गुरुवार, 7 फ़रवरी 2013

पप्पू तो ऐसे ही पास होता रहा है

हर बार की तरह इस बार भी अजमेर नगर निगम का बजट हंगामे और वाहियात खींचतान के बीच पास हो गया। हां, इतना जरूर है कि इसे इस बार इसे पप्पू की संज्ञा दे दी गई, बाकी वह पहले भी इसी तरह से पास होता रहा है। भूतपूर्व नगर परिषद सभापति स्वर्गीय रतनलाल यादव के जमाने से ऐसा ही होता आया है। बड़े-बड़े हंगामे और मुकदमे तक हुए हैं। शायद ही कोई ऐसी साधारण सभा हुई हो, जिसमें मर्यादा की सीमाएं पार नहीं की गई हों। हर बार मीडिया सदन के अंदर बनाए जाने वाले माहौल का मुद्दा उठाता रहा है, मगर आज तक न तो कोई सभापति कंट्रोल कर पाया और न ही पार्षदों ने व्यवहार को संयमित करने पर विचार किया। आज जो भाजपा विधायक श्रीमती अनिता भदेल माहौल से खिन्न हो कर सदन छोड़ कर चली गईं, वे ही जब नगर परिषद सभापति थीं, तब पार्षदों का हंगामा देख कर रोने लगी थीं। अपनी पहली बैठक में मेयर कमल बाकोलिया को भी पीछे के दरवाजे से लगभग भागना पड़ गया था। इस बार चूंकि सभा खुले आसमान के नीचे हुई, इस कारण आजादी कुछ ज्यादा ही थी। हालत ये हो गई कि भाजपा के दोनों विधायकों वासुदेव देवनानी व अनिता भदेल को खुद की इज्जत बचाने की खातिर सभा का बहिष्कार करना पड़ गया।
इसे भले ही मेयर बाकोलिया की रणनीति जीत मान लिया जाए कि उन्होंने बिना चर्चा के ध्वनिमत से बजट पारित करवा लिया, मगर सच ये है कि हंगामा पहले से सुनिश्चित कर लिया गया था। दोनों ओर से। वरना क्या जरूरत थी कि सभा की शुरुआत ही सभा स्थल को लेकर की गई। पता था कि इस पर पलट कर कांग्रेसी भी सवाल करेंगे कि आपने भी तो नगर निगम से बाहर बैठक की थी, फिर भी श्रीगणेश इसी से किया गया। हालत ये हो गई कि नेता प्रतिपक्ष नरेश सत्यावना ने तो यह आरोप भी लगाया कि दिया कि भाजपा बोर्ड के दौरान तो जाम से जाम भी टकराए थे। स्वाभाविक रूप से इस पर टकराव होना था, वह हुआ और आखिर पूरी बजट बैठक हंगामे के हवाले ही हो गई। पार्षदों में हाथापाई इस कदर हुई कि मारपीट की नौबत आ गई। शायद यह पहला मौका था कि सदन में पुलिस को प्रवेश करना पड़ा। बेशक इससे सदन की अवमानना हुई, मगर इसके लिए जिम्मेदार भी तो पार्षद ही थे।
यानि ये नूरा कुश्ती थी
क्या पार्षदों के बीच हुई तू-तू मैं-मैं नूरा कुश्ती थी? बिलकुल। इसका साफ खुलासा विधायक श्रीमती भदेल ने किया और बनावटी लड़ाई व हंसी-मजाक बंद करने की अपील की। यह अपील उस वक्त तो काम नहीं आई, मगर जैसे ही सभा समाप्त हुई, झगड़ा करने वाले पार्षद गलबहियां करते नजर आए। अनिता द्वारा हंगामे को बनावटी लड़ाई की संज्ञा देना इस बात का भी इशारा है कि पार्षद भले ही सदन में पार्टी के नाते भिड़ रहे हैं, मगर सामान्य दिनों मिल-बांट कर काम करते हैं। सच तो ये है कि भाजपा पार्षदों की फूट व बाकोलिया से मिलीभगत के कारण ही उनका कार्यकाल बड़े ही सुकून से कट रहा है।
शहर से बड़ा खुद का हित
सभा स्थल के विवाद और बजट प्रस्तावों पर भले ही पार्षदों के बीच मतैक्य रहा, मगर जैसे ही पार्षदों के लिए कॉलोनी विकसित करने और निगम के खर्चे पर पार्षदों के मसूरी ट्रिप का प्रस्ताव आया तो सभी ने मौन स्वीकृति दे दी।
खुद ही अपने धोळों में डलवाई धूल
निगम में संभवत: सर्वाधिक वरिष्ठ पार्षद मोहनलाल शर्मा ने खुद ही अपने धोळों में धूल डलवाई। होना तो यह चाहिए था कि अनेक बोर्ड देख चुके शर्मा की मौजूदगी सदन को दिशा प्रदान करती, मगर अपने मिजाज की वजह से पहले कांग्रेसी कुनबे से बाहर हुए और जब बोलने लगे तो उनकी सुनने को कोई तैयार ही नहीं था। मौका देख कर बाकोलिया ने भी दंडित करने की चेतावनी का साहस जुटा लिया।
हाईलाइट होना चाहते थे गुलाम मुस्तफा?
कुछ दिन पहले मेयर बाकोलिया के खिलाफ मोर्चा खोल आरोपों की झड़ी लगाने वाले कांग्रेस के मनोनीत पार्षद सैयद गुलाम मुस्तफा चिश्ती साधारण सभा बैठक में मेयर का सुरक्षा कवच बने नजर आए तो सभी का चौंकना स्वाभाविक था। इसका संकेत उन्होंने सभा से पहले ही दिया था, जब उन्होंने बाकोलिया पर शब्द बाण चलाने के बाद भाजपा को भी निशाने पर लिया था। ऐसा प्रतीत हुआ कि वे इन दोनों ही प्रकरणों से हाईलाइट होना चाहते थे कि कम से कम शहर को यह तो ख्याल रहे कि वे भी निगम के पार्षद हैं।
-तेजवानी गिरधर

मंगलवार, 5 फ़रवरी 2013

कमजोरी नेताओं की, अटैक जनता के हार्ट पर

संभाग के सबसे बड़े अस्पताल जेएलएन हॉस्पिटल के कार्डियोलॉजी डिपार्टमेंट में पिछले 8 महीने से हार्ट सर्जन नहीं है, मगर न तो इसकी चिंता स्थानीय राजनीतिकों व अस्पताल प्रशासन को है और न ही राज्य सरकार को को दरकार। यदि किसी मरीज को हार्ट सर्जरी करवानी हो तो, उसे अपनी जान बचाने के लिए राजधानी जयपुर या अन्य बड़े शहर के अस्पताल का रुख करना पड़ रहा है। लालफीताशाही कैसे काम करती है, इससे तो हम वाकिफ हैं ही, राजनेताओं की इच्छाशक्ति का क्या हाल है, यह किसी से छिपा हुआ नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि या तो यहां के नेताओं को इस गंभीर कमी का ठीक से अहसास नहीं है या फिर वे कहीं न कहीं अपने शहर के हक की आवाज को उठाने में समर्थ नहीं है। नेताओं की यही कमजोरी मानो जनता की उम्मीदों और हक पर मानो अटैक कर रही है।
असल में अजमेर के नेताओं में राष्ट्रीय मसलों पर मीडिया में बयान जारी करने करने की होड़ है, बयानबाजी में एक-दूजे का विरोध करने में तो महारथ हासिल है, मगर किसी को चिंता नहीं है कि जिस शहर में उनका हार्ट धड़कता है, उसमें हार्ट सर्जन का पद खाली चला आ रहा है।
बात कांग्रेस की करें तो स्थानीय सांसद व केन्द्रीय कंपनी मामलात राज्य मंत्री सचिन पायलट इतनी ऊंचाई पर जा बैठे हैं कि उन्हें जेएलएन बहुत छोटा नजर आता है। वैसे भी उनका सीधा इससे कोई संबंध नहीं है। रहा सवाल मुख्य सचेतक डॉ. रघु शर्मा, संसदीय सचिव ब्रह्मदेव कुमावत व शिक्षा राज्यमंत्री श्रीमती नसीम अख्तर इंसाफ का तो वे सीधे राज्य सरकार में पहुंच रखते हैं, मगर इनकी पकड़ कितनी मजबूत है, यह तो हालात खुद बयां कर रहे हैं। शर्मा को अपने केकड़ी के विकास की चिंता है तो कुमावत सत्ता का सुख भोगने में व्यस्त। अजमेर शहर की दोनों सीटों पर भाजपा का कब्जा होने के कारण अजमेर मुख्यालय पर सर्वाधिक सक्रिय पुष्कर विधायक श्रीमती नसीम को समारोहों व कार्यक्रमों से ही फुर्सत नहीं है। और तो और मेयर कमल बाकोलिया, यूआईटी सदर नरेन शहानी भगत, शहर कांग्रेस अध्यक्ष महेंद्र सिंह रलावता, पूर्व विधायक ललित भाटी सरीखे प्रभावशाली नेताओं को भी चिंता नहीं है। या तो वे यह मांग सीएम अशोक गहलोत या केंद्रीय मंत्री सचिन पायलट तक पहुंचा नहीं पा रहे या फिर उनकी सुनवाई होती ही नहीं। रहा सवाल जेएलएन को करीब से समझने वाले डॉ. राजकुमार जयपाल व डॉ. श्रीगोपाल बाहेती की तो, उनकी इन दिनों चल ही नहीं रही। ऐसे में जेएलएन अस्पताल की इस सबसे बड़ी जरूरत पर कोई ध्यान देने वाला नहीं है।
अब बात करते हैं भाजपा की। विपक्ष में रह कर जनता के हक और आवाज को बुलंद करना भाजपा के नेताओं की जिम्मेदारी बनती है। अजमेर में भाजपा राजनीति के कर्ताधर्ता कहे जाने वाले औंकार सिंह लखावत प्रदेश की राजनीति में इतने व्यस्त हो चुके हैं, अजमेर में यदा-कदा समारोहों आदि में ही नजर आते हैं। शिक्षा राज्यमंत्री रहे मौजूदा विधायक प्रो. वासुदेव देवनानी, जो कि हर किसी मांग को उठाने एवं उसका श्रेय लेने में आगे रहते है, वे भी इस मामले में चूक गए लगते हैं। दूसरी बार विधायक चुनी गई श्रीमती अनिता भदेल का भी इस पर ध्यान नहीं है। शहर भाजपा अध्यक्ष रासासिंह रावत को संगठन के कामकाज से ही फुर्सत नहीं है। कैसी विडंबना है कि पूरे विपक्ष को न तो हार्ट सर्जन की कमी गुजरे आठ माह में दिखी ही नहीं, उसके लिए दबाव बनाना तो दूर की बात है।
कुल मिला कर शहर के कमजोर दिल वाले मरीजों का उपचार अजमेर नहीं तो कहीं न कहीं पर तो हो ही रहा है, मगर शहर के नेेताओं का दिल अपनी जनता के लिए कब मजबूत होगा, कुछ कहा नहीं जा सकता।
-तेजवानी गिरधर

सोमवार, 4 फ़रवरी 2013

मुस्तफा ने किया पलट कर भाजपा पर भी वार

कहते हैं न कि कोई अपनों को भले ही गालियां दे, मगर अगर गैर अपनों को गाली दें तो वह उसे बर्दाश्त नहीं होता। कुछ ऐसा ही वाकया नगर निगम के मनोनीत कांग्रेसी पार्षद सैयद गुलाम मुस्तफा चिश्ती ने पेश किया है। कल तक नगर निगम के मेयर कमल बाकोलिया के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले चिश्ती ने एक लिखित बयान जारी कर भाजपा पार्षद दल की बैठक पर सवाल खड़े किए हैं और उससे दोहरे चरित्र पर अपना नजरिया स्पष्ट करने को कहा है। उनका कहना है कि शहर भाजपा जनता के साथ धोखा कर गुमराह कर रही है। भाजपा पार्षद दल की बैठक में जिन मुद्दों पर नगर निगम की साधारण सभा में विरोध करना तय किया गया है, उन मुद्दों पर भाजपा पार्षद व उप महापौर अपनी सैद्धांतिक सहमति व्यक्त कर चुके हैं।
गुलाम मुस्तफा ने कहा कि भाजपा साधारण सभा निगम परिसर के अन्यत्र करने के मुद्दे पर धरना और मामला सदन में उठाने की घोषणा कर चुकी है, जबकि भाजपा पार्षद दल के मुख्य सचेतक भागीरथ जोशी व पार्षद नीरज जैन व भारती श्रीवास्तव फायसागर पार्क में सभा करने का सार्वजनिक समर्थन का ऐलान कर चुके हैं। इसी प्रकार महात्मा गांधी मार्ग का नाम बदलने के प्रस्ताव का गांधीजी के प्रति आस्था प्रकट कर विरोध करने वाली भाजपा का दोहरा चरित्र इससे भी साबित होता है कि उनके दल के उप महापौर अजित सिंह राठौड़ नाम बदलने का समर्थन कर चुके हैं। निगम के पूर्व महापौर धर्मेन्द्र गहलोत ने तो कचहरी रोड का नाम महात्मा गांधी मार्ग होने पर सवालिया निशान लगा दिया है कि निगम रिकार्ड उपलब्ध करवाएं कि इस मार्ग का नाम रिकार्ड में गांधीजी के नाम पर है या नहीं। यह भी तब जबकि वे खुद महापौर रह चुके हैं और रिकार्ड से बखूबी वाकिफ हैं। इससे उनकी गांधीजी के प्रति आस्था का पता चलता है।
गुलाम मुस्तफा का कहना है कि जहां विपक्ष मजबूत होता है, वहां सत्ता पक्ष संवेदनशील हो कर कार्य करता है। निगम में भाजपा निष्क्रिय है, यही कारण है कि भाजपा पार्षद ने अपने नेतृत्व पर अविश्वास व्यक्त कर मेरे द्वारा उठाई गए मुद्दों का समर्थन कर रहे हैं। इसका ज्वलंत उदाहरण है कि मुख्य सचेतक के रूप में भागीरथ को नियुक्त करना।
उनका कहना है कि सुभाष उद्यान व फॉयसागर पार्क को बीओटी पर देने के प्रस्ताव पर भी भाजपा को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। वह अपनी बैठक में तय कर चुकी है कि सदन पटल पर बीओटी आधारित शर्तें रखनी चाहिए, इससे जाहिर होता है कि भाजपा पार्कों को सशर्त ठेके पर देने के समर्थन में है, जो कि जनता के पार्कों में घूमने के अधिकार पर कुठाराघात है।
बेशक गुलाम मुस्तफा की इन बातों में दम तो नजर आता है और मेयर बाकोलिया पर भी जो आरोप लगाए थे, उनमें भी दम था, मगर यकायक पलट कर भाजपा पर वार करने का राज समझ में नहीं आता। कहीं ऐसा तो नहीं कि उनके बाकोलिया पर वार करने को कांग्रेस विरोधी कृत्य माने जाने को डाइल्यूट करने के लिए भाजपा का रुख किया है। बहरहाल, जो कुछ हो, उनके सवालों का जवाब न तो कांग्रेस के पास है और न ही भाजपा के पास।
-तेजवानी गिरधर

रविवार, 3 फ़रवरी 2013

भाजपा भी तो जिम्मेदार है बाकोलिया की नाकामी के लिए

लंबे अरसे बाद होने जा रही नगर निगम की साधारण सभा को लेकर शहर की राजनीति गरमा गई है। एक ओर जहां कांग्रेस के मनोनीत पार्षद गुलाम मुस्तफा ने सीधे निगम मेयर कमल बाकोलिया पर हमला बोला है, वहीं भाजपा पार्षद दल भी यकायक जाग गया है। उसे भी शहर की बदहाली की चिंता सताने लगी है। उसे अब याद आ रहा है कि जनता के व्यापक हित में राजस्थान नगर पालिका अधिनियम 2009 के प्रावधानों के तहत साधारण सभा 60 दिवस के भीतर होनी चाहिए, लेकिन निगम मेयर और प्रशासन ने इसका उल्लंघन किया। अधिनियम में यह भी प्रावधान है कि बैठक निगम परिसर या कार्यालय में होनी चाहिए।
सवाल ये है कि भाजपा को मेयर की इस नाकामी का अचानक याद कैसे आ गई? भाजपा की ओर से जारी बयान में लिखा है कि शहर जिला अध्यक्ष रासासिंह रावत, विधायक वासुदेव देवनानी, श्रीमती अनिता भदेल, वरिष्ठ उपाध्यक्ष एवं प्रवक्ता अरविंद यादव, पूर्व सभापति सुरेंद्र सिंह शेखावत, महामंत्री धर्मेंद्र गहलोत, कैलाश कच्छावा, सोमरत्न आर्य ने मेयर बाकोलिया के ढ़ाई वर्ष के कार्यकाल को विफलतम बताते हुए कहा कि इस अवधि में अजमेर सर्वाधिक बदहाली का शिकार हुआ। कांग्रेस की कार्यप्रणाली से जनता सर्वाधिक निराश हुई है। उनके आरोप में दम है, मगर सवाल ये है कि निगम बोर्ड में बराबर की टक्कर जितने पार्षद होने के बाद भी भाजपा मेयर को घेरने में कामयाब क्यों नहीं हो पाई? स्पष्ट है कि शहर भाजपा नेताओं की आपसी फूट, पार्षदों में बिखराव और सशक्त नेतृत्व के अभाव के कारण भाजपा निगम में विपक्ष की भूमिका सशक्त ढंग से नहीं निभा पाई है। सच तो ये है कि मेयर बाकोलिया को अपने ही कांग्रेसी पार्षदों की बजाय भाजपा पार्षदों का निजी तौर पर संबल हासिल है।
भाजपा पार्षद दल की इस हालत पर मलाल खुद भाजपा पार्षदों तक को हो चला है। भाजपा पार्षद दल की बैठक से छन कर आई खबरों से तो यह भी सामने आया है कि तेजतर्रार पार्षद नीरज जैन ने भाजपा पार्षद दल की बैठक में यह कह कर खिन्नता जाहिर की कि भाजपा नेताओं, पार्षदों के बीच तालमेल के अभाव के कारण ही हम आज तक निगम में कांग्रेस के मेयर और निगम प्रशासन की नियम विरुद्ध कार्रवाइयों का मजबूती से विरोध नहीं कर पाए। अगर कोई पार्षद पहल भी करता है, तो पार्टी के अन्य पार्षद यह कहते हुए साथ छोड़ देते हैं कि तुम्हें किसने अधिकृत किया। भाजपा पार्षदों में आपसी टांग खिंचाई का नतीजा यह है कि निगम में भाजपा का बोर्ड होते हुए भी पार्षद जनहित के मुद्दे पुरजोर तरीके से नहीं उठा पाते। इतना ही नहीं, बैठक के दौरान यह भी उजागर हुआ कि कुछ पार्षद अपने ही नेता डिप्टी मेयर अजीत सिंह से संतुष्ट नहीं हैं और अपने आपको नेतृत्वहीन मानते हैं। यह दीगर बात है कि अपनी बेटी की शादी के व्यस्त अजित सिंह बैठक में मौजूद नहीं थे, वरना उनके सामने बोलने की तो आज तक किसी ने हिम्मत नहीं दिखाई।
वैसे यह नेतृत्व की ही खामी है कि पार्षद जे. के. शर्मा बिना किसी का मार्गदर्शन लिए अपने स्तर पर ही तय कर लेते हैं कि वे नियमों के विपरीत बोर्ड की बैठक फॉयसागर पार्क में करने पर धरना देंगे, जिस पर शहर भाजपा अध्यक्ष रासासिंह असमंजस में पड़ जाते हैं कि क्या करें, क्या न करें? वे तो इस कारण ढ़ीले पड़े थे खुद भाजपा बोर्ड के समय भी निगम से बाहर बैठक की जा चुकी है। वो तो पूर्व मेयर धर्मेन्द्र गहलोत ने स्टडी कर ताजा नियमों का खुलासा किया, तब जा कर रणनीति बनाने का रास्ता निकल कर आया। गहलोत ने बताया कि नगर निगम के कंडक्ट ऑफ बिजनेस रूल 1974 में साधारण सभा नगर निगम भवन के साथ ही निगम की अन्य परिसंपत्ति में भी करने के विकल्प दिए गए थे। इसे सन् 2009 के एक्ट में संशोधित कर सभी विकल्प हटाकर जीसी केवल नगर निगम कार्यालय में कराने की अनिवार्यता रखी गई है।
पार्टी कितनी दिशाविहीन है, इसका अंदाजा इसी बात से हो जाता है कि तकरीबन ढ़ाई साल बाद उसे खयाल आता है कि उसे मुख्य सचेतक नियुक्त करना चाहिए और बोर्ड बैठक में कांग्रेस को टक्कर देने के लिए भागीरथ जोशी की नियुक्ति की जाती है।
खैर, अब जब कि पार्टी नेताओं ने पार्षदों को पुरानी बातों और विवादों को भुलाकर एकजुट होकर जनहित के मामले सभा में उठाने पर जोर दिया है, देखते हैं यह अपील कितना असरकारक होती है।
-तेजवानी गिरधर

शनिवार, 2 फ़रवरी 2013

गांधीजी का नाम हटाने का प्रस्ताव रखा ही कैसे?


पार्षद सैयद गुलाम मुस्तफा चिश्ती
अजमेर नगर निगम की साधारण सभा के एजेंडे में कचहरी रोड के नाम को बदल कर मुकुट बिहारी लाल भार्गव मार्ग किए जाने के प्रस्ताव का विरोध होना ही था। अव्वल तो उसका नाम पहले से ही रखा हुआ है, भले ही उसका उपयोग नहीं किया जा रहा हो, साथ ही एक ऐसे शख्सियत का नाम इस मार्ग से जुड़ा हुआ है, जिन्हें राष्ट्रपिता के रूप में जाना जाता है। ऐसे में सवाल ये उठता है कि इस प्रकार का प्रस्ताव एजेंडे में शामिल ही कैसे कर दिया गया?
जानकारी ये है कि जस्टिस एस एन भार्गव ने उप निदेशक स्थानीय निकाय विभाग को मार्ग का नाम मुकुट बिहारी लाल भार्गव के नाम से रखने का प्रस्ताव दिया था। गंभीर लापरवाही ये हुई कि इसके औचित्य की जांच किए बिना ही आंख मीच कर प्रस्ताव जस का तस एजेंडे में शामिल कर दिया गया। न अधिकारियों ने इस पर गौर किया और न ही मेयर कमल बाकोलिया ने ध्यान दिया। नतीजतन बाकोलिया की छीछालेदर हो रही है। यह लालफीताशाही का ज्वलंत नमूना है। सवाल ये है कि क्या इस प्रकार निगम से बाहर के किसी व्यक्ति के प्रस्ताव को इस प्रकार एजेंडे में रखा जाना कानूनन व नैतिक रूप से उचित है? क्या यह एक गलत परंपरा को तो जन्म नहीं देगा? अब निगम की मुख्य कार्यकारी अधिकारी विनिता श्रीवास्तव यह कह कर अपने आपको विवाद से दूर करने की कोशिश कर रही हैं कि नाम परिवर्तन करना है या नहीं, ये तो पार्षद तय करेंगे।
कचहरी रोड व्यापारिक एसोसिएशन के महासचिव नरेन्द्र सिंह छाबड़ा व सचिव किशोर टेकवानी
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि महात्मा गांधी मार्ग का नाम मुकुट बिहारी लाल भार्गव मार्ग किए जाने पर सबसे पहले एक जागरूक नागरिक ऐतेजाद अहमद ने फेसबुक पर किया। इसके बाद कांग्रेस के मनोनीति पार्षद सैयद गुलाम मुस्तफा चिश्ती ने बाकायदा प्रेस कॉॅन्फे्रंस में इसका कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि इस देश में महात्मा गांधी से कोई और बड़ा नहीं हो सकता। बाद में कचहरी रोड व्यापारिक एसोसिएशन के महासचिव नरेन्द्र सिंह छाबड़ा व सचिव किशोर टेकवानी के नेतृत्व में वहां के व्यापारियों ने भी घोर निन्दा करते हुए महात्मा गांधी मार्ग के नाम से कोई छेड़छाड़ ने करने की चेतावनी दी। उन्होंने गांधीजी के नाम को भुनाने वाली पार्टी कांग्रेस के मेयर कमल बाकोलिया की सरपरस्ती में ही इस प्रकार का प्रस्ताव लाए जाने पर आश्चर्य जताया और उनके कांग्रेसी होने पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया।
यह ठीक है कि मुकुट बिहारी लाल भार्गव भी अजमेर की बड़ी हस्ती रहे। वे अजमेर के तीन बार सांसद रहे। वे एक बार अजमेर मेरवाड़ा स्टेट के दौरान 1952 में अजमेर दक्षिण संसदीय क्षेत्र से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीते। दूसरी बार अजमेर का राजस्थान में विलय होने के बाद 1957 में और तीसरी बार 1962 में भी कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा का चुनाव जीता। उनके नाम पर मार्ग का नामकरण करने का प्रस्ताव रखने वाले जस्टिस एस एन भार्गव उनके पुत्र हैं। उनके नाम पर किसी मार्ग का नाम होना ही चाहिए, मगर पहले से जिस मार्ग का नाम महात्मा गांधी के नाम से हो, उसे हटा कर स्वर्गीय भार्गव के नाम से किए जाने की बात पूरी तरह से बेमानी है। संभव है जस्टिस भार्गव को जानकारी न हो कि कचहरी रोड का नाम महात्मा गांधी के नाम पर है या नहीं, मगर प्रस्ताव को आगे मूव कर एजेंडे में शामिल करने वाले अधिकारियों ने जरा भी ख्याल नहीं किया कि वे विवादास्पद प्रस्ताव रखने जा रहे हैं, जो वाकई अफसोसनाक है।
-तेजवानी गिरधर