रविवार, 19 अगस्त 2012

दो साल तो परिपक्व होने में ही लग गए कमल बाकोलिया को

अजमेर नगर निगम के मेयर कमल बाकोलिया के कार्यकाल के दो साल पूरे हो गए। दो साल में उपलब्धि के नाम पर कुछ खास दर्ज नहीं करवा पाए। हां, एक उपलब्धि जरूर गिनी जा रही है। उनकी बॉडी लैंग्वेज और आत्मविश्वास के साथ की गई घोषणाओं को आधार मान कर मीडिया वाले अब यह मानने लगे हैं कि बाकोलिय नौसीखिए नहीं रहे। परिपक्व हो गए हैं।  यानि कि दो साल तो उन्हें केवल परिपक्व होने में ही लग गए। बाकी बचे तीन साल में क्या कर पाएंगे, पता नहीं। अलबत्ता तीसरे साल के प्रवेश में जो घोषणाएं की हैं, उससे यह जरूर लगता है कि अब उनकी समझदानी में आ गया है कि वे मेयर हैं और मेयर चाहे तो बहुत कुछ कर सकता है। यानि कि अब यह माना जा सकता है कि उनका माइंडसेट बदल गया गया है। बदलना भी चाहिए। करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान। एक और उपलब्धि भी रेखांकित की जा रही है। वो ये कि पार्षदों पर भले ही गाहे बगाहे भ्रष्टाचार  व पक्षपात के आरोप लगे हों, मगर खुद की कमीज अभी सफेद ही है। 
असल में हुआ ये कि जब बाकोलिया मेयर बने तो राजनीति में कोरे कागज थे। गैस एजेंसी चलाते-चलाते यकायक शहर को चलाने की जिम्मेदारी आ गई तो भला उनसे उम्मीद की भी कैसे जा सकती थी कि उनके पास कोई विजन भी होगा। न राजनीति की समझ, न नगर निगम के कामकाज की और न ही शहर के बारे में कोई समझदारी से भरी सोच। इन सब चीजों को सीखने में दो साल तो लगने ही थे। दुर्भाग्य से, जिसे कि उनके लिए सौभाग्य कहना ज्यादा उचित होगा कि उन्हें जहां बोर्ड में भाजपा का बहुमत मिला, वहीं सी आर मीणा जैसे परिपक्व सीईओ। उनसे भिड़ंत लेते-लेते न केवल राजनीतिक समझ बढ़ी है, अपितु अफसरों-कर्मचारियों से किए जाने वाले व्यवहार की जानकारी भी। करीब डेढ़ साल पहले अपुन ने दैनिक न्याय सबके लिए के द थर्ड आई कॉलम में इशारा कर दिया था कि बाकोलिया भाग्य से मिला मेयर बनने का मौका गंवा रहे हैं। किसी विद्वान का यह सूत्र भी सुझाया था कि जीवन ताश का खेल है, जिसमें एक बार ताश के पत्ते बंट जाने के बाद हमें उन्हीं पत्तों से ही खेलना होता है। उसके अलावा कोई चारा भी नहीं। मगर अमूमन होता ये है कि हम यह कह कर सियापा करते हैं कि काश हमें हमारी पसंद के पत्ते मिले होते तो हम ये कर लेते, वो कर लेते। और उसी में अपना वक्त जाया करते हैं। जबकि होना यह चाहिए हम किस्मत से मिले पत्तों से ही बेहतर से बेहतर खेलने की कोशिश करें। जो मिले ही नहीं, उनकी कल्पना करने का कोई मतलब ही नहीं। शायद यही सूत्र और अपनी नियती समझने में उन्हें इतना वक्त लग गया। माना कि वे ऐसे बोर्ड के मेयर हैं, जिसमें भाजपा पार्षदों का बहुमत है और कई कांग्रेसी भी ऐसे हैं, जो उनके नाथने में नहीं नाथे जा पा रहे। ऐसे में उन्हें मिले हुए पत्तों से ही खेलना होगा, जो कि उनकी किस्मत के कारण मिले हैं। उसी किस्मत का ही कमाल है कि उन्हें अपने स्वर्गीय पिता श्री हरिशचंद जटिया के कर्मों की बदौलत मेयर का टिकट मिला और जीत भी गए। मगर कमी सिर्फ ये थी कि मेयर जैसा माइंड सेट नहीं था। वे समझ ही नहीं पा रहे थे कि वे क्या से क्या हो गए हैं। हालांकि उन्होंने निगम की सियासी स्थिति को देखते हुए सीईओ के रूप में सी आर मीणा जैसे अधिकारी को लगवाया जो उनके लिए काफी मददगार हो सकता था, मगर उन्हीं के साथ ट्यूनिंग नहीं बैठा पाए। उनके इर्द-गिर्द जो चौकड़ी जुटी रही, वह भी उलटे-उलटे रास्ते सुझाती रही। उसी के कारण शहर के कई तो ऐसे हैं जो उनके चेंबर इसी कारण नहीं घुसते कि उनके आसपास कुछ छुटभैया मटरगस्ती कर रहे होंगे।
खैर, देर आयद, दुरुस्त आयद। कम से कम अब मीडिया वाले भी मानने को मजबूर हैं कि बाकोलिया पूरे आत्म विश्वास के साथ भरे हुए हैं। कुछ करना चाहते हैं। क्या कर पाते हैं ये तो वक्त ही बताएगा।
सब कुछ बदल देने के विजन के साथ फॉर्म में आए बाकोलिया को नगर निगम को हाई टैक करने की सीख किसने दी पता नहीं, मगर है तारीफ ए काबिल। केन्द्रीय सूचना प्रौद्यागिकी एवं दूरसंचार राज्य मंत्री सचिन पायलट के शागिर्द होने के नाते कम से कम ये सोच तो आनी ही चाहिए थी।
दो नए दफ्तर रामगंज, माकड़वाली रोड या जयपुर रोड पर बनाने की योजना और अतिक्रमण से निपटने के लिए निगम का अपना पुलिस दस्ता बनाने की इच्छा सराहनीय है। संकड़ी गलियों वाले शहर में आपदा प्रबंधन के लिए हाईटेक उपकरणों से सुसज्जित करने का विचार भी उत्तम है।
बहरहाल, दो साल पूरे होने पर नगर के प्रथम नागरिक को नए जोश व जब्जे के लिए ढ़ेरों शुभकामनाएं।
-तेजवानी गिरधर

ईद पर अतिरिक्त सावधानी की जरूरत

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ और इलाहाबाद में शुक्रवार को हुई हिंसा के मद्देनजर केंद्र सरकार ने एक बार फिर राजस्थान सहित सभी राज्यों से कहा है कि वे ईद के मौके पर हर स्तर पर सतर्कता बरतें।
गृह मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक खुफिया सूत्रों से जानकारी मिली है कि कुछ शरारती तत्व असम की घटनाओं को देश के अन्य इलाकों में दोहराना चाहते हैं। मुंबई की हिंसा के बाद कर्नाटक में अफवाहों के चलते पूर्वोत्तर के लोगों का पलायन इसी मुहिम का नतीजा है। सूत्रों के मुताबिक ऐसी सूचनाएं हैं कि ईद के मौके पर कुछ शरारती तत्व खुरापात कर सकते हैं, ऐसे में राजस्थान सहित महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, यूपी, बिहार, दिल्ली, हरियाणा और कर्नाटक को खासतौर पर सतर्क रहने को कहा गया है।
यूं तो सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती की दरगाह व तीर्थराज पुष्कर को अपने आंचल में समेटे अजमेर की आध्यात्मिक धरा पूरी दुनिया में सांप्रदायिक सौहाद्र्र की मिसाल मानी जाती है, लेकिन साथ ही एक बार दरगाह में बम विस्फोट हो चुकने और मुंबई सीरियल ब्लास्ट के मास्टर माइंड हेडली की गुप्त पुष्कर यात्रा सहित अन्या कई घटनाओं के बाद यह शहर भी अति संवेदनशील शहरों में शुमार किया जाता है। विशेष रूप से पिछले स्वतंत्रता दिवस पर दरगाह के निजाम गेट पर पाक समर्थित पोस्टर लगाने की कोशिश चिंता का विषय है। हांलाकि पोस्टर लगाने वाले बिहार स्थित पुरनिया के 26 बांसवाड़ी आयल बाइसी निवासी मोहम्मद इस्माइल (42) पुत्र मोहम्मद ताहिर को देशद्रोह के आरोप में रंगे हाथ गिरफ्तार कर लिया गया, मगर आज तक पता नहीं लग पाया है कि इसके पीछे किसका हाथ था। खुद पुलिस को भी उसके किसी दहशतगर्द गिरोह से संबद्ध होने की आशंका है। इसके अतिरिक्त शक ये भी है कि इस्माइल के अतिरिक्त पकड़े गए अन्य आरोपी कहीं स्लीपर सेल के लिए काम तो नहीं कर रहे थे।
कुल मिला कर गृह मंत्रालय की चेतावनी की रोशनी और अजमेर के हालात के मद्देनजर खुफिया एजेंसियों व पुलिस को अतिरिक्त सतर्कता बरतनी होगी, ताकि कोई सिरफिरा इस शांत नगरी में नफरत की हवा न फैला सके।
-तेजवानी गिरधर

शुक्रवार, 17 अगस्त 2012

आखिर ले ही लिया अंजुमनों ने नजराने का हिस्सा


पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी की ओर से दरगाह जियारत के दौरान पांच करोड़ का नजराना दिए जाने की घोषणा पर अपना हक जता कर विवाद करने वाली खादिमों की दोनों अंजुमनों ने अपना-अपना हिस्सा लेकर खुद ही विवाद को समाप्त कर दिया। न केवल उन्होंने पाकिस्तान के दिल्ली स्थित उच्चायुक्त सलमान बशीर के हाथों नजराने के चैक लिए, अपितु उनका इस्तकबाल भी किया। सलमान बशीर ने दरगाह कमेटी के सदर प्रोफेसर सोहेल अहमद, अंजुमन मोईनिया फकरिया चिश्तिया सैय्यद जादगान के सदर सैय्यद हिसामुद्दीन नियाजी व अंजुमन यादगार चिश्तिया शेख जादगान के सदर शमशाद मोहम्मद चिश्ती को नजराने की राशि चैक के माध्यम से दी। तीनों चैक की राशि 5 करोड़ 47 लाख 48 हजार 905 रुपये है।
बेशक अंजुमनों का विवाद समाप्त करने का यह कदम न केवल दुनिया की कदीमी दरगाह शरीफ व भारत की प्रतिष्ठा के अनुकूल है, अपितु उनकी सदाशयता का प्रतीक भी बन गया है। बेहतर ये होता कि वे इस पर कोई विवाद नहीं करते तो नजराने की राशि के चैक वितरण का समारोह भव्य होता और हमारे देश व पाकिस्तान के अवाम को भी अच्छा संदेश जाता।
ज्ञातव्य है कि नजराने की राशि की घोषणा जब अमलीजामा पहनने जा रही थी तो इसके बंटवारे को लेकर विवाद खड़ा हो गया था। एक ओर जहां दरगाह कमेटी ने दरगाह एक्ट और बायलॉज के हिसाब से स्वयं को नजर का हकदार बताया, वहीं दूसरी ओर खादिमों ने भी कानूनी व शरई तौर पर स्वयं को ही नजर का अधिकारी बताया।
असल में जहां तक धार्मिक परंपरा का सवाल है, बेशक नजराना दिया ही खादिम को जाता है, मगर चूंकि यह रकम काफी बड़ी थी, इस कारण इसको लेकर खींचतान मची। हालांकि भारत स्थित पाक उच्चायोग के काउंसलर अबरार हाशमी ने स्पष्ट कर दिया था कि जरदारी की जियारत के दो दिन पूर्व ही मीडिया में 5 करोड़ रुपए का नजरान देने की बात आ चुकी थी, इस कारण यह कह कर कि घोषणा गुंबद शरीफ के नीचे हुई है, उस पर विवाद बेमानी है। उन्होंने यह भी साफ कर दिया कि जरदारी ने नजराने की राशि दरगाह में विकास कार्यों के लिए घोषित की गई थी। इसके बावजूद अंजुमनें विवाद करती रहीं। उनका कहना था कि यदि नजराने की राशि का बंटवारा किया गया तो वे अपना हिस्सा नहीं लेंगी।
अंजुमन सचिव सैयद वाहिद अंगारा का कहना था कि जरदारी ने जियारत के बाद नजराने की घोषणा की थी। जरदारी ने दरगाह में गुंबद शरीफ के नीचे घोषणा की गई, वहां केवल खादिमों का अधिकार है। वहां दीवान और दरगाह कमेटी का कोई हक ही नहीं है। जरदारी ने साफ तौर पर नजराने का ऐलान किया है, किसी प्रकार के डवलपमेंट की कोई बात नहीं हुई। इसके अतिरिक्त उनका तर्क ये भी था कि नजर में बंटवारा नहीं हो सकता। इस नजर पर पहला हक संबंधित खादिम का होता है। खादिम अपने परिवार पर यह राशि खर्च करता है। इसके बाद वह कल्याणकारी कार्यों में राशि व्यय करता है। अंजुमन का यह भी कहना था कि चूंकि मामला नजराने का है, इस कारण यह दरगाह स्थित महफिलखाने में होना चाहिए।
जहां तक पाक सरकार का सवाल है, कदाचित उसे यह पता नहीं था कि नजराने पर अंजुमन के हक को लेकर विवाद हो जाएगा, इस कारण बाद में अपना प्रतिनिधि भेज कर विवाद को निपटाने की कवायद की। विवाद के कारण ही चैक वितरण का कार्यक्रम सुरक्षा कारणों के बहाने महफिलखाने की बजाय जवाहर रंगमंच पर करना तय किया गया। लेकिन जब विवाद निपटता नहीं दिखा तो आखिर एक बहुत ही संक्षिप्त कार्यक्रम सर्किट हाउस में किया गया।
अपुन ने पहले ही लिखा था कि यदि विवाद बढ़ता है और अंजुमन बंटवारे का हिस्सा लेने से इंकार करती हैं तो इससे अच्छा संदेश नहीं जाएगा। इससे नजराना देने वाले का दिल भी दुखेगा। भविष्य में कोई राष्ट्राध्यक्ष अथवा वीवीआईपी इस प्रकार नजराना घोषित करने से बचेगा। भला कौन अपनी श्रद्धा को इस प्रकार के विवाद में उलझाना चाहेगा। बेहतर यही होगा कि सभी पक्ष इस मामले में समझदारी का परिचय देते हुए बीच का रास्ता निकालें। हालात को समझते हुए अंजुमनों ने आखिर बीच का रास्ता अख्तियार कर ही लिया, इसके लिए वे बधाई की पात्र हैं।
प्रसंगवश आपको बता दें कि नजराने की राशि का चौथा हिस्सा होने की बात भी उठी थी। दैनिक समाचार पत्र अमर उजाला की खबर के अनुसार दरगाह दीवान जेनुल आबेदीन ने अपने हिस्से को लेकर पाक उच्चायोग को पत्र लिखा था। उसके पीछे सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले को आधार बना कर तर्क ये दिया गया होगा कि दरगाह शरीफ के गुबंद के भीतर आने वाले किसी भी चढ़ावे पर सज्जादानशीन का 50 प्रतिशत अधिकार है। अब जब कि पाकिस्तान सरकार ने केवल तीन पक्षों को ही नजराने का बंटवारा कर दिया है, देखना ये होगा कि दीवान इस पर कोई ऐतराज करते हैं अथवा नहीं।
-तेजवानी गिरधर

गुरुवार, 16 अगस्त 2012

हिम्मत कैसे होती है पाक समर्थित पोस्टर लगाने की?


स्वतंत्रता दिवस पर दरगाह के निजाम गेट पर पाक समर्थित पोस्टर लगाने पर बिहार स्थित पुरनिया के 26 बांसवाड़ी आयल बाइसी निवासी मोहम्मद इस्माइल (42) पुत्र मोहम्मद ताहिर को देशद्रोह के आरोप में रंगे हाथ गिरफ्तार करने पर भले ही पुलिस अपनी पीठ थपथपा रही हो, मगर सवाल ये उठता है कि इस तरह की हरकत करने की किसी की हिम्मत होती ही कैसे है? वो भी चौड़े-धाड़े? चौड़े-धाड़े ही इस्माइल ने पोस्टर लगाने की भूल की, इसी कारण वह तुरंत पकड़ा गया, वरना पुलिस को आज तक पता नहीं लगता कि पोस्टर कौन लगा गया?
हालांकि यह अभी जांच का विषय है कि इस्माइल का मकसद क्या था और किसके कहने पर उसने ऐसा किया, मगर सबसे बड़ा सवाल ये है कि उसकी हिम्मत खुले-आम पोस्टर लगाने की कैसे हो गई? यदि उसका मकसद अपनी मर्जी से अथवा किसी के इशारे पर पोस्टर लगाना ही था तो वह चोरी-छुपे भी लगा सकता था। उसकी इस हरकत से इस बात की आशंका भी होती है कि कहीं वह मानसिक रूप से अस्वस्थ तो नहीं था? जैसा कि खुद उसका बयान है कि उसे ख्वाजा साहब ने सपने में कहा था कि यह पोस्टर लगाना है, इस आशंका को बल प्रदान करता है कि उसने धर्म भीरुता के चलते ऐसा किया हो। जहां तक पोस्टर में लिखे मजमून का सवाल है, उसमें भी पूरी दुनिया का मालिक गरीब नवाज लिखा है, न कि पूरी दुनिया का मालिक पाकिस्तान, जैसा कि पुलिस व मीडिया बयान कर रहा है।
बेशक उसमें पाकिस्तान भी लिखा है, वह ऊपर अलग से लिखा है। पूरी दुनिया का मालिक गरीब नवाज वाक्य की फोंट साइज एक ही है, इससे साफ झलकता है कि उसका ज्यादा जोर गरीब नवाज पर है, न कि पाकिस्तान पर। अकेला पाकिस्तान शब्द उसे देशद्रोह की श्रेणी में गिनवा रहा है, जबकि न तो भारत के खिलाफ कुछ लिखा है और न ही पाकिस्तान के समर्थन में कोई बात लिखी है। फिर भी पाकिस्तान लिख कर वह क्या जताना चाहता था, इसकी छानबीन होने पर ही सच सामने आएगा। दूसरी अहम बात ये है कि आखिर उसने 15 अगस्त का दिन ही क्यों चुना? इस दिन का हमारी स्वतंत्रता, संप्रभुता, एकता, अखंडता से सीधा भावनात्मक संबंध है। ऐसे मौके पर यदि कोई मुस्लिम दरगाह जैसे पवित्र स्थान पर पाकिस्तान का जिक्र करता हुआ पोस्टर लगाएगा तो जाहिर तौर पर यह उसके पाक परस्त होने की इशारा करता है। ऐसा पाक परस्त यदि स्वाधीनता दिवस के मौके पर घटिया हरकत करता है तो यह इस बात का सबूत भी है कि उसे पुलिस तंत्र की कोई परवाह नहीं थी। और यदि वह किसी दहशतगर्द गिरोह से संबद्ध है तो यह और भी गंभीर बात है। वस्तुत: यह पुलिस और सीआईडी को खुली चुनौती है, जिसका तोड़ पुलिस को ही निकालना है। खुफिया एजेंसियों को इस्माइल के अतिरिक्त पकड़े गए आरोपियों के स्लीपर सेल के लिए काम करने की भी आशंका जाहिर है। ज्ञातव्य है कि दहशतगर्दों की स्लीपर सेल में शामिल होने वाले शातिरों के बैंक खातों में संगठन पैसा जमा करवाता है। इसका खुलासा तो पूरी जांच होने पर हो पाएगा।
कुल मिला कर इस प्रकार की हरकतें हमारे शांतिप्रिय शहर के वसियों के लिए भी सोचनीय हैं। विशेष रूप से इस कारण कि दरगाह में एक बार बम विस्फोट हो चुका है और आतंकी व तस्करी वारदातों के अनेक मामले सामने आ चुके हैं।
-तेजवानी गिरधर

जैन स्थानक भवन ढ़हने के लिए जिम्मेदार कौन?


अजमेर में रामद्वारा गली, पुरानी मंडी स्थित मसूदा की हवेली नाम से ख्यात जैन स्थानक भवन का एक हिस्सा पर्यूषण पर्व पर बाल संस्कार शिविर एवं महिला चौपी के दौरान गिरने से एक बुजुर्ग की मौत हो गई और जैन संत राजेश मुनि सहित सात अन्य धर्मावलंबियों के घायल हो गए। मौका ए वारदात पर राहत पहुंचाना आसान भी नहीं था, इस कारण हादसा काफी भीषण होने की आशंका थी, मगर सौभाग्य से टल गया। बात आई गई हो गई, मगर ऐसे में सवाल ये तो उठता है कि इस हादसे के लिए जिम्मेदार किसे माना जाना चाहिए?
असल में इस भवन का संचालन श्री स्थानकवासी जैन श्रावक संघ की ओर से किया जाता रहा है। जैसा कि संघ के सचिव पारसमल विनायका का कहना है, उन्हें यह तो पता है कि मेंटीनेंस समाज की ओर से समय-समय पर किया जाता रहा है और वर्तमान में भवन की स्थिति ठीक ही थी, लेकिन उन्हें यह जानकारी नहीं कि पिछली बार मैंटीनेंस कब हुआ। भवन गिरने क्या कारण रहा, इसके बारे में हालांकि उनका कहना है कि दिन में अचानक बिजली गिरी थी, जो सीधे भवन पर आई थी। यह सब अचानक हुआ। इसका सीधा सा अर्थ है कि वे भवन को गिरने की वजह बिजली को मान रहे हैं, मगर इसकी पुष्टि आसपास के लोगों ने नहीं की। सीधी सी बात है कि वे इस पुराने भवन की हालत खराब होने को नकार रहे हैं।
ऐसा अमूमन होता है। जब भी कोई हादसा होता है तो संबंधित लोग जिम्मेदारी से बचने की कोशिश करते ही हैं। विशेष रूप से समाज का भवन होने पर सीधे तौर पर किसी व्यक्ति विशेष पर जिम्मेदारी आयद की भी नहीं जा सकती। और फिर सामाजिक मामला होने के कारण मामले को दबाने की कोशिश ही की जाती है, अगर समाज में ही दूसरा गुट सक्रिय न हो। जो कुछ भी हो, कहीं न कहीं त्रुटि तो हुई ही है। या तो भवन के रखरखाव में चूक हुई है, या लापरवाही बरती गई है। भले ही इस हादसे के लिए फौरी तौर पर संघ को इसके लिए जिम्मेदार मान भी लिया जाए, मगर उससे होना जाना क्या है? उसे साबित करना न तो संभव है और न ही कार्यवाही की कोई उम्मीद। सांप मरने के बाद लकीर पीटने से होना क्या है? बेहतर यही है कि हम इस दुर्घटना को एक सबक के रूप में लें।
असल में शहर के घने इलाकों में अनेक भवन काफी पुराने हैं। जर्जरावस्था की दृष्टि से तकरीबन पचास भवनों को चिन्हित भी किया गया है। वे कभी भी गिर सकते हैं। हर बार बारिश आने से पहले नगर निगम एक ढर्ऱे के रूप में जर्जर भवनों के मालिकों को भवन गिराने अथवा मरम्मत कराने के लिए नोटिस जारी करता है। इस बार भी मार्च माह में यह दस्तूर निभाया गया, ताकि बाद में हादसा हो तो निगम को जिम्मेदार न ठहराया जाए, मगर उनका फॉलोअप आज तक नहीं किया। नतीजतन दो जर्जर भवन गिर चुके हैं। ये दीगर बात है कि हादसे बड़े नहीं हुए, इस कारण निगम के अफसर चैन की नींद सो रहे हैं। जानकार लोगों का मानना है कि जर्जर भवनों की हालत को लेकर निगम तभी चेतता है, जब तक कोई ऐसा भवन ही न हो, जो कि बस गिरने ही वाला हो। इस मामले में कई बार निगम मजबूर भी होता है। कई भवनों में मकान मालिक और किरायेदारों के बीच कोर्ट में विवाद चल रहे हैं, इस वजह से निगम के हाथ बंधे रहते हैं।
बहरहाल, जो भी हालात हों, जो भी अड़चनें हों, उनके बीच से ही निगम को रास्ता निकालना है। चाहे वह संबंधित मालिकों को भवन गिराने को विवश न कर पाए, मगर कम से कम उनकी मरम्मत करवाने को तो मजबूर कर ही सकता है।
इस बार जिस तरह से लगातार दो दिन तक कभी रिमझिम तो कभी तेज बारिश हुई है, धूप खिलने पर कुछ और भवन धराशायी हो सकते हैं। निगम को चाहिए कि वे पहले से चिन्हित भवनों की सुध ले और उनमें से जिनको बेहद जरूरी हो गिराने की कार्यवाही तुरंत करे, वरना कोई बड़ा हादसा होगा और हमारे पास सियापा करने के अलावा कोई चारा नहीं रह जाएगा।
-तेजवानी गिरधर