सोमवार, 25 जून 2012

ये मुबारक नहीं, नसीम व इंसाफ की प्रतिष्ठा का सवाल है

कांग्रेस अल्पसंख्यक विभाग के शहर जिलाध्यक्ष पद पर मुबारक खान की नियुक्ति पर हो रहे विवाद से मुबारक की प्रतिष्ठा पर असर पड़े न पड़े, उनके भाई इंसाफ अली व भाभी शिक्षा राज्य मंत्री श्रीमती नसीम अख्तर इंसाफ पर जरूर पड़ रहा है। जहां तक मुबारक का सवाल है, वे तो अब तक निर्विवाद थे ही, इंसाफ व नसीम भी अल्पसंख्यकों में निर्विवाद नेता के रूप में स्थापित थे। अगर कहीं विरोध था भी तो वह मुखर नहीं था। किसी ने न तो अब तक हिम्मत जुटाई थी और न ही किसी को विवाद करने का मौका मिला था। लेकिन मुबारक के नियुक्त होते ही यह उजागर हो गया है कि कांग्रेस में कई अल्पसंख्यक उनके खिलाफ हैं।
असल में जहां तक मुबारक की नियुक्ति का सवाल है तो यह साफ जाहिर है कि वे अपने भाई-भाभी के दम पर ही अध्यक्ष बन कर आए हैं। ऐसे में विरोध हो रहा है तो यह केवल उनका ही नहीं, बल्कि नसीम व इंसाफ का भी कहलाएगा। अगर वे अपने बूते ही बन कर आए हैं तो भी यही माना जाएगा कि वे भाई-भाभी की सिफारिश पर बने हैं। उनका विरोध करने वाले साफ तौर पर कह रहे हैं कि मुबारक की नियुक्ति व्यक्तिगत संबंधों को तरजीह देकर की गई है। यह उन कार्यकर्ताओं के साथ कुठाराघात है, जो बरसों से कांग्रेस के अल्पसंख्यक वर्ग के साथ सच्चे सिपाही की तरह काम कर रहे हैं।
शहर कांग्रेस उत्तर ब्लाक ए के अध्यक्ष आरिफ हुसैन, शहर कांग्रेस के सचिव मुख्तार अहमद नवाब, एनएसयूआई अध्यक्ष वाजिद खान, युवक कांग्रेस उत्तर विधानसभा अध्यक्ष सैयद अहसान यासिर चिश्ती, अल्पसंख्यक विभाग के संयोजक एसएम अकबर, सैयद गुलाम मोइनुद्दीन, गुलाम हुसैन तथा जहीर कुरैशी ने पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी, केंद्रीय संचार राज्यमंत्री सचिन पायलट तथा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डा. चंद्रभान को शिकायत की है और विभाग के राष्ट्रीय अध्यक्ष इमरान किदवई आरोप लगाया कि इस तरह नियुक्ति देकर वे पार्टी को कमजोर करने की कार्रवाई कर रहे हैं। उन्होंने किदवई को पद से हटाने की मांग के साथ ही मुबारक की नियुक्ति को भी निरस्त करने की मांग की है। उनका कहना है कि मुबारक देहात से जुड़े रहे हैं, इनके भाई इंसाफ अली देहात कांग्रेस में उपाध्यक्ष हैं और भाभी नसीम अख्तर इंसाफ शिक्षा राज्यमंत्री हैं। ऐसे में मुबारक को शहर में नियुक्ति दे दी गई, जबकि संगठन से जुड़े कई कर्मठ कार्यकर्ताओं की अनदेखी कर दी गई है।
अव्वल तो मुबारक को यह पद हासिल करने की जरूरत ही नहीं थी। उनकी चवन्नी पहले से ही चल रही थी। यह पद पा कर अनावश्यक रूप से विवाद में आ गए। हालांकि वे केवल अपने भाई-भाभी की वजह से राजनीति में वजूद नहीं रखते, अपितु खुद भी लंबे समय से सक्रिय राजनीति में हैं, मगर इस नियुक्ति से खुद तो विवाद में आए ही, अपने निर्विवाद भाई-भाभी पर भी एक बारगी भाई-भतीजावाद का आरोप लगवा बैठे। रहा सवाल इस पद पर नियुक्ति का तो यह तो वे ही जान सकते हैं कि इसके पीछे का गणित और भावी रणनीति क्या है?
बहरहाल, अब जब कि नियुक्ति हो गई है तो उस पर कायम रहना भी जरूरी है, क्योंकि उनकी नियुक्ति का विरोध हो रहा है और उसे उनके भाई-भाभी से भी जोड़ा जा रहा है। यानि कि उनकी प्रतिष्ठा भी जुड़ गई है। जाहिर सी बात है कि अब वे भी मुबारक को पद पर कायम रखवाने के लिए पूरा जोर लगाएंगे। खुद मुबारक को भी अपना दमखम दिखाना होगा। नियुक्ति का विरोध होते ही उनके स्वागत में जनसेवा समिति की ओर से आयोजित समारोह को इसी कड़ी से जोड़ कर देखा जा सकता है। वैसे एक बात तो है मुबारक की नियुक्ति पर विरोध के बहाने से ही सही, इंसाफ अली व नसीम अखतर को तो यह तो पता लग गया कि कौन-कौन उनके खिलाफ हैं।


-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com

गालरिया साहब, ऐसी ही सख्ती की दरकार है मातहतों को

नवनियुक्त जिला कलेक्टर वैभव गालरिया ने आते ही अपने मातहत अफसरों पर सख्ती दिखा कर यह संकेत दे दिया है कि वे सरकारी योजनाओं व कार्यक्रमों में किसी प्रकार की कोताही बर्दाश्त नही करेंगे। सबसे पहले उन्होंने नंबर लिया राष्ट्रीय झील संरक्षण परियोजना के तहत निर्माणाधीन पुष्कर (कपिल कुंड) फीडर निर्माण कार्य का। चूंकि वे इस परियोजना के डायरेक्टर रह चुके हैं, इस कारण उन्हें पहले से जानकारी थी कि यहां संबंधित अफसरशाही पूरी लापरवाही बरत रही है, इस कारण भिड़ते ही उनका नंबर लिया। अजमेर वासियों के लिए यह एक सुखद संकेत है।
सब जानते हैं कि पुष्कर फीडर व खरेखड़ी फीडर का काम कितना महत्वपूर्ण है। यह काम पवित्र पुष्कर सरोवर के वजूद को कायम रखने के लिए हुए अब तक हुए और हो रहे कामों में से एक है। इसके बावजूद सरोवर में यदि कुंड बना कर स्नान की व्यवस्था करनी पड़ रही है, तो इसका मतलब यह है कि जितनी भी योजनाएं बनीं और जितना भी पैसा आया, वह सब पानी में चला गया। कदाचित इसी वजह से आमजन में यह भावना भी घर कर गई है कि सरकार हिंदू तीर्थस्थल के रखरखाव पर तो ध्यान देती नहीं और तुष्टिकरण के तहत दरगाह के विकास और उर्स मेले पर पूरा ध्यान देती है।
ज्ञातव्य है कि गालरिया ने परियोजना की नोडल एजेंसी यूआईटी सचिव पुष्पा सत्यानी, एईएन केदार शर्मा व ठेकेदार के प्रतिनिधियों की जम कर क्लास ली अैर यूआईटी सचिव को ठेकेदार द्वारा फीडर निर्माण की गति तेज नहीं करने पर ठेका निरस्त कर यूआईटी स्तर पर फीडर का काम पूरा करने के निर्देश दिए हैं। इसी प्रकार खरेखड़ी फीडर से सटी नाग पहाड़ी क्षेत्र में परियोजना के तहत मनमाने तरीके से बनाए गए गैबियन स्ट्रक्चर की दीवारों को तोड़कर पाइप नहीं लगाने पर पंचकुंड नर्सरी के वनपाल को फटकार लगाई तथा डीएफओ को तत्काल प्रभाव से ऐसे गैबियन स्ट्रक्चर को चिह्नित कर पाइप लगाने के निर्देश दिए जहां गैबियन की वजह से पहाड़ी से बहकर आने वाला बरसाती पानी रुक रहा है। साथ ही सरोवर किनारे व फीडरों में से जमा मिट्टी हटाने के निर्देश दिए। दौरे के दौरान श्री ब्रह्मा गायत्री तीर्थ विकास संस्थान के अध्यक्ष राकेश पाराशर, सचिव अरुण पाराशर, एनएलसीपी की जिला निगरानी समिति के सदस्य गोविंद पाराशर, समाजसेवी जगदीश कुर्डिया आदि ने ब्रह्मा मंदिर में चढ़ावे की राशि का दुरुपयोग रोकने, उर्स की तर्ज पर पुष्कर मेले के लिए अतिरिक्त बजट दिलाने, खरेखड़ी में अरावली पहाड़ी में हो रहे अवैध खनन पर प्रतिबंध लगाने, बूढ़ा पुष्कर-बाड़ी घाटी तक बाईपास का निर्माण मेले से पहले कराने सहित अनेक सुझाव दिए। उम्मीद की जानी चाहिए कि गालरिया तीर्थराज पुष्कर की धार्मिक व ऐतिहासिक महत्ता को ध्यान में रखते हुए इन मामलों में भी सख्ती बरतेंगे।
सब जानते हैं कि पुष्कर के सरकारी अस्पताल के क्या हाल हैं और उसने कितना नाम कमाया है। गालरिया ने वहां का भी औचक दौरा किया, मगर उसकी मुखबिरी हो जाने के कारण चिकित्सा स्टाफ पूरी तरह से मुस्तैद हो गया। उन्होंने सारी व्यवस्थाएं ऐसी दुरुस्त कर दीं मानों वे सदैव रहती हों। इसी कारण गालरिया को कोई खास कमी नजर नहीं आई। कैसी विडंबना है कि चिकित्साकर्मी मुख्य गेट पर कलेक्टर के स्वागत के लिए हाथों में माला लेकर ऐसे खड़े हो गए, मानों वहां कलेक्टर का अभिनंदन समारोह आयोजित किया गया हो। अच्छा हुआ कि उन्होंने मालाएं नहीं पहनीं।
यदि यही रवैया उन्होंने रखा तो कोई आश्चर्य नहीं कि बदहाल आनासागर झील संरक्षण, कछुआ छाप सीवरेज सिस्टम, दुर्घटना जोन बना गौरव पथ सहित बिगड़ी यातायात व्यवस्था को अपनी नियती समझ चुके अजमेर वासियों को अहसास हो जाएगा कि अदिति मेहता जैसे और अफसर भी हैं आईएएस जमात में। 

-तेजवानी गिरधर
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क्या पुलिस की मिलीभगत से हो रही हैं चोरियां, लूट व ठगी?

चोरी की कोई वारदात होती है तो स्वाभाविक रूप से सभी अखबारों में यही सुर्खियां होती हैं कि पुलिस नकारा हो गई है, पुलिस सुस्त, चोरी सुस्त, पुलिस का मुखबिर तंत्र नाकामयाब हो गया है, पुलिस अपराधियों से मिली हुई है, इत्यादि इत्यादि। आखिर माजरा क्या है? क्या वाकई इसके लिए पूरी तरह से पुलिस ही जिम्मेदार है या फिर लुटेरे पुलिस से ज्यादा शातिर हैं? या फिर निचले स्तर पर अपराधी पुलिस कर्मियों से मिले हुए हैं?
यदि पुलिस की मानें तो यह बात आसानी से गले उतर जाती है कि जब लुटेरे सक्रिय हैं तो आखिर क्यों महिलाएं सोने के गहने पहन कर निकलती हैं, क्या एक-एक महिला के साथ एक-एक पुलिस कर्मचारी तैनात किया जाए? इसी प्रकार जब महिलाओं व वृद्धों को बेवकूफ बना की लुटेरे या ठग अपने काम को अंजाम देते हैं तो भी पुलिस का यह तर्क होता है कि वे लालच में आ कर बेवकूफ बनते ही क्यों हैं, क्या एक-एक घर में पुलिस तैनात की जाए? बात तो बिलकुल ठीक ही है। मगर तस्वीर का दूसरा पहलु कुछ और ही बयां करता है।
अचानक किसी बाहरी गिरोह के सक्रिय होने की बात अलहदा है, मगर असल में पुलिस का ताना-बाना और बीट प्रणाली बनाई ही इस प्रकार गई है कि हर थाने व चौकी के पुलिस कर्मियों को अपने-अपने इलाके में सक्रिय बदमाशों की पूरी जानकारी होती है। पुलिस को पता होता है या पता होना ही चाहिए कि वारदात किसने अंजाम दी होगी। वह चाहे तो तुरंत संबंधित अपराधी तक पहुंच सकती है। पहुंचती भी है। ऐसे अनेक उदाहरण मिल जाएंगे कि चोरी अगर किसी प्रभावशाली के यहां हुई तो चोर पकड़ा ही जाता है। वजह क्या है? वजह ये है कि पुलिस उस मामले में अपने तंत्र को वाकई सख्ती से अंजाम देती है और चोर तक पहुंच जाती है और माल की बरामदगी भी हो जाती है। अर्थात अगर पुलिस चाहे तो कम से कम लूट व चोरी की वारदातों पर तो काबू पा ही सकती है। अगर इच्छाशक्ति हो। मगर एक के बाद एक वारदातें होने और उनका खुलासा न होने से यह साफ है कि पुलिस तंत्र विफल हो चुका है। चाहे इसके लिए उसके मुखबिर तंत्र की विफलता को कारण माना जाए अथवा निचले स्तर पर अपराधियों की पुलिस कर्मियों से मिलीभगत को, इन दोनों कारणों के बिना इस प्रकार की वारदातें हो ही नहीं सकतीं।
आम तौर पर यही कहा जाता है कि पुलिस का खौफ समाप्त हो गया है, इसी कारण चोर-उचक्के मुस्तैद हैं। इसमें काफी हद तक सच्चाई है। असल में अपराधियों में खौफ तभी खत्म होता है, जबकि वे निचले स्तर पर मिलीभगत करके चलते हैं। ऐसा तभी होता है, जबकि निचले स्तर पर कांस्टेबल अपराधियों के लिए मुखबिरी का काम करते हैं। यही कारण है कि कई बार वांटेड अपराधियों की तलाशी सरगरमी से करने की दुहाई दी जाती है, मगर निचले स्तर अपराधियों को दबिश की पूर्व सूचना होने के कारण वे भाग जाते हैं। अर्थात यदि यह कहा जाए कि पुलिस की मिलीभगत से ही चोरी और लूट होती है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। हालांकि इसका मतलब ये नहीं कि पुलिस लूट, ठगी या चोरी करवाने में सहयोगी होती है या वही करवाती है, मगर यह जरूर सच है कि अपराधी निचले स्तर पर पुलिस वालों को संतुष्ट किए रहते हैं, इस कारण पुलिस अफसरों को अपराधियों तक पहुंचने में सफलता नहीं मिलती। अब सवाल ये उठता है कि निचले स्तर पर एक कांस्टेबल इस प्रकार मिलीभगत करने का साहस कैसे कर लेता है, उसका जवाब है कि जब वह देखता है कि उसका अफसर ही तोड़-बट्टे करता है तो वह क्यों न करे। हर कोई अपने अपने पद और कद के मुताबिक फायदा उठाता ही है।
इसी संदर्भ में अगर हम हाल ही गिरफ्तार आईएएस अजय सिंह की बात करें तो उनके सारे मातहतों को पता होगा कि अजय सिंह कहां-कहां तोड़बट्टा कर रहे हैं, मगर चूंकि वे अधीनस्थ होते हैं और पुलिस में कथित रूप से अनुशासन है, इस कारण वे कुछ बोल नहीं पाते। ऐसे में वे भी मौके का फायदा उठाते हैं और निचले स्तर पर छोटी-मोटी बदमाशी करते रहते हैं। अजय सिंह के प्रकरण में तो बड़ अफसरों तक को पता था, मगर वे शायद पाप का घड़ा भरने का इंतजार कर रहे थे। यानि कि यह साफ है कि पुलिस के अफसर यदि वाकई सख्त हों तो क्या मजाल है कि उनके मातहत बेईमानी करें या अपराधियों की क्या मजाल कि इस प्रकार बेखौफ एक के बाद एक वारदातें करते रहें।
यूं तो हाल ही चेन स्नेचिंग व ठगी की एकाधिक वारदातें हुई हैं और इसकी वजह से पुलिस को शर्मिंदगी झेलनी पड़ रही है, मगर गत दिवस जब फर्जी पुलिस बनकर शातिरों ने एक सीनियर आरएस अफसर की वृद्ध मां को ही लूट लिया तो मीडिया ने पुलिस की जम कर मजम्मत की।
जिस प्रकार लगातार ऐसी वारदातें होती जा रही हैं और उन पर काबू नहीं पाया जा पा रहा है, इससे तो यही प्रतीत होता है कि पुलिस केवल बेईमानी कर रही है और अपराध पर अंकुश की उसकी इच्छाशक्ति कम होती जा रही है। एक दूसरी वजह भी समझ में आती है। वो ये कि पिछले दो माह में हुए एक दर्जन से ज्यादा वारदातों में शातिरों ने अमूमन वृद्धों को ही शिकार बनाया है, यानि कि शातिर अपराधियों का कोई गिरोह सक्रिय है, जिसने कि आदर्शनगर, रामगंज, क्रिश्चियन गंज और सिविल लाइंस इलाकों को अपना वारदात स्थल बना रखा है। अगर कोई नया गिरोह भी है तब भी उसे पकडऩे की जिम्मेदारी पुलिस की ही है। हमारे पुलिस कप्तान राजेश मीणा को इसका अहसास होगा ही। अगर अब भी पुलिस ने मुस्तैदी दिखा कर इन वारदातों पर काबू नहीं पाया तो आमजन का पुलिस पर से विश्वास खत्म हो जाएगा, जिसके लिए पुलिस कप्तान मीणा सहित पूरा बेड़ा ही जिम्मेदार होगा। वैसे हाल ही अजमेर रेंज के सभी पुलिस अधिकारियों की बैठक के दौरान आईजी अनिल पालिवाल ने सभी थाना अधिकारियों सहित सर्किल आफिसर्स से पुलिस स्टेशनों की कार्य प्रणाली को दुरुस्त करने और मुस्तैद रहने को कहा है। देखते हैं उनके निर्देश का कितना असर होता है।
आखिर में एक बात और। पुलिस की नाकामी एक वजह ये भी मानी जाती है कि आज के दौर में सामान्य कानून-व्यवस्था बनाने से लेकर वीआईपी विजिट, अतिक्रमण हटाने और कोर्ट की बढ़ती पेशियों इत्यादि अनेकानेक कामों के बोझ तले पुलिस पूरी तरह से पिस रही है। पुराने मामलों की जांच पूरी हो ही नहीं पाती कि नई वारदातें हो जाती हैं। जरूरत के मुताबिक नफरी न होने के कारण पुलिस कर्मियों को छुट्टी नहीं मिलती और वे धीरे-धीरे नौकरी के प्रति लापरवाह व उदासीन होते जा रहे हैं। अगर इस प्रकार की मनोवृत्ति बढ़ रही है तो यह बेहद घातक है। इस पर सरकार को गौर करना ही होगा। 

-तेजवानी गिरधर
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शुक्रवार, 22 जून 2012

आईपीएस ने पोत दी पुलिस के चेहरे पर कालिख

अब तक तो चोर और उठाईगिरे ही आए दिन वारदातों को अंजाम देकर पुलिस के चेहरे पर कालिख पोत रहे थे, मगर अब एक आईपीएस अफसर ने ही यह काम अंजाम दे दिया है। अपने रीडर रामगंज थाने में एएसआई प्रेमसिंह के हाथों घूस मंगवाने के आरोप में गिरफ्तार आईपीएस अफसर अजय सिंह को घर भरने की इतनी जल्दी थी कि नौकरी की शुरुआत में ही लंबे हाथ मारना शुरू कर दिया। अफसोनाक बात ये है कि उनकी कारगुजारियों की चर्चाएं बाजार में तो आम थीं, मगर अजमेर के पुलिस कप्तान राजेश मीणा ने आंखें मूंद रखी थीं। परिणाम ये रहा कि पाप का घड़ा जल्द ही फूट गया। आश्चर्य तो इस बात का है कि एक आईपीएस के मामले में एसीडी ने इतनी मुस्तैदी कैसे दिखाई। बेशक इसके लिए वह बधाई की पात्र है।
हालांकि अजय सिंह रिश्वत के केवल एक ही मामले में पकड़े गए हैं, मगर सरकार ठीक से विधिवत जांच करवाए तो पता लग सकता है कि ऐसे ही कितने और मामलों में वे तोड़बट्टा कर रहे थे। जानकारी के अनुसार आईपीएस अजयसिंह जिस मार्स बिल्ड होम एंड डवलपर्स की मल्टीलेवल मार्केटिंग कंपनी की जांच कर रहे थे, उसमें आरोपियों के साथ-साथ गेनर्स पर भी नजर रखे हुए थे। उनका इतना खौफ था कि कई गेनर्स अंडरग्राउंड हो गए कि कहीं उन्हें भी झूठा न फंसा दिया जाए। जाहिर सी बात है कि उनसे भी तोड़बट्टे की बातें चल रही होगी। बेहतर तो यही होगा कि केवल रिश्वत के एक ही मामले तक सीमित न रह कर उनके पास चल रही सभी जांचों की भी पड़ताल करवाई जाए। वरना इन आईपीएस अफसर ने तो ऐसी कालिख पोती है, जिसे साफ करना आसान काम नहीं होगा।
आईपीएस अजय सिंह कितने बेखौफ थे, इसका अंदाजा इसी बात से हो जाता है कि वे अपने भाई हेमंत कुमार के साथ जिस गाडी में जाते हुए पकड़े गए, उसमें अवैध शराब की दो पेटियां व 47 हजार रुपए पाए गए। इस पर कानोता थाने में मामला दर्ज कर हेमंत कुमार को भी गिरफ्तार कर लिया गया।
ऐसा नहीं है कि अजय सिंह की वर्दी पर यह पहला दाग लगा है। इससे पहले भी वे विवादों में रहे हैं। जानकारी के अनुसार अलवर के शिवाजी पार्क थाने में वर्ष 2009 में एक युवती ने छेड़छाड़ व मारपीट का मामला दर्ज कराया था। जांच में अजयसिंह और उनके दोस्त का नाम भी सामने आया, लेकिन इस बीच अजय सिंह का आईपीएस में चयन होने के कारण मामले में एफआर लगा दी गई थी।
इसी प्रकार अजय सिंह को प्रोबेशन पीरियड के दौरान जोधपुर कमिश्नरेट से प्रशिक्षण पूरा होने से पहले ही हटाया गया था। गत वर्ष अप्रैल में झंवर में एसएचओ लगाया गया था, मगर वहां तीन माह पूरे होने से पहले ही ग्रामीणों की शिकायत पर हटा दिया गया। अजमेर में एलआईसी अधिकारी लक्ष्मण मीणा को आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोपी अधिकारी के बी चौधरी को वीआईपी ट्रीटमेंट देने का भी उन पर आरोप है। आरोप है कि उन्होंने अजमेर के कोटड़ा में जोधपुर के एक बुजुर्ग के भूखंड पर कब्जे के मामले में पीडि़त को एक लाख रुपए लेकर भूखंड छोडऩे केलिए धमकाया था। इसी प्रकार शांतिनगर के एक मकान को धोखाधड़ी से बेचने के मामले में जेल में रहते हुए एक आरोपी जुल्फिकार उर्फ जुल्फी पर बाहर से पावर आफ अटार्नी बनाने का गंभीर आरोप है। इसी प्रकार दहेज प्रताडऩा के एक मामले में हस्तक्षेप कर जबरन महिला थाने में मुकदमा दर्ज करवाया। उच्चधिकारियों की अनुमति के बिना ही कांस्टेबल राजाराम व जयपालसिंह को एसी का रिटर्न टिकिट देकर मुंबई में से दहेज प्रताडऩा के आरोपी रणजीतसिंह को गिरफ्तार करने भेज दिया। दोनों शातिर पुलिसकर्मियों ने मुंबई में बीयर बार, होटलों व बीच पर मौज-मस्ती कर मुकदमे से आरोपी और उसके परिवार के अन्य लोगों का नाम बाहर कराने के लिए लाखों की रिश्वत मांगी थी। बाद में आरोपी को अजमेर लाकर तीन दिनों तक एक होटल में बंधक बना कर रखा और पीडि़ता को पांच लाख रुपए दिलवा कर एक लाख रुपए कांस्टेबल ने वसूलेे। इसकी खबरें अखबारों में सुर्खियों में छपीं।
कुल मिला कर सच ये है कि पूरे पुलिस प्रशासन को उनकी करगुजारियों की जानकारी थी, मगर उसने आंखें मूूंद रखी थीं। अगर ऐसा नहीं है तो यह और भी दुर्भाग्यपूर्ण है। एक कहावत है न कि अफसर अफसर का मुंह सूंघता है। इस मामले में कदाचित ऐसा ही हो रहा था। वैसे भी आईएएस व आईपीएस लोबियों इतनी तगड़ी हैं कि एकाएक किसी आईएएस व आईपीएस के खिलाफ कार्यवाही नहीं होती। ये तो गनीमत है कि रिश्वत के ताजा मामले में पीडि़त ने एसीडी का दरवाजा खटखटाया और उसने भी पूरी मुस्तैदी के साथ कार्यवाही को अंजाम दिया, वरना अजय सिंह अब तक न जाने कितने और कारनामे करते। 

-तेजवानी गिरधर
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अब आप पर उम्मीदें टिकी हैं गालरिया साहब

यह एक सुखद बात है कि अजमेर नए जिला कलेक्टर वैभव गालरिया अजमेर जिले से सुपरिचित हैं, साथ ही वे स्वयं भी महसूस करते हैं कि उन्हें यहां काम करने में आसानी रहेगी। असल में वे यहां वर्ष 2001 में ब्यावर के उपखंड अधिकारी और वर्ष 2009 में राजस्थान लोक सेवा आयोग के सचिव रह चुके हैं। राष्ट्रीय झील संरक्षण परियोजना के निदेशक रहने के दौरान पुष्कर में झील संरक्षण का कामकाज भी देख चुके हैं। ऐसे में उम्मीद की जा सकती है कि वे अजमेर जिले की समस्याओं के समाधान व यहां के विकास के लिए गंभीरता दिखाएंगे। उनके लिए सुविधाजनक बात ये भी है कि अजमेर के संभागीय आयुक्त अतुल शर्मा भी अजमेर के हैं और उनकी अजमेर के प्रति गहरी रुचि है। यूं उम्मीद तो पूर्व कलेक्टर मंजू राजपाल से भी बहुत थी, मगर कुछ स्थानीय गंदी राजनीति के कारण और कुछ उनके अक्खड़पन की वजह से उनका कार्यकाल कुछ खास उपलब्धि वाला नहीं रहा। देखना ये होगा कि दोनों तालमेल बैठा कर तो राजनीतिक दखलंदाजी का उपयोग अजमेर के लिए कैसे कर पाते हैं।
गालरिया जी भलीभांति जानते होंगे कि यूं तो तीर्थराज पुष्कर व दरगाह ख्वाजा गरीब नवाज और किशनगढ़ की मार्बल मंडी के कारण अजमेर जिला अन्तरराष्ट�्रीय मानचित्र पर अंकित है, मगर आज भी प्रदेश के अन्य बड़े जिलों की तुलना में इसका उतना विकास नहीं हो पाया है, जितना की वक्त की रफ्तार के साथ होना चाहिए था। यूं तो मौटे तौर पर गालरिया जी को विकास से जुड़े मुद्दों की जानकारी होगी, फिर भी उनकी जानकारी के लिए यहां कुछ बिंदुओं पर चर्चा कर लेते हैं, जिन पर राजनीतिक दल व सामाजिक व स्वयंसेवी संस्थाएं भी दबाव बना सकती हैं।
1. हवाई अड्डा:-
पर्यटन की दृष्टि से विश्व मानचित्र पर अहम स्थान बना चुके अजमेर शहर के लिये यह विडम्बना की ही बात है कि यहां अभी तक हवाई अड्डा नहीं बन पाया है। किशनगढ़ में स्थान चिन्हित हो जाने के बावजूद चयनित भूमि के कानूनी विवाद में पड़ जाने के कारण यह कार्य फिर से अटक गया है। उम्मीद है कि गालरिया इस मसले का भी कोई वैकल्पिक हल निकलवाने में अपनी भूमिका का निर्वाह करेंगे।
2. बीसलपुर से नहीं बुझी अजमेर की प्यास:-
मूलत: अजमेर जिले के लिए ही बीसलपुर पेयजल योजना बनाई गई थी, जिसका उपयोग अब जयपुर सहित अन्य स्थानों के लिए भी किया जा रहा है। इसका परिणाम ये है कि अजमेर जिले के अनेक गांव अब भी फ्लोराइड युक्त पानी पीने को मजबूर हैं। पानी के कमी से अवरुद्ध औद्योगिक विकास कैसे हो, यह आज भी एक बड़ी समस्या है। ऐसे में पूर्व उप मंत्री ललित भाटी व पूर्व विधायक डा. श्रीगोपाल बाहेती चंबल का पानी लाए जाने पर लगातार दबाव बनाए हुए हैं। सुझाव ये है कि चंबल के सरप्लस पानी को भैंसरोडगढ़ या अन्य किसी उपयुक्त स्थल से अजमेर तक पहुंचाया जा सकता है। जानकारी है कि मुख्यमंत्री अशेाक गहलोत भी सिद्धांत: इससे सहमत हैं। अगर गालरिया जी प्रयास करें तो उनके लिए यह एक बड़ी उपलब्धि होगी। इससे न केवल पूरे जिले की प्यास बुझेगी, अपितु औद्योगिक विकास का रास्ता भी खुल जाएगा।
3. यातायात एक बड़ी समस्या:-
अजमेर की यातायात समस्या बहुत ही विकट है, जिससे एक लंबे अरसे से यहां के नागरिक पीडि़त हैं। अव्यवस्थित व अनियंत्रित यातायात को दुरुस्त करने के लिए यातायात मास्टर प्लान की जरूरत है। इसके लिए आनासागर चौपाटी से विश्राम स्थली या ग्लिट्ज तक फ्लाई ओवर बनाया जा सकता है, इससे वैशालीनगर रोड, फायसागर रोड पर यातायात का दबाव घटेगा। झील का संपूर्ण सौन्दर्य दिखाई देगा। उर्स मेले व पुष्कर मेले के दौरान बसों के आवागमन में सुविधा होगी और बी.के. कौल नगर, हरिभाऊ उपाध्याय नगर, फायसागर क्षेत्र के निवासियों को शास्त्रीनगर, सिविल लाइन्स, कलेक्टे्रट के लिए सिटी बस, पब्लिक ट्रांसपोर्ट सुविधा मिल सकेगी।
इसी प्रकरण से जुड़ा हुआ एक मुख्य बिंदु पार्किंग स्थलों के विकास करने का है। प्रयास किए जाएं तो इन स्थानों पर इनको विकसित किया जा सकता है:- 1. खाईलैण्ड मार्केट से लगी हुई नगर निगम की वह भूमि, जिस पर पूर्व में अग्नि शमन कार्यालय था, 2. नया बाजार में स्थित पशु चिकित्सालय की भूमि, जहां अंडर ग्राउण्ड पार्किंग संभव है, 3. मदार गेट स्थित गांधी भवन के पीछे स्कूल की भूमि, 4. कचहरी रोड स्थित जीआरपी/सीआरपी ग्राउण्ड, जहां अंडर ग्राउण्ड पार्किंग संभव है, 5. केसरगंज स्थित गोल चक्कर में अंडर ग्राउण्ड पार्किंग और 6. मोइनिया इस्लामिया स्कूल के ग्राउंड में अंडर ग्राउण्ड पार्किंग।
4. पुष्कर व आनासागर झील संरक्षण:-
तीर्थराज पुष्कर के पवित्र सरोवर और आनासागर झील के संरक्षण की हालत क्या है, यह गालरिया जी से छुपी हुई नहीं है। वे स्वयं झील संरक्षण के लिए हो रहे कार्य के प्रति असंतोष जाहिर कर चुके हैं। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि करोड़ों रुपए खर्च करके भी तीर्थराज पुष्कर में पवित्र स्नान के लिए कुंडों का ही सहारा लिया जा रहा है। इसी प्रकार आनासागर झील एक ऐतिहासिक धरोहर है। इसकी दुर्दशा से हर कोई वाकिफ है। प्रयास भी हुए हैं, मगर आज तक समुचित समाधान नहीं निकाला जा सका है।
4. विकास में बाधा बना हुआ है रेलवे:-
रेलवे को सदैव से अजमेर की धरोहर माना जाता रहा है, किन्तु रेलवे को स्वयं अभी यह बात साबित करनी शेष है। अजमेर शहर के लगभग एक तिहाई भू भाग पर रेल विभाग का अधिकार है। होना यह चाहिये था कि रेलवे के कुशल प्रबन्धन की बदौलत अजमेर का यह भाग अजमेर वासियों के लिये सुविधा का एक आधार बनता, मगर रेल विभाग ने कई स्थानों पर बैरिकेटिंग कर, रास्तों को रुकावट में बदल दिया है। शहर की विशेष भौगोलिक बनावट के कारण पूरे शहर को जोडऩे के लिये फिलहाल सिर्फ एक मार्ग स्टेशन रोड उपलब्ध है। इस मार्ग से यातायात का दबाव कम करने के लिये लम्बे समय से एक वैकल्पिक मार्ग की जरूरत महसूस की जाती रही है, मगर रेल विभाग के असहयोग के कारण ही यह मार्ग नहीं बन पा रहा है। प्रशासन अगर थोड़ा सा तालमेल करे तो रास्ता निकल सकता है। जहां तक स्टेशन रोड पर बने फुट ओवर ब्रिज का सवाल है, उसे हाल ही प्लेटफार्म से जोडऩे के निर्देश रेल राज्य मंत्री दे चुके हैं, मगर यह भी तभी होगा, जबकि प्रशासन रुचि दिखाए।
5. ठंडे बस्ते में पड़ी दरगाह विकास योजना:-
केन्द्र सरकार की पहल पर कुछ समय पूर्व दरगाह विकास के लिए 300 करोड़ रुपये की एक महत्वाकांक्षी परियोजना बनाई गई थी, मगर अजमेर से दिल्ली तक वाया जयपुर महज फाइलें ही आती-जाती रहीं। कई बैठकें भी हुईं, मगर वह मूर्त रूप नहीं ले सकी। हाल ही राज्य सरकार के मुख्य सचिव सी. के. मैथ्यू ने कहा था कि वह योजना अब भी अस्तित्व में है, मगर अमल करने में देरी हो रही है। गालरिया जी रुचि लें तो इस योजना के जरिए अजमेर का कायाकल्प हो सकता है।
6. औद्योगिक विकास:-
अजमेर में औद्योगिक विकास को नए आयाम देने के लिए स्पेशल इकोनोमिक जोन की जरूरत है। विशेष रूप से इन्फोर्मेशन टेक्नोलोजी का स्पेशल इकोनोमिक जोन बनाया जा सकता है। अजमेर के सांसद व केन्द्रीय संचार राज्य मंत्री सचिन पायलट इस दिशा में सतत प्रयत्नशील हैं। जिला प्रशासन को भी रुचि लेनी चाहिए। इसी प्रकार खनिज आधारित स्पेशल इकोनोमिक जोन भी बनाया जा सकता है। जिले में खनिज पर्याप्त मात्रा में मौजूद है। 7. पर्यटन विकास:-
जहां तक पर्यटन के विकास की बात है, यहां धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने की भरपूर गुुंजाइश है। धार्मिक पर्यटकों का अजमेर में ठहराव दो-तीन तक हो सके, इसके लिए यहां के ऐतिहासिक स्थलों को आकर्षक बनाए जाने की कार्ययोजना तैयार की जानी चाहिए। इसके लिए अजमेर के इतिहास व स्वतंत्रता संग्राम में अतुलनीय योगदान एवं भूमिका पर लाइट एण्ड साउंड शो तैयार किए जा सकते हैं। आनासागर की बारादरी, पृथ्वीराज स्मारक, और तीर्थराज पुष्कर में उनका प्रदर्शन हो सकता है। इसी प्रकार ढ़ाई दिन के झोंपड़े से तारागढ़ तथा ब्रह्म�ा मंदिर से सावित्री मंदिर पहाड़ी जैसे पर्यटन स्थल पर 'रोप-वे परियोजना भी बनाई जा सकती है। साथ ही पर्यटक बस, पर्यटक टैक्सियां आदि उपलब्ध कराने पर कार्य किया जाना चाहिए। 

-तेजवानी गिरधर
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