मंगलवार, 22 जुलाई 2014

जलदाय मंत्री सांवरलाल जाट को उलझा दिया वसुंधरा ने

जलदाय मंत्री रहते प्रो. सांवरलाल जाट को लोकसभा का चुनाव लड़ाते वक्त ही भले ही यह माना गया कि हर कीमत पर मिशन पच्चीस हासिल करने के लिए मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे ने ये कदम उठाया है, मगर तभी ये आशंका थी और सवाल था कि जाट का क्या होगा? हार जाने पर मंत्री बनाए रखा जाता या नहीं ये सवाल तो अब बेमानी हो गया है क्योंकि वे जीत गए, मगर जीतने के बाद क्या उन्हें केन्द्र में भी मंत्री बनवा पाएंगी या फिर एक अदद सांसद रहने को मजबूर कर देंगी, यह सवाल अब भी कायम है। इतना ही नहीं, अब तो हालत ये है कि अकेले उन्हीं को निशाने पर ले कर सरकार के अस्तित्व पर सवाल उठाए जाने लगे हैं। इसकी वजह से अजमेर के साथ जो अन्याय हुआ है, वो तो सबके सामने है ही। न वे ठीक से मंत्री पद की भूमिका निभा पा रहे हैं और न ही सांसद के नाते केन्द्र में कुछ कर पा रहे हैं।
बेशक विधानसभा अध्यक्ष कैलाश मेघवाल ने अपनी व्यवस्था दे कर कांग्रेस की आपत्ति को नकार दिया है, मगर कानूनविदों व जनता में यह विषय चर्चा का विषय बना हुआ है। ज्ञातव्य है कि कांग्रेस ने विधानसभा में यह तर्क दे कर हंगामा किया था कि सरकार अस्तित्व में ही नहीं है। ऐसे सदन की कार्यवाही कैसे चल सकती है क्योंकि 8 दिसंबर को चुनाव के नतीजे आने के बाद 13 दिसंबर को मुख्यमंत्री ने और 20 दिसंबर को सभी मंत्रियों के साथ सांवर लाल जाट ने मंत्री पद की शपथ ली। नियमों के अनुसार तब तक उन्होंने सदन में विधायक की शपथ नहीं ली थी, ऐसे में वे विधायक नहीं थे। यानी वे गैर विधायक मंत्री बने थे। संविधान की धारा 164 (4) के तहत बिना विधायक कोई भी व्यक्ति मंत्री रह सकता है, लेकिन 6 माह तक के लिए है। जाट मंत्री बनने के समय विधायक नहीं थे, लेकिन 21 जनवरी को उन्होंने शपथ ले ली। यानी 6 माह के अंदर विधायक बन गए। वे लगातार मंत्री रह सकते थे, लेकिन उन्होंने 29 मई को ही विधायक पद से इस्तीफा दे दिया। ऐसे में अब भी वे गैर विधायक मंत्री हैं। जबकि उनके गैर विधायक मंत्री बनने के छह महीने 20 जून को ही पूरे हो गए। ऐसे में उनके मंत्री पद की संवैधानिक स्थितियां 20 जून को ही समाप्त हो गईं। इसका अर्थ यह है कि इस समय राज्य मंत्रिमंडल में केवल 11 मंत्री हैं। जबकि संविधान की 164-(1 ए) के तहत 12 मंत्रियों से कम मंत्री नहीं हो सकते। चूंकि जाट 20 जून से मंत्री नहीं हैं, ऐसे में यह स्थिति संविधान का उल्लंघन है। इस पर अध्यक्ष कैलाश मेघवाल ने उनके तर्क को नकार दिया।
अब चूंकि विधानसभा अध्यक्ष व्यवस्था दे चुके हैं कि सरकार अस्तित्व में है, इस कारण मामला तकनीकी रूप से समाप्त हो गया है, बावजूद इसके कांग्र्रेस इस मुद्दे को लगातार गरमाये हुए है। न्यूज चैनल्स पर भी इसको लेकर बहस जारी है कि क्या सरकार वैधानिक संकट में है? इन बहसों से भले ही सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ रहा हो, मगर उसकी किरकिरी तो हो ही रही है। ये सवाल उठाए जाने लगे हैं कि वसुंधरा ने जाट को क्यों अटका रखा हैïï? या तो उन्हें हटा कर किसी और को मंत्री बना दिया जाए ताकि संवैधानिक सवाल उठे ही नहीं, या फिर मंत्री बनाए रखना है तो सांसद पद से इस्तीफा दिलवाएं। दोनों में से कुछ तो करें, मगर अज्ञात कारणों से इस पर निर्णय नहीं कर पा रही हैं।
एक संभावना ये है कि केन्द्र में राज्य मंत्री बनाए जाने की मांग पूरी होने तक वे उन्हें यहां मंत्री बनाए रखना चाहती हैं। या फिर महज इसी कारण मामला अटका हुआ है कि किसी वजह से मंत्रीमंडल विस्तार हो नहीं पा रहा और इसी वजह से जाट लटके हुए हैं। जो कुछ भी हो मगर कांग्रेस को तो बैठे ठाले मुद्दा मिला हुआ है ही। रहा सवाल जाट का तो उनकी स्थिति भी त्रिशंकु जैसी है। उन्हें ये पता ही नहीं कि उनकी क्षमता का उपयोग राज्य में किया जाएगा या फिर केवल सांसद बने रह कर जनता की सेवा करनी होगी। या फिर केन्द्र में मंत्री बनने का कोई चांस है। जाहिर तौर पर उनकी इस असमंजस का खामियाजा जनता को भुगतना पड़ रहा है। वे न तो एक मंत्री के रूप में ठीक से काम कर पा रहे हैं और न ही एक सांसद के नाते स्थानीय मुद्दे केन्द्र में उठा पा रहे हैं।
निजी तौर पर जाट के लिए तब यह घाटे का सौदा होगा, यदि उन्हें वसुंधरा केन्द्र में मंत्री नहीं बनवा पातीं हैं। वे भले चंगे केबीनेट मंत्री पद का रुतबा लिए हुए थे, मगर पार्टी की खातिर या किसी अज्ञात चाल के कारण एक अदद सांसद ही बन कर रह गए। आज तक इस बात का खुलासा नहीं हुआ है कि वसुंधरा ने आखिर क्या मंत्र मार कर या आश्वासन दे कर जाट को लोकसभा का चुनाव लडऩे के लिए राजी किया, जबकि खुद उनकी इच्छा नहीं थी।
-तेजवानी गिरधर

शनिवार, 19 जुलाई 2014

स्थाई न्यूरो सर्जन की व्यवस्था आठों भाजपा विधायकों के लिए चुनौती

कथित नाकामियों की वजह से सत्ताच्युत हुई कांग्रेस के पास तो कोई समाधान नहीं था, सुराज और अच्छे दिन के वादे करके सत्ता में आई भाजपा भी अजमेर में न्यूरो सर्जरी सुविधा के मामले में हाथ खड़े किए हुए है। बीमारी की वजह से लंबे समय से छुट्टी पर चल रहे जवाहर लाल नेहरू अस्पताल के न्यूरो सर्जरी विभाग के अध्यक्ष डॉ. बी. एस. दत्ता की गैर मौजूदगी में आखिर अस्पताल प्रशासन को न्यूरो सर्जरी वार्ड को ताले ही लगाने पड़ गए। भाजपा विदेश से आयातित हाईटैक चुनाव प्रचार के दम पर सत्ता पर तो काबिज हो गई, मगर सुपर स्पेशलिस्ट सेवाओं के मामले में अजमेर संभाग का सबसे बड़ा अस्पताल बीमार पड़ा है, इससे शर्मनाक बात कोई हो नहीं सकती।
हालत ये है कि डॉ. दत्ता की अनुपस्थिति में गंभीर मरीजों को भर्ती नहीं किया जा रहा है और यहां आने वाले अधिकतर रोगियों को जयपुर रैफर किया जा रहा है। इसमें कोई दोराय नहीं कि डॉ. दत्ता ने नौकरी को कभी नौकरी की तरह नहीं करके सदैव उसे सेवा के ही रूप में लिया, जिसकी वजह से बीमार होते हुए भी मरीजों के ऑपरेशन किए। मगर अब जब कि वे छुट्टी पर चले गए हैं तो नए मरीजों को भर्ती करना संभव नहीं रहा। ये तो चलो डॉ. दत्ता अब बीमार चल रहे हैं, मगर जिन दिनों तंदरुस्त थे, तब उनकी बदमिजाजी से प्रशासन से टकराव होता था। बेशक वे मरीजों के लिए भगवान की तरह ही हैं, मगर उनके काम को जो तरीका था, उसकी वजह से एक बार तत्कालीन तेजतर्रार जिला कलेक्टर राजेश यादव तक से भिड़ंत हो गई। दो इलैक्ट्रॉनिक मीडिया रिपोर्टस के मामले में सीधा तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का दखल था, मगर यहां से रुखसत करने की चेतावनी दे कर भी जिला कलेक्टर डॉ. दत्ता का बाल भी बांका नहीं कर पाए। स्पष्ट है कि सरकार के पास अजमेर न्यूरो सर्जन के रूप में डॉ. दत्ता का विकल्प तब भी नहीं था। माना कि सरकार की अपनी मजबूरियां हैं कि अच्छे न्यूरो सर्जन उसके पास नहीं हैं, मगर इसका अर्थ ये तो नहीं कि न्यूरो सर्जरी की सेवाओं के लिए भारी राशि से खोला न्यूरो सर्जरी विभाग बंद होने के कगार पर आ जाना चाहिए। और मरीज दर दर की ठोकरें खाने को मजबूर हो जाने चाहिए। यदि सरकार को वाकई मरीजों की चिंता है तो उसे चाहे अधिक पैकेज पर ही सही, न्यूरो सर्जन की व्यवस्था करनी ही चाहिए। सबसे बड़े संभागीय अस्पताल में न्यूरो सर्जन का अभाव जिले के सभी आठों भाजपा विधायकों सहित संभाग के सभी विधायकों के लिए एक चुनौती है। जनता की सेवा के नाम पर जीत कर आए ये विधायक देखते हैं कि जनसेवा के लिए सरकार पर दबाव बना कर समस्या का समाधान करवा पाते हैं या नहीं। हालांकि मेडिकल कॉलेज प्राचार्य डॉ. अशोक चौधरी ने अर्जेंट टेम्प्रेरी बेस पर एक सहायक प्रोफेसर को नियुक्त करने के निर्देश दिए हैं और उम्मीद है कि जल्द नियुक्ति भी हो जाए, मगर विधायकों को चाहिए वे सरकार पर दबाव बना कर स्थाई नियुक्ति के लिए प्रयास करें।

गोरान निर्दोष थे तो एफआईआर में जिक्र ही काहे को किया

इसे एसीबी की बेवकूफी या अतिरिक्त चतुराई ही कहा जाएगा कि जब पुलिस थानों से मंथली लेने के मामले में गिरफ्तार अजमेर के पूर्व एसपी राजेश मीणा के प्रकरण से राजस्थान लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष हबीब खान गोरान का कोई लेना-देना ही नहीं था तो उनका जिक्र एफआईआर में किया ही क्यों? यही वजह है कि आज जब कि आयोग विभिन्न कारणों से विवादों में आ गया है और गौरान पर हमले हो रहे हैं तो इस प्रकरण को विधानसभा में भी उठाया जा रहा है। 
असल में एफआईआर में ठठेरा के गोरान के घर भी जाने के जिक्र की वजह से ही निलंबित एसपी मीणा की ओर से पेश जमानत याचिका में यह सवाल उठाने उठाने का मौका मिल गया कि उनको भी नामजद क्यों नहीं किया गया। एसीबी की कार्यवाही कितनी गोपनीयता कितनी लचर थी, इसका अंदाजा इसी बात से लग जाता है कि जैसे ही मीण को गिरफ्तार किया गया तो यह बात भी उजागर हुई कि दलाल ठठेरा आयोग के किसी बड़े अधिकारी के घर भी गया था, तभी उसका नाम उजागर करने के लिए आयोग के समक्ष प्रदर्शन किया गया।
बेशक, इस पूरे प्रकरण में सचमुच क्या हुआ, इसके लिए एसीबी पर ही यकीन करना होगा क्योंकि जांच एजेंसी वही है, मगर एसीबी के कार्यवाहक महानिदेशक अजीत सिंह का मात्र इतनी सफाई देना ही पर्याप्त नहीं कि गोरान की इस मामले में संलिप्तता नहीं पाई गई और उनके खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला। कैसी विडंबना है कि पहले खुद ही गोरान का नाम एफआईआर में शामिल किया और फिर खुद की खंडन कर दिया कि उनके बारे में कोई सबूत नहीं मिला है। वो भी तब जब निलंबित एसपी मीणा ने अपनी जमानत अर्जी में सवाल उठाया था। वरना यह पता ही नहीं लगता कि एसीबी ने कहां चूक की है।
जब अजीत सिंह ने यह कहा था कि गोरान बिलकुल निर्दोष हैं तो उन्हें यह भी बताना होगा कि आखिर किस तरह? आयोग अध्यक्ष का पद संवैधानिक है और आयोग की बड़ी गरिमा है, उसके बारे में यदि कोई संशय पैदा होता है तो उस पर सफाई होना बेहद जरूरी है। सिंह को यह बताना ही चाहिए कि ठठेरा ने गोरान के घर पर जाने का क्या कारण बताया है? फरार आरपीएस लोकेश सोनवाल के घर से निकलते समय जो बैग लेकर वह गोरान के घर गया और बाहर निकला तो बैग उसके हाथ में नहीं था, उस बैग में क्या था? सिंह को ये भी बताना चाहिए कि क्या उन्होंने इस बारे में गोरान से भी कोई पूछताछ की थी? यदि पूछताछ की थी तो उन्होंने ठठेरा के आने की क्या वजह बताई? अगर वे ऐसा नहीं करते तो आयोग अध्यक्ष गोरान व्यर्थ ही संदेह से देखे जाते रहेंगे।
-तेजवानी गिरधर

रविवार, 13 जुलाई 2014

लखावत के प्रयास रंग लाए, सवा सौ साल पुराना विवादित ब्रिज हटाया

राजस्थान धरोहर एवं प्रोन्नति प्राधिकरण के अध्यक्ष ओंकार सिंह लखावत के प्रयासों ने अपना रंग दिखाया और आखिरकार रेलवे के इंजीनियरों को सहमत करके बूढ़ा पुष्कर सरोवर के बीच रेलवे का करीब सवा सौ साल पुराना विवादास्पद ब्रिज को जेसीबी मशीन की सहायता से ध्वस्त कर दिया गया। अपने आप में यह एक बड़ी उपलब्धि मानी जाएगी। और यह भी तभी संभव हो पाया, जब केन्द्र व राज्य में एक ही पार्टी भाजपा की सरकार है, साथ ही लखावत ने प्राधिकरण अध्यक्ष के नाते पूरी ताकत लगा दी।
असल में बूढ़ा पुष्कर के कायाकल्प में अंग्रेजों के जमाने में बना यह ब्रिज आड़े आ रहा था। सरोवर के तट पर स्थित पंपिंग स्टेशन से सरोवर के बीच में ब्रिज बना हुआ था। रेलवे लंबे समय तक बूढ़ा पुष्कर से लाखों गैलन पानी लेता था। सरोवर का भूमिगत जलस्तर खत्म होने के बाद से रेलवे का ब्रिज अनुपयोगी हो गया था। मगर सब जानते हैं कि एक बार कब्जा होने के बाद उसे कोई नहीं छोडऩा नहीं चाहता, चाहे सरकारी महकमा हो। इस मामले में भी असल में कोई अफसर न तो पहल करना चाहता था और न ही पंगा मोल लेना चाहता था। उसकी बला से तो ब्रिज सौ दो सौ साल वहीं पड़ा रहे। अगर लखावत रुचि न लें तो ये ऐसा ही पड़ा रहता।
ज्ञातव्य है कि प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के साथ ही फिर से बूढ़ा पुष्कर के विकास की कवायद तेज हो गई है। हालांकि इसका जीर्णोद्धार तो लखावत ने पिछली भाजपा सरकार के दौरान ही प्राधिकरण के अध्यक्ष रहते करवाया था, मगर सरकार पलटने के साथ ही यह रुक गया। असल में प्राधिकरण ही ठंडे बस्ते में चला गया था। अब लखावत ने फिर काबिज होने पर बूढ़ा पुष्कर के समग्र विकास के लिए विस्तृत मास्टर प्लान तैयार करवाने की ठानी है और इसी के अनुरूप ही समयबद्ध विकास कराया जाएगा।
लखावत ने इस सिलसिले में मौके पर ही बूढ़ा पुष्कर विकास एवं समारोह समिति की बैठक ली। सामाजिक कार्यकर्ताओं, संत-महात्माओं एवं विभिन्न विभागों के प्रतिनिधियों ने बूढ़ा पुष्कर के विकास के संबंध में आवश्यक सुझाव प्रस्ताव रखे। लखावत ने संबंधित विभागों सामाजिक संस्थाओं को अलग-अलग दायित्व सौंपा। वन विभाग समेत घाट निर्माता समाजों के प्रतिनिधियों को घाटों के किनारे पौधरोपण करने की जिम्मेदारी सौंपी गई। नेशनल हाईवे के इंजीनियरों को हाईवे निर्माण के दौरान बूढ़ा पुष्कर सरोवर में बरसाती पानी की आवक के लिए पुलिया निर्माण करने तथा अवरोधक हटाने के निर्देश दिए। नगर पालिका के ईओ प्रहलाद स्वरूप भार्गव को तीर्थ यात्रियों की सुविधार्थ सुलभ कॉम्पलेक्स बनाने, स्थायी सफाई कर्मचारी नियुक्त करने के निर्देश दिए। बूढ़ा पुष्कर, गया कुंड, मध्य पुष्कर सरोवर का सीमाज्ञान कराने के निर्देश दिए। ज्ञातव्य है कि इन तीनों तीर्थ स्थलों को हाल ही में नगर पालिका बोर्ड ने पालिका सीमा में शामिल करने का प्रस्ताव पारित किया है। बैठक में घाटों की सुरक्षा के लिए दीवार भव्य प्रवेश द्वार बनाने की जिम्मेदारी एडीए को सौंपी गई। नंद किशोर पाराशर ने बूढ़ा पुष्कर में 108 फीट ऊंची भगवान शिव की प्रतिमा का निर्माण कराने का प्रस्ताव रखा, जिसे लखावत ने मंजूरी देते हुए माहेश्वरी सेवा सदन के अध्यक्ष श्याम सुंदर बिड़ला के संयोजन में एक कमेटी गठित की।
बैठक में विधायक त्रय सुरेश सिंह रावत, अनिता भदेल व भागीरथ चौधरी, नगर पालिकाध्यक्ष मंजू कुर्डिया, कपालेश्वर मंदिर के महंत सेवानंद गिरी, रामसखा आश्रम के महंत रामशरण दास महाराज, उपखंड अधिकारी राष्ट्रदीप यादव, तहसीलदार गजराज सिंह सोलंकी, भाजपा नेता कंवल प्रकाश किशनानी, पार्षद संपत सांखला, पूर्व पालिकाध्यक्ष सूरज नारायण शर्मा, नगर सुधार न्यास के पूर्व अध्यक्ष नरेन शाहनी भगत के अतिरिक्त एडीए, नेशनल हाईवे, सार्वजनिक निर्माण, वन, जलदाय, पर्यटन सहित विभिन्न विभागों के अधिकारी इंजीनियर उपस्थित थे।
-तेजवानी गिरधर

पहले भी विवादित चर्चा में आ गए थे गौरान

अब जब कि आरएएस प्री 2013 परीक्षा में पेपर लीक और परीक्षा निरस्त करने संबंधी मामलों को लेकर खफा एबीवीपी के कार्यकर्ताओं ने आयोग अध्यक्ष हबीब खान गौरान से नैतिकता के आधार पर इस्तीफा देने और उनके कार्यकाल की उच्च स्तरीय जांच की मांग की है, तो यकायक वह प्रकरण भी चर्चा में आ गया है, जबकि उनके नाम को मंथली मामले में गिरफ्तार अजमेर के तत्कालीन एसपी राजेश मीणा ने उजागर किया था। बात ये सामने आई कि दलाल रामदेव ठठेरा उनके पास थैला लेकर गया था। यह सवाल तब उठा था कि मीणा की गिरफ्तारी को दस दिन बीत जाने के बाद भी एसीबी ने यह तथ्य क्यों उजागर नहीं किया कि ठठेरा थैला लेकर आखिर राजस्थान लोक सेवा आयोग के किस उच्चाधिकारी के घर पर कुछ वक्त रुका था? उसने वहां क्या किया? क्या वहां आयोग से जुड़े किसी मसले की दलाली की गई? या फिर वह यूं ही मिलने चला गया, क्योंकि वह उनका पूर्व परिचित था? जाहिर सी बात है कि हर किसी को यह जानने की जिज्ञासा थी कि आखिर वह उच्चाधिकारी कौन है और दलाल ने उसके घर पर जा कर क्या किया? इस बारे में मीडिया ने खबरों के फॉलो अप में उसका जिक्र तो कई बार किया है, मगर अपनी ओर से नाम उजागर करने से बचा, क्योंकि बिना सबूत के संवैधानिक पद पर बैठे उच्चाधिकारी का नाम घसीटना दिक्कत कर सकता था। यहां तक कि मीडिया ने इशारा तक नहीं किया, जबकि ऐसे मामलों में अमूमन वह इशारा तो कर ही देता है, भले ही नाम उजागर न करे।
अपुन ने तभी इस कॉलम में लिख दिया था कि इस मामले की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों को अच्छी तरह से पता है कि आखिर वह अधिकारी कौन है? ऐसा हो ही नहीं सकता कि रिपोर्टिंग और फॉलो अप के दौरान जिन्होंने पुलिस व एसीबी में अपने संपर्क सूत्रों के जरिए सूक्ष्म से सूक्ष्म पोस्टमार्टम किया हो, उन्हें ये पता न लगा हो कि वह अधिकारी कौन है? मगर मजबूरी ये रही कि अगर एसीबी ने अपनी कार्यवाही में उसका कहीं जिक्र नहीं किया अथवा कार्यवाही में उसे शामिल नहीं किया तो नाम उजागर करना कानूनी पेचीदगी में उलझा सकता है। वैसे भी यह पत्रकारिता के एथिक्स के खिलाफ है कि बिना किसी पुख्ता जानकारी के किसी जिम्मेदार अधिकारी का नाम किसी कांड में घसीटा जाए।
इशारा तो अपुन को भी था, मगर ऑन द रिकार्ड सूचना न होने के कारण नाम का खुलासा नहीं किया, अलबत्ता यह जरूर बता दिया था कि कांग्रेस सरकार एकाएक उस उच्चाधिकारी को फंसाने के मूड में नहीं है। चाहे उसके खिलाफ कुछ सबूत हों या नहीं। इसकी वजह ये है उसकी नियुक्ति ही विधानसभा चुनाव के मद्देनजर बिगड़े जातीय समीकरण के तहत की थी। इसके अतिरिक्त यदि उस पर हाथ डाला जाता तो आयोग की कार्यप्रणाली को ले कर भी बवाल खड़ा हो जाता।
खैर, एसीबी व सरकार ने जरूर गोरान का नाम अपनी ओर से उजागर नहीं किया, मगर मीणा ने अपनी जमानत अर्जी में इसका हवाला दे कर उस रहस्य से पर्दा उठा दिया था। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि एसीबी की प्राथमिकी में जिक्र है कि उन्हें ट्रेप करने वाले दिन ठठेरा गोरान के बंगले पर भी थैला लेकर गया था। मीणा ने इस पर ऐतराज जताया है कि गोरान को नामजद क्यों नहीं किया गया। हालांकि सवाल ये भी रहा कि क्या मीणा को इस तरह किसी और के खिलाफ कार्यवाही न करने पर सवाल उठाने का अधिकार है या नहीं, या कोर्ट उस पर प्रसंज्ञान लेगा या नहीं। वैसे भी एसीबी जब अपनी कार्यवाही को एसपी के खिलाफ अंजाम दे रही थी तो इसी बीच किसी काम से ठठेरा के गोरान के बंगले पर जाने से ही तो यह आरोप नहीं बन जाता कि वे उन्हें भी रिश्वत की राशि देने गया था। हां, इतना जरूर है कि चूंकि गोरान भी आपीएस रहे हैं, इस कारण उसके ठठेरा के संबंध होना स्वाभाविक लगता है।
खैर, जहां तक कानूनी पृष्ठभूमि का सवाल है ये तो एसीबी ही अच्छी तरह से बता सकती है कि गोरान के खिलाफ मामला बनता था या नहीं, मगर ठठेरा के गोरान के घर पर भी जाने से वे भी संदेह के घेरे में तो आ ही गए थे।
आपको याद होगा कि तब एसीबी के कार्यवाहक पुलिस महानिदेशक अजीत सिंह ने गोरान को यह कह कर क्लीन चिट दे दी कि उनके खिलाफ कोई साक्ष्य नहीं मिला है। बात बिलकुल ठीक थी। जब साक्ष्य मिला ही नहीं तो कार्यवाही होती भी क्या, मगर ठठेरा का गोरान के घर जाने का खुलासा ही अपने आप में कई सवाल खड़े कर गया था।
अव्वल तो जब गोरान के घर पर ठठेरा के जाने को यदि सामान्य मुलाकात ही माना गया है, तो एसीबी को जरूरत ही क्या पड़ी कि उसने प्राथमिकी में इसका जिक्र किया। जब गोरान व ठठेरा के बीच कुछ गलत हुआ ही नहीं तो उसका जिक्र करना ही नहीं चाहिए था। चलो, एससीबी की इस बात को मान लेते हैं कि उनको गोरान के खिलाफ कोई साक्ष्य नहीं मिला है, मगर क्या इतना कहने भर से बात समाप्त हो जाती है। बेहतर ये होता कि वे इस बारे में ठठेरा ने क्या स्पष्टीकरण दिया, इसका खुलासा करते, ताकि उनकी बात पर यकीन होता। फरार आरपीएस लोकेश सोनवाल के घर निकलते समय वह बैग लेकर गोरान के घर गया और बाहर निकला तो बैग उसके हाथ में नहीं था, तो सवाल ये उठता है कि उस बैग में क्या था? क्या उसने आगरा गेट सब्जीमंडी से सब्जी खरीद कर गोरान के घर पहुंचाई थी? इसके अतिरिक्त अजीत सिंह ने यह भी नहीं बताया कि क्या उन्होंने इस बारे में गोरान से भी कोई पूछताछ की थी? यदि पूछताछ की थी तो उन्होंने ठठेरा के आने की क्या वजह बताई? अजीत सिंह की यह बात यकीन करने लायक थी कि मंथली प्रकरण में गोरान की कोई लिप्तता नहीं पाई गई है, मगर एसपी मीणा को मंथली देने जाते समय बीच में उसका गोरान के घर थैला लेकर जाने ने संदेह तो पैदा किया ही था।
खैर, अब जब कि फिर गोरान निशाने पर लिए जा रहे हैं तो उनका पुराना प्रकरण चर्चा में आता है तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
-तेजवानी गिरधर