सोमवार, 4 फ़रवरी 2013

मुस्तफा ने किया पलट कर भाजपा पर भी वार

कहते हैं न कि कोई अपनों को भले ही गालियां दे, मगर अगर गैर अपनों को गाली दें तो वह उसे बर्दाश्त नहीं होता। कुछ ऐसा ही वाकया नगर निगम के मनोनीत कांग्रेसी पार्षद सैयद गुलाम मुस्तफा चिश्ती ने पेश किया है। कल तक नगर निगम के मेयर कमल बाकोलिया के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले चिश्ती ने एक लिखित बयान जारी कर भाजपा पार्षद दल की बैठक पर सवाल खड़े किए हैं और उससे दोहरे चरित्र पर अपना नजरिया स्पष्ट करने को कहा है। उनका कहना है कि शहर भाजपा जनता के साथ धोखा कर गुमराह कर रही है। भाजपा पार्षद दल की बैठक में जिन मुद्दों पर नगर निगम की साधारण सभा में विरोध करना तय किया गया है, उन मुद्दों पर भाजपा पार्षद व उप महापौर अपनी सैद्धांतिक सहमति व्यक्त कर चुके हैं।
गुलाम मुस्तफा ने कहा कि भाजपा साधारण सभा निगम परिसर के अन्यत्र करने के मुद्दे पर धरना और मामला सदन में उठाने की घोषणा कर चुकी है, जबकि भाजपा पार्षद दल के मुख्य सचेतक भागीरथ जोशी व पार्षद नीरज जैन व भारती श्रीवास्तव फायसागर पार्क में सभा करने का सार्वजनिक समर्थन का ऐलान कर चुके हैं। इसी प्रकार महात्मा गांधी मार्ग का नाम बदलने के प्रस्ताव का गांधीजी के प्रति आस्था प्रकट कर विरोध करने वाली भाजपा का दोहरा चरित्र इससे भी साबित होता है कि उनके दल के उप महापौर अजित सिंह राठौड़ नाम बदलने का समर्थन कर चुके हैं। निगम के पूर्व महापौर धर्मेन्द्र गहलोत ने तो कचहरी रोड का नाम महात्मा गांधी मार्ग होने पर सवालिया निशान लगा दिया है कि निगम रिकार्ड उपलब्ध करवाएं कि इस मार्ग का नाम रिकार्ड में गांधीजी के नाम पर है या नहीं। यह भी तब जबकि वे खुद महापौर रह चुके हैं और रिकार्ड से बखूबी वाकिफ हैं। इससे उनकी गांधीजी के प्रति आस्था का पता चलता है।
गुलाम मुस्तफा का कहना है कि जहां विपक्ष मजबूत होता है, वहां सत्ता पक्ष संवेदनशील हो कर कार्य करता है। निगम में भाजपा निष्क्रिय है, यही कारण है कि भाजपा पार्षद ने अपने नेतृत्व पर अविश्वास व्यक्त कर मेरे द्वारा उठाई गए मुद्दों का समर्थन कर रहे हैं। इसका ज्वलंत उदाहरण है कि मुख्य सचेतक के रूप में भागीरथ को नियुक्त करना।
उनका कहना है कि सुभाष उद्यान व फॉयसागर पार्क को बीओटी पर देने के प्रस्ताव पर भी भाजपा को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। वह अपनी बैठक में तय कर चुकी है कि सदन पटल पर बीओटी आधारित शर्तें रखनी चाहिए, इससे जाहिर होता है कि भाजपा पार्कों को सशर्त ठेके पर देने के समर्थन में है, जो कि जनता के पार्कों में घूमने के अधिकार पर कुठाराघात है।
बेशक गुलाम मुस्तफा की इन बातों में दम तो नजर आता है और मेयर बाकोलिया पर भी जो आरोप लगाए थे, उनमें भी दम था, मगर यकायक पलट कर भाजपा पर वार करने का राज समझ में नहीं आता। कहीं ऐसा तो नहीं कि उनके बाकोलिया पर वार करने को कांग्रेस विरोधी कृत्य माने जाने को डाइल्यूट करने के लिए भाजपा का रुख किया है। बहरहाल, जो कुछ हो, उनके सवालों का जवाब न तो कांग्रेस के पास है और न ही भाजपा के पास।
-तेजवानी गिरधर

रविवार, 3 फ़रवरी 2013

भाजपा भी तो जिम्मेदार है बाकोलिया की नाकामी के लिए

लंबे अरसे बाद होने जा रही नगर निगम की साधारण सभा को लेकर शहर की राजनीति गरमा गई है। एक ओर जहां कांग्रेस के मनोनीत पार्षद गुलाम मुस्तफा ने सीधे निगम मेयर कमल बाकोलिया पर हमला बोला है, वहीं भाजपा पार्षद दल भी यकायक जाग गया है। उसे भी शहर की बदहाली की चिंता सताने लगी है। उसे अब याद आ रहा है कि जनता के व्यापक हित में राजस्थान नगर पालिका अधिनियम 2009 के प्रावधानों के तहत साधारण सभा 60 दिवस के भीतर होनी चाहिए, लेकिन निगम मेयर और प्रशासन ने इसका उल्लंघन किया। अधिनियम में यह भी प्रावधान है कि बैठक निगम परिसर या कार्यालय में होनी चाहिए।
सवाल ये है कि भाजपा को मेयर की इस नाकामी का अचानक याद कैसे आ गई? भाजपा की ओर से जारी बयान में लिखा है कि शहर जिला अध्यक्ष रासासिंह रावत, विधायक वासुदेव देवनानी, श्रीमती अनिता भदेल, वरिष्ठ उपाध्यक्ष एवं प्रवक्ता अरविंद यादव, पूर्व सभापति सुरेंद्र सिंह शेखावत, महामंत्री धर्मेंद्र गहलोत, कैलाश कच्छावा, सोमरत्न आर्य ने मेयर बाकोलिया के ढ़ाई वर्ष के कार्यकाल को विफलतम बताते हुए कहा कि इस अवधि में अजमेर सर्वाधिक बदहाली का शिकार हुआ। कांग्रेस की कार्यप्रणाली से जनता सर्वाधिक निराश हुई है। उनके आरोप में दम है, मगर सवाल ये है कि निगम बोर्ड में बराबर की टक्कर जितने पार्षद होने के बाद भी भाजपा मेयर को घेरने में कामयाब क्यों नहीं हो पाई? स्पष्ट है कि शहर भाजपा नेताओं की आपसी फूट, पार्षदों में बिखराव और सशक्त नेतृत्व के अभाव के कारण भाजपा निगम में विपक्ष की भूमिका सशक्त ढंग से नहीं निभा पाई है। सच तो ये है कि मेयर बाकोलिया को अपने ही कांग्रेसी पार्षदों की बजाय भाजपा पार्षदों का निजी तौर पर संबल हासिल है।
भाजपा पार्षद दल की इस हालत पर मलाल खुद भाजपा पार्षदों तक को हो चला है। भाजपा पार्षद दल की बैठक से छन कर आई खबरों से तो यह भी सामने आया है कि तेजतर्रार पार्षद नीरज जैन ने भाजपा पार्षद दल की बैठक में यह कह कर खिन्नता जाहिर की कि भाजपा नेताओं, पार्षदों के बीच तालमेल के अभाव के कारण ही हम आज तक निगम में कांग्रेस के मेयर और निगम प्रशासन की नियम विरुद्ध कार्रवाइयों का मजबूती से विरोध नहीं कर पाए। अगर कोई पार्षद पहल भी करता है, तो पार्टी के अन्य पार्षद यह कहते हुए साथ छोड़ देते हैं कि तुम्हें किसने अधिकृत किया। भाजपा पार्षदों में आपसी टांग खिंचाई का नतीजा यह है कि निगम में भाजपा का बोर्ड होते हुए भी पार्षद जनहित के मुद्दे पुरजोर तरीके से नहीं उठा पाते। इतना ही नहीं, बैठक के दौरान यह भी उजागर हुआ कि कुछ पार्षद अपने ही नेता डिप्टी मेयर अजीत सिंह से संतुष्ट नहीं हैं और अपने आपको नेतृत्वहीन मानते हैं। यह दीगर बात है कि अपनी बेटी की शादी के व्यस्त अजित सिंह बैठक में मौजूद नहीं थे, वरना उनके सामने बोलने की तो आज तक किसी ने हिम्मत नहीं दिखाई।
वैसे यह नेतृत्व की ही खामी है कि पार्षद जे. के. शर्मा बिना किसी का मार्गदर्शन लिए अपने स्तर पर ही तय कर लेते हैं कि वे नियमों के विपरीत बोर्ड की बैठक फॉयसागर पार्क में करने पर धरना देंगे, जिस पर शहर भाजपा अध्यक्ष रासासिंह असमंजस में पड़ जाते हैं कि क्या करें, क्या न करें? वे तो इस कारण ढ़ीले पड़े थे खुद भाजपा बोर्ड के समय भी निगम से बाहर बैठक की जा चुकी है। वो तो पूर्व मेयर धर्मेन्द्र गहलोत ने स्टडी कर ताजा नियमों का खुलासा किया, तब जा कर रणनीति बनाने का रास्ता निकल कर आया। गहलोत ने बताया कि नगर निगम के कंडक्ट ऑफ बिजनेस रूल 1974 में साधारण सभा नगर निगम भवन के साथ ही निगम की अन्य परिसंपत्ति में भी करने के विकल्प दिए गए थे। इसे सन् 2009 के एक्ट में संशोधित कर सभी विकल्प हटाकर जीसी केवल नगर निगम कार्यालय में कराने की अनिवार्यता रखी गई है।
पार्टी कितनी दिशाविहीन है, इसका अंदाजा इसी बात से हो जाता है कि तकरीबन ढ़ाई साल बाद उसे खयाल आता है कि उसे मुख्य सचेतक नियुक्त करना चाहिए और बोर्ड बैठक में कांग्रेस को टक्कर देने के लिए भागीरथ जोशी की नियुक्ति की जाती है।
खैर, अब जब कि पार्टी नेताओं ने पार्षदों को पुरानी बातों और विवादों को भुलाकर एकजुट होकर जनहित के मामले सभा में उठाने पर जोर दिया है, देखते हैं यह अपील कितना असरकारक होती है।
-तेजवानी गिरधर

शनिवार, 2 फ़रवरी 2013

गांधीजी का नाम हटाने का प्रस्ताव रखा ही कैसे?


पार्षद सैयद गुलाम मुस्तफा चिश्ती
अजमेर नगर निगम की साधारण सभा के एजेंडे में कचहरी रोड के नाम को बदल कर मुकुट बिहारी लाल भार्गव मार्ग किए जाने के प्रस्ताव का विरोध होना ही था। अव्वल तो उसका नाम पहले से ही रखा हुआ है, भले ही उसका उपयोग नहीं किया जा रहा हो, साथ ही एक ऐसे शख्सियत का नाम इस मार्ग से जुड़ा हुआ है, जिन्हें राष्ट्रपिता के रूप में जाना जाता है। ऐसे में सवाल ये उठता है कि इस प्रकार का प्रस्ताव एजेंडे में शामिल ही कैसे कर दिया गया?
जानकारी ये है कि जस्टिस एस एन भार्गव ने उप निदेशक स्थानीय निकाय विभाग को मार्ग का नाम मुकुट बिहारी लाल भार्गव के नाम से रखने का प्रस्ताव दिया था। गंभीर लापरवाही ये हुई कि इसके औचित्य की जांच किए बिना ही आंख मीच कर प्रस्ताव जस का तस एजेंडे में शामिल कर दिया गया। न अधिकारियों ने इस पर गौर किया और न ही मेयर कमल बाकोलिया ने ध्यान दिया। नतीजतन बाकोलिया की छीछालेदर हो रही है। यह लालफीताशाही का ज्वलंत नमूना है। सवाल ये है कि क्या इस प्रकार निगम से बाहर के किसी व्यक्ति के प्रस्ताव को इस प्रकार एजेंडे में रखा जाना कानूनन व नैतिक रूप से उचित है? क्या यह एक गलत परंपरा को तो जन्म नहीं देगा? अब निगम की मुख्य कार्यकारी अधिकारी विनिता श्रीवास्तव यह कह कर अपने आपको विवाद से दूर करने की कोशिश कर रही हैं कि नाम परिवर्तन करना है या नहीं, ये तो पार्षद तय करेंगे।
कचहरी रोड व्यापारिक एसोसिएशन के महासचिव नरेन्द्र सिंह छाबड़ा व सचिव किशोर टेकवानी
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि महात्मा गांधी मार्ग का नाम मुकुट बिहारी लाल भार्गव मार्ग किए जाने पर सबसे पहले एक जागरूक नागरिक ऐतेजाद अहमद ने फेसबुक पर किया। इसके बाद कांग्रेस के मनोनीति पार्षद सैयद गुलाम मुस्तफा चिश्ती ने बाकायदा प्रेस कॉॅन्फे्रंस में इसका कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि इस देश में महात्मा गांधी से कोई और बड़ा नहीं हो सकता। बाद में कचहरी रोड व्यापारिक एसोसिएशन के महासचिव नरेन्द्र सिंह छाबड़ा व सचिव किशोर टेकवानी के नेतृत्व में वहां के व्यापारियों ने भी घोर निन्दा करते हुए महात्मा गांधी मार्ग के नाम से कोई छेड़छाड़ ने करने की चेतावनी दी। उन्होंने गांधीजी के नाम को भुनाने वाली पार्टी कांग्रेस के मेयर कमल बाकोलिया की सरपरस्ती में ही इस प्रकार का प्रस्ताव लाए जाने पर आश्चर्य जताया और उनके कांग्रेसी होने पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया।
यह ठीक है कि मुकुट बिहारी लाल भार्गव भी अजमेर की बड़ी हस्ती रहे। वे अजमेर के तीन बार सांसद रहे। वे एक बार अजमेर मेरवाड़ा स्टेट के दौरान 1952 में अजमेर दक्षिण संसदीय क्षेत्र से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीते। दूसरी बार अजमेर का राजस्थान में विलय होने के बाद 1957 में और तीसरी बार 1962 में भी कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा का चुनाव जीता। उनके नाम पर मार्ग का नामकरण करने का प्रस्ताव रखने वाले जस्टिस एस एन भार्गव उनके पुत्र हैं। उनके नाम पर किसी मार्ग का नाम होना ही चाहिए, मगर पहले से जिस मार्ग का नाम महात्मा गांधी के नाम से हो, उसे हटा कर स्वर्गीय भार्गव के नाम से किए जाने की बात पूरी तरह से बेमानी है। संभव है जस्टिस भार्गव को जानकारी न हो कि कचहरी रोड का नाम महात्मा गांधी के नाम पर है या नहीं, मगर प्रस्ताव को आगे मूव कर एजेंडे में शामिल करने वाले अधिकारियों ने जरा भी ख्याल नहीं किया कि वे विवादास्पद प्रस्ताव रखने जा रहे हैं, जो वाकई अफसोसनाक है।
-तेजवानी गिरधर

शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2013

अब खुल कर दावेदारी करेंगे छीतरमल टेपण

जिला लघु उद्योग केन्द्र में रोजगार अधिकारी के पद से वीआरएस ले चुके छीतर मल टेपण इस बार विधानसभा चुनाव में टिकट की दावेदारी खुल कर करेंगे। ज्ञातव्य है कि वे लंबे अरसे से दावेदारी करते रहे हैं, मगर तब सरकारी नौकरी की मर्यादा आड़े आती थी। हालांकि वे पहले भी पिछड़े तबके के लोगों को न्याय दिलवाने में जुटे रहते थे, मगर अब खुल कर फुल टाइम इसी काम में जुटने जा रहे हैं। इसी सिलसिले में उन्होंने वकालत का पेशा भी शुरू करने का निर्णय किया है और जिला बार एसोसिएशन में रजिस्ट्रेशन करवा लिया है। उनकी मंशा गरीबों की फ्री में वकालत करने की है, जिससे उन्हें जनाधार बनाने में मदद मिलेगी।
आपको बता दें कि टेपण अखिल भारतवर्षीय खटीक महासभा, पुष्कर के अध्यक्ष हैं। अपने समाज एवं एससी-एसटी वर्ग के लिए सामाजिक कार्य करने एवं मदद करने के लिए वे अलग ही पहचान बना चुके हैं। अजमेर दक्षिण विधानसभा क्षेत्र में उनकी खटीक समाज के लगभग दस हजार वोट हैं, जिन पर उनकी गहरी पकड़ है। अब तक की समाजसेवा, समाज के पर्याप्त वोट और एससी-एसटी वर्ग में पेठ के दम पर वे दमदार तरीके से दावेदारी करेंगे। उन्होंने गुलाबबाड़ी, आदर्श नगर समेत दक्षिण विधानसभा में जनाधार बढ़ाने के लिए जनसंपर्क भी शुरू कर दिया है। करीब 50 हजार परिवारों के टेलीफोन नंबरों का रिकॉर्ड भी टेपण ने एकत्रित कर अपनी तैयारी को पुख्ता किया है।
ज्ञातव्य है कि टेपण गुजरे 33 साल से एमएलए के टिकट की दावेदारी कर रहे हैं। 1880 में पहली दफा केकडी से टिकट मांगा था और उसके बाद तीन बार अजमेर दक्षिण से टिकट की दावेदारी कर चुके हैं। मगर अब तकं कांग्रेस ने इन्हें ने मौका नहीं दिया। इस दरम्यान में इन्होंने करीब 14 विभागों में प्रतिनियुक्ति पर नौकरी करते हुए अपनी पेठ बनाने का काम किया। वीआरएस लेने के बाद टिकट की चाह में कभी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत तो कभी केंद्रीय मंत्री सचिन पायलट के दर हाजिरी दे रहे हैं।
हालंाकि टेपण की महत्वाकांक्षा अपनी जगह है, मगर आपको बता दें कि दक्षिण विधानसभा क्षेत्र में पूर्व विधायक ललित भाटी की दावेदारी को कमजोर नहीं आंका जा सकता। वे कोली समाज के सर्वाधिक मजबूत नेता हैं। केंद्रीय कंपनी मामलात राज्य मंत्री सचिन पायलट को लोकसभा चुनाव में कोलियों का समर्थन दिलवाने के कारण संभव है वे उन्हें सपोर्ट करें। वर्तमान में वे शहर कांग्रेस अध्यक्ष महेन्द्र सिंह रलावता का सहयोग करते हुए पायलट खेमे के प्रमुख नेताओं में शुमार हैं। यूं अजमेर दक्षिण सीट पर पूर्व विधायक डॉ. राजकुमार जयपाल की नजरें भी टिकी हैं। हालंाकि पिछले चुनाव में भाटी के निर्दलीय रूप से मैदान में उतर जाने के कारण भाजपा की विधायक श्रीमती अनिता भदेल से हार चुके हैं। सचिन पायटल से उनकी नाइत्तफाकी किसी से छिपी नहीं है। अन्य दावेदारों में खटीक समाज के ही कांग्रेसी पार्षद विजय नागौरा भी दावेदारी का मानस रखते हैं। उन पर नगर सुधार न्यास के अध्यक्ष नरेन शहाणी का हाथ है। वैसे टेपण की अपने खटीक समाज में नागौरा से कहीं अधिक पकड़ और पहचान है। ऐसे में टेपण की दावेदारी उनसे ज्यादा मजबूत हो सकती है। शहर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रताप यादव भी एक मजबूत दावेदार के रूप में सामने आ सकते हैं। वे भी पिछले लंबे अरसे से टिकट मांगते रहे हैं। अब देखना ये है कि इन पांच दावेदारों में से किसकी किस्मत चेतती है।
-तेजवानी गिरधर

मुस्तफा के सवालों का ये जवाब नहीं बाकोलिया जी

अजमेर नगर निगम में कांग्रेस के मनोनीत पार्षद सैयद गुलाम मुस्ताफा चिश्ती ने अपनी ही पार्टी के मेयर कमल बाकोलिया के खिलाफ मोर्चा खोल कर कुछ अहम सवाल खड़े किए हैं। इस पर बाकोलिया ने प्रतिक्रिया में यह कह कर अपना पिंड छुड़वाने की कोशिश की है कि कांग्रेस के पार्षद को यदि कोई शिकायत है तो वह पार्टी के मंच पर आकर अपनी बात रख सकता है, जिलाध्यक्ष एवं प्रदेशाध्यक्ष को बता सकता है। इस तरह से विरोध करना सही नहीं है। कुछ इसी तरह की प्रतिक्रिया देते हुए नेता प्रतिपक्ष नरेश सत्यावना ने तो मुस्तफा को पार्टी से ही निकालने की मांग कर डाली है।
पार्टी अनुशासन की आड़ में बचने के लिए दोनों ने भले ही इस प्रकार की प्रतिक्रियाएं दी हों, मगर मुस्तफा ने जो सवाल उठाए हैं, वे जस के तस अब भी मुंह बाये खड़े हैं। बेशक बाकोलिया की पार्टी अनुशासन और पार्टी मंच की बात में दम है, मगर उन्होंने जिन सवालों के जवाब देने से बचना चाहा है, असल में वे आम आदमी के सवाल हैं, जिनका जवाब उन्हें सार्वजनिक मंच पर ही देना चाहिए। अहम सवाल तो ये उठ खड़ा हुआ है कि कांग्रेस के मनोनीत पार्षद को उनसे सार्वजनिक मंच पर सवाल करने की आखिर नौबत ही कैसे आई? जाहिर है कि जब निजी तौर पर उठाए गए सवालों को उन्होंने नजरअंदाज किया होगा, तभी कोई पार्षद पार्टी की मर्यादा को लांघ कर उनसे मुंहजोरी करने को मजबूर हुआ होगा। इसका इजहार खुद मुस्तफा ने भी दिया है कि बाकोलिया से जनहित में साधारण सभा आयोजित करने का आग्रह कई बार किया लेकिन उन्होंने उनकी मांग पर ध्यान नहीं दिया।
ज्ञातव्य है कि राजस्थान नगर पालिका अधिनियम के तहत बोर्ड की साधारण सभा की बैठक 60 दिन के भीतर होनी चाहिए, जिसे कि बाकोलिया पूरी तरह से नजरअंदाज कर रहे हैं। मुस्तफा ने साफ आरोप लगाया है कि निगम में तीन साल में तीन बार ही साधारण सभा का आयोजन किया, जबकि नियमानुसार 20 बार साधारण सभा का आयोजन होना था। इस सिलसिले में उनकी दलील है कि तत्कालीन भाजपा सरकार ने मेड़ता एवं माउंट आबू नगर पालिका अध्यक्ष को इसलिए निलंबित कर दिया था कि दोनों ने एक माह के भीतर नियमित साधारण सभा का आयोजन नहीं किया था। इसी दलील को आधार बना कर उन्होंने मेयर के खिलाफ भी कार्रवाई की मांग कर डाली है।
मुस्तफा की इस मांग में दम इस कारण है कि समय पर साधारण सभा आयोजित नहीं होने पर जनहित में किए जाने वाले कार्य प्रभावित हो रहे हैं। इसका खामियाजा आमजन को भुगतना पड़ रहा है। प्रमुख रूप से खांचा भूमि, अमानत राशि रिफंड, नक्शे पास कराना, दुकानों की लीज अवधि आदि महत्वपूर्ण मुद्दों पर निर्णय नहीं हुए हैं। इसके अतिरिक्त करोड़ों के सफाई ठेका व अन्य घोषणाओं के फैसले साधारण सभा में होने चाहिए थे। निगम में लोग काम के लिए चक्कर लगा रहे हैं, लेकिन किसी के भी काम नहीं होने से उनमें निगम के प्रति नाराजगी देखी जा सकती है। मुस्तफा का ये भी आरोप है कि जब से मेयर बाकोलिया ने पदभार संभाला है, तब से जनता से जुड़े मुद्दों पर निर्णय नहीं हुए। महज बजट बैठकें ही आयोजित की गई हैं। निगम में जनता से चुने प्रतिनिधियों को महत्व नहीं दिया जा रहा है। इस वजह से कई पार्षदों में रोष है। निगम में वर्तमान व्यवस्था के खिलाफ समय आने पर कई पार्षद सामने आएंगे। मुस्तफा ने विपक्ष को भी लपेटने में गुरेज नहीं किया और उसको आइना दिखाते हुए कहा कि निगम में विपक्ष अपनी सक्रिय भूमिका नहीं निभा पा रहा है। इसका खामियाजा जनता को उठाना पड़ रहा है।
लब्बोलुआब मुस्तफा ने जिस तरह जनता के हित में सवाल उठाए हैं, वे पूरी तरह से जायज हैं, जिनके उत्तर देना बाकोलिया की जिम्मेदारी है। आज भले ही मुंह फेर लें, लेकिन कल जब पार्टी जनता की अदालत में जाएगी तो वह भी इसी तरह से मुंह फेर सकती है।
-तेजवानी गिरधर