मंगलवार, 6 नवंबर 2012

पुष्कर से दावेदारी के चक्कर में हैं इब्राहिम फखर?


इन दिनों भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा के प्रदेश उपाध्यक्ष इब्राहिम फखर जिस तरह से पुष्कर के मामलों में रुचि ले रहे हैं, उससे यह कयासबाजी शुरू हो गई है कि कहीं वे पुष्कर से विधानसभा चुनाव की टिकट की दावेदारी के चक्कर में तो नहीं हैं? ज्ञातव्य है कि पुष्कर मेले को लेकर प्रशासन की सुस्ती व लापरवाही को मुद्दा बना कर अजमेर जिला भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा व भाजपा पुष्कर मंडल के संयुक्त तत्त्वावधान में कलेक्ट्रेट पर धरना दिया गया, जिसके कर्ताधर्ता इब्राहिम फखर थे। कुछ दिन पहले भी उन्होंने पुष्कर मेले के लिए पर्याप्त राशि जारी करने संबंधी बयान जारी किया था। इससे भी लगा था कि उनकी पुष्कर में रुचि है।
यदि पुष्कर भाजपा मंडल की ओर से ही धरना दिया जाता तो कोई खास बात नहीं होती, मगर अल्पसंख्यक मोर्चा और वह भी इब्राहिम फखर भी इसमें रुचि लेते हैं तो लोगों का चौंकना स्वाभाविक है। मुख्य रूप से अल्पसंख्यक मोर्चे की जिम्मेदारी अल्पसंख्यक मामलात में दखल देना व भाजपा में अल्पसंख्यकों की तादात बढ़ाना है। पुष्कर व पुष्कर मेले से उसका कोई लेना-देना नहीं है। न ही मेले में अल्पसंख्यक आते हैं, जिनकी खातिर वे इस मुद्दे पर जोर दे। यही वजह है कि इब्राहिम फखर के वहां से दावेदारी करने की चर्चा हो रही है।
यहां बताना प्रासंगिक ही होगा कि अब तक भाजपा नेता सलावत खां टिकट की खातिर से वहां काफी दिन से रुचि लेते रहे थे। उनके प्रयासों से मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के बैनर तले तीन दिवसीय प्रशिक्षण शिविर आयोजित किया गया, जिसमें राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के भूतपूर्व सरसंघ चालक स्वर्गीय कु. सी. सुदर्शन व मंच के मार्गदर्शक इंद्रेश कुमार ने अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई थी। हालांकि इस आयोजन को संघ की ओर से मुसलमानों को अपने साथ जोडऩे की कवायद माना गया, लेकिन आयोजन के लिए पुष्कर का चयन करने को सलावत खान की पुष्कर सीट से चुनाव लडऩे की तैयारी के रूप में देखा गया।
जहां तक हिंदुओं के तीर्थस्थल पुष्कर से किसी मुस्लिम की दावेदारी का सवाल है, उसकी वजह इस विधानसभा क्षेत्र में मुसलमानों मतदाताओं की पर्याप्त संख्या है। वर्तमान में वहां से कांग्रेस की श्रीमती नसीम अख्तर इंसाफ विधायक हैं और राज्य की शिक्षा राज्य मंत्री हैं। इस सीट से पूर्व में भी पूर्व मंत्री स्वर्गीय रमजान खान विधायक रह चुके हैं।  रमजान खान यहां से 1985, 1990 व 1998 में चुनाव जीते थे। 1993 में उन्हें विष्णु मोदी ने और उसके बाद 2003 में डा. श्रीगोपाल बाहेती ने परास्त किया। मोदी से हारने की वजह ये रही कि उनका चुनाव मैनेजमेंट बहुत तगड़ा था। हार जीत का अंतर कुछ अधिक नहीं रहा। मोदी (34,747) ने रमजान खां (31,734) को मात्र 3 हजार 13 मतों से पराजित किया था। डा. बाहेती से रमजान इस कारण हारे कि भाजपा नेता भंवर सिंह पलाड़ा ने निर्दलीय रूप से मैदान में रह कर तकरीबन तीस हजार वोटों की सेंध मार दी थी। बाहेती (40,833) ने रमजान खां (33,735) को 7 हजार 98 मतों से पराजित किया था, जबकि पलाड़ा ने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में 29 हजार 630 वोट लिए थे। स्पष्ट है कि रमजान केवल पलाड़ा के मैदान में रहने के कारण हारे थे। यदि पलाड़ा नहीं होते तो रमजान को हराना कत्तई नामुमकिन था।
कुल मिला कर यह सीट भाजपा मुस्लिम प्रत्याशी के लिए काफी मुफीद रह सकती है। एक तो उसे मुस्लिमों के पूरे वोट मिलने की उम्मीद होती है, दूसरा भाजपा व हिंदू मानसिकता के वोट भी स्वाभाविक रूप से मिल जाते हैं। इसी गणित के तहत रमजान तीन बार विधायक रहे और दो बार निकटतम प्रतिद्वंद्वी। हालांकि एक फैक्टर ये भी है कि रमजान पुष्कर के लोकप्रिय नेता थे। गांव-गांव ढ़ाणी-ढ़ाणी उनकी जबदस्त पकड़ थी। जहां तक कांग्रेस का सवाल है, उसके मुस्लिम प्रत्याशी के लिए यह सीट उपयुक्त नहीं है, फिर भी पिछली बार श्रीमती नसीम अख्तर इंसाफ (42 हजार 881) ने भाजपा प्रत्याशी पलाड़ा (36 हजार 347) को 6 हजार 534 मतों से हरा दिया। वजह ये रही कि भाजपा के बागी श्रवणसिंह रावत 27 हजार 612 वोट खा गए। ज्ञातव्य है कि रावत मतदाताओं की पर्याप्त संख्या होने के आधार पर ही शहर जिला भाजपा अध्यक्ष रासासिंह रावत की रुचि पुष्कर से चुनाव लडऩे में है, मगर दिक्कत ये है कि ब्यावर की सीट रावतों के लिए काफी बेहतर है, तो ऐसे में सवाल ये उठता है कि जिले में एक साथ दो रावतों को भाजपा टिकट देने का निर्णय करेगी?
बहरहाल, कदाचित कुछ गुंजाइश देख कर ही इब्राहिम फखर पुष्कर क्षेत्र में दखल देने की सोच रहे हैं।
-तेजवानी गिरधर

रविवार, 4 नवंबर 2012

समित शर्मा जी, इसलिए हुआ आपकी शानदार योजना का कचरा


राजस्थान मेडिकल सर्विसेज कॉरपोरेशन लिमिटेड के प्रबंध निदेशक डॉ. समित शर्मा ने बीते दिन जब मुख्यमंत्री निशुल्क दवा योजना का निरीक्षण किया तो उन्हें पता लग गया कि जिस आदर्श योजना के कारण उनकी देशभर में सराहना हो रही है, धरातल पर उसकी स्थिति क्या है? कहीं डॉक्टर गायब तो कहीं दवाइयों के स्टॉक में गड़बड़ी। जेएलएन के एक काउंटर दवाई थी तो दूसरे पर नहीं होने के नाम पर मरीजों को लौटाया जा रहा था। कहीं दवाई होते हुए भी नहीं देना तो कहीं दवाइयों को बेचे जाने की शिकायतें। कल्पना की जा सकती है कि जब संभाग मुख्यालय के सबसे बड़े अस्पताल की हालत ये है, जहां कि अधिकारियों, नेताओं व मीडिया की नजर है, वहीं ये हाल है तो कस्बों व गांवों में क्या हालत होगी? हालांकि उन्होंने संबंधित दोषियों के खिलाफ कार्यवाही के निर्देश दिए हैं, मगर होना जाना क्या है, सब जानते हैं।
असल में जब यह योजना लागू की गई थी तब ही इसके क्रियान्वयन को लेकर सवाल उठाए गए थे। बेशक योजना ऐसी है, जो कि वाकई आम जनता के लिए बेहद उपयोगी है, साथ ही सरकार को भी वाहवाही दिला सकती है, मगर ऐसा हुआ नहीं। वजह साफ है कि जो चुनौतियां थीं, उनसे निपटने पर न तो ठीक से विचार हुआ और न ही योजना को धरातल पर लागू कर ढ़ांचे में कोई सुधार किया गया। डॉ. शर्मा तो कलेक्टर तक रह चुके हैं और अच्छी तरह से जानते हैं कि हमारे यहां किस किस्म और प्रवृत्ति का स्टाफ है। उन्हें योजना लागू करने के साथ ही उस पर सख्त निगरानी का विशेष सेल कायम करना चाहिए था। उसी सड़े-गले सिस्टम के भरोसे ही योजना लागू कर दी गई। नतीजा ये है कि जिस अत्यंत लोककल्याणकारी योजना के कारण गहलोत सरकार को ख्याति मिलनी चाहिए थी, उसी के कारण आम आदमी की गालियां पड़ रही हैं।
हालांकि ऐसा नहीं है कि पूरा सिस्टम ही सड़ा हुआ है या इस योजना का लाभ नहीं मिल रहा है, मगर चूंकि सिस्टम में कई खामियां हैं और अनेक मरीजों को पूरी दवाइयां नहीं मिल पा रही, उन्हें धक्के खाने पड़ रहे हैं, इस कारण वे मुफ्त में मिल रही दवाइयों पर दुआ देने की बजाय गालियां दे रहे हैं। योजना के ठीक से क्रियान्वयन पर ध्यान न देने और सुपरविजन सख्त न होने के कारण एक भलीचंगी योजना का कचरा हो गया है। अब तो स्थिति ये है कि स्वयं समित शर्मा कह रहे हैं कि मुख्यमंत्री निशुल्क दवा योजना का लाभ आमजन को तब ही मिलेगा जब डॉक्टर्स गंभीर होंगे। यानि कि स्पष्ट है कि कहीं न कहीं उन्हें डॉक्टरों की लापरवाही पकड़ में आ गई है। इस योजना की परफोरमेंस की हालत ये है कि हर जगह भ्रष्टाचार की तलाश करने वाले योजना के जनक डॉ. समित शर्मा के बारे में बिना सबूत के कुछ भी कहे जा रहे हैं। अगर योजना ठीक से लागू होती तो इस प्रकार की बातें करना आसान नहीं होता।
कुल मिला कर संतोष करने लायक बात ये है कि राजस्थान में यह योजना अलबत्ता ठीकठाक चल रही है, जबकि अन्य प्रदेशों में तो कई विवादों में पड़ जाने से सरकार को बंद करनी पड़ी थी।
-तेजवानी गिरधर

शनिवार, 3 नवंबर 2012

रासासिंह को टिकट चाहिए तो पद छोडऩा होगा


प्रो. रासासिंह रावत
हालांकि राजस्थान भाजपा में भावी मुख्यमंत्री के रूप में श्रीमती वसुंधरा राजे को प्रोजेक्ट करने अथवा न करने की जद्दोजहद थमी नहीं है, लेकिन इस बीच चुनावी तैयारियां शुरू कर दी गई हैं। एक ओर जहां प्रदेश भाजपा अध्यक्ष अरुण चतुर्वेदी अपने स्तर सर्वे करवा रहे हैं, वहीं वसुंधरा ने भी फीड बैक लेना शुरू कर दिया है। जयपुर में चल रही इस सरगरमी के बीच खबर आई है कि अजमेर शहर भाजपा अध्यक्ष प्रो. रासासिंह रावत ने पुष्कर से चुनाव लडऩे की इच्छा जताई है। इस पर उन्हें कहा गया बताया कि अगर टिकट चाहिए तो आपको पद छोडऩा होगा। वजह ये कि जो दावेदार टिकट की भागदौड़ करेगा तो अपने पद की जिम्मेदारी कर ठीक से निर्वहन नहीं कर पाएगा। यह फार्मूला अन्य शहर व देहात जिला अध्यक्षों पर भी लागू किए जाने की जानकारी मिली है।
जहां तक रासासिंह की टिकट का सवाल है, उसमें अड़चन ये है कि परिसीमन के बाद रावत बहुल बनी ब्यावर सीट पर पहले से ही भाजपा के शंकरसिंह रावत काबिज हैं। उनका टिकट कटने की संभावना कम है। ऐसे में जिले से रावतों को दो टिकट देना कुछ कठिन है। विशेष परिस्थिति में दी भी जा सकती है।
इसी बीच रावत के उत्तराधिकारी की चर्चा भी आरंभ हो गई है। यूं तो इसके लिए एक बार फिर पूर्णाशंकर दशोरा, शिवशंकर हेडा, धर्मेश जैन, धर्मेन्द्र गहलोत, हरीश झामनानी, श्रीकिशन सोनगरा आदि के नाम उभर कर आ रहे हैं, मगर मौजूदा जिला सदस्यता अभियान प्रभारी प्रो. बी. पी. सारस्वत का नाम पुन: प्रमुखता से सामने आ रहा है। पिछली बार भी जब शहर भाजपा अध्यक्ष पद पर ताजपोशी की खींचतान मची हुई थी तो आखिर तक प्रो. सारस्वत ही नंबर वन चल रहे थे, मगर विधायकद्वय प्रो. वासुदेव देवनानी व श्रीमती अनिता भदेल ने प्रो. रावत के नाम पर सहमति दी थी। अब जब कि प्रो. रावत के पद से हटने की बात आ रही है तो फिर से प्रो. सारस्वत का नाम सामने आ गया है। इस बार उनका नाम और दमदार तरीके से सामने आया है। एक तो उस वक्त सहमति न देने वाले अब सहमति देने को आतुर दिखाई देते हैं। दूसरा सदस्यता अभियान के कुशल संचालन की वजह से उनका पाया और मजबूत हो गया है कि उनमें बेहतर संगठन क्षमता है, जिसका उपयोग पार्टी हित में किया जाना चाहिए। बेशक प्रो. सारस्वत के लिए यह अच्छी स्थिति है, मगर ऐसे में उनकी पिछले पंद्रह साल से ब्यावर से टिकट हासिल करने की इच्छा का क्या होगा? क्या वे इस इच्छा की तिलांजलि दे देंगे?
प्रो. बी. पी. सारस्वत
राजनीति के जानकार बताते हैं कि कोई भी नेता संगठन की अहम जिम्मेदारी की बजाय जनप्रतिनिधि बनना ज्यादा पसंद करता है। कारण ये है कि जनप्रतिनिधि के ठाठ कुछ अलग ही होते हैं। संगठन में तो केवल घिसाई होती है, प्रतिष्ठा भले ही हो। उसमें भी यदि सरकार अपनी पार्टी की हो तो ठीक है, विरोधी पार्टी की सरकार है तो घिसाई कुछ ज्यादा ही होती है। गांठ का पैसा भी पूरा होता है। इसके अतिरिक्त एक बार जिसमें मन में चुनावी राजनीति करने की इच्छा जागृत हो जाती है तो वह छूटती नहीं है। प्रो. सारस्वत की छूटी या नहीं, पता नहीं। एक पहलु ये भी है कि वे जिस ब्यावर सीट से चुनाव लडऩा चाह रहे थे, वह अब रावत बहुल हो गई है। वर्तमान में भी रावत विधायक ही है। जिले की अन्य सीटों की दावेदारियां पहले से ही अन्य जातियों के लिए पुख्ता मान ली जाएं तो उनके लिए मसूदा सीट ही बचती है। वह उनको कितना मुफीद रहेगी, कुछ कहा नहीं जा सकता। बहरहाल, अजमेर में चुनावी सरगरमी शुरू हो गई है और नित नई चर्चाएं होती रहेंगी।
-तेजवानी गिरधर

शुक्रवार, 2 नवंबर 2012

दिव्या को कद के अनुरूप पद न मिला तो छोड़ दी आरपीएससी


हालांकि राजस्थान लोक सेवा आयोग की सदस्य रहीं श्रीमती दिव्या सिंह के पति विश्वेन्द्र सिंह खंडन कर रहे हैं, मगर राजनीति के जानकारों का मानना है कि दिव्या सिंह ने मौका पडऩे पर आयोग का अध्यक्ष नहीं बनाए जाने से नाराज हो कर ही इस्तीफा दे दिया। ज्ञातव्य है कि उन्होंने गत 30 अक्टूबर को अपना इस्तीफा राज्यपाल व आयोग अध्यक्ष को भिजवा दिया था और 2 नवंबर को राज्यपाल मारग्रेट अल्वा ने उसे स्वीकार कर कार्मिक विभाग को भिजवा दिया।
उल्लेखनीय है कि इस्तीफा देते वक्त दिव्या सिंह ने इसकी वजह निजी कारण बताई थी, मगर माना जाता है कि वे आयोग का अध्यक्ष न बनाए जाने से खफा थीं। खफा होने की वजह ये मानी जा रही है कि वे अपने आपको उनके साथ ही आयोग के सदस्य बने मौजूदा अध्यक्ष हबीब खां गौरान से कहीं अधिक योग्य व प्रभावशाली मानती हैं। राजनीतिक लिहाज से हैं भी। दोनों की नियुक्ति नवंबर, 2011 को की गई थी। तब उन्हें उम्मीद थी कि जैसे ही प्रो. बी. एल.शर्मा सेवानिवृत्त होंगे, उनको अध्यक्ष बनाया जाएगा। इसके पीछे आधार भी था। वो यह कि उन्हें वसुंधरा राजे के कार्यकाल में जाते-जाते आयोग के दो टुकड़े करते हुए जिस राजस्थान अधीनस्थ कर्मचारी सेवा बोर्ड का गठन किया था, उसका उन्हें अध्यक्ष बनाया गया था। अर्थात वे एक बार आयोग अध्यक्ष के समतुल्य पद बैठ चुकी थीं। बाद में अशोक गहलोत सरकार ने उस बोर्ड को भंग कर दिया, मगर उन्हें आयोग में सदस्य के रूप में नियुक्ति दी गई। उन्हें ख्याल था कि अगस्त, 2012 में प्रो. बी. एल. शर्मा सेवानिवृत्त होंगे, तब वे आयोग अध्यक्ष पद के लिए कोशिश करेंगी। उन्होंने कोशिश की भी बताई, मगर गहलोत सरकार ने जातीय समीकरण के तहत गोरान को प्राथमिकता दे दी, जो कि दिव्या सिंह को नागवार गुजरी। स्वाभाविक सी बात है कि जो शख्स एक बार आयोग के अध्यक्ष के बराबर का टैग हासिल कर चुका हो, भला वह उससे वंचित होने को कैसे स्वीकार कर सकता है। वह भी अपने साथ नियुक्त हुए सदस्य गोरान को प्राथमिकता देते हुए। बताया जाता है कि नाराजगी की वजह से इस्तीफा देने वाली वे दूसरी सदस्य हैं। इससे पहले आयोग सदस्य नाथूलाल जैन की वरिष्ठता को नजरअंदाज करते हुए जब उनके जूनियर याकूब खान को अध्यक्ष बनाया गया तो जैन ने तत्काल ही आयोग की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था।
असल में उनकी रुचि शुरू से आयोग का अध्यक्ष बनने में थी। इस कारण सदस्य रहते हुए वे आयोग में कम ही आईं। जानकारी के मुताबिक वे एक साल के कार्यकाल में मात्र तीन बार ही आयोग आईं। पहली बार वे 30 नवंबर 2011 को सदस्य का कार्यग्रहण करने के लिए आयोग पहुंचीं। इसके बाद 31 जनवरी 2012 को आयोग सदस्य एच एल मीणा की सेवानिवृत्ति पर विदाई समारोह में शामिल हुईं और एक बार आयोग में साक्षात्कार बोर्ड की बैठक के लिए आयोग पहुंचीं।
बहरहाल, उनका इस्तीफा मंजूर किया जा चुका है और उनके पति विश्वेन्द्र सिंह कह रहे हैं कि उन्होंने अध्यक्ष न बनाए जाने की वजह से सदस्य पद नहीं छोड़ा है, मगर राजनीति के जानकार यही मान रहे हैं कि यह उनका कोई नया राजनीतिक समीकरण है। आगामी चुनाव के मद्देनजर वे भरतपुर सहित पूर्वी राजस्थान में नई रणनीति बना रहे हैं।
-तेजवानी गिरधर

गुरुवार, 1 नवंबर 2012

राजस्थान राजस्व मंडल अजमेर की शान


अजमेर में स्थित राजस्थान राजस्व मंडल 1 नवंबर को अपना स्थापना दिवस मना रहा है। यह राजस्थान में अजमेर की अहमियत का अहसास कराता है। आइये, जानें मंडल के बारे में:-
आजादी और अजमेर राज्य के राजस्थान में विलय के बाद राज्य के लिए एक ही राजस्व मंडल की स्थापना एक नवंबर 1949 को की गई। पूर्व के अलग-अलग राजस्व मंडलों को सम्मिलित कर घोषणा की गई कि सभी प्रकार के राजस्व विवादों में राजस्व मंडल का फैसला सर्वोच्च होगा। खंडीय आयुक्त पद की समाप्ति के उपरांत समस्त अधीनस्थ राजस्व विभाग एवं राजस्व न्यायालय की देखरेख एवं संचालन का भार भी राजस्व मंडल पर ही रखा गया। इसके प्रथम अध्यक्ष बृजचंद शर्मा थे। इसका कार्यालय जयपुर के हवा महल के पिछले भाग में जलेबी चौक में स्थित टाउन हाल, जो कि पहले राजस्थान विधानसभा भवन था, में खोला गया। बाद में इसे राजकीय छात्रावास में स्थानांतरित किया गया। इसके बाद एमआई रोड पर अजमेरी गेट के बाहर रामनिवास बाग के एक छोर के सामने यादगार भवन में स्थानांतरित किया गया। इसके बाद इसे जयपुर रेलवे स्टेशन के पास खास कोठी में शिफ्ट किया गया।
सन 1958 में राव कमीशन की सिफारिश पर अजमेर में तोपदड़ा स्कूल के पीछे शिक्षा विभाग के कमरों में स्थानांतरित किया गया। इसके बाद 26 जनवरी 1959 को जवाहर स्कूल के नए भवन में शिफ्ट किया गया। इसका उदघाटन तत्कालीन मुख्यमंत्री स्वर्गीय स्व. श्री मोहनलाल सुखाडिय़ा ने किया। सन 1966 में अध्यक्ष के अतिरिक्त सदस्यों की संख्या बदल कर कम से कम तीन और अधिकतम सात निर्धारित की गई। कुछ ही साल पहले इसकी सदस्य संख्या की सीमा 15 कर दी गई। इसमें सुपर टाइम आईएएस अधिकारियों के अतिरिक्त राजस्थान उच्च न्यायिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी, वरिष्ठ अभिभाषक और आरएएस से पदोन्नत वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों को पदस्थापित किया जाता है।
यहां बताना प्रासंगिक होगा कि अजमेर में सशक्त राजनीतिक नेतृत्व न होने के कारण कई बार इसके विखंडन की स्थितियां आईं, मगर वकीलों, बद्धिजीवियों, राजनीति नेताओं व समाज के अन्य तबकों के एक जुट हो कर विरोध करने के कारण टल गया।
विखंडन का नाम लिए बिना की गई थी विखंडन की तैयारी
बीते साल संभागीय आयुक्तों को राजस्व मंडल का सदस्य बना कर उसका विखंडन करने का प्रस्ताव था। इसके विरोध में एक ओर जहां अजमेर आंदोलित हुआ, वहीं राज्य सरकार इसे हल्के में ले रही थी और स्थिति स्पष्ट करने की बजाय उलझाए जा रही थी।
वस्तुत: विवाद शुरू ही इस बात से हुआ कि राजस्व महकमे के शासन उप सचिव ने संभागीय आयुक्तों को राजस्व मंडल के सदस्य की शक्तियां प्रदत्त करने संबंधी पत्र मंडल के निबंधक को लिखा। पत्र की भाषा से ही स्पष्ट था कि सरकार मंडल को संभाग स्तर पर बांटने का निर्णय कर चुकी थी, बस उसे विखंडन का नाम देने से बच रही थी। शासन उपसचिव के पत्र से ही स्पष्ट था कि गत 1 अप्रैल 2011 को अतिरिक्त मुख्य सचिव विकास की अध्यक्षता में हुई बैठक में ही निर्णय कर यह निर्देश जारी कर दिए थे कि संभागीय आयुक्तों को मंडल सदस्य के अधिकार दे दिए जाएं। तभी तो शासन उपसचिव ने निबंधक को साफ तौर निर्णय की नोट शीट भेज कर आवश्यक कार्यवाही करके सूचना तुरंत राजस्व विभाग को देने के लिए कहा था। इस पर वकीलों ने आंदोलन शुरू कर दिया, दूसरी ओर राजस्व मंत्री हेमाराम चौधरी यही कहते रहे कि मंडल के विखंडन जैसा कोई प्रस्ताव सरकार के पास विचाराधीन नहीं है। ऐसे में सवाल ये उठाा था कि क्या राजस्व मंत्री की जानकारी में लाए बिना ही अतिरिक्त मुख्य सचिव विकास की अध्यक्षता में निर्णय कर लिया गया? उससे भी बड़ा सवाल ये कि अगर अधिकारियों के स्तर पर निर्णय ले भी लिया था तो उसे कार्यान्वित किए जाने के लिए उनके अधीन विभाग के शासन उप सचिव ने राजस्व मंत्री को जानकारी दिए बिना ही मंडल के निबंधक को पत्र कैसे लिख दिया? माजरा साफ था कि या तो वाकई मंत्री महोदय को जानकारी दिए बिना ही पत्र व्यवहार चल रहा था, या फिर वे झूठ बोल रहे थे।
इस बाबत अजमेर फोरम ने भी सरकार को पत्र लिख कर कहा था कि बड़े हित के लिये किसी छोटे हित का बलिदान अवांछित नहीं माना जाता, किन्तु किसी छोटे को अकारण इसलिये भी बलि की वेदी पर नहीं चढ़ाया जा सकता कि वह छोटा है। राजस्व मंडल के अधिकार संभागीय मुख्यालयों को हस्तान्तरित करने का निर्णय भले ही कार्य विकेन्द्रीकरण के तर्क पर टिकाया गया हो मगर यह सच भी भुलाये जाने योग्य नहीं है कि अजमेर में राजस्व मंडल की स्थापना का निर्णय भी इस तर्क के आधार पर ही लिया गया था कि राज्य के अन्य शहर भी राजधानी के साथ साथ अपने किसी महत्व के आधार पर विकास की दौड़ में आगे बढ़ सकें। सिर्फ इतना ही नहीं याद रखने लायक यह ऐतिहासिक तथ्य भी है कि सन 1958 में पी.सत्यनारायण राव, विश्वनाथन एवं गुहा कमेटी की रिपोर्ट में कहा गया था कि राज्य की राजधानी जयपुर को बनाया जाता है तो लोक सेवा आयोग, माध्यमिक शिक्षा बोर्ड तथा राजस्व मंडल सरीखे महत्वपूर्ण दफ्तर अजमेर में स्थापित किये जायें। ऐसी स्थिति में राजस्व मंडल के अधिकार यदि अनावश्यक रूप से विखंडित किये जाते हैं तो इसे एक आधारभूत समझौते की अवहेलना ही माना जाएगा।
अजमेर फोरम राजस्व मंडल के मुद्दे पर अजमेर के वकीलों की मंाग का समर्थन करते हुए अनुरोध करता है कि राजस्व मंडल की गरिमा व अजमेर की अस्मिता के साथ छेड़छाड न की जाए।
बहरहाल, आखिरकार सरकार ने दबाव बढ़ता देख मामला दफ्तर दाखिल कर दिया और राजस्व मंडल आज अपने मूल रूप में अजमेर की शान बना हुआ है।
-तेजवानी गिरधर