सोमवार, 30 जुलाई 2012

सवाल तो वाजिब ही उठाया था अनिता भदेल ने


अजमेर। नगर सुधार न्यास के तत्वावधान में आयोजित हॉकी खेल मैदान व स्टेडियम लोकार्पण समारोह में जिन सवालों को लेकर अजमेर दक्षिण की भाजपा विधायक श्रीमती अनिता भदेल व राज्य के स्वायत्त शासन मंत्री शांति धारीवाल के बीच टकराव हुआ, वे थे तो वाजिब ही, ये दीगर बात है कि धारीवाल से जवाब देते नहीं बना और उन्होंने पलट कर अपने भाषण में मर्यादा को ताक पर रख कर प्रतिकूल टिप्पणी कर दी।
हुआ दरअसल ये कि कार्यक्रम के दौरान श्रीमती अनिता भदेल ने अपने भाषण में हॉकी एस्ट्रोटर्फ की हकीकत बयां की और यह पूछा कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत द्वारा वर्ष 2010-11 में हॉकी एस्ट्रोटर्फ के निर्माण हेतु 2 करोड़ रुपये की वित्तीय स्वीकृतियां व उस राशि से किये गये कार्यों को सार्वजनिक किया जाये। जाहिर सी बात है खुशनुमा माहौल में इस प्रकार का घोचा धारीवाल को सहन नहीं हुआ और उन्होंने अपनी बड़बोलेपन की आदत के मुताबिक प्रतिकूल टिप्पणी कर हिसाब-किताब पूरा करने की कोशिश की। यानि की आग में और घी डालने का काम कर दिया। इस पर अनिता भदेल को भी तरारा आ  गया और धारीवाल द्वारा किये गये आचरण को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए चुनौती दे डाली है कि यदि शांति धारीवाल सही हैं तो साबित करके बतायें कि वर्ष 2010-11 से अब तक अजमेर हॉकी एस्ट्रोटर्फ निर्माण हेतु किन-किन तारीखों को प्रशासनिक व वितीय स्वीकृतियां जारी हुई तथा किन-किन मदों पर खर्च की गयी। एस्ट्रोट्रर्फ निर्माण की सम्पूर्ण जानकारी देते हुए विधायक श्रीमती अनिता भदेल ने बताया कि केन्द्र की एनडीए सरकार में खेल मंत्री रहे विक्रम वर्मा द्वारा उपरोक्त कार्य हेतु राशि स्वीकृत की गई थी तथा राज्य सरकार की अनुदान राशि के रूप में 53 लाख रुपये तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा जी द्वारा सन 2008 में दिये गये थे, जिसकी प्रतिलिपियां प्रेस वार्ता के दौरान भी दी गई थीं। वस्तुस्थिति यह है कि चन्द्रवरदाई खेल स्टेडियम भारतीय जनता पार्टी शासनकाल में तत्कालीन न्यास अध्यक्ष ओंकार सिंह लखावत के मस्तिष्क की परिकल्पना थी। उसके पश्चात भा.ज.पा. को जब-जब शासन का अवसर प्राप्त हुआ विकास कार्य कराया। कांग्रेस सरकार ने सिर्फ वाहवाही लूटने का कार्य किया है। इतना ही नहीं कार्यक्रम के दौरान धारीवाल की टिप्पणी के बाद श्रीमती अनिता भदेल और भाजपा जिलाध्यक्ष रासासिंह रावत ने शेष कार्यक्रम का बहिष्कार कर दिया।
इसमें कोई दोराय नहीं कि अनिता भदेल की बातों में दम है। वे बाकायदा तथ्यात्मक आरोप लगा रही हैं। होना यह चाहिए था कि धारीवाल को ठीक ठीक ब्यौरा देना चाहिए था कि किस-किस के शासनकाल में क्या-क्या हुआ। यदि वे ऐसा करते तो उनकी यह सदाशयता एप्रीशिएट की जाती। इसमें कोई बुराई भी नहीं है। मगर वे तो अनिता के सवाल पर उखड़ गए। ऐसे में भाजपा को उन पर हमला करने का मौका मिल गया।
वैसे एक बात है, हालात ठीक इसके विपरीत होते तो धारीवाल की जगह भाजपा के कोई मंत्री बौखलाते। ऐसा अमूमन होता है। काम किसी पार्टी की सरकार में शुरू होता है और पूरा किसी और पार्टी की सरकार के वक्त। होता ये है कि काम पूरा करने वाली पार्टी के नेता वाहवाही लूटते हैं, तो काम शुरू करने वाली पार्टी वालों को मिर्ची लगती है। ऐसा भी तो हो सकता है कि कोई काम कांग्रेस के राज में शुरू हुआ हो और उसका उद्घाटन भाजपा के राज में। मगर हमारे राजनेता इतने उदार हृदय नहीं हैं कि इसे सहजता से लें। श्रेय लेने की होड़ लगी रहती है। और उसी का परिणाम है कि इस प्रकार टकराव हो जाता है। खासकर जब चुनाव में ज्यादा समय न बचा हो तो राजनीति को गरमाने के लिए ऐसे टकराव जानबूझ कर भी किए जाते हैं।
कुल मिला कर जैसे ही मौका लगा अनिता भदेल ने दाव चल दिया। वैसे इस प्रकार का काम अमूमन अजमेर उत्तर के भाजपा विधायक प्रो. वासुदेव देवनानी ज्यादा किया करते हैं। अब चूंकि देवनानी अजमेर से बाहर थे तो अनिता भदेल ने कमी पूरी कर दी।
-तेजवानी गिरधर

रविवार, 29 जुलाई 2012

गहलोतजी, विकास को तरसते अजमेर पर ध्यान दीजिए


अजमेर। महान सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती की दरगाह व तीर्थराज पुष्कर और किशनगढ़ की मार्बल मंडी के कारण यूं तो अजमेर जिला अन्तरराष्टï्रीय मानचित्र पर मौजूद है, मगर आज भी प्रदेश के अन्य बड़े जिलों की तुलना में इसका उतना विकास नहीं हो पाया है, जितना की वक्त की रफ्तार के साथ होना चाहिए था। अकेले पानी की कमी को छोड़ कर किसी भी नजरिये से अजमेर का गौरव कम नहीं रहा है। चाहे स्वाधीनता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने का मुद्दा हो या यहां की सांस्कृतिक विरासत की पृष्ठभूमि, हर क्षेत्र में अजमेर का अपना विशिष्ट स्थान रहा है। दुर्भाग्य से आजादी के बाद राजस्थान राज्य में विलय के बाद कमजोर राजनीतिक नेतृत्व के कारण यह लगातार पिछड़ता गया। दुर्भाग्य से अजमेर शहर की दोनों सीटों पर भाजपा के विधायक हैं, इस कारण अजमेर वासियों का सरकार में प्रतिनिधित्व करने वाला कोई नहीं है।
आइये, समझें कि कैसे छू सकता है अजमेर जिला विकास के आयाम:-
एक लम्बे समय से यहां हवाई अड्ïडे के निर्माण की मांग को देखते हुए मौजूदा प्रदेश कांग्रेस सरकार ने लोकसभा चुनाव से ठीक पहले केन्द्र सरकार के साथ एमओयू पर हस्ताक्षर तो करवा लिए, मगर मगर आज भी उस दिशा में प्रगति की रफ्तार कम ही है। केन्द्रीय संचार राज्य मंत्री सचिन पायलट विशेष प्रयास कर तो रहे हैं, फिर भी जब तक राज्य सरकार पूरी रुचि नहीं लेगी, वर्षों पुराना सपना साकार नहीं हो पाएगा। अगर यहां हवाई अड्डा बना तो न केवल यहां पर्यटन का विकास होगा और दरगाह व पुष्कर आने वाले पर्यटकों व श्रद्धालुओं को सुविधा होगी, अपितु किशनगढ़ की मार्बल मंडी में भी चार चांद लग जाएंगे।
ऐतिहासिक अजमेर शहर में जहां तक पर्यटन के विकास की बात है, यहां धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने की भरपूर गुुंजाइश है। धार्मिक पर्यटकों का अजमेर में ठहराव दो-तीन तक हो सके, इसके लिए यहां के ऐतिहासिक स्थलों को आकर्षक बनाए जाने की कार्ययोजना तैयार की जानी चाहिए। इसके लिए अजमेर के इतिहास व स्वतंत्रता संग्राम में अतुलनीय योगदान एवं भूमिका पर लाइट एण्ड साउंड शो तैयार किए जा सकते हैं। आनासागर की बारादरी, पृथ्वीराज स्मारक, और तीर्थराज पुष्कर में उनका प्रदर्शन हो सकता है। इसी प्रकार ढ़ाई दिन के झोंपड़े से तारागढ़ तथा ब्रह्मïा मंदिर से सावित्री मंदिर पहाड़ी जैसे पर्यटन स्थल पर 'रोप-वेÓ परियोजना भी बनाई जा सकती है। साथ ही पर्यटक बस, पर्यटक टैक्सियां आदि उपलब्ध कराने पर कार्य किया जाना चाहिए। पर्यटक यहां आ कर एक-दो दिन का ठहराव करें, इसके लिए जरूरी है कि सरकार होटल, लॉज, रेस्टोरेन्ट इत्यादि लगाने वाले उद्यमियों को विशेष सुविधाएं व कर राहत प्रदान कर उन्हें आकर्षित व प्रोत्साहित करने की दिशा में कार्ययोजना तैयार करे।
सब जानते हैं कि अजमेर के विकास में पानी की कमी बड़ी रुकावट शुरू से रही है। हालांकि बीसलपुर योजना से पेयजल की उपलब्धता हुई है, मगर औद्योगिक आवश्यकताओं के लिए बीसलपुर पर्याप्त नहीं है। जयपुर को भी पीने का पानी दिए जाने के बाद यहां पिछली गर्मी में कितनी किल्लत हुई थी, उसकी कल्पना करते ही मन सिहर उठता है। एक बार पूर्व उप मंत्री ललित भाटी ने यह तथ्य उजागर किया था कि मध्यप्रदेश से राजस्थान के हिस्से का पानी हमें अभी प्राप्त नहीं हो रहा है और वो 'सरप्लस वाटरÓ बगैर उपयोग के व्यर्थ बह रहा है। उन्होंने सुझाया था कि उस 'सरप्लस वाटरÓ  को लेकर अजमेर व अन्य शहरों के लिए पेयजल, कृषि एवं औद्योगिक उपयोग के लिए भैंसरोडगढ़ या अन्य किसी उपयुक्त स्थल से पानी अजमेर तक पहुंचाया जाकर उपलब्ध कराया जा सकता है। चंबल के पानी से भी कृषि, औद्योगिक एवं पेयजल की जरूरतें पूरी हो सकती हैं। भाटी के प्रयासों से इस दिशा में एक कदम के रूप में सर्वे भी हुआ, मगर वह आज फाइलों में दफन है। यदि उसे अमल में लाया जाए तो यहां औद्योगिक विकास के रास्ते खुल सकते हैं।
बड़े शहरों के मुकाबले अजमेर को खड़ा करने के लिए एक सुझाव यह भी है कि औद्योगिक विकास को नए आयाम देने के लिए स्पेशल इकॉनोमिक जोन (सेज) बनाया जा सकता है। विशेष रूप से इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी का स्पेशल इकोनोमिक जोन बनाने पर ध्यान दिया जाए तो  उसमें पानी की कमी भी बाधक नहीं होगी। जाहिर तौर पर शैक्षणिक स्तर ऊंचा होने से आई.टी. उद्योगों को प्रतिभावान युवा सहज उपलब्ध होंगे। वर्तमान में इन्फोसिस व विप्रो जैसी प्रतिष्ठित कंपनियों में अजमेर के सैकड़ों युवा कार्यरत हैं। इसके अतिरिक्त आई.टी. क्षेत्र की बड़ी कम्पनियों को अजमेर की ओर आकर्षित करने की कार्य योजना बनाई जा सकती है। इसी प्रकार खनिज आधारित स्पेशल इकोनोमिक जोन भी बनाया जा सकता है। जिले में खनिज पर्याप्त मात्रा में मौजूद है। वर्तमान में बीसलपुर बांध परियोजना में पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। मोटे तौर पर देखा जाए तो यहां पर्यटन और खनिज आधारित औद्यागिक विकास की विपुल संभानाएं हैं, जरूरत है तो सिर्फ उस पर ध्यान देने की। सुव्यवस्थित मास्टर प्लान बना कर उस पर काम किया जाए तो न केवल उससे प्रदेश सरकार का राजस्व बढ़ेगा, अपितु रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे।
अजमेर शहर की सबसे बड़ी समस्या है यातायात की। अव्यवस्थित व अनियंत्रित यातायात को दुरुस्त करने के लिए यातायात मास्टर प्लान की जरूरत है। हालांकि संभागीय आयुक्त अतुल शर्मा ने अजमेर वासी होने के कारण इस दिशा में रुचि ली है, लेकिन जब तक सरकार कोई स्पेशल पैकेज नहीं देगी, समस्या से निजात नहीं पाई जा सकती है। सरकार पहल करे तो आनासागर चौपाटी से विश्राम स्थली या ग्लिट्ज तक फ्लाई ओवर बनाया जा सकता है, इससे वैशालीनगर रोड, फायसागर रोड पर यातायात का दबाव घटेगा। झील का संपूर्ण सौन्दर्य दिखाई देगा। उर्स मेले व पुष्कर मेले के दौरान बसों के आवागमन में सुविधा होगी और बी.के. कौल नगर, हरिभाऊ उपाध्याय नगर, फायसागर क्षेत्र के निवासियों को शास्त्रीनगर, सिविल लाइन्स, कलेक्टे्रट के लिए सिटी बस, पब्लिक ट्रांसपोर्ट सुविधा मिल सकेगी।
उम्मीद है कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अजमेर आगमन पर इन सुझावों पर ध्यान देंगे।
-तेजवानी गिरधर

शनिवार, 28 जुलाई 2012

पार्षदों का केवल टांग अड़ाना तो ठीक नहीं

शहर में नए राशनकार्ड बनाने लिए फार्म वितरण एवं जमा करने के लिए लगाए जा रहे शिविर में जनता के नुमाइंदे कहाने वाले पार्षदों का  नदारद रहना बेहद अफसोसनाक है। विशेष रूप से जब इस बेहद कठिन और अहम कार्य में पार्षदों को अहमियत नहीं दिए जाने पर पार्षदों की ओर से जिला रसद अधिकारी हरिशंकर गोयल की खिंचाई की गई हो और उनके दबाव की वजह से ही जिला प्रशासन की ओर से उनकी भागीदारी को अहमियत दी गई हो तो शिविर में न मौजूद रहना यह संदेश देता है कि क्या वे केवल टांग अड़ाने की ही भूमिका अदा कर रहे हैं या फिर जनता के नुमाइंदे होने के नाते जनता से सीधे जुड़े शिविर में उनकी कोई रुचि नहीं है।
यहां उल्लेखनीय है कि पार्षदों की गैरमौजूदगी की वजह से लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। फार्म सत्यापित कराने के लिए लोग उनका इंतजार करते रहते हैं और आखिरकार निराश होकर अपने घर लौट जाते हैं। लोगों का आरोप है कि पहले फार्म लेने के लिए चक्कर लगाने पड़े थे, अब फार्म का सत्यापन करवाने के लिए पार्षदों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। ज्ञातव्य है कि रसद विभाग की लापरवाही, प्रगणकों की कमी और प्रगणकों की कोताही के चलते ही पार्षदों के दबाव पर अब नगर निगम के सहयोग से सभी वार्डों में शिविर लगाए जा रहे हैं। ऐसा इसलिए भी किया गया है मौके पर ही पार्षद फार्म को सत्यापित कर दें, लेकिन जब वे वहां से नदारद रहते हैं तो लोगों को परेशानी होती है। इतना ही नहीं, फार्म में मांगी गई अत्यधिक जानकारियों की वजह से आम आदमी को बड़ी परेशानी हो रही है। ऐसे में यदि पार्षद थोड़ी सी भी सक्रियता दिखाएं तो यह बेहद दुरूह काम सरल हो सकता है।
गौरतलब है कि इस मसले पर पार्षदों की ओर से दी गई दलीलों में वाकई दम था कि उनकी भागीदारी न होने के कारण आम लोगों को परेशानी हो रही है और वे उन्हें परेशान कर रहे हैं। अब जब कि प्रशासन की पहल पर वार्ड वार शिविर लगाए जा रहे हैं, तो उन्हें अपनी जिम्मेदारी को समझना चाहिए।
-तेजवानी गिरधर

अब बिजली कहां से आ गई जाट साहब?


अजमेर विद्युत वितरण निगम ने भाजपा के विरोध के चलते फिलहाल बिजली कटौती बंद कर दी है। ऐसे में सवाल उठता है कि यह बिजली आई कहां से? यदि बिजली उपलब्ध थी तो काटी क्यों जा रही थी? हालांकि हकीकत ये ही लगती है कि बिजली की कमी तो है, मगर अब चूंकि खुद निगम ने ही चला कर पंगा लिया है, इस कारण उसे डाइल्यूट करने के लिए उसे जुगाड़ करना पड़ रहा है। जुगाड़ अर्थात कहीं और की काट कर यहां शहर वालों को राजी किया जा रहा है।
यह राजी करने की नौबत आई इसलिए कि भाजपा ने जैसे ही प्रदर्शन कर चेतावनी दी कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत एवं केंद्रीय सूचना एवं प्रौद्योगिकी राज्यमंत्री सचिन पायलट को अजमेर आने पर काले झंडे दिखाए जाएंगे, तो इस फजीहत से बचने के लिए फिलहाल कटौती बंद करने का निर्णय कर किया गया। असल में हुआ ये कि निगम ने खुद ही आ बैल मुझे मार वाली कहावत चरितार्थ कर ली। न जाने किसने अक्ल दी कि इन दिनों चल रहे रमजान माह के दौरान रोजों के मद्देनजर मुस्लिम बहुल इलाकों में कटौती बंद कर दी। जब इस प्रकार धर्म के आधार पर शहर को दो हिस्सों में बांटा तो हिंदूवादी संगठनों को गुस्सा आना ही था। शहर भाजपा अध्यक्ष प्रो. रासासिंह रावत, विधायक वासुदेव देवनानी एवं अनिता भदेल के नेतृत्व में निगम मुख्यालय पर प्रदर्शन किया गया। एमडी पीएस जाट व तकनीकी निदेशक बी एल माहेश्वरी की गैर मौजूदगी में चीफ इंजीनियर अजमेर जोन सी के खमेसरा एवं सर्किल इंजीनियर मेटेरियल मैनेजमेंट एस एस शेखावत को गुस्से का शिकार होना पड़ा। देवनानी ने तो खमेसरा को लालटेन ही भेंट कर दी। पार्षद नीरज जैन ने भी अपनी आदत के मुताबिक जलवा दिखाया।  इसी प्रकार विश्व हिन्दू परिषद के महामंत्री शशि प्रकाश इंदौरिया ने मजहब के नाम पर बिजली कटौती में भेदभाव करने को गलत करार दिया। उन्होंने मुस्लिम बहुल इलाकों में कटौती समाप्त किए जाने एवं हिन्दू एवं जैन समाज के त्यौहारों को नजरअंदाज किए जाने को गलत बताया। आरोप में दम भी था। इस आरोप की गंभीरता को देखते हुए ही निगम को मजबूरी में पूरे शहर में बिजली कटौती को बंद करना पड़ गया।
यदि निगम केवल मुस्लिम इलाकों की कटौती करने का निर्णय न करता तो यह नौबत नहीं आती। लोग इतने दिन से कटौती की मार सहन कर ही रहे थे, मगर वे धर्म के आधार पर भेदभाव को सहन नहीं कर पाए। जैसे ही हंगामा हुआ तो एमडी पी एस जाट को समझ में आ गया कि ये मामला भारी पड़ जाएगा। वजह ये कि आगामी दो दिन विभिन्न कार्यक्रमों के चलते मुख्यमंत्री अशोक गहलोत सहित अनेक मंत्री अजमेर में उपस्थित रहने वाले हैं। उनके सामने विरोध प्रदर्शन हुआ तो वह भारी पड़ जाएगा।
हालांकि भाजपा को इतनी उम्मीद नहीं थी कि उसकी काले झंडे दिखाने की चेतावनी इतना काम कर जाएगी कि निगम घबरा कर तुरंत कटौती बंद कर देगा। जैसे ही कटौती बंद हुई तो उसे समझ में आ गया कि कहीं मंत्रियों के अजमेर में रहने के दौरान हंगामा न होने की खातिर तो कटौती बंद की जा रही है और उनके जाने के बाद फिर से कटौती चालू कर दी जाएगी। सो शहर भाजपा अध्यक्ष प्रो. रासासिंह रावत ने बयान जारी कर कहा कि यदि केवल कानून व्यवस्था बनाने एवं मुख्यमंत्री के अजमेर दौरे के कारण ही बिजली बंद की है तो इस छलावे को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। मुख्यमंत्री के दौरे के बाद यदि वापस कटौती की गई, तो भाजपा फिर जन आंदोलन करेगी। अब देखना ये होगा कि तीन दिन बाद निगम का रुख अख्तियार करता है?
-तेजवानी गिरधर

गुरुवार, 26 जुलाई 2012

दीवान साहब के बयान से फिल्म जगत तो सहमा ही


बीते दिनों महान सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती की दरगाह के दीवान और ख्वाजा साहब के सज्जादानशीन सैयद जेनुअल आबेदीन व खुद्दाम हजरात के बीच हुए विवाद का कोई निष्कर्ष निकला हो या नहीं, जो कि निकलना भी नहीं है, मगर फिल्म जगत तो सहम ही गया। और साथ ही अधिकतर फिल्मी हस्तियों को जियारत कराने वाले सैयद कुतुबुद्दीन सकी के नजराने पर भी मार पडऩे का अंदेशा हो गया। इसकी वजह ये है कि अजमेर में खादिमों के ताकतवर होने के कारण फिल्मी हस्तियों को भले ही कोई खतरा नहीं है, मगर जिस तरह से इस विवाद ने तूल पकड़ा और इलैक्ट्रॉनिक मीडिया ने जिस तरीके से उछाला, उससे फिल्म जगत पर तो भारी असर पड़ा ही होगा।
असल में हुआ ये था कि दरगाह दीवान ने यह बयान जारी कर कहा कि फिल्मी कलाकारों, निर्माता और निर्देशकों द्वारा फिल्मों और धारावाहिकों की सफलता के लिए गरीब नवाज के दरबार में मन्नत मांगना शरीयत और सूफीवाद के मूल सिद्धांतों के खिलाफ और नाकाबिले बर्दाश्त है। उन्होंने ऐसे संवेदनशील मुद्दे पर इस्लामिक विद्वानों और शरीयत के जानकारों की खामोशी को चिंताजनक बताया। अजमेर में खादिम भले ही उनके धुर विरोधी हों  अथवा आम मुसलमानों पर दीवान साहब की कोई खास पकड़ नहीं हो, मगर देश-दुनिया में तो उन्हें ख्वाजा साहब के वंशज के रूप में काफी गंभीरता से लिया जाता है। यही वजह रही कि उनके बयान को राष्ट्रीय मीडिया ने खासी तवज्जो दी। अनेक चैनलों पर तो ब्रेकिंग न्यूज के रूप में यह सवालिया टैग बारबार दिखाया जाता रहा कि दरगाह शरीफ में फिल्मी हस्तियों की जियारत पर रोक? ऐसा अमूमन होता है कि दिल्ली में बैठे पत्रकार धरातल की सच्चाई तो जानते नहीं और दूसरा जैसा ये कि उनकी किसी भी खबर को उछाल कर मारने की आदत है, सो इस खबर को भी उन्होंने इतना तूल दिया कि पूरा फिल्म जगत सहम ही गया होगा।
हालांकि अजमेर में ऐसा कुछ हुआ नहीं है और न ही होने की संभावना प्रतीत होती है, मगर फिल्मी हस्तियों में तो संशय उत्पन्न हो ही गया। जाहिर सी बात है कि ऐसे में वे अजमेर आने से पहले दस बार सोचेंगी कि कहीं वहां उन्हें जियारत करने से रोक तो नहीं दिया जाएगा अथवा उनके साथ बदतमीजी तो नहीं होगी। ऐसे में यदि अच्छा खासा नजराना देने वाली फिल्मी हस्तियों की आवक बंद होगी अथवा कम होगी तो स्वाभाविक रूप से यह खुद्दाम हजरात को नागवार गुजरेगा। खासकर फिल्म जगत के अघोषित रजिस्टर्ड खादिम सैयद कुतुबुद्दीन चश्ती पर तो बड़ा भारी असर पड़ेगा।
हालांकि जिस मुद्दे को दीवान साहब ने उठाया था, उस पर तो खास चर्चा हुई नहीं, बल्कि उनके ख्वाजा साहब के वश्ंाज होने न होने पर आ कर अटक गई, मगर मुंबई में फिल्म जगत में तो यही संदेश गया ना कि अजमेर में उनको लेकर बड़ा भारी विवाद है। उन्हें क्या पता कि यहां दीवान साहब कितने ताकतवर हैं या उनके समर्थक उनके साथ क्या बर्ताव करेंगे?
यूं मूल मुद्दे पर नजर डाली जाए तो जहां दीवान साहब का बयान तार्किक रूप से ठीक प्रतीत होता है तो खुद्दाम हजरात की दलील भी परंपरागत रूप से सही प्रतीत होती है, मगर झगड़ा इस बात पर आ कर ठहर गया कि इस बयान के जरिए दीवान साहब कहीं अपने आप को दरगाह शरीफ का हैड न प्रचारित करवा लें। सो खादिमों ने तुरंत ऐतराज किया। खादिमों का पूरा जोर इस बात पर रहा कि दीवान को जियारत के मामले में दखल देने का कोई अधिकार नहीं है क्योंकि वे कोई दरगाह के मुखिया नहीं है, महज दरगाह कमेटी के मुलाजिम हैं। दूसरा ये कि ख्वाजा साहब का दरबार सभी 36 कौमों के लिए है। मन्नत और दुआ पर आपत्ति सही नहीं है। ख्वाजा साहब के दरबार में कोई भेदभाव नहीं है। हर आने वाला अपनी मुराद लेकर आता है। मुराद और दुआ व्यक्ति के निजी मामले हैं।
ऐसा करके वे दीवान साहब के बयान की धार को भोंटी तो कर पाए हैं, मगर यदि फिल्म जगत तक सारी बात ठीक से न पहुंच पाई तो वह तो सहमा ही रहेगा। साथ ही जनाब कुतुबुद्दीन साहब का नजराना भी तो मारा जाएगा। कदाचित इसी वजह से खादिम सैयद कुतुबुद्दीन चिश्ती ने कहा कि ये दीवान का मीडिया स्टंट मात्र है। खादिमों की रजिस्टर्ड संस्था अंजुमन सैयद जादगान के पूर्व सचिव सैयद सरवर चिश्ती ने भी कहा कि दीवान का बयान सस्ती लोकप्रियता पाने का हथकंडा मात्र है।

-तेजवानी गिरधर
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tejwanig@gmail.com