गुरुवार, 3 अप्रैल 2014

सचिन की अजमेर शहर में सक्रियता से भाजपा हैरान

अजमेर संसदीय क्षेत्र के कांग्रेस प्रत्याशी मौजूदा सांसद, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष व केन्द्रीय कंपनी मामलात राज्य मंत्री सचिन पायलट की अजमेर शहर में सक्रियता से भाजपा हैरान है। असल में भाजपा यह माने बैठी थी कि स्थानीय स्तर पर कांग्रेसी नेताओं की सचिन के प्रति तनिक नाराजगी का सीधा फायदा उसे मिलेगा, मगर सचिन ने उनकी आशाओं पर पानी फेर दिया है। ज्ञातव्य है कि सचिन ने पिछले दिनों पूर्व उप मंत्री ललित भाटी, पार्षद मोहनलाल शर्मा, पूर्व पार्षद शिवरतन वैष्णव, पूर्व शहर कांग्रेस उपाध्यक्ष डॉ. सुरेश गर्ग आदि को मना लिया है। पूर्व विधायक डॉ. श्रीगोपाल बाहेती व पूर्व विधायक डॉ. राजकुमार जयपाल तो पहले ही साथ हो लिए थे। इसके अतिरिक्त सचिन ने अनेक स्थानीय कार्यकर्ताओं से भी सीधा संपर्क साधा है। इससे यह संदेश गया है कि वे अजमेर शहर में विशेष सक्रिय हैं। हालांकि भाजपाई सचिन की इस सक्रियता को इस रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं कि वे तनाव में हैं, इस कारण ग्राउंड लेवल पर जाने को मजबूर हैं, मगर सच्चाई ये है कि इससे कांग्रेसियों में उत्साह है। कहने की आवश्यकता नहीं है कि सचिन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष हैं, इस कारण नाराज नेताओं व कार्यकर्ताओं को एडजस्ट करने के लिए उन्हें किसी ने पूछने की जरूरत नहीं है। जो कुछ भी हो, सचिन की सक्रियता ने भाजपा को चौकन्ना कर दिया है और वह उसी के अनुरूप रणनीति परिवर्तित कर रही है।
-तेजवानी गिरधर

सिंगारियां के चक्कर में भाजपा के ब्राह्मण वोट न छिटक जाएं

केकड़ी क्षेत्र में भाजपा के कद्दावर राजपूत नेता पूर्व प्रधान भूपेंद्रसिंह शक्तावत के कांग्रेस में शामिल होने के बाद भाजपा ने पलटवार करते हुए पूर्व विधायक बाबूलाल सिंगारियां को शामिल तो कर लिया है, मगर सवाल ये उठ रहा है कि उनके भाजपा में आने से अनुसूचित जाति के जितने वोटों का भाजपा को फायदा होगा, कहीं उससे अधिक ब्राह्मण वोटों का नुकसान न हो जाए? ज्ञातव्य है कि बाबू लाल सिंगारिया ने कांग्रेस विधायक रहते हुए अजमेर के तत्कालीन एसपी आलोक त्रिपाठी को कलैक्ट्रेट में भरी बैठक के दौरान थप्पड़ मारा था, जिससे पूरे प्रदेश के ब्राह्मण उनसे नाराज हो गए थे। यह नाराजगी इतनी थी कि जब भी वे चुनाव में टिकट के लिए सक्रिय होते थे, ब्राह्मण समुदाय उनका विरोध करने लगता था। एक मात्र यही वजह रही कि 2003 में वे भाजपा प्रत्याशी गोपाल लाल धोबी से चुनाव हार गए। दिलचस्प बात ये है कि ब्राह्मण एसपी को थप्पड़ मारने वाले इस पूर्व विधायक को एक ब्राह्मण विधायक केकड़ी के ही शत्रुघ्न गौतम ने अहम भूमिका निभाई है। ऐसे में गौतम अपने समाज को क्या जवाब देंगेïïï?
आपको जानकारी होगी कि 1998 की कांग्रेस लहर में सिंगारिया ने केकड़ी सुरक्षित सीट से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीता। इसके बाद 2003 में वे भाजपा प्रत्याशी गोपाल लाल धोबी से चुनाव हारे। जब 2008 में केकड़ी सीट सामान्य हो गई तो कांग्रेस ने रघु शर्मा को टिकट दे दिया। इस पर सिंगारिया बागी बन कर खड़े हो गए, मगर शर्मा फिर भी जीत गए। उस चुनाव में सिंगारियां ने 22 हजार 123 वोट हासिल कर यह जता दिया कि उनकी इलाके में व्यक्तिगत पकड़ है। हाल ही संपन्न विधानसभा चुनाव में रघु शर्मा फिर से मैदान में आए तो सिंगारिया एनसीपी के टिकट पर खड़े हो गए और 17 हजार 500 मत हासिल शर्मा की हार का कारण प्रमुख कारण बने। विश्लेषण से पता लगता है कि उनकी न केवल सजातीय वोटों पर पकड़ है, अपितु सरवाड़ व केकड़ी में हुए सांप्रदायिक तनाव के कारण नाराज अल्पसंख्यकों में भी उन्होंने सेंध मार दी थी। हाल ही जब कांग्रेस ने भाजपा के भूपेन्द्र सिंह शक्तावत को तोड़ा और इससे भाजपा को राजपूत वोटों का नुकसान होता दिखाई दिया तो उसने सिंगारियां को अपने पक्ष में करके कांग्रेस को झटका दिया है।
सिंगारियां को पिछली बार लोकसभा चुनाव में तो बागी होने के बाद भी सचिन अपने लिए पार्टी में वापस ले आए, हालांकि पूर्व विधायक रघु शर्मा इससे सहमत नहीं थे। इस बार उनको कांग्रेस में वापस लिए जाने की संभावना नहीं थी, समझा जाता है कि इसी कारण उन्होंने भाजपा में जाना बेहतर समझा। कुछ लोग ये कयास लगा रहे हैं कि वे अशोक गहलोत के करीब हैं और कदाचित गहलोत की सचिन से नाइत्तफाकी के चलते उनके ही इशारे पर भाजपा में चले गए हैं। अब देखना ये भी होगा कि क्या उनके कहने पर उनके समर्थक भाजपा का उतना ही साथ देते हैं, जितना कि उनके स्वयं खड़े होने पर देते हैं। आशंका ये भी है कि कहीं सिंगारियां से नाराज ब्राह्मण भाजपा को नुकसान न पहुंचा दें।
-तेजवानी गिरधर

रविवार, 30 मार्च 2014

हम इसलिए ताकते हैं बाहरी नेताओं की राह

यह अजमेर का दुर्भाग्य है कि चुनाव के दौरान कांग्रेस व भाजपा में स्थानीय दावेदारों के होते हुए भी बाहरी नेताओं के आने की चर्चा होती है।  स्थानीय दावेदार भी यही मानस बना कर रखते हैं कि उन्हें तो मौका मिलने वाला है नहीं, सो बाहर से जो भी प्रत्याशी आएगा, उसका पार्टी के प्रति निष्ठा के नाम पर स्वागत करना ही है।
असल में राजनीति के लिहाज से अजमेर को चरागाह माना जाता है। पार्टियों के हाईकमान जानते हैं कि यहां से किसी की दमदार दावेदारी है नहीं, सो जिस किसी को भी एडजस्मेंट के लिए यहां भेजा जाएगा, उसे यहां के दावेदार व जनता शिरोधार्य करेगी।
बाहर के नेताओं के अजमेर में पनपने का एक लंबा सिलसिला है। रोचक तथ्य है कि वर्षों से यहां बसे अनेक नेता भी कभी बाहर से ही यहां आए और आज अपना वजूद रखते हैं। वे भले ही अब स्थानीय कहे जाएं और यहीं रच-बस गए हैं, मगर वास्तविकता से कैसे नकारा जा सकता है कि वे बाहर से आ कर ही यहां पनपे हैं। मौजूदा भाजपा विधायक प्रो. वासुदेव देवनानी का उदाहरण तो सबको पता है। कुछ नेताओं का जिक्र करें तो आप भी चौंक जाएंगे। यथा सर्वश्री औंकार सिंह लखावत, धर्मेश जैन, पूर्णाशंकर दशोरा, डॉ. श्रीगोपाल बाहेती, भंवर सिंह पलाड़ा आदि आदि। तत्कालीन अजमेर नगर परिषद के सभापति स्वर्गीय वीर कुमार भी बाहर से ही यहां आए थे। विष्णु मोदी भी बाहर से आ कर कांग्रेस के सांसद बने और बाद में भाजपा के टिकट पर मसूदा विधायक चुने गए। यहां जन्मे नेता भी स्थापित हुए हैं, मगर उनकी संख्या कम ही है।
वस्तुत: स्थानीय नेताओं के स्थापित न होने का मूल कारण ये है कि वे कभी अपना जनाधार नहीं बना पाए। चुनाव के वक्त उनकी दावेदारी होती जरूर है, मगर जनाधार न होने के कारण पार्टियां उनको तवज्जो नहीं देतीं। आपको याद होगा कि पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस हाईकमान ने स्थानीय इकाई की ओर से डॉ. श्रीगोपाल बाहेती का नाम प्रस्तावित करने के बाद भी सचिन पायलट को प्रत्याशी बनाया। इसका सीधा सा अर्थ ये है कि जरूर डॉ. बाहेती के जनाधार में कोई कमी रही होगी, जो पार्टी ने उन्हें दरकिनार कर दिया। भाजपा ने भी हाई प्रोफाइल सचिन से मुकाबला करने के लिए स्थानीय दावेदार प्रो. रासासिंह रावत, पूर्व मंत्री प्रो.सांवरलाल जाट, धर्मेन्द्र गहलोत, सरिता गेना, पुखराज पहाडिय़ा, मदनसिंह रावत, भंवरसिंह पलाड़ा, सुरेन्द्र सिंह शेखावत, डॉ. भगवती प्रसाद सारस्वत, डॉ. कमला गोखरू आदि को साइड में रख कर उदयपुर की श्रीमती किरण माहेश्वरी को चुनाव मैदान में उतार दिया। स्थानीय एक भी दावेदार में इतनी कुव्वत नहीं थी कि वह पार्टी नेताओं को चुनौती दे सके। स्पष्ट है कि उनका जनाधार नहीं था। इसी प्रकार जब पहली बार प्रो. देवनानी अजमेर लाए गए तो यहां हरीश झामनानी, तुलसी सोनी, जगदीश वच्छानी सरीखे दावेदार थे, मगर भाजपा हाईकमान ने उन्हें उपयुक्त नहीं माना।
अब बात करते हैं कि आखिर क्या वजह है कि स्थानीय नेताओं का जनाधार बन नहीं पाता। इसकी एक मात्र वजह यही समझ में आती है कि ये नेता ग्राउंड पर ठीक से काम नहीं करते और मात्र पार्टी में सक्रियता के नाते टिकट मांगते हैं। जनता में उनकी पकड़ तो होती नहीं है, केवल पार्टी सिंबल के दम पर चुनाव लडऩा चाहते हैं। यदि यही नेता पहले जनता की सेवा करें व अपनी लोकप्रियता स्थापित करें और उसके बाद टिकट की दावेदारी करें तो पार्टी हाईकमान उसे नजर अंदाज नहीं कर सकता। हाईकमान जानता है कि अगर इनको टिकट नहीं दिया गया तो जनता उसका साथ देने को तैयार नहीं होगी। यदि कोई वास्तविक जननेता हो तो उसे दरकिनार करने से पहले हाईकमान को भी दस बार सोचना होगा।
रहा जनाधार का सवाल तो वह बनता इसलिए नहीं है कि स्थानीय नेता ठेठ जमीन पर जनसमस्याओं के लिए तो काम करते नहीं हैं। छिटपुट उदाहरणों को छोड़ दिया जाए तो यह याद नहीं आता कि किसी नेता ने स्थानीय किसी समस्या के लिए जन आंदोलन खड़ा किया हो। शहर की सबसे बड़ी समस्या यातायात व पार्किंग की है, मगर आज तक कोई ऐसा आंदोलन नहीं हुआ कि प्रशासन को मजबूर हो कर इसका समाधान करना पड़ा हो। जिन दिनों पानी की विकट समस्या थी, तब भी कोई बड़ा जन आंदोलन नहीं हुआ। दैनिक नवज्योति के संपादक श्री दीनबंधु चौधरी व युवा भाजपा नेता श्री भंवर सिंह पलाड़ा ने आईआईटी के लिए एक आंदोलन खड़ा किया, मगर उसे पूरा जनसमर्थन नहीं मिला। परिणाम स्वरूप सरकार पर दबाव नहीं बनाया जा सका। यूं आंदोलन हुए हैं, मगर केवल पार्टी बैनर पर। उसमें किसी नेता विशेष की निजी भूमिका नहीं रही। नतीजा ये है कि आज अजमेर एक भी नेता ऐसा नहीं है, जिसकी एक आवाज पर पूरी जनता साथ खड़ी हो जाए। यानि कि जब तक स्थानीय नेता जनता पर अपनी पकड़ नहीं बनाएंगे, पार्टी हाईकमान इसी प्रकार बाहरी नेताओं को पेराटूपर की तरह उतारते रहेंगे।

शनिवार, 29 मार्च 2014

विधानसभा चुनाव में टिकट न मिलने के कारण पहले से नाराज थे शक्तावत

केकड़ी विधानसभा क्षेत्र में भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व प्रधान भूपेंद्र सिंह शक्तावत का कांग्रेस में शामिल होना भाजपा प्रत्याशी प्रो. सांवरलाल के लिए एक बड़ा झटका है। उनका सावर सताईसा क्षेत्र में खासा प्रभाव है और इससे राजपूत वोटों का धु्रवीकरण कांग्रेस प्रत्याशी सचिन पायलट की ओर हो सकता है। उल्लेखनीय बात ये है कि वे अकेले नहीं बल्कि दल-बल के साथ आए हैं। भाजपा की जिला मंत्री आशा कंवर राठौड़, केकड़ी देहात महिला मोर्चा अध्यक्ष सज्जन कंवर राठौड़, सरपंच सावर पुष्पेंन्द्र सिंह शक्तावत, पूर्व पंचायत समिति सदस्य गोपी लोधा, पूर्व पंचायत समिति सदस्य मांगी लाल धोबी, पंचायत समिति सदस्य नारायण मीणा आदि भी कांग्रेस में शामिल हो गए हैं।
आपको बता दें कि शक्तावत भाजपा से पहले ही नाराज चल रहे थे। हाल ही संपन्न विधानसभा चुनाव में वे टिकट के प्रबल दावेदार थे, मगर भाजपा ने ऐन वक्त पर ब्राह्मण कार्ड खेलते हुए शत्रुघ्र गौत्तम को प्रत्याशी बनाकर चुनाव मैदान में उतार दिया था। हालांकि चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा प्रत्याशी के समर्थन में हुई वसुन्धरा राजे की सभा में मंच पर दिखाई दिये थे, मगर चर्चाएं यही थीं कि उनकी सक्रिय भागीदारी के अभाव रहा।
इससे पहले 2008 के विधानसभा चुनाव में वे भाजपा से बगावत कर चुके हैं। पार्टी ने श्रीमती रिंकू कंवर को प्रत्याशी बनाया, इस पर उन्होंने बगावत कर दी। उन्हें 17 हजार 801 वोट मिले थे। रिंकू हार गईं और कांग्रेस के रघु शर्मा जीत गए थे।

यानि कि भाजपा से हुई थी आप के सोमानी की डील

अजमेर संसदीय क्षेत्र में आम आदमी पार्टी के प्रत्याशी अजय सोमानी ने किससे डील करके मैदान से हटने निर्णय किया, इसका खुलासा हो पाता, उससे पहले ही भाजपा के वरिष्ठ नेता व नगर सुधार न्यास के पूर्व सदर धर्मेश जैन ने खुद खुलासा कर दिया कि उन्होंने ही सोमानी को समझाया था कि मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए भाजपा को समर्थन दें। इससे यह साफ हो गया है कि सोमानी भाजपा नेताओं के दबाव में थे। डील में क्या हुआ, कितने में हुई, आगे क्या फायदा देना तय हुआ, ये तो पता नहीं, मगर समझा जा सकता है कि इस आर्थिक युग में भला कौन केवल समझाइश से मान जाता है। जो कुछ भी हो जैन ने अंदर की बात का खुलासा करके सोमानी को मैदान से हटवाने का श्रेय तो ले लिया है। अब ये पता नहीं कि मुंह पर स्याही पुतवाने की एवज में जैन ने उनको भाजपा प्रत्याशी प्रो. सांवरलाल जाट से कुछ दिलवाने का तय करवाया है या नहीं।
इसी सिलसिले में एक कानाफूसी पर भी जरा गौर करें। वो ये कि जिस आखिरी बैठक में सोमानी ने मैदान से हटने का निर्णय सुनाया, उसमें कहा बताया कि चूंकि वे खुद तो जीत नहीं पाएंगे, इस कारण बेहतर ये है कि वे हट जाएं ओर मोदी को रोकने के लिए कांगे्रेस का समर्थन करें। इस पर बैठक में मौजूद कार्यकर्ता भड़क गए थे।
अब बात करें ये कि क्या वाकई सोमानी के हटने से भाजपा को लाभ होगा? कुछ लोग मानते हैं कि माहेश्वरी समाज में उनका अच्छा नेटवर्क है, मगर वे इतने बड़े नेता भी नहीं कि उनके कहने से माहेश्वरी समाज के लोग वोट डालने के बारे में निर्णय करने जा रहे थे या अब करेंगे। सच तो ये है कि उन्हें आप के कार्यकर्ता ही ठीक से नहीं जानते। उलटा कार्यकर्ताओं को एक बड़ा गुट उनके खिलाफ था। सोमानी से मैदान से हटने का एक कारण ये भी था। वे नामांकन भरने वाले दिन से ही कुछ निराश से थे। वे मैदान से हट न जाएं, इस बात की आशंका कार्यकर्ताओं को पहले से ही हो गई थी। समझा जा सकता है कि वरना पहले से स्याही का इंतजाम कैसे हो गया?
हां, इतना जरूर है कि बैलेट पर चूंकि अब आम आदमी पार्टी का सिंबल नहीं होगा, इस कारण जो कांग्रेस विरोधी वोट पहले सोमानी को मिलने की संभावना थी, वह अब भाजपा की ओर जा सकता है। मगर इसमें सोमानी का कोई लेना-देना नहीं होगा। एक बात और। सोमानी के हटने के बाद कार्यकर्ताओं में निराशा और किंकर्तव्यविमूढ़ है कि अब वह क्या करे? संभव है पार्टी की ओर से निर्देश आएं कि वे नोटा का बटन दबाने की अपील करें।
-तेजवानी गिरधर