मंगलवार, 9 अक्टूबर 2012

सिंगारिया की धमाकेदार शुरुआत का प्रतीक है इंदिरा स्मारक


अजमेर में रेलवे स्टेशन रोड पर जिस इंदिरा गांधी स्मारक की चर्चा इन दिनों खूब हो रही है, वहां पर इंदिरा गांधी की मूर्ति स्थापित होने पर उसका श्रेय भले ही नगर सुधार न्यास सदर नरेन शहाणी भगत के खाते में जाए अथवा तुरत-फुरत में एनओसी देने के लिए नगर निगम मेयर कमल बाकोलिया की वाहवाही हो, मगर कम लोगों को ही पता है कि असल में यह स्मारक केकड़ी के पूर्व विधायक बाबूलाल सिंगारिया की राजनीति में धमाकेदार शुरुआत की यादगार है।
हुआ ये था कि तकरीबन पच्चीस साल पहले जिन दिनों सिंगारिया कांग्रेस में सक्रिय हुए ही थे तो उन्होंने अपनी एंट्री धमाकेदार तरीके से करने के लिए स्टेशन रोड पर मोइनिया इस्लामिया स्कूल की दीवार पर इंदिरा गांधी के फोटो के साथ उनके लोकप्रिय बीस सूत्र का एक भित्ति चित्र लगवाया था। इस पर विवाद हुआ और बाद में विवाद तब ज्यादा बढ़ गया, जबकि उसके ऊपर कांग्रेस का चुनाव चिन्ह हाथ भी लगा दिया गया। बाद में जब टैम्पो स्टैंड के लिए स्कूल के मैदान की जमीन ली गई तो दीवार तोड़े जाने के सबब इसे हटाने की नौबत आ गई। मगर कांग्रेसी अड़ गए। उन दिनों सिंगारिया, पूर्व विधायक हाजी कयूम खान, महेन्द्र सिंह रलावता, महेश ओझा, कैलाश झालीवाल वाली सशक्त लॉबी ने इसे प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया था। बड़ी जद्दोजहद हुई। आखिर भित्ति चित्र वाली दीवार के हिस्से को छोड़ते हुए दोनों तरफ मार्ग निकालना पड़ा। बाद में पुराने भित्ति चित्र के ठीक पीछे नया भित्ति चित्र व्यवस्थित तरीके से बनवाया गया और तब से यह स्थान इंदिरा गांधी के स्मारक के रूप में स्थापित हो गया, जहां पर कांग्रेस का एक गुट जयंती व पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि अर्पित करने आया करता था।
यहां पर मूर्ति की स्थापना करने की बात तो बहुत बाद में आई। नगर सुधार न्यास ने वर्ष 2002 में मोइनिया इस्लामिया स्कूल के बाहर प्रतिमा लगाने के आवेदन किया था। इस पर संभागीय आयुक्त कार्यालय ने नगर सुधार न्यास को 16 अक्टूबर 2003, 6 जुलाई 2004, 6 सितंबर 2004, 7 अक्टूबर 2004 और फरवरी 2005 को पत्र लिखकर निगम की एनओसी पेश करने के निर्देश दिए थे, लेकिन प्रदेश में भाजपा का शासन होने की वजह से न्यास ने केवल 7 अप्रैल 2004 को पत्र लिखकर निगम से एनओसी देने का आग्रह कर इतिश्री कर ली। निगम में भाजपा का बोर्ड होने की वजह से मामला लटका रहा।
ज्ञातव्य है कि पिछले दिनों गांधी जयंती पर कांग्रेस की एक सभा में मूर्ति स्थापना के मुद्दे को मुख्य रूप से शहर कांग्रेस महामंत्री प्रताप यादव ने उठाया था। इससे पहले भी वे अनेक बार इस मुद्दे पर राज्य सरकार से पत्र व्यवहार करते रहे हैं। उनका मुद्दा था कि जब केन्द्र व राज्य में कांग्रेस की सरकार है और नगर निगम में मेयर व न्यास में सदर कांग्रेस के हैं, तब भी क्या इंदिरा गांधी की प्रतिमा नियत स्थान पर लगने के इंतजार में न्यास में ही पड़ी रहेगी। इस पर भगत ने जैसे ही सफाई दी कि न्यास ने नगर निगम को इस संबंध में पत्र लिखा, लेकिन निगम स्तर पर कोई कार्रवाई नहीं की जा सकी है, तो बवाल हो गया। निगम में नेता प्रतिपक्ष नरेश सत्यावना ने इस बात पर नाराजगी जताई की बेमौके ऐसे मुद्दे न उठाए जाएं। इसके साथ ही सत्यावना ने भगत के इस बयान को भी गलत ठहराया कि न्यास ने प्रतिमा के संबंध में निगम के मेयर कमल बाकोलिया को कोई चि_ी लिखी है। उन्होंने दावा किया कि यूआईटी सदर चि_ी बता दें तो निगम की साधारण सभा में प्रस्ताव पारित कर प्रतिमा स्थापित करवाने के संबंध में कार्रवाई करेंगे। वस्तुस्थिति ये थी कि प्रस्ताव निगम के पास लंबित पड़ा था। जाहिर सी बात है कि वे इस मुद्दे को हथियाना चाहते थे, ताकि मूर्ति लगवाने में अपनी भूमिका भी दर्ज करवा सकें।
बहरहाल इस हलचल का परिणाम ये रहा कि मेयर कमल बाकोलिया ने दस साल से लंबित मामले का निबटारा कर दिया। बाकोलिया ने 6 सदस्यों की एक कमेटी का गठन कर दिया, इसमें तीन भाजपा के भागीरथ जोशी, दलजीत सिंह व दिनेश चौहान और तीन कांग्रेस के नरेश सत्यावना, चंद्रशेखर बालोटिया व श्रीमती चंद्रकांता पारलेचा का शामिल किया गया। इस कमेटी ने मेयर की अध्यक्षता में हुई बैठक में सर्वसम्मति से श्रीमती गांधी प्रतिमा लगाने के लिए स्वीकृति प्रदान कर दी। अब उम्मीद की जा रही है कि मूर्ति जल्द ही लग जाएगी। इसमें भी पेच ये आ सकता है कि मूर्ति के नीचे लगाए जाने वाले शिलापट्ट पर नाम किस-किस के आएंगे।
चलते-चलते यह बता दें कि जिस प्रकार तीन भाजपा पार्षदों ने मूर्ति लगाने के प्रस्ताव पर सहमति दी है, उसको लेकर भाजपा पार्षद दल में अंतर्विरोध चल रहा है। बताते हैं कि उन्होंने डिप्टी मेयर अजित सिंह तक को विश्वास में नहीं लिया है। इसको लेकर पार्षदों में गरमागरम बहस चल रही है, जिसका अंत क्या होगा, पता नहीं।
-तेजवानी गिरधर

शनिवार, 6 अक्टूबर 2012

क्या वापसी पर नरवाल पाला बदल लेंगे?


भारतीय जनता पार्टी युवा मोर्चा अजमेर शहर जिला अध्यक्ष पद पर देवेंद्र सिंह शेखावत की नियुक्ति की विरोध करने वाले प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य अनिल नरवाल भले ही बहाल हो गए हैं, मगर ये सवाल आज भी खड़ा है कि क्या वे इस वजह से अपना पाला बदल लेंगे?
असल में ये सवाल इस वजह से उठता है क्योंकि शेखावत का ही विरोध करने वाले उनके प्रतिद्वंद्वी नितेश आत्रेय की नाराजगी को दूर करने के लिए उन्हें कोटा संभाग का प्रभारी बनाया गया तो यही समझा गया था कि प्रदेश भाजपा उपाध्यक्ष औंकारसिंह लखावत गुट ने उन्हें बोतल में बंद कर लिया है। लखावत गुट में बड़ा सुकून था कि चलो देवनानी लॉबी के एक युवा मोर्चा नेता को तो सेट कर लिया। इस बात की भी तसल्ली थी कि अब वे अजमेर में शेखावत को परेशान करने के लिए दखल नहीं देंगे, मगर चंद दिन बाद ही उन्होंने जता दिया कि वे उस खेमे से बंधे हुए नहीं हैं। डीजल के दामों में बढ़ोत्तरी को लेकर मोर्चा की अजमेर इकाई अभी कुछ करती, इससे पहले ही उन्होंने अपने समर्थकों के साथ रैली निकाल कर यूपीए सरकार का पुतला फूंका और जता दिया कि वे अजमेर में तो अपना दखल जारी रखेंगे ही। इससे भी रोचक बात ये थी कि उन्होंने इस विरोध प्रदर्शन की जो विज्ञप्ति अखबारों को भेजी, वह भारतीय जनता युवा मोर्चा शहर जिला अजमेर के लेटर हेड पर भेजी है। उसमें साफ लिखा है कि भारतीय जनता युवा मोर्चा शहर जिला अजमेर का यह प्रदर्शन संभाग प्रभारी नितेश आत्रेय के नेतृत्व में आयोजित किया गया। इस प्रदर्शन पर शहर जिला अध्यक्ष देवेन्द्र सिंह शेखावत की स्थिति अजीबोगरीब हो गई। वे समझ रहे थे कि आत्रेय से मुक्ति मिल गई, मगर वे तो उससे भी बड़ा सिरदर्द हो गए। अर्थात वे अब भी देववानी लॉबी में ही बने हुए हैं, भले ही वापसी में लखावत का हाथ हो। इसके चंद दिन बाद ही जब मोर्चे का कांग्रेस हटाओ, देश बचाओ आंदोलन के तहत जवाहर रंगमंच पर सम्मेलन हुआ तो ये खतरा बना हुआ ही था कि आत्रेय का गुट हंगामा किए बिना नहीं मानेगा। वो तो यह गुट इससे पहले हुए अजमेर बंद के दौरान कांग्रेस कार्यालय में कालिख पोते जाने की वजह से उलझ गया, वरना इतनी शांति से सम्मेलन होना संभव नहीं था।
बहरहाल, अब जब कि नरवाल को बहाल किया गया है तो अंदरखाने की खबर ये है कि ऐसा ओंकार सिंह लखावत के प्रयासों से हुआ है और वे उन्हें देवनानी लॉबी से तोड़ कर लाए हैं। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठ रहा है कि क्या बहाली के बाद वे लखावत का अहसान मान कर उनके कहे अनुसार चलेंगे या फिर देवनानी गुट में ही बने रहेंगे। हां, ये बात जरूर हो सकती है कि दूध का जला छाछ भी फूंक फूंक कर पीता है सो आत्रेय के झटके बाद नरवाल की बहाली से पहले उन्होंने उनसे वचन लिया होगा कि वे वापस देवनानी लॉबी को ज्वाइन नही करेंगे।
-तेजवानी गिरधर

अब हेमा गहलोत बढ़ रही हैं तेजी से आगे


अजमेर की राजनीति में हेमा गहलोत का नाम अब किसी परिचय का मोहताज नहीं है। कुछ अरसे पहले जरूर उन्हें अजमेर में प्रथम मेयर धर्मेन्द्र गहलोत की धर्मपत्नी के रूप में जाना जाता था, मगर अब उन्होंने अपनी खुद की पहचान बनाना शुरू कर दिया है।
हाल ही उन्होंने केन्द्रीय कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल द्वारा महिला विरोधी बयान दिए जाने पर शहर भाजपा महिला मोर्चा की ओर से गांधी भवन पर आयोजित प्रदर्शन का नेतृत्व किया। शहर अध्यक्ष जयंती की अनुपस्थिति में आयोजित इस प्रदर्शन में उपाध्यक्ष होने के नाते नेतृत्व करते हुए उन्होंने जता दिया कि वे भी अपने पति की तरह पूरी तरह से बिंदास हैं और उनमें भी नेतृत्व के गुण हैं। महिला मोर्चा में उनकी अपनी फेन फॉलोइंग भी है। बताते हैं वे उतनी ही तेज-तर्रार हैं, जितनी विधायक श्रीमती अनिता भदेल हो चुकी हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि वे महिला मोर्चा में भदेल विरोधी गुट की अग्रणी नेता मानी जाती हैं। यूं अनिता भदेल मोर्चा की प्रदेश उपाध्यक्ष हैं, मगर मीटिंग इत्यादि में हेमा गहलोत का गुट अपनी उपस्थिति अलग से दिखाता है।
समझा जाता है कि धर्मेन्द्र गहलोत निकट भविष्य में चुनावी राजनीति  में कोई चांस नजर नहीं आने के कारण अपनी धर्मपत्नी को पूरा संबल प्रदान कर रहे हैं। हालांकि विधानसभा चुनाव में अजमेर उत्तर से उनकी दावेदारी की भी चर्चाएं हैं, मगर समझा जाता कि सिंधियों के लिए अघोषित रूप से आरक्षित इस सीट से उन्हें कुछ खास उम्मीद नहीं होगी। रहा सवाल नगर निगम का तो वे मेयर रह चुकने के बाद पार्षद का चुनाव तो लड़ेंगे नहीं। मेयर पद की बात करें, जिसका चुनाव सीधे मतदाता करेंगे, तो अगली बार न जाने किस जाति-वर्ग के लिए आरक्षित हो। ऐसे में चुनावी राजनीति के लिहाज से उनके पास कुछ खास करने को है नहीं। संगठन में जरूर महामंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद पर हैं। ऐसे में उनकी धर्मपत्नी का सक्रिय राजनीति में आगे आना नए समीकरणों की ओर इशारा करता है। यदि मेयर का पद ओबीसी महिला के लिए आरक्षित होता है तो एक झटके में उनकी पत्नी आगे आ जाएंगी। इसके अतिरिक्त भी जिस प्रकार पढ़ी लिखी महिलाओं की भाजपा में कमी है, हेमा गहलोत के लिए आगे बढऩे का पूरा चांस है। अपनी तो यही दुआ है कि जिस तरह धर्मेन्द्र व हेमा मालिनी की जोड़ी आबाद है, वैसे ही धर्मेन्द्र गहलोत व हेमा गहलोत की जोड़ी भी आबाद रहे।

-तेजवानी गिरधर

शुक्रवार, 5 अक्टूबर 2012

क्या नई संभागीय आयुक्त इस ओर ध्यान देंगी?


अजमेर निवासी अतुल शर्मा के सेवानिवृत्त होने के बाद संभागीय आयुक्त के पद पर 1985 बैच की आईएएस किरण सोनी गुप्ता ने कार्यभार संभाल लिया है। अपनी पहली ही बैठक में उन्होंने कलेक्टर वैभव गालरिया से अजमेर में चल रही विभिन्न विकास योजनाओं की जानकारी ली। ट्रैफिक, पानी, पार्किंग, सीवरेज व अन्य समस्याओं के बारे मेंं भी जाना। जैसा कि उन्होंने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि अजमेर संभाग में टूरिज्म और औद्योगिक क्षेत्र में विकास की बड़ी संभावनाएं हैं, ऐसा प्रतीत होता है कि जरूर यहां के विकास में रुचि लेंगी।
कदाचित उन्हें पता न लगा हो कि शर्मा अजमेर के लिए क्या-क्या करना चाहते थे और क्या-क्या कर गए, साथ ही कौन से काम राजनीतिक दखंलदाजी के कारण बाकी रह गए, लिहाजा उन्हें बताना हमारा फर्ज है।
असल में शर्मा अजमेर को उसके ऐतिहासिक गौरव के अनुरूप अन्य बड़े शहरों की तरह खूबसूरत और सुव्यवस्थित करना चाहते थे, मगर ऐसा हो नहीं पाया।
विकास के मामले में अन्य शहरों से पिछडऩे के अतिरिक्त यह शहर वर्षों से अतिक्रमण और यातायात अव्यवस्था से बेहद पीडि़त है। पिछले पच्चीस साल के कालखंड में अकेले पूर्व कलेक्टर श्रीमती अदिति मेहता को ही यह श्रेय जाता है कि उन्होंने मजबूत इरादे के साथ अतिक्रमण हटा कर शहर का कायाकल्प कर दिया था। संभागीय आयुक्त अतुल शर्मा भी बहुत कुछ करना चाहते थे, मगर राजनीति आड़े आ गई। शर्मा के विशेष प्रयासों से शहर को आवारा जानवरों से मुक्त करने का अभियान शुरू हुआ, मगर चूंकि राजनीति में असर रखने वालों ने केन्द्रीय राज्य मंत्री सचिन पायलट का दबाव डलवा दिया, इस कारण वह अभियान टांय टांय फिस्स हो गया। इसी प्रकार शहर को अतिक्रमण से मुक्त करने पर भी शर्मा ने पूरा जोर लगाया, मगर जब भी इस दिशा में कुछ करते, कोई न कोई राजनीतिक रोड़ा सामने आ जाता। एक बार शर्मा ने तत्कालीन जिला कलेक्टर श्रीमती मंजू राजपाल के प्रयासों से टे्रफिक मैनेजमेंट कमेटी की अनुशंसा पर यातायात व्यवस्था को सुधारने के लिए जवाहर रंगमंच के बाहर बनी गुमटियों को दस साल ही लीज समाप्त होने के बाद हटाया तो बड़ा हंगामा हुआ। कांग्रेसी पार्षदों ने जेसीबी मशीन के आगे तांडव नृत्य किया।नेताओं ने यह साबित करने की कोशिश की कि प्रशासन तो जन-विरोधी है, जबकि वे स्वयं गरीबों के सच्चे हितैषी। बहरहाल, विरोध का परिणाम ये रहा कि प्रशासन को न केवल गुमटी धारकों को अन्यत्र गुमटियां देनी पड़ीं, अपितु यातायात में बाधा बनी अन्य गुमटियों को हटाने का निर्णय भी लटक गया।
इसी प्रकार शहर की यातायात व्यवस्था को सुधारने के लिए शर्मा की अध्यक्षता में अनेक महत्वपूर्ण निर्णय तो हुए, पर उन पर कितना अमल हो नहीं पाया। जिस कचहरी रोड और नेहरू अस्पताल के बाहर उन्होंने सख्ती दिखाते हुए ठेले और केबिने हटाई थीं, वहां फिर पहले जैसे हालात हो गए। शर्मा ने पशु पालन की डेयरियों को अजमेर से बाहर ले जाने की कार्यवाही शुरू करने का ऐलान किया, मगर आज भी स्थिति जस की तस है। बड़े-बड़े गोदाम शहर से बाहर निर्धारित स्थल पर स्थानांतरित करने की व्यवस्था करने का निर्णय किया गया, मगर आज तक कुछ नहीं हुआ। शहर के प्रमुख चौराहों को चौड़ा करने का निर्णय भी धरा रह गया। खाईलैंड में नगर निगम की खाली पड़ी जमीन पर बहुमंजिला पार्किंग स्थल बनाने की योजना अब तक खटाई में पड़ी हुई है। कुल मिला कर शर्मा जैसा चाहते थे, वैसा हो नहीं पाया। अब देखते हैं कि अजमेर विकास की संभावनाएं बताने और उस पर अमल करने को जोर देने वाली किरण सोनी गुप्ता कितना जज्बा दिखाती हैं।
जानकारी है कि वे न केवल कुशल प्रशासक हैं, बल्कि साहित्य और कला में भी उनकी गहरी रुचि है। महाराणा प्रताप, ए ग्रेट सन ऑफ मेवाड़ के अलावा उन्होंने कई पुस्तकें लिखी हैं और विभिन्न विषयों पर उनके लिखे आर्टिकल समय-समय पर पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। चित्रकारी के प्रति उनका लगाव है और वे अच्छी चित्रकार भी हैं। उनकी बनाई पेंटिंग्स राष्ट्रीय स्तर पर सराही गई और उन्हें कई अवार्ड भी मिले हैं। सामाजिक क्षेत्र में भी गुप्ता कई संस्थाओं से जुड़ी रही हैं। एक बड़े अधिकारी का यह पहलु अजमेर के कला प्रेमियों के लिए सुखद है। कला प्रेमी अजमेर फोरम के माध्यम से एक बड़ा कला केन्द्र बनवाने के लिए प्रशासन व सरकार पर दबाव बनाए हुए हैं। सूचना केन्द्र में पूरी सुविधाएं नहीं हैं और जवाहर रंगमंच छोटा पड़ता है। ऐसे में भोपाल के भारत भवन जैसे कला केन्द्र की सख्त जरूरत है। उम्मीद है वे इस ओर तो जरूर ध्यान देंगी।
-तेजवानी गिरधर

बुधवार, 3 अक्टूबर 2012

अजमेर ने खो दिया मार्केटिंग का इकलौता बादशाह


सोनिया और करिश्मा प्रदर्शनी की बदोलत लोकप्रिय मार्केटिंग गुरू श्री वासुदेव वाधवानी का निधन अजमेर के लिए एक अपूरणीय क्षति है, जिसकी पूर्ति कत्तई असंभव है।
पैंतालीस स्वर्गीय वाधवानी पहले शख्स थे, जिन्होंने मात्र पच्चीस साल ही उम्र में ही दिखा दिया था कि उनमें मार्केटिंग का बेजोड़ गुर है। उस जमाने में न तो लोग मार्केटिंग के बारे में समझते थे और न ही मीडिया मार्केटिंग के संबंध में। शहर का सबसे बड़ा अखबार दैनिक नवज्योति हुआ करता था। दूसरे स्थान पर दैनिक न्याय व राजस्थान पत्रिका की गिनती होती थी। विज्ञापन के लिहाज से इन अखबारों में मात्र एक-एक व्यक्ति रखा हुआ होता था। वही शहरभर के चुनिंदा तीन-चार सौ विज्ञापनदाताओं से विशेष अवसरों पर विज्ञापन लिया करते थे। विज्ञापन की दुनिया क्या होती है और विज्ञापन के क्या लाभ होते हैं, इसके बारे में व्यवसाइयों को कोई खास जानकारी नहीं होती थी। जहां तक प्रॉडक्ट्स की मार्केटिंग का सवाल है, गिनती की कंपनियों के एसआर जरूर हुआ करते थे, मगर योजनाद्ध तरीके से मार्केटिंग कैसे की जाती है, इसके बारे में किसी को जानकारी नहीं थी। स्वर्गीय श्री वाधवानी पहले शख्स थे, जिन्होंने इंडियन मार्केटिंग की स्थापना की और शहर के व्यपारियों को पहली बार दिखाया कि अपने प्रोडक्ट का मार्केटिंग सर्वे कैसे किया जाता है और उसके क्या लाभ हैं। उन्होंने न केवल सर्वे की परंपरा को आरंभ किया अपितु हॉर्डिंग्स, फ्लैक्स व बैनर के जरिए विज्ञापन करने से भी साक्षात्कार कराया। कदाचित कुछ इक्का दुक्का और युवक भी इस क्षेत्र में आए होंगे, मगर स्वर्गीय वाधवानी उन सबमें अव्वल थे और जल्द ही उन्होंने अपने कारोबार का विस्तार कर लिया। साथ ही मीडिया मार्केटिंग से भी शहर वासियों को रूबरू करवाया। दैनिक भास्कर और राजस्थान पत्रिका तो बहुत बाद में आए, उससे पहले ही उन्होंने मीडिया मार्केटिंग की शुरुआत कर दी।  मुझे अच्छी तरह ख्याल है कि दैनिक भास्कर ने अजमेर आने पर सबसे पहले उनसे ही विज्ञापनों की मार्केटिंग करवाई। बाद में तो भास्कर व पत्रिका ने बाकायदा मार्केटिंग हैड व उनके नीचे स्टाफ रखना आरंभ किया और शहर में तरीके से मार्केटिंग होने लगी। मगर निजी क्षेत्र में मीडिया मार्केटिंग के वे सदैव बेताज बादशाह रहे।
सरे राह ग्रुप के विज्ञापन प्रभारी व अजमेर मल्टी मीडिया के प्रोपराइटर स्वर्गीय वाधवानी दैनिक भास्कर अजमेर से अधिकृत विज्ञापन एजेंसी संचालक के रूप में भी जुड़े हुए थे। उन्होंने अनेक युवक-युवतियों को मार्केटिंग सिखाई और रोजगार भी उपलब्ध करवाया।
आमजन में उनकी पहचान सोनिया व करिश्मा प्रदर्शनी से हुई, जिसकी परंपरा शुरू करने का श्रेय भी उनके ही खाते में जाता है। एक ही छत के नीचे जरूरत का हर सामान, वह भी सस्ते में कैसे मिलता है, इससे साक्षात्कार करवाने की उपलब्धि उनके ही खाते में जाती है। एक अर्थ में उन्होंने शहर के व्यवसाइयों को यह सिखाया कि प्रदर्शनी के जरिए अपना माल कैसे बेहतर ढंग से बेचा जा सकता है। यदि ये कहें कि अजमेर का व्यवसाय जगत उनके बिना अधूरा है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
उनकी सफलता का सबसे बड़ा सूत्र ये था कि वे सदैव पॉजिटिव रहते थे। उनके साथी और व्यवसायी बताते हैं कि नहीं शब्द तो उनकी जुबान पर था ही नहीं। कैसा भी काम हो, वे यही कहते थे कि हो जाएगा। उनकी व्यवहार कुशलता का ही सबब है कि आज पूरे मीडिया जगत और व्यावसायिक दुनिया में शोक की लहर व्याप्त है।
अजमेरनामा उनके निधन पर भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित करता है और ईश्वर से प्रार्थना करता है कि उनके परिजन को इस दु:ख को सहन की शक्ति प्रदान करे।
-तेजवानी गिरधर