सोमवार, 6 जुलाई 2015

गहलोत व लाला बन्ना के प्रभारी बनने की खबर दबी कैसे?

जैसे ही अजमेरनामा ये खबर उजागर की कि नगर निगम के पूर्व मेयर धर्मेन्द्र गहलोत व पूर्व सभापति सुरेन्द्र सिंह शेखावत उर्फ लाला बन्ना को आगामी नगर निकाय चुनाव में दो भिन्न नगर पालिकाओं का प्रभारी बनाया गया है तो अजमेर की राजनीति में भूचाल आ गया। मीडिया जगत भी भौंचक्क रह गया। असल में ये खबर अजमेर के लिए इसलिए बेहद गंभीर थी, क्योंकि इससे यहां के दो दिग्गजों के राजनीतिक भविष्य पर सवाल लग रहा था। साथ ही सामान्य वर्ग के अन्य दावेदारों की किस्मत के ताले खुल रहे थे। इस कारण भाजपा खेमे में यह खबर खासी चर्चा में रही। कांग्रेसियों ने भी खूब चटकारे ले कर इस खबर को एक दूसरे को बताया। विशेष रूप से उन कांग्रेसी दावेदारों ने राहत महसूस की, जो कि इन दोनों के सामने चुनाव लडऩे के लिए दावेदारी कर रहे हैं।
यूं इस खबर पर सभी का चौंकाना स्वाभाविक ही था। कारण कि 12 जून को प्रदेश भाजपा अध्यक्ष अशोक परनामी की ओर से जारी इस आदेश के बारे में किसी को पता क्यों नहीं लगा? कदाचित किसी अखबार ने इसे छापा भी होगा तो ऐसे किसी कोने में जहां किसी की नजर नहीं पड़ी। सवाल उठता है कि क्या जानबूझ कर इस खबर को दबाया गया या फिर इसको मीडिया ने गंभीरता से लिया ही नहीं? सुविज्ञ सूत्रों के अनुसार भले ही किसी को कानों कान ये खबर पता नहीं लगी, मगर कम से इन दोनों नेताओं को तो पता लग ही गया था कि उनके राजनीतिक कैरियर पर बैरियर लगाने का षड्यंत्र रचा जा चुका है। इसी कारण दोनों ने अपनी और अपने आकाओं की ओर से प्रभारी पद की नियुक्ति रद्द करने के लिए पूरी ताकत झोंक दी। बताया यही गया है कि फिलवक्त उनकी मांग मान ली गई है, मगर इसकी आधिकारिक घोषणा प्रदेश मुख्यालय ने नहीं की है।
बहरहाल, अब भले ही दोनों को टिकट दे कर चुनाव लडऩे की हरी झंडी दे दी जाए, मगर ये सवाल ज्यादा अहम है कि आखिर जानते बूझते हुए ये कारसतानी किस स्तर पर हुई? एक ओर जहां इसमें मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे का इशारा माना जा रहा है तो शक ये भी है कि किसी शातिर खिलाड़ी ने प्रभारियों की लिस्ट बनते वक्त इन दोनों के नाम उसमें घुसड़वा दिए। सोचने का विषय ये भी है कि इन दोनों के स्थानीय आकाओं को इस करतूत की हवा तक क्यों नहीं लगी? सवाल ये भी है कि दोनों को ये झटका क्यों दिया गया, जबकि दोनों ही मेयर पद के प्रबलतम दावेदार हैं? ऐसा तो हो नहीं सकता कि प्रदेश आलाकमान को पता ही न हो। और अगर पता नहीं था तो इससे शर्मनाक बात कोई हो ही नहीं सकती। साफ है कि या तो दोनों का पत्ता साफ करने की बाकायदा रणनीति थी या फिर पार्टी ने अब तक इस चुनाव की कोई रणनीति बनाई ही नहीं है किन-किन को मेयर बनाने की खातिर मैदान में उतारना है।
एक बड़ा सवाल और भी खड़ा हो गया है। वो ये कि जब जीतने और भाजपा का बहुमत आने के बाद दोनों में से कोई एक ही मेयर बन सकता है, और दूसरे को मात्र पार्षद पद पर संतुष्ट होना पड़ेगा, तो क्या एक बार मेयर व सभापति रह चुके नेता इसके लिए मानसिक रूप से तैयार हैं? अथवा ढ़ाई-ढ़ाई साल का फार्मूला फिर अपनाया जाएगा? या फिर संघ के रुख के बाद कोई एक चुनाव मैदान में उतरेगा ही नहीं? और ये भी कि कहीं, ऐन वक्त पर दोनों की लड़ाई का कोई तीसरा तो लाभ नहीं उठा ले जाएगा? जो भी हो, मगर अब इस चुनाव में टिकट बंटने से लेकर परिणाम आने व बोर्ड बनने तक अब दोनों ही सबकी नजर में रहेंगे।
फिलवक्त दोनों के प्रभारी पद से मुक्त होने की कानाफूसी के बीच बांछें खिले हुए जे. के. शर्मा, नीरज जैन व सोमरत्न आर्य के चेहरे कुछ मायूस हो गए हैं।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

रविवार, 5 जुलाई 2015

वार्ड एक से दमदार दावेदारी करेंगे मनवर खान

आगामी अगस्त माह में होने वाले नगर निगम चुनाव के लिए वार्ड एक से कांग्रेस की ओर से युवा कांग्रेस नेता मनवर खान कायमखानी टिकट की दमदार दावेदारी करने जा रहे हैं। उनकी दावेदारी का दम ये है कि एक तो वे इस इलाके में पिछले तकरीबन 25 साल से सक्रिय हैं और दूसरा ये कि इस वार्ड के कुल लगभग आठ हजार मतदाताओं में से एक हजार दो सौ अल्पसंख्यक मतदाता हैं।
मनजी भाई के नाम से सुपरिचित मनवर खान का व्यवसाय वार्ड के अंतर्गत आने वाले रीजनल कॉलेज के सामने मुख्य मार्ग पर तकरीबन 27 साल से है और उनका इलाके के सभी लोगों से सीधा व्यक्तिगत संपर्क है। कांग्रेस में उनकी सक्रियता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि अजमेर से पुष्कर या पुष्कर से अजमेर आते-जाते वक्त शायद ही ऐसा कोई वीआईपी हो, जिसका उनकी ओर से रीजनल कॉलेज चौराहे के पास स्वागत  न किया गया हो। 21 दिसम्बर 1968 को जन्मे मनवर खान कांग्रेस में 1991 से सक्रिय हैं। वे एनएसयूआई, युवक कांग्रेस व अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ में महत्वपूर्ण पदों पर रह चुके हैं। 1995 से लेकर अब तक जितने भी नगर परिषद व विधानसभा चुनाव हुए हैं, उसमें उन्होंने सक्रिय भागीदारी निभाई है। यदि ये कहा जाए कि कोटड़ा व नौसर में उनकी टीम की वजह से ही कांग्रेस का जनाधार बना हुआ है, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। उनकी चुनावी तैयारी का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि हाल ही उन्होंने अपने फेसबुक अकाउंट पर एक पोस्टर भी शाया कर दिया है।
इसके अतिरिक्त कायमखानी शोध संस्थान, श्री वीर तेजा सर्वधर्म समिति व श्री रामदेव बाबा समिति, कोटड़ा आदि से जुड़ कर सामाजिक कार्य करते रहे हैं। वर्तमान में व्यवसाय के रूप में एंगलिकन एजुकेशन प्रा. लि. और रोज-आना रेस्टोरेंट का संचालन कर रहे हैं।

धर्मेन्द्र गहलोत व लाला बन्ना मेयर की दौड़ से बाहर?

क्या अजमेर नगर निगम के पूर्व मेयर धर्मेन्द्र गहलोत व अजमेर नगर परिषद के पूर्व सभापति सुरेन्द्र सिंह शेखावत उर्फ लाला बन्ना आगामी अगस्त माह में होने जा रहे अजमेर नगर निगम चुनाव में मेयर पद की दौड़ से बाहर कर दिए गए हैं? ये चौंकाने सवाल इसलिए उठ खड़ा हुआ है कि दोनों को प्रदेश भाजपा अध्यक्ष अशोक परनामी ने निकाय चुनाव के लिए प्रभारी बनाया है। गहलोत भीलवाड़ा जिले की मांडलगढ़ नगर पालिका व शेखावत  को नागौर जिले की मेड़ता सिटी नगर पालिका के लिए चुनाव के लिए पार्टी प्रभारी बनाया गया है। स्वाभाविक रूप से सवाल उठता है कि अगर वे इन दोनों स्थानों पर पार्टी की जिम्मेदारी निभाएंगे तो अजमेर में चुनाव कैसे लड़ पाएंगे?
ज्ञातव्य है कि अजमेर नगर निगम मेयर पद के लिए गहलोत व शेखावत को ही सबसे प्रबल दावेदार माना जा रहा है। कुछ सूत्र तो यहां तक दावा कर रहे थे कि गहलोत को तो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की ओर हरी झंडी तक मिल चुकी है। कहने की जरूरत नहीं है कि वे शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी के खासमखास हैं और चर्चा है कि वे वार्ड दो से चुनाव लडऩे का मानस बना रहे हैं। उधर शेखावत को इसलिए मेयर पद का प्रबल दावेदार माना जा रहा है क्योंकि वे महिला व बाल विकास राज्य मंत्री श्रीमती अनिता भदेल सहित दिग्गज भाजपा नेता ओम प्रकाश माथुर के बेहद करीबी हैं।
समझा जाता है कि दोनों को बाकायदा सोची समझी राजनीति के तहत प्रभारी बनाया गया है, वरना क्या भाजपा हाई कमान को ये पता नहीं था कि वे चुनाव लडऩे के इच्छुक हैं? कयास है कि प्रदेश अध्यक्ष परनामी ने मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के इशारे पर ही ऐसा किया होगा। वजह ये कि गहलोत सीधे तौर पर संघ लॉबी के शिक्षा राज्य मंत्री देवनानी के करीबी हैं तो शेखावत कथित तौर पर मुख्यमंत्री पद के आगामी दावेदार ओम प्रकाश माथुर के नजदीकी। गहलोत से वसुंधरा की नाराजगी तब से भी हो सकती है, जब उन्होंने उनके पिछले कार्यकाल में कचरे का ट्रक कलैक्ट्रेट में ला पटका था, जिससे सरकार की काफी किरकिरी हुई थी। बताया जाता है कि उस वक्त देवनानी खम ठोक कर नहीं खड़े होते तो गहलोत को इस्तीफा देना पड़ जाता। बात अगर अजमेर भाजपा के भीष्म पितामह औंकार सिंह लखावत की की जाए तो वे भी दोनों से नाइत्तफाकी रखते हैं। गहलोत से देवनानी की वजह से तो शेखावत से उनके पुत्र उमर दान लखावत को कॉलेज इलैक्शन के वक्त हरवाने की वजह से। जो कुछ भी हो, दोनों को प्रभारी बनाने का ऐलान बेहद चौंकाने वाला है। जाहिर तौर पर इससे स्थानीय भाजपा में भूचाल आएगा और मेयर पद की लाइन में लगे अन्य दावेदारों की बाछें खिलेंगी। इनमें पार्षद जे. के. शर्मा, पूर्व उपसभापति सोमरत्न आर्य व पार्षद नीरज जैन शामिल हैं।
तेजवानी गिरधर
7742067000

शनिवार, 4 जुलाई 2015

भाजपा 35, कांग्रेस 25?

हालांकि मतदान के दिन तक इसका ठीक अनुमान लगाना कठिन है कि नगर निगम चुनाव में भाजपा व कांग्रेस को कितनी सीटें मिलेंगी, मगर सट्टा बाजार ने अभी से फलित निकालना शुरू कर दिया है। सट्टा बाजार कुल साठ सीटों में से 35 भाजपा को तो 25 कांग्रेस को दे रहा है। यह आंकड़ा चौंकाने वाला है। विशेष रूप से इसलिए कि वार्डों में पुनर्सीमांकन में भाजपा नेताओं की अहम भूमिका रही है। वैसे भी भाजपा को जितना प्रचंड बहुमत आज से एक-डेढ़ साल पहले केन्द्र व राज्य में मिला था, उसे देखते हुए तो ये आकलन तो भाजपा के लिए चिंताजनक होना चाहिए। मात्र पांच सीट का ही तो अंतर है। अगर कांग्रेस पांच सीट ज्यादा ले आए तो वह भाजपा के बराबर हो जाएगी। ये आकलन जरूर अजमेर शहर का प्रतिनिधित्व करने वाले दोनों मंत्रियों प्रो. वासुदेव देवनानी व श्रीमती अनिता भदेल और शहर भाजपा अध्यक्ष अरविंद यादव के लिए सोचनीय है। सोचनीय ये भी है कि आखिर माहौल में इतना परिवर्तन कैसे आ गया कि पूरी तरह से सिमट चुकी कांग्रेस भाजपा के लिए चुनौती बन कर उभर रही है। और वो भी तब जबकि भाजपा के पास यादव के नेतृत्व में नई टीम है और कांग्रेस उसी पुरानी टीम के साथ मैदान में उतरेगी, जो विधानसभा व लोकसभा चुनाव में हार का सामना कर चुकी है। इसका एक ही अर्थ है कि केन्द्र व राज्य में भाजपा का परफोरमेंस कुछ कमजोर रहा है। जनता को जो आशाएं थीं, जरूर उनमें कहीं न कहीं कमी रह गई है। इतना जल्द जनता का विमुख होना चौंकाने वाला है। हालांकि इतना जरूर सही है कि भाजपा को उसके सत्तारूढ़ होने का फायदा जरूर मिलेगा। जहां वह निचले स्तर पर छोटे नेताओं को प्रलोभन देने की स्थिति में है, वहीं प्रशासन भी उसी के कब्जे में है।
जहां तक चुनावी चौसर का सवाल है, जाहिर तौर पर दोनों दलों के अध्यक्ष उसे संगठनात्मक स्तर पर संभालेंगे ही, मगर कुछ प्रमुख नेताओं की इसमें अहम भूमिका होगी। भाजपा की बात करें तो अजमेर उत्तर में प्रो. देवनानी और अजमेर दक्षिण में श्रीमती भदेल के हाथ में कमान होगी। वे जिन प्रत्याशियों को फाइनल करेंगे, लगभग वे ही प्रदेश हाईकमान से तय हो कर आने हैं। इसी प्रकार कांग्रेस में मोटे तौर पूरी जिम्मेदारी शहर अध्यक्ष महेन्द्र सिंह रलावता पर है, मगर अजमेर दक्षिण की शतरंज बैठाने का काम काफी दिन पहले से ही विधानसभा चुनाव हारे हेमंत भाटी शुरू कर चुके हैं। देखने वाली बात ये होगी कि पूर्व उप मंत्री ललित भाटी व पूर्व विधायक डॉ.  राजकुमार जयपाल कितना हिस्सा बांट पाते हैं। उधर अजमेर उत्तर में पूर्व विधायक डॉ. श्रीगोपाल बाहेती का भी प्रभाव नजर आ सकता है। माना जाता है कि भले ही प्रत्याशियों के चयन की प्रक्रिया स्थानीय स्तर पर होगी, मगर नाम फाइनल जयपुर में ही होंगे।
रहा सवाल मेयर का तो भाजपा में पूर्व मेयर धर्मेन्द्र गहलोत, पूर्व सभापति सुरेन्द्र सिंह शेखावत, पार्षद जे. के. शर्मा, पूर्व उपसभपति सोमरत्न आर्य के नाम उभर कर आ रहे हैं, वहीं कांग्रेस में कौन दावेदार होगा, अभी कुछ नहीं कहा जा सकता।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

गुरुवार, 2 जुलाई 2015

पार्षद कमल बैरवा भी ताल ठोकने की तैयारी में

अजमेर नगर निगम के मौजूदा वार्ड नंबर एक के कांग्रेस पार्षद कमल बैरवा सामान्य वार्ड नंबर दो से ताल ठोकने की तैयारी में दिखाई देते हैं। असल में जिस इलाके में वे रहते हैं, वह अब सामान्य वार्ड हो गया है। इस कारण इस बात की उम्मीद कम है कि कांग्रेस उन्हें यहां से टिकट दे। जाहिर तौर पर यहां सामान्य वर्ग के नेता ही प्रयास करेंगे। मगर बैरवा की दिक्कत ये है कि उन्होंने पूरे पांच साल जनता की भरपूर सेवा की, इसी उम्मीद में न कि उन्हें फिर से मौका मिलेगा, मगर दुर्भाग्य से वार्ड आरक्षित नहीं रहा।
 बताया जा रहा है कि वे पहले तो कांग्रेस से टिकट की गुजारिश करेंगे। अपने काम गिनाएंगे और साथ ही अपनी जीत का समीकरण बताएंगे। अगर कांग्रेस को समझ में आया तो ठीक, वरना निर्दलीय ही मैदान में उतर जाएंगे। निर्दलीय के रूप में चुनाव लडऩे के लिए उन्होंने तैयारी भी शुरू कर दी है। बाकायदा क्षेत्र के लोगों से संपर्क कर रहे हैं। उन्हें समर्थन भी मिल रहा है। हालांकि वे जानते हैं कि उनके खड़े होने पर कांग्रेस के अधिकृत प्रत्याशी को नुकसान होगा, और इसका फायदा भाजपा प्रत्याशी को हो सकता है, मगर वे शतरंज इस प्रकार बिछा रहे हैं कि उनका सीधा मुकाबला भाजपा प्रत्याशी से हो। यदि कांग्रेस को यहां कोई दमदार और जिताऊ प्रत्याशी नहीं मिला तो उनकी चाल कामयाब भी हो सकती है। वैसे बताया जा रहा है कि फिलवक्त भाजपा की ओर से पूर्व मेयर धर्मेन्द्र गहलोत का यहां से चुनाव लडऩे का मानस है। जाहिर तौर पर वे मेयर बनने के लिए चुनाव लड़ रहे हैं, जिसमें संघ की सहमति बताई जा रहा है। शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी का वरदहस्त तो है ही। अब देखना ये है कि यहां होता क्या है? वैसे जो कुछ होगा, वह काफी दिलचस्प होगा।
-तेजवानी गिरधर
7742067000
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