गुरुवार, 23 जनवरी 2014

जब डॉ. गोखरू का कुछ नहीं हुआ तो डॉ. मीणा का क्या होगा?

संभाग के सबसे बड़े अस्पताल जवाहर लाल नेहरू चिकित्सालय में एक बार फिर भर्ती मरीजों से बाजार से दवा मंगाने का मामला सामने आया है। जेएलएन मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. अशोक चौधरी ने निरीक्षण के दौरान पाया कि डॉक्टर सी.के. मीणा की यूनिट में भर्ती मरीजों को वार्ड से दवा देने के बजाय बाजार से मंगवाई जा रही है। चौधरी ने मामले को गंभीर मानते हुए जांच के आदेश दिए और कहा कि मरीजों की शिकायत के कारण उजागर हुए इस प्रकरण में डॉ. मीणा से स्पष्टीकरण मांगा जाएगा। जाहिर सी बात है कि निर्धारित प्रक्रिया के तहत की मामले की जांच होगी, जिसका नतीजा क्या होगा, इसका अंदाजा इसी बात से लगता है कि इससे पहले भी अस्पताल के कार्डियोलॉजी विभाग में हुए इसी प्रकार के गोरखधंधे में जांच के बाद क्या कार्यवाही हुई, यह आज तक पता नहीं लग पाया है। इसमें रेखांकित करने वाली बात ये है कि उस गोरखधंधे को तो राजस्थान मेडिकल सर्विसेज कार्पोरेशन के एमडी डॉ. समित शर्मा ने ही पकड़ा था, जिनको निशुल्क दवा योजना लागू करने का श्रेय दिया जाता है।
असल में सरकारी जांच प्रक्रिया इतनी जटिल और लंबी है कि अमूमन घोटालों व गोरखधंधों की जांच टांय टांय फिस्स हो जाती है और समय बीतने के साथ लोग भी उसे भूल जाते हैं। यहां आप को बता दें कि कार्डियोलॉजी विभाग में हुए दवाओं के गोरखधंधे के मामले में विभाग के प्रमुख डॉ. आर. के. गोखरू पर लगे आरोप तकनीकी पेच में ही उलझ गए थे। उसकी वजह ये समझी गई कि निशुल्क दवा योजना के लिए जो नियम बने हुए हैं, उसमें और इस योजना का संचालन व निगरानी करने वाले राजस्थान मेडिकल सर्विसेज कार्पोरेशन को दिए गए अधिकारों में कुछ अस्पष्टता है, जिसे कभी स्पष्ट नहीं किया गया।
हालांकि डॉ. गोखरू प्रकरण में गठित हाईपावर कमेटी ने जांच कर रिपोर्ट राजस्थान मेडिकल सर्विसेज कार्पोरेशन के एमडी डॉ. समित शर्मा को भेज दी, जिस पर कार्यवाही का आज तक पता नहीं लग पाया, मगर इस मामले में डॉ. गोखरू क जो रवैया रहा, उससे ही लग गया था कि जरूर कहीं न कहीं उनके बचने का ग्राउंड मौजूद था। तभी तो उन्होंने जेएलएन मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य एवं नियंत्रक डॉ. पी. के. सारस्वत की ओर से दिए गए कारण बताओ नोटिस का जवाब देना जरूरी नहीं समझा। वस्तुत: उन्होंने यह पेच फंसाया था कि उनके खिलाफ जिस मामले में जांच की जा रही है, उसमें एक सामान्य फिजीशियन सही निर्णय नहीं कर सकता। इसके लिए हृदयरोग का विशेषज्ञ होना जरूरी है। अर्थात उन्हें इस बात का अंदाजा है कि यदि कमेटी में हृदयरोग विशेषज्ञ होंगे तो वे डॉ. गोखरू की ओर से सुझाए गए इंजेक्शन की अहमियत को स्वीकार करेंगे। इससे यह भी आभास हुआ कि डॉ. गोखरू के पास अपनी ओर से सुझाये हुए इंजैक्शन को ही लगाने के दमदार तकनीकी आधार थे, जिसके बारे में कार्पोरेशन के पास स्पष्ट नीति-निर्देश नहीं थे। उनका यह तर्क भी बेहद तकनीकी और दमदार था कि सरकार की ओर से निर्धारित इंजैक्शन की सक्सैस रेट कम है और देर से असर करता है, जबकि वे जो इंजैक्शन लिखते हैं, वही कारगर है। अर्थात वे यह कहना चाहते हैं कि एक विशेषज्ञ ही यह बेहतर निर्णय कर सकता है कि मरीज की जान बचाने के लिए तुरत-फुरत में कौन सा इंजैक्शन लगाया जाना चाहिए। वर्तमान प्रकरण में भी इस प्रकार का तर्क दिया जा सकता है कि जो दवाई बाजार से लाने को कही गई, वही कारगर है, सरकारी दवाई नहीं। अब इसका निर्धारण तो वरिष्ठ चिकित्सक ही कर सकते हैं। उसमें भी मतभिन्नता हो सकती है।
कुल मिला कर अब यह देखना होगा कि डॉ. मीणा क्या स्पष्टीकरण देते हैं और उनके खिलाफ क्या कार्यवाही होती है? होती भी है या नहीं?
-तेजवानी गिरधर

बुधवार, 15 जनवरी 2014

सांप सूंघ गया सचिन पायलट विरोधियों को

अजमेर के सांसद व केन्द्रीय कंपनी मामलात राज्य मंत्री सचिन पायलट के जो विरोधी यह सोच कर मूछों को ताव दे रहे थे कि अब जब लोकसभा चुनाव आएंगे तो वे उन्हें निपटाएंगे, अब सचिन के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बन जाने के बाद चुप हो गए हैं। उन्हें सांप सूंघ गया है। वे यह सोच कर बैठे थे कि जैसे ही सचिन टिकट लाएंगे, वे अपनी औकात दिखाएंगे। यानि कि चुनाव जीतना है तो सचिन को उन्हें राजी करना ही होगा। हालांकि यह स्पष्ट होना अभी बाकी है कि सचिन चुनाव भी लड़ेंगे या नहीं, मगर अब जब कि सचिन को पूरे प्रदेश की कमान सौंप दी गई है, जो भी टकराव भरा रुख अपनाएगा, उसका पत्ता साफ हो जाएगा। जो भी पार्टी या सचिन विरोधी रुख रखेगा, उसे बाहर का रास्ता दिखाने का फैसला करने में सचिन को देर नहीं लगेगी। हालांकि पार्टी नेताओं को एकजुट रखने की जिम्मेदारी सचिन की ही है, इस कारण बनती कोशिश वे अपने हाथ से बेहतर ही करने की कोशिश करेंगे, मगर जो भी एक सीमा से ज्यादा नखरे दिखाएगा, उसका इलाज करने के लिए सचिन को किसी से पूछने की जरूरत नहीं होगी।
आपको ख्याल होगा कि पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के दम पर अजमेर उत्तर से कांग्रेस का टिकट लाए पूर्व विधायक डॉ. श्रीगोपाल बाहेती सचिन के धुर विरोधी हैं, मगर चूंकि प्रदेश अध्यक्ष बनवाने में गहलोत का सहयोग रहा है, इस कारण उन्हें रुख बदलना होगा। इसे यूं भी कहा जा सकता है कि उन्हें गहलोत के कहने से एडजस्ट भी किया जा सकता है। बात अगर पूर्व उप मंत्री ललित भाटी की करें तो वे तो हार के लिए सचिन को जिम्मेदार बता कर खुले में खिलाफत कर चुके हैं। उन्हें फिर से सुर बदलने के रास्ते तलाशने होंगे या फिर पार्टी हित में सचिन को भाटी को राजी करने की युक्ति ढ़ंढऩी होगी। इसी प्रकार पुराने कांग्रेसी ललित भटनागर व दिनेश शर्मा को भी सुलह का रास्ता अख्तियार करना होगा, जो कि खुलेआम सचिन का विरोध कर चुके हैं। विधानसभा चुनाव में टिकट वितरण के दौरान सचिन से नाराज हो चुके अन्य नेताओं को भी अपने रवैये में परिवर्तन लाना होगा।
सर्वाधिक दिलचस्प होगा अजमेर डेयरी अध्यक्ष रामचंद्र चौधरी का रुख। हालांकि सचिन के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद उनकी कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन यह सब जानते हैं कि वे कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी तक के सामने सचिन का विरोध कर चुके हैं। उन्होंने तो यहां तक चुनौती दे दी थी कि अगर उन्हें विधानसभा चुनाव का टिकट नहीं दिया गया तो वे लोकसभा चुनाव में सचिन के खिलाफ चुनाव लड़ेंगे। विधानसभा चुनाव तो वे बागी बन कर लड़े ही। यह जानते हुए भी अजमेर लोकसभा सीट पर पहला दावा सचिन का ही है, वे हाल ही अजमेर डेयरी के एक जलसे के दौरान कह चुके हैं कि वे लोकसभा चुनाव लड़ेंगे। अब देखना ये होगा कि नए हालात में उनको राजी करने के लिए उनकी जाट लॉबी के आका क्या प्रयास करते हैं। नगर सुधार न्यास के पूर्व सदर नरेन शहाणी भगत की सचिन से नाइत्तफाकी भी जग जाहिर है, उन्हें भी पार्टी में रहने के लिए रुख बदलना होगा। हां, पूर्व विधायक डॉ. राजकुमार जयपाल जरूर विधानसभा चुनाव से पहले सुलह कर चुके थे और चुनाव में उन्होंने काम भी किया, इस कारण उन्हें दिक्कत नहीं आएगी। कुल मिला कर यदि सचिन चुनाव लड़ते हैं तो उन्हें अपने विरोधियों को सैट करने में पहले जितनी दिक्कत नहीं आएगी।

मंगलवार, 14 जनवरी 2014

टंडन के रुख को लेकर आशंकित थे कांग्रेसी

विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की बुरी तरह से हार के पश्चात कुछ दिन की चुप्पी के बाद जैसे ही वरिष्ठ कांग्रेसी नेता एडवोकेट राजेश टंडन ने निष्ठावान कांग्रेसियों का जलसा आहूत किया तो हर कांग्रेसी के दिमाग में यही बात थी कि वे न जाने क्या नया शगूफा छोडऩे वाले हैं। जाहिर सी बात है कि जब मूल संगठन शहर कांग्रेस कमेटी मौजूद है तो कांग्रेस के भविष्य पर विचार करने के लिए व्यक्तिगत प्रयासों से आहूत नए मंच की जरूरत क्या है? इस प्रकार की हरकत से शहर कांग्रेस की भूमिका पर भी सवाल उठते थे कि वह क्या नकारा हो गई है? कहने की जरूरत नहीं है कि मुख्य धारा से अलग हट कर चल रहे कांग्रेसियों ने पहले से आम कांग्रेसजन के नाम से एक समानांतर सा संगठन बना रखा है, तो एक और मंच का नाम आने पर चौंकना स्वाभाविक ही है। कांग्रेसी अभी यह सोच ही रहे थे कि जलसे में जाएं या नहीं, अचानक अजमेर के सांसद व केन्द्रीय कंपनी मामलात राज्य मंत्री सचिन पायलट प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष घोषित हो गए। अब तो कांग्रेसियों के लिए और दिक्कत हो गई। पता नहीं टंडन साहब के जलसे में क्या हो और उन्हें सचिन विरोधी खेमे में न गिन लिया जाए, सो कई कांग्रेसी किनारा कर गए। एक सोच ये भी थी कि टंडन साहब ने यह नई दुकान क्यों सजाई है? जितने मुंह उतनी बातें। कुछ कह रहे थे कि इस बहाने वे अपनी ताकत दिखा कर शहर कांग्रेस अध्यक्ष पद की दावेदारी करना चाहते हैं तो कुछ की सोच थी कि प्रदेश कांग्रेस कार्यकारिणी में एडजस्ट होना चाहते हैं। बहरहाल फिर भी व्यक्तिगत संबंधों के नाते कांग्रेसी गए, मगर डर डर कर। उन्होंने वहां जा कर तब राहत की सांस ली, जब खुद टंडन ने ही कहा कि कांग्रेस के नव नियुक्त प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट के नेतृत्व में पूरी ताकत और शक्ति के साथ लोकसभा का चुनाव लड़ा जाएगा। पायलट का गुणगान करते हुए उन्होंने कहा कि ऊर्जावान युवक को प्रदेश की कमान सौंपने के कारण लोकसभा चुनाव के परिणाम भी कांग्रेस के पक्ष में रहेंगे। कुल मिला कर टंडन साहब के इस जलसे को लेकर जो आशंकाएं थीं वे निर्मूल रहीं। अब कांग्रेसी इस बात पर भेजापक्की कर रहे हैं कि कहीं टंडन साहब की सोच कुछ और तो नहीं थी, जो कि पायलट के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद बदल गई।

शनिवार, 11 जनवरी 2014

देवनानी या कृपलानी को लोकसभा चुनाव लड़ाने की चर्चा

श्रीचंद कृपलानी
इन दिनों राजनीतिक हलकों में ऐसी चर्चा है कि अजमेर उत्तर के भाजपा विधायक प्रो. वासुदेव देवनानी या निम्बाहेड़ा के भाजपा विधायक श्रीचंद कृपलानी को लोकसभा चुनाव लड़ाने पर पार्टी हाईकमान विचार कर रहा है। इसकी प्रमुख वजह ये बताई जा रही है कि सिंधी कोटे में ये दोनों ही मंत्री बनने की कतार में हैं। दोनों की दावेदारी मजबूत है, मगर दोनों को मंत्री बनाया नहीं जा सकता। पिछली बार सिंधी विधायक के रूप में अकेले देवनानी जीते थे, इस कारण उन्हें मंत्री बनाने में दिक्कत नहीं आई। इस बार देवनानी के अतिरिक्त कृपालानी व ज्ञानदेव आहूजा भी जीत कर आ गए। इसी कारण समस्या उत्पन्न हुई है। ऐसे में देवनानी व कृपालानी में से किसी एक को मंत्री बना कर दूसरे को लोकसभा में भेजना की बेहतर विकल्प होगा।
वासुदेव देवनानी
जहां तक कृपलानी का सवाल है, बताते हैं कि वे मंत्री बनने को ही प्राथमिकता दे रहे हैं, यह कह कर कि चित्तौड़ में उनके अनुकूल स्थितियां नहीं हैं। उनकी तो निम्बाहेड़ा में भी स्थिति खराब थी, वो तो कांग्रेस विरोधी लहर चली, वरना हार भी सकते थे। इधर स्वाभाविक रूप से देवनानी की प्राथमिकता भी मंत्री बनने की है, वे पहले भी मंत्री रह चुके हैं, मगर संघ को लगता है कि उन्हें अजमेर से आसानी से जितवा कर लोकसभा में भेजा जा सकता है। वजह ये बताई जा रही है कि उनको संसदीय क्षेत्र के सवा लाख सिंधी वोट तो मिलेंगे ही, भाजपा मानसिकता के वोट भी हासिल होंगे। यदि वोटों की बहुलता को देखते हुए किसी जाट को टिकट दिया जाता है तो भाजपा मानसिकता के राजपूत वोट छिटक सकते हैं, मगर देवनानी के साथ यह दिक्कत नहीं है। सिंधियों की इन मार्शल जातियों से कोई टसल नहीं है। रहा सवाल वैश्य समुदाय के विरोध का, क्योंकि उसका जिले में एक भी विधायक नहीं है, तो उसे एडीए का चेयरमैन बना कर संतुष्ट किया जा सकता है।

भाजपा के सामने अजमेर से जीत चुके कांग्रेस के आचार्य भगवान देव का उदाहरण है। इसी प्रकार कांग्रेस प्रत्याशी किशन मोटवानी भी प्रो. रासासिंह रावत से मात्र पैंतीस हजार से ही हारे थे। तब सिंधियों ने मोटवानी का साथ नहीं दिया था। उस वक्त चला काको आडवानी मामो मोटवानी का नारा लोगों को आज भी याद है। कुल मिला कर भाजपा को तो कम से सिंधी प्रत्याशी को उतारने में कोई दिक्कत नहीं है। बताते हैं देवनानी विरोधी लॉबी के जबरदस्त विरोध के बाद भी वे न केवल टिकट लेकर आए, बीस हजार वोटों से जीत भी गए, इससे उस लॉबी के पेट में भारी मरोड़ है। वह भी यह चाहती है कि किसी प्रकार देवनानी से मुक्ति मिल जाए ताकि वे मंत्री न बन पाएं। अब देखना ये है कि भाजपा के अंदर पक रही खिचड़ी पक पाती है या नहीं।

गुरुवार, 9 जनवरी 2014

सारस्वत व पहाडिय़ा का टिकट गया खड्डे में

आगामी लोकसभा चुनाव के लिए प्रदेश अध्यक्ष व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे की ओर से की जा रही कवायद के तहत जिस तरह अजमेर के दो नेताओं को पार्टी का काम सौंपा गया है, उससे तो उनका अजमेर संसदीय क्षेत्र के टिकट का दावा तो गया खड्डे में। ज्ञातव्य है कि पूर्व जिला प्रमुख पुखराज पहाडिय़ा व अजमेर जिले के भाजपा सदस्यता प्रभारी रहे प्रो. बी. पी. सारस्वत को क्रमश: टोंक-सवाईमाधोपुर व नागौर का लोकसभा प्रभारी बनाया गया है। इसके साथ ही स्पष्ट किया गया है कि ये प्रभारी खुद चुनाव नहीं लड़ेंगे। लोकसभा क्षेत्र में सारा समन्वय, सम्मेलन, बूथ मैनेजमेंट सिस्टम आदि का सारा काम लोकसभा प्रभारी के जिम्मे रहेगा। ताजा जानकारी तो ये तक है कि सारस्वत को देहात जिला भाजपा अध्यक्ष का जिम्मा सौंपा गया है।
उल्लेखनीय है कि पहाडिय़ा व सारस्वत इस बार टिकट केलिए पुरजोर ताकत लगाने का मानस बना चुके थे। वैश्य समाज के कोटे में पहाडिय़ा तो पिछली बार भी दावेदार थे, मगर श्रीमती किरण माहेश्वरी को टिकट मिल गया, जबकि सारस्वत इस बार टिकट मांगने का पक्का मानस बना चुके हैं, हालांकि उन्होंने अब तक मांगने से परहेज रखा था। उन्हें किसी विश्व विद्यालय के कुलपति की ऑफर भी है। बहरहाल, यदि इन नियुक्तियों में कोई परिवर्तन नहीं होता तो दोनों का टिकट तो गया खड्डे में।