गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

विधायक देवनानी ने खेला तुरुप का पत्ता


अजमेर उत्तर के भाजपा विधायक प्रो. वासुदेव देवनानी ने तुरुप का पत्ता खेल दिया है। वे पार्टी के वरिष्ठ नेता गुलाब चंद कटारिया की मेवाड़ यात्रा के समर्थन में खुल कर मैदान में आ गए हैं। उन्होंने कहा है कि प्रवास पर जाना भाजपा नेताओं की कार्य संस्कृति का हिस्सा है। भाजपा के कार्यकर्ता, पदाधिकारी और जनप्रतिनिधि प्रवास करते रहते हैं। उनकी इस चाल पर अजमेर सहित प्रदेशभर के भाजपा नेता चकित हैं। संभव ये भी है कि उन्होंने सामान्य तौर पर कटारिया की यात्रा को जायज बताया हो, मगर चूंकि यह विषय भाजपा के लिए काफी संवेदनशील है, इस कारण उनके समर्थन को विशेष रणनीति व अर्थ में लिया जा रहा हो।
ज्ञातव्य है कि कटारिया की पूर्व में प्रस्तावित मेवाड़ यात्रा, जो कि उस वक्त स्थगित हो गई, को लेकर भाजपा में बड़ा घमासान हो चुका है। हालत ये हो गई थी कि पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को हाईकमान पर दबाव बनाने के लिए विधायकों व पदाधिकारियों के सामूहिक इस्तीफे की राजनीति करनी पड़ी थी। बवाल बढ़ता देख कटारिया ने खुद ही पार्टी हित में कदम पीछे खींच लिए और यात्रा स्थगित कर दी थी। तब से लेकर वसुंधरा व संघ खेमे में तलवारें खिंची हुई हैं और अब तक सुलह का कोई रास्ता नहीं निकल पाया है। इसी बीच जैसे ही कटारिया ने जैसे ही दुबारा यात्रा आरंभ कर दी तो सभी भौंचक्के रह गए। राजनीतिक पंडित शतरंज की इस चाल को समझने की कोशिश कर ही रहे थे कि इसी बीच देवनानी ने खुल कर उनका समर्थन कर दिया। यहां यह बताना प्रासंगिक होगा कि पिछली बार जब वसुंधरा ने विधायकों के इस्तीफे एकत्रित किए थे तो जानकारी यही उभर कर आई थी कि देवनानी ने इस्तीफे पर हस्ताक्षर नहीं किए थे, हालांकि उन्होंने चुप्पी साधते हुए कोई प्रतिक्रिया भी नहीं दी थी। इसके बावजूद समझा यही गया कि चूंकि वे संघ लॉबी से हैं, इस कारण वसुंधरा को उनसे इस्तीफा देने की उम्मीद भी नहीं रही होगी।
बहरहाल, अब जबकि देवनानी खुल कर कटारिया के साथ आ गए हैं, इसका अर्थ यही लगाया जा रहा है कि वे इस बार वसुंधरा के मानसिक दबाव से पूरी तरह से मुक्त होना चाहते हैं। साथ ही संघ लॉबी के साथ खुल कर खड़े हो कर अपना स्टैंड साफ कर देना चाहते हैं।
वैसे देवनानी ने एक चतुराई भी दिखाई। जब उनसे पूछा गया कि भाजपा नेता रामदास अग्रवाल के वी से वी तक के बयान पर उनका क्या कहना है तो वे बोले कि वी से वी का असली मतलब विकास से विजय तक की यात्रा होता है। प्रदेश में भाजपा शासन में जो विकास हुआ, अब आगामी विधानसभा चुनावों में पार्टी को उसी आधार पर विजय मिलेगी। अग्रवाल ने यह बात किस संदर्भ में बोली इसका जवाब तो वे ही दे सकते हैं। समझा जा सकता है कि अग्रवाल का बयान संकेतों में सीधे-सीधे वसुंधरा पर ही था, मगर देवनानी ने उसका दूसरा ही अर्थ निकाल कर अपने आप को साफ बचा लिया।
ज्ञातव्य है कि वे मूलत: संघ लॉबी से ही हैं, मगर जब संघ के कोटे से उन्हें मंत्री बनाया गया था तो बाद में संघ के लोग ही उन पर संदेह करने लगे थे। इस पर वे पलट कर संघ खेमे में आ गए। और उसी की बदोलत उन्हें फिर से टिकट मिला  व जितवाने में भी संघ की बड़ी भूमिका थी। तब से वे संघ लॉबी में ही बने हुए हैं, लेकिन पिछले कुछ दिनों से सामान्य शिष्टाचार के नाते वसुंधरा के संपर्क में भी रहे। कदाचित संघ उन पर फिर से संदेह कर रहा हो और उन्हें दो घोड़ों पर सवार माना जा रहा हो, सो उन्होंने खुल कर मैदान में आना ही उचित समझा। इससे जाहिर तौर पर संघ की मुहिम को बल मिलेगा। इसका बड़ा फायदा ये हो सकता है कि संघ लॉबी उनके टिकट की खातिर फिर अड़ सकती है। अब ये तो वक्त ही बताएगा कि उनकी तुरुप यह पत्ता कामयाब होता है या पिट जाता है।
-तेजवानी गिरधर

सोमवार, 17 दिसंबर 2012

बारूद के ढ़ेर पर बैठा है अजमेर शरीफ


समझौता एक्सप्रेस में ब्लास्ट के आरोपी दशरथ चौहान की एनआईए दिल्ली की टीम की ओर से की गई गिरफ्तारी के बाद उसका यह खुलासा अजमेर सहित पूरे देशवासियों के लिए सनसनीखेज और चिंताजनक है कि उसका और उसके साथियों का इरादा इसी साल अजमेर में बड़ा बम ब्लास्ट करने का था, लेकिन किसी कारण षड्यंत्र सफल नहीं हो पाया। इस साल उसकी जयपुर में दीपावली मनाने की योजना बनाई थी। वह कितना खूंखार है, इसका अनुमान इसी बात ये लगाया जा सकता है कि पूछताछ के दौरान एनआईए की टीम के समक्ष दिए गए बयान में दशरथ को अपराध का कोई मलाल नहीं था। उसने कहा कि पाकिस्तान के आतंकवादी जब चाहें भारत में हत्या कर चले जाते हैं। हमने जो किया उसका कोई मलाल नहीं। मैंने अपना फर्ज निभाया, पुलिस अपना फर्ज निभाए। ज्ञातव्य है कि नागदा से गिरफ्तार दशरथ पर 5 लाख रु. का इनाम था। दशरथ पर मई 2007 में हैदराबाद की मक्का-मदीना मस्जिद में विस्फोट का भी आरोप है।
दशरथ सिंह के खुलासे के बाद यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि भले ही अपने आंचल में दरगाह ख्वाजा गरीब नवाज और तीर्थराज पुष्कर को समेटे अजमेर को सांप्रदायिक सौहार्द्र के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता हो, मगर हकीकत ये है कि यह आज बारूद के ढ़ेर पर बैठा है। इतना ही नहीं दशरथ सिंह की गिरफ्तारी के बाद जिस प्रकार दरगाह शरीफ के मेन गेट पर खादिमों की संस्था अंजुमन के पूर्व सदर सैयद किबरिया चिश्ती व पूर्व सचिव सैयद सरवर चिश्ती ने जिस तल्ख अंदाज में प्रतिक्रिया दी, उससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह शहर किसी भी वक्त अशांति के आगोश में समा सकता है।
असल में अजमेर पिछले लंबे अरसे से आपराधिक गतिविधियों का केन्द्र बनता जा रहा है। प्रसंगवश बताना लाजिमी है कि पिछले दिनों अजमेर पुलिस को उदयपुर पुलिस के माध्यम से यह जानकारी मिली थी कि मुम्बई के तीन शार्प शूटर मोहम्मद आजम, तानिश शाह और अयूब एक इंडिगो कार में सवार हो कर नाथद्वारा से अजमेर दरगाह जियारत करने आए हुए हैं। वे किसी गम्भीर वारदात को भी अंजाम दे सकते हैं। पुलिस रात भर उनकी तलाश करती रही पर कुछ हाथ नहीं आया। दूसरे दिन सूचना मिली कि शार्प शूटर इंडिगो कार में सवार होकर रेलवे स्टेशन की और जा रहे हैं। पुलिस ने स्टेशन पर नाकाबंदी की, मगर शार्प शूटर सचेत हो गए और कार छोड़ कर भाग गए। पुलिस ने लाख कोशिश की मगर वे हाथ नहीं आए। केवल कार का ड्राइवर श्यामलाल ही पकड़ में आ पाया।
इससे ठीक एक दिन पहले आनासागर झील की चौपाटी के नजदीक एस्केप चैनल की सफाई के दौरान बरामद हुए बम, एक खुखरी और चाकू ने भी शांत नजर आने वाले अजमेर को यकायक किसी बड़ी आशंका से भयभीत कर दिया था। आयुध विशेषज्ञों का मानना है कि ये हथगोले 300 मीटर तक मार कर सकते थे और 150 मीटर के दायरे में भारी तबाही मचा सकते थे। चौंकाने वाला तथ्य ये है कि इन बमों को एक सप्ताह के भीतर ही रखा गया था।
उल्लेखनीय है कि शहर में जिंदा हथगोला मिलने का यह पहला मामला नहीं है। इससे पूर्व वर्ष 2009 में सितंबर के अंतिम सप्ताह में हाथीखेड़ा गांव के पहाड़ी क्षेत्र में भी 4 जिंदा हैंड ग्रेनेड मिले थे। लोहाखान क्षेत्र में एक खंडहर से मशीनगन की बुलेट भी बरामद हो चुकी हैं।
असल में पिछले कुछ समय से हो रही इस प्रकार की आपराधिक घटनाओं से अजमेर यकायक अति संवेदनशील शहरों की गिनती में आ गया है। यूं तो मादक पदार्थों का ट्रांजिट सेंटर बने दरगाह इलाके व पुष्कर में अंडरवल्र्ड के लोगों की आवाजाही की वजह से इस सरजमीं के नीचे सुलग रही आग का इशारा समय-समय पर मिलता रहा है, मगर दरगाह में बम फटने के बाद तो यह साबित ही हो गया कि आतंकवाद के राक्षस ने यहां भी दस्तक दे दी है।
जहां तक अंडरवल्र्ड की गतिविधियों का सवाल है, अनेक बार यह प्रमाणित हो चुका है कि अजमेर मादक पदार्थों की तस्करी कर ट्रांजिट सेंटर बन चुका है। जोधपुर के सरदारपुरा इलाके में एक साइबर कैफे से पकड़ा गया आईएसआई एजेंट ऋषि महेन्द्र बिना पासपोर्ट व वीजा के बांग्लादेश सीमा से भारत में घुसा और अजमेर के दरगाह इलाके में रहने लगा। बाद में पता लगा कि उसे आईएसआई ने भारतीय सेना के पूना से लेकर पश्चिमी सीमा पर स्थित ठिकानों का पता लगाने के लिए भेजा था। वह यहां लंगरखाना गली में होटलों में नौकरी करता रहा। वह कुछ वक्त जयपुर के रामगंज इलाके में रह चुका था।
इसी प्रकार निकटवर्ती किशनगढ़ की मार्बलमंडी में हिजबुल मुजाहिद्दीन का खुंखार आतंकवादी शब्बीर हथियारों सहित पकड़ा गया तो पुलिस और खुफिया तंत्र सकते में आ गया था। तब जा कर इस बात का खुलासा हुआ कि दरगाह इलाके की ही तरह किशनगढ़ की मार्बलमंडी में भी देशभर से लोगों की आवाजाही के कारण संदिग्ध लोग आसानी से घुसपैठ कर जाते हैं। इसी प्रकार दरगाह इलाके में पाक जासूस मुनीर अहमद और सलीम काफी दिन तक रह कर अपनी गतिविधियां संचालित कीं, लेकिन खुफिया तंत्र तो भनक तक नहीं लगी। शब्बीर की निशानदेही पर हैदराबाद में पकड़े गए मुजीब अहमद के तार आईएसआई से जुड़े होने के पुख्ता प्रमाण मिले।
अपराधियों के हौसले इतने बुलंद हैं कि वे जेल से ही आपनी गेंगों का संचालन कर रहे हैं। इस सिलसिले में अनेक बार मोबाइल सहित अन्य आपत्तिजनक चीजें भी बरामद हो चुकी हैं।
खुफिया पुलिस बीच-बीच में आसानी से आ-जा रहे बांग्लादेशी घुसपैठियों को पकड़ कर भले ही अपनी पीठ थपथपाती रही है, मगर वह इसके लायक नहीं, यह तब साबित हो गया, जब मुंबई बम ब्लास्ट का मास्टर माइंड हेडली पुष्कर हो कर चला गया। तब ही इशारा हो गया था कि पुष्कर में स्थित इजरायलियों का धर्म स्थल बेद खबाद आतंकियों के निशाने पर है। इसी प्रकार ब्रह्मा मंदिर को खतरे की सूचनाएं भी समय समय पर मिलती रही हैं। हाल ही दो पाकिस्तानियों के पुष्कर में आ कर लौट जाने व पुलिस तंत्र को इसकी जानकारी बाद में मिलने से अंदाजा लगाया जा सकता है, यह अति संवेदनशील शहर आज बारूद के ढ़ेर पर बैठा है और पुलिस तंत्र नीरो की तरह चैन की बंसी बजा रहा है।
-तेजवानी गिरधर

अब जा कर चेते, की बैलों की सार-संभाल

देर आयद, दुरुस्त आयद। देर से ही सही अजमेर की सामाजिक व धार्मिक संस्थाओं ने रेलवे स्टेशन से पिछले दिनों झारखंड के लिए ले जाते छुड़ाए गए 64 बैलों को ऋषि उद्यान गोशाला में चारे-पानी और अन्य भोजन की व्यवस्था के लिए हाथ आगे बढ़ाए हैं। बेशक यह मीडिया का ही प्रयास है कि सामाजिक संगठनों के साथ बैलों को छुड़ाने वाले हिंदूवादी संगठनों के कार्यकर्ताओं को भी लगा कि केवल पशुओं को कत्लखाने जाने से रोकने अथवा छुड़वाना ही पर्याप्त नहीं है। उनकी सार संभाल भी की जानी चाहिए। सरकार की तो जिम्मेदारी है ही, मगर ऐसे काम में जनसहभागिता भी होनी ही चाहिए।
यहां ज्ञातव्य है कि पिछले दिनों झारखंड के लिए ले जाते छुड़ाए गए 64 बैल ऋषि उद्यान गोशाला के लिए बोझ बन गए तो गोशाला संचालक यतीन्द्र शास्त्री ने मुंह खोला। उधर जीआरपी सुपुर्दगीनामे पर बैलों को सुपुर्द करने के बाद उनकी जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं थी। यह खबर जब दैनिक भास्कर व राजस्थान पत्रिका में छपी तो हलचल हुई। प्रशासन भी जागा तो सामाजिक संगठनों को भी ख्याल आया। अपुन ने भी इस कॉलम में सवाल उठाया कि क्या पशुओं को छुड़वा देने से ही कर्तव्य की इतिश्री हो जाती है? जिन्होंने धर्म के नाम पर बैलों को कत्लखाने जाने से रोक कर वाहवाही ली, उन्होंने पलट कर यह भी नहीं देखा कि उन बैलों का क्या हुआ और बैल शास्त्री के गले पड़ गए। यदि ऐसा होता रहा तो भविष्य में कोई काहे को इस प्रकार सुपुर्दगी लेगा? गाय-बैलों को मुक्त करवाने वाले धर्म और नैतिकता के नाते उनके चारे-पानी की जिम्मेदारी क्यों नहीं लेते? जब धर्म के नाम पर अन्य कार्यों पर लाखों-करोड़ों रुपए खर्च होते हैं तो जानवरों की परवरिश क्यों नहीं की जाती? इस खबर पर एक फेसबुक मित्र को बहुत बुरा लगा कि हम तो रातें जाग कर पशुओं को बचाते हैं और आप घर बैठ कर रजाई में घुसे हुए सवाल उठा देते हैं। उन्हें अपुन ने यही जवाब दिया कि महाशय जिस प्रकार हिंदूवादी संगठन पशुओं को बचाने का काम करते हैं, ठीक इसी तरह मीडिया भी उनकी सार संभाल के लिए जनता व सरकार को जगाने का काम करती है। खैर, अब मीडिया की मुहिम रंग लाई है। जैन मिलन, अजमेर माहेश्वरी प्रगति संस्था और पार्षद ज्ञान सारस्वत के प्रयासों से चारे और गुड़ की व्यवस्था की गई है। बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद और शिवसेना के कार्यकर्ता भी बैलों की मदद के लिए पहुंचे। कुल मिला कर यह सुखद बात है कि अजमेर की संस्थाओं में सेवा का भाव है, बशर्ते कि उन्हें पता लगे कि कहां सेवा करने की जरूरत है। अंत भला, सो भला।
-तेजवानी गिरधर

रविवार, 16 दिसंबर 2012

महान सूफी संत के दर से फूटा आक्रोश


पांच साल पहले हुए समझौता एक्सप्रेस बम ब्लास्ट के आरोपी दशरथ सिंह को एनआईए और दिल्ली-नागदा पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए जाने के बाद जो प्रतिक्रिया पूरे विश्व में सांप्रदायिक सौहार्द्र की मिसाल महान सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती की दरगाह के दर से आई, वह अजमेरवासियों के लिए चिंता का विषय है। ज्ञातव्य है कि अंजुमन सैयद जादगान के पूर्व अध्यक्ष सैयद गुलाम किबरिया चिश्ती व पूर्व सचिव सैयद सरवर चिश्ती ने दशरथ को कड़ी से कड़ी सजा दिए जाने की मांग करते हुए दरगाह शरीफ के गेट पर जोरदार प्रदर्शन किया। अगर दशरथ दोषी है तो उसे वही सजा मिलेगी, जो कि कानून के मुताबिक संबंधित न्यायालय देगा और देना भी चाहिए, मगर जिस प्रकार उसकी तुलना कसाब प्रकरण से की गई और बेहद तल्ख भाषा का इस्तेमाल किया गया, वह अजमेर के शांत माहौल के लिए कत्तई ठीक नहीं माना जा सकता।
यूं इन दोनों खादिम नेताओं की ओर से निजी तौर पर की गई प्रतिक्रिया को अंजुमन या पूरी खादिम कौम की प्रतिक्रिया नहीं माना जा सकता, मगर जिस प्रकार सार्वजनिक रूप से गरमागरम बयानबाजी हुई, उसे अगर दरगाह शरीफ के पाक और कदीमी मुकाम से जोड़ कर देखा जाए तो वह काफी गंभीर है। बेशक दरगाह शरीफ सभी धर्मावलंबियों की आस्था का केन्द्र है और उस पर अगर हमला किया जाता है तो वह सभी की आस्था पर हमला है, अकेले किसी एक जमात पर नहीं। अगर ऐसा होता तो अकेली एक ही जमात यहां सुकून पाने को आती। दरगाह में पूर्व में हुए बम विस्फोट पर सभी जमातों को उतना ही गुस्सा आया, जितना एक जमात को आया। किसी भी जमात ने उसकी तरफदारी नहीं की। अगर चंद लोग उस हमले के पीछे थे, जो कि साबित होना बाकी है, तो उन्हें पूरी कौम या संगठन से जोड़ कर नहीं देखा जा सकता। जनाब किबरिया साहब ने जरूर कुछ संयत भाषा का इस्तेमाल किया, मगर जनाब सरवर साहब तो भावावेश में आ गए। उन्होंने साफ तौर पर बम विस्फोट करने की मंशा रखने वाले तत्वों को चुनौती दे कर उन्हें उत्तेजित करने का ही काम किया है। उनकी भावना को समझा जा सकता है, महसूस किया जा सकता है, मगर जिन शब्दों का इस्तेमाल उन्होंने किया, जिन्हें कि यहां लिखना उचित नहीं है, वे कम से कम उन जैसे जिम्मेदार शख्स को शोभा नहीं देते।
उल्लेखनीय है कि करीब एक माह पहले भी उन्होंने एक विवादास्पद बयान दिया था, जिस पर मंगलूर शहर की पांडेश्वर पुलिस ने मामला दर्ज किया। उन्होंने कहा था कि नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बन गए तो कोई ताज्जुब नहीं कि सारे मुसलमान आतंकवादी बन जाएं। गत दो नवंबर को पॉपूलर फ्रंट ऑफ इंडिया की सार्वजनिक बैठक में दिए गए इस बयान पर वहां के नागरिक सुनील कुमार ने शिकायत दर्ज करवाई है कि यह भड़काऊ भाषण लोंगों को दंगे उकसाने प्रयास है। तब भी चिश्ती को निजी तौर पर जानने वालों को अचरज हुआ था कि एक प्रगतिशील खादिम और खादिमों में नई सोच लाने की की कोशिश करने वाला ऐसा कैसे कह सकता है। वैसे कुछ लोगों का मानना है कि वे अंजुमन पर दुबारा काबिज होने के लिए इस प्रकार की बयानबाजी कर रहे हैं।
-तेजवानी गिरधर

जनाब सरवर चिश्ती के पूर्व प्रकरण से संबंधित न्यूज आइटम पढऩे के लिए यहां क्लिक कीजिए:-
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अजमेर की आशा ने पाया चंडीगढ़ में सम्मान


अजमेर की आशा मनवानी को भले ही अजमेर की जनता ने न ठीक से पहचाना हो और न ही कभी कोई सम्मान दिया हो, मगर उनकी बिंदास पर्सनल्टी की महक चंडीगढ़ पहुंच गई और उन्हें वहां नीरजा भनोट अवार्ड से नवाजा गया है।
जरा अपनी स्मृति में टटोलिए। ये आशा मनवानी वही महिला हैं, जो अमूमन अजमेर में महिलाओं के लिए काम करने वाली स्वयंसेवी स्वयंसेवी संस्थाओं के कार्यक्रमों में नजर आती रही हैं। इकहरे बदल व नाटे कद की इस महिला को समाजसेवा के क्षेत्र में काम करने वाले लोग उन्हें भलीभांति पहचानते हैं। महिलाओं पर होने वाले अत्याचार के खिलाफ लडऩे वाले यह लड़ाकू महिला दिखने में तो सामान्य सी लगती है, इसी कारण उनके व्यक्तित्व पर किसी ने गौर नहीं किया। मगर इस महिला की प्रतिभा को चंडीगढ़ में न केवल पहचाना गया, अपितु नवाजा भी गया।
चंडीगढ़ के यूटी गेस्ट हाउस में उनको  नीरजा भनोट अवार्ड से सम्मानित किया गया है। उन्हें यह अवार्ड पूर्व थलसेना अध्यक्ष रिटायर्ड जनरल वी पी मलिक के हाथों दिलवाया गया। उनके व्यक्तित्व से प्रभावित हो कर दैनिक भास्कर के सिटी लाइफ ने उनका विशेष कवरेज दिया है। आइये, देखते हैं कि उसमें क्या लिखा है:-
पत्नी को सताने वाले को थप्पड़ मारने से नहीं कतराती ये महिला
चंडीगढ़। अजमेर में लोग इन्हें लड़ाकू के नाम से जानते हैं। हो भी क्यों न। पत्नी को सताने वाले हर पति को यह थप्पड़ मारने से कभी भी नहीं कतरातीं। जरूरत पड़े तो पुलिस की तरह भी पेश आती हैं। यह हैं अजमेर की 55 वर्षीय आशा मनवानी। आशा ने सिटी लाइफ से शेयर किया लड़ाकू बनने का सफर।
किसी ने सच ही कहा कि हालात इंसान को मजबूत बना देते हैं। आशा के साथ भी ऐसा ही हुआ। वह मजबूत बनीं। खुद के लिए भी और अपने जैसी दूसरी औरतों के लिए भी। इसके पीछे उनकी जिंदगी की दर्दनाक दास्तान है। आशा ने बताया कि छोटे कद के कारण उनके पति ने उन्हें शादी के बाद से कोसना शुरू किया। उन्हें अलसर की बीमारी हुई तो उन्हें इलाज के लिए माइके जाने को कहा और पीछे से दूसरी शादी कर ली। इस लाचार बेटी का साथ माइके वालों ने भी दिया। पर आशा ने हार नहीं मानी और हालातों के साथ लड़ती चली गईं। एक फैक्ट्री में काम मिला तो खुद का और बच्चों का गुजारा किया।
हमें तो अपनों ने लूटा गैरों में कहां दम था, हमारी कश्ती वहां डूबी, जहां पानी कम था। यह कहावत बोलने के बाद आशा ने दो किस्से सुनाए, जिन्हें सुन कर किसी की आंख में भी आंसू आ जाएं। आशा ने बताया कि फैमिली कोर्ट के आदेश के बावजूद उनके व्यापारी पति ने मुआवजा नहीं दिया। फैसला हुआ भी तो मुआवजे के रूप में उन्हें महीने के मात्र 1000 रुपये मिलते थे, जो बढ़ कर अब 2200 हो गए हैं। यह राशि भी उन्हें कोर्ट के कई चक्कर लगाने के बाद मिलती हैं। अपनी 32 साल की बेटी की शादी के लिए उनके पास पैसे नहीं हैं। दहेज न देना भी बेटी की शादी न होने का कारण है। इस पर आशा ने कहा कि बुजुर्गों और रीति-रिवाजों के नाम पर आज भी लड़की के पेरेंट्स से ससुराल वाले बहुत कुछ वसूलते हैं। इसलिए बेटी की शादी में पेरेंट्स को सिर्फ बेटी के नाम की एफडी, गोल्ड और प्लॉट देना चाहिए ताकि जरूरत के समय पर वह किसी की मोहताज न हों। दूसरा किस्सा सुनाते हुए आशा ने कहा कि पाई-पाई जोड़ कर जो मकान बनाया, उसकी रजिस्ट्री भी भाईयों ने धोखे से अपने नाम करा ली। मगर अवॉर्ड में मिलने वाले डेढ़ लाख रुपये पाकर वह बेहद खुश हैं।
सब कानून मालूम हैं
मनवानी छठी क्लास तक पढ़ी हैं, मगर अब सभी कानूनी कार्यवाइयों से भलीभांति अवगत हो चुकी हंै । वे असहाय महिलाओं की मदद करती हैं। महिलाओं को स्त्रीधन, कोर्ट के बाहर परिवारों को मिलाने, महिलाओं को तलाक ओर महिलाओं व उनके बच्चों को आश्रय दिलाने में मदद की है। फैमली कोर्ट अब कई मामलों में उनकी मदद लेता है। आशा महिलाओं के अधिकारों के लिए लडने वाली लक्षता महिला संस्थान की सचिव हैं।