मंगलवार, 24 दिसंबर 2013

किस के इशारे पर मेयर को तंग कर रहे हैं सीईओ?

प्रदेश में भाजपा की सरकार आते ही अजमेर नगम निगम के मेयर कमल बाकोलिया के प्रति सीईओ हरफूल सिंह यादव के तेवर तीखे हो गए हैं। एक चुने हुए जनप्रतिनिधि को उसकी औकात दिखाने की इससे बड़ी मिसाल क्या होगी कि एक अधिकारी अपने मातहतों को सख्त भाषा में यह आदेश जारी किए कि कोई भी अधिकारी या बाबू मेयर को सीधे कोई फाइल न भेजे। आदेश में कहा गया है कि जानकारी मिली है कि शाखा प्रभारी उनकी जानकारी में लाए बिना ही फाइलें सीधी मेयर के पास भेज देते हैं। पूर्व में वर्ष 13 जनवरी 2001 को तत्कालीन सीईओ ने भी इसी आशय के आदेश जारी किए थे, इसके बावजूद पालना नहीं करना अनुशासनहीनता की श्रेणी में आता है। इतन ही नहीं यादव ने विभिन्न शाखाओं से जो फाइलें मेयर को भिजवाई गई हैं, उनकी सूची भी उनको प्रस्तुत करने को कहा है।
ज्ञातव्य है कि मेयर और सीईओ के बीच काफी समय से टकराव चल रहा है। विशेष रूप से सफाई कर्मियों की भर्ती के दौरान मतभेद खुलकर सामने आए थे। कांग्रेस शासनकाल में यह मनमुटाव दबा रहा, मगर जैसे ही भाजपा की सरकार आई, यादव के तेवर ही बदल गए हैं। इसी से सवाल उठता है कि क्या वे मौके का फायदा उठा कर अपने अधिकारों का सख्ती से इस्तेमाल कर रहे हैं या फिर उनको किसी ने ऊपर से इशारा किया है कि मेयर को कब्जे में रखो।
जो कुछ भी हो, मेयर बाकोलिया का बाकी का कार्यकाल बहुत अच्छा नहीं निकलता दिखाई दे रहा है। कदाचित इसमें उनकी ढि़लाई का भी दोष है। इस सिलसिले में याद आता है कांग्रेस शासनकाल में भाजपा की जिला प्रमुख श्रीमती सुशील कंवर पलाड़ा का कार्यकाल, जिसमें जिला परिषद का सीईओ दुआ-सलाम करके ही रहता था। क्या मजाल कि वह ऊंची आवाज में बात करे अथवा इस प्रकार के आदेश जारी करे।

इसे पलाड़ा का दावा समझा जा सकता है

हाल ही आयोजित पंचायतीराज सशक्तिकरण सम्मेलन में जिस तरह का मंजर था और जैसी भाजपा के युवा नेता भंवर सिंह पलाड़ा की बॉडी लैंग्वेज थी, उसे पलाड़ा की ओर से आगामी लोकसभा चुनाव के लिए दावेदारी भी समझा जा सकता है।
असल में यह समारोह मूलत: निवर्तमान जिला प्रमुख व पलाड़ा की धर्मपत्नी श्रीमती सुशील कंवर पलाड़ा के शानदार कार्यकाल के बाद ऐतिहासिक विदाई की शक्ल लिए हुए था, मगर जिस प्रकार पलाड़ा ने कहा कि अभी तो लोकसभा का फाइनल बाकी है, उससे वहां मौजूद सारे नेता व कार्यकर्ता समझ गए कि भाजपा के लिए खाली पड़ी लोकसभा सीट के लिए दावेदारी का आगाज हो गया है। वैसे भी श्रीमती किरण माहेश्वरी के हार कर जाने के बाद यह मैदान खाली ही है। स्थानीय नेताओं में दम था नहीं, इस कारण उन्हें भेजा गया था। बात रही पूर्व सांसद व मौजूदा शहर भाजपा अध्यक्ष रासासिंह रावत की तो, अजमेर संसदीय क्षेत्र से मगरा-ब्यावर का रावत बहुल इलाका परिसीमन के साथ हटा दिए जाने के बाद उनका दावा पहले ही कमजोर हो गया। हालंकि दावा वे अब भी कर सकते हैं, मगर वे आकर्षक चेहरा नहीं रहे और उनका कार्यकाल उपलब्धियों से शून्य होने के कारण संभव है भाजपा उन पर दाव न खेले। बात अगर पलाड़ा करें तो इस बात में कोई दोराय नहीं कि उन्होंने अपनी पत्नी के माध्यम से पूरे जिले में जिस प्रकार विकास कार्य करवाए, उनसे उनकी खूब वाहवाही हुई। यहां तक कि राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित हो कर परफोरमेंस पर ठप्पा भी लगवा लिया।
सम्मेलन की सफलता इसमें मौजूद छह भाजपा विधायकों और प्रमुख नेताओं के साथ भारी भीड़ से आंकी जा सकती है। इसमें संसदीय क्षेत्र में शामिल दूदू के कार्यकर्ता भी थे।
जहां तक सम्मेलन के औचित्य का सवाल है, उसे दैनिक भास्कर के चीफ रिपोर्टर सुरेश कासलीवाल ने कुछ इस प्रकार व्यक्त किया है:-आने वाले हर व्यक्ति के मन में एक ही सवाल था, जिला प्रमुख सुशील कंवर पलाड़ा को मसूदा क्षेत्र से विधायक बने पंद्रह दिन हो गए हैं, ऐसे में अब पंचायतीराज सशक्तिकरण सम्मेलन आयोजित किए जाने का क्या औचित्य है? सम्मेलन में पंचायतीराज सशक्तिकरण के नाम पर कोई चर्चा भी नहीं हुई और न ही पंचायत राज के प्रतिनिधियों के अधिकार बढ़ाने या वेतन-भत्ते को लेकर ही कोई बात हो पाई। विधायकों ने इसे जिला प्रमुख की ऐतिहासिक विदाई का समारोह जरूर कहा।
यानि कि साफ है कि यह सम्मेलन श्रीमती पलाड़ा की विदाई के साथ ही स्वयं पलाड़ा की दावेदारी का आगाज करता नजर आया। रहा सवाल टिकट मिलने का तो टिकट कैसे लिया जाता है, इसका अंदाजा हाल ही मसूदा में पत्नी के लिए दमदारी से टिकट हासिल किए जाने से लगाया जा सकता है। इतना ही नहीं जिले में सर्वाधिक घमासान वाली सीट, जहां देहात जिला अध्यक्ष तक बागी हो कर खड़े हो गए, उसके बाद भी जिस प्रकार जीत हासिल की, उससे उन्होंने ये भी साबित कर दिया कि उनकी रणनीति कितनी कारगर है। यदि ये माना जाए कि केन्द्रीय कंपनी मामलात राज्य मंत्री सचिन पायलट ही अजमेर से चुनाव लडऩे वाले हैं तो उनसे मुकाबले के लिए जैसी साधन संपन्नता चाहिए, वह उनमें है ही। उनके दावे में एक बड़ी बाधा सिर्फ ये आ सकती है कि इस बार किसी जाट नेता का दावा कुछ ज्यादा मजबूत होगा, क्योंकि जाटों की तादात काफी है। यह बात दीगर है कि जाटों में सर्वाधिक दमदार नसीराबाद से जीते मौजूदा जलदाय मंत्री प्रो. सांवर लाल जाट ही हैं, जो कि इस चुनाव में कोई रुचि नहीं लेंगे। उनके जैसा जाना-पहचाना दूसरा जाट चेहरा फिलहाल नजर नहीं आता। जो कुछ भी हो, पलाड़ा ने एक तरह से अपना दावा तो ठोक ही दिया है।
-तेजवानी गिरधर

रविवार, 22 दिसंबर 2013

ब्यावर नगर परिषद सभापति ने चहेते पत्रकारों को बांटी रेवडिय़ां

अंधा बांटे रेवड़ी, फिर-फिर अपनों को देय। यह कहावत अजमेर जिले की ब्यावर नगर परिषद के सभापति डॉ. मुकेश मौर्य पर सटीक साबित होती है। अपने चहेतों को उपकृत करने के लिए सभापति हमेशा सुर्खियों में रहते हैं। कुछ समय पूर्व सफाई कर्मचारी भर्ती मामला और अवैध कॉम्पलैक्स निर्माण विवादों में रहा था। इस बार तो सभापति ने सारी हदें पार कर दीं। अपना उल्लू साधने के लिए पार्षदों को लड़ाने में माहिर सभापति ने अब पत्रकारों में फूट डाल दी।
कांग्रेस राज में जमकर कथित भ्रष्टाचार करने वाले ब्यावर नगर परिषद सभापति मुकेश मौर्य भाजपा राज आते ही सकते में आ गए हैं। सत्ता बदलते ही भाजपा पार्षदों ने भी भ्रष्टाचार की पोल खोलना शुरू कर दिया है। सभापति की शिकायतें स्वायत्त शासन विभाग और भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो में की गई। समाचार पत्रों में यह खबरें प्रकाशित होते ही सभापति की नींद उड़ गई। उन्हें भ्रष्टाचार का खेल एसीबी और मुख्यमंत्री तक पहुंचने का डर सताने लगा। इस मामले को दबाने और गोरखधंधों को छिपाने के लिए सभापति ने चुनिंदा पत्रकारों को भूखण्डों की लॉलीपोप थमा थी। प्रमुख समाचार पत्रों के प्रभारियों और परिषद की बीट देखने वाले संवाददाताओं को भूखंड आवंटित कर दिए। इतना ही नहीं सभापति ने अपने चहेतों को राजी करने के लिए उनसे जुड़े कम्प्यूटर ऑपरेटर और फोटोग्राफर्स के नाम भी भूखंड आवंटित कर दिए। हालांकि दिखावे के लिए भूखण्ड आवंटन की यह प्रक्रिया 20 दिसंबर को पत्रकारों के सामने अंजाम दी गई मगर इस प्रक्रिया में 52 आवेदकों में से सिर्फ 13 आवेदकों को ही लाभ दिया गया। शेष फाइलें मौके पर मौजूद तक नहीं थी। भूखंड से वंचित पत्रकारों द्वारा कारण पूछे जाने पर सभापति ने टालमटोल जवाब दिए। न तो उनकी फाइलें मौके पर मंगवाई गई और न हीं उन्हें बताया गया कि फाइलों में आखिर ऐसी क्या कमी रही, जिनकी वजह से उन्हें इस प्रक्रिया में शामिल नहीं किया गया। पत्रकारों के नाराजगी जाहिर करने पर सभापति कक्ष में भूखण्ड का लाभ पाने वाले पत्रकार भड़क गए और सभापति की हिमायत करने लगे। मॉर्निंग न्यूज के विष्णुदत्त धीमान, ईटीवी के सुमित सारस्वत, केशवधारा के संपादक संदीप बुरड़ ने सभी पत्रकारों की फाइलें मौके पर मंगवाने और फाइलों में कमियां बताने की बात कही। इस पर भूखण्ड का लाभ लेने वाले राजस्थान पत्रिका के भगवत दयाल सिंह और दैनिक नवज्योति के किशनलाल नटराज आगबबूला हो गए। पत्रिका के भगवत दयाल तो इतना भड़के कि संदीप बुरड़ से गाली-गलौच करते हुए मारपीट के लिए दौड़ पड़े। मौके पर मौजूद पत्रकारों और कर्मचारियों ने बीच बचाव किया। 'फूट डालो और राज करोÓ की नीति अपनाने वाले सभापति मुस्कुराते हुए यह सारा नजारा देख रहे थे। उनके चेहरे की कुटिल मुस्कान साफ बयान कर रही थी कि वे अपना उल्लू साधने में सफल रहे। सभापति ने पत्रकार विमल चौहान, राहुल पारीक, हेमंत कुमार साहू, कमल किशोर प्रजापति, संतोष कुमार त्रिपाठी, किशनलाल नटराज, मोमीन रहमान, राजेश कुमार शर्मा, पदम कुमार सोलंकी, कमल कुमार जलवानियां, तरुण दीप दाधीच, भगवत दयाल सिंह, महावीर प्रसाद को पत्रकार कॉलोनी में भूखण्ड आवंटित किए हैं। शेष आवेदकों को सभापति ने झांसा देकर टरका दिया।
सभापति कक्ष से बाहर आकर पत्रकार मनीष चौहान, दिलीप सिंह, बबलू अग्रवाल, संदीप बुरड़, सुमित सारस्वत, विष्णु धीमान, बृजेश शर्मा, विष्णु जलवानियां, यतीन पीपावत ने नाराजगी जाहिर की। पत्रकारों की यह नाराजगी भगवत दयाल को रास नहीं आई और उसने धमकी दे डाली कि 'देखता हूं अब तुम लोग प्लॉट कैसे लेते हो। तुममें दम हो तो सभापति से लेकर दिखाना।Ó उसके इस कथन से मिलीभगत साफ जाहिर होती है।
हमारे सूत्रों ने तो इतना तक बताया कि प्रक्रिया शुरू होने से पहले सूची कुछ और थी, जिसे बाद में बदल दिया गया। इस बीच किशनलाल को सभापति कक्ष में सभी पत्रकारों की फाइलें टटोलते हुए देखा गया। इस बात को लेकर वहां मौजूद कुछ पार्षद भी हैरत में पड़ गए थे कि आखिर सभापति के राज में यह सब क्या हो रहा है।
सभापति द्वारा अंजाम दी गई कि यह पूरी कार्यवाही अवैध थी। इसे पारदर्शी बनाने की बजाय गोपनीय रखा गया। सभापति ने नियमों को दरकिनार कर चहेतों को रेवडिय़ों की तरह भूखण्ड आवंटित कर दिए, ताकि उनके मुंह बंद रहें। यह प्रक्रिया पूरी तरह नियम विरूद्ध थी, जो कई सवाल खड़े करती है। नियमानुसार इस प्रक्रिया का चयन उस कमेटी द्वारा होना चाहिए था, जिसमें सूचना एवं जनसंपर्क अधिकारी एवं संपादकीय टीम से जुड़ा कोई वरिष्ठ पत्रकार सदस्य शामिल हो। जबकि सभापति द्वारा मनमर्जी से गठित की गई पांच सदस्यों की कमेटी में न तो पीआरओ प्रतिनिधि था और न ही कोई संपादकीय सदस्य। सभापति की अध्यक्षता में बनी कमेटी में आयुक्त ओमप्रकाश ढीढवाल, सहायक लेखाधिकारी घनश्याम तंवर, कार्यालय अधीक्षक दुर्गालाल जाग्रत, वरिष्ठ लिपिक भंवरनाथ रावल शामिल थे।
वंचित आवेदकों ने प्रक्रिया पर संदेह जताते हुए भ्रष्टाचार के आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि कुछ आवेदकों को योग्य नहीं होने के बावजूद भूखण्ड दे दिए गए हैं, जबकि योग्यता रखने वाले आवेदकों की अनदेखी की गई। सभापति ने कुछ समय पूर्व पत्रकारिता में कदम रखने वाले अनाडिय़ों को पत्रकार की श्रेणी में शामिल कर लिया, जबकि राज्य सरकार द्वारा अधिस्वीकृत पत्रकारों को दरकिनार कर दिया। सभापति ने जिन मोमीन रहमान को भूखण्ड आवंटित किया है, वे कुछ समय पूर्व नवज्योति में कम्प्यूटर ऑपरेटर के पद पर लगे थे। प्रेस फोटोग्राफर कमल किशोर प्रजापति उर्फ सुमन प्रजापति अशिक्षित हैं। महावीर प्रसाद दैनिक भास्कर के सक्र्युलेशन विभाग में कार्यरत हैं। सुबह उठकर अखबार बेचने वाले को भी सभापति ने न जाने क्यों प्रक्रिया में शामिल कर भूखण्ड का लाभ दे दिया। वर्षों से पत्रकारिता में जीवन झोंक रहे 80 वर्षीय अधिस्वीकृत पत्रकार भंवरलाल शर्मा को योजना का लाभ नहीं दिया गया।
आखिर क्या वजह रही कि चयन कमेटी में संपादकीय सदस्य और पीआरओ को शामिल नहीं किया गया? वर्षों से सिर्फ पत्रकारिता कर रहे पत्रकारों की अनदेखी क्यों की गई? आखिर ऐसी क्या सांठ-गांठ रही कि किशनलाल को सभापति कक्ष में पत्रकारों की फाइलें टटोलने की परमिशन दी गई? आखिर क्या वजह रही कि राजेश शर्मा, किशनलाल और भगवत दयाल पूरी प्रक्रिया के तहत अगुवाई करते हुए घर-घर जाकर फार्म भरवाते रहे और बाद में घालघुसेड़ कर खुद को भूखण्ड मिलने के बाद चुप्पी साध गए? सात दिवस की निर्धारित अवधि में आवेदन फार्म जमा करवाने के बाद परिषद ने नोटिस थमाकर आपत्तियां पूरी करने के लिए तीन दिवस का समय दिया था। निर्धारित अवधि में पत्रकारों ने कमियों की पूर्ति कर दस्तावेज जमा करवा दिए। इसके बाद फिर कौनसी कमियां रह गई जिनकी वजह से लॉटरी के वक्त फाइलों को मौके पर नहीं मंगवाया गया? आखिर लॉटरी प्रक्रिया के दौरान वंचित आवेदकों को पूछने पर भी फार्म की कमियां क्यों नहीं बताई गई? नियमानुसार सभी फाइलें चैक होने के बाद चयनित फाइलों के आवेदकों की लॉटरी निकालनी थी, जबकि सभापति ने प्लॉट की लॉटरी निकाली। 27 में से 13 प्लॉट आवंटित करने के बाद अब 14 प्लॉट शेष बचे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि शेष 14 प्लॉट बचे हुए 39 आवेदकों को कैसे दिए जाएंगे?
इन सभी सवालों को दरकिनार कर सभापति ने अपने शेष कार्यकाल को राजी-खुशी निकालने के लिए पत्रकारों को मैनेज किया है। वैसे राजनीति में लेन-देन की परंपरा तो वर्षों से चली आ रही है, मगर काले कारनामों को छुपाने के लिए भूखण्ड देकर मुंह बंद करने का यह तरीका नया है जो जनप्रतिनिधियों के साथ शहर में चर्चा का विषय बन गया है। अब देखना है कि संवेदनशील और पारदर्शी सरकार के शासन में लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहलाने वाले इन पत्रकारों के साथ क्या न्याय होगा।

शनिवार, 21 दिसंबर 2013

जीत के लिए कांग्रेस को पाटना होगा 1 लाख 91 हजार 943 मतों का अंतर

अजमेर संसदीय क्षेत्र की सभी आठ विधानसभा सीटों पर भाजपा का कब्जा
अजमेर। पिछले लोकसभा चुनाव में जहां कांग्रेस के सचिन पायलट ने भाजपा की श्रीमती किरण माहेश्वरी को 76 हजार 135 मतों के भारी अंतर से पराजित किया था, वहीं अगर ताजा विधानसभा चुनाव परिणाम के आंकड़ों के हिसाब से देखें तो भाजपा ने न केवल यह अंतर पाट दिया है, अपितु 1 लाख 91 हजार 943 मतों की बढ़त भी हासिल कर ली है। अजमेर संसदीय क्षेत्र के आठों विधानसभा क्षेत्रों में कांग्रेस व भाजपा को मिले मतों का यह मोटा मोटा अंतर पाटना कांग्रेस प्रत्याशी के लिए एक मुश्किल टास्क होगा। यदि कांग्रेस व भाजपा के बागियों को मिले वोटों को दोनों दलों के वोटों में जोड़ दिया जाए तो भी भाजपा की बढ़त 1 लाख 60 हजार 916 मतों की रहेगी। पूरे संसदीय क्षेत्र में कांग्रेस के बागियों को 85 हजार 66 मत मिले, जबकि भाजपा के बागियों ने 54 हजार 39 वोट हासिल किए थे।
यूं हर निर्दलीय ने किसी न किसी को नुकसान पहुंचाया होगा, मगर प्रमुख निर्दलियों या बागियों पर नजर डालें तो अजमेर उत्तर, अजमेर दक्षिण व पुष्कर में सीधी टक्कर ही थी। केकड़ी में कांग्रेस के बागी व एनसीपी के प्रत्याशी पूर्व विधायक बाबूलाल सिंगारियां ने 17 हजार 35 मत झटक लिए। यहां कांग्रेस के डॉ. रघु शर्मा 8 हजार 867 वोटों से हारे। अर्थात यही एक मात्र ऐसी सीट रही, जहां कांग्रेस विरोधी लहर का असर नहीं पड़ा। सिंगारियां नहीं होते तो कांग्रेस के डॉ. रघु शर्मा आसानी से जीत जाते।  किशनगढ़ में एनसीपी के उज्जीर खां ने कांग्रेस को 1763 वोटों का झटका दिया। इसी प्रकार बीएसपी के हिम्मत सिंह ने 2775, निर्दलीय रामसिंह चौधरी ने 2283 व निर्दलीय हुक्म सिंह हरमाड़ा ने 1465 मत लिए और दोनों दलों को नुकसान पहुंचाया। नसीराबाद में निर्दलीय संगीता व बसपा के अशोक खाबिया ने भाजपा को 1131 व 1515 वोटों का झटका दिया। कांग्रेस को निर्दलीय सुवा लाल गुंजल व सलामुद्दीन से क्रमश: 2972 व 1769 वोट का झटका दिया। मसूदा में कांग्रेस के बागी निर्दलीय रामचंद्र चौधरी व वाजिद चीता ने 28 हजार 447 व 20690 वोट का झटका दिया। भाजपा को तीन बागियों देहात जिला अध्यक्ष नवीन शर्मा ने 22 हजार 186, भंवर लाल बूला ने 8433 व शांति लाल गुर्जर ने 10622  वोटों का नुकसान पहुंचाया। यहां बसपा के गोविन्द ने 2098,  भारतीय युवा शक्ति के कमलेश ने 1066, निर्दलीय ओमप्रकाश ने 1078, मांगीलाल जांगिड़ ने 1838 और शान्ति लाल ने 10622 वोट हासिल कर दोनों को नुकसान पहुंचाया।
ज्ञातव्य है कि अजमेर संसदीय क्षेत्र में शामिल अजमेर जिले की सात सीटों किशनगढ़, पुष्कर, अजमेर उत्तर, अजमेर दक्षिण, मसूदा, नसीराबाद, मसूदा एवं केकड़ी और जयपुर जिले की दूदू विधानसभा सीट पर भाजपा ने कब्जा कर लिया है। उनमें विभिन्न प्रत्याशियों को मिले मतों का विवरण इस प्रकार है:-
किशनगढ़
किशनगढ़ विधानसभा क्षेत्र में भाजपा के भागीरथ चौधरी विजयी रहे। उन्होनें इंडियन नेशनल कांग्रेस के नाथूराम सिनोदिया  को 31 हजार 74 मतों से हराया।  श्री चौधरी को 95 हजार 384 मत मिले जबकि श्री नाथूराम सिनोदिया को 64 हजार 310 मत मिले। एनसीपी के उज्जीर खां को 1763, बीएसपी के हिम्मत सिंह को 2775, एनपीपी के गोपाल माहेश्वरी को 364, निर्दलीय प्रहलाद सिंह को 325, निर्दलीय बंसत कुमार राठी को 328, निर्दलीय रामसिंह चौधरी को 2283, निर्दलीय सत्यनारायण चौसला को 859, निर्दलीय हुक्म सिंह हरमाड़ा  को 1465 मत मिले। यहां विधानसभा के कुल विधि मान्य मत एक लाख 69 हजार 856 रहे।  जबकि 101 मत निरस्त किए गए। नोटा के विकल्प के लिये 2540 मत पड़े।
पुष्कर
पुष्कर विधानसभा क्षेत्र में भाजपा के सुरेश सिंह रावत विजयी रहे।  उन्होनें इंडियन नेशनल कांग्रेस की नसीम अख्तर इंसाफ को 41 हजार 290 मतों से हराया।  सुरेश सिंह को 90 हजार 13 मत मिले जबकि नसीम अख्तर इंसाफ को 48 हजार 723 मत मिले । बसपा के  दिलीप को 1770, भारतीय युवा शक्ति पार्टी के गोपाल महाराज को 2334, नेशनल पीपुल्स पार्टी के नारायण सिंह को 897, अखिल भारतीय आमजन पार्टी के लतीफ अली को 1287, निर्दलीय पे्रम सिंह राठौड को 2501 मत मिलें। यहां विधानसभा के कुल विधि मान्य मत एक लाख 47 हजार 525 रहे।  जबकि 77 मत निरस्त किए गए। नोटा के विकल्प के लिये 2943 मत पड़े।
अजमेर उत्तर
अजमेर उत्तर विधानसभा क्षेत्र में भाजपा के श्री वासुदेव देवनानी विजयी रहे। इन्होनें इंडियन नेशनल कांग्रेस के डॉ. श्रीगोपाल बाहेती को 20 हजार 479 मतों से हराया।  देवनानी को 68 हजार 461 मत मिले जबकि डॉ. बाहेती को 47 हजार 982 मत मिले । निर्दलीय कैलाश चन्द्र शर्मा को 666, निर्दलीय नारायण दास सिंधी को 225, निर्दलीय पुखराज को 207, निर्दलीय मिठ्ठू सिंह रावत को 296, निर्दलीय मुन्ना मारवाडी को 240, निर्दलीय सोहन लाल को 984 मत मिले। यहां विधानसभा के कुल विधि मान्य मत एक लाख 19 हजार 61 रहे।  जबकि 148 मत निरस्त किए गए। नोटा के विकल्प के लिये 2357 मत पड़े।
अजमेर दक्षिण
अजमेर दक्षिण विधानसभा क्षेत्र में भाजपा की अनिता भदेल विजयी रही।  इन्होनें इंडियन नेशनल कांग्रेस के हेमन्त भाटी को 23 हजार 158 मतों से हराया।  अनिता भदेल को 70 हजार 509 मत मिलें जबकि हेमन्त भाटी को 47 हजार 351 मत मिले। बसपा के गणपत लाल को 990, नेशनल पीपुल्स पार्टी के सुरेश को 793, निर्दलीय ओमप्रकाश को 540, निर्दलीय सोहनलाल को 569 मत मिले। यहां विधानसभा के कुल विधि मान्य मत एक लाख 20 हजार 752 रहे।  जबकि 103 मत निरस्त किए गए। नोटा के विकल्प के लिये 2342 मत पड़े।
नसीराबाद
नसीराबाद विधानसभा क्षेत्र से भाजपा के सांवर लाल विजयी रहे।  उन्होनें इंडियन नेशनल कांग्रेस के महेन्द्र सिंह गुर्जर को 28 हजार 900 मतों से हराया।  सांवर लाल को 84 हजार 953 मत मिले जबकि महेन्द्र सिंह गुर्जर को 56 हजार 53 मत मिले । निर्दलीय प्रभू को 1305, बसपा के  अशोक को 1515, निर्दलीय भागू सिंह रावत को 248, निर्दलीय राजेश कुमार को 244, निर्दलीय सलामुद्दीन को 1213, निर्दलीय सालम को 1769, निर्दलीय सुवालाल गुंजल को 2972, निर्दलीय संगीता को 1131 मत मिलें। यहां विधानसभा के कुल विधि मान्य मत एक लाख 51 हजार 403 रहे।  जबकि 131 मत निरस्त किए गए। नोटा के विकल्प के लिये 1946 मत पड़े।
मसूदा
मसूदा विधानसभा क्षेत्र  में भाजपा की सुशील कंवर पलाड़ा विजयी रही। पलाडा ने इंडियन नेशनल कांग्रेस के ब्रहमदेव कुमावत को 4475 मतों से पराजित किया।  सुशील कंवर पलाडा को 34 हजार 11  मत मिले जबकि ब्रहमदेव कुमावत को 29 हजार 536 मत मिले। यहा बसपा के गोविन्द को 2098,  भारतीय युवा शक्ति के कमलेश को 1066,  जागो पार्टी के नारायण लाल जोशी को 646,  राष्ट्रीय लोकदल के हीरा सिंह चौधरी को 435, निर्दलीय ओमप्रकाश को 1078, निर्दलीय नवीन शर्मा को 22 हजार 186,  निर्दलीय पुष्कर नारायण त्रिपाठी को 791, निर्दलीय भंवर सिंह को 3390, निर्दलीय भंवर लाल बूला को 8433,  निर्दलीय मांगीलाल जांगिड को 1838, निर्दलीय रामचन्द्र को 28447,  निर्दलीय वाजिद को 20690,  निर्दलीय शान्ति लाल को 10622  मत मिले। यहां विधानसभा के कुल विधि मान्य मत एक लाख 65 हजार 267 रहे।  जबकि 113 मत निरस्त किए गए। नोटा के विकल्प के लिये 2676 मत पड़े।
केकड़ी
केकड़ी विधानसभा क्षेत्र में भाजपा के शत्रुघ्न गौतम विजयी रहे। इन्होनें इंडियन नेशनल कांग्रेस के डांॅ रघु शर्मा को 8 हजार 867 मतो से हराया।  शत्रुघ्न गौतम को 71292 मत मिले जबकि डांॅ रघु शर्मा को 62 हजार 425 मत मिले। एनसीपी के बाबूलाल सिंगारिया को 17 हजार 35, बसपा के सोराम को 1043, लोकदल के कमलेश कुमार माली को 311, बहुजन संघर्ष दल के चन्द्रप्रकाश लोहार को 584, भारतीय युवा शक्ति पार्टी के रामप्रसाद को 466, सपा के बालूराम जाट को 287, एनपीपी के सूरजकरण को 918, निर्दलीय गीता देवी को 1267 एवं महेश कुमार पोपटानी को 1480 मत मिले। यहां विधानसभा के कुल विधि मान्य मत एक लाख 57 हजार 108 रहे।  जबकि 85 मत निरस्त किए गए। नोटा के विकल्प के लिये 2598 मत पड़े।
जयपुर जिले के दूदू विधानसभा क्षेत्र में भाजपा ने कांग्रेस को 33 हजार 720 मतों से पराजित किया। भाजपा के प्रेमचंद को 86 हजार 238 जबकि कांग्रेस के हजारी लाल नागर को 52 हजार 519 वोट प्राप्त हुए।
ज्ञातव्य है कि कांग्रेस ने पंद्रहवीं लोकसभा चुनाव के लिए हुए चुनाव में कांग्रेस के दिग्गज प्रत्याशी सचिन पायलट ने भाजपा की महिला मोर्चा अध्यक्ष श्रीमती किरण माहेश्वरी को 76 हजार 135 मतों के बड़े अंतर से हरा दिया था। कुल 14 लाख 52 हजार 490 मतदाताओं वाले इस संसदीय क्षेत्र में पड़े 7 लाख 70 हजार 875 मतों में सचिन को 4 लाख 5 हजार 575 और किरण को 3 लाख 29 हजार 440 मत मिले। पिछले छह चुनावों में यहां कुल पांच बार भाजपा के प्रो. रासासिंह रावत जीते थे और यह भाजपा का गढ़ सा बन गया था, जबकि एक बार कांग्रेस की प्रभा ठाकुर ने उन्हें 5772 मतों से हरा कर इसे ध्वस्त किया था। कुल 7 लाख 71 हजार 160 वैध मतों में से बसपा के रोहितास को 9 हजार 180, जागो पार्टी के इन्द्रचन्द पालीवाला को 7 हजार 984 तथा निर्दलीय उम्मीदवार ऊषा किरण वर्मा को 4 हजार 670, नफीसुद्दीन मियां को 3 हजार 134, मुकेश जैन को 2 हजार 601 तथा शांति लाल ढाबरिया को 8 हजार 576 मत मिले। कुल 171 मत अवैध हुए, 34 टेण्डर मत गिरे और कुल मतदान 7 लाख 71 हजार 502 मतों का हुआ । पोस्टल बैलट पेपर 454 में 178 किरण माहेश्वरी को, 104 सचिन पायलट को व एक मत रोहितास को मिला। कुल 171 पोस्टल बैलट पेपर अवैध हुए।
यहां यह बताना भी प्रासंगिक रहेगा कि पिछले विधानसभा चुनाव में पांच क्षेत्रों पुष्कर, किशनगढ़, नसीराबाद, केकड़ी व दूदू पर कांग्रेस का कब्जा था और मसूदा क्षेत्र में जीते निर्दलीय विधायक ने कांग्रेस को समर्थन दे रखा था, जबकि भाजपा के पास केवल दो सीटें अजमेर उत्तर व अजमेर दक्षिण थीं। पूरे संसदीय क्षेत्र में कांग्रेस को 3 लाख 72 हजार 332 वोट मिले थे, जबकि भाजपा को 3 लाख 54 हजार 536 वोट मिले। इस प्रकार कांग्रेस की बढ़त 17 हजार 796 बनी हुई थी। इस बढ़त को 76 हजार 135 तक बढ़ा कर कांग्रेस के सचिन पायलट ने जीत दर्ज की थी।
-गिरधर तेजवानी

शुक्रवार, 20 दिसंबर 2013

पहले दौर में रह ही गए देवनानी व अनिता भदेल

मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने मंत्रीमंडल गठन के पहले दौर में अजमेर जिले से सर्वाधिक अपेक्षित नसीराबाद विधायक प्रो. सांवरलाल जाट को तो स्थान दिया, मगर अजमेर उत्तर विधायक प्रो. वासुदेव देवनानी या अजमेर दक्षिण विधायक श्रीमती अनिता भदेल में से किसी एक को मंत्री बनाए जाने के कयासों पर विराम लगा दिया। दोनों के ही समर्थक अपने-अपने तर्क दे कर अपने नेता को मंत्रीमंडल में शामिल किए जाने के दावे कर रहे थे।
ज्ञातव्य है कि दोनों ही लगातार तीसरी बार जीते हैं। देवनानी एक बार राज्य मंत्री रह चुके हैं, इस कारण इस बार उन्हें केबीनेट नहीं तो कम से कम राज्य मंत्री बनाए जाने की संभावना थी। उनके नाम में इस कारण भी दम था कि वे संघ लॉबी के प्रमुख नेताओं में शुमार हैं। ज्ञातव्य है कि वसुंधरा राजे की इस्तीफा राजनीति के दौरान उन्होंने संघ के इशारे पर हस्ताक्षर नहीं किए थे। दिक्कत है तो ये कि इस बार एक साथ तीन सिंधी विधायक बने हैं। निम्बाहेड़ा से श्रीचंद कृपलानी व राजगढ़ से ज्ञानदेव आहूजा जीते हैं। आहूजा दूसरी बार विधायक बने हैं, जबकि कृपलानी भी वरिष्ठ हैं व वसुंधरा के करीबी माने जाते हैं। इस कारण चर्चा ये भी थी कि वे सिंधी कोटे में कृपलानी को प्राथमिकता दे सकती हैं। मगर साथ ही संघ लॉबी के दबाव में देवनानी का नाम पक्का माना जा रहा था। दूसरी ओर श्रीमती भदेल अनुसूचित जाति की महिला विधायक होने के साथ-साथ लगातार तीसरी बार जीतने के कारण मेरिट पर मानी जा रही थीं, मगर उनके साथ दिक्कत ये रही कि उनकी दमदार पैरवी करने वाले मात्र प्रदेश उपाध्यक्ष औंकार सिंह लखावत हैं। जहां तक इस्तीफा राजनीति का सवाल है, अफवाह यही है कि भदेल ने इस्तीफे पर साइन किए थे, मगर इसकी आज तक पुष्टि नहीं हो पाई।
अब चर्चा ये है कि चूंकि फिलहाल किसी सिंधी को शामिल नहीं किया गया है, इस कारण देवनानी की संभावना बरकरार है, जबकि श्रीमती भदेल इस कारण सब्र रख सकती हैं कि अभी एक भी महिला को मंत्री बनने का मौका नहीं मिला है। वैसे इतना पक्का है कि इन दोनों में से ही मंत्री बनेगा, चूंकि दोनों एक ही शहर से हैं। जहां तक पहले दौर में चांस न मिलने का सवाल है, तो माना जाता है कि चूंकि सर्वाधिक चार मंत्री अजमेर संभाग से हैं और उनको पहले मौका दिया जाना जरूरी था, इस कारण देवनानी व भदेल का नंबर नहीं आ पाया। उल्लेखनीय है कि प्रो. सांवरलाल जाट, यूनुस खान, कैलाश मेघवाल व अजय सिंह किलक अजमेर संभाग से हैं। कुल मिला कर देवनानी व भदेल के समर्थकों को कुछ दिन और इंतजार करना होगा।