रविवार, 2 जून 2013

अजमेर उत्तर में भाजपा ने गैर सिंधी को टिकट दी तो दक्षिण की सीट खिसक जाएगी

इन दिनों अजमेर में यह चर्चा काफी गरम है कि भाजपा इस बार अजमेर उत्तर विधानसभा क्षेत्र से किसी गैर सिंधी को चुनाव लड़ाने का मानस बना सकती है। स्थानीय भाजपाइयों का एक बड़ा तबका इसी कोशिश में है, मगर उसमें खतरा ये है कि ऐसा करने पर भाजपा को अपनी दक्षिण सीट गंवानी पड़ सकती है। इस कारण ऐसा करने से पहले भाजपा को दस बार सोचना पड़ेगा।
यहां कहने की जरूरत नहीं है कि सिंधी मतदाता आमतौर पर भाजपा विचारधारा का ही माना जाता है। पिछली बार जब कांग्रेस ने नया प्रयोग करते हुए पूर्व पुष्कर विधायक डॉ. श्रीगोपाल बाहेती को अजमेर उत्तर से उतारा था तो पूरा सिंधी मतदाता लामबंद हो गया, जिससे वे तो पराजित हुए ही, अजमेर दक्षिण की प्रत्याशी विधायक श्रीमती अनिता भदेल भी भारी मतों से जीतीं। असल में उनकी जीत में सिंधी मतदाताओं की बड़ी भूमिका थी, जिसे कि स्वयं श्रीमती भदेल भी स्वीकार करती हैं। कांग्रेस के उस प्रयोग का नुकसान उसे प्रदेश की कुल पांच सीटों पर सीधे उठाना पड़ा था।
हालांकि कांग्रेस की तरह भाजपा में भी पिछले कुछ चुनावों से गैर सिंधी प्रत्याशी को उतारने का दबाव रहता है, मगर अपने पक्के वोट बैंक को नाराज न करने की गरज से पार्टी हाईकमान ने उस पर ध्यान नहीं दिया। विशेष रूप से परिसीमन के बाद यह तर्क दिया जाता है कि अजमेर उत्तर में सिंधी मतदाताओं की संख्या काफी कम हो गई है। इसी को आधार बना कर कुछ दावेदार झूठे आंकड़ों का सहारा लेकर टिकट हासिल करने की जुगत में हैं। मगर वे भूल जाते हैं कि ऐसे आंकड़े पिछली बार के परिणाम से ही सामने आ गए थे। अगर उनकी इस बात को मान भी लिया जाए तो यह तो पक्का हो ही जाता है कि अजमेर उत्तर के मतदाता अब अजमेर दक्षिण में हैं। अगर भाजपा ने गैर सिंधी को टिकट दिया तो अजमेर उत्तर में तो नुकसान होगा ही, साथ ही जिस दक्षिण क्षेत्र में सिंधी ज्यादा हैं, वहां भाजपा प्रत्याशी को सीधे-सीधे नुकसान होगा, जिसके दम पर उसका जीतना आसान हुआ करता है। इतना ही नहीं, अजमेर जिले की नसीराबाद, किशनगढ़, ब्यावर आदि सीटों पर भी असर पड़ सकता है। बताते हैं कि अजमेर दक्षिण की विधायक श्रीमती अनिता भदेल का टिकट इस बार भी पक्का है, इस कारण वे कभी नहीं चाहेंगी कि अजमेर उत्तर से किसी गैर सिंधी को टिकट मिले। इस बार चूंकि उनका तीसरा टर्म होगा और भाजपा की सरकार बनी तो उनका मंत्री बनना पक्का है, ऐसे में संभव है वे अपनी सीट को बचाने के लिए किसी सिंधी को ही टिकट देने की पैरवी करें।

नाजिम साहब, दरगाह में तो खादिमों की ही चलेगी

हाल ही जब महान सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती की दरगाह का प्रबंध संभालने वाली सरकार संस्था दरगाह कमेटी के नए नाजिम अंसार अहमद ने कहा कि दरगाह में जायरीन के साथ दुव्र्यवहार होता है और मेरे साथियों के साथ भी हो चुका है बुरा सलूक हो चुका है तो मुझे यकायक अपनी वह पोस्ट याद आ गई, जिसमें बताया गया था कि दरगाह में तो केवल खादिमों की चलेगी।
असल में हर नया नाजिम जब आता है तो कुछ पहले से उसे पता होता है और कुछ आने के बाद यहां के हालात पता लगते हैं तो वह उन्हें सुधारने की सोचता है। मगर अफसोस कि हर बार असफलता ही हाथ लगती है। समझदार नाजिम तो जल्द ही एडजस्ट होने की कोशिश करते हैं, जबकि अडिय़ल कुछ दिन बाद एडजस्ट होने को मजबूर हो जाते हैं। अंसार अहमद पहले नाजिम नहीं हैं, जिन्हें यह पता लगा है कि दरगाह में जायरीन के साथ बुरा सलूक होता है। उनसे पूर्व के सभी नाजिमों को इन हालात से मुकाबिल होना पड़ा है। दो नाजिम, जिन्हें अपने पद का गुमान था, वे तो पिट भी चुके हैं। वे ही क्यों, पिछले सालों में गुजरे कई उर्स मेलों में पुलिस वाले तक पिट चुके हैं। बाद में ऊपर के दबाव से पुलिस कर्मियों को समझौता ही करना पड़ा है।
वस्तुत: दरगाह के इंतजामात में भले ही दरगाह कमेटी की भूमिका होती है, मगर दरगाह की सारी धार्मिक रस्में अदा करने और जियारत करवाने में सीधा खादिमों व उनकी संस्था अंजुमन की ही महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। इस लिहाज से जायरीन का सीधा वास्ता खादिमों से ही पड़ता है। इनके बीच दरगाह कमेटी की कोई भी भूमिका नहीं होती। एक तो खादिमों की तादाद बहुत है, दूसरा उनकी ऊपर तक राजनीतिक पहुंच तगड़ी है। आर्थिक दृष्टि से भी वे बहुत संपन्न हैं। इस कारण वे ही दरगाह में हावी हैं। जहां तक नाजिम का सवाल है, उसको कुछ तो सीमित अधिकार हैं, दूसरे उनको इस्तेमाल करवाने के लिए खुद की कोई पुख्ता सुरक्षा एजेंसी नहीं है। ऐसे में चाह कर भी वह कुछ नहीं कर पाता। दरगाह के अंदर अतिक्रमणों को ही लीजिए। हर बार उर्स से पहले इस पर चर्चा होती है, मगर आज तक अतिक्रमण नहीं हटाए जा सके हैं। नाजिम के पास अधिकारों की कमी के चलते आने वाली समस्याओं से निपटने के लिए कई बार दरगाह ख्वाजा साहब एक्ट में संशोधन की चर्चा होती है, मगर वह चर्चा भर हो कर रह जाती है। आज तक सरकार की हिम्मत नहीं हुई है कि वह बर्र के छत्ते में हाथ डाले। वजह साफ है। अगर उसने एक्ट के जरिए खादिमों पर अंकुश लगाने की कोशिश तो उनका विरोध पूरे देश के मुसलमानों में गलत संदेश देगा।
पिछले दिनों जब पहली बार केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलात मंत्रालय के नवनियुक्त सचिव डॉ. सुतानु बेहुरिया यहां आए तो उन्होंने भी इस दिशा में कदम उठाने की बात कही थी। उन्होंने दरगाह के बारे में बारीक जानकारी रखने वाले पूर्व नाजिम अशफाक हुसैन से गहन चर्चा की और जाना कि दरगाह से जुड़े संबद्ध पक्षों के क्षेत्राधिकार, उनका योगदान और उनमें टकराव के कारण होने वाली समस्याएं क्या हैं? चूंकि बेहुरिया का यह दौरा विशेष रूप से दरगाह ख्वाजा साहब एक्ट के सिलसिले में था नहीं, वे तो कटसी विजिट पर आए थे, इस कारण सहसा यकीन ही नहीं हुआ कि वे वाकई गंभीर हैं।  हुआ भी वही। उसके बाद आज तक फिर उस पर कोई चर्चा सामने नहीं आई।
दरगाह ख्वाजा साहब एक्ट में संशोधन तो बहुत बड़ी बात हो गई, दरगाह से सीधे जुड़े तीन पक्षों खुद्दाम साहेबान, दरगाह दीवान व दरगाह नाजिम और दरगाह के बाहर की व्यवस्थाओं के लिए जिम्मेदार जिला प्रशासन के बीच ही छोटी-छोटी बातों पर सहमति नहीं हो पाती। आए दिन टकराव होता है और उसकी सुर्खियां प्रिंट व इलैक्ट्रॉनिक मीडिया पर चमकती हैं। जिला प्रशासन अंदर के मामलों पर सीधे दखल कर नहीं पाता और नाजिम को इतने अधिकार हैं नहीं कि वह सख्ती बरत पाए। इसी कारण एक्ट में संशोधन की बातें उठती हैं, मगर फिर चादर ओढ़ कर सो जाती हैं।
आपको याद होगा कि दरगाह ख्वाजा साहब के खादिमों के लिए लाइसेंस लेना जरूरी करने के मामले में दरगाह नाजिम के पूर्व नाजिम की कथित सिफारिश ने ही जबरदस्त तूल पकड़ लिया था। हालांकि नाजिम अहमद रजा ने अपनी सफाई में साफ कर दिया कि उन्होंने न तो लाइसेंस जरूरी करने सिफारिश की है और न ही ऐसा करने का उनका मानस है, लेकिन खादिम इससे राजी नहीं हुए। वे मामले की सीआईडी जांच करवाना चाहते थे ताकि यह पता लग सके कि यह खुराफात किसने की है। दरअसल दरगाह एक्ट की धारा 11(एफ) पर एक राय नहीं बनने तक दरगाह कमेटी ने पहले ही इस मामले को टाल दिया था। उसके बाद नाजिम का सिफारिश करने का कोई मतलब ही नहीं था। इसके बावजूद ऐसा पत्र फैक्स के जरिए मीडिया के पास पहुंचा तो विवाद हो गया। इस पर खादिम शेखजादा जुल्फिकार चिश्ती का कहना था कि जो खादिम पिछले तकरीबन आठ सौ साल से दरगाह ख्वाजा साहब की खिदमत कर रहे हैं, उन्हें लाइसेंस लेना जरूरी करने की बात ही बेमानी है। खिदमत करने अथवा जियारत करवाने का हक खादिमों का जन्मजात हक है। इसके लिए उन्हें किसी सल्तनत या सरकार का मुंह ताकने की भला क्या जरूरत है? लाइसेंस का मतलब ही ये होता है कि किसी काम करने का हक सरकार की ओर से मुहैया करवाया जाए। दरगाह में कौन जियारत करवाएगा, इससे सरकार का कोई लेना-देना ही नहीं है।
एक मुद्दा खादिमों को आइडेंटिटी कार्ड जारी करने का भी रहा है। इसको लेकर भी खादिमों को ऐतराज रहा है। उन्हें ऐसा प्रतीत होता है कि ऐसा करके सरकार उनके हक-हकूक को छीनना चाहती है।
कुल मिला कर नए नाजिम ने कही भले ही सही बात हो और व्यवस्थाएं सुधारने का जज्बा दिखाया है, मगर जल्द ही उनको भी समझ में आ जाएगा कि यहां किस प्रकार नौकरी करनी है।
-तेजवानी गिरधर

शुक्रवार, 31 मई 2013

दबाव बेशक नसीम को होगा, मगर जिम्मेदार तो जिला प्रशासन है

गत दिवस पुष्कर में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के हाथों डाक बंगले का शिलान्यास कराए जाने का मामला इन दिनों बहुत गरमाया हुआ है। कहा ये जा रहा है कि पुष्कर की विधायक व शिक्षा राज्य मंत्री श्रीमती नसीम अख्तर इंसाफ की तिकड़मबाजी से उस जमीन पर शिलान्यास करवा लिया गया, जिसकी स्वीकृति ही नहीं थी। सच तो यह है कि स्वीकृति पूर्व में ही निरस्त हो गई थी। बेशक नसीम ने अपने इलाके में वाहवाही लेने के लिए शिलान्यास करवाने की जुगाड़ बैठाई और मुख्यमंत्री के तयशुदा कार्यक्रम में शिलान्यास कार्यक्रम शामिल न होने के बाद भी उसे अधिकृत कार्यक्रम में शामिल करवा लिया, मगर सवाल ये उठता है जिला कलेक्टर वैभव गालरिया ने तथ्यात्मक जानकारी लिए बिना ही ऐसा होने कैसे दिया?  उससे भी बड़ी बात यह है कि डाक बंगले के लिए जमीन न होने के बावजूद वर्क ऑर्डर जारी कैसे हो गए? क्या अधिकारी इतने दबाव में थे कि उन्होंने आंख मींच कर वह सब कुछ होने दिया, जिसके लिए बाकायदा नीति-निर्देश बने हुए हैं। यहां आपको बता दें कि मुख्यमंत्री कार्यालय ने मुख्यमंत्री द्वारा कराए जाने वाले उद्घाटन और शिलान्यासों के संबंध में कड़े निर्देश जारी किए हुए हैं। इन निर्देश में साफ कहा गया है कि जहां भी किसी भवन या स्थान को लेकर विवाद या संदेह हो उसका उद्घाटन अथवा शिलान्यास मुख्यमंत्री से नहीं कराया जाए। स्पष्ट है कि यहां इस मामले में सीएमओ के इस निर्देश की पालना नहीं की गई। जहां तक पीडब्ल्यूडी का सवाल है, वह कह रहा है कि  उनकी ओर से शिलान्यास के लिए किसी प्रकार का पत्राचार नहीं किया गया। अर्थात शिलान्यास संबंधी कार्यक्रम नसीम अख्तर शिक्षा राज्यमंत्री राजस्थान सरकार एवं जिला प्रशासन अजमेर के निर्देशों से किया गया है। मगर सवाल ये उठता है कि जब डाक बंगले के निर्माण की मंजूरी को पहले ही विभाग के मंत्री डॉ भरत सिंह ने निरस्त कर दिया था तो उसके बाद भी पीडब्ल्यूडी के अफसरों ने यह तथ्य क्यों छुपाए रखा कि उसके द्वारा जमीन उपलब्ध नहीं होने के बावजूद टेंडर जारी करने की कार्रवाई वित्तीय व लेखा नियमों को ताक में रख कर अंजाम दी गई है। विभाग ने एक कदम आगे बढ़ कर वर्क ऑर्डर तक जारी कर दिया।
बहरहाल, ताजा स्थिति ये है कि काम की मंजूरी ही निरस्त हो जाने के बाद शिलान्यास भी स्वत: ही शून्य हो गया है।
ज्ञातव्य है कि यह सारा विवाद हुआ ही इस कारण कि पीडब्ल्यूडी मंत्री ने प्रस्तावित डाक बंगले के काम की पूर्व में जारी स्वीकृति को शिलान्यास कार्यक्रम तय होने के कुछ दिन पहले निरस्त कर दिया। विभाग के प्रमुख शासन सचिव व मुख्य अभियंता ने विभागीय आदेश भी जारी कर दिए। मगर ये पता नहीं लग रहा कि आखिर इस आदेश की जानकारी महकमे के स्थानीय अफसरों को क्यों नहीं मिली?
-तेजवानी गिरधर

जेल में पीसीओ की जरूरत कहां है, मोबाइल जो उपलब्ध है

पूर्व जेल अधीक्षक प्रीता भार्गव के सामने मोबाइल पड़े हैं
राज्य के जेल मंत्री रामकिशोर सैनी ने कहा कि जल्द ही अजमेर, जोधपुर और जयपुर सेंट्रल जेलों की तरह राज्य की सभी जेलों में पीसीओ लगेंगे। उनकी घोषणा पर कानाफूसी है कि जेलों में पीसीओ की जरूरत ही कहां है। जब जेल में कैदियों को आसानी से मोबाइल फोन उपलब्ध हो जाते हैं तो वे काहे को पीसीओ से बात करेंगे। प्रदेश की जेलों में अब तक कई बार की गई आकस्मिक तलाशी में हर बार वहां मोबाइल फोन छुपाए हुए मिले हैं। खुद पुलिस का मानना है कि इन्हीं मोबाइल के जरिए कई खूंखार कैदी अपनी गेंगे चला रहे हैं। मोबाइल तो कुछ भी नहीं है, जेलों में कारतूस, हथियार तक कैदियों के पास पाए गए हैं।
स्वयं जेल राज्य मंत्री रामकिशोर सैनी ने भी एक बार स्वीकार किया थ कि जेल में कैदी मोबाइल का उपयोग कर रहे हैं और उस पर अंकुश के लिए प्रदेश की प्रमुख जेलों में जैमर लगाए जाएंगे, मगर आज तक कोई प्रभावी कार्यवाही नहीं हो पाई है। जेल मंत्री का जेलों में जैमर लगवाए जाने की बात से स्पष्ट है कि वे अपराधियों के पास मोबाइल पहुंचने को रोकने में नाकाम रहने को स्वयं स्वीकार कर रहे थे।
आपको याद होगा कि सजायाफ्ता बंदी के परिजन से रिश्वत लेने के मामले में अजमेर जेल के तत्कालीन जेलर जगमोहन सिंह को सजा सुनाते हुए न्यायाधीश कमल कुमार बागची ने जेल में व्याप्त अनियमितताओं पर टिप्पणी की कि अजमेर सेंट्रल जेल का नाम बदल कर केन्द्रीय अपराध षड्यंत्रालय रख दिया जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। न्यायाधीश ने इस सिलसिले में संदर्भ देते हुए कहा कि समाचार पत्रों में यह तक उल्लेख आया है कि जेल में मोबाइल, कारतूस व हथियार बरामद हुए हैं और हत्या की सजा काट रहे मुल्जिम ने अजमेर जेल से साजिश रच कर जयपुर में व्यापारी पर जानलेवा हमला करवाया। जेल प्रशासन के लिए इससे शर्मनाक टिप्पणी हो नहीं सकती थी। आपको ये भी याद होगा कि जयपुर के टायर व्यवसायी हरमन सिंह पर गोली चलाने की सुपारी अजमेर जेल से ही ली गई। जेल में आरोपी आतिश गर्ग ने मोबाइल से ही पूरी वारदात की मॉनीटरिंग की। जब उसे पता लगा कि उसकी हरकत उजागर हो गई है तो उसने अपना मोबाइल जलाने की कोशिश की, जिसे जेल अधिकारियों ने बरामद भी किया। इससे पहले जेल में कैदियों ने जब मोबाइल के जरिए फेसबुक पर फोटो लगाए तो भी यह मुद्दा उठा था कि लाख दावों के बाद भी जेल में अपराधियों के मोबाइल का उपयोग करने पर कोई रोक नहीं लगाई जा सकी है। सवाल उठता है कि क्या जब भी जांच के दौरान किसी कैदी के पास मोबाइल मिला है तो उस मामले में इस बात की जांच की गई है कि आखिर किस जेल कर्मचारी की लापरवाही या मिलीभगत से मोबाइल कैदी तक पहुंचा है? क्या ऐसे कर्मचारियों को कभी दंडित किया गया है?

बुधवार, 29 मई 2013

स्लम फ्री सिटी बनाने की योजना पर खुश होने की जरूरत नहीं है

अजमेर वासियों के लिए यह खबर वाकई खुश होने वाली बात है कि अजमेर शहर को देश का पहला स्लम फ्री सिटी बनाने की योजना मंजूर हो गई है। इसका स्वागत किया ही जाना चाहिए। मगर संभव है आपको हैडिंग पढ़ कर अटपटा लगा हो कि आखिर ऐसी क्या बात है कि खुशी के मौके पर नकारात्मक टिप्पणी क्यों की जा रही है।
असल में महान सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती की दरगाह और तीर्थराज पुष्कर की बदोलत अजमेर का नाम विश्व के मानचित्र पर अलग ही चमकता है। बारहों महीने यहां बड़ी हस्तियों, नेताओं और फिल्म कलाकारों का आना-जाना लगा ही रहता है। नतीजतन यहां के विकास के लिए कई बार पैकेज घोषित हुए हैं। कुछ लागू भी हुए हैं, उसके बाद भी दरगाह इलाके और पुष्कर सरोवर के हालात किसी से छिपे हुए नहीं हैं। वजह ये है कि यहां योजनाएं लागू तो होती हैं, मगर चूंकि राजनीतिक जागरूकता का अभाव है, इस कारण उनकी ठीक से मॉनीटरिंग नहीं होती और उसका परिणाम ये होता है कि योजनाओं में लगी राशि पानी में चली जाती है। आपको याद होगा कि पूर्व मुख्यमंत्री शिवचरण माथुर के कार्यकाल में अरावली की पहाडिय़ों को हरा-भरा कर उसे पुराना स्वरूप प्रदान करने के लिए हैलीकॉप्टर से बीजारोपण का काम शुरू हुआ, मगर उस पर ठीक से ध्यान न देने के कारण उसे गाय खा गई। आज पहाडिय़ां पहले से भी ज्यादा नंगी हो गई हैं। इसी प्रकार पुष्कर वैली प्रोजेक्ट पर भी करोड़ों खर्च किए गए, मगर पहाडिय़ों की दुर्दशा और सरोवर की बदहाली खुद ही कहानी बयां कर रही है कि वह पैसा न जाने कहां बह गया। तीर्थराज पुष्कर के पास बूढ़ा पुष्कर के जीर्णोद्धार पर भी खूब पैसा खर्च किया गया और भाजपा नेता औंकार सिंह लखावत ने प्रोजेक्ट पूरा करने के लिए दिन-रात एक कर दिया। तत्कालीन मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे की मौजूदगी में भव्य समारोह भी हुआ, मगर सरकार बदलने के बाद आज हालत ये है कि उधर कोई झांकने को तैयार नहीं है। बात करें हवाई अड्डे की तो उसके लिए कितने पापड़ बेले गए हैं। वर्षों बाद गहलोत सरकार ने आते ही एमओयू पर हस्ताक्षर किए, मगर साढ़े चार साल बीत गए, अब जा कर धरातल पर कुछ होता नजर आ रहा है।
इसी प्रकार सीवरेज योजना को ही लीजिए। जब इसे अजमेर में लागू किए जाने की बात आई तो बड़ी खुशी की लहर थी, मगर उस पर जैसा अमल हुआ है, वह किसी ने छिपा नहीं है। आज भी वह अधूरी है। कई जगह काम अधूरा है तो जो पूरा हो चुका है, उस पर विवाद चल रहा है। इस दौरान न जाने कितनी जानें काल-कलवित हो गईं, मगर यह शहर केवल सियापा ही करता रहा। इस सिलसिले में एक कलेक्टर ने तो यहां तक कहा था कि अगर कोई और शहर होता तो हंगामा हो जाता और प्रशासन की जान सांसत में होती। इसी कड़ी में एक सच्चाई ये भी है कि राजनीतिक जागरूकता का अभाव ही वह वजह कि यहां अफसरशाही हावी है और उन्हें अजमेर बहुत सूट करता है। कई अफसर तो ऐसे हैं, जिन्हें कई साल हो गए अजमेर में बसे हुए और यहीं पर विभाग बदल बदल कर तबादला करवा लेते हैं।
खैर, इन सब योजनाओं में सबसे खराब अनुभव रहा दरगाह विकास योजना का। उसके लिए तीन सौ करोड़ रुपए से भी ज्यादा की योजना बनाई गई। बड़ी खुशी थी। बाकायदा अलग-अलग मद में राशि भी तय हुई। अजमेर फोरम ने तो इसे अपना प्राइम प्रोजेक्ट बना कर लगातार दबाव बनाए रखा। मगर वह अजमेर, जयपुर व दिल्ली के बीच डौलती रही और उसे गाय कब खा गई, पता ही नहीं लगा। ऐसा इस वजह से हुआ कि अजमेर के नेताओं ने उस पर ध्यान ही नहीं दिया। और आप समझ सकते हैं कि बिना फॉलोअप के कुछ भी नहीं होता। आज भी उस योजना की फाइलें कहने को वजूद में, मगर दफ्न हैं, मगर किसी को फुर्सत नहीं है कि उसके पीछे पड़े।
वस्तुत: इसी कारण इस शहर को कोई इलायची बाई की गद्दी के नाम  से पुकारता है तो कोई इसे मुर्दा शहर, मुर्दा लोग की उपमा देता है। टायर्ड और रिटायर्ड तो इसे वर्षों से कहा ही जाता है। राजनीतिक जागरूकता के अभाव और सशक्त नेतृत्व के अभाव में यहां के लोग इतने सहनशील हैं कि हर परेशानी को बिना कोई गिला-शिकवा किए सहन करते रहते हैं। आईआईटी के लिए जरूर सिटीजंस कौंसिल के महासचिव व जिला पत्रकार संघ के अध्यक्ष दीनबंधु चौधरी और युवा भाजपा नेता भंवर सिंह पलाड़ा ने अभियान को दिशा दी और जागरूकता लाने की कोशिश की, मगर उसे अपेक्षित जनसमर्थन नहीं मिल पाया और अजमेर का हक मारा गया। सचिन पायलट के केन्द्रीय राज्य मंत्री बनने के बाद अलबत्ता यहां विकास को दिशा मिली है, मगर निचले स्तर पर आज भी वही हालत है।
एक-दो नेताओं को छोड़ कर अधिसंख्य नेताओं की हालत ये है कि वे यहां चल रही योजनाओं के बारे में न तो समझते हैं और न ही उसका फॉलोअप करते हैं। इसी कारण यह खबर सुन कर कि अजमेर स्लम फ्री बनेगा, उतनी खुशी नहीं होती, जितनी कि होनी चाहिए। आज भले ही नगर सुधार न्यास के अध्यक्ष नरेन शहाणी व नगर निगम के मेयर कमल बाकोलिया योजना मंजूर होने पर खुशी में गाल बजा रहे हों और इसका श्रेय सचिन पायलट को देने से नहीं थक रहे हों, मगर वे और उनके बाद आने वाले जनप्रतिनिधि इस योजना पर ठीक से ध्यान देंगे, इसमें तनिक संदेह है।
-तेजवानी गिरधर