गुरुवार, 18 जुलाई 2013

बोर्ड अध्यक्ष सच्चाई कह गए तो भाटी को बुरा लग गया

रेलवे बोर्ड अध्यक्ष अरुणेंद्र कुमार ने गत दिवस अजमेर दौरे के दौरान जैसे ही यह बयान दिया कि पुष्कर-मेड़ता तथा नसीराबाद-कोटा रेल लाइन की उपयोगिता नहीं पाई गई है और इन पर रेल लाइन बिछाने से कोई विशेष प्रभाव पडऩे वाला नहीं है, तो पूर्व उप मंत्री ललित भाटी को बुरा लग गया। उन्होंने बाकायदा बयान जारी कर कहा कि वे अजमेर से जुड़े रेलवे के मसलों पर सर्वोच्च सदन के निर्णय के खिलाफ अनर्गल बयानबाजी कर रहे हैं।
बेशक उनकी इस प्रतिक्रिया में दम है कि रेल बजट की घोषणा क्या देश के सर्वोच्च सदन में बिना किसी ठोस आधार के की जा सकती है, मगर सवाल ये भी तो है न कि उस सर्वोच्च सदन भी तो आखिरकार उसी सरकारी तंत्र की रिपोर्ट पर ही घोषणाएं करता है, जो कि अब ये कह रहा है कि इन रेल लाइनों की उपयोगिता नहीं पाई गई है। संसद को खुद-ब-खुद सपना थोड़े ही आता है। इससे तो ऐसा संदेह होता है कि कहीं रेल बजट में जो घोषणा की गई, उसके पीछे कोरा राजनीतिक दबाव तो नहीं था। सबको पता है कि इन रेल लाइनों के लिए काफी अरसे से मांग की जा रही थी और फौरी तौर पर सर्वे भी हुआ। मगर घोषणा तभी हुई जब अजमेर के सांसद व केन्द्रीय कंपनी मामलात राज्य मंत्री सचिन पायलट ने विशेष प्रयास कर रेलवे बजट में उसे शामिल करवा दिया।
यह भी सर्वविदित तथ्य है कि कई बार राजनीतिक दबाव की वजह से नई योजनाएं लागू कर दी जाती हैं, भले ही उनकी उतनी उपयोगिता हो न हो। ऐसे कई उदाहरण देखे जा सकते हैं। अजमेर-पुष्कर रेल लाइन का मसला ही लीजिए। भारी दबाव के चलते उसे चालू तो कर दिया गया, मगर धरातल पर उसकी उपयोगिता कितनी साबित हो पाई है, किसी से छिपी हुई नहीं है। ताजा मामले में भी ऐसा ही प्रतीत होता है। आम जनता व उसे सपने बेचने वाली नेता नगरी अपने नजरिये से पुष्कर-मेड़ता तथा नसीराबाद-कोटा रेल लाइन की उपयोगिता आंकती है, जबकि रेलवे के तकनीकी जानकारों के आंकने का तरीका कुछ और है। और यही वजह है कि इनकी बजट घोषणा तो हो गई, मगर आज रेलवे के सर्वोच्च अधिकारी ही कह रहे हैं कि इनकी उपयोगिता नहीं पाई गई है। उनकी बात में जरूर कोई दम होगा। यूं ही जुगाली तो नहीं कर गए होंगे। हां, इतना जरूर है कि सच कड़वा होता है, इस कारण भाटी सहित हर अजमेरवासी को बुरा लगा होगा, यह दीगर बात है कि अकेले भाटी ही बोले, बाकी नेताओं की तो जुबान तक नहीं खुली। इस लिहाज भाटी साधुवाद के पात्र हैं कि उन्होंने इतने गंभीर मसले पर प्रतिक्रिया तो जाहिर की।
रहा सवाल भाटी का सर्वोच्च सदन में की गई घोषणा को पत्थर की लकीर की तरह प्रस्तुत करने का तो यह भी सबको पता है कि ऐसी अनेक घोषणाएं होती हैं, जो बाद में पूरी ही नहीं होतीं। इसके प्रति संसद कितनी प्रतिबद्धता रखता है, यह किसी से छिपा हुआ नहीं है। विपक्ष चिल्लता ही रह जाता है और सत्तारूढ़ दल के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती।
भाटी ने सलाह दी है कि बोर्ड अध्यक्ष कार्यवाहक हैं और उन्हें प्रचलित सामान्य व्यवहार के क्रम में ऐसे में निर्णय लेने तथा सार्वजनिक बयानबाजी से परहेज करना चाहिए। सलाह देने का अधिकार सभी को है, मगर बोर्ड अध्यक्ष ने तो वास्तविक तथ्य लोगों के सामने रखा है, कम से कम राजनेताओं की तरह सब्ज बाग तो नहीं दिखाए। इसके अतिरिक्त उनका बयान राजनीतिक बयानबाजी की श्रेणी में नहीं गिना जा सकता, जिससे परहेज की जाए। वे ऐसी जानकारी देने के लिए अधिकृत हैं, और इसके लिए उन्हें किसी की इजाजत लेने की जरूरत नहीं है।
भाटी ने एक बात बड़ी दिलचस्प और काम की कही है, वो यह कि बोर्ड अध्यक्ष ने ऐसा कर अजमेर के सांसद तथा केंद्रीय कंपनी मामलात के राज्यमंत्री सचिन पायलट को संदेह के घेरे मेें लाने का अनपेक्षित कार्य किया है। बात बिलकुल सही है। स्पष्ट है कि पायलट ने ही दोनों रेल लाइनों की घोषणा करवाई है और यदि रेलवे का सर्वोच्च अधिकारी अजमेर में आ कर यहीं पर इन घोषणाओं की धज्जियां उड़ता है तो पायलट पर संदेह होता है कि एक बार घोषणा करवाने के बाद शायद उन्होंने उसके क्रियान्वयन की ओर ध्यान नहीं दिया। खैर, अच्छी बात है कि बोर्ड अध्यक्ष आइना दिखा गए हैं, अब भाटी सहित सभी कांग्रेसी नेताओं को पायलट पर दबाव बनाना चाहिए कि बोर्ड अध्यक्ष आपकी फजीहत कर गए हैं और आप जनता के सामने झूठे पड़ रहे हैं, लिहाजा पीछे पड़ कर इस पर अमल करवाएं। विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुटे भाजपा नेताओं को भी पायलट को घेरना चाहिए कि उनके प्रयासों से घोषणाओं का यह हश्र कैसे हो रहा है?
-तेजवानी गिरधर

शुक्रवार, 12 जुलाई 2013

हवाई अड्डा बना नहीं, शुरू हो गई राजनीति

अजमेर जिले के किशनगढ़ के पास प्रस्तावित बहुप्रतीक्षित हवाई अड्डा अभी बना भी नहीं है कि उसके नामकरण को लेकर राजनीति शुरू हो गई है। ठीक उसी तरह जैसे अजमेर रेलवे स्टेशन को लेकर हुई थी।
ज्ञातव्य है कि हाल ही राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी अजमेर आए तो दरगाह जियारत के दौरान खादिमों की संस्था अंजुमन की ओर से मांग की गई कि इसका नाम सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के नाम पर गरीब नवाज एयरपोर्ट रखा जाए। उन्होंने इसके पक्ष में तर्क भी दिए। इस पर हालांकि अन्य संगठन मुखर रूप से सामने नहीं आए हैं, मगर किन्हीं सज्जन ने फेसबुक पर पृथ्वीराज चौहान एयरपोर्ट अजमेर के नाम से अकाउंट बना दिया है। स्पष्ट है कि यह प्रयास अंजुमन की मांग के जवाब में शुरू की जा रही मुहिम का हिस्सा है। इसी मुहिम के तहत अजमेर यूथ क्लब ने तो बाकायदा एक अपील जारी की है, जिसमें हालांकि वर्तनी की अशुद्धियां हैं, मगर आपकी जानकारी के लिए उसे दुरुस्त कर हूबहू दिया जा रहा है:-
भारत के अंतिम हिंदू सम्राट और अजमेर के सम्राट पृथ्वीराज चौहान के नाम पर अजमेर में क्या है? केवल एक भाजपा के राज में बना पृथ्वीराज स्मारक, उसकी भी सरकार ने हालात खराब कर दी है। हमने सरकार के सभी बड़े मंत्रियों को खत लिख कर मांग की है कि अजमेर में निर्माणाधीन एयरपोर्ट का नाम पृथ्वीराज चौहान रखा जाये, जिससे देशभर और विदेशों में उनकी पहचान बनी रहे। अब सरकार के मन में कया है, सरकार जाने, हमने साफ कर दिया है कि पृथ्वीराज का नाम नहीं तो एयरपोर्ट नहीं। हमें आपका थोड़ा सा सहयोग चाहिये। आप हमारे द्वारा बनाई गयी फेसबुक आईडी prithvirajchauhanairportajmer@gmail.com को भी जोड़ें, जिससे सरकार को अजमेर के लोगों के सम्मान के लिए एयरपोर्ट का नाम पृथ्वीराज चौहान के नाम पर रखना पड़े। हमें अजमेर के सभी सामाजिक संगठन और मार्केट एसोशिएयन का भी समर्थन मिला है। हमने करीब 20 हजार पेम्पलेट छपवा कर घर-घर यह संदेश भेजा है। सभी संकुल कॉलेज में भी यह संदेश भेजा है। सब हमारे साथ जुड़ रहे हैं। आपसे फिर निवेदन है कि आप हमारे द्वारा बनायी गयी फेसबुक आईडी और अन्य लोगों को जुडऩे के लिये कहें। हम आपके आभारी होंगे। -विजय कांकाणी माहेश्वरी। आप फेसबुक पर जाकर हमारी आईडी prithvirajchauhanairportajmer@gmail.com को सर्च करें, आपको मिल जायेगा। हमें अपने हिंदू सम्राट पृथ्वीराज चौहान के खातिर सरकार को अपती ताकत दिखानी होगी।
इस अपील से समझा जा सकता है कि हवाई अड्डे के नाम को लेकर आगे चल कर क्या होने वाला है।
ज्ञातव्य है कि इससे पहले अजमेर रेलवे स्टेशन का नाम रेलवे बोर्ड के स्तर पर अजमेर शरीफ करने के प्रस्ताव का खुलासा होने पर किस प्रकार सभी हिंदूवादी संगठन, व्यापारिक संगठन और कई संस्थाएं रातोंरात अजयमेरु संघर्ष मंच के बैनर तले लामबंद हो गई थीं और जिला कलैक्टर तथा मंडल रेल प्रबंधक अजमेर को ज्ञापन देकर अजमेर के रेलवे स्टेशन का नाम परिवर्तन कर अजमेर शरीफ करने के प्रस्ताव को तत्काल निरस्त कराने की मांग करते हुए उन्हें मुख्यमंत्री राजस्थान सरकार तथा रेल मंत्री भारत सरकार के नाम ज्ञापन पत्र सौंपे। सभी संगठनों के प्रतिनिधिगण व कार्यकर्ताओं ने स्थानीय डाक बंगले से मंच के संयोजक सुनील दत्त जैन, जो कि संघ के महानगर संचालक भी हैं, के नेतृत्व में विशाल जुलूस जिला कलैक्टर कार्यालय व डीआरएम कार्यालय भी निकाला।
ज्ञापन में बताया गया था कि अजमेर का अपना एतिहासिक गौरव रहा है। इसका इतिहास करीब 2000 वर्ष पुराना है तथा इसकी पहचान पिछली कई पीढिय़ों से यहां के इतिहास व गौरव के अनुरूप अजयमेरू के नाम से होती चली आई है। इसी आधार पर यात्री परिवहन के दूसरे बड़े केन्द्र रोडवेज ने भी अजमेर आगार को अजयमेरू आगार पिछले कई वर्षों से घोषित किया हुआ है। इस स्थिति में रेलवे स्टेशन का नाम यहां के साम्प्रदायिक सौहार्द के विपरीत परिवर्तन करने का काई औचित्य नहीं है। उक्त नाम परिवर्तन क्षुद्र राजनीतिक उद्देश्य की पूर्ति करने के लिये तथा वोटों की राजनीति के लिए केन्द्र सरकार के इशारे पर कराने के प्रयास किये जा रहे हैं। कभी भी अजमेर की जनता व जनप्रतिनिधियों के द्वारा इस प्रकार की कोई मांग नहीं की गई, फिर भी इस प्रकार के षडय़ंत्र करके लोगों की भावनाओं को आहत किया जा रहा है। ज्ञापन में नाम परिवर्तन की उक्त प्रक्रिया को तत्काल समाप्त कराने की मांग करते हुए यह भी मांग की कि अजमेर रेलवे स्टेशन का नाम चूंकि अजमेर की पहचान अजयपाल जी, अगणराज जी व यशस्वी सम्राट पृथ्वीराज चौहान से होती है, अत: यहां की गौरवशाली व ऐतहासिक परम्परा के अनुरूप अजयमेरू रखा जाए। इतना भारी विरोध देख कर मंडल रेल प्रबंधक मनोज सेठ ने आश्वस्त किया था कि रेलवे द्वारा रेलवे स्टेशन के नाम परिवर्तन के संदर्भ में कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी तथा नाम परिवर्तन के इस प्रकरण का पटाक्षेप कर दिया।
-तेजवानी गिरधर

गुरुवार, 11 जुलाई 2013

कांग्रेस उठा सकती है अजमेर विकास प्राधिकरण का फायदा

अजमेर नगर सुधार न्यास के क्षेत्रांतर्गत अजमेर शहर में पुष्कर व किशनगढ़ को मिला कर अजमेर विकास प्राधिकरण का गठन जल्द होने जा रहा है। राजनीतिक पंडित समझते हैं कि कांग्रेस सरकार इसमें अध्यक्ष की नियुक्ति कर जातीय संतुलन का फायदा उठा सकती है।
ज्ञातव्य है कि पिछली बार अजमेर उत्तर में परंपरागत को तोड़ते हुए गैर सिंधी के रूप में पूर्व विधायक डॉ. श्रीगोपाल बाहेती को टिकट दी थी, जिसके परिणामस्वरूप सिंधी-गैर सिंधीवाद उफना और नतीजतन डॉ. बाहेती सशक्त उम्मीदवार होते हुए भी पराजित हो गए। आगामी चुनाव को लेकर भी सुगबुगाहट शुरू हो चुकी है। हर किसी की नजर है कि क्या इस बार कांग्रेस फिर गैर सिंधी का प्रयोग करने का साहस दिखाएगी। हालांकि सूत्र यही बताते हैं कि कांग्रेस पिछली हार के बाद सकते में है, मगर गैर सिंधी दावेदारों के रूप में पूर्व विधायक डॉ. श्रीगोपाल बाहेती और शहर कांग्रेस अध्यक्ष महेन्द्र सिंह रलावता दमदार तरीके से दावेदारी कर रहे हैं। विशेष रूप से लैंड फॉर लैंड मामले में उलझने के कारण नगर सुधार न्यास के अध्यक्ष पद से नरेन शहाणी के इस्तीफे के बाद उनका दावा कमजोर होने और प्रत्यक्षत: दूसरा सशक्त सिंधी दावेदार नहीं उभरने के कारण बाहेती व रलावता अति उत्साहित हैं। ऐसे में कांग्रेस को यह समझ में नहीं आ रहा कि आखिर वह क्या करे। राजनीतिक पंडित समझते हैं कि अजमेर विकास प्राधिकरण का गठन इसी समय होने के कारण कांग्रेस के लिए एक ऐसा मौका है, जिसमें वह जातीय संतुलन बैठा सकती है। वह अजमेर उत्तर की सीट व एडीए अध्यक्ष का पद सिंधी-गैर सिंधी के बीच बांट कर दोनों समुदायों को राजी कर सकती है। हालांकि जैसी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की प्रवृत्ति है, किसी को यह नहीं लग रहा कि वे चंद माह के लिए एडीए में अध्यक्ष की नियुक्ति करेंगे, मगर हाल ही विभिन्न आयोगों व बोर्डों में नियुक्ति किए जाने से अनुमान लगाया जा रहा है कि वे यहां भी नियुक्ति कर सकते हैं।
उधर एडीए के जल्द गठन की प्रक्रिया के बीच इसका अध्यक्ष बनने की कवायद भी तेज हो गई है। हालांकि चंद माह के लिए अध्यक्ष बनना बेमानी सा है, क्योंकि यह जरूरी नहीं कि कांग्रेस की सरकार दुबारा आए ही, मगर बावजूद इसके कांग्रेस के वे नेता जो अजमेर उत्तर या दक्षिण के टिकट के दावेदार हैं, यहां भी भाग्य आजमाना चाहते हैं। विशेष रूप से गैर सिंधी दावेदार पूर्व विधायक डॉ. श्रीगोपाल बाहेती, शहर कांग्रेस अध्यक्ष महेन्द्र सिंह रलावता, पूर्व विधायक डॉ. राजकुमार जयपाल व पूर्व उप मंत्री ललित भाटी का नाम सामने आ रहा है। ज्ञातव्य है कि डॉ. बाहेती पर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का वरदहस्त माना जाता है, जबकि रलावता पर केन्द्रीय कंपनी मामलात राज्य मंत्री सचिन पायलट व कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह का। हालांकि केन्द्रीय कंपनी मामलात राज्य मंत्री सचिन पायलट की की डॉ. बाहेती से नाराजगी उनके लिए बाधक हो सकती है, मगर माना जा रहा है कि आगामी चुनाव को देखते हुए सचिन का रुख कुछ नरम पड़ सकता है। ऐसे में अगर डॉ. बाहेती अध्यक्ष बन जाएं तो कोई अचरज नहीं होना चाहिए। जहां तक डॉ. जयपाल का सवाल है, उनके संबंध भी पायलट से अच्छे नहीं हैं, इस कारण उनकी नियुक्ति में संदेह उत्पन्न होता है, मगर संभावित बदले समीकरणों के तहत उनको भी कुछ न कुछ दिया जा सकता है। रहा सवाल भाटी का तो वे हैं तो सचिन के खेमे में, मगर उनका ज्यादा जोर विधानसभा टिकट पर नजर आता है। वैसे अनुसूचित जाति के किसी नेता के अध्यक्ष बनने की संभावना इस कारण कुछ कम है क्योंकि अजमेर दक्षिण सीट व नगर निगम मेयर की सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है और अजमेर उत्तर की सीट अघोषित रूप से सिंधियों के लिए। ऐसे में सामान्य वर्ग के नेताओं को प्राथमिकता देना कांग्रेस की मजबूरी है। अब देखते हैं मुख्यमंत्री गहलोत क्या करते हैं?
राजनीतिक जोड़तोड़ की कवायद करने वालों का कयास है कि गहलोत बाहेती को एडीए का अध्यक्ष, डॉ. जयपाल को शहर कांग्रेस अध्यक्ष, रलावता को देहात जिला कांग्रेस अध्यक्ष, भाटी को अजमेर दक्षिण का टिकट व किसी सिंधी को अजमेर उत्तर का टिकट देकर संतुलन बैठा सकते हैं। ज्ञातव्य है कि किशनगढ़ विधायक नाथूराम सिनोदिया को इस बार फिर टिकट दिया जाना लगभग तय है, इस कारण उन्हें देहात अध्यक्ष पद से मुक्त करने में कोई दिक्कत नहीं आएगी।
-तेजवानी गिरधर

सोमवार, 8 जुलाई 2013

गजल को गाली दे गए पत्रकार आलोक श्रीवास्तव

दैनिक भास्कर के स्थानीय संपादक, वरिष्ठ पत्रकार व गजलकार डॉ. रमेश अग्रवाल के गजल संग्रह भीड़ में तनहाइयां के विमोचन समारोह में आए मुख्य अतिथि दैनिक भास्कर की ही पत्रिका अहा जिंदगी के संपादक आलोक श्रीवास्तव ने गजल को ऐसी गाली दी कि उसे अजमेर के प्रबुद्ध नागरिक कभी नहीं भूल पाएंगे। यूं तो उन्होंने डॉ. अग्रवाल के गजल संग्रह की तारीफ की, मगर कार्यक्रम में मौजूद जनसमूह का श्रेय उन्होंने डॉ. अग्रवाल के पत्रकारिता के कद को दे डाला। ऐसा कर के उन्होंने जानबूझ कर डॉ. अग्रवाल की अप्रतिम और लाजवाब गजलों को बौना करने की कोशिश की, जिससे समारोह में मौजूद हर शख्स का जायका बिगड़ गया। उनसे अनजाने में ऐसा हुआ, ऐसा इस कारण नहीं माना जा सकता कि क्योंकि वे भी एक जाने-माने पत्रकार हैं, शब्दों के खिलाड़ी हैं और उन्हें अच्छी तरह से पता था कि वे क्या कह अपनी पत्रकारितागत चतुराई का परिचय दे रहे हैं। साफ दिख रहा था कि अलग से कुछ हट कर सत्य को उद्घाटित करने की कोशिश में ही उन्होंने एक सौहार्द्रपूर्ण मंजर पर राई बघारने की यह हरकत की। अगर वे यह कहते कि भले ही डॉ. अग्रवाल के आभा मंडल की वजह से इतना शानदार समारोह हुआ है, मगर उनकी गजलें उससे भी ज्यादा शानदार हैं, तो बात समझ में भी आती, मगर जिस अंदाज में उन्होंने अपनी बात कही, साफ झलक रहा था पेट में इस बात का बड़ा भारी कष्ट रहा कि एक गजल संग्रह का विमोचन समारोह इतना भव्य कैसे हो रहा है?
बेशक उनकी बात इस अर्थ में ठीक मानी जा सकती है कि किसी भी प्रभावशाली व्यक्ति का कार्यक्रम श्रोताओं की पर्याप्त मौजूदगी और कार्यक्रम की गरिमा की दृष्टि से कामयाब होता है, मगर यह तो एक सार्वभौमिक तथ्य है। इसमें नया कुछ भी नहीं। इसमें कोई दो राय नहीं कि कार्यक्रम में स्तरीय प्रबुद्ध वर्ग की मौजूदगी के पीछे पत्रकारिता के क्षेत्र में डॉ. अग्रवाल की अब तक की साधना, पहचान और लोकप्रियता ही प्रमुख वजह रही। एक अदद गजलकार के नाते तो लोग जुटे नहीं थे। वे अन्य गजलकारों की तरह कोई प्रतिष्ठित गजलकार हैं भी नहीं और न ही ऐसा उनका कोई दावा है। मगर इससे उनकी उम्दा गजलें छोटी नहीं हो जातीं। स्वाभाविक सी बात है कि शहर के प्रबुद्ध लोग यही देखने-सुनने आये थे कि एक प्रतिष्ठित पत्रकार की गजलें कैसी हो सकती हैं। उन्हें सुन कर समारोह में मौजूद शायद ही कोई ऐसा दर्शक रहा हो, जिसके मुंह से अनायास वाह-वाह न निकला हो। अजमेर के जाने-माने और मूर्धन्य गजलकार व गीतकार सुरेन्द्र चतुर्वेदी व गोपाल गर्ग और लॉफ्टर चैलेंज फेम रास बिहारी गौड़ भी डॉ. अग्रवाल की गजलों की बारीक समीक्षा करते हुए शब्दों की कमी महसूस कर रहे थे। वे कोई उनके एक अच्छे पत्रकार होने के नाते थोड़े ही तारीफ कर रहे थे। ऐसे में आलोक श्रीवास्तव का यह कहना कि कोई अन्य गजलकार होता तो इतना भव्य समारोह नहीं होता, बहुत बेहूदा और भद्दी टिप्पणी लगी। हालांकि उन्होंने आड़ गजल की लगातार हो रही दुर्दशा की ली, मगर ऐसे गरिमापूर्ण समारोह में इस प्रकार टिप्पणी करके उन्होंने अपनी खुद की गरिमा गिरा ली। अव्वल तो वे खुद ही अपने मन्तव्य का अतिक्रमण कर रहे थे। खुद उनके पास भी इस सवाल का जवाब नहीं होगा कि क्या डॉ. अग्रवाल की जगह किसी और अदद गजलकार के गजल संग्रह का विमोचन होता तो वे समारोह के मुख्य अतिथी बनना स्वीकार करते? जब वे खुद गजल मात्र को सम्मान नहीं देते तो दुनिया से क्या अपेक्षा कर रहे हैं?
वस्तुत: पूरा समारोह ही एक अच्छे पत्रकार के उम्दा गजलकार भी होने पर आश्चर्यमिश्रित भाव पर ही थिरक रहा था, मानो पत्रकार तो कवि, गजलगो या साहित्यकार हो ही नहीं सकता। बेशक साहित्यकार होने के लिए पत्रकार होना जरूरी नहीं है, चूंकि साहित्य एक स्वतंत्र विधा है, मगर ऐसा अमूमन देखा गया है कि साहित्यकार वर्ग किसी पत्रकार के साहित्य के क्षेत्र में भी दखल देने पर असहज हो जाता है। उसे इस बात की भी पीड़ा होती है कि शब्दों के असली संवाहक तो वे हैं, फिर महज रूखी खबरों में शब्दों का प्रयोग करने वालों को समाज में उनसे अधिक सम्मान क्यों दिया जाता है?
जहां तक मेरी निजी जानकारी, समझ और अनुभव है, डॉ. अग्रवाल मूलत: साहित्यक प्रतिभा हैं, पत्रकारिता उनकी आजीविका का साधन मात्र है, जिसमें भी उन्होंने उत्कृष्टता से प्रतिष्ठा पाई है। उनके भीतर मौजूद साहित्यकार से साक्षात्कार तो लोग उनके दैनिक नवज्योति में काम करने के दौरान चकल्लस कॉलम और दैनिक भास्कर के दो दूनी पांच कॉलम में ही करते रहे हैं, जिनमें वे जीवन दर्शन, व्यंग्यपूर्ण चुटकी और हास्य रस से युक्त पद्य के साथ गद्य के रूप में एक-दो शेर भी पिरोते हैं। हां, उनकी पहचान जरूर एक वरिष्ठ पत्रकार के रूप में स्थापित हुई है। अब जब कि उन्होंने अपनी गजलों के जरिए हिरण के अंतिम आर्तनाद में छिपी छटपटाहट और वेदना को उभारा है, उनकी पहचान एक स्तरीय गजलगो के रूप में भी हो गई है।
-तेजवानी गिरधर

रविवार, 7 जुलाई 2013

पहले क्यों नहीं रोका मोइनी को वीआईपी खादिम बनने से?

हर वीआईपी-वीवीआईपी की जियारत कर तरह राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को दरगाह की जियारत कराने को लेकर भी विवाद होता दिखाई दे रहा है। दरगाह के खादिमों की संस्था अंजुमन सैयद जादगान का कहना है कि चूंकि राष्ट्रपति का पहले से कोई खादिम नहीं है और वे पहली बार दरगाह आ रहे हैं, ऐसे में अंजुमन का ही हक है वो राष्ट्रपति को जियारत कराए। अंजुमन ने बाकायदा सदर सैयद हिसामुद्दीन नियाजी की सदारत में बैठक कर निर्णय किया कि प्रशासन किसी खादिम को थोपता है, तो अंजुमन इसका विरोध करेगी। अंजुमन सचिव सैयद वाहिद हुसैन अंगाराशाह  के अनुसार प्रशासन ने जबरदस्ती किसी खादिम को जियारत के लिए थोपा तो अंजुमन के सभी लोग के दौरान आस्ताना से बाहर आ जाएंगे।
सवाल उठता है कि आखिर हर बार वीआईपी-वीवीआईपी की जियारत को लेकर विवाद होता क्यों है? खादिमों के बीच विवाद तो फिर भी समझ में आता है, उसके कई कारण बन जाते हैं, मगर अंजुमन और खादिम के बीच विवाद अनूठा है। स्वाभाविक सी बात है कि राष्ट्रपति भवन की ओर से प्रशासन को पूछा गया होगा कि जियारत कौन करवाएगा तो उन्होंने सैयद मुकद्दस मोइनी का नाम प्रस्तावित किया गया होगा। कारण सिर्फ यही है कि वे अघोषित रूप से वीआईपी खादिम हैं। चाहे जिला प्रशासन का कोई अधिकारी हो या फिर जयपुर-दिल्ली से पहली बार आने वाला वीआईपी, उन्हीं से संपर्क किया जाता है। यह एक परंपरा सी बन गई है। इसी प्रकार की परंपरा खादिम कुतुबुद्दीन सकी को लेकर है। वे भी फिल्म जगत के अघोषित खादिम हैं। कारण ये है कि वे फिल्म जगत के संपर्क में रहते हैं। किसी भी एक्टर-एक्ट्रेस को जियारत के लिए अजमेर आना होता है तो उनके मित्र उन्हीं का नाम सुझा देते हैं। इसी कारण आज वे अघोषित रूप से फिल्मी खादिम हो गए हैं। इसका कभी कोई विरोध नहीं हुआ। विरोध का आधार बनता भी नहीं है। यह ठीक उसी प्रकार है, जैसे आपका कोई मेहमान आप पर दरगाह जियारत कराने की जिम्मेदारी सौंपे तो आप अपनी पसंद के खादिम से संपर्क करते हैं। इसमें किसी को कोई ऐतराज नहीं होता। बात जहां तक मुकद्दस मोइनी की है, वे चूंकि लगातार प्रशासन के संपर्क में रहते हैं, इस कारण वे भी अघोषित रूप से वीआईपी खादिम हो गए हैं। अब चूंकि मामला देश के राष्ट्रपति प्रणब मुकर्जी का है और वे पहली बार अजमेर आ रहे हैं, इस कारण अंजुमन दावा कर रही है।
इस बारे में मोईनी का दावा है कि प्रशासन के पास उनके नाम का फैक्स राष्ट्रपति कार्यालय से पहुंच चुका है, इसलिए वे जियारत कराएंगे। बेशक ऐसा हुआ होगा, मगर राष्ट्रपति भवन के अधिकारियों को क्या पता कि  उन्हें मोइनी का नाम भेजना है, जरूर प्रशासन ने ही उनका नाम सुझाया होगा, इसी कारण उन्हीं के नाम का फैक्स आया होगा।
अब जब विवाद की स्थिति बन रही है तो सवाल उठता है कि अंजुमन ने इससे पहले प्रशासन को यह स्पष्ट क्यों नहीं कह रखा है कि पहली बार आने वाले वीवीआईपी के लिए खादिम का नाम तय करने का जिम्मा कायदे के अनुसार अंजुमन का है, अत: मोइनी का नाम न सुझाया करें और अंजुमन से पूछ कर ही तय करें। प्रशासन को क्या पता कि अंजुमन इस पर विवाद करेगी? खैर, अब देखते हैं क्या होता है? बेहतर तो यही है कि कम से कम मुकर्जी के सामने तो विवाद न हो, उससे पहले ही सुलह हो जाए और आगे के लिए भी तय हो जाए कि पहली बार आने वाले वीवीआईपी के बारे में क्या नीति रहेगी?
-तेजवानी गिरधर