सोमवार, 29 अप्रैल 2013

शैक्षिक राजधानी बनी भ्रष्टाचारियों का अड्डा


अरावली पर्वत शृंखला के आंचल में महाराजा अजयराज चौहान द्वारा स्थापित अजमेर नगरी की दुनिया में खास पहचान रही है। इसका आध्यात्मिक और पौराणिक महत्व इसी तथ्य से आंका जा सकता है कि सृष्टि के रचयिता प्रजापिता ब्रह्मा ने तीर्थगुरू पुष्कर में ही आदि यज्ञ किया था। सूफी मत के कदीमी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती के रूहानी संदेश से महकती इस पाक जमीन में पल्लवित व पुष्पित विभिन्न धर्मों की मिली-जुली संस्कृति पूरे विश्व में सांप्रदायिक सौहाद्र्र की मिसाल पेश करती है। इस रणभूमि के ऐतिहासिक गौरव का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि यह सम्राटों, बादशाहों और ब्रितानी शासकों की सत्ता का केन्द्र रही है। आजादी के आंदोलन में तो यह स्वाधीनता सेनानियों की प्रेरणास्थली रही। मगर............. मगर, अब दुष्कर्मियों और भ्रष्टाचारियों के अड्डे के रूप में पहचान बनाने लगी है। कुछ साल पहले बहुचर्चित अश्लील छायाचित्र ब्लैकमेल कांड की वजह से पूरी दुनिया में यह जमीं शर्मसार हुई और अब भ्रष्टाचार के एक के बाद एक कांड खुलने से यह भ्रष्टाचार का अड्डा साबित होती जा रही है।
ताजा मामला कोर्ट से जुड़ा है, जिसमें कोर्ट स्टेनोग्राफर, कनिष्ठ लिपिक भर्ती परीक्षा में पांच से छह लाख रुपए लेकर भर्ती करवाने का खुलासा हुआ है। एसीबी ने इस मामले में दो वकीलों, नसीराबाद कोर्ट के नाजिर और अजमेर कोर्ट में लिपिक के घर छापा मारा। इससे पहले भी अनेक मामले उजागर हो चुके हैं और प्रदेशभर में एसीबी की सर्वाधिक कार्यवाहियों का रिकार्ड बनता जा रहा है।
आपको याद होगा कि एसीबी ने इससे पहले कैटल फीड प्लांट के तत्कालीन मैनेजर सुरेंद्र कुमार शर्मा के पास 10 करोड़ की नकदी व सोना पकड़ा था। कोआपरेटिव बैंक के एमडी हनुमान कच्छावा का आय से अधिक संपत्ति का प्रकरण भी एसीबी की कार्यवाही से उजागर हुआ। इसके बाद बैंक के ही ब्रजराजसिंह भी एसीबी के जाल में फंसे और कोर्ट से सजा भी हुई।  कानून की रक्षा करने वाली पुलिस भी एसीबी की कार्यवाही से नहीं बच पाई। आईपीएस अजय सिंह के पकड़े जाने से इसकी शुरुआत हुई। जब एसपी राजेश मीणा के घर छापा पड़ा तो पूरी अजमेर जिले की पुलिस भ्रष्टाचार में संलिप्त पाई गई। इस मामले में तत्कालीन एसपी राजेश मीणा और एएसपी लोकेश सोनवाल से लेकर करीब एक दर्जन थानाधिकारी उलझे। मीणा चार माह से जेल में है, जबकि लोकेश सोनवाल फरार है। दो थानाधिकारियों के स्थाई गिरफ्तारी वारंट जारी हो रखे हैं तो शेष के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए जरूरी कार्रवाई की जा रही है। इस प्रकरण में राजस्थान लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष पर भी छींटे आए, मगर उनके खिलाफ मामला नहीं बना। पिछले दिनों आबकारी का डिपो मैनेजर और आदर्शनगर थाने का तत्कालीन एसआई भी एसीबी की गिरफ्त में आए। इसके बाद एसीबी ने फिर एक बड़ी कार्रवाई कर माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के वित्तीय सलाहकार नरेंद्र कुमार तंवर को धर दबोचा। तंवर से करोड़ों रुपए की बोर्ड की एफडी और अकूत संपत्ति का पता चला। तंवर भी जेल में हैं। इस सिलसिले में आम जनता की नजर में बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष पर भी शक की सुई घूम गई, यह बात अलग है कि अब तक वे लपेटे में नहीं आए हैं।
सवाल ये उठता है कि आखिर इसकी वजह क्या है कि अजमेर में ही भ्रष्टाचार के मामले अधिक पकड़ में आ रहे हैं। यूं भले ही इस शहर को टायर्ड व रिटायर्ड लोगों का शहर कहा जाए, मगर उसी की जड़ में छिपा है यहां हो रहे गोरखधंधे का राज। आप रिकार्ड उठा कर देख लीजिए, जो भी अधिकारी एक बार यहां आ जाता है तो उसकी कोशिश यही रहती है कि किसी न किसी रूप में यहीं बना रहे। इसी वक्त कोई एक दर्जन बड़े अधिकारी अजमेर में मौजूद हैं, जो डिपार्टमेंट बदल-बदल की अजमेर को ही अपना ठिकाना बनाए हुए हैं। वजह ये नहीं है कि इस आध्यात्मिक धरा पर उन्हें आत्मिक सुकून मिलता है, अपितु कारण ये है कि यहां लूटना आसान है, क्योंकि जनता तो सोयी हुई है ही, सहनशील है ही, यहां के नेता भी मस्त हैं। सच तो ये है कि उन्हें पता ही लगता कि कौन अधिकारी कितना लूट रहा है। उनमें दमदारी भी नहीं है। इसी कारण अधिकारियों की यहां मौज ही रहती है और वे पूरी नौकरी तो यहां करना चाहते ही हैं, रिटायर्ड होने के बाद भी यहीं बस जाते हैं।
माना कि भ्रष्टाचार हर जगह मौजूद है, मगर अकेले अजमेर के अधिकारी ही एसीबी की चपेट में कैसे आ रहे हैं। इसका सीधा सा अर्थ है कि यहां राजनीतिक तंत्र कमजोर होने के कारण वे बेखौफ भ्रष्टाचार करते हैं और एसीबी के जाल में फंस जाते हैं। और इसी वह से अजमेर अब भ्रष्टाचारियों का अड्डा सा बन गया है। पूर्व एसपी राजेश मीणा को ही लीजिए। क्या जिस प्रकार उन पर मंथली वसूलने का आरोप लगा, वैसे मंथली और जिलों में नहीं वसूली जाती? बेशक वसूली जाती है, मगर यहां आ कर मीणा इतने बेखौफ हो गए कि उन्हें ख्याल ही नहीं रहा कि कभी एसीबी के चक्कर में आ जाएंगे। स्पष्ट है कि उन्होंने यहां की जनता, व्यापारियों व छुटभैये नेताओं का मिजाज जान लिया और ठठेरा के चक्कर में लापरवाह हो गए। वे क्या सारे थानेदार भी बड़ी आसानी से ठठेरा के जाल में आ गए।
ताजा मामला भी बहुत गंभीर है। भले ही इसमें फिलहाल चंद लोग ही लपेटे में आए हैं, मगर ठीक से और पूरी ईमानदारी से काम हुआ व राजनीतिक दखलंदाजी नहीं हुई तो चौंकाने वाली जानकारियां भी सामने आ सकती हैं।
-तेजवानी गिरधर

पहाडिय़ा को आज जातीय व्यवस्था से परहेज क्यों?


हरियाणा के राज्यपाल एवं राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ पहाडिय़ा गत दिवस पुष्कर सरोवर की पूजा-अर्चना के बाद अपने अखिल भारतीय खटीक समाज के पुश्तैनी पुरोहित पर यह कह कर जम कर बरसे कि मेरी कोई बिरादरी नहीं है और धार्मिक स्थानों को जातियों में मत बांटो। वे खटीक समाज के पुश्तैनी पुरोहित द्वारा विजिटिंग कार्ड देने से गुस्साए और उसकी बही में हस्ताक्षर करने से भी इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि जाति क्या होती है, मेरी कोई बिरादरी नहीं है और न ही मेरा कोई पुश्तैनी पुरोहित है। उन्होंने कहा कि मैं किसी से भी पूजा करवा सकता हूं। मैं पुष्कर में कई बार आ चुका हूं तथा लेकिन इससे पहले कभी भी पुश्तैनी पंडा नहीं आया। पहाडिया ने कहा कि यह गलत व्यवस्था बदलना चाहिए। इस वाकये से कई अहम सवाल उठ खड़े हुए हैं।
सबसे बड़ा सवाल ये कि पहाडिय़ा आज जिस जातीय व्यवस्था से परहेज कर रहे हैं, क्या इसी जातीय व्यवस्था की वजह से ही इस मुकाम पर नहीं पहुंचे हैं? वे जिस जांत-पांत पर आज ऐतराज कर रहे हैं, क्या उसी व्यवस्था के चलते आरक्षित विधानसभा सीट से चुनाव लड़े हैं? अगर उन्हें इस जातीय व्यवस्था से इतनी ही एलर्जी थी, तो विधायक पद का चुनाव आरक्षित सीट से ही क्यों लड़े, किसी सामान्य सीट से चुनाव लड़ते? क्या कांग्रेस ने उन्हें मेरिट के आधार पर राजस्थान का मुख्यमंत्री बनाया था, या फिर अनुसूचित जाति को तुष्ट करने के लिए इस पद से नवाजा? क्या इस प्रचलित धारणा से इंकार किया जा सकता है कि राज्यपाल जैसे संवैधानिक अथवा राजनीतिक पदों पर नियुक्तियां राजनीतिक आधार पर जातीय संतुलन को बनाए रखने के लिए किया जाता? कैसी विचित्र बात है कि कहीं न कहीं जिस जाति की बदौलत पहाडिय़ा आज इस मुकाम पर हैं, उसे वे सिरे से नकारते हुए कह रहे हैं कि जाति क्या होती है? इतने बड़े पद पर पहुंचने के बाद वे कह रहे हैं कि उनकी कोई बिरादरी नहीं है? सवाल ये उठता है कि अगर उनका जाति व बिरादरी पर कोई विश्वास नहीं है तो वे अपने नाम के साथ खटीक समाज के पहाडिय़ा सरनेम का उपयोग क्यों करते हैं? क्या उन्होंने कभी जातीय व्यवस्था के तहत चल रही आरक्षण व्यवस्था का विरोध किया है या अब करने को तैयार हैं?
हो सकता है कि उनका कोई पुश्तैनी पंडा न हो, या उनकी जानकारी में न हो, मगर तीर्थराज पुष्कर में परंपरागत रूप से जातीय आधार पर चल रही पुरोहित व्यवस्था को कैसे नकार सकते हैं? यदि उनकी पूर्व की तीर्थयात्रा के दौरान गलती से कोई पुरोहित दावा करने नहीं आया तो आज आया पुरोहित अवैध है? बेशक यह यह उनकी इच्छा पर निर्भर है कि वे अपनी जाति के पंडे से पूजा करवाएं या न करवाएं, मगर उस व्यवस्था को ही सिरे से कैसे नकार सकते हैं, जो कि पुरातनकाल से चली आ रही है, जिसमें कि सभी यकीन है? सच तो ये है कि इसी व्यवस्था के चलते नई पीढ़ी के लोगों को अपने पुरखों के बारे में जानकारी मिलती है, जो सामान्यत: अन्यत्र कहीं उपलब्ध नहीं है। सवाल ये भी है कि वे किस अधिकार के तहत एसडीएम को हिदायत दे गए कि पुष्कर तीर्थ में की जा रही जातिवादी पंडागिरी को बंद करवाएं? क्या उनकी हिदायत को मानने के लिए एसडीएम बाध्य हैं? क्या इसके लिए राज्य सरकार को अनुशंषा करने की बजाय उस अधिकारी को निर्देश देना उचित है, जो कि उनके अधीन आता ही नहीं है? अव्वल तो ये भी कि क्या एसडीएम के पास ऐसे अधिकार हैं कि वे जातीय आधार पर हजारों से साल से चल रही पंडा व्यवस्था को बदलवा दें?
वैसे एक बात है कि पहाडिय़ा के विचार वाकई उत्तम हैं और आदर्श व्यवस्था के प्रति उनके विश्वास के द्योतक हैं, मगर ये सवाल इस कारण उठते हैं कि जिस व्यवस्था की पगडंडी पर चल कर वे आज जहां आ कर ऐसी आदर्श व्यवस्था की पैरवी करते हैं, वह बेमानी है।
-तेजवानी गिरधर

रविवार, 28 अप्रैल 2013

क्या बार कौंसिल की समिति कर रही है वकील चौहान की तरफदारी?


राजस्थान बार कौंसिल की ओर से न्यायालय भर्ती परीक्षा घोटाले की जांच के लिए बनी समिति ने अपनी जांच रिपोर्ट कौंसिल को सौंपते हुए जहां कुछ सिफारिशें की हैं, वहीं कुछ अहम सवाल भी उठा दिए हैं। उसका मौजूदा परीक्षा निरस्त किए जाने की अनुशंसा करना और पिछले सालों में हुई भर्तियों की जांच हाईकोर्ट द्वारा गठित निष्पक्ष समिति से कराए जाने की अनुशंसा करना समझ में आता है। साथ ही न्यायिक कर्मचारियों की भर्ती राजस्थान उच्च न्यायालय को अपने स्तर पर आयोजित करने का सुझाव भी उचित प्रतीत होता है। मगर जिस प्रकार से सवाल उठाए हैं, उससे वह एसीबी की कार्यवाही में दखल करती और न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही अपना अभिमत प्रस्तुत करती प्रतीत होती है। उससे यह भी आभास होता है कि कहीं कौंसिल ने इस मामले की मॉनीटरिंग करने और गुणावगुण की समीक्षा तक करने के मकसद से कमेटी का गठन तो नहीं किया था।
समिति के सदस्य और जिला बार एसोसिएशन के अध्यक्ष राजेश टंडन व पूर्व अध्यक्ष किशन गुर्जर ने एंटी करप्शन ब्यूरो की जांच पर जिस प्रकार सवाल उठाए हैं, उससे यह साफ लगता है कि उसे न्यायालय से पहले इस कमेटी के सदस्यों के सवालों के जवाब देने होंगे। उन्होंने किस प्रकार एफआईआर का पोस्टमार्टम किया है, इसका अनुमान उसके इन सवालों से लग जाता है कि एसीबी ने संपूर्ण कार्रवाई की वीडियो रिकार्डिंग भी करवाई है, ऐसा बताया गया था, लेकिन एफआईआर में इसका हवाला नहीं है। उन्होंने यह भी पूछा है कि जिला जज के घर जाते समय कानावत के पास केतली थी तो उसका हवाला एफआईआर में क्यों नहीं है। वैसे एक बात तो है कि कमेटी ने संबंधित न्यायाधीश अजय कुमार शारदा के मामले में सवाल उठा कर साहस का परिचय जरूर दिया है। बात स्वाभाविक भी है कि जब एसीबी की एफआईआर में आरोपी हेमराज के हवाले से न्यायाधीश अजय कुमार शारदा पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं और अगर वास्तव में ऐसा था तो एसीबी ने उसी दिन न्यायाधीश के आवास पर छापा क्यों नहीं मारा? अगर इजाजत लेने की जरूरत होने पर एसीबी ने तत्काल हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को सूचित क्यों नहीं किया?
कमेटी के कुछ सवालों से यह आभास होता है कि कहीं वह वकील भगवान चौहान की तरफदारी तो नहीं कर रही। बानगी देखिए-वकील भगवान सिंह के घर 90 हजार मिलने के आधार पर उसे प्रकरण से जोडना कहां तक उचित है, किसी वकील के घर इतनी रकम मिलना कोई अपराध नहीं है। प्रकरण में फंसाए जाने की आशंका से मौके से चले जाना भी अपराध नहीं है। फिर एसीबी ने केवल इस आधार पर भगवान सिंह को आरोपी प्रचारित क्यों किया है? समिति ने कहा कि एसीबी को सत्यता उजागर करनी चाहिए? अगर कोई तथ्य गलत है तो उसका खंडन होना चाहिए था। समिति सदस्यों के रुख से एक अहम सवाल ये भी उठता है कि क्या कमेटी को केवल जांच रिपोर्ट देने को कहा गया था या अपने स्तर सवाल उठाने की भी जिम्मेदारी दी गई थी।
वैसे एक बात जरूर बड़ी दिलचस्प है, वो यह कि लिपिक भर्ती प्रकरण में फरार आरोपी वकील भगवान सिंह अजमेर में थानों से मंथली वसूली मामले में फरार चल रहे एएसपी लोकेश सोनवाल के वकील हैं। कैसा अजीब संयोग है कि सोनवाल तो एसीबी के वांटेड हैं, और अब भगवान सिंह भी।
-तेजवानी गिरधर 

शुक्रवार, 26 अप्रैल 2013

अजमेर में कई स्थान हैं, जिनके नाम बदल गए हैं


kesarganjअपने एक मित्र और अजमेर के प्रबुद्ध नागरिक ऐतेजाद अहमद खान ने हाल ही फेसबुक पर एक फोटा शाया किया है, जो कि यह प्रमाणित करता है कि हम जिसे केसरगंज (Kesar) इलाके के नाम से जानते हैं, वह असल में (Qaiser) गंज है, जिसकी स्थापना 1883 में हुई थी। इसका अपभ्रंश होते हुए वह केसरगंज हो गया और ये ही आजकल प्रयोग में आ रहा है। उन्होंने वाकई मेहनत करके यह जानकारी सार्वजनिक की है। कदाचित और लोगों को भी इस बारे में जानकारी हो, जिन्होंने कि अजमेर के इतिहास की पुस्तकों का अध्ययन किया है।
वैसे, एक बात है, अकेला केसरगंज ही इस प्रकार का मामला नहीं है। शहर के अन्य कई स्थान भी पहले किसी और नाम से थे, जो कि बाद में बदल गए। इनकी बानगी देखिए- जिसे हम आज रामगंज कहते हैं, वह कभी रसूल गंज हुआ करता था। इसका प्रमाण ये है कि आज भी पुलिस चौकी वाली गली में उसकी नामपट्टिका लगी हुई है। 
ढ़ाई दिन का झौंपड़ा
ढ़ाई दिन का झौंपड़ा
इसी प्रकार आज जिस पर्यटन स्थल को हम ढ़ाई दिन का झौंपड़ा कहते हैं, वह कभी संस्कृत विद्यालय हुआ करता था। दरगाह के सिर्फ एक किलोमीटर फासले पर स्थित यह अढ़ाई दिन का झौंपड़ा मूलत: सरस्वती कंठाभरण नामक विद्यालय था। अजमेर के पूर्ववर्ती राजा अरणोराज के उत्तराधिकारी विग्रहराज तृतीय ने इसका निर्माण करवाया था। सन् 1192 में मोहम्मद गौरी ने इसे गिराकर कर मात्र ढ़ाई दिन में बनवा दिया। बाद में कुतुबुद्दीन ऐबक ने इसे मस्जिद का रूप दे दिया। मराठा काल में यहां पंजाबशाह बाबा का ढ़ाई दिन का उर्स भी लगता था। कदाचित इन दोनों कारणो से इसे अढ़ाई दिन का झौंपड़ा कहा जाता है। यहां बनी दीर्घाओं में खंडित मूर्तियां और मंदिर के अवशेष रखे हैं।
इसी प्रकार अजमेर शहर के केन्द्र में नया बाजार के पास स्थित इस अकबर के किले का निर्माण अकबर ने 1571 से 1574 ईस्वी में राजपूतों से होने वाले युद्धों का संचालन करने और ख्वाजा साहब के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के लिए करवाया था। बाद में इसे राजपूताना संग्रहालय और मैगजीन के नाम से भी जाना जाने लगा। 
संग्रहालय
संग्रहालय
यह महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल भारतीय राजनीति में अहम स्थान रखता है, क्योंकि यहीं पर सम्राट जहांगीर ने दस जनवरी 1916 ईस्वी को इंग्लेंड के राजा जॉर्ज पंचम के दूत सर टामस रो को ईस्ट इंडिया कंपनी को हिंदुस्तान में व्यापार करने की अनुमति दी थी। टामस रो यहां कई दिन जहांगीर के साथ रहा। ब्रिटिश काल में 1818 से 1863 तक इसका उपयोग शस्त्रागार के रूप में हुआ, इसी कारण इसका नाम मैगजीन पड़ गया। वर्तमान में यह संग्रहालय है। पूर्वजों की सांस्कृतिक धरोहर का सहज ज्ञान जनसाधारण को कराने और संपदा की सुरक्षा करने की दृष्टि से भारतीय पुरातत्व के महानिदेशक मार्शल ने 1902 में लार्ड कर्जन के अजमेर आगमन के समय एक ऐसे संग्रहालय की स्थापना का सुझाव रखा था, जहां जनसाधारण को अपने अतीत की झांकी मिल सके। अजमेर के गौरवमय अतीत को ध्यान में रखते हुये लार्ड कर्जन ने संग्रहालय की स्थापना करके प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और ब्रिटिश सरकार के तत्कालीन एजेन्ट कालविन के अनुरोध पर कई राज्यों के राजाओं ने बहुमूल्य कलाकृतियां उपलब्ध करा संग्रहालय की स्थापना में अपना अपूर्व योग दिया। संग्रहालय की स्थापना 19 अक्टूबर, 1908 को एक शानदार समारोह के साथ हुई। संग्रहालय का उद्घाटन ब्रिटिश सरकार के तत्कालीन एजेन्ट कालविन ने किया और उस समारोह में विभिन्न राज्यों के राजाओं के अतिरिक्त अनेक विदेशी भी सम्मिलित हुये। सन् 1892 में इसके दक्षिणी पूर्वी बुर्ज में नगरपालिका का दफ्तर भी खोला गया था।
कुछ और उदाहरण लीजिए- यह सब जानते हैं कि ईसाई समुदाय के लोग जिस स्थान पर रहा करते थे, उसे क्रिश्चियनगंज कहा जाता है, मगर आज कई लोग उसे कृष्णगंज के नाम से पुकारना पसंद करते हैं और कुछ संस्थाओं के नाम इसी नाम पर हैं। इसी प्रकार अंदरकोट को आज कई लोग इंद्रकोट कहना पसंद करते हैं, जब कि इसका अर्थ था परकोटे के अंदर का हिस्सा। इसी प्रकार आप ख्याल होगा कि जवाहरलाल नेहरू अस्पताल को आज भी कई पुराने लोग विक्टोरिया अस्पताल के नाम से जानते हैं, जिसका नाम आजादी के बाद नेहरू जी के नाम से कर दिया गया। 
ajmer logoइसी प्रकार इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया के शासन की रजत जयंती के मौके पर रेलवे स्टेशन के सामने विक्टोरिया क्लॉक टावर निर्माण करवाया गया, जिसे आज हम केवल क्लॉक टावर या घंटाघर के नाम से जानते हैं और उसी के नाम पर क्लॉक टावर पुलिस थाने का नाम है।
वस्तुत: कालचक्र में जब भी जो प्रभावशाली हुआ, उसने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर नाम बदल दिए। यह एक सामान्य प्रक्रिया है। इसमें उद्वेलित होने जैसी कोई बात नहीं है। 
जनाब ऐतेजाद अहमद खान ने बेशक एक महत्वपूर्ण जानकारी सार्वजनिक की है, मगर उसकी प्रस्तुति कुछ असहज करने वाली है। वो यह कि उन्होंने अपनी टिप्पणी में लिखा है कि कृपया बजरंग दल या कोई और दल इस पर उत्तेजित न हो, ये एक सच्चाई है। इस पंक्ति की जरूरत नहीं थी। उन्हें अपनी जानकारी को मात्र जानकारी के लिए निरपेक्ष भाव से प्रस्तुत करना चाहिए था।
-तेजवानी गिरधर

गुरुवार, 25 अप्रैल 2013

भाजपा के बाद कांग्रेस के नेता भी पीछे पड़े बीना काक के


अजमेर जिले की प्रभारी मंत्री श्रीमती बीना काक के यदाकदा अजमेर आने और यहां की समस्याओं पर ध्यान न दिए जाने पर भाजपा नेताओं ने तो विरोध दर्शाया ही है, अब कांग्रेसी नेता भी उनके पीछे पड़ गए हैं। ज्ञातव्य है पिछले दिनों जब बीना काक ने अजमेर संग्रहालय में लाइट एंड साउंड शो का उद्घाटन किया तो भाजपा नेताओं ने उन पर कभी-कभी अजमेर आने और केवल वाहवाही के कार्यक्रमों में शिरकत करने का आरोप लगाया था। इस सिलसिले में अजमेर दक्षिण की भाजपा विधायक श्रीमती अनिता भदेल ने तो यहां तक कहा था कि यह लाइट एंड साउंड शो का प्रोजेक्ट उनके प्रयासों की देन है।
बहरहाल, बीना काक की अजमेर की अनदेखी किए जाने की प्रवृत्ति पर कांग्रेसी नेताओं ने भी ऐतराज जताया है। मनोतीन कांग्रेसी पार्षद सैयद गुलाम मुस्तफा, शहर जिला कांग्रेस के पूर्व उपाध्यक्ष डॉ. सुरेश गर्ग, कांग्रेस अल्पसख्यंक प्रकोष्ठ के पूर्व जिला अध्यक्ष डॉ. मंसूर अली, शहर युवक कांग्रेस के पूर्व महामंत्री राजकुमार जैन, अजमेर जिला इंटक के अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह शेखावत आदि ने कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी को पत्र लिख कर कहा है कि अजमेर के कांग्रेसजन आपके ध्यान में अजमेर की प्रभारी मंत्री की अजमेर के प्रति उपेक्षा की ओर ध्यान आकर्षित करा कर निवेदन कराना चाहते हैं कि आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर प्रभारी मंत्री को अजमेर के प्रति रुचि दिखाने, अजमेर आने व कार्यकर्ताओं व प्रशासन से मिलने हेतु पाबंद किया जाए अन्यथा और किसी प्रभारी मंत्री को नियुक्त करने के निर्देश दें। पत्र में लिखा है कि प्रभारी मंत्री के समय-समय पर कांग्रेसजन से संवाद कायम नहीं करने से कांग्रेसजन का मनोबल टूटता है तथा वे असहाय हो जाते हैं। प्रभारी मंत्री के नियमित रूप से नहीं आने तथा नियंत्रण के अभाव में प्रशासन कांग्रेसजन की उपेक्षा करता है तथा मनमाने तरीके से कार्य कर रहा है। प्रशासन को रोकने पर कहा जाता है कि हमारा ट्रांसफर करवा दो। इस प्रकार प्रशासनिक अराजकता फैली हुई है।
उल्लेखनीय है कि शहर कांग्रेस की गत दिनों हुई बैठक में ब्लॉक अध्यक्ष विजय जैन ने इस बात की पीड़ा जाहिर की थी कि शहर में सोनू निगम नाइट के पास उन्हें ही नहीं मिल पाए और कार्यकर्ता उनसे पास की डिमांड कर रहे थे। उन्होंने यह भी कहा कि पर्यटन मंत्री बीना काक अजमेर आई और अन्य नेताओं के आगमन की उन्हें कोई सूचना नहीं दी जाती जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए। कांग्रेसियों की इस पीड़ा से भाजपा नेताओं के आरोपों की पुष्टि भी हो रही है। बहरहाल देखना ये है कि क्या कांग्रेस व भाजपा के इस दबाव के मद्देनजर उन्हें प्रभारी मंत्री पद से हटाया जाता है या नहीं।
-तेजवानी गिरधर