ही हटाया गया था। गत वर्ष अप्रैल में झंवर में एसएचओ लगाया गया था, मगर वहां तीन माह पूरे होने से पहले ही ग्रामीणों की शिकायत पर हटा दिया गया। अजमेर में एलआईसी अधिकारी लक्ष्मण मीणा को आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोपी अधिकारी के बी चौधरी को वीआईपी ट्रीटमेंट देने का भी उन पर आरोप है। आरोप है कि उन्होंने अजमेर के कोटड़ा में जोधपुर के एक बुजुर्ग के भूखंड पर कब्जे के मामले में पीडि़त को एक लाख रुपए लेकर भूखंड छोडऩे केलिए धमकाया था। इसी प्रकार शांतिनगर के एक मकान को धोखाधड़ी से बेचने के मामले में जेल में रहते हुए एक आरोपी जुल्फिकार उर्फ जुल्फी पर बाहर से पावर आफ अटार्नी बनाने का गंभीर आरोप है। इसी प्रकार दहेज प्रताडऩा के एक मामले में हस्तक्षेप कर जबरन महिला थाने में मुकदमा दर्ज करवाया। उच्चधिकारियों की अनुमति के बिना ही कांस्टेबल राजाराम व जयपालसिंह को एसी का रिटर्न टिकिट देकर मुंबई में से दहेज प्रताडऩा के आरोपी रणजीतसिंह को गिरफ्तार करने भेज दिया। दोनों शातिर पुलिसकर्मियों ने मुंबई में बीयर बार, होटलों व बीच पर मौज-मस्ती कर मुकदमे से आरोपी और उसके परिवार के अन्य लोगों का नाम बाहर कराने के लिए लाखों की रिश्वत मांगी थी। बाद में आरोपी को अजमेर लाकर तीन दिनों तक एक होटल में बंधक बना कर रखा और पीडि़ता को पांच लाख रुपए दिलवा कर एक लाख रुपए कांस्टेबल ने वसूलेे। इसकी खबरें अखबारों में सुर्खियों में छपीं।
कुल मिला कर सच ये है कि पूरे पुलिस प्रशासन को उनकी करगुजारियों की जानकारी थी, मगर उसने आंखें मूूंद रखी थीं। अगर ऐसा नहीं है तो यह और भी दुर्भाग्यपूर्ण है। एक कहावत है न कि अफसर अफसर का मुंह सूंघता है। इस मामले में कदाचित ऐसा ही हो रहा था। वैसे भी आईएएस व आईपीएस लोबियों इतनी तगड़ी हैं कि एकाएक किसी आईएएस व आईपीएस के खिलाफ कार्यवाही नहीं होती। ये तो गनीमत है कि रिश्वत के ताजा मामले में पीडि़त ने एसीडी का दरवाजा खटखटाया और उसने भी पूरी मुस्तैदी के साथ कार्यवाही को अंजाम दिया, वरना अजय सिंह अब तक न जाने कितने और कारनामे करते। 

-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com

अब आप पर उम्मीदें टिकी हैं गालरिया साहब

यह एक सुखद बात है कि अजमेर नए जिला कलेक्टर वैभव गालरिया अजमेर जिले से सुपरिचित हैं, साथ ही वे स्वयं भी महसूस करते हैं कि उन्हें यहां काम करने में आसानी रहेगी। असल में वे यहां वर्ष 2001 में ब्यावर के उपखंड अधिकारी और वर्ष 2009 में राजस्थान लोक सेवा आयोग के सचिव रह चुके हैं। राष्ट्रीय झील संरक्षण परियोजना के निदेशक रहने के दौरान पुष्कर में झील संरक्षण का कामकाज भी देख चुके हैं। ऐसे में उम्मीद की जा सकती है कि वे अजमेर जिले की समस्याओं के समाधान व यहां के विकास के लिए गंभीरता दिखाएंगे। उनके लिए सुविधाजनक बात ये भी है कि अजमेर के संभागीय आयुक्त अतुल शर्मा भी अजमेर के हैं और उनकी अजमेर के प्रति गहरी रुचि है। यूं उम्मीद तो पूर्व कलेक्टर मंजू राजपाल से भी बहुत थी, मगर कुछ स्थानीय गंदी राजनीति के कारण और कुछ उनके अक्खड़पन की वजह से उनका कार्यकाल कुछ खास उपलब्धि वाला नहीं रहा। देखना ये होगा कि दोनों तालमेल बैठा कर तो राजनीतिक दखलंदाजी का उपयोग अजमेर के लिए कैसे कर पाते हैं।
गालरिया जी भलीभांति जानते होंगे कि यूं तो तीर्थराज पुष्कर व दरगाह ख्वाजा गरीब नवाज और किशनगढ़ की मार्बल मंडी के कारण अजमेर जिला अन्तरराष्ट�्रीय मानचित्र पर अंकित है, मगर आज भी प्रदेश के अन्य बड़े जिलों की तुलना में इसका उतना विकास नहीं हो पाया है, जितना की वक्त की रफ्तार के साथ होना चाहिए था। यूं तो मौटे तौर पर गालरिया जी को विकास से जुड़े मुद्दों की जानकारी होगी, फिर भी उनकी जानकारी के लिए यहां कुछ बिंदुओं पर चर्चा कर लेते हैं, जिन पर राजनीतिक दल व सामाजिक व स्वयंसेवी संस्थाएं भी दबाव बना सकती हैं।
1. हवाई अड्डा:-
पर्यटन की दृष्टि से विश्व मानचित्र पर अहम स्थान बना चुके अजमेर शहर के लिये यह विडम्बना की ही बात है कि यहां अभी तक हवाई अड्डा नहीं बन पाया है। किशनगढ़ में स्थान चिन्हित हो जाने के बावजूद चयनित भूमि के कानूनी विवाद में पड़ जाने के कारण यह कार्य फिर से अटक गया है। उम्मीद है कि गालरिया इस मसले का भी कोई वैकल्पिक हल निकलवाने में अपनी भूमिका का निर्वाह करेंगे।
2. बीसलपुर से नहीं बुझी अजमेर की प्यास:-
मूलत: अजमेर जिले के लिए ही बीसलपुर पेयजल योजना बनाई गई थी, जिसका उपयोग अब जयपुर सहित अन्य स्थानों के लिए भी किया जा रहा है। इसका परिणाम ये है कि अजमेर जिले के अनेक गांव अब भी फ्लोराइड युक्त पानी पीने को मजबूर हैं। पानी के कमी से अवरुद्ध औद्योगिक विकास कैसे हो, यह आज भी एक बड़ी समस्या है। ऐसे में पूर्व उप मंत्री ललित भाटी व पूर्व विधायक डा. श्रीगोपाल बाहेती चंबल का पानी लाए जाने पर लगातार दबाव बनाए हुए हैं। सुझाव ये है कि चंबल के सरप्लस पानी को भैंसरोडगढ़ या अन्य किसी उपयुक्त स्थल से अजमेर तक पहुंचाया जा सकता है। जानकारी है कि मुख्यमंत्री अशेाक गहलोत भी सिद्धांत: इससे सहमत हैं। अगर गालरिया जी प्रयास करें तो उनके लिए यह एक बड़ी उपलब्धि होगी। इससे न केवल पूरे जिले की प्यास बुझेगी, अपितु औद्योगिक विकास का रास्ता भी खुल जाएगा।
3. यातायात एक बड़ी समस्या:-
अजमेर की यातायात समस्या बहुत ही विकट है, जिससे एक लंबे अरसे से यहां के नागरिक पीडि़त हैं। अव्यवस्थित व अनियंत्रित यातायात को दुरुस्त करने के लिए यातायात मास्टर प्लान की जरूरत है। इसके लिए आनासागर चौपाटी से विश्राम स्थली या ग्लिट्ज तक फ्लाई ओवर बनाया जा सकता है, इससे वैशालीनगर रोड, फायसागर रोड पर यातायात का दबाव घटेगा। झील का संपूर्ण सौन्दर्य दिखाई देगा। उर्स मेले व पुष्कर मेले के दौरान बसों के आवागमन में सुविधा होगी और बी.के. कौल नगर, हरिभाऊ उपाध्याय नगर, फायसागर क्षेत्र के निवासियों को शास्त्रीनगर, सिविल लाइन्स, कलेक्टे्रट के लिए सिटी बस, पब्लिक ट्रांसपोर्ट सुविधा मिल सकेगी।
इसी प्रकरण से जुड़ा हुआ एक मुख्य बिंदु पार्किंग स्थलों के विकास करने का है। प्रयास किए जाएं तो इन स्थानों पर इनको विकसित किया जा सकता है:- 1. खाईलैण्ड मार्केट से लगी हुई नगर निगम की वह भूमि, जिस पर पूर्व में अग्नि शमन कार्यालय था, 2. नया बाजार में स्थित पशु चिकित्सालय की भूमि, जहां अंडर ग्राउण्ड पार्किंग संभव है, 3. मदार गेट स्थित गांधी भवन के पीछे स्कूल की भूमि, 4. कचहरी रोड स्थित जीआरपी/सीआरपी ग्राउण्ड, जहां अंडर ग्राउण्ड पार्किंग संभव है, 5. केसरगंज स्थित गोल चक्कर में अंडर ग्राउण्ड पार्किंग और 6. मोइनिया इस्लामिया स्कूल के ग्राउंड में अंडर ग्राउण्ड पार्किंग।
4. पुष्कर व आनासागर झील संरक्षण:-
तीर्थराज पुष्कर के पवित्र सरोवर और आनासागर झील के संरक्षण की हालत क्या है, यह गालरिया जी से छुपी हुई नहीं है। वे स्वयं झील संरक्षण के लिए हो रहे कार्य के प्रति असंतोष जाहिर कर चुके हैं। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि करोड़ों रुपए खर्च करके भी तीर्थराज पुष्कर में पवित्र स्नान के लिए कुंडों का ही सहारा लिया जा रहा है। इसी प्रकार आनासागर झील एक ऐतिहासिक धरोहर है। इसकी दुर्दशा से हर कोई वाकिफ है। प्रयास भी हुए हैं, मगर आज तक समुचित समाधान नहीं निकाला जा सका है।
4. विकास में बाधा बना हुआ है रेलवे:-
रेलवे को सदैव से अजमेर की धरोहर माना जाता रहा है, किन्तु रेलवे को स्वयं अभी यह बात साबित करनी शेष है। अजमेर शहर के लगभग एक तिहाई भू भाग पर रेल विभाग का अधिकार है। होना यह चाहिये था कि रेलवे के कुशल प्रबन्धन की बदौलत अजमेर का यह भाग अजमेर वासियों के लिये सुविधा का एक आधार बनता, मगर रेल विभाग ने कई स्थानों पर बैरिकेटिंग कर, रास्तों को रुकावट में बदल दिया है। शहर की विशेष भौगोलिक बनावट के कारण पूरे शहर को जोडऩे के लिये फिलहाल सिर्फ एक मार्ग स्टेशन रोड उपलब्ध है। इस मार्ग से यातायात का दबाव कम करने के लिये लम्बे समय से एक वैकल्पिक मार्ग की जरूरत महसूस की जाती रही है, मगर रेल विभाग के असहयोग के कारण ही यह मार्ग नहीं बन पा रहा है। प्रशासन अगर थोड़ा सा तालमेल करे तो रास्ता निकल सकता है। जहां तक स्टेशन रोड पर बने फुट ओवर ब्रिज का सवाल है, उसे हाल ही प्लेटफार्म से जोडऩे के निर्देश रेल राज्य मंत्री दे चुके हैं, मगर यह भी तभी होगा, जबकि प्रशासन रुचि दिखाए।
5. ठंडे बस्ते में पड़ी दरगाह विकास योजना:-
केन्द्र सरकार की पहल पर कुछ समय पूर्व दरगाह विकास के लिए 300 करोड़ रुपये की एक महत्वाकांक्षी परियोजना बनाई गई थी, मगर अजमेर से दिल्ली तक वाया जयपुर महज फाइलें ही आती-जाती रहीं। कई बैठकें भी हुईं, मगर वह मूर्त रूप नहीं ले सकी। हाल ही राज्य सरकार के मुख्य सचिव सी. के. मैथ्यू ने कहा था कि वह योजना अब भी अस्तित्व में है, मगर अमल करने में देरी हो रही है। गालरिया जी रुचि लें तो इस योजना के जरिए अजमेर का कायाकल्प हो सकता है।
6. औद्योगिक विकास:-
अजमेर में औद्योगिक विकास को नए आयाम देने के लिए स्पेशल इकोनोमिक जोन की जरूरत है। विशेष रूप से इन्फोर्मेशन टेक्नोलोजी का स्पेशल इकोनोमिक जोन बनाया जा सकता है। अजमेर के सांसद व केन्द्रीय संचार राज्य मंत्री सचिन पायलट इस दिशा में सतत प्रयत्नशील हैं। जिला प्रशासन को भी रुचि लेनी चाहिए। इसी प्रकार खनिज आधारित स्पेशल इकोनोमिक जोन भी बनाया जा सकता है। जिले में खनिज पर्याप्त मात्रा में मौजूद है। 7. पर्यटन विकास:-
जहां तक पर्यटन के विकास की बात है, यहां धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने की भरपूर गुुंजाइश है। धार्मिक पर्यटकों का अजमेर में ठहराव दो-तीन तक हो सके, इसके लिए यहां के ऐतिहासिक स्थलों को आकर्षक बनाए जाने की कार्ययोजना तैयार की जानी चाहिए। इसके लिए अजमेर के इतिहास व स्वतंत्रता संग्राम में अतुलनीय योगदान एवं भूमिका पर लाइट एण्ड साउंड शो तैयार किए जा सकते हैं। आनासागर की बारादरी, पृथ्वीराज स्मारक, और तीर्थराज पुष्कर में उनका प्रदर्शन हो सकता है। इसी प्रकार ढ़ाई दिन के झोंपड़े से तारागढ़ तथा ब्रह्म�ा मंदिर से सावित्री मंदिर पहाड़ी जैसे पर्यटन स्थल पर 'रोप-वे परियोजना भी बनाई जा सकती है। साथ ही पर्यटक बस, पर्यटक टैक्सियां आदि उपलब्ध कराने पर कार्य किया जाना चाहिए। 

-तेजवानी गिरधर
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tejwanig@gmail.com

सोमवार, 18 जून 2012

क्या भागवत के कन्हैया सोनी के घर रुकने के कोई मायने हैं?


सिंधुपति महाराजा दाहरसेन के बलिदान दिवस पर आयोजित श्रद्धांजलि कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में अजमेर आए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघचालक मोहन राव भागवत कार्यक्रम के अतिरिक्त कहां ठहरेंगे, इसको लेकर अनेक प्रकार के कयास लगाए जा रहे थे। कोई कह रहा था कि संघ पृष्ठभूमि के भाजपा विधायक प्रो. वासुदेव देवनानी कोशिश रहेगी कि वे उन्हें अपने यहां ले जाएं ताकि उनके खिलाफ एकजुट हो चुके भाजपाइयों को झटका दिया जा सके। कुछ लोगों की तो बाकायदा इस पर नजर भी थी कि देवनानी के घर व गली की रंगाई-पुताई तो नहीं हुई है या सुरक्षा इंतजाम तो नहीं किए गए हैं। कदाचित कुछ ऐसे भी हों, जिन्होंने प्रयास भी किए हों कि भावगत उनके घर न जाएं।
कोई कह रहा था कि वे किसी भी ऐसे स्वयंसेवक के घर जाएंगे, जिसका राजनीति से सीधा कोई वास्ता न हो। अगर ऐसा है तो यह वाकई विडंबनापूर्ण है कि अपने ही राजनीतिक चेहरे भाजपा से संघ कैसे दूर रहना चाहता है। अर्थात इस परिवार में दो दर्जे के लोग हैं। एक वे जो सीधे संघ से जुड़े हुए हैं और एक वे जो कभी संघ की शाखाओं में नहीं गए, मगर हैं भाजपा में। जाहिर तौर जो संघ पृष्ठभूमि से जुड़ा हुआ नहीं है, वह संघ की नजर में दोयम दर्जे का है। खैर, बात चल रही थी भागवत के ठहरने की। कोई कह रहा था कि वे ऐसे स्वयंसेवक के घर ठहरेंगे, जो बहुत जाना पहचाना चेहरा न हो, कहीं वह इसको भुना न ले। कई तरह की बातें थीं, मगर संघ के चंद प्रमुख कार्यकर्ताओं के अतिरिक्त किसी को जानकारी नहीं थी कि वे आखिर कहां ठहरेंगे।
बहरहाल, आखिरकार वे हरिभाऊ उपाध्याय नगर विस्तार में दाहरसेन स्मारक से कुछ ही दूर संघ के कार्यकर्ता कन्हैया सोनी के यहां ठहरे। यूं तो इसके कोई मायने नहीं हैं कि वे वहां क्यों ठहरे, मगर चूंकि संघ की चाल ढ़ाई घर वाली होती है, इस कारण स्थानीय राजनीतिक हलकों में इसकी चर्चा जरूर शुरू हो गई है। आपको बता दें कि ये कन्हैया सोनी निहायत सज्जन हैं और उनकी भाजपा की सक्रिय राजनीति में कुछ खास रुचि नहीं है। ये वे ही हैं, जो पिछली बार भाजपा शासनकाल के दौरान नगर सुधार न्यास के ट्रस्टी बनाए गए थे। अपने कार्यकाल के दौरान दाहरसेन स्मारक की खैर खबर लेते रहे, मगर इस वजह से राजनीतिक रूप से चर्चा में नहीं रहे। कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी वे अखबारों की सुर्खियों में नहीं रहे। लेकिन अब जब कि वे भागवत के जजमान बने तो चर्चा में आ गए हैं। हालांकि विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं और भाजपा का टिकट किसे मिलेगा, इसका कुछ अता-पता नहीं, मगर कुछ प्रमुख दावेदारों में उनका नाम भी शुमार हो गया है। तर्क सिर्फ ये है कि संघ का कुछ पता नहीं, ऐन वक्त पर किस पर हाथ रख दे, जिसकी कि भले ही राजनीतिक पृष्ठभूमि अथवा अनुभव न रहा हो। अजमेर के इतिहास में ऐसे एकाधिक उदाहरण हैं। प्रमाण है नवलराय बच्चानी, हरीश झामनानी, वासुदेव देवनानी, अनिता भदेल, श्रीकिशन सोनगरा, के नाम। और संघ उनको जिनवा भी लाता है। एक तथ्य ये भी माना जाता है कि अजमेर की दोनों सीटें संघ के खाते में हैं।
ज्ञातव्य है कि लगातार दो बार विधायक रहे प्रो. वासुदेव देवनानी का दावा सबसे प्रबल माना जाता है, मगर चूंकि भाजपा का एक बड़ा धड़ा उनकी कार सेवा कर रहा है, इस कारण कुछ संशय पैदा होता है। पिछली बार भी उन्हें बड़े पापड़ बेलने पड़े थे। उनके अतिरिक्त प्रमुख रूप से उभरने वालों में स्वामी समूह के एमडी कंवलप्रकाश किशनानी का नाम आता है। भामस नेता महेन्द्र तीर्थानी भी पंक्ति में बताए जाते हैं। रहा सवाल पूर्व शहर महामंत्री तुलसी सोनी का तो उन्होंने देवनानी के चक्कर में पार्षद का चुनाव हार कर खुद ही अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली। ऐसी ही गलती जाने-माने वकील अशोक तेजवानी से हो गई। नाम तो प्रमुख समाजसेवी जगदीश वच्छानी का भी लेने में कोई हर्ज नहीं है, मगर बताते हैं कि उन्हें गुरू स्वामी हिरदाराम जी महाराज मना कर गए कि सक्रिय राजनीति में मत जाना।
अव्वल तो भाजपा किसी गैर सिंधी को शायद ही टिकट दे, मगर बाइ द वे ऐसा होता है तो फिर कई की लार टपक सकती है। प्रमुख रूप से लाला बन्ना के नाम से चर्चित पूर्व नगर परिषद सभापति सुरेन्द्र सिंह शेखावत का नाम सबसे ऊपर है। वो तो देवनानी का संघ वाला हथियार चल गया, वरना वे तो पिछली बार ही प्रदेश अध्यक्ष ओमप्रकाश माथुर से घनिष्ठ संबंधों के चलते टिकट हासिल कर चुके थे। बड़े नामों में आप पूर्व शहर भाजपा अध्यक्ष शिवशंकर हेडा व पूर्णाशंकर दशोरा, पूर्व न्यास अध्यक्ष धर्मेश जैन, संघ के महानगर प्रमुख सुनील जैन, पूर्व नगर निगम मेयर धर्मेद्र गहलोत व पूर्व डिप्टी मेयर सोमरत्न आर्य, सतीश बंसल आदि को शुमार कर सकते हैं। माफ कीजिएगा, कोई नाम रह गया हो तो मेहरबानी करके बुरा न मानिये, अगली बार उनका भी जिक्र कर दिया जाएगा। पार्षद ज्ञान सारस्वत भी दावेदारी की तैयार कर रहे हैं। उन्होंने तो बाकायदा जमीन पर काम भी शुरू कर रखा है। एक और पार्षद जे. के. शर्मा की भी बड़ी इच्छा है कि साफ सुथरी छवि के आधार पर उनको मौका मिलना चाहिए। अब ये देखने वाली बात होगी होता क्या है?

-तेजवानी गिरधर
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रविवार, 17 जून 2012

सिंध और महाराजा दाहरसेन पर अद्वितीय पुस्तक प्रकाशित


सिंधुपति महाराजा दाहरसेन के बलिदान दिवस के मौके पर अजमेर में दाहरसेन स्मारक पर गत 16 जून, 2012 को आयोजित विशाल श्रद्धांजलि समारोह में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहनराव भागवत सहित अन्य अतिथियों के हाथों विमोचित पुस्तक संसार का सिरमौर सिंध और महाराजा दाहरसेन, सिंध और दाहरसेन बाबत लिखी गई अब तक की सभी पुस्तकों से भिन्न और तथ्यों के संकलन की दृष्टि से अद्वितीय है। यह अमूल्य कृति प्रखर वक्ता, कुशल राजनीतिज्ञ एवं सरस्वती पुत्र पूर्व सांसद श्री औंकार सिंह लखावत द्वारा सिंध और महाराजा दाहरसेन पर किए गए गहन शोध का साक्षात लिपिबद्ध स्वरूप है।
पुस्तक का अध्ययन करने से स्पष्ट प्रतीत होता है कि विषय के बारे में विस्तृत, गूढ़ व गहन जानकारी के लिए उन्होंने न केवल सिंध के इतिहास से संबंधित अनेकानेक प्राचीन ग्रंथ, दस्तावेज व पुस्तकों का अध्ययन-मनन किया है, अपितु अनेक विषय विशेषज्ञों से गहन चर्चा कर इतिहास के उस सत्य को उद्घाटित करने, उभारने व पुनस्र्थापित करने की कोशिश की है, जो कि या तो लुप्त प्राय: हो चुका था अथवा जिसे निहित स्वार्थी तत्वों ने तोड़-मरोड़ कर भावी पीढ़ी को दिग्भ्रमित करने की कोशश की।
इस अनुपम पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि इसमें सिंध और महाराजा दाहरसेन से जुड़े वास्तविक तथ्यों को तर्क की कसौटी पर कस कर तथ्यों को सिलसिलेवार और सहज पठनीय भाषा में प्रस्तुत किया गया है। इतना ही नहीं, इस पुस्तक से हमें महान सिंधु घाटी की सभ्यता और महाराजा दाहरसेन की महानता का भान होता है, जो कि हमारे लिए अत्यंत ही गौरवपूर्ण व प्रेरणास्पद है। इसके अतिरिक्त अनेक प्रसिद्ध व प्रतिष्ठित इतिहासकार, समाजसेवी, साहित्यकार व राजनीतिज्ञों के सिंध व महाराजा दाहरसेन संबंधी कथनों का संकलन इस पुस्तक को और अधिक संग्रहणीय बनाता है।
वस्तुत: यह एक पुस्तक मात्र नहीं, अपितु महान सिंधु नदी से निकली एक धारा है, जिसका पान कर न केवल शोधार्थियों की जिज्ञासा तृप्त होगी, अपितु हमारी भावी पीढ़ी के लिए एक प्रकाश स्तंभ का कार्य करेगी। धरती पर गंगा की तरह इस धारा को हमारे पास लाने का भगीरथी प्रयास करने वाले श्री लखावत कोटि-कोटि साधुवाद के पात्र हैं। पुस्तक का प्रकाशन तीर्थ पैलेस प्रकाशन, 125, हैलोज रोड, पुष्कर की ओर से किया गया है और इसका मूल्य मात्र एक सौ रुपए रखा गया है।
यहां उल्लेखनीय है कि श्री लखावत इससे पूर्व जय आवड़ आसापुरा, बाहरठ नरहरिदास, हिंगलाज शक्तिपीठ, बोल सांसद बोल : युग चारण बोल, राजल अकबर का नवरोज दियो छुड़ाय आदि पुस्तकें लिख चुके हैं।
जहां तक श्री लखावत के व्यक्तित्व और कृतित्व का सवाल है, सब जानते हैं कि वे राज्यसभा सदस्य व अजमेर नगर सुधार न्यास के अध्यक्ष रह चुके हैं। न्यास के अध्यक्षीय काल में ही उन्होंने दाहरसेन स्मारक सहित सम्राट पृथ्वीराज चौहान स्मारक, लव-कुश उद्यान, मनीषि समरथदान पत्रकार भवन सहित अनेकानेक स्थाई और दर्शनीय स्थानों का निर्माण करवाया। वे अजमेर में स्थित चारण साहित्य शोध संस्थान के अध्यक्ष भी हैं और भक्तिधाम की स्थापना उन्हीं की देन है।
राजस्थान धरोहर संरक्षण एवं प्रोन्नति प्राधिकरण के अध्यक्ष रहने के दौरान उन्होंने बूढ़ा पुष्कर जीर्णोद्धार, गोगामेड़ी में गोगाजी चौहान स्मारक, खानुआ में राणा सांगा स्मारक, भरतपुर में महाराजा सूरजमल स्मारक, मेड़ता में मीराबाई स्मारक, मानगढ़ धाम, बांसवाड़ा में गोविंद गुरू स्मारक, सलूम्बर में हाड़ी रानी स्मारक, खरनाल में तेजीजी स्मारक, पींपासर में जाम्भाजी स्मारक, चूरू में गुरू गोविंद सिंह स्मृति साहवा सरोवर, सीलू-जालौर में नर्मदेश्वर धाम, टहला में नरहरिदास बारहठ स्मारक, आउवा में सत्याग्रह उद्यान, अर्णवराज एवं मीरा उद्यान आदि के निर्माण करवाया। पेशे से वे वकालत करते हैं।
श्री लखावत का जन्म 1 अप्रैल, 1949 को नागौर जिले के टहलां गांव में श्री आसकरण लखावत के घर हुआ। प्रारंभिक शिक्षा कड़ेल व थांवला में अर्जित करने के बाद बीए की डिग्री नागौर जिले के डीडवाना कस्बे में प्राप्त की। वहां भारत सेवक समाज के उपाध्यक्ष और प्रांतीय मंत्री रहे। इसके पश्चात अजमेर चले आए। यहां अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के अजमेर विभाग के मंत्री व उपाध्यक्ष रहे। आजीविका के लिए माध्यमिक शिक्षा बोर्ड में लिपिक की नौकरी की। इसी दौरान राजकीय महाविद्यालय से एलएलबी की और वकालत प्रारंभ कर दी। इस दौरान युवा अभिभाषक परिषद के मंत्री रहे।
अध्ययनकाल के दौरान ही साहित्यिक कार्यों व पत्रकारिता में रुचि रही और वकालत करने के साथ सन् 1969 में समाचार एजेंसी हिंदुस्तान समाचार के जिले के संवाददाता बने। इसी दौरान उनकी रुचि राजनीति में भी हुई और। सन् 1996 में उनको अजमेर नगर सुधार न्यास का अध्यक्ष बनाया गया। सन् 1998 में उनको राज्यसभा सदस्य के रूप में चुना गया। भाजपा संगठन में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही और प्रदेश महामंत्री रहे। वर्तमान में प्रदेश उपाध्यक्ष पद पर हैं।

उनका संपर्क सूत्र है:-
1. 24-ए, मोहन कालोनी, स्वेज फार्म, सोडाला, जयपुर
दूरभाष : 09414007610, 0145-2290629
ईमेल : oslakhawat@gmail.com
2. करणी कुंज, कचहरी रोड, अजमेर
दूरभाष : 0145-2422610

गुरुवार, 14 जून 2012

अजमेर-पुष्कर रेल मार्ग : न था तो दुख, और है तो बेकार

जब तक अजमेर-पुष्कर रेल मार्ग शुरू नहीं हो रहा था तो इस बात का हल्ला था कि इसमें लेट लतीफी क्यों हो रही है और अब जब शुरू हो गया है तो तकलीफ ये है कि यह बेकार और अनुपायोगी है। कैसी विडंबना है? कैसा विरोधाभास है?
आपको याद होगा कि जब अजमेर-पुष्कर रेल मार्ग की महत्वाकांक्षी योजना पर केन्द्र और राज्य सरकार के बीच तालमेल की कमी के चलते धीमी गति से अमल हो रहा था तो यह कहा जा रहा था कि नियत अवधि से यह न केवल तीन साल पिछड़ गया है, अपितु इसकी लागत भी तकरीबन चार करोड़ बढ़ गई है। जहां 88 करोड़ लगने थे, वहां लागत 92 करोड़ को भी पार कर गई। इस रेल मार्ग का काम 1 जनवरी 2006 को शुरू हुआ था। यदि सब कुछ ठीकठाक चलता रहता तो इसको दो साल में पूरा कर लिया जाता, लेकिन लेटलतीफी के कारण इसे कुल चार साल में पूरा होने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। शुरुआत से ही इसकी राह में रोड़े आ रहे थे। सबसे पहले तो जो रूट तय किया गया, उस पर आने वाली वन भूमि मिलने में देरी हुई। वन महकमे ने पूरा डेढ़ साल खराब कर दिया। रेलवे बार-बार आग्रह करता रहा, लेकिन वन महकमे ने इसकी गंभीरता को ही नहीं समझा। केन्द्र व राज्य सरकार में समन्वय न होने के कारण भी काम ठप्प पड़ा रहा। इसके लिए राजनीतिकों को गालियां भी पड़ती थीं कि वे क्षेत्र के विकास पर ध्यान नहीं देते। वो तो बाद में केन्द्रीय संचार राज्य मंत्री सचिन पायलट ने रुचि ली, तब जा कर काम ने तेजी पकड़ी और आखिर यह रूट शुरू हो गया। अब जब कि यह शुरू हो गया है तो पता लग रहा है कि ये बेकार ही है। प्रतिदिन पुष्कर-अजमेर-ब्यावर के बीच केवल साठ-सत्तर यात्री ही इसमें सफर करते हैं। पुष्कर-अजमेर के बीच करीब चार माह पहले शुरू हुए इस मार्ग की लंबाई 28 किलोमीटर है। पुष्कर के लिए ब्यावर वाया अजमेर कुल दस डिब्बों की स्पेशल ट्रेन चलाई जा रही है। अर्थात करीब छह सौ यात्री क्षमता की इस ट्रेन के केवल साठ-सत्तर लोग ही उपयोग कर रहे हैं। जाहिर सी बात है कि जब इस ट्रेन से आमदनी नहीं है तो रेलवे महकमे ने भी न तो स्टेशन पर पर्याप्त स्टाफ रखा है और न ही यात्री सुविधाओं पर कोई ध्यान दे रहा है। स्टेशन में गंदगी की भरमार है। सफाई के लिए केवल एक कर्मचारी लगाया गया है, वो भी हफ्ते में मात्र दो दिन आता है।
सवाल ये उठता है कि नियत समय से करीब चार साल बाद शुरू होने पर भी यात्री भार मात्र साठ-सत्तर है तो समय पर शुरू हो जाता तो क्या हाल होता? कोई दस-बारह ही यात्रा करते। यूं मांग तो करीब पंद्रह-बीस साल पुरानी थी, इसे शुरू करने की। बाहर से आने वाले यात्रियों को पुष्कर जाने के लिए ट्रेन की सुविधा देने के मकसद से स्थानीय राजनीतिक दल प्रयास करते रहे और बड़ी जद्दोजहद के बाद इसको मंजूरी मिली। तत्कालीन लोकसभा सदस्य प्रो. रासासिंह रावत और राज्यसभा सदस्य डा. प्रभा ठाकुर व औंकार सिंह लखावत ने भी खूब जोर लगाया। ऐसे में प्रश्न ये उठता है कि ऐसे अनुपयोगी विकास कार्यों के लिए हम आखिर क्यों जोर लगाते हैं? केवल वोटों की खातिर या फिर सरकारों के पैसा है तो उसे कहीं तो ठिकाने लगवाना है। क्या हमें पता नहीं था कि यह रेल मार्ग शुरू होने पर इसका हश्र क्या होगा? मगर मानसिकता विशेष की तुष्टि के लिए जिद कर रहे थे। इस योजना पर भी करीब एक सौ करोड़ का खर्चा आ चुका है और अब भी यह घाटे का सौदा ही साबित हो रही है, तो क्या यह हमारी ही गाढ़ी कमाई का दुरुपयोग नहीं है, जो कि हमारी जिद के कारण किया गया है और किया जा रहा है?
अजमेर-पुष्कर रेल मार्ग ही क्यों, बूढ़ा पुष्कर के जीर्णोद्धार कार्य का भी कमोबेश यही हश्र है। राजस्थान धरोहर संरक्षण एवं प्रोन्नति प्राधिकरण के पूर्व अध्यक्ष औंकार सिंह लखावत के भगीरथी प्रयासों से करोड़ों रुपए लगा कर बूढ़ा पुष्कर पर शानदार घाट व मंदिर बना दिए गए, तो जाहिर तौर इस ऐतिहासिक कार्य के लिए उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा हुई। होनी भी चाहिए। मगर उसका उपयोग क्या है? आज न तो वहां तीर्थ यात्री जाता है और न ही पुष्कर के पुरोहितों की वहां जा कर पूजा-अर्चना करवाने में रुचि है। एक बड़ी वजह ये है कि भाजपा शासन काल में शुरू हुए इस कार्य को कांग्रेस सरकार ने आते ही ठप कर दिया। उस प्राधिकरण पर ही ताले लगा दिए। यदि कांग्रेस सरकार इस पर ध्यान देती तो कदाचित इसका विकास भी होता और तीर्थ यात्रियों का भी पैर वहां पड़ता। मगर चिंता किसे है? विधानसभा में पुष्कर का प्रतिनिधित्व करने वाली शिक्षा राज्य मंत्री श्रीमती नसीम अख्तर इंसाफ की भी इसमें कोई खास रुचि नहीं है। अब केवल संतोष यह कह कर किया जा सकता है कि चलो एक ऐतिहासिक काम तो हो गया, अभी नहीं तो बाद में आबाद हो जाएगा।
अजमेर-पुष्कर रेल मार्ग के बारे में भी इसी प्रकार का संतोष किया जा सकता है कि हमारे जनप्रतिनिधियों की प्रयासों से शुरू तो हुआ, जब इसे जब मेड़ता तक जोड़ा जाएगा और पुष्कर से हरिद्वार की ट्रेन शुरू की जाएगी तो उपयोगी हो जाएगा। प्रसंगवश हवाई अड्डे की भी बात कर लें। इसकी मांग भी बहुत पुरानी है और राजनीतिक जागरूकता के अभाव और सशक्त नेतृत्व की कमी का उलाहना देते हुए आज हमें शिकायत है कि वह शुरू नहीं हो पा रहा, मगर जैसे हालत हैं, वह भी जब शुरू होगा तो विमानों में यात्री बैठाने को ही नहीं होंगे, मगर हम कम से कम गर्व से कह तो सकेंगे कि हमारे यहां हवाई अड्डा भी है।
लब्बोलुआब अपना सिर्फ इतना कहना भर है कि विकास कार्य होने चाहिए, मगर ऐसे, जिनका लाभ वास्तव में आम लोगों को मिले, न कि वे गिनाने भर को हों व स्मारक की भांति खड़े शोभा बढ़ाएं। 

-तेजवानी गिरधर
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