हालांकि इस बात पर सहज विश्वास नहीं होता, मगर ये सच है कि वरिष्ठ पत्रकार व सुनहरा राजस्थान के संपादक अनिल लोढ़ा का नाम भी अजमेर संसदीय क्षेत्र के लिए भाजपा प्रत्याशी के रूप में चर्चा में आया था। बताया जाता है कि काफी माथापच्ची के बाद भी जब भाजपा हाईकमान को सचिन पायलट के सामने प्रत्याशी को तय करने में दिक्कत आ रही थी तो मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे की ओर से उनका नाम वैकल्पिक रूप में प्रस्तावित किया गया। यह बात अलग है कि उस पर गंभीरता से चर्चा हुई या नहीं हुई, मगर राजनीति के जानकारों को इसकी जानकारी हो गई थी। आपको यहां बता दें कि लोढ़ा को वसुंधरा का करीबी माना जाता है। कहा तो यहां तक जाता है कि विधानसभा में जब भी अभिभाषण अथवा कोई विशेष वक्तव्य देने की बात आती है तो वे लोढ़ा से चर्चा जरूर करती हैं। माना ये भी जाता है कि पत्रकारिता के आरंभ से लोढ़ा में राजनीतिक महत्वाकांक्षा रही है। पिछले कुछ चुनावों में भी उनके नाम की चर्चा होती रही है।
शुक्रवार, 21 मार्च 2014
प्रो. जाट से बेहतर स्थानीय प्रत्याशी था भी नहीं भाजपा के पास
भाजपा ने अजमेर संसदीय क्षेत्र में प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष व स्थानीय सांसद और केन्द्रीय कंपनी मामलात राज्य मंत्री सचिन पायलट के सामने राज्य सरकार में जलदाय मंत्री प्रो. सांवरलाल जाट को उतार कर सटीक दाव चला है। प्रो. जाट से बेहतर स्थानीय प्रत्याशी उसके पास था भी नहीं। जाट ने आखिरी दौर में किस आधार और शर्त पर चुनाव लडऩे को स्वीकार किया है, इसका तो पता नहीं, मगर अब कम से कम ये तो नहीं कहा जाएगा कि भाजपा ने सचिन के आगे थाली परोस दी है। हालांकि जब दावेदारों के लिए पार्टी ने पदाधिकारियों से वोटिंग करवाई थी, तब जाट का नाम कहीं नहीं था, अलबत्ता उनके पुत्र रामस्वरूप लांबा का नाम जरूर सामने आया। इससे यह स्पष्ट हो गया था कि मंत्री पद का सुख भोग रहे जाट ने लोकसभा चुनाव में फालतू माथा लगाना उचित नहीं समझा और अपने बेटे को आगे कर दिया।
ज्ञातव्य है कि इस बार किशनगढ़ विधायक भागीरथ चौधरी, पुष्कर विधायक सुरेश सिंह रावत, शहर भाजपा अध्यक्ष रासा सिंह रावत, देहात भाजपा अध्यक्ष भगवती प्रसाद सारस्वत, पूर्व जिला प्रमुख व मौजूदा मसूदा विधायक श्रीमती सुशील कंवर पलाड़ा के पति भंवर सिंह पलाड़ा, पूर्व जिला प्रमुख पुखराज पहाडिय़ा व श्रीमती सरिता गैना, सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी सी.आर. चौधरी, पूर्व विधायक किशन गोपाल कोगटा, पूर्व मेयर धर्मेंद्र गहलोत, नगर परिषद के पूर्व सभापति सुरेंद्र सिंह शेखावत, नगर सुधार न्यास के पूर्व अध्यक्ष धर्मेश जैन, पूर्व शहर भाजपा अध्यक्ष शिवशंकर हेड़ा, जिला प्रचार मंत्री कंवल प्रकाश किशनानी, डॉ. कमला गोखरू, डॉ. दीपक भाकर, सतीश बंसल, ओमप्रकाश भडाणा, गजवीर सिंह चूड़ावत, सरोज कुमारी (दूदू), नगर निगम के उप महापौर अजीत सिंह राठौड़ व डीटीओ वीरेंद्र सिंह राठौड़ की पत्नी रीतू चौहान के नाम दावेदारी में उभरे थे। चूंकि इनमें प्रो. सारस्वत ने सबसे ज्यादा वोट हासिल किए, इस कारण उनका नाम आखिर तक चलता रहा। उनके अतिरिक्त राजस्थान लोक सेवा आयोग के पूर्व अध्यक्ष सी. आर. चौधरी का नाम भी उभरा, मगर उन्हें नागौर से उतार दिया गया। शहर भाजपा अध्यक्ष प्रो. रासासिंह रावत, अजमेर उत्तर के विधायक प्रो. वासुदेव देवनानी व पूर्व मेयर धर्मेन्द्र गहलोत का नाम भी आखिर तक चलता रहा। इतना ही नहीं, भाजपा के शीर्ष नेता पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी की भी चर्चा हुई, मगर वह कोरी अफवाह ही साबित हुई। जब कांग्रेस ने सचिन का नाम घोषित कर दिया तो हर किसी की नजर इसी बात पर थी कि अब भाजपा क्या करती है। माना यही जा रहा था कि सचिन के मुकाबले भाजपा किसी स्थानीय दावेदार को शायद ही उतारे। बाहरी नेताओं में मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे की पुत्रवधु श्रीमती निहारिका का नाम चर्चा में रहा। कुल मिला कर आखिर तक असमंजस बना रहा। मगर जैसे ही प्रो. जाट का नाम आया, हर एक भाजपाई की जुबान पर यही बात सुनाई दी कि अब होगा कांटे का मुकाबला।
यहां आपको बता दें कि पूर्ववर्ती भाजपा सरकार में भी जल संसाधन मंत्री रहे प्रो. सांवरलाल जाट का नाम पिछली बार भी सचिन के सामने दमदार प्रत्याशी के रूप में था, मगर न जाने उनकी खुद की अनिच्छा के चलते या फिर उन्हें कमजोर मानते हुए पार्टी ने भाजपा महिला मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीमती किरण माहेश्ववरी को उदयपुर से ला कर भिड़ा दिया। उसका यह प्रयोग फेल हो गया। वजहें तो अनेक थीं, मगर एक प्रमुख वजह ये मानी गई कि श्रीमती माहेश्वरी के साथ जातीय समीकरण नहीं था। चूंकि परिसीमन के बाद अजमेर संसदीय क्षेत्र में जाटों के मतों की संख्या दो लाख से ज्यादा हो गई थी, इस कारण भाजपा के लिए कोई जाट नेता ही कारगर होता, मगर यह बात पार्टी को इस बार समझ में आई है। वह भी काफी माथापच्ची के बाद, वरना प्रो. जाट तो पहले से उपलब्ध थे।
खैर, भाजपा ने हर दृष्टि से, यथा जातीय समीकरण, साधन संपन्नता और कद आदि के लिहाज से उपयुक्त प्रत्याशी मैदान में उतारा है। अब देखना ये है कि ये मुकाबला कैसा रहता है? बारीक विश्लेषण बाद में करेंगे।
-तेजवानी गिरधर
ज्ञातव्य है कि इस बार किशनगढ़ विधायक भागीरथ चौधरी, पुष्कर विधायक सुरेश सिंह रावत, शहर भाजपा अध्यक्ष रासा सिंह रावत, देहात भाजपा अध्यक्ष भगवती प्रसाद सारस्वत, पूर्व जिला प्रमुख व मौजूदा मसूदा विधायक श्रीमती सुशील कंवर पलाड़ा के पति भंवर सिंह पलाड़ा, पूर्व जिला प्रमुख पुखराज पहाडिय़ा व श्रीमती सरिता गैना, सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी सी.आर. चौधरी, पूर्व विधायक किशन गोपाल कोगटा, पूर्व मेयर धर्मेंद्र गहलोत, नगर परिषद के पूर्व सभापति सुरेंद्र सिंह शेखावत, नगर सुधार न्यास के पूर्व अध्यक्ष धर्मेश जैन, पूर्व शहर भाजपा अध्यक्ष शिवशंकर हेड़ा, जिला प्रचार मंत्री कंवल प्रकाश किशनानी, डॉ. कमला गोखरू, डॉ. दीपक भाकर, सतीश बंसल, ओमप्रकाश भडाणा, गजवीर सिंह चूड़ावत, सरोज कुमारी (दूदू), नगर निगम के उप महापौर अजीत सिंह राठौड़ व डीटीओ वीरेंद्र सिंह राठौड़ की पत्नी रीतू चौहान के नाम दावेदारी में उभरे थे। चूंकि इनमें प्रो. सारस्वत ने सबसे ज्यादा वोट हासिल किए, इस कारण उनका नाम आखिर तक चलता रहा। उनके अतिरिक्त राजस्थान लोक सेवा आयोग के पूर्व अध्यक्ष सी. आर. चौधरी का नाम भी उभरा, मगर उन्हें नागौर से उतार दिया गया। शहर भाजपा अध्यक्ष प्रो. रासासिंह रावत, अजमेर उत्तर के विधायक प्रो. वासुदेव देवनानी व पूर्व मेयर धर्मेन्द्र गहलोत का नाम भी आखिर तक चलता रहा। इतना ही नहीं, भाजपा के शीर्ष नेता पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी की भी चर्चा हुई, मगर वह कोरी अफवाह ही साबित हुई। जब कांग्रेस ने सचिन का नाम घोषित कर दिया तो हर किसी की नजर इसी बात पर थी कि अब भाजपा क्या करती है। माना यही जा रहा था कि सचिन के मुकाबले भाजपा किसी स्थानीय दावेदार को शायद ही उतारे। बाहरी नेताओं में मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे की पुत्रवधु श्रीमती निहारिका का नाम चर्चा में रहा। कुल मिला कर आखिर तक असमंजस बना रहा। मगर जैसे ही प्रो. जाट का नाम आया, हर एक भाजपाई की जुबान पर यही बात सुनाई दी कि अब होगा कांटे का मुकाबला।
यहां आपको बता दें कि पूर्ववर्ती भाजपा सरकार में भी जल संसाधन मंत्री रहे प्रो. सांवरलाल जाट का नाम पिछली बार भी सचिन के सामने दमदार प्रत्याशी के रूप में था, मगर न जाने उनकी खुद की अनिच्छा के चलते या फिर उन्हें कमजोर मानते हुए पार्टी ने भाजपा महिला मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीमती किरण माहेश्ववरी को उदयपुर से ला कर भिड़ा दिया। उसका यह प्रयोग फेल हो गया। वजहें तो अनेक थीं, मगर एक प्रमुख वजह ये मानी गई कि श्रीमती माहेश्वरी के साथ जातीय समीकरण नहीं था। चूंकि परिसीमन के बाद अजमेर संसदीय क्षेत्र में जाटों के मतों की संख्या दो लाख से ज्यादा हो गई थी, इस कारण भाजपा के लिए कोई जाट नेता ही कारगर होता, मगर यह बात पार्टी को इस बार समझ में आई है। वह भी काफी माथापच्ची के बाद, वरना प्रो. जाट तो पहले से उपलब्ध थे।
खैर, भाजपा ने हर दृष्टि से, यथा जातीय समीकरण, साधन संपन्नता और कद आदि के लिहाज से उपयुक्त प्रत्याशी मैदान में उतारा है। अब देखना ये है कि ये मुकाबला कैसा रहता है? बारीक विश्लेषण बाद में करेंगे।
-तेजवानी गिरधर
आम आदमी पार्टी की नजर प्रिंस सलीम पर भी
अजमेर लोकसभा क्षेत्र में आम आदमी पार्टी अपना उम्मीदवार उतारना तो चाहती है, मगर उसे फिलहाल कोई जंच ही नहीं रहा। हालांकि टिकट के लिए आठ दावेदारों ने साक्षात्कार दिए हैं, मगर अब तक उचित प्रत्याशी नहीं मिलने के कारण तलाश जारी है। सच तो ये है कि ढंग का प्रत्याशी नहीं मिलने के कारण किसी को भी मैदान में उतारने की स्थिति नहीं है, मगर चूंकि पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष राज्य की सभी पच्चीस सीटों पर चुनाव लड़ाने की घोषणा कर चुके हैं, इस कारण मशक्कत अब भी जारी है। इस बीच पता लगा है कि एनजीओ चलाने वाले प्रिंस सलीम पर भी विचार चल रहा है। उनका नाम पार्टी हाईकमान के पास प्रस्तावित हो चुका है। एक-दो दिन में स्थिति स्पष्ट हो जाएगी।
असल में शुरू में अन्ना आंदोलन का नेतृत्व कर चुकी और बाद में पार्टी में अजमेर प्रभारी बनीं श्रीमती कीर्ति पाठक को ही प्रबल दावेदार माना जा रहा था, मगर कथित रूप से उनके व्यवहार के कारण एक धड़ा अलग हो गया और वह उन्हें प्रभारी पद से भी हटवाने में भी कामयाब हो गया। हांलाकि बावजूद इसके उन्होंने अपना दावा ठोक दिया।
उधर कीर्ति विरोधी धड़े का समर्थन हासिल काफी ऊर्जावान कवि और पार्टी की राष्ट्रीय परिषद और प्रदेश कार्यकारिणी के सदस्य शहनाज हिंदुस्तानी का नाम तो बताते हैं कि काफी दिन पहले तय सा माना जा रहा था, मगर उनकी भी कारसेवा हो गई। परिणाम स्वरूप फेसबुक पर छीछालेदर भी हुई।
हिंदुस्तानी ने लिखा कि सभी कार्यकर्ताओं से मेरा अनुरोध है जो भी प्रत्याशी आम आदमी पार्टी की ओर से अजमेर की धरती को मिले उसे निर्विरोध स्वीकार कर दिल से प्रचार में जुट जाएं और असामाजिक, स्वार्थी एवं महत्वाकांक्षी लोगों से सावधान रहें । किसी भी तरह की गुंडागर्दी या भू माफियाओं से डरने की जरूरत नहीं है । बस ये ध्यान रहे कि उनके लोग आप की टोपी पहन कर कोई गलत काम न कर पाएं, क्यूं कि कुछ ऐसे लोग हमारी आप अजमेर की टीम में शामिल हो गए हैं, जो हमारी हर खबर लीक कर पार्टी को बदनाम करने की तैयारी में है, भ्रष्टाचार पे दे झाड़ू, दे झाड़ू-दे झाड़ू, आम आदमी जिंदाबाद, - आप का शहनाज हिन्दुस्तानी.......जय हिन्द। जो भी व्यक्ति अगर किसी को ये बोल रहा है कि मैं टिकट दिलवा दूंगी या दूंगा, वो किसी भी तरह से पार्टी का कार्यकर्ता नहीं है। सभी उससे दूरी बनाए रखें । आजकल बहुत से फ्रॉड लोग इसी चक्कर में पैसे कमाने में लगे हैं । अपने आप को पार्टी का विशेष पदाधिकारी बताता है और पैसे ऐंठता है। ऐसी गन्दगी अजमेर ही नहीं अपितु कहीं भी दिख सकती है। जरूरी नहीं जिसके हाथ में झाड़ू है, वो गंदगी साफ करने आया हो, वो गंदगी फैला भी सकता है। सावधान ! जय हिन्द !
इस के बाद टिकट की ही एक दावेदार श्रीमती किरण माहेश्वरी ने लिखा कि आज मैने ये देखा की हमारी पार्टी में चमचों की तादाद ज्यादा हो गयी है, जहां जहां इन चमचों की संख्या है, वहा पार्टी का वजूद खत्म हो रहा है। हमने अजमेर में सबको जोडऩे की कोशिश जारी की है, पर कुछ लोग एक-एक करके पार्टी के पुराने लोगो को पार्टी से तोड़ते जा रहे हैं, पर हम ऐसा होने नहीं देंगे। क्या पार्टी अजमेर में उमीदवार उतारेगी या नहीं? आज अजमेर में आम आदमी पार्टी का आदर्श नगर का ऑफिस भी बंद करवा दिया, क्योंकि में सब पुराने और नये पार्टी कार्यकर्ताओं को बुला कर जो चुनावी रणनीति बनाना चाहा, पर पार्टी के कुछ लोगों ने पार्टी ऑफिस के ताला लगवा दिया और कहा की कोई मीटिंग नहीं होगी। ऐसे लोगों के कारण केजरीवाल जी को इतनी परेशानी हो रही है। अरविन्द तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं। जयहिन्द।
ज्ञातव्य है कि श्रीमती शेखावत अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन की महिला इकाई की राजस्थान प्रदेश अध्यक्ष, राजपूत एकता मंच व महिला मोर्चा में पुष्कर विधानसभा क्षेत्र की अध्यक्ष और सामाजिक परिवर्तन फाउंडेशन की राजस्थान प्रदेश अध्यक्ष हैं। वे पत्रकारिता से भी जुड़ी हुई हैं और वे भारतीय राष्ट्रीय पत्रकार संघ की अजमेर जिला संयोजक व सर्च स्टोरी ब्यूरो की ब्यूरो प्रमुख हैं।
पार्टी की नजर अजमेर की पूर्व जिला कलेक्टर श्रीमती अदिति मेहता पर भी थी, मगर यह कॉलम लिखते समय तक उन्होंने आनाकानी कर रखी है। इसी प्रकार एक दावेदार अजय सोमानी हैं, उनकी भी शिकायतें ऊपर पहुंच चुकी हैं।
अब देखना ये है कि पार्टी किसे चुनाव मैदान में उतारती है?
तेजवानी गिरधर
असल में शुरू में अन्ना आंदोलन का नेतृत्व कर चुकी और बाद में पार्टी में अजमेर प्रभारी बनीं श्रीमती कीर्ति पाठक को ही प्रबल दावेदार माना जा रहा था, मगर कथित रूप से उनके व्यवहार के कारण एक धड़ा अलग हो गया और वह उन्हें प्रभारी पद से भी हटवाने में भी कामयाब हो गया। हांलाकि बावजूद इसके उन्होंने अपना दावा ठोक दिया।
उधर कीर्ति विरोधी धड़े का समर्थन हासिल काफी ऊर्जावान कवि और पार्टी की राष्ट्रीय परिषद और प्रदेश कार्यकारिणी के सदस्य शहनाज हिंदुस्तानी का नाम तो बताते हैं कि काफी दिन पहले तय सा माना जा रहा था, मगर उनकी भी कारसेवा हो गई। परिणाम स्वरूप फेसबुक पर छीछालेदर भी हुई।
हिंदुस्तानी ने लिखा कि सभी कार्यकर्ताओं से मेरा अनुरोध है जो भी प्रत्याशी आम आदमी पार्टी की ओर से अजमेर की धरती को मिले उसे निर्विरोध स्वीकार कर दिल से प्रचार में जुट जाएं और असामाजिक, स्वार्थी एवं महत्वाकांक्षी लोगों से सावधान रहें । किसी भी तरह की गुंडागर्दी या भू माफियाओं से डरने की जरूरत नहीं है । बस ये ध्यान रहे कि उनके लोग आप की टोपी पहन कर कोई गलत काम न कर पाएं, क्यूं कि कुछ ऐसे लोग हमारी आप अजमेर की टीम में शामिल हो गए हैं, जो हमारी हर खबर लीक कर पार्टी को बदनाम करने की तैयारी में है, भ्रष्टाचार पे दे झाड़ू, दे झाड़ू-दे झाड़ू, आम आदमी जिंदाबाद, - आप का शहनाज हिन्दुस्तानी.......जय हिन्द। जो भी व्यक्ति अगर किसी को ये बोल रहा है कि मैं टिकट दिलवा दूंगी या दूंगा, वो किसी भी तरह से पार्टी का कार्यकर्ता नहीं है। सभी उससे दूरी बनाए रखें । आजकल बहुत से फ्रॉड लोग इसी चक्कर में पैसे कमाने में लगे हैं । अपने आप को पार्टी का विशेष पदाधिकारी बताता है और पैसे ऐंठता है। ऐसी गन्दगी अजमेर ही नहीं अपितु कहीं भी दिख सकती है। जरूरी नहीं जिसके हाथ में झाड़ू है, वो गंदगी साफ करने आया हो, वो गंदगी फैला भी सकता है। सावधान ! जय हिन्द !
इस के बाद टिकट की ही एक दावेदार श्रीमती किरण माहेश्वरी ने लिखा कि आज मैने ये देखा की हमारी पार्टी में चमचों की तादाद ज्यादा हो गयी है, जहां जहां इन चमचों की संख्या है, वहा पार्टी का वजूद खत्म हो रहा है। हमने अजमेर में सबको जोडऩे की कोशिश जारी की है, पर कुछ लोग एक-एक करके पार्टी के पुराने लोगो को पार्टी से तोड़ते जा रहे हैं, पर हम ऐसा होने नहीं देंगे। क्या पार्टी अजमेर में उमीदवार उतारेगी या नहीं? आज अजमेर में आम आदमी पार्टी का आदर्श नगर का ऑफिस भी बंद करवा दिया, क्योंकि में सब पुराने और नये पार्टी कार्यकर्ताओं को बुला कर जो चुनावी रणनीति बनाना चाहा, पर पार्टी के कुछ लोगों ने पार्टी ऑफिस के ताला लगवा दिया और कहा की कोई मीटिंग नहीं होगी। ऐसे लोगों के कारण केजरीवाल जी को इतनी परेशानी हो रही है। अरविन्द तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं। जयहिन्द।
ज्ञातव्य है कि श्रीमती शेखावत अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन की महिला इकाई की राजस्थान प्रदेश अध्यक्ष, राजपूत एकता मंच व महिला मोर्चा में पुष्कर विधानसभा क्षेत्र की अध्यक्ष और सामाजिक परिवर्तन फाउंडेशन की राजस्थान प्रदेश अध्यक्ष हैं। वे पत्रकारिता से भी जुड़ी हुई हैं और वे भारतीय राष्ट्रीय पत्रकार संघ की अजमेर जिला संयोजक व सर्च स्टोरी ब्यूरो की ब्यूरो प्रमुख हैं।
पार्टी की नजर अजमेर की पूर्व जिला कलेक्टर श्रीमती अदिति मेहता पर भी थी, मगर यह कॉलम लिखते समय तक उन्होंने आनाकानी कर रखी है। इसी प्रकार एक दावेदार अजय सोमानी हैं, उनकी भी शिकायतें ऊपर पहुंच चुकी हैं।
अब देखना ये है कि पार्टी किसे चुनाव मैदान में उतारती है?
तेजवानी गिरधर
गुरुवार, 20 मार्च 2014
दो बार ध्वस्त हो चुका है अजमेर में भाजपा का गढ़
एक बार डॉ. श्रीमती प्रभा ठाकुर ने प्रो. रासासिंह रावत को 5772 मतों से और दूसरी बार सचिन ने किरण को 76 हजार 135 वोटों से हराया
-तेजवानी गिरधर- अजमेर संसदीय क्षेत्र को पूर्व सांसद व वर्तमान शहर भाजपा अध्यक्ष प्रो. रासासिंह रावत ने रावत वोटों के दम पर भाजपा का गढ़ बना रखा था। वे यहां से पांच बार जीते। इस गढ़ को एक बार कांग्रेस की डॉ. प्रभा ठाकुर ने 5 हजार 772 मतों ध्वस्त किया तो दूसरी बार 2009 में अजमेर के मौजूदा सांसद व केन्द्रीय कंपनी मामलात राज्य मंत्री व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट ने भाजपा महिला मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीमती किरण माहेश्वरी को 76 हजार 135 वोटों से हराया।
इतिहास के आइने में देखें तो राजस्थान में शामिल होने से पहले अजमेर एक अलग राज्य था। सन् 1952 में हुए प्रथम लोकसभा चुनाव में अजमेर राज्य में दो संसदीय क्षेत्र थे-अजमेर उत्तर व अजमेर दक्षिण। राजस्थान में विलय के बाद 1957 में यहां सिर्फ एक संसदीय क्षेत्र हो गया। सन् 1952 से 1977 तक इस इलाके में कांग्रेस का ही बोलबाला रहा। अत्यल्प जातीय आधार के बावजूद यहां से मुकुट बिहारी लाल भार्गव तीन बार, विश्वेश्वर नाथ भार्गव दो बार जीते, लेकिन इसके बाद कांग्रेस के खिलाफ चली देशव्यापी आंधी ने इस गढ़ को ढ़हा दिया और जनता पार्टी के श्रीकरण शारदा ने बदलाव का परचम फहरा दिया। सन् 1980 में जैसे ही देश की राजनीति ने फिर करवट ली तो कांग्रेस के आचार्य भगवानदेव ने कब्जा कर लिया। भगवान देव ने जनता पार्टी के श्रीकरण शारदा को 53 हजार 379 मतों से पराजित किया था। देव को 1 लाख 68 हजार 985 और शारदा को 1 लाख 25 हजार 606 मत मिले थे। सन् 1984 में पेराटूपर की तरह उतने विष्णु मोदी ने भी कांग्रेस की प्रतिष्ठा को बनाए रखा। मोदी ने भाजपा के कैलाश मेघवाल को 56 हजार 694 वोटों से पराजित किया था। मोदी को 2 लाख 16 हजार 173 और मेघवाल को 1 लाख 59 हजार 479 मत मिले थे।
लेकिन 1989 में कांग्रेस के देशव्यापी बिखराव के साथ डेढ़ लाख रावत वोटों को आधार बना कर रासासिंह को उतारा तो यहां का मिजाज ही बदल गया। उसके बाद के छह लोकसभा चुनावों में, 1998 को छोड़ कर, पांच में रासासिंह रावत ने विजय पताका फहराई। कांग्रेस ने भी बदल-बदल कर जातीय कार्ड खेले मगर वे कामयाब नहीं हो पाए। रावत के सामने सन् 1989 में सवा लाख गुर्जरों के दम उतरे बाबा गोविंद सिंह गुर्जर 1 लाख 8 हजार 89 वोटों से हारे। धनखड़ को 1 लाख 86 हजार 333 व रावत को 2 लाख 11 हजार 676 वोट मिले थे। सन् 1991 में रावत ने डेढ़ लाख जाटों के दम पर उतरे जगदीप धनखड़ 25 हजार 343 वोटों से हराया। और सन् 1996 में एक लाख सिंधी मतदाताओं के मद्देनजर उतरे किशन मोटवानी 38 हजार 132 वोटों से पराजित हो गए। सन् 1998 के मध्यावधि चुनाव में सोनिया गांधी के राजनीति में सक्रिय होने के साथ चली हल्की लहर पर सवार हो कर सियासी शतरंज की नौसिखिया खिलाड़ी प्रभा ठाकुर ने रासासिंह को लगातार चौथी बार लोकसभा में जाने रोक दिया था। हालांकि इस जीत का अंतर सिर्फ 5 हजार 772 मतों का रहा, लेकिन 1999 में आए बदलाव के साथ रासासिंह ने प्रभा ठाकुर को 87 हजार 674 मतों से पछाड़ कर बदला चुका दिया। इसके बाद 2004 में रासासिंह ने कांग्रेस के बाहरी प्रत्याशी हाजी हबीबुर्रहमान को 1 लाख 27 हजार 976 मतों के भारी अंतर से कुचल दिया। हबीबुर्रहमान को 1 लाख 86 हजार 812 व रावत को 3 लाख 14 हजार 788 वोट मिले थे। इसके बाद 2009 में चूंकि परिसीमन के कारण संसदीय क्षेत्र का रावत बहुल मगरा-ब्यावर इलाका कट कर राजसमंद में चला गया तो रावत का तिलिस्म टूट गया। भाजपा ने उन्हें टिकट नहीं दिया। उनके स्थान पर श्रीमती किरण माहेश्वरी आईं, मगर वे कांग्रेस के सचिन पायलट से 76 हजार 135 वोटों से हार गईं। कुल 14 लाख 52 हजार 490 मतदाताओं वाले इस संसदीय क्षेत्र में पड़े 7 लाख 70 हजार 875 मतों में सचिन को 4 लाख 5 हजार 575 और किरण को 3 लाख 29 हजार 440 मत मिले।
आइये जरा देख लें कि तब किस को कितने वोट मिले थे-
कुल 7 लाख 71 हजार 160 वैध मतों में से बसपा के रोहितास को 9 हजार 180, जागो पार्टी के इन्द्रचन्द पालीवाला को 7 हजार 984 तथा निर्दलीय उम्मीदवार ऊषा किरण वर्मा को 4 हजार 670, नफीसुद्दीन मियां को 3 हजार 134, मुकेश जैन को 2 हजार 601 तथा शांति लाल ढाबरिया को 8 हजार 576 मत मिले। कुल 171 मत अवैध हुए, 34 टेण्डर मत गिरे और कुल मतदान 7 लाख 71 हजार 502 मतों का हुआ । पोस्टल बैलट पेपर 454 में 178 किरण माहेश्वरी को, 104 सचिन पायलट को व एक मत रोहितास को मिला। कुल 171 पोस्टल बैलट पेपर अवैध हुए।
विधानसभा वार स्थिति
अजमेर संसदीय क्षेत्र के आठ विधानसभा क्षेत्र में विभिन्न उम्मीदवारों को मिले मतों की स्थिति इस प्रकार है-
दूदू- इस विधानसभा क्षेत्र से सचिन पायलट को 57 हजार 653, भाजपा की किरण माहेश्वरी को 38 हजार, बसपा के रोहितास को 1613, जागो पार्टी के इन्द्रचन्द पालीवाला को 1174 तथा निर्दलीय ऊषा किरण वर्मा को 670, नफीसुद्दीन मियां को 455, मुकेश जैन को 409 तथा शांतिलाल ढाबरिया को 1257 मत मिले । वैध मतों की संख्या एक लाख एक हजार 231 है।
किशनगढ़- इस विधानसभा क्षेत्र से सचिन को 49 हजार 392, किरण को 51 हजार 831, रोहितास को 1214, इन्द्रचन्द पालीवाला को 945 तथा ऊषा किरण वर्मा को 701, नफीसुद्दीन मियां को 367, मुकेश जैन को 337 तथा शांतिलाल ढाबरिया को 1110 मत मिले । वैध मतों की संख्या एक लाख 5 हजार 897 है।
पुष्कर- सचिन पायलट को 53 हजार 7, किरण को 36 हजार 675, रोहितास को 1226, इन्द्रचन्द पालीवाला को 1110 तथा ऊषा किरण वर्मा को 654, नफीसुद्दीन मियां को 486, मुकेश जैन को 344 तथा शांतिलाल ढाबरिया को 1292 मत मिले । वैध मतों की संख्या 94 हजार 794 है।
अजमेर उत्तर- सचिन 39 हजार 241, किरण माहेश्वरी को 42 हजार 189, रोहितास को 457, इन्द्रचन्द पालीवाला को 557 तथा ऊषा किरण वर्मा को 183, नफीसुद्दीन मियां को 195, मुकेश जैन को 138 तथा शांतिलाल ढाबरिया को 443 मत मिले । वैध मतों की संख्या 83 हजार 403 है।
अजमेर दक्षिण- सचिन को 39 हजार 656, किरण माहेश्वरी को 37 हजार 499, रोहितास को 510, इन्द्रचन्द पालीवाला को 484, ऊषा किरण वर्मा को 170, नफीसुद्दीन मियां को 158, मुकेश जैन को 89 तथा शांतिलाल ढाबरिया को 375 मत मिले । वैध मतों की संख्या 78 हजार 941 है।
नसीराबाद- सचिन को 49 हजार 38, किरण को 43 हजार 501, रोहितास को 1497, इन्द्रचन्द पालीवाला को 1061, ऊषा किरण वर्मा को 555, नफीसुद्दीन मियां को 397, मुकेश जैन को 312 तथा शांतिलाल ढाबरिया को 1145 मत मिले । वैध मतों की संख्या 97 हजार 506 है।
मसूदा- सचिन को 59 हजार 996, किरण को 44 हजार 259, रोहितास को 1368, इन्द्रचन्द पालीवाला को 1408, ऊषा किरण वर्मा को 901, नफीसुद्दीन मियां को 599, मुकेश जैन को 513 तथा शांतिलाल ढाबरिया को 1587 मत मिले । वैध मतों की संख्या एक लाख 10 हजार 631 है।
केकड़ी- सचिन को 57 हजार 488, किरण को 35 हजार 308, रोहितास को 1294, इन्द्रचन्द पालीवाला को 1245, ऊषा किरण वर्मा को 836, नफीसुद्दीन मियां को 477, मुकेश जैन को 459 तथा शांतिलाल ढाबरिया को 1367 मत मिले । वैध मतों की संख्या 98 हजार 474 है।
आठ में से केवल दो विधानसभा क्षेत्रों में मिली भाजपा को बढ़त
संसदीय क्षेत्र के आठ में से छह विधानसभा क्षेत्रों अजमेर दक्षिण, मसूदा, पुष्कर, केकड़ी, नसीराबाद और दूदू में कांग्रेस को बढ़त हासिल हुई, जबकि भाजपा को केवल दो क्षेत्रों अजमेर उत्तर व किशनगढ़ में ही बढ़त मिल पाई। कांग्रेस को सर्वाधिक बढ़त केकड़ी में 22 हजार 180 मतों की मिली, जबकि सबसे कम बढ़त अजमेर दक्षिण में 2 हजार 157 मतों की रही। कांग्रेस को दूदू में 19 हजार 653, पुष्कर में 16 हजार 332, नसीराबाद में 5 हजार 537 और मसूदा में 15 हजार 737 मतों की बढ़त मिली। भाजपा को अजमेर उत्तर में 2 हजार 948 व किशनगढ़ में 2 हजार 539 मतों की बढ़त हासिल हुई।
न इतनी बड़ी हार का डर था, न इतनी बड़ी जीत की आशा
इस चुनाव सबसे चौंकाने वाला तथ्य ये रहा कि भाजपा को न इतनी बड़ी हार का डर था और न ही कांग्रेस को इतनी बड़ी जीत की आशा। दोनों पक्षों की ओर से हालांकि पचास हजार वोटों से जीतने का हवाई दावा किया जा रहा है, लेकिन पार्टियों का आकलन 15 से 20 हजार वोटों से जीतने का ही था। हालांकि इस आकलन में भी मन ही मन डर था कि कहीं हार न जाएं, लेकिन दोनों ही दलों के नेता इतना तो तय मान रहे थे कि हारे भी तो मतांतर ज्यादा नहीं होगा। हालांकि निष्पक्ष राजनीतिक पंडित सचिन का पलड़ा कुछ भारी मान रहे थे, लेकिन दोनों ओर के आकलन की वजह से वे भी कुछ कहने की स्थिति में नहीं रहे।
तब सट्टा बाजार सही निकला
सट्टा बाजार शुरू से सचिन को जीता हुआ मान कर चल रहा था, लेकिन पूर्व के अनुभवों से सबक लेते हुए राजनीतिक जानकार व राजनीतिक दल उस पर यकीन नहीं कर रहे थे और न ही गंभीरता से ले कर चल रहे थे। सट्टा बाजार में किरण की जीत पर चालीस पैसे, जबकि सचिन की जीत पर दो रुपए चालीस पैसे लगाए जा रहे थे। सट्टा बाजार की यह गणित वाकई सही साबित हुई और सचिन भारी मतों से जीत गए।
युवा मतदाता ने किया था चमत्कार
परिणाम आने के बाद यह स्पष्ट माना जा रहा है कि नए परिसीमित संसदीय क्षेत्र में बढ़े तकरीबन एक लाख युवा मतदाता ने यह चमत्कार किया है। हालांकि राजनीति के जानकार यह मान रहे थे कि सचिन को युवा होने का लाभ मिलेगा, लेकिन साथ यह भी मान कर चल रहे थे कि किरण को महिला होने का जो लाभ मिलेगा, उससे संतुलन हो जाएगा। परिणाम आने के बाद यह साफ हो गया है कि सचिन के युवा होने का पहलु ज्यादा कारगर साबित हुआ है।
-तेजवानी गिरधर- अजमेर संसदीय क्षेत्र को पूर्व सांसद व वर्तमान शहर भाजपा अध्यक्ष प्रो. रासासिंह रावत ने रावत वोटों के दम पर भाजपा का गढ़ बना रखा था। वे यहां से पांच बार जीते। इस गढ़ को एक बार कांग्रेस की डॉ. प्रभा ठाकुर ने 5 हजार 772 मतों ध्वस्त किया तो दूसरी बार 2009 में अजमेर के मौजूदा सांसद व केन्द्रीय कंपनी मामलात राज्य मंत्री व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट ने भाजपा महिला मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीमती किरण माहेश्वरी को 76 हजार 135 वोटों से हराया।
इतिहास के आइने में देखें तो राजस्थान में शामिल होने से पहले अजमेर एक अलग राज्य था। सन् 1952 में हुए प्रथम लोकसभा चुनाव में अजमेर राज्य में दो संसदीय क्षेत्र थे-अजमेर उत्तर व अजमेर दक्षिण। राजस्थान में विलय के बाद 1957 में यहां सिर्फ एक संसदीय क्षेत्र हो गया। सन् 1952 से 1977 तक इस इलाके में कांग्रेस का ही बोलबाला रहा। अत्यल्प जातीय आधार के बावजूद यहां से मुकुट बिहारी लाल भार्गव तीन बार, विश्वेश्वर नाथ भार्गव दो बार जीते, लेकिन इसके बाद कांग्रेस के खिलाफ चली देशव्यापी आंधी ने इस गढ़ को ढ़हा दिया और जनता पार्टी के श्रीकरण शारदा ने बदलाव का परचम फहरा दिया। सन् 1980 में जैसे ही देश की राजनीति ने फिर करवट ली तो कांग्रेस के आचार्य भगवानदेव ने कब्जा कर लिया। भगवान देव ने जनता पार्टी के श्रीकरण शारदा को 53 हजार 379 मतों से पराजित किया था। देव को 1 लाख 68 हजार 985 और शारदा को 1 लाख 25 हजार 606 मत मिले थे। सन् 1984 में पेराटूपर की तरह उतने विष्णु मोदी ने भी कांग्रेस की प्रतिष्ठा को बनाए रखा। मोदी ने भाजपा के कैलाश मेघवाल को 56 हजार 694 वोटों से पराजित किया था। मोदी को 2 लाख 16 हजार 173 और मेघवाल को 1 लाख 59 हजार 479 मत मिले थे।
लेकिन 1989 में कांग्रेस के देशव्यापी बिखराव के साथ डेढ़ लाख रावत वोटों को आधार बना कर रासासिंह को उतारा तो यहां का मिजाज ही बदल गया। उसके बाद के छह लोकसभा चुनावों में, 1998 को छोड़ कर, पांच में रासासिंह रावत ने विजय पताका फहराई। कांग्रेस ने भी बदल-बदल कर जातीय कार्ड खेले मगर वे कामयाब नहीं हो पाए। रावत के सामने सन् 1989 में सवा लाख गुर्जरों के दम उतरे बाबा गोविंद सिंह गुर्जर 1 लाख 8 हजार 89 वोटों से हारे। धनखड़ को 1 लाख 86 हजार 333 व रावत को 2 लाख 11 हजार 676 वोट मिले थे। सन् 1991 में रावत ने डेढ़ लाख जाटों के दम पर उतरे जगदीप धनखड़ 25 हजार 343 वोटों से हराया। और सन् 1996 में एक लाख सिंधी मतदाताओं के मद्देनजर उतरे किशन मोटवानी 38 हजार 132 वोटों से पराजित हो गए। सन् 1998 के मध्यावधि चुनाव में सोनिया गांधी के राजनीति में सक्रिय होने के साथ चली हल्की लहर पर सवार हो कर सियासी शतरंज की नौसिखिया खिलाड़ी प्रभा ठाकुर ने रासासिंह को लगातार चौथी बार लोकसभा में जाने रोक दिया था। हालांकि इस जीत का अंतर सिर्फ 5 हजार 772 मतों का रहा, लेकिन 1999 में आए बदलाव के साथ रासासिंह ने प्रभा ठाकुर को 87 हजार 674 मतों से पछाड़ कर बदला चुका दिया। इसके बाद 2004 में रासासिंह ने कांग्रेस के बाहरी प्रत्याशी हाजी हबीबुर्रहमान को 1 लाख 27 हजार 976 मतों के भारी अंतर से कुचल दिया। हबीबुर्रहमान को 1 लाख 86 हजार 812 व रावत को 3 लाख 14 हजार 788 वोट मिले थे। इसके बाद 2009 में चूंकि परिसीमन के कारण संसदीय क्षेत्र का रावत बहुल मगरा-ब्यावर इलाका कट कर राजसमंद में चला गया तो रावत का तिलिस्म टूट गया। भाजपा ने उन्हें टिकट नहीं दिया। उनके स्थान पर श्रीमती किरण माहेश्वरी आईं, मगर वे कांग्रेस के सचिन पायलट से 76 हजार 135 वोटों से हार गईं। कुल 14 लाख 52 हजार 490 मतदाताओं वाले इस संसदीय क्षेत्र में पड़े 7 लाख 70 हजार 875 मतों में सचिन को 4 लाख 5 हजार 575 और किरण को 3 लाख 29 हजार 440 मत मिले।
आइये जरा देख लें कि तब किस को कितने वोट मिले थे-
कुल 7 लाख 71 हजार 160 वैध मतों में से बसपा के रोहितास को 9 हजार 180, जागो पार्टी के इन्द्रचन्द पालीवाला को 7 हजार 984 तथा निर्दलीय उम्मीदवार ऊषा किरण वर्मा को 4 हजार 670, नफीसुद्दीन मियां को 3 हजार 134, मुकेश जैन को 2 हजार 601 तथा शांति लाल ढाबरिया को 8 हजार 576 मत मिले। कुल 171 मत अवैध हुए, 34 टेण्डर मत गिरे और कुल मतदान 7 लाख 71 हजार 502 मतों का हुआ । पोस्टल बैलट पेपर 454 में 178 किरण माहेश्वरी को, 104 सचिन पायलट को व एक मत रोहितास को मिला। कुल 171 पोस्टल बैलट पेपर अवैध हुए।
विधानसभा वार स्थिति
अजमेर संसदीय क्षेत्र के आठ विधानसभा क्षेत्र में विभिन्न उम्मीदवारों को मिले मतों की स्थिति इस प्रकार है-
दूदू- इस विधानसभा क्षेत्र से सचिन पायलट को 57 हजार 653, भाजपा की किरण माहेश्वरी को 38 हजार, बसपा के रोहितास को 1613, जागो पार्टी के इन्द्रचन्द पालीवाला को 1174 तथा निर्दलीय ऊषा किरण वर्मा को 670, नफीसुद्दीन मियां को 455, मुकेश जैन को 409 तथा शांतिलाल ढाबरिया को 1257 मत मिले । वैध मतों की संख्या एक लाख एक हजार 231 है।
किशनगढ़- इस विधानसभा क्षेत्र से सचिन को 49 हजार 392, किरण को 51 हजार 831, रोहितास को 1214, इन्द्रचन्द पालीवाला को 945 तथा ऊषा किरण वर्मा को 701, नफीसुद्दीन मियां को 367, मुकेश जैन को 337 तथा शांतिलाल ढाबरिया को 1110 मत मिले । वैध मतों की संख्या एक लाख 5 हजार 897 है।
पुष्कर- सचिन पायलट को 53 हजार 7, किरण को 36 हजार 675, रोहितास को 1226, इन्द्रचन्द पालीवाला को 1110 तथा ऊषा किरण वर्मा को 654, नफीसुद्दीन मियां को 486, मुकेश जैन को 344 तथा शांतिलाल ढाबरिया को 1292 मत मिले । वैध मतों की संख्या 94 हजार 794 है।
अजमेर उत्तर- सचिन 39 हजार 241, किरण माहेश्वरी को 42 हजार 189, रोहितास को 457, इन्द्रचन्द पालीवाला को 557 तथा ऊषा किरण वर्मा को 183, नफीसुद्दीन मियां को 195, मुकेश जैन को 138 तथा शांतिलाल ढाबरिया को 443 मत मिले । वैध मतों की संख्या 83 हजार 403 है।
अजमेर दक्षिण- सचिन को 39 हजार 656, किरण माहेश्वरी को 37 हजार 499, रोहितास को 510, इन्द्रचन्द पालीवाला को 484, ऊषा किरण वर्मा को 170, नफीसुद्दीन मियां को 158, मुकेश जैन को 89 तथा शांतिलाल ढाबरिया को 375 मत मिले । वैध मतों की संख्या 78 हजार 941 है।
नसीराबाद- सचिन को 49 हजार 38, किरण को 43 हजार 501, रोहितास को 1497, इन्द्रचन्द पालीवाला को 1061, ऊषा किरण वर्मा को 555, नफीसुद्दीन मियां को 397, मुकेश जैन को 312 तथा शांतिलाल ढाबरिया को 1145 मत मिले । वैध मतों की संख्या 97 हजार 506 है।
मसूदा- सचिन को 59 हजार 996, किरण को 44 हजार 259, रोहितास को 1368, इन्द्रचन्द पालीवाला को 1408, ऊषा किरण वर्मा को 901, नफीसुद्दीन मियां को 599, मुकेश जैन को 513 तथा शांतिलाल ढाबरिया को 1587 मत मिले । वैध मतों की संख्या एक लाख 10 हजार 631 है।
केकड़ी- सचिन को 57 हजार 488, किरण को 35 हजार 308, रोहितास को 1294, इन्द्रचन्द पालीवाला को 1245, ऊषा किरण वर्मा को 836, नफीसुद्दीन मियां को 477, मुकेश जैन को 459 तथा शांतिलाल ढाबरिया को 1367 मत मिले । वैध मतों की संख्या 98 हजार 474 है।
आठ में से केवल दो विधानसभा क्षेत्रों में मिली भाजपा को बढ़त
संसदीय क्षेत्र के आठ में से छह विधानसभा क्षेत्रों अजमेर दक्षिण, मसूदा, पुष्कर, केकड़ी, नसीराबाद और दूदू में कांग्रेस को बढ़त हासिल हुई, जबकि भाजपा को केवल दो क्षेत्रों अजमेर उत्तर व किशनगढ़ में ही बढ़त मिल पाई। कांग्रेस को सर्वाधिक बढ़त केकड़ी में 22 हजार 180 मतों की मिली, जबकि सबसे कम बढ़त अजमेर दक्षिण में 2 हजार 157 मतों की रही। कांग्रेस को दूदू में 19 हजार 653, पुष्कर में 16 हजार 332, नसीराबाद में 5 हजार 537 और मसूदा में 15 हजार 737 मतों की बढ़त मिली। भाजपा को अजमेर उत्तर में 2 हजार 948 व किशनगढ़ में 2 हजार 539 मतों की बढ़त हासिल हुई।
न इतनी बड़ी हार का डर था, न इतनी बड़ी जीत की आशा
इस चुनाव सबसे चौंकाने वाला तथ्य ये रहा कि भाजपा को न इतनी बड़ी हार का डर था और न ही कांग्रेस को इतनी बड़ी जीत की आशा। दोनों पक्षों की ओर से हालांकि पचास हजार वोटों से जीतने का हवाई दावा किया जा रहा है, लेकिन पार्टियों का आकलन 15 से 20 हजार वोटों से जीतने का ही था। हालांकि इस आकलन में भी मन ही मन डर था कि कहीं हार न जाएं, लेकिन दोनों ही दलों के नेता इतना तो तय मान रहे थे कि हारे भी तो मतांतर ज्यादा नहीं होगा। हालांकि निष्पक्ष राजनीतिक पंडित सचिन का पलड़ा कुछ भारी मान रहे थे, लेकिन दोनों ओर के आकलन की वजह से वे भी कुछ कहने की स्थिति में नहीं रहे।
तब सट्टा बाजार सही निकला
सट्टा बाजार शुरू से सचिन को जीता हुआ मान कर चल रहा था, लेकिन पूर्व के अनुभवों से सबक लेते हुए राजनीतिक जानकार व राजनीतिक दल उस पर यकीन नहीं कर रहे थे और न ही गंभीरता से ले कर चल रहे थे। सट्टा बाजार में किरण की जीत पर चालीस पैसे, जबकि सचिन की जीत पर दो रुपए चालीस पैसे लगाए जा रहे थे। सट्टा बाजार की यह गणित वाकई सही साबित हुई और सचिन भारी मतों से जीत गए।
युवा मतदाता ने किया था चमत्कार
परिणाम आने के बाद यह स्पष्ट माना जा रहा है कि नए परिसीमित संसदीय क्षेत्र में बढ़े तकरीबन एक लाख युवा मतदाता ने यह चमत्कार किया है। हालांकि राजनीति के जानकार यह मान रहे थे कि सचिन को युवा होने का लाभ मिलेगा, लेकिन साथ यह भी मान कर चल रहे थे कि किरण को महिला होने का जो लाभ मिलेगा, उससे संतुलन हो जाएगा। परिणाम आने के बाद यह साफ हो गया है कि सचिन के युवा होने का पहलु ज्यादा कारगर साबित हुआ है।
बुधवार, 19 मार्च 2014
पिछली बार भी भाजपा असमंजस में थी, सचिन के सामने किसे उतारे?
पिछली बार की तरह इस बार भी भाजपा अजमेर में कांग्रेस प्रत्याशी सचिन पायलट के सामने अपने प्रत्याशी को लेकर पसोपेश में नजर आई। असल में भाजपाई ये सोच रहे थे कि प्रदेश कांग्रेस की कमान का जिम्मा होने के कारण सचिन पायलट चुनाव मैदान में नहीं आएंगे। उनकी ये भी सोच थी कि चूंकि अजमेर संसदीय क्षेत्र की सभी सीटों पर कांग्रेस बुरी तरह से हार गई है, इस कारण इस बार सचिन यहां से चुनाव लडऩे का साहस नहीं जुटा पाएंगे। इसी वजह से कई स्थानीय दावेदार उछल-उछल कर दावा कर रहे थे। मगर उनका अनुमान गलत निकला। सचिन फिर से धमक गए। जाहिर तौर पर सचिन की वजह से भाजपा खेमे में खलबली है। और इसी कारण भाजपा को प्रत्याशी तय करने में देरी हुई है। मजेदार बात ये है कि यह स्थिति तब है, जबकि भाजपा ने अजमेर संसदीय क्षेत्र की सभी सीटों पर कब्जा करके करीब दो लाख वोटों की बढ़त बना रखी है। यानि कि सचिन हो या कोई और, भाजपा का कोई भी उम्मीदवार जीत सकता है। मगर धरातल का सच ऐसा है नहीं। वरना सचिन के नाम की घोषणा से पहले और नहीं तो घोषणा के तुरंत बाद प्रत्याशी घोषित कर दिया जाता।
आपको याद होगा कि पिछली बार भी भाजपा को प्रत्याशी तलाशने में देरी हुई थी। उसे स्थानीय दावेदारों में दम नहीं लग रहा था, इस कारण भाजपा महिला मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीमती किरण माहेश्वरी को उतारा था। ज्ञातव्य है कि पिछली सबसे दमदार स्थानीय प्रत्याशी प्रो. सांवरलाल जाट थे, मगर पार्टी उन पर दाव नहीं खेल पाई। इस बार तो जाट राज्य सरकार में केबीनेट मंत्री बन चुके हैं, ऐसे में वे काहे हो अदद सांसद बनना चाहते। इसी कारण उन्होंने अपने बेटे रामस्वरूप लांबा को आगे कर दिया। यहां आपको बता दें कि अजमेर में जाटों के वोट दो लाख से भी ज्यादा हैं, इस कारण भाजपा को जाट प्रत्याशी ही ज्यादा सूट कर सकता है। इसी कारण राजस्थान लोक सेवा आयोग के पूर्व अध्यक्ष छोटू राम चौधरी का नाम चला, मगर उन्हें नागौर से प्रत्याशी बना दिया गया है। इसी क्रम में किशनगढ़ विधायक भागीरथ चौधरी, पूर्व जिला प्रमुख श्रीमती सरिता गैना व उनके ससुर सी. बी. गैना और अजमेर में कलेक्टर रह चुके महावीर सिंह का नाम सामने आया। पिछली बार जाट फैक्टर के तहत फिल्म अभिनेता धर्मेन्द्र की धर्मपत्नी फिल्म अभिनेत्री हेमा मालिनी का भी नाम चर्चा में आया था। इस बार धर्मेन्द्र के पुत्र सन्नी देओल का नाम भी उछला।
कुल मिला कर प्रत्याशी घोषित होने से पहले तक भाजपाई यह समझ ही नहीं पा रहे कि मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के मन में क्या है? कुछ का अनुमान रहा कि वे अपनी पुत्रवधू श्रीमती निहारिका को उतार सकती हैं। जो कुछ भी हो, आज-कल में भाजपा प्रत्याशी का नाम सामने आ ही जाएगा, मगर इतना तय है कि सचिन की वजह से भाजपा कुछ पसोपेश में जरूर पड़ी है।
आपको याद होगा कि पिछली बार भी भाजपा को प्रत्याशी तलाशने में देरी हुई थी। उसे स्थानीय दावेदारों में दम नहीं लग रहा था, इस कारण भाजपा महिला मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीमती किरण माहेश्वरी को उतारा था। ज्ञातव्य है कि पिछली सबसे दमदार स्थानीय प्रत्याशी प्रो. सांवरलाल जाट थे, मगर पार्टी उन पर दाव नहीं खेल पाई। इस बार तो जाट राज्य सरकार में केबीनेट मंत्री बन चुके हैं, ऐसे में वे काहे हो अदद सांसद बनना चाहते। इसी कारण उन्होंने अपने बेटे रामस्वरूप लांबा को आगे कर दिया। यहां आपको बता दें कि अजमेर में जाटों के वोट दो लाख से भी ज्यादा हैं, इस कारण भाजपा को जाट प्रत्याशी ही ज्यादा सूट कर सकता है। इसी कारण राजस्थान लोक सेवा आयोग के पूर्व अध्यक्ष छोटू राम चौधरी का नाम चला, मगर उन्हें नागौर से प्रत्याशी बना दिया गया है। इसी क्रम में किशनगढ़ विधायक भागीरथ चौधरी, पूर्व जिला प्रमुख श्रीमती सरिता गैना व उनके ससुर सी. बी. गैना और अजमेर में कलेक्टर रह चुके महावीर सिंह का नाम सामने आया। पिछली बार जाट फैक्टर के तहत फिल्म अभिनेता धर्मेन्द्र की धर्मपत्नी फिल्म अभिनेत्री हेमा मालिनी का भी नाम चर्चा में आया था। इस बार धर्मेन्द्र के पुत्र सन्नी देओल का नाम भी उछला।
कुल मिला कर प्रत्याशी घोषित होने से पहले तक भाजपाई यह समझ ही नहीं पा रहे कि मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के मन में क्या है? कुछ का अनुमान रहा कि वे अपनी पुत्रवधू श्रीमती निहारिका को उतार सकती हैं। जो कुछ भी हो, आज-कल में भाजपा प्रत्याशी का नाम सामने आ ही जाएगा, मगर इतना तय है कि सचिन की वजह से भाजपा कुछ पसोपेश में जरूर पड़ी है।
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