बुधवार, 22 अगस्त 2012

प्रदेश अध्यक्ष ने बढ़ा दी कांग्रेस पार्षदों में फूट

 डॉ. चंद्रभान

हाल ही नगर निगम में नेता प्रतिपक्ष के पद को लेकर कांग्रेस पार्षद दल एक बार फिर दो फाड़ दिखाई दिया। असल में कांग्रेस पार्षद दल शुरू से ही दो फाड़ है। एक धड़ा मेयर कमल बाकोलिया के साथ रहता है तो दूसरा हर वक्त फच्चर डालता रहता है। इस कारण आए दिन मेयर व कांग्रेस की किरकिरी होती रहती है, जिस पर न तो कभी मेयर ने ध्यान दिया और न ही संगठन ने। अब तो बाकायदा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डॉ. चंद्रभान ने ही नरेश सत्यावना को पार्षद दल का नेता बना कर इस दो फाड़ पर ठप्पा लगा दिया है।
असल में लगता ये है कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष को यहां के हालत की पूरी जानकारी दी ही नहीं गई। कम से कम यह तो खुलासा किया ही नहीं गया कि यदि सत्यावना को नेता बनाया तो दूसरा दल गैर अनुसूचित जाति के व्यक्ति को नेता बनाने के मुद्दे पर बिफर जाएगा। कदाचित कांगे्रस के स्थानीय मैनेजरों को भी इसका अंदाजा नहीं हो। उन्होंने सोचा कि जैसे ही हाईकमान से सत्यावना की नियुक्ति की घोषणा होगी, सभी नतमस्तक हो कर उसे मान लेंगे। मगर हुआ उलटा। जैसे ही सत्यावना का नाम घोषित हुआ, वरिष्ठ कांग्रेस पार्षद मोहनलाल शर्मा उर्फ मोहन नेता के साथ लामबंद हो गए। उनका खुला आरोप है कि कांग्रेसजन की रायशुमारी के बिना पार्टी ने नेता प्रतिपक्ष घोषित कर दिया है। सत्यावना के विरोध में लामबंद हुए पार्षद एकत्रित भी बाकोलिया के धुर विरोधी पार्षद नौरत गुर्जर के निवास स्थान पर हुए, जिससे स्पष्ट है सत्यावना की नियुक्ति में बाकोलिया का ही हाथ है। विरोधी गुट में मोहन नेता सहित विजय नागौरा, मुबारक अली चीता, ललित गुर्जर शामिल हैं।
नेता बनने पर इस प्रकार स्वागत हुए नरेश सत्यावना का
यहां उल्लेखनीय है कि विरोधी गुट का आरोप है कि बिना रायशुमारी के सत्यावना की नियुक्ति की गई है, जबकि संगठन का तर्क है कि अजमेर के प्रभारी सलीम भाटी पिछले दिनों रायशुमारी करके गए है। रायशुमारी में नरेश सत्यावना, विजय नागौरा, मोहन लाल शर्मा, नौरत गुर्जर, आशा तुनवाल, सोनल मौर्य तथा शाहिदा परवीन के नाम आए थे। उन्होंने ही सत्यावना का नाम सुझा दिया, जिसे कि प्रदेश अध्यक्ष डॉ. चंद्रभान ने घोषित कर दिया। जहां तक विरोध के पीछे तर्क का सवाल है, वह काफी ठोस है। जब पहले से ही मेयर अनुसूचित जाति आरक्षित वर्ग से है तो पार्षद दल का नेता सामान्य या अन्य पिछड़ा वर्ग से होना चाहिए था। इस तर्क को प्रदेश अध्यक्ष कितना तवज्जो देते हैं, पता नहीं, मगर प्रदेश अध्यक्ष की लापरवाही से ही कांग्रेस पार्षदों के बीच की खाई और बढ़ गई है, जिसे कि पाटना कठिन होगा। जाहिर सी बात है कि ऐसे में बाकोलिया को सामान्य कामकाम में भाजपा पार्षदों की मिजाजपुर्सी करनी होगी, जो कि उन पर पहले से ही करने के आरोप लगते रहे हैं। वैसे विरोधी दल के पार्षदों को खुश करके रखने की परंपरा बाकोलिया के दोस्त भूतपूर्व नगर परिषद सभापति स्वर्गीय वीर कुमार के जमाने से ही चली आ रही है। बाकोलिया भी उसी परंपरा का निर्वाह कर रहे हैं। कदाचित इसी वजह से भाजपा पार्षद दल की धार उसकी ताकत के मुताबिक तेज नहीं है। पिछले दिनों कार्यकाल के दो साल पूरे होने पर जब बाकोलिया ने उपलब्धियां गिनाई तो विरोध में भाजपा की ओर से आयोजित सद्बुद्धि यज्ञ फौरी विरोध बन कर रह गया। विरोध होने पर बाकोलिया की पेशानी पर एक भी सलवट न पडऩा इसका प्रमाण है। उन्होंने यज्ञ को बड़े ही हल्के फुल्के अंदाज में लिया। और कोई निगम होता तो बाकोलिया का जीना हराम हो जाता।
-तेजवानी गिरधर

मंगलवार, 21 अगस्त 2012

लाइलाज है बांग्लादेशियों की घुसपैठ?

असम में हुई हिंसा और उसके बाद देश के कई भागों से असमियों के पलायन के साथ ही बांग्लोदेशियों की घुसपैठ की समस्या का मुद्दा फिर ज्वलंत हो उठा है। भाजपा ने तो बाकायदा इस मुद्दे पर अभियान तक छेड़ दिया है। ऐसे में एक बार फिर यह बहस छिड़ गई है कि आखिर इस घुसपैठ का अंत कब होगा?
हालांकि यहां अवैध रूप से आए बांग्लादेशी यदा-कदा गिरफ्तार होते रहे हैं और पिछले पांच साल में ही तकरीबन ढ़ाई सौ पकड़े जा चुके है, मगर आज तक न तो इनकी आवाजाही बंद हुई है। और जो वर्षों पहले यहां आ कर बस गए, वे तो लाइलाज हैं ही। अब तो हालत ये हो गई है कि जब भी कोई बांग्लादेशी घुसपैठिया पकड़ा जाता है तो किसी को कोई आश्चर्य नहीं होता। अखबारों में भी इस खबर को उतना ही स्थान मिलता है, जितना किसी छोटी-मोटी दुर्घटना को।
असल में बांग्लादेशी दरगाह जियारत के बहाने यहां आते हंै और यहीं बसने की फिराक में रहते हैं। दरगाह जियारत के सिलसिले में देशभर के लोगों की रोजाना की आवाजाही और दरगाह इलाके की बसावट का फायदा उठा कर वे यहां आसानी से घुल-मिल जाते हैं। हालांकि अधिसंख्य मेहनत-मजदूरी करके अपना पेट पालते हैं, मगर कई आपराधिक गतिविधियों में लिप्त पाए गए हैं। बांग्लादेशी घुसपैठिये नकली नोटों के साथ भी पकड़े जा चुके हैं। सूत्र बताते हैं कि वे मादक पदार्थों के ट्रांजिट सेंटर बन चुके अजमेर में तस्करों के संपर्क में आते हैं और उनके लिए संदेश वाहक का काम करते हैं। दरगाह इलाके में अंडरवल्र्ड की गतिविधियां भी जारी हैं और शातिर अपराधी यहां फरारी काटने चले आते हैं।
देश के किसी और इलाके में घूमने का वीजा बनवा कर अचानक दरगाह जियारत के बहाने अजमेर आने वालों की तो लंबी फेहरिश्त है, लेकिन आज तक पता नहीं लगा कि आखिर ऐसा संभव कैसे हो गया? सीमा पर भी इतनी लापरवाही बरती जाती है कि ऐसे लोगों को खदेडऩे के बाद वे फिर वे आ जाते हैं। कानून की स्थिति ये है कि देश निकाला देने और आइंदा भारत न आने देने के लिए पाबंद करने के अलावा उनके खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं हो पाती। साफ जाहिर है कि पाकिस्तान व बांग्लादेश से आने वाले लोगों को पता है कि उन्हें भविष्य में भारत न आने देने के लिए सिर्फ पाबंद भर किया जाएगा। इसी कारण भारतीय कानून के प्रति वे कितने पूरी तरह से लापरवाह हैं। पिछले तीस साल में बांग्लादेशियों की पहचान कर इन्हें खदेडऩे की कार्यवाही पर अनेक बार विचार किया गया, गिरफ्तारियां भी हुईं, लेकिन आज तक उस पर ठीक से अमल नहीं किया गया। प्रशासन और पुलिस की लापरवाही किस हद को पार कर गई है, इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि अधिकतर बांग्लादेशियों ने राशनकार्ड बनवा लिए हैं। उन्होंने अपने मकानों की रजिस्ट्रियां तक करवा ली हैं। कई ने यहीं शादी कर ली और उनके बच्चे भी हैं। यहां तक कि राजनीति में भी सक्रिय हो गए हैं।
जब भी कोई आतंकी वारदात होती है तो पूरा प्रशासनिक तंत्र वर्षों से यहां जमे बांग्लादेशी घुसपैठियों की धरपकड़ करने में लग जाता है। तब बड़ा हल्ला होता है कि बांग्लादेशियों को खदेड़ा जाना चाहिए। प्रशासन तो सक्रिय होता ही है, हिंदूवादी संगठन भी सिर पर आसमान उठा लेते हैं। कुछ दिन मीडिया भी बारीक से बारीक बातों को उजागर करता है, मगर आखिर होता वही है, ढ़ाक के तीन पात। वजह स्पष्ट है यह समस्या जितनी प्रशासनिक नहीं, उससे कहीं अधिक राजनीतिक है। एक मात्र यही वजह है जिस कारण आज तक बांग्लादेशी घुसपैठियों की समस्या से निजात नहीं मिल पाई है।  इसका एक उदाहरण देखिए। जब एक संदिग्ध बांग्लादेशी घुसपैठिया यूसुफ पकड़ा गया तो पता लगा कि उसकी बीवी श्रीमती जीनत बानो कांग्रेस में सक्रिय है। वह भी शहर महिला कांग्रेस के उपाध्यक्ष पद पर। हालांकि शहर महिला कांग्रेस की अध्यक्ष श्रीमती सुरजीत कपूर ने पल्ला झाड़ते हुए साफ कर दिया कि उसे अनैतिक गतिविधियों के कारण डेढ़ माह पहले ही पार्टी से निकाला जा चुका है। हो सकता है उनका दावा सही हो, लेकिन सवाल ये उठता है कि क्या किसी को पार्टी में शामिल करते वक्त और कोई महत्वपूर्ण पद देते समय इस बात का ध्यान रखा ही नहीं जाता कि उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि या चरित्र कैसा है? एक बांग्लादेशी घुसपैठिये की बीवी पार्टी में घुसपैठ कर जाए और संगठन चलाने वालों को हवा तक न लगे, इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा? बांग्लादेशी घुसपैठियों के राजनीतिक संबंधों का यह अकेला मामला नहीं है। कुछ साल पहले जब शहर युवक कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष सैयद गुलाम मुस्तफा ने गरीबों के राशन कार्ड बनवाने का अभियान चलाया था, तब भी यह उजागर हुआ था कि कुछ बांग्लादेशी घुसपैठियों ने अभियान का लाभ उठाने की कोशिश की है। ऐसे में संगठन को अपना दामन बचाने के लिए अभियान को समेटना पड़ा था। इन दो घटनाओं से स्पष्ट है कि बांग्लादेशी घुसपैठिये पनप ही इस कारण रहे हैं कि उन्हें राजनीतिक संरक्षण मिल जाता है। और यह भी साफ है कि जब तक इस प्रकार के संरक्षण को खत्म नहीं किया जाता, घुसपैठ की समस्या से निजात नहीं मिल पाएगी।
-तेजवानी गिरधर

रविवार, 19 अगस्त 2012

दो साल तो परिपक्व होने में ही लग गए कमल बाकोलिया को

अजमेर नगर निगम के मेयर कमल बाकोलिया के कार्यकाल के दो साल पूरे हो गए। दो साल में उपलब्धि के नाम पर कुछ खास दर्ज नहीं करवा पाए। हां, एक उपलब्धि जरूर गिनी जा रही है। उनकी बॉडी लैंग्वेज और आत्मविश्वास के साथ की गई घोषणाओं को आधार मान कर मीडिया वाले अब यह मानने लगे हैं कि बाकोलिय नौसीखिए नहीं रहे। परिपक्व हो गए हैं।  यानि कि दो साल तो उन्हें केवल परिपक्व होने में ही लग गए। बाकी बचे तीन साल में क्या कर पाएंगे, पता नहीं। अलबत्ता तीसरे साल के प्रवेश में जो घोषणाएं की हैं, उससे यह जरूर लगता है कि अब उनकी समझदानी में आ गया है कि वे मेयर हैं और मेयर चाहे तो बहुत कुछ कर सकता है। यानि कि अब यह माना जा सकता है कि उनका माइंडसेट बदल गया गया है। बदलना भी चाहिए। करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान। एक और उपलब्धि भी रेखांकित की जा रही है। वो ये कि पार्षदों पर भले ही गाहे बगाहे भ्रष्टाचार  व पक्षपात के आरोप लगे हों, मगर खुद की कमीज अभी सफेद ही है। 
असल में हुआ ये कि जब बाकोलिया मेयर बने तो राजनीति में कोरे कागज थे। गैस एजेंसी चलाते-चलाते यकायक शहर को चलाने की जिम्मेदारी आ गई तो भला उनसे उम्मीद की भी कैसे जा सकती थी कि उनके पास कोई विजन भी होगा। न राजनीति की समझ, न नगर निगम के कामकाज की और न ही शहर के बारे में कोई समझदारी से भरी सोच। इन सब चीजों को सीखने में दो साल तो लगने ही थे। दुर्भाग्य से, जिसे कि उनके लिए सौभाग्य कहना ज्यादा उचित होगा कि उन्हें जहां बोर्ड में भाजपा का बहुमत मिला, वहीं सी आर मीणा जैसे परिपक्व सीईओ। उनसे भिड़ंत लेते-लेते न केवल राजनीतिक समझ बढ़ी है, अपितु अफसरों-कर्मचारियों से किए जाने वाले व्यवहार की जानकारी भी। करीब डेढ़ साल पहले अपुन ने दैनिक न्याय सबके लिए के द थर्ड आई कॉलम में इशारा कर दिया था कि बाकोलिया भाग्य से मिला मेयर बनने का मौका गंवा रहे हैं। किसी विद्वान का यह सूत्र भी सुझाया था कि जीवन ताश का खेल है, जिसमें एक बार ताश के पत्ते बंट जाने के बाद हमें उन्हीं पत्तों से ही खेलना होता है। उसके अलावा कोई चारा भी नहीं। मगर अमूमन होता ये है कि हम यह कह कर सियापा करते हैं कि काश हमें हमारी पसंद के पत्ते मिले होते तो हम ये कर लेते, वो कर लेते। और उसी में अपना वक्त जाया करते हैं। जबकि होना यह चाहिए हम किस्मत से मिले पत्तों से ही बेहतर से बेहतर खेलने की कोशिश करें। जो मिले ही नहीं, उनकी कल्पना करने का कोई मतलब ही नहीं। शायद यही सूत्र और अपनी नियती समझने में उन्हें इतना वक्त लग गया। माना कि वे ऐसे बोर्ड के मेयर हैं, जिसमें भाजपा पार्षदों का बहुमत है और कई कांग्रेसी भी ऐसे हैं, जो उनके नाथने में नहीं नाथे जा पा रहे। ऐसे में उन्हें मिले हुए पत्तों से ही खेलना होगा, जो कि उनकी किस्मत के कारण मिले हैं। उसी किस्मत का ही कमाल है कि उन्हें अपने स्वर्गीय पिता श्री हरिशचंद जटिया के कर्मों की बदौलत मेयर का टिकट मिला और जीत भी गए। मगर कमी सिर्फ ये थी कि मेयर जैसा माइंड सेट नहीं था। वे समझ ही नहीं पा रहे थे कि वे क्या से क्या हो गए हैं। हालांकि उन्होंने निगम की सियासी स्थिति को देखते हुए सीईओ के रूप में सी आर मीणा जैसे अधिकारी को लगवाया जो उनके लिए काफी मददगार हो सकता था, मगर उन्हीं के साथ ट्यूनिंग नहीं बैठा पाए। उनके इर्द-गिर्द जो चौकड़ी जुटी रही, वह भी उलटे-उलटे रास्ते सुझाती रही। उसी के कारण शहर के कई तो ऐसे हैं जो उनके चेंबर इसी कारण नहीं घुसते कि उनके आसपास कुछ छुटभैया मटरगस्ती कर रहे होंगे।
खैर, देर आयद, दुरुस्त आयद। कम से कम अब मीडिया वाले भी मानने को मजबूर हैं कि बाकोलिया पूरे आत्म विश्वास के साथ भरे हुए हैं। कुछ करना चाहते हैं। क्या कर पाते हैं ये तो वक्त ही बताएगा।
सब कुछ बदल देने के विजन के साथ फॉर्म में आए बाकोलिया को नगर निगम को हाई टैक करने की सीख किसने दी पता नहीं, मगर है तारीफ ए काबिल। केन्द्रीय सूचना प्रौद्यागिकी एवं दूरसंचार राज्य मंत्री सचिन पायलट के शागिर्द होने के नाते कम से कम ये सोच तो आनी ही चाहिए थी।
दो नए दफ्तर रामगंज, माकड़वाली रोड या जयपुर रोड पर बनाने की योजना और अतिक्रमण से निपटने के लिए निगम का अपना पुलिस दस्ता बनाने की इच्छा सराहनीय है। संकड़ी गलियों वाले शहर में आपदा प्रबंधन के लिए हाईटेक उपकरणों से सुसज्जित करने का विचार भी उत्तम है।
बहरहाल, दो साल पूरे होने पर नगर के प्रथम नागरिक को नए जोश व जब्जे के लिए ढ़ेरों शुभकामनाएं।
-तेजवानी गिरधर

ईद पर अतिरिक्त सावधानी की जरूरत

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ और इलाहाबाद में शुक्रवार को हुई हिंसा के मद्देनजर केंद्र सरकार ने एक बार फिर राजस्थान सहित सभी राज्यों से कहा है कि वे ईद के मौके पर हर स्तर पर सतर्कता बरतें।
गृह मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक खुफिया सूत्रों से जानकारी मिली है कि कुछ शरारती तत्व असम की घटनाओं को देश के अन्य इलाकों में दोहराना चाहते हैं। मुंबई की हिंसा के बाद कर्नाटक में अफवाहों के चलते पूर्वोत्तर के लोगों का पलायन इसी मुहिम का नतीजा है। सूत्रों के मुताबिक ऐसी सूचनाएं हैं कि ईद के मौके पर कुछ शरारती तत्व खुरापात कर सकते हैं, ऐसे में राजस्थान सहित महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, यूपी, बिहार, दिल्ली, हरियाणा और कर्नाटक को खासतौर पर सतर्क रहने को कहा गया है।
यूं तो सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती की दरगाह व तीर्थराज पुष्कर को अपने आंचल में समेटे अजमेर की आध्यात्मिक धरा पूरी दुनिया में सांप्रदायिक सौहाद्र्र की मिसाल मानी जाती है, लेकिन साथ ही एक बार दरगाह में बम विस्फोट हो चुकने और मुंबई सीरियल ब्लास्ट के मास्टर माइंड हेडली की गुप्त पुष्कर यात्रा सहित अन्या कई घटनाओं के बाद यह शहर भी अति संवेदनशील शहरों में शुमार किया जाता है। विशेष रूप से पिछले स्वतंत्रता दिवस पर दरगाह के निजाम गेट पर पाक समर्थित पोस्टर लगाने की कोशिश चिंता का विषय है। हांलाकि पोस्टर लगाने वाले बिहार स्थित पुरनिया के 26 बांसवाड़ी आयल बाइसी निवासी मोहम्मद इस्माइल (42) पुत्र मोहम्मद ताहिर को देशद्रोह के आरोप में रंगे हाथ गिरफ्तार कर लिया गया, मगर आज तक पता नहीं लग पाया है कि इसके पीछे किसका हाथ था। खुद पुलिस को भी उसके किसी दहशतगर्द गिरोह से संबद्ध होने की आशंका है। इसके अतिरिक्त शक ये भी है कि इस्माइल के अतिरिक्त पकड़े गए अन्य आरोपी कहीं स्लीपर सेल के लिए काम तो नहीं कर रहे थे।
कुल मिला कर गृह मंत्रालय की चेतावनी की रोशनी और अजमेर के हालात के मद्देनजर खुफिया एजेंसियों व पुलिस को अतिरिक्त सतर्कता बरतनी होगी, ताकि कोई सिरफिरा इस शांत नगरी में नफरत की हवा न फैला सके।
-तेजवानी गिरधर

शुक्रवार, 17 अगस्त 2012

आखिर ले ही लिया अंजुमनों ने नजराने का हिस्सा


पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी की ओर से दरगाह जियारत के दौरान पांच करोड़ का नजराना दिए जाने की घोषणा पर अपना हक जता कर विवाद करने वाली खादिमों की दोनों अंजुमनों ने अपना-अपना हिस्सा लेकर खुद ही विवाद को समाप्त कर दिया। न केवल उन्होंने पाकिस्तान के दिल्ली स्थित उच्चायुक्त सलमान बशीर के हाथों नजराने के चैक लिए, अपितु उनका इस्तकबाल भी किया। सलमान बशीर ने दरगाह कमेटी के सदर प्रोफेसर सोहेल अहमद, अंजुमन मोईनिया फकरिया चिश्तिया सैय्यद जादगान के सदर सैय्यद हिसामुद्दीन नियाजी व अंजुमन यादगार चिश्तिया शेख जादगान के सदर शमशाद मोहम्मद चिश्ती को नजराने की राशि चैक के माध्यम से दी। तीनों चैक की राशि 5 करोड़ 47 लाख 48 हजार 905 रुपये है।
बेशक अंजुमनों का विवाद समाप्त करने का यह कदम न केवल दुनिया की कदीमी दरगाह शरीफ व भारत की प्रतिष्ठा के अनुकूल है, अपितु उनकी सदाशयता का प्रतीक भी बन गया है। बेहतर ये होता कि वे इस पर कोई विवाद नहीं करते तो नजराने की राशि के चैक वितरण का समारोह भव्य होता और हमारे देश व पाकिस्तान के अवाम को भी अच्छा संदेश जाता।
ज्ञातव्य है कि नजराने की राशि की घोषणा जब अमलीजामा पहनने जा रही थी तो इसके बंटवारे को लेकर विवाद खड़ा हो गया था। एक ओर जहां दरगाह कमेटी ने दरगाह एक्ट और बायलॉज के हिसाब से स्वयं को नजर का हकदार बताया, वहीं दूसरी ओर खादिमों ने भी कानूनी व शरई तौर पर स्वयं को ही नजर का अधिकारी बताया।
असल में जहां तक धार्मिक परंपरा का सवाल है, बेशक नजराना दिया ही खादिम को जाता है, मगर चूंकि यह रकम काफी बड़ी थी, इस कारण इसको लेकर खींचतान मची। हालांकि भारत स्थित पाक उच्चायोग के काउंसलर अबरार हाशमी ने स्पष्ट कर दिया था कि जरदारी की जियारत के दो दिन पूर्व ही मीडिया में 5 करोड़ रुपए का नजरान देने की बात आ चुकी थी, इस कारण यह कह कर कि घोषणा गुंबद शरीफ के नीचे हुई है, उस पर विवाद बेमानी है। उन्होंने यह भी साफ कर दिया कि जरदारी ने नजराने की राशि दरगाह में विकास कार्यों के लिए घोषित की गई थी। इसके बावजूद अंजुमनें विवाद करती रहीं। उनका कहना था कि यदि नजराने की राशि का बंटवारा किया गया तो वे अपना हिस्सा नहीं लेंगी।
अंजुमन सचिव सैयद वाहिद अंगारा का कहना था कि जरदारी ने जियारत के बाद नजराने की घोषणा की थी। जरदारी ने दरगाह में गुंबद शरीफ के नीचे घोषणा की गई, वहां केवल खादिमों का अधिकार है। वहां दीवान और दरगाह कमेटी का कोई हक ही नहीं है। जरदारी ने साफ तौर पर नजराने का ऐलान किया है, किसी प्रकार के डवलपमेंट की कोई बात नहीं हुई। इसके अतिरिक्त उनका तर्क ये भी था कि नजर में बंटवारा नहीं हो सकता। इस नजर पर पहला हक संबंधित खादिम का होता है। खादिम अपने परिवार पर यह राशि खर्च करता है। इसके बाद वह कल्याणकारी कार्यों में राशि व्यय करता है। अंजुमन का यह भी कहना था कि चूंकि मामला नजराने का है, इस कारण यह दरगाह स्थित महफिलखाने में होना चाहिए।
जहां तक पाक सरकार का सवाल है, कदाचित उसे यह पता नहीं था कि नजराने पर अंजुमन के हक को लेकर विवाद हो जाएगा, इस कारण बाद में अपना प्रतिनिधि भेज कर विवाद को निपटाने की कवायद की। विवाद के कारण ही चैक वितरण का कार्यक्रम सुरक्षा कारणों के बहाने महफिलखाने की बजाय जवाहर रंगमंच पर करना तय किया गया। लेकिन जब विवाद निपटता नहीं दिखा तो आखिर एक बहुत ही संक्षिप्त कार्यक्रम सर्किट हाउस में किया गया।
अपुन ने पहले ही लिखा था कि यदि विवाद बढ़ता है और अंजुमन बंटवारे का हिस्सा लेने से इंकार करती हैं तो इससे अच्छा संदेश नहीं जाएगा। इससे नजराना देने वाले का दिल भी दुखेगा। भविष्य में कोई राष्ट्राध्यक्ष अथवा वीवीआईपी इस प्रकार नजराना घोषित करने से बचेगा। भला कौन अपनी श्रद्धा को इस प्रकार के विवाद में उलझाना चाहेगा। बेहतर यही होगा कि सभी पक्ष इस मामले में समझदारी का परिचय देते हुए बीच का रास्ता निकालें। हालात को समझते हुए अंजुमनों ने आखिर बीच का रास्ता अख्तियार कर ही लिया, इसके लिए वे बधाई की पात्र हैं।
प्रसंगवश आपको बता दें कि नजराने की राशि का चौथा हिस्सा होने की बात भी उठी थी। दैनिक समाचार पत्र अमर उजाला की खबर के अनुसार दरगाह दीवान जेनुल आबेदीन ने अपने हिस्से को लेकर पाक उच्चायोग को पत्र लिखा था। उसके पीछे सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले को आधार बना कर तर्क ये दिया गया होगा कि दरगाह शरीफ के गुबंद के भीतर आने वाले किसी भी चढ़ावे पर सज्जादानशीन का 50 प्रतिशत अधिकार है। अब जब कि पाकिस्तान सरकार ने केवल तीन पक्षों को ही नजराने का बंटवारा कर दिया है, देखना ये होगा कि दीवान इस पर कोई ऐतराज करते हैं अथवा नहीं।
-तेजवानी गिरधर