शुक्रवार, 26 जुलाई 2013

रघु शर्मा के साथ भगत को देख सभी चौंके

लैंड फॉर लैंड मामले में फंसने के कारण अजमेर नगर सुधार न्यास के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे चुके नरेन शहाणी भगत को पहली बार एक सार्वजनिक सरकारी समारोह में देख सभी चौंके। मौका था जवाहर रंगमंच पर आयोजित राजीव गांधी विद्यार्थी डिजीटल योजना के तहत लैपटॉप तथा नव प्रवेशित साईकिल के लिए चैक वितरण समारोह का, जिसमें मुख्य अतिथि के रूप में सरकारी मुख्य सचेतक डॉ. रघु शर्मा मौजूद थे। इसमें उनके साथ जब लोगों ने भगत को भी देखा तो चौंकना स्वाभाविक था। शाहनी मंच पर पहुंचे, तो शिक्षा विभाग के अफसरों ने उनका अभिनंदन किया। वे मंच पर रघु शर्मा के साथ बैठे। साथ ही रघु शर्मा के साथ विद्यार्थियों को लेपटॉप भी वितरित किए। अखबारों ने इस घटना को बाकायदा रेखांकित किया। यह घटना यूं भले ही सामान्य लगती हो, मगर राजनीति के जानकार माथापच्ची कर इसके अर्थ निकालने की कोशिश कर रहे हैं।

भगत की बॉडी लैंग्वेज से ऐसा अहसास हो रहा था, मानो पिछले दिनों इस्तीफे के बाद उन पर जो मानसिक दबाव था, उससे वे बाहर आ चुके हैं, तभी तो एक सार्वजनिक समारोह में बिंदास हो कर उपस्थित हुए। सवाल ये उठता है कि क्या उन्हें आयोजक विभाग ने बुलवाया। जाहिर तौर पर नहीं। चूंकि अब वे न्यास अध्यक्ष पद पर नहीं हैं। सरकारी कार्यक्रम में एक कांग्रेसी नेता के नाते भी उन्हें नहीं बुलवाया जा सकता था, जिस पर कि विशेष से फिलवक्त आरोप लगा हुआ है। यह भी पक्का है कि वे बिना बुलाए मेहमान की तरह नहीं पहुंचे होंगे। इतनी निर्लज्जता की उनसे उम्मीद नहीं की जा सकती। अर्थात उन्हें रघु शर्मा ने ही बुलवाया। और अगर ऐसा है तो इसके राजनीतिक मायने निकलते हैं। सबसे बड़ा तो ये कि  रिश्वत प्रकरण में आरोपी होने के बाद भी सरकारी तौर पर उनसे परहेज नहीं किया जा रहा है। यानि की उनके बारे में सरकार का रुख नरम है। रघु शर्मा दूध पीते बच्चे तो हैं नहीं। जरूर उन्होंने कुछ सोच कर उन्हें बुलवाया होगा। सरकार यानि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का रुख जो भी हो, रघु शर्मा अपने स्तर पर ऐसा कदम उठा रहे हैं तो जरूर उसकी कोई वजह होगी। अब जबकि इस घटना पर लोगों की नजर है और कोई विवाद हो सकता है तो संभव है रघु शर्मा उन्हें बुलवाने की बात से इंकार करें, मगर उनके इस बात का कोई भी जवाब नहीं होगा कि बिन बुलाए भगत के आने पर उन्होंने ऐतराज क्यों नहीं किया। क्या उन्हें पता नहीं था कि भगत के उनके साथ मंच पर होने से कुछ विवाद हो सकता है? अगर ये भी मान लिया जाए कि वे बिन बुलाए ही वहां पहुंच गए, तो क्या रघु शर्मा को इतनी भी अक्ल नहीं कि वे उन्हें मंच पर बुलवाने की रिस्क लेंगे।
कयास ये भी लगाया जा सकता है कि केन्द्रीय मंत्री सी पी जोशी के इशारे पर रघु ने उन पर फंदा डाला होगा। कहने की जरूरत नहीं है कि विधानसभा चुनाव को लेकर जोशी एक बार फिर लॉबिंग करने में जुट गए हैं। वे इन दिनों दावेदारों पर हाथ रख रहे हैं, ताकि बाद में चुनाव जीतने पर उनके काम आएं। कुल मिला कर यह साफ है कि यह छोटी सी घटना कोई खास अर्थ रखती है। इसे इस रूप में भी लिया जा सकता है कि उन्हें फिर से प्लेटफार्म उपलब्ध करवाया जा रहा है। इसका आधार ये है कि उन पर जो आरोप है, उसकी जांच नौ दिन चले अढ़ाई कोस की रफ्तार से चल रही है। कहने वाले तो यहां तक कहने लगे हैं कि वे इस केस से बाहर आ जाएंगे। सच जो भी हो, भगत का सरकारी कार्यक्रम में सार्वजनिक मंच पर मुख्य सचेतक के साथ मौजूद होना अन्य दावेदारों को पच नहीं रहा।
-तेजवानी गिरधर

गुरुवार, 25 जुलाई 2013

मास्साब चौधरी जी को निपटाना आसान नहीं होगा

अजमेर के सांसद व केन्द्रीय कंपनी मामलात राज्य मंत्री सचिन पायलट से खुला पंगा लेने वाले अजमेर देहात जिला कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष व अजमेर डेयरी के अध्यक्ष रामचंद्र चौधरी को भले ही पायलट के इशारे पर उनके गुट के नेताओं ने चारों से ओर से घेर लिया है, मगर उन्हें निपटाना इतना आसान भी नहीं होगा। हांलाकि कांग्रेस एक समुद्र है और इसमें न जाने कितने रामचंद्र चौधरी आए और गए, साथ ही सचिन के सीधे राहुल गांधी से ताल्लुक भी हैं, मगर जहां तक स्थानीय राजनीति का सवाल है, चौधरी को नजरअंदाज करना हंसी खेल नहीं है। एक तो मदेरणा-मिर्धा लॉबी के आशीर्वाद के कारण उनको बेदखल करने से पहले पार्टी दस बार सोचेगी। दूसरा जाट खेमा पहले से ही पार्टी से नाराज चल रहा है और जिले में तकरीबन ढ़ाई लाख जाट वोट हैं, उनको चलते रस्ते नाराज करना मंहगा पड़ सकता है। मगर यदि भारी दबाव के चलते उन्हें पार्टी से बाहर करने की नौबत आ भी गई तो वे विधानसभा चुनाव और बाद में लोकसभा चुनाव में पार्टी को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
आपको पता होगा कि चौधरी हसबैंड मेमोरियल स्कूल में फिजिक्स के टीचर रहे हैं और अजमेर डेयरी पर वर्षों से उनका एकछत्र राज है। पुराने लोगों में मास्साब के नाम से जाने जाने वाले चौधरी की को-ऑपरेटिव मूवमेंट पर कितनी पकड़ है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देहात जिला कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटाए जाने के बाद भी और जिले के दिग्गज जाट नेता पूर्व मंत्री प्रो. सांवरलाल जाट व पूर्व शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी के एडी चोटी का जोर लगाने के बाद भी उन्हें डेयरी से बेदखल नहीं किया जा सका। हालांकि ऊपर मदेरणा-मिर्धा लॉबी का वरदहस्त है, मगर स्थानीय स्तर पर अकेले अपने दम पर राजनीति करते हैं। बस दिक्कत ये है कि जब उनको रीस यानि गुस्सा आता है तो किसी के बस में नहीं आते। और उनकी यही फितरत उनके लिए कई बार भारी परेशानी का सबब बन जाती है। रीस आने के बाद आगा-पीछा नहीं देखते। एक बार तो दैनिक नवज्योति से सीधा पंगा मोल ले लिया। तब नवज्योति को यहां बोलबाला था। वे सार्वजनिक रूप से नवज्योति को गाली देते थे। इसके चलते कांग्रेस के एक बड़े जलसे का जिला पत्रकार संघ ने बायकाट कर दिया, मगर चौधरी ने कोई परवाह नहीं की। आखिर तक वे झुके नहीं। सचिन के मामले में भी वे रीस पर काबू नहीं रख पाए और आज सचिन समर्थकों से चारों ओर से घिर गए हैं।
सब जानते हैं कि विवादों से उनका चोली-दामन का साथ रहा है और उनकी अब तक की जिंदगी संघर्षों में ही बीती है। ज्ञातव्य है कि मसूदा में निर्दलीय ब्रह्मदेव कुमावत ने चौधरी को हरा दिया था, लेकिन पार्टी को सरकार बनाने के लिए कुमावत की जरूरत थी, इस कारण उन्हें संसदीय सचिव बनाया गया। यह बात चौधरी को इतनी बुरी लगी कि उनके समर्थकों ने बिजयनगर में आयोजित किसान सम्मेलन में ब्रह्मदेव कुमावत के साथ हाथापाई कर दी। यह विवाद काफी दिन तक चलता रहा। मगर इस बार का संघर्ष देख कर यही लगता है कि कहीं उन्होंने रोंग नंबर तो डायल नहीं कर दिया। उन्होंने चैलेंज भी तो ऐसी शख्सियत को दे दिया है, जो इन दिनों चमकता सितारा हैं। सचिन युवा हैं तो उतना जोश भी है। यूं पूर्व विधायक डॉ. श्रीगोपाल बाहेती व पूर्व विधायक डॉ. राजकुमार जयपाल भी उनकी छतरी के नीचे नहीं आए, मगर कम से कम उन्होंने इस तरह खुली बगावत तो नहीं की। उन्होंने चौधरी की तरह कभी सार्वजनिक रूप से पायलट से मुंहजोरी नहीं की है। उनके विरोध की रस्साकस्सी ने कभी सार्वजनिक रूप से नौटंकी का रूप नहीं लिया है। कम से कम अनुशासनहीनता तो नहीं की। मगर चौधरी ने तो खुले आम चुनौती दे कर आलाकमान तक को सकते में डाल दिया है। चौधरी के इस रवैये के कारण पार्टी की काफी थू-थू तो हो रही है, पायलट की भी बड़ी भारी किरकिरी हुई है।
हालांकि पायलट चाहें तो पार्टी हाईकमान में अपनी जबदस्त पेठ के चलते खुद ही चौधरी को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखवा सकते हैं, मगर उनके इशारे पर चौधरी को झटका देने के लिए निचले स्तर पर ही कांग्रेसी नेता लामबंद हो गए हैं। कांग्रेस विधायकों समेत जिले के कई कांग्रेसी नेताओं ने चौधरी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। सभी ने कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष डॉ. चंद्रभान को पत्र भेजकर चौधरी को कांग्रेस से निष्कासित करने की मांग की है। बेशक चौधरी जमीनी नेता हैं, उनकी अजमेर डेयरी अध्यक्ष के नाते जिले पर निजी पकड़ है और उनकी जाति के तकरीबन ढ़ाई लाख वोट जिले में हैं, मगर उन्होंने विरोध का जो तरीका अपनाया है, उसे हाईकमान गंभीर मान सकता है। हाईकमान को डर है कि अगर इस तरह का विरोध छूत की तरह फैला तो यह पार्टी के लिए बहुत घातक होगा।
-तेजवानी गिरधर
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मंगलवार, 23 जुलाई 2013

भगत को टिकट नहीं मिलेगा, ये मान कर सक्रिय हो गए कई सिंधी दावेदार


लैंड फॉर लैंड मामले में आरोपी बनाए जाने के कारण इस्तीफा देने को मजबूर हुए नरेन शहाणी भगत का विधानसभा टिकट भी कटा मान कर यूं तो गैर सिंधी दावेदारों के हौंसले बुलंद हैं, मगर यकायक कई सिंधी दावेदारों ने भी मालिश शुरू कर दी है।
जानकारी के अनुसार नौकरी से इस्तीफा दे कर चुनाव का मानस बनाने से अब तक बच रहे सरकारी चिकित्सक डॉ. लाल थदानी की लार खाली मैदान देख कर सबसे ज्यादा टपक रही है। यूं तो वे पूर्व में भी दावेदारों में शुमार रहे हैं, मगर इस बार संभवत: सर्वाधिक मशक्कत कर रहे हैं। उन्होंने लाइजनिंग के लिए जयपुर के चक्कर काटना शुरू कर दिया है। उन्हें उम्मीद है कि भूतपूर्व राजस्व मंत्री स्वर्गीय किशन मोटवानी के आशीर्वाद से राजस्थान सिंधी अकादमी का अध्यक्ष बन कर कद बनाने के कारण उन पर सर्वाधिक गौर किया जाएगा। इसी प्रकार पिछली बार एडी-चोटी का जोर लगाने वाले युवा नेता नरेश राघानी भी हाथ-पैर मार रहे हैं। इसके लिए वे दिल्ली के एक-दो दमदार सूत्रों की मदद ले रहे हैं। वैसे उन्होंने अभी अपने पत्ते खोले नहीं हैं। इसी प्रकार स्वर्गीय मोटवानी जी के जमाने से टिकट मांग रहे पूर्व पार्षद हरीश मोतियानी ने भी अपना दावा छोड़ा नहीं है। उन पर पूर्व विधायक डॉ. श्रीगोपाल बाहेती का वरदहस्त है, मगर डॉ. बाहेती खुद ही दावेदार हैं, ऐसे में वे उनकी कितनी मदद करेंगे, कुछ कहा नहीं जा सकता। रहा सवाल पुराने दावेदार पूर्व पार्षद रमेश सेनानी का तो वे इस बार उन्होंने प्रत्यक्षत: तो दावेदारी नहीं की है। अंदर ही अंदर अपने आका पूर्व विधायक डॉ. राजकुमार जयपाल के जरिए कुछ कर रहे हों तो पता नहीं। पूर्व विधायक नानकराम जगतराय के उप चुनाव में टिकट मांगने वाले कर्मचारी नेता हरीश हिंगोरानी  ने पिछली बार तो बाकायदा घोषित रूप से भगत को सहयोग करने के कारण दावा नहीं किया था, मगर इस बार मैदान खाली देख कर वे भी कूद पड़े हैं। वे समझते हैं कि इससे बढिय़ा मौका फिर नही आएगा। दावा करने के लिए दावा करना कितना आसान है, इसका उदाहरण पेश करते नजर आ रहे हैं विन्नी जयसिंघानी, जिन्हें कुछ कांग्रेसी नेताओं ने चने के झाड़ पर चढ़ा दिया है, यह कह कर कि उनके रिश्तेदार पूर्व आईएएस अधिकारी एम. डी. कोरानी चाहें तो उन्हें टिकट दिलवा सकते हैं। एक सुगबुगाहट ये भी है कि कांग्रेस किसी सिंधी महिला पर दाव खेल सकती है। इसी के चलते पार्षद रश्मि हिंगोरानी भी तिकड़म भिड़ा रही हैं। हालांकि उन्होंने घोषित रूप से दावा नहीं किया है। इसी प्रकार एक नाम किन्हीं कंचन खटवानी का भी सामने आ रहा है, जो कि इन दिनों सक्रिय हो गई हैं। एक और नाम भी चर्चा में आता नजर आता है, वो है जाने-माने शराब ठेकेदार जांगीराम की पुत्रवधु का। बताया जाता है कि वे पैसे के दम पर टिकट ला सकती हैं। कुल मिला कर स्थिति ये है कि भगत का टिकट कटने की उम्मीद में एक अनार सौ बीमार वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। हो सकता है कि कुछ ऐसे और भी दावेदार भी बाद में सामने आएं। उनमें वासुदेव माधानी का नाम लिया जा सकता है, जो उस चुनाव में काफी सक्रिय हुए थे, जब भगत टिकट लेकर आए थे। एक नाम और भी है, वो है दीपक हासानी का, मगर वह तो पहले ही झटका खा चुके हैं। ज्ञातव्य है कि एक जमीन प्रकरण में उनकी वजह से मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का नाम घसीटे जाने पर उनका न्यास अध्यक्ष पद का दावा खारिज हो गया था।
जहां तक भगत का सवाल है, उन्होंने अभी अपना दावा छोड़ा नहीं है। सुनने में तो यहां तक आ रहा है कि वे लैंड फॉर लैंड मामले से बच कर आ सकते हैं। अगर ऐसा होता है तो उनका दावा उतना ही स्टैंड करेगा, जितना मामले में उलझने से पहले था।
-तेजवानी गिरधर

जाट लॉबी के दम पर सचिन से भिड़े चौधरी

अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव और प्रदेश प्रभारी गुरुदास कामत की मौजूदगी में अजमेर के सांसद व केन्द्रीय कंपनी मामलात राज्य मंत्री सचिन पायलट से जिस प्रकार एक बार फिर अजमेर डेयरी अध्यक्ष व पूर्व देहात जिला कांग्रेस अध्यक्ष रामचंद्र चौधरी भिड़े, उससे साफ दिखता है कि उनको जाट लॉबी की पूरी शह है। यहां यह बताने की जरूरत नहीं है कि जाटों का पूर्व विधानसभा अध्यक्ष परसराम मदेरणा लॉबी का तबका पूर्व जलदाय मंत्री महिपाल मदेरणा के भंवरी प्रकरण में फंसने के कारण खफा है। इस वजह से कांग्रेस इन दिनों कुछ दबाव में है। चौधरी भी उसी लॉबी से हैं।
असल में परिसीमन के बाद अजमेर संसदीय क्षेत्र जाट बहुल हो गया है। माना जाता है कि अब यहां दो लाख से ज्यादा जाट मतदाता हैं। परिसीमन से पूर्व जब यहां सवा से डेढ़ लाख जाट वोट थे, तब भी जाट यहां दावेदारी करते थे। विशेष रूप से भूतपूर्व केन्द्रीय मंत्री स्वर्गीय श्री रामनिवास मिर्धा का नाम चर्चा में आता था। कांग्रेस ने एक बार जाट नेता जगदीप धनखड़ को भी चुनाव मैदान में उतारा था, मगर वे रावतों की बहुलता व उनका मतदान प्रतिशत अधिक होने के अतिरिक्त अपनी कुछ गलतियों की वजह से हार गए। उल्लेखनीय है कि पूर्व सांसद प्रो. रासासिंह रावत के सामने बदल-बदल कर खेले गए जातीय कार्डों में सबसे बेहतर स्थिति धनखड़ की रही थी। रावत के सामने 1989 में सवा लाख गुर्जरों के दम उतरे बाबा गोविंद सिंह गुर्जर 1 लाख 8 हजार 89 वोटों से, सन् 1991 में डेढ़ लाख जाटों के दम पर उतरे जगदीप धनखड़ 25 हजार 343 वोटों से और सन् 1996 में एक लाख सिंधी मतदाताओं के मद्देनजर उतरे किशन मोटवानी 38 हजार 132 वोटों से पराजित हुए। सन् 1998 के मध्यावधि चुनाव में सोनिया गांधी लहर पर सवार हो कर सियासी शतरंज की नौसिखिया खिलाड़ी प्रभा ठाकुर ने रासासिंह को लगातार चौथी बार लोकसभा  में जाने रोक दिया था, हालांकि इस जीत का अंतर सिर्फ 5 हजार 772 मतों का रहा, लेकिन 1999 में आए बदलाव के साथ रासासिंह ने प्रभा ठाकुर को 87 हजार 674 मतों से पछाड़ कर बदला चुका दिया। इसके बाद 2004 में रासासिंह ने कांग्रेस के बाहरी प्रत्याशी हाजी हबीबुर्रहमान को 1 लाख 27 हजार 976 मतों के भारी अंतर से कुचल दिया। ये आंकड़े इशारा करते हैं कि तुलनात्मक रूप से जाट प्रत्याशी बेहतर रहा। अब जबकि परिसीमन के बाद जाटों की संख्या दो लाख को पार कर गई है, उनका दावा और मजबूत माना जाता है। इस सिलसिले में पिछले चुनाव में भी मांग उठी थी, मगर अपने प्रभाव के कारण करीब सवा लाख गुर्जर मतदाताओं के दम पर सचिन पायलट टिकट लेकर आ गए। इस बार लोकसभा चुनाव से एक साल पहले ही रामचंद्र चौधरी सचिन के खिलाफ झंडा बुलंद करने में लग गए हैं और स्थानीय की मांग पर अड़े हुए हैं। वैसे समझा जाता है कि उनकी रुचि लोकसभा चुनाव से अधिक विधानसभा चुनाव में है। पिछली बार वे मसूदा में निर्दलीय ब्रह्मदेव कुमावत की वजह से हार गए थे। इस बार फिर मसूदा से टिकट मांग रहे हैं। इसके लिए संसदीय क्षेत्र में जाटों की पर्याप्त तादाद को आधार बना कर दबाव डाल रहे हैं। कामत के सामने तो उन्होंने साफ तौर पर कहा कि अगर उन्हें टिकट नहीं दिया गया तो वे लोकसभा चुनाव में सचिन के खिलाफ मैदान में उतर जाएंगे। अर्थात सीधे तौर पर बार्गेनिंग पर उतर आए हैं।
यहां यह बताना भी प्रासंगिक होगा कि जाटों की बहुतलता के आधार पर भाजपा भी इस बार किसी जाट प्रत्याशी को मैदान में उतारने पर विचार कर रही है। भाजपा को यह समझ पिछले चुनाव में भी थी, मगर उसने भी बाहरी प्रत्याशी श्रीमती किरण माहेश्वरी का प्रयोग किया। पिछली बार तत्कालीन जलदाय मंत्री प्रो. सांवरलाल दावेदार के रूप में माने जाते थे। ऐसा लगता है कि उनकी रुचि लोकसभा चुनाव में नहीं है। इस बार कुछ जाट दावेदारों ने  टिकट के लिए मशक्कत शुरू कर दी है।
-तेजवानी गिरधर

सोमवार, 22 जुलाई 2013

सैयद आजम हुसैन : इतिहास के सहेजते-सहेजते वे स्वर्णिम इतिहास हो गए

अजमेर के राजकीय संग्रहालय के अधीक्षक सैयद आजम हुसैन का असमय निधन होने पर पूरा अजमेर सन्न रह गया। बेशक, उनसे पूर्व के अधीक्षकों ने भी संग्रहालय की भलीभांति देखभाल की, मगर सैयद आजम हुसैन ने जो कार्य किए, उनका विशेष उल्लेख अजमेर के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो गया है। उन्होंने अपने कार्यकाल में न केवल संग्रहालय में अनेकानेक आयोजन कर इसे लोकप्रिय किया, अपितु लाइट एंड साउंड शो जैसी बहुप्रतीक्षित योजना को भी मूर्त रूप प्रदान करने में अहम भूमिका निभाई। अजमेर के स्थापना दिवस पर आयोजन की शुरुआत भी उनके ही खाते में दर्ज की जाएगी। इसके अतिरिक्त तारागढ़ के जीर्णोद्धार में भी उन्होंने विशेष रुचि ली। चंद शब्दों में कहें तो उन्होंने अकबर के किले को नया जीवन प्रदान किया। ऐसे ऊर्जावान अधिकारी से अजमेर को और भी उम्मीदें थीं, मगर काल के क्रूर हाथों ने उन्हें हमसे छीन लिया। और अजमेर के प्रति विशेष दर्द को अपने दिल में लिए ही वे हमसे विदा हो गए।
उनकी सोच से परिचित करवाने के लिए यहां उनका वह आलेख प्रकाशित किया जा रहा है, जो कि अजमेर एट ए ग्लांस पुस्तक में प्रकाशित हो चुका है। लाइट एंड साउंड शो उनका एक सपना था, जो कि उन्होंने साकार किया, उसका भी इसमें जिक्र है:-
-सैयद आजम हुसैन-
अजमेर में नया बाजार के पास स्थित अकबर के किले में स्थापित राजपूताना म्यूजियम आज स्वस्थ मनोरंजन के साथ-साथ शिक्षा के केन्द्र के रूप में भी अपनी भूमिका निभा रहा है। बाहर से आने वाले जायरीन और पर्यटकों के अतिरिक्त इतिहास के शोधार्थी भी इसको देखने में विशेष रुचि रखते हैं। पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग का प्रयास है कि इस ऐतिहासिक स्थल को और अधिक आकर्षक बनाया जाए। संग्रहालय को देखने के लिए आने वाले दर्शक हमारी कला, संस्कृति, स्थापत्य, शिल्प तथा इतिहास को काल क्रमानुसार आत्मसात कर सकें, इसके लिए पुरा सामग्री को काल क्रमानुसार प्रदर्शित किया जा रहा है। प्रदर्शित की जाने वाली सामग्री के पेडस्टल, शोकेस, अलमीरा, परिचय-पट्ट आदि संग्रहालय विज्ञान के अनुसार तैयार किए जा रहे हैं।
चूंकि अकबर का किला अजमेर के इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाओं का साक्षी रहा है, अत: पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग का यह प्रयास है कि पर्यटकों को आकर्षित करने केलिए किले में शीघ्र ही लाइट एंड साउंड शो के माध्यम से अकबरी किले में घटित प्रमुख ऐतिहासिक घटनाओं को दिखाया जायेगा। न केवल पर्यटकों अपितु शहरवासियों के लिए भी यह शो आकर्षण का केन्द्र होगा। शो के माध्यम से दर्शक जान सकेंगे कि हल्दी घाटी युद्ध (1576 ई.) के समय सम्राट अकबर द्वारा मुगल सेना को मेवाड़ की ओर अजमेर से ही रवाना किया था। ब्रिटिश प्रतिनिधि सर टामस रो ने जनवरी, 1616 ईस्वी में मुगल सम्राट जहांगीर से इसी किले में भेंट की थी। शाहजहां के दो शहजादों का जन्म भी इसी किले में हुआ था। इस लिहाज से यह स्थल इतिहास के नजरिये से काफी महत्वपूर्ण है। सरकार की ओर से उपलब्ध कराई गई विशेष राशि से अकबरी किले में जीर्णोद्धार व मरम्मत के कार्य प्रगति पर हैं। इन कार्यों के तहत किले की बायीं बुर्ज के मरम्मत कार्य करवाये जा रहे हैं। इस बुर्ज में संग्रहालय को जीवन्त व आकर्षक बनाने हेतु प्रदर्शनी व सेमीनार आदि का आयोजन किया जायेगा।
ज्ञातव्य है कि राजकीय संग्रहालय, अजमेर की स्थापना अकबरी किले में सन् 1908 ई. में राजपूताना म्यूजियम के नाम से हुई। यहां पुरातात्विक वस्तुओं यथा शिलालेख, प्रतिमाएं, अस्त्र-शस्त्र, लघु रंग चित्र व अन्य सामग्री संग्रहित है, जिन्हें विभिन्न प्रमुख दीर्घाओं में प्रदर्शित किया गया है।
म्यूजियम में में सिन्धु घाटी सभ्यता को प्रदर्शित करने के लिए अलग से कक्ष बनाया हुआ है। सन् 1920 ई. में प्रकाश में आयी सिन्ध सभ्यता के अवशेषों के नमूने यथा मोहरंे, मृद-भांड, आभूषण, मृद प्रतिमाएं व खिलौने आदि इस कक्ष में प्रदर्शित हैं, जिन्हें देख कर दर्शक दांतों तले अंगुली दबाने को मजबूर हो जाता है।
यह सर्वविदित है कि शिलालेख इतिहास लेखन में महत्वपूर्ण व विश्वसनीय स्रोत हैं। यहां स्थापित शिलालेख कक्ष में ग्राम बरली, अजमेर से प्राप्त शिलालेख दूसरी शताब्दी ईस्वी पूव समय का है। इसी कक्ष में ढ़ाई दिन का झोंपड़ा से प्राप्त महत्वपूर्ण शिलालेख भी दिग्दर्शित हैं। इसी प्रकार म्यूजियत के प्रतिमा कक्ष में 8-9 शताब्दी ईस्वी से 16-17वीं शताब्दी ईस्वी काल की प्रतिमाएं प्रदर्शित हैं। यहां प्रदर्शित प्रतिमाएं शैव, वैष्णव व जैन प्रतिमा शिल्प की उत्कृष्ठ कृतियां हैं, जो साबित करती हैं कि शिल्प कला में प्राचीन काल से हम कितने संपन्न रहे हैं।
राजस्थान की धरा शूर वीरों की धरा रही है। म्यूजियम के अस्त्र-शस्त्र कक्ष में मध्य काल में प्रयुक्त होने वाले अस्त्र-शस्त्र यथा भाले, तलवार, ढाल, कटार, जिरह-बख्तर, बन्दूकें आदि दर्शकों के आकर्षण का प्रमुख केन्द्र हैं। रियासत काल में राजपूताना के राजा-महाराजाओं ने अन्य कलाओं के साथ-साथ चित्रकला को भी आश्रय प्रदान किया। राजाश्रय में बने चित्र तत्कालीन दरबारी व्यवस्था हमारी धार्मिक मान्यताओं तथा रीति रिवाजों का दर्पण है। यहां लघु रंग चित्र-कक्ष में प्रदर्शित मुल्ला दो प्याजा के कथानक पर आधारित लघु रंग चित्र मेवाड़ चित्र शैली के नायाब नमूने हैं।
सरकारी नौकरी की औपचारिता की सीमाओं से बाहर निकल कर अजमेर के लिए कुछ कर गुजरने की उनकी उत्कट इच्छा को सलाम। आने वाले अधीक्षकों के लिए वे सदैव प्रेरणा के स्रोत रहेंगे।
-तेजवानी गिरधर