गुरुवार, 17 अप्रैल 2014

मतदान प्रतिशत 5.66 गिरने के क्या मायने हैं?

हालांकि यह बात सही है कि इस बार लोकसभा चुनाव में अजमेर संसदीय क्षेत्र में मतदान 15.57 प्रतिशत बढ़ा है, जो कि एक रिकार्ड है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों के लिए इसका महत्व तो है ही, उससे कहीं अधिक महत्व तीन-चार माह पहले दिसम्बर 2013 में हुए विधानसभा चुनाव के मतदान प्रतिशत का भी काउंट किया जा रहा है। विधानसभा चुनाव में रिकॉर्ड 74.10 प्रतिशत मतदान हुआ था। उसकी तुलना में 5.66 मतदान प्रतिशत गिरना विशेष अर्थ रखता है। मोटे तौर पर इसका ज्यादा नुकसान भाजपा को माना जाता है। इसकी वजह ये है कि जब भी मतदान प्रतिशत बढ़ता है तो वह सत्ता के खिलाफ माना जाता है। यदि इसमें गिरावट आई तो इसका मतलब ये माना जाता है कि सत्ता विरोधी लहर में कुछ कमी आई होगी। ज्ञातव्य है कि विधानसभा चुनाव में रिकार्ड मतदान की वजह से भाजपा ने कांग्रेस पर एक लाख 91 हजार 963 मतों की बढ़त हासिल की थी। मतदान प्रतिशत 5.66 प्रतिशत गिरने का मोटे तौर आंकडों की भाषा में यह अर्थ निकाला जा रहा है कि भाजपा व कांग्रेस के बीच का मंतातर कम होगा, हालांकि दोनों चुनाव को प्रभावित करने वाले कारक और भी हैं। अगर वे अधिक प्रभावी होते हैं तो अनुमान गलत भी निकल सकता है। वैसे भाजपा नेताओं का मानना है कि भले ही मतदान प्रतिशत गिरा है, मगर मोदी लहर के चलते यह मतांतर और भी बढ़ेगा।
बात अगर पिछले लोकसभा चुनाव की तुलना करते हुए करें तो एक ओर जहां मतदान प्रतिशत में 15.57 इजाफा हुआ है, वहीं मतदाता भी थोक में बढ़े हैं। पिछले लोकसभा चुनाव की तुलना में 2 लाख 27 हजार 867 मतदाता बढ़े हैं। दोनों तरह का इजाफा सत्ता विरोधी माना जाता है। एक और फैक्टर भी आसन्न चुनाव को प्रभाविक करता नजर आता है। वो ये है कि पिछले विधानसभा चुनाव की तुलना में 79 हजार 10 वोट बढ़ गए हैं, जो अधिसंख्य नई पीढ़ी के हैं। स्वाभाविक रूप से वे परिवर्तन की ओर उन्मुख हैं, जिसका सीधा-सीधा लाभ भाजपा को मिलेगा।
उल्लेखनीय है कि अजमेर संसदीय क्षेत्र के आठों विधानसभा क्षेत्रों में कुल 68.64 प्रतिशत मतदान हुआ है। जिला निर्वाचन विभाग के अनुसार किशनगढ़ में 72.63, पुष्कर में 72.07, नसीराबाद में 72.34, दूदू में 66.37   तथा केकड़ी 63.95  में प्रतिशत मतदान हुआ है। इसी तरह मसूदा में  67.97,  अजमेर उत्तर  65.46 में एवं अजमेर दक्षिण में  68.11 प्रतिशत मतदान हुआ है। बात अगर हाल ही संपन्न हुए विधानसभा चुनाव की करें तो उसके आंकड़े इस प्रकार हैं:-अजमेर जिले में 11 लाख 85 हजार 667 मतदाताओं ने अपने मताधिकार का उपयोग किया। जिले में 16 लाख 26 मतदाता थे, जिनमें से 8 लाख 24 हजार 920 पुरुष व 7 लाख 75 हजार 106 महिला मतदाता थे। इनमें से 6 लाख 15 हजार 576 पुरुष व 5 लाख 70 हजार 91 महिला मतदाताओं ने मतदान किया। इस प्रकार जिले में रिकॉर्ड 74.10 प्रतिशत मतदान हुआ।
बात अगर हाल ही संपन्न हुए विधानसभा चुनाव की करें तो उसके आंकड़े इस प्रकार हैं:- अजमेर जिले में 11 लाख 85 हजार 667 मतदाताओं ने अपने मताधिकार का उपयोग किया। जिले में 16 लाख 26 मतदाता थे, जिनमें से 8 लाख 24 हजार 920 पुरूष व 7 लाख 75 हजार 106 महिला मतदाता थे। इनमें से 6 लाख 15 हजार 576 पुरूष व 5 लाख 70 हजार 91 महिला मतदाताओं ने मतदान किया। इस प्रकार जिले में रिकॉर्ड 74.10 प्रतिशत मतदान हुआ।
किशनगढ़ विधानसभा क्षेत्र में 2 लाख 23 हजार 420 में से 1 लाख 71 हजार 360 मतदाताओं यानि 76.70 प्रतिशत मतदाताओं ने मताधिकार का उपयोग किया।
पुष्क$र विधानसभा क्षेत्र में 1 लाख 94 हजार 398 में से 1 लाख 49 हजार 778 मतदाताओं यानि 77.05 प्रतिशत मतदाताओं ने मताधिकार का उपयोग किया। अजमेर उत्तर विधानसभा क्षेत्र में 1 लाख 78 हजार 427 में से 1 लाख 20 हजार 186 मतदाताओं यानि 67.36 प्रतिशत मतदाताओं ने मताधिकार का उपयोग किया। अजमेर दक्षिण विधानसभा क्षेत्र में 1 लाख 79 हजार 234 में से 1 लाख 21 हजार 911 मतदाताओं यानि 68.02 प्रतिशत मतदाताओं ने मताधिकार का उपयोग किया। नसीराबाद विधानसभा क्षेत्र में 1 लाख 85 हजार 343 में से 1 लाख 52 हजार 640 मतदाताओं यानि 82.36 प्रतिशत मतदाताओं ने मताधिकार का उपयोग किया। दूदू विधानसभा क्षेत्र में 1 लाख 99 हजार 70 में से 1 लाख 49 हजार 627 मतदाताओं यानि 75.16 प्रतिशत मतदाताओं ने मताधिकार का उपयोग किया। मसूदा विधानसभा क्षेत्र में 2 लाख 21 हजार 896 में से 1 लाख 67 हजार 103 मतदाताओं यानि 75.31 प्रतिशत मतदाताओं ने मताधिकार का उपयोग किया। केकड़ी विधानसभा क्षेत्र में 2 लाख 9 हजार 615 में से 1 लाख 58 हजार 453 मतदाताओं यानि 75.59 प्रतिशत मतदाताओं ने मताधिकार का उपयोग किया। विधानसभा वार मतदान प्रतिशत के अंतर की बात करें तो किशनगढ़ में मतदान प्रतिशत 4.07 गिरा है। पुष्कर में 4.98 प्रतिशत गिरा है। अजमेर उत्तर में 1.90 प्रतिशत गिरा है। अजमेर दक्षिण में .09 प्रतिशत बढ़ा है। नसीराबाद में 10.02 प्रतिशत गिरा है। दूदू में 8.79 प्रतिशत गिरा है। केकड़ी में 11.64 प्रतिशत गिरा है। मसूदा में 7.34 प्रतिशत गिरा है। अर्थात अजमेर शहर में मतदान प्रतिशत में बहुत ज्यादा विचलन नहीं हुआ है। इसका ये अर्थ निकाला जा सकता है कि कांग्रेस व भाजपा में मतांतर में ज्यादा फर्क नहीं आएगा। उधर केकड़ी में यह गिरावट उल्लेखनीय है।
-तेजवानी गिरधर

अजमेर संसदीय क्षेत्र में विधानसभा चुनाव के मुकाबले 5.66 प्रतिशत मतदान गिरा

अजमेर। अजमेर संसदीय क्षेत्र के आठों विधानसभा क्षेत्रों में मतदाताओं ने जमकर मतदान किया है। जिले में   68.64 प्रतिशत मतदान हुआ है। जिला निर्वाचन विभाग के अनुसार किशनगढ़ में 72.63, पुष्कर में 72.07,   नसीराबाद में   72.34,   दूदू में 66.37   तथा केकड़ी   63.95  में प्रतिशत मतदान हुआ है। इसी तरह मसूदा में  67.97,  अजमेर उत्तर  65.46 में एवं अजमेर दक्षिण में  68.11 प्रतिशत मतदान हुआ है।
जिले में पिछले लोकसभा चुनाव में 53.07 प्रतिशत मतदान हुआ था। इस बार मतदान के प्रतिशत में 15.57 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। यह उल्लेखनीय वृद्धि है, लेकिन जहां तक पिछले साल दिसम्बर में हुए विधानसभा चुनाव का सवाल है, उसकी तुलना में मतदान प्रतिशत 5.66 प्रतिशत कम हुआ है। विधानसभा चुनाव में रिकॉर्ड 74.10 प्रतिशत मतदान हुआ था।
आइये, जरा पिछले लोकसभा चुनाव में हुए मतदान के आंकड़े देखें:-
लोकसभा चुनाव 2009 में अजमेर संसदीय क्षेत्र में 7 लाख 70 हजार 875 मतदाताओं ने अपने मताधिकार का उपयोग किया, जिसमें 4 लाख 12 हजार 873 पुरूष व 3 लाख 58 हजार 2 महिलाएं थीं। मतदान का प्रतिशत 53.07 रहा, जिसमें पुरूषों का प्रतिशत 54.99 व महिलाओं का प्रतिशत 51.02 रहा। तब इस संसदीय क्षेत्र में 14 लाख 52 हजार 490 मतदाता थे, जिनमें 7 लाख 50 हजार 811 पुरूष व 7 लाख एक हजार 679 महिला मतदाता थे।
जिला निर्वाचन अधिकारी श्री राजेश यादव ने यह जानकारी देते हुए बताया कि अजमेर संसदीय क्षेत्र में सर्वाधिक 59.25 प्रतिशत मतदान नसीराबाद विधानसभा क्षेत्र में हुआ, जहां 97 हजार 507 मतदाताओं ने मतदान किया । यहां कुल मतदाता एक लाख 64 हजार 545 हैं।
अजमेर संसदीय क्षेत्र में सबसे कम 48.44 प्रतिशत मतदान अजमेर दक्षिण विधानसभा क्षेत्र में हुआ, जहां एक लाख 62 हजार 948 मतदाताओं में से 78 हजार 941 मतदाताओं ने मतदान किया।
दूदू विधानसभा क्षेत्र में 54.94 प्रतिशत मतदान हुआ। यहां एक लाख 84 हजार 239 मतदाताओं में से एक लाख एक हजार 231 मतदाताओं ने मतदान किया।
किशनगढ़ विधानसभा क्षेत्र में 50.13 प्रतिशत मतदान हुआ। यहां दो लाख 11 हजार 211 मतदाताओं में से एक लाख 5 हजार 897 मतदाताओं ने मतदान किया।
पुष्कर विधानसभा क्षेत्र में 56.03 प्रतिशत मतदान हुआ। यहां एक लाख 69 हजार 168 मतदाताओं में से 94 हजार 792 मतदाताओं ने मतदान किया।
अजमेर उत्तर विधानसभा क्षेत्र में 50.41 प्रतिशत मतदान हुआ। यहां एक लाख 65 हजार 433 मतदाताओं में से 83 हजार 403 मतदाताओं ने मताधिकार का उपयोग किया।
मसूदा विधानसभा क्षेत्र के 2 लाख 933 मतदाताओं में से एक लाख 10 हजार 630 मतदाताओं ने मतदान किया, जो 55.05 प्रतिशत रहा ।
केकड़ी विधानसभा क्षेत्र में 50.75 प्रतिशत मतदान हुआ। यहां एक लाख 94 हजार 13 मतदाताओं में से 98 हजार 474 मतदाताओं ने मतदान किया।
बात अगर हाल ही संपन्न हुए विधानसभा चुनाव की करें तो उसके आंकड़े इस प्रकार हैं:-
अजमेर जिले में 11 लाख 85 हजार 667 मतदाताओं ने अपने मताधिकार का उपयोग किया। जिले में 16 लाख 26 मतदाता थे, जिनमें से 8 लाख 24 हजार 920 पुरूष व 7 लाख 75 हजार 106 महिला मतदाता थे। इनमें से 6 लाख 15 हजार 576 पुरूष व 5 लाख 70 हजार 91 महिला मतदाताओं ने मतदान किया। जिले में रिकॉर्ड 74.10 प्रतिशत मतदान हुआ है।
किशनगढ़
किशनगढ़ विधानसभा क्षेत्र में 2 लाख 23 हजार 420 में से 1 लाख 71 हजार 360 मतदाताओं यानि 76.70 प्रतिशत मतदाताओं ने मताधिकार का उपयोग किया।
पुष्कर
पुष्क$र विधानसभा क्षेत्र में 1 लाख 94 हजार 398 में से 1 लाख 49 हजार 778 मतदाताओं यानि 77.05 प्रतिशत मतदाताओं ने मताधिकार का उपयोग किया।
अजमेर उत्तर
अजमेर उत्तर विधानसभा क्षेत्र में 1 लाख 78 हजार 427 में से 1 लाख 20 हजार 186 मतदाताओं यानि 67.36 प्रतिशत मतदाताओं ने मताधिकार का उपयोग किया।
अजमेर दक्षिण
अजमेर दक्षिण विधानसभा क्षेत्र में 1 लाख 79 हजार 234 में से 1 लाख 21 हजार 911 मतदाताओं यानि 68.02 प्रतिशत मतदाताओं ने मताधिकार का उपयोग किया।
नसीराबाद
नसीराबाद विधानसभा क्षेत्र में 1 लाख 85 हजार 343 में से 1 लाख 52 हजार 640 मतदाताओं यानि 82.36 प्रतिशत मतदाताओं ने मताधिकार का उपयोग किया।
दूदू
विधानसभा क्षेत्र में 1 लाख 99 हजार 70 में से 1 लाख 49 हजार 627 मतदाताओं यानि 75.16 प्रतिशत मतदाताओं ने मताधिकार का उपयोग किया।
मसूदा
मसूदा विधानसभा क्षेत्र में 2 लाख 21 हजार 896 में से 1 लाख 67 हजार 103 मतदाताओं यानि 75.31 प्रतिशत मतदाताओं ने मताधिकार का उपयोग किया।
केकड़ी
केकड़ी विधानसभा क्षेत्र में 2 लाख 9 हजार 615 में से 1 लाख 58 हजार 453 मतदाताओं यानि 75.59 प्रतिशत मतदाताओं ने मताधिकार का उपयोग किया।

बुधवार, 16 अप्रैल 2014

सचिन विकास, तो जाट मोदी के नाम पर मांग रहे हैं वोट

राज्य की पच्चीस में चंद प्रतिष्ठापूर्ण सीटों में से एक अजमेर संसदीय क्षेत्र का चुनावी रण बहुत ही दिलचस्प हो गया है। एक ओर जहां कांग्रेस प्रत्याशी सचिन पायलट, जो कि यहां के सांसद होने के साथ-साथ केन्द्रीय कंपनी मामलात राज्य मंत्री व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष हैं,  खुद के प्रयासों से कराए गए विकास कार्यों के नाम पर वोट मांग रहे हैं तो भाजपा प्रत्याशी प्रो. सांवर लाल जाट, जो कि जिले के नसीराबाद विधानसभा क्षेत्र के विधायक व राजस्थान सरकार में जलदाय मंत्री हैं, कांग्रेस सरकार को कोसते हुए मोदी लहर पर सवार हो कर जीत की उम्मीद पाले हुए हैं। मोदी लहर के चलते मोटे तौर पर यही मान कर चला जा रहा है कि जाट का पलड़ा भारी है, लेकिन सचिन इस दावे को कि उन्होंने अजमेर के विकास के लिए हरसंभव प्रयास किया, उस लहर को थामने की कोशिश के रूप में देख जा रहा है। उन्हें कामयाबी मिलती है या नहीं ये तो चुनाव परिणाम सामने आने पर पता लग पाएगा।
असल में विधानसभा चुनाव में संसदीय क्षेत्र की आठों सीटों पर जीत और भाजपा की कांग्रेस पर तकरीबन एक लाख नब्बे हजार से अधिक वोटों की बढ़त के कारण भाजपा का उत्साहित होना लाजिमी है। इसके अतिरिक्त राज्य में भाजपा की सरकार का भी उसे लाभ मिलेगा। संगठन तो मजबूत है ही, इस बार संघ की ओर से मोदी को प्रोजेक्ट किए जाने के कारण संघ के स्वयंसेवक भी कमर कस कर मैदान में डटे हुए हैं। भाजपा का इस सीट पर ज्यादा जोर देने की वजह ये है कि अगर उसे सफलता मिलती है तो उसे यह कहने का मौका मिल जाएगा कि प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष तक उनके सामने नहीं टिक पाए। कदाचित इसी वजह से मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे तीन सभाएं कर चुकी हैं। सच तो यह है कि प्रो. जाट चुनाव लडऩा ही नहीं चाहते थे, चूंकि वे राज्य में मंत्री रहते हुए खुश हैं, मगर वसुंधरा के दबाव ने उन्हें चुनाव मैदान में उतरने को मजबूर कर दिया। इसी वजह से चुनावी जुगाली में यह सुनने में आता है कि जाट के प्रमुख सिपहसालार चाहते हैं कि वे मंत्री ही बने रहें, ताकि उनका कल्याण होता रहे।
उधर कांग्रेस को उम्मीद है कि भाजपा के पूर्व सांसद प्रो. रासासिंह रावत के पांच बार के कार्यकाल के उपलब्धि शून्य होने की तुलना में सचिन की उल्लेखनीय उपलब्धियों को जनता तवज्जो देगी। वे हवाई अड्डे के निर्माण का रास्ता साफ कर उसका शिलान्यास करवाने, केन्द्रीय विश्वविद्याल की स्थापना, कई नई ट्रेनें शुरू करवाने, दो सौ करोड़ की पेयजल परियोजनाएं शुरू करवाने,  देश के पहले स्मल फ्री सिटी के रूप में अजमेर का चयन करवा कर तीन हजार करोड़ की योजना शुरू करवाने, ढ़ाई सौ से ज्यादा स्कूलों में कंप्यूटर लैब शुरू करवाने, साठ करोड़ की लागत से राज्य का पहला ई-लर्निंग संस्थान स्थापित करवाने, मेगा हैल्थ कैंप के जरिए सत्तर हजार लोगों को लाभान्वित करवाने सहित विभिन्न समाजों के देवी-देवताओं के डाक टिकट जारी करवाने आदि को गिनवा रहे हैं। यहां यह बताना प्रासंगिक ही होगा कि आजादी के बाद सचिन के रूप में अजमेर को पहली बार केन्द्रीय मंत्रीमंडल में प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला था।
सचिन के सेलिब्रिटी होने की वजह से आम जनता के बीच सहज सुलभता न होना उनका नकारात्मक पहलू माना जाता है तो कांग्रेस विरोधी लहर में भी सचिन की उपलब्धियां उन्हें मैदान में मजबूती प्रदान कर रही है। बात अगर संगठन की करें तो हालत कुछ अच्छी नहीं है, मगर चूंकि सचिन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष हैं, इस कारण दूसरे दर्जे के नेता एकजुट हो गए हैं। इसके अतिरिक्त आगामी नगर निगम चुनाव के मद्देनजर भी छोटे नेता अपनी परफोरमेंस दिखाने को मजबूर हैं। हां, अलबत्ता कांग्रेस में अपना भविष्य नहीं देख कर अजमेर डेयरी अध्यक्ष रामचंद्र चौधरी व पूर्व विधायक बाबूलाल सिंगारियां ने जरूर किनारा कर जाट का साथ दे दिया है। इसी प्रकार नगर सुधार न्यास के पूर्व अध्यक्ष नरेन शहाणी ने लैंड फोर लैंड मामले में उलझने की वजह से सरकार की तलवार लटकती देख कांग्रेस को तिलांजली दे दी है। बात अगर साधन संपन्नता की करें तो दोनों प्रत्याशी काफी तगड़े हैं। धरातल पर हो रही चुनाव प्रचार की गतिविधियां भी इसका साफ इशारा कर रही हैं।
जातीय समीकरण
जहां तक जातीय समीकरण का सवाल है कांग्रेस को सबसे बड़ा संबल है साढ़े तीन-चार लाख अनुसूचित जाति वोटों का। दूसरा बड़ा वोट बैंक है मुसलमानों का, जो कि करीब डेढ़ लाख हैं। इसके अतिरिक्त सचिन के स्वजातीय गुर्जर वोट करीब डेढ़-पौने दो लाख हैं। दूसरी ओर भाजपा की सबसे बड़ी ताकत हैं प्रो. जाट के स्वजातीय दो-ढ़ाई लाख वोट। इसके अतिरिक्त तकरीबन दो लाख वैश्य व एक लाख सिंधी परंपरागत रूप से भाजपा के साथ माने जाते हैं। बात अगर एक लाख राजपूत व सवा लाख रावतों की करें तो हैं तो वे परंपरागत रूप से भाजपा के साथ, मगर इस बार समीकरण कुछ गड़बड़ा सकता है। इसकी एक वजह है जैसलमेर-बाड़मेर में दिग्गज राजपूत नेता पूर्व विदेश मंत्री जसवंत सिंह की बगावत और दूसरा  स्वयं भाजपा प्रत्याशी का जाट होना। केकड़ी इलाके के राजपूत नेता भूपेन्द्र सिंह शक्तावत के कांग्रेस में आ जाने का भी भाजपा को कुछ तो नुकसान होगा ही। इसी प्रकार सचिन ने अपने कुछ प्रयासों से रावतों में भी सेंध मारी है। कयास है कि पूर्व सांसद प्रो. रासासिंह रावत को टिकट न दिए जाने से रावतों का उत्साह कुछ कम हुआ है। सचिन कुछ सिंधी वोट इस बिना पर हासिल करने की कोशिश में हैं कि उन्होंने विधानसभा चुनाव में अजमेर उत्तर में किसी सिंधी को टिकट देने की पैरवी की थी।
जातीय लिहाज से इस चुनाव पर पूर्व कांग्रेस विधायक बाबूलाल सिंगारियां के भाजपा में चले जाने का असर रहेगा। उनकी केकड़ी विधानसभा क्षेत्र के सजातीय व मुसलमानों पर पकड़ है, जिनके दम पर विधानसभा चुनाव में उन्होंने लगभग 17 हजार वोट हासिल किए थे। इसी प्रकार अजमेर डेयरी अध्यक्ष रामचंद्र चौधरी का जाट को समर्थन हासिल होने का भाजपा को फायदा होगा। डेयरी अध्यक्ष होने के कारण उनकी कुछ गुर्जर मतों पर भी पकड़ है, मगर देखना ये होगा कि क्या वे सचिन के मैदान में होते हुए सेंध मार पाते हैं या नहीं। तकरीबन तेईस हजार वोटों से अजमेर दक्षिण की सुरक्षित सीट पर कब्जा बरकरार रखने वाली श्रीमती अनिता भदेल कांग्रेस के वोट बैंक पर सेंध मारने की स्थिति में हैं। मगर सिक्के का दूसरा पहलू ये है कि उनकी जीत में अनुसूचित जातियों से कहीं अधिक सिंधियों की अहम भूमिका रही है। उन्हें कांग्रेस प्रत्याशी हेमंत भाटी को स्थापित होने से रोकने वाले कांग्रेस के अनुसूचित जाति के कुछ नेताओं का भी साथ मिला था, मगर अब चूंकि सचिन मैदान में हैं, इस कारण उनका भितरघात करना कुछ मुश्किल हो गया है।
मानसिक स्थिति
सचिन भारी मानसिक दबाव में हैं, क्योंकि उन पर प्रदेश कांग्रेस का भार है। जीतने पर प्रदेश कांग्रेस पर पकड़ मजबूत होगी व राहुल गांधी का और विश्वास हासिल होगा। और हारने पर पूरी कांग्रेस हारी हुई मानी जाएगी। हांलाकि बावजूद इसके वे प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बने रहेंगे, क्योंकि कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने उन्हें जर्जर हो चुकी कांग्रेस का जीर्णोद्धार करने ही भेजा है। बात अगर प्रो. जाट की करें तो उन पर कोई खास मानसिक दबाव नहीं दिखता, क्योंकि हार जाने पर भी मंत्री पद तो कायम रहेगा ही। इसी वजह से कुछ लोग यह कहने से नहीं चूकते कि जाट की जीतने में रुचि ही नहीं है।  हालांकि इसका दूसरा पहलू ये है कि जीतने पर राष्ट्रीय राजनीति में एक बड़े जाट नेता के रूप में कदम बढ़ा सकते हैं। इसके अतिरिक्त भाजपा की अकेले अपने दम पर सरकार बनी तो कदाचित मंत्री बनने का भी मौका मिल सकता है।
साइड इफैक्ट
इस चुनाव के परिणाम के अपने साइड इफैक्ट भी होंगे। जाट के जीतने पर मंत्री पद खाली होगा और उस पर अजमेर उत्तर के प्रो. वासुदेव देवनानी को बैठाया जा सकता है। मगर इसके लिए उन पर अन्य विधायकों की तुलना में मतांतर अधिक रखने का दबाव बना हुआ है। अन्य भाजपा विधायकों पर भी इसी प्रकार का दबाव है, जो कि राज्य मंत्री बनने का रास्ता प्रशस्त करेगा।
-तेजवानी गिरधर

मंगलवार, 15 अप्रैल 2014

खुद के बचाव के लिए लिया देथा ने लिया गूगरवाल का पक्ष?

शहर कांग्रेस कमेटी ने भाजपा प्रत्याशी सांवर लाल जाट के स्वजातीय अधिकारी जिला परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी लालाराम गूगरवाल पर दरगाह इलाके में आरएसएस मानसिकता के कर्मचारी लगाने का आरोप लगा कर उन्हें चुनाव कार्य से मुक्त करने की कांग्रेस की मांग को जिला निर्वाचन अधिकारी भवानी सिंह देथा ने भले ही दमदार तर्क दे कर खारिज कर दिया, लेकिन चुनाव आयोग ने किसी भी संभावित विवाद से बचने के लिए गूगरवाल को हटाना ही बेहतर समझा।
बेशक देथा के तर्क में दम था कि रेंडम सिस्टम के जरिए यह पता ही नहीं लग पाता कि कौन से कर्मचारी की ड्यूटी कहां पर लगी है। कर्मचारी को खुद भी मतदान दल की रवानगी वाले दिन पता चलता है, उसे कौन से स्थान पर जाना है, मगर अजमेर लोकसभा क्षेत्र की केंद्रीय चुनाव पर्यवेक्षक बसु इंगति को कहीं न कहीं गड़बड़ लगी, जिसकी उन्होंने आयोग को रिपोर्ट भेज दी, भले ही मीडिया को शेयर नहीं किया। ऐसा प्रतीत होता है कि देथा ने गूगरवाल के विरुद्ध की गई शिकायत को यह मान कर अपने ऊपर ले लिया कि भला उनकी देखरेख में नीचे गड़बड़ कैसे चल रही है। इस चक्कर में वे गूगरवाल का पक्ष ले बैठे। ऐसे में चुनाव पर्यवेक्षक बसु इंगति ने उनसे सीधा टकराव लेने की बजाय आयोग से दिशा-निर्देश मांग लिए। और आयोग ने सख्ती दिखाते हुए देथा के तर्क को दरकिनार करते हुए राज्य निर्वाचन आयोग के मुख्य चुनाव अधिकारी अशोक जैन को निर्देश दे दिए, जिसकी पालना में देथा को गूगरवाल को हटाना पड़ गया। इस पूरे घटनाक्रम में यह स्पष्ट है कि चुनाव पर्यवेक्षक बसु इंगति ने आगे चल कर कोई बड़ा विवाद होने से बचने के लिए रिपोर्ट भेजी होगी। आखिर उन्हें भी तो अपनी खाल बचानी थी। उनकी रिपोर्ट पर हुई कार्यवाही से जहां देथा की किरकिरी हुई है, वहीं एक नजर में इससे कांग्रेस के आरोप की कहीं न कहीं पुष्टि होती है। संभव है उनके पास आरोप संबंधी तथ्य रहे होंगे।

चुनाव आयोग के निर्देश अव्यावहारिक व अस्पष्ट

चुनाव आयोग के निर्देश पर जिला निर्वाचन अधिकारी भवानी सिंह देथा ने यह तो व्यवस्था दे दी कि चुनाव प्रचार समाप्त होने के बाद मतदाता या अभ्यर्थी के अलावा कोई भी राजनीतिक व्यक्ति निर्वाचन क्षेत्र में नहीं रह सकता, मगर यह अस्पष्ट ही है। निर्देश में कहीं भी ये स्पष्ट नहीं है कि राजनीतिक व्यक्ति माने कौन? आयोग किसे राजनीतिक व्यक्ति मान रहा है, राजनीतिक दल के पदाधिकारी सहित सभी जनप्रतिनिधियों को अथवा केवल जनप्रतिनिधि यथा निगम मेयर, नगर परिषद सभापति, जिला प्रमुख, प्रधान, सरपंच, विधायक व सांसद आदि को?
असल में आयोग का यह निर्देश पालना के लिहाज से भी अव्यावहारिक है। एक ओर जहां चुनाव कार्य के लिए बड़े पैमाने पर विभिन्न विभागों के अधिकारियों व कर्मचारियों को लगाया जा चुका है, ऐसे में भला जिले के सभी सामुदायिक केन्द्र, धर्मशाला, गेस्ट हाउस, लॉज, होटल आदि में ठहरने वाले व्यक्तियों की जानकारी तथा बाहर से आने वाले वाहनों पर निगरानी की व्यवस्था करना कैसे संभव हो पााएगा? माना कि जिला निर्वाचन अधिकारी ने निर्देश की पालना करने की बात कही है, मगर प्रतीत यही होता है कि किसी बाहरी राजनीतिक व्यक्ति के यहां होने की जानकारी शिकायत होने पर ही मिल पाएगी। यदि कोई नेता किसी के घर पर है तो उसका पता सरकारी मशीनरी को कैसे मिल पाएगा? निर्देश की अव्यवहारिकता का एक पहलु ये भी है कि क्या कोई राजनेता अपने निर्वाचन क्षेत्र से बाहर अपने निजी काम से भी नहीं रुक पाएगा क्या? और यह भी कैसे सत्यापित हो पाएगा कि वह निजी काम से आया है या फिर कोई राजनीतिक गतिविधि कर रहा है?
निर्देश में यह भी लिखा है कि मतदान से 48 घंटे पूर्व की अवधि में अनेक गतिविधियों पर प्रतिबन्ध लगाया गया है, जिनका उल्लंघन करना दण्डनीय अपराध होगा, मगर यह स्पष्ट नहीं है कि दंड किस प्रकार का होगा।
निर्देश में यह भी लिखा है कि चुनाव प्रचार समाप्त होने के बाद टेलिविजन, रेडियो, ऐसे ही अन्य किसी उपकरण या इलेक्ट्रोनिक मीडिया के माध्यम से चुनाव प्रचार करने, एस.एम.एस. या मोबाइल फोन के जरिये चुनाव प्रचार-प्रसार करने पर पाबन्दी रहेगी, मगर यह वाकई संभव हो पाएगा, इसमें संशय ही है। सवाल उठता है कि क्या राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक दलों की ओर से टीवी पर जारी हो रहे वोट अपील के विज्ञापन रोके जा सकेंगे, जबकि चुनाव के एकाधिक चरण अभी बाकी हैं? निर्देश में यह स्पष्ट नहीं है कि क्या चुनाव प्रचार समाप्त होने के बाद 16 व 17 तरीख को छपने वाले अखबारों में विज्ञापन प्रतिबंधित रहेंगे?
-तेजवानी गिरधर