शुक्रवार, 29 जून 2012

नसीम अखतर के खाते में खास उपलब्धि दर्ज

गहलोत ने दिए सावित्री स्कूल को अधिग्रहित करने के निर्देश
अजमेर। अजमेर जिले के पुष्कर विधानसभा क्षेत्र की कांग्रेस विधायक और राज्य की शिक्षा राज्य मंत्री श्रीमती नसीम अख्तर के प्रयास आखिर रंग लाए। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अजमेर की सावित्री सीनियर सेकंडरी स्कूल को राज्य सरकार द्वारा अधिग्रहित करने की स्वीकृति प्रदान कर दी। नसीम अख्तर बधाई पात्र हैं। बधाई के पात्र नए जिला कलेक्टर वैभव गालरिया भी हैं, जिनके ताजा कार्यकाल के शुरू में ही एक ऐतिहासिक निर्णय हुआ है। अतिरिक्त जिला कलेक्टर मोहम्मद हनीफ स्वाभाविक रूप से शाबाशी के हकदार हैं, जिन्होंने स्कूल प्रशासक होने के नाते अपनी इच्छा शक्ति दिखाते हुए स्कूल को अधिग्रहीत करने का सटीक प्रस्ताव बना कर सरकार को भेजा। इसमें कोई दोराय नहीं कि स्कूल का वजूद बचाने की खातिर शहर कांग्रेस अध्यक्ष महेन्द्र सिंह रलावता, पूर्व विधायक डा. श्रीगोपाल बाहेती सहित अन्य सभी राजनीतिक नेताओं के साथ राजस्थान शिक्षक संघ राधाकृष्णन के प्रदेशाध्यक्ष विजय सोनी ने भी पूरा दबाव बनाया और मीडिया ने भी सामाजिक सरोकार के दिशा में सक्रिय भूमिका अदा की। उन सभी का भी शुक्रिया अदा किया जाना चाहिए, जिन्होंने प्रत्यक्ष या अप्रत्क्ष रूप से इस मुहिम में सहयोग किया। और सबसे ज्यादा बधाई की पात्र हैं, वे दो हजार छात्राएं और उनके अभिभावक, जिनकी दुआओं ने असर दिखाया है।
बेशक अजमेर के अजमेर के तकरीबन सौ साल पुराने व प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान सावित्री कन्या सीनियर सेकंडरी स्कूल का वजूद कायम रहने से सभी अजमेरवासियों को खुशी होगी। यहां उल्लेखनीय है कि इस स्कूल सभी सुविधाओं से परिपूर्ण है। स्कूल के पास रसायन विज्ञान, वनस्पति विज्ञान, भौतिक विज्ञान एवं गृह विज्ञान की आधुनिक संसाधनों से सुसज्जित प्रयोगशालाओं सहित उच्च कोटि की अन्य सुविधाएं भी हैं। परिणाम की दृष्टि से भी स्कूल का बेहतरीन रिकार्ड रहा है। इस वर्ष बोर्ड की सभी परीक्षाओं में विद्यालय की छात्राओं ने जिला मेरिट में जगह बनाई है। स्कूल के खाते में तकरीबन 3 करोड़ से अधिक की राशि मौजूद है। इसके अलावा करोड़ों रुपए मूल्य के विद्यालयों के भवन, बस व अन्य चल-अचल संपत्ति मौजूद है। कुल मिला कर स्कूल में संसाधन पूरे हैं। इसे चलाने के लिए सरकार को अपने स्तर पर बस स्टाफ की व्यवस्था करनी होगी। आज जब कि महिला शिक्षा पर सर्वाधिक जोर दिया जा रहा है, ऐसे बेहतरीन स्कूल को बचा कर सरकार ने अपने दायित्व का भलीभांति निर्वहन किया है। उम्मीद की जानी चाहिए कि जल्द ही स्कूल में स्टाफ की तैनाती कर इसे नए शिक्षण सत्र में अध्ययन-अध्यापन कार्य सुचारू रूप से शुरू हो जाएगा।

-तेजवानी गिरधर
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tejwanig@gmail.com

बुधवार, 27 जून 2012

क्या सलावत पुष्कर से चुनाव की तैयारी कर रहे हैं?


भाजपा नेता सलावत खां की ओर से मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के बैनर तले तीन दिवसीय प्रशिक्षण शिविर आयोजित करने को जहां संघ की ओर से मुसलमानों को अपने साथ जोडऩे की कवायद माना जा रहा है, वहीं आयोजन के लिए पुष्कर का चयन करने को आयोजन संयोजक सलावत खान की पुष्कर विधानसभा सीट से चुनाव लडऩे की तैयारी के रूप में देखा जा रहा है।
तीर्थराज पुष्कर के होटल न्यू पार्क में आयोजित शिविर की महत्ता इसी से जाहिर हो जाती है कि इसमें राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के पूर्व सरसंघ चालक कु. सी. सुदर्शन व मंच के मार्गदर्शक इंद्रेश कुमार ने अपनी मौजूदगी दर्ज कराई, वहीं देशभर से करीब डेढ़ सौ प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इंद्रेश कुमार वे ही हैं, जो कि मुसलमानों को संघ के जोडऩे की कार्ययोजना के थिंक टैंक हैं और जिन पर दरगाह बम ब्लास्ट मामले में शामिल होने के आरोप लग चुके हैं। जाहिर सी बात है शिविर आयोजित करवाने में उनकी अहम भूमिका रही है और सुदर्शन को लाने का श्रेय भी उन्हीं के खाते में जाता है। शिविर के लिए पुष्कर का चयन उन्हीं की सोची समझी रणनीति नजर आती है। मगर चूंकि शिविर के संयोजक की भूमिका सलावत खान ने अदा की, इस कारण राजनीतिक हलकों में यही माना जा रहा है कि वे पुष्कर से चुनाव लडऩे की योजना बना रहे हैं।
आइये, जरा ये समझ लें कि पुष्कर से चुनाव लडऩे की उनकी रणनीति का गणित क्या हो सकता है। उल्लेखनीय है कि सलावत की पुष्कर सीट पर नजर काफी समय से रही है। हिंदुओं के सर्वोच्च तीर्थस्थल को अपने आंचल में समेटे इस सीट से पूर्व में भी पूर्व मंत्री स्वर्गीय रमजान खान विधायक रह चुके हैं। पूर्व में भाजपा रमजान के पुष्कर से जीतने को इस रूप में भुना चुकी है कि मुसलमानों की भाजपा से दूरी की मान्यता गलतफहमी है। अकेले यही गिनाने के लिए कि भाजपा के पास भी अच्छे मुस्लिम नेता हैं, रमजान खां को मंत्री भी बनाया गया। रमजान खान यहां से 1985, 1990 व 1998 में चुनाव जीते थे। 1993 में उन्हें विष्णु मोदी ने और उसके बाद 2003 में डा. श्रीगोपाल बाहेती ने परास्त किया। मोदी से हारने की वजह ये रही कि उनका चुनाव मैनेजमेंट बहुत तगड़ा था। हार जीत का अंतर कुछ अधिक नहीं रहा। मोदी (34,747) ने रमजान खां (31,734) को मात्र 3 हजार 13 मतों से पराजित किया था।
डा. बाहेती से रमजान इस कारण हारे कि भाजपा नेता भंवर सिंह पलाड़ा ने निर्दलीय रूप से मैदान में रह कर तकरीबन तीस हजार वोटों की सेंध मार दी थी। बाहेती (40,833) ने रमजान खां (33,735) को 7 हजार 98 मतों से पराजित किया था, जबकि पलाड़ा ने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में 29 हजार 630 वोट लिए थे। स्पष्ट है कि रमजान केवल पलाड़ा के मैदान में रहने के कारण हारे थे। यदि पलाड़ा नहीं होते तो रमजान को हराना कत्तई नामुमकिन था।
कुल मिला कर यह सीट भाजपा मुस्लिम प्रत्याशी के लिए काफी मुफीद रहती है। एक तो उसे मुस्लिमों के पूरे वोट मिलने की उम्मीद होती है, दूसरा भाजपा व हिंदू मानसिकता के वोट भी स्वाभाविक रूप से मिल जाते हैं। इसी गणित के तहत रमजान तीन बार विधायक रहे और दो बार निकटतम प्रतिद्वंद्वी। हालांकि एक फैक्टर ये भी है कि रमजान पुष्कर के लोकप्रिय नेता थे। गांव-गांव ढ़ाणी-ढ़ाणी उनकी जबदस्त पकड़ थी। जहां तक कांग्रेस का सवाल है, उसके मुस्लिम प्रत्याशी के लिए यह सीट उपयुक्त नहीं है, फिर भी पिछली बार श्रीमती नसीम अख्तर इंसाफ (42 हजार 881) ने भाजपा प्रत्याशी पलाड़ा (36 हजार 347) को 6 हजार 534 मतों से हरा दिया। वजह ये रही कि भाजपा के बागी श्रवणसिंह रावत 27 हजार 612 वोट खा गए।
बहरहाल समझा जाता है कि सलावत खान ने बहुत सोची समझी रणनीति के तहत ही मुस्लिम राष्ट्रीय मंच का तीन दिवसीय प्रशिक्षण शिविर आयोजित करवाया। अब उनके लिए भाजपा की टिकट की दावेदारी आसान हो जाएगी। हालांकि पलाड़ा की दावेदारी अब भी मजबूत है, मगर उनके पास केकड़ी व अजमेर का भी विकल्प है। इस विधानसभा क्षेत्र में रावतों की बहुलता के कारण शहर भाजपा अध्यक्ष व पूर्व सांसद प्रो. रासासिंह रावत भी संभावित दावेदारों की गिनती में आते हैं। इसी प्रकार नगर निगम के उप महापौर सोमरत्न आर्य भी यहां अपनी जमीन तलाश रहे हैं।

-तेजवानी गिरधर
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क्यों नहीं हो रहा कृषि उपज मंडी के अध्यक्ष का चुनाव?

अजमेर की कृषि उपज मंडी समिति के अध्यक्ष श्री सिरोनारायण मीणा के निधन को सात माह से भी ज्यादा का वक्त बीत चुका है, मगर उनके स्थान पर नए अध्यक्ष का चुनाव नहीं कराया जा रहा है। समिति की उपाध्यक्ष श्रीमती शहनाज ही कार्यवाहक अध्यक्ष के रूप में काबिज हैं।
नियमानुसार किसी भी सदस्य अथवा पदाधिकारी का निधन होने पर उपचुनाव छह माह के भीतर हो जाना चाहिए। वह समयावधि भी बीत चुकी है, मगर कृषि विपणन निदेशालय ने चुप्पी साध रखी है। कायदे से मीणा के स्थान पर नए अध्यक्ष का चुनाव कराने से पहले उस वार्ड नंबर का उपचुनाव कराया जाना जरूरी है, जहां से कि पूर्व अध्यक्ष सिरोनारायण निर्वाचित हुए थे। यह वार्ड अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित है और अध्यक्ष का पद भी अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है।
ज्ञातव्य है कि मीणा ने गत 29 सितंबर 2011 को अध्यक्ष पद संभाला था, मगर दुर्भाग्य से 6 नवंबर 2011 को उनका निधन हो गया। इस पर 18 नवंबर को उनके स्थान पर उपाध्यक्ष श्रीमती शहनाज ने कार्यवाहक अध्यक्ष के रूप में पदभार संभाल लिया। मंडी प्रशासन ने 1 दिसंबर 2011 को निदेशालय को पत्र लिख कर अध्यक्ष मीणा के निधन की जानकारी देते हुए मार्गदर्शन मांगा। इस पर 13 दिसंबर को संयुक्त निदेशक ने मंडी सचिव को पत्र लिख कर कहा कि कृषक निर्वाचन क्षेत्र के रिक्त हुए पद का उपचुनाव संपन्न होने के बाद ही अध्यक्ष का चुनाव किया जाएगा। अत: उक्त पद के उपचुनाव का प्रस्ताव बना कर भेजा जाए। मंडी प्रशासन ने इस पर कोई कार्यवाही नहीं की। इस पर मंडी समिति की 17 जनवरी 2012 को हुई आम बैठक में बाकायदा प्रस्ताव पारित किया गया कि वार्ड संख्या दो के उपचुनाव के लिए प्रस्ताव निदेशलय को भेजा जाए। इसके बाद भी जब प्रस्ताव नहीं भेजा गया तो यही समझा जा रहा था कि कार्यवाहक अध्यक्ष श्रीमती शहनाज के दबाव की वजह से मंडी सचिव इसमें रुचि नहीं ले रहे हैं। रुचि न लेने की वजह ये बताई जा रही थी कि अगर चुनाव हुए तो स्वाभाविक रूप से दुबारा जो अध्यक्ष बनेगा वह अनुसूचित जनजाति का ही होगा, वह चाहे वार्ड दो से चुना गया सदस्य हो अथवा अनुसूचित जनजाति की हगामी देवी। उल्लेखनीय है कि अनुसूचित जनजाति के लिए एक ही वार्ड नंबर दो आरक्षित है, जबकि हगामी सामान्य वार्ड से जीत कर आई हैं। चुनाव होने पर शहनाज को अध्यक्ष पद छोडऩा पड़ता, इस कारण यही माना गया कि उनकी प्रस्ताव भेजने में रुचि नहीं है, लेकिन बाद में प्रस्ताव भेज दिया गया तो यह संशय समाप्त हो गया। अब स्थिति ये है कि उस प्रस्ताव को निदेशालय ने दबा रखा है। इसमें शहनाज का कोई दबाव है अथवा राज्य स्तरीय राजनीति की दखलंदाजी, कुछ नहीं कहा जा सकता। कुल मिला कर उप चुनाव समय पर न होने से जहां नियम की अवहेलना हो रही है, वहीं मंडी का कामकाज भी प्रभावित हो रहा है। 

-तेजवानी गिरधर
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सोमवार, 25 जून 2012

ये मुबारक नहीं, नसीम व इंसाफ की प्रतिष्ठा का सवाल है

कांग्रेस अल्पसंख्यक विभाग के शहर जिलाध्यक्ष पद पर मुबारक खान की नियुक्ति पर हो रहे विवाद से मुबारक की प्रतिष्ठा पर असर पड़े न पड़े, उनके भाई इंसाफ अली व भाभी शिक्षा राज्य मंत्री श्रीमती नसीम अख्तर इंसाफ पर जरूर पड़ रहा है। जहां तक मुबारक का सवाल है, वे तो अब तक निर्विवाद थे ही, इंसाफ व नसीम भी अल्पसंख्यकों में निर्विवाद नेता के रूप में स्थापित थे। अगर कहीं विरोध था भी तो वह मुखर नहीं था। किसी ने न तो अब तक हिम्मत जुटाई थी और न ही किसी को विवाद करने का मौका मिला था। लेकिन मुबारक के नियुक्त होते ही यह उजागर हो गया है कि कांग्रेस में कई अल्पसंख्यक उनके खिलाफ हैं।
असल में जहां तक मुबारक की नियुक्ति का सवाल है तो यह साफ जाहिर है कि वे अपने भाई-भाभी के दम पर ही अध्यक्ष बन कर आए हैं। ऐसे में विरोध हो रहा है तो यह केवल उनका ही नहीं, बल्कि नसीम व इंसाफ का भी कहलाएगा। अगर वे अपने बूते ही बन कर आए हैं तो भी यही माना जाएगा कि वे भाई-भाभी की सिफारिश पर बने हैं। उनका विरोध करने वाले साफ तौर पर कह रहे हैं कि मुबारक की नियुक्ति व्यक्तिगत संबंधों को तरजीह देकर की गई है। यह उन कार्यकर्ताओं के साथ कुठाराघात है, जो बरसों से कांग्रेस के अल्पसंख्यक वर्ग के साथ सच्चे सिपाही की तरह काम कर रहे हैं।
शहर कांग्रेस उत्तर ब्लाक ए के अध्यक्ष आरिफ हुसैन, शहर कांग्रेस के सचिव मुख्तार अहमद नवाब, एनएसयूआई अध्यक्ष वाजिद खान, युवक कांग्रेस उत्तर विधानसभा अध्यक्ष सैयद अहसान यासिर चिश्ती, अल्पसंख्यक विभाग के संयोजक एसएम अकबर, सैयद गुलाम मोइनुद्दीन, गुलाम हुसैन तथा जहीर कुरैशी ने पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी, केंद्रीय संचार राज्यमंत्री सचिन पायलट तथा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डा. चंद्रभान को शिकायत की है और विभाग के राष्ट्रीय अध्यक्ष इमरान किदवई आरोप लगाया कि इस तरह नियुक्ति देकर वे पार्टी को कमजोर करने की कार्रवाई कर रहे हैं। उन्होंने किदवई को पद से हटाने की मांग के साथ ही मुबारक की नियुक्ति को भी निरस्त करने की मांग की है। उनका कहना है कि मुबारक देहात से जुड़े रहे हैं, इनके भाई इंसाफ अली देहात कांग्रेस में उपाध्यक्ष हैं और भाभी नसीम अख्तर इंसाफ शिक्षा राज्यमंत्री हैं। ऐसे में मुबारक को शहर में नियुक्ति दे दी गई, जबकि संगठन से जुड़े कई कर्मठ कार्यकर्ताओं की अनदेखी कर दी गई है।
अव्वल तो मुबारक को यह पद हासिल करने की जरूरत ही नहीं थी। उनकी चवन्नी पहले से ही चल रही थी। यह पद पा कर अनावश्यक रूप से विवाद में आ गए। हालांकि वे केवल अपने भाई-भाभी की वजह से राजनीति में वजूद नहीं रखते, अपितु खुद भी लंबे समय से सक्रिय राजनीति में हैं, मगर इस नियुक्ति से खुद तो विवाद में आए ही, अपने निर्विवाद भाई-भाभी पर भी एक बारगी भाई-भतीजावाद का आरोप लगवा बैठे। रहा सवाल इस पद पर नियुक्ति का तो यह तो वे ही जान सकते हैं कि इसके पीछे का गणित और भावी रणनीति क्या है?
बहरहाल, अब जब कि नियुक्ति हो गई है तो उस पर कायम रहना भी जरूरी है, क्योंकि उनकी नियुक्ति का विरोध हो रहा है और उसे उनके भाई-भाभी से भी जोड़ा जा रहा है। यानि कि उनकी प्रतिष्ठा भी जुड़ गई है। जाहिर सी बात है कि अब वे भी मुबारक को पद पर कायम रखवाने के लिए पूरा जोर लगाएंगे। खुद मुबारक को भी अपना दमखम दिखाना होगा। नियुक्ति का विरोध होते ही उनके स्वागत में जनसेवा समिति की ओर से आयोजित समारोह को इसी कड़ी से जोड़ कर देखा जा सकता है। वैसे एक बात तो है मुबारक की नियुक्ति पर विरोध के बहाने से ही सही, इंसाफ अली व नसीम अखतर को तो यह तो पता लग गया कि कौन-कौन उनके खिलाफ हैं।


-तेजवानी गिरधर
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गालरिया साहब, ऐसी ही सख्ती की दरकार है मातहतों को

नवनियुक्त जिला कलेक्टर वैभव गालरिया ने आते ही अपने मातहत अफसरों पर सख्ती दिखा कर यह संकेत दे दिया है कि वे सरकारी योजनाओं व कार्यक्रमों में किसी प्रकार की कोताही बर्दाश्त नही करेंगे। सबसे पहले उन्होंने नंबर लिया राष्ट्रीय झील संरक्षण परियोजना के तहत निर्माणाधीन पुष्कर (कपिल कुंड) फीडर निर्माण कार्य का। चूंकि वे इस परियोजना के डायरेक्टर रह चुके हैं, इस कारण उन्हें पहले से जानकारी थी कि यहां संबंधित अफसरशाही पूरी लापरवाही बरत रही है, इस कारण भिड़ते ही उनका नंबर लिया। अजमेर वासियों के लिए यह एक सुखद संकेत है।
सब जानते हैं कि पुष्कर फीडर व खरेखड़ी फीडर का काम कितना महत्वपूर्ण है। यह काम पवित्र पुष्कर सरोवर के वजूद को कायम रखने के लिए हुए अब तक हुए और हो रहे कामों में से एक है। इसके बावजूद सरोवर में यदि कुंड बना कर स्नान की व्यवस्था करनी पड़ रही है, तो इसका मतलब यह है कि जितनी भी योजनाएं बनीं और जितना भी पैसा आया, वह सब पानी में चला गया। कदाचित इसी वजह से आमजन में यह भावना भी घर कर गई है कि सरकार हिंदू तीर्थस्थल के रखरखाव पर तो ध्यान देती नहीं और तुष्टिकरण के तहत दरगाह के विकास और उर्स मेले पर पूरा ध्यान देती है।
ज्ञातव्य है कि गालरिया ने परियोजना की नोडल एजेंसी यूआईटी सचिव पुष्पा सत्यानी, एईएन केदार शर्मा व ठेकेदार के प्रतिनिधियों की जम कर क्लास ली अैर यूआईटी सचिव को ठेकेदार द्वारा फीडर निर्माण की गति तेज नहीं करने पर ठेका निरस्त कर यूआईटी स्तर पर फीडर का काम पूरा करने के निर्देश दिए हैं। इसी प्रकार खरेखड़ी फीडर से सटी नाग पहाड़ी क्षेत्र में परियोजना के तहत मनमाने तरीके से बनाए गए गैबियन स्ट्रक्चर की दीवारों को तोड़कर पाइप नहीं लगाने पर पंचकुंड नर्सरी के वनपाल को फटकार लगाई तथा डीएफओ को तत्काल प्रभाव से ऐसे गैबियन स्ट्रक्चर को चिह्नित कर पाइप लगाने के निर्देश दिए जहां गैबियन की वजह से पहाड़ी से बहकर आने वाला बरसाती पानी रुक रहा है। साथ ही सरोवर किनारे व फीडरों में से जमा मिट्टी हटाने के निर्देश दिए। दौरे के दौरान श्री ब्रह्मा गायत्री तीर्थ विकास संस्थान के अध्यक्ष राकेश पाराशर, सचिव अरुण पाराशर, एनएलसीपी की जिला निगरानी समिति के सदस्य गोविंद पाराशर, समाजसेवी जगदीश कुर्डिया आदि ने ब्रह्मा मंदिर में चढ़ावे की राशि का दुरुपयोग रोकने, उर्स की तर्ज पर पुष्कर मेले के लिए अतिरिक्त बजट दिलाने, खरेखड़ी में अरावली पहाड़ी में हो रहे अवैध खनन पर प्रतिबंध लगाने, बूढ़ा पुष्कर-बाड़ी घाटी तक बाईपास का निर्माण मेले से पहले कराने सहित अनेक सुझाव दिए। उम्मीद की जानी चाहिए कि गालरिया तीर्थराज पुष्कर की धार्मिक व ऐतिहासिक महत्ता को ध्यान में रखते हुए इन मामलों में भी सख्ती बरतेंगे।
सब जानते हैं कि पुष्कर के सरकारी अस्पताल के क्या हाल हैं और उसने कितना नाम कमाया है। गालरिया ने वहां का भी औचक दौरा किया, मगर उसकी मुखबिरी हो जाने के कारण चिकित्सा स्टाफ पूरी तरह से मुस्तैद हो गया। उन्होंने सारी व्यवस्थाएं ऐसी दुरुस्त कर दीं मानों वे सदैव रहती हों। इसी कारण गालरिया को कोई खास कमी नजर नहीं आई। कैसी विडंबना है कि चिकित्साकर्मी मुख्य गेट पर कलेक्टर के स्वागत के लिए हाथों में माला लेकर ऐसे खड़े हो गए, मानों वहां कलेक्टर का अभिनंदन समारोह आयोजित किया गया हो। अच्छा हुआ कि उन्होंने मालाएं नहीं पहनीं।
यदि यही रवैया उन्होंने रखा तो कोई आश्चर्य नहीं कि बदहाल आनासागर झील संरक्षण, कछुआ छाप सीवरेज सिस्टम, दुर्घटना जोन बना गौरव पथ सहित बिगड़ी यातायात व्यवस्था को अपनी नियती समझ चुके अजमेर वासियों को अहसास हो जाएगा कि अदिति मेहता जैसे और अफसर भी हैं आईएएस जमात में। 

-तेजवानी गिरधर
7742067000
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