शनिवार, 22 अगस्त 2015

एक ही सवाल, लाला बन्ना अब क्या करेंगे?

-तेजवानी गिरधर-
अजमेर नगर निगम के मेयर पद के चुनाव में भाजपा से बगावत करने के बाद हार जाने से सुरेन्द्र सिंह शेखावत उर्फ लाला बन्ना का लंबा राजनीतिक जीवन दाव पर लग गया है। उन्हें भाजपा से बाहर निकाला दिया गया है। अब हर एक अजमेर वासी की जुबान पर ये सवाल है कि उनका अगला कदम क्या होगा। क्या वे कांग्रेस ज्वाइन करेंगे या फिर भाजपा में लौटने की जुगत बैठाएंगे अथवा सामान्य वर्ग के हितों के लिए कोई लंबी मुहिम चलाएंगे।
जहां तक सामान्य तबके के लोगों का सवाल है, वे उनके भाजपा से बगावत को इस लिहाज से उचित मानते हैं कि आखिर उन्होंने हिम्मत तो दिखाई, सामान्य तबके के हितों की रक्षा करने की। उनके कदम को कितना समर्थन था, इसका अंदाजा मेयर के चुनाव के वक्त नगर निगम भवन के बाहर उठ रहे ज्वार से लगाया जा सकता है। असल में ये गुस्सा अजमेर की एक सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित होने व दूसरी अघोषित रूप से सिंधियों के लिए आरक्षित होने के बाद भी मेयर के सामान्य सीट पर ओबीसी को बैठाने को लेकर था। इसमें वे लोग भी षामिल थे, जो भाजपा मानसिकता के होने के बाद भी लंबे अरसे से षिक्षा राज्य मंत्री प्रो वासुदेव देवनानी के खिलाफ हैं। एक बात और। अगर लाला बन्ना की जगह कोई और होता तो कदाचित इतना जनसमर्थन नजर नहीं आता। कारण की उनकी खुद की अच्छी खासी फेन फॉलोइंग है।
जाहिर तौर पर उनके हार जाने का सबको दुख है। और गुस्सा भी कि सत्ता का गलत उपयोग किया गया। सारा ठीकरा खुद पर फूटता देख निर्वाचन अधिकारी हरफूल सिंह यादव को बाकायदा बयान जारी कर सफाई देनी पडी कि उन्होंने कोई पक्षपात नहीं किया, मगर उस पर कोई यकीन करने को तैयार नहीं है। वजह ये है कि घोषणा से पहले ही टीवी व सोषल मीडिया पर आ गया कि लाला बन्ना विजयी हो गए।
रहा सवाल कि क्या लाला बन्ना से सही किया। कुछ तो ऐसे हैं जो कि लाला बन्ना के इस कदम को पार्टी से बगावत ही नहीं मानते। वे कहते हैं कि अगर पार्टी सामान्य सीट पर किसी सामान्य को ही उतारती और तब भी वे चुनाव मैदान में उतरते तो वह बगावत कहलाई जा सकती थी। उन्होंने सामान्य जन के हित की खातिर खुद का राजनीतिक कैरियर दाव पर लगा दिया; ऐसे नेता को दगाबाज या बागी कहना गलत है। अगर ऐसा ही होता रहा तो फिर आगे कभी कोई सामान्य वर्ग के लिए आगे आने को तैयार नहीं होगा। यहां उल्लेखनीय है कि खुद बन्ना ने भी यही कहा था कि वे केवल सामान्य जन के हितों के कुठाराघात होने के कारण निर्दलीय रूप से मैदान में उतरे हैं। यदि पार्टी किसी सामान्य को टिकट देती तो वे उसका समर्थन करते।
बेषक ताजा हालात तो ये ही हैं कि हर किसी की लाला के प्रति हमदर्दी है और सभी षिक्षा राज्य मंत्री प्रो वासुदेव देवनानी को ही दोषी मान रहे हैं। मगर ऐसे भी हैं, जो पूरे मामले को अलग नजरिये से देखते हैं। उनका कहना है कि सामान्य सीट का मतलब ये नहीं होता कि उस पर केवल सामान्य ही खडा हो सकता है। सामान्य का मतलब होता है कि अनारक्षित अथवा ओपन फोर ऑल। ऐसे में अगर धर्मेन्द्र गहलोत को इस सीट पर उतारा गया तो उसमें गलत क्या है। यह उनका कानूनी अधिकार भी तो है। दूसरा ये कि लोकतंत्र में सही और गलत का पैमाना केवल संख्या बल ही होता है और वह धर्मेन्द्र गहलोत के साथ था। ऐसे में उनके निर्वाचन को सामान्य वर्ग के अहित के रूप में कैसे देखा जा सकता है। एक तर्क ये भी है कि लाला बन्ना को मेयर सीट का दावा करना ही नहीं चाहिए था क्योंकि वे अपने दक्षिण इलाके से पर्याप्त पार्षद नहीं जितवा पाए। ऐसे में मेयर बनने की जिद पकड़ कर, पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के निर्णय को अस्वीकार करते हुए पूरे शहर की जनता को पूरे दिन परेशान कर और अंत में अपनी ही पार्टी की किरकिरी करवा कर कौनसी नैतिकता का परिचय दिया था? जब अजमेर में पार्टी की इज्जत देवनानी ने बचाई तो उन्हें ही अधिकार था कि उनकी पसंद के पार्षद को टिकट दिया जाए। उसमें भी यह अहम है कि उन्होंने उसी को टिकट दिलवाया जो इसका पात्र था, जिसने पार्टी को जितवाने में अहम भूमिका निभाई। उनके योगदान को भुला कर ऐसे किसी भी सामान्य को टिकट देना क्या उचित होता जो केवल खुद की सीट जीत पाया हो। पार्टी हाईकमान को बेहतर पता है कि उसे क्या करना है। फिर जब पार्टी ने एक प्रत्याषी तय कर दिया तो उसे स्वीकार न करना बगावत ही तो कहलाएगी। ऐसे में बन्ना ने जो किया वह भले ही सामान्य वर्ग के हित की लडाई करार दी जाए, मगर इससे पार्टी की जो किरकिरी हुई है, उसकी भरपाई करना कठिन है।
बहरहाल, सभी के अपने अपने तर्क हैं, मगर असल नुकसान तो बन्ना हो ही हुआ है। उनका वर्षों से बनाया गया राजनीतिक कैरियर चौपट हो गया। भाजपा अब उन्हें वापस लेगी नहीं, लेना भी चाहेगी तो देवनानी आडे आएंगे। उधर यदि वे कांग्रेस में षामिल होते हैं तो कांग्रेस उन्हें क्या देने वाली है। अभी कांग्रेस के पास कुछ देने को है भी नहीं। आगे भी उन्हें अजमेर उत्तर से टिकट नहीं दिया जा सकेगा, क्योंकि दो बार गैर सिंधी के रूप में डॉ श्रीगोपाल बाहेती को टिकट दे कर हार का मुंह देख चुकी पार्टी अब ये दुस्साहस नहीं करेगी। ऐसे में बन्ना के लिए एक मात्र चारा ये बचा है कि वे तीन साल इंतजार करें और सामान्य वर्ग के हितों की लडाई को जारी रखते हुए निर्दलीय के रूप में चुनाव लडें और कांग्रेस व भाजपा के सिंधी प्रत्याषियों को हरा कर जीतें। हालांकि यह प्रयोग पहले सतीष बंसल कर चुके हैं, मगर तब सामान्य वर्ग उतना संगठित नहीं हो पाया था। अब सामान्य वर्ग का मिजाज उफान पर है, लाला बन्ना की लोकप्रियता भी है और उनका बलिदान भी सबके सामने है, जिसे कि आगामी चुनाव में भुनाया जा सकता है।
कुछ लोगों का मानना है कि लाला बन्ना के लिए चूंकि कांग्रेस में कुछ नहीं रखा है, इस कारण वापस मुख्य धारा में आने की कोषिष करेंगे, जिसमें उनके आका दिग्गज भाजपा नेता ओम प्रकाष माथुर कर सकते हैं।
चंद सवाल कुछ और छूट गए हैं। आखिर क्या वजह रही कि भारी जनसमर्थन के बाद भी लाला बन्ना ने अजमेर बंद का संभावित कदम पीछे लिया, कहीं उन्हें सत्ता की ओर से कोई धमकी तो नहीं मिली। क्या वजह रही कि ओबीसी का मेयर बनने पर जनता का गुस्सा सातवें आसमान पर था, वह डिप्टी मेयर भी ओबीसी का बनने पर काफूर हो गया।

गुरुवार, 20 अगस्त 2015

जलवा तो खूब दिखाया कामना पेसवानी ने, मगर मात्र 161 पर सिमटी

वार्ड 21 में कांग्रेस की बागी व निर्दलीय प्रत्याशी कामना पेसवानी ने चुनाव प्रचार के दौरान जिस प्रकार का जलवा दिखाया था, उससे लग रहा था कि वे कांग्रेस या भाजपा में से किसी को तो नुकसान पहुंचाएंगी ही, मगर वोट पडे तो वे केवल 161 ही हासिल कर पाईं।
जब उन्हें टिकट नहीं मिला मैदान में ऐसे उतरीं कि मानों जीत ही जाएंगी। हालांकि उनके जीतने की संभावना तो नहीं थी, मगर वे किसी न किसी को नुकसान जरूर पहुंचाएंगी, ऐसा जरूर आभास उन्होंने दिया। समझा जाता है कि जो वोट उन्होंने हासिल किए हैं, वे सिंधी होने के नाते सिंधियों के होंगे, या फिर उन कांग्रेसियों के जो कि कांग्रेस की रष्मि हिंगोरानी से निजी रूप खफा थे। अर्थात दोनों पार्टियों के कुछ कुछ वोट झटकने की संभावना थी।
अपन ने पहले भी लिखा था कि कामना पेसवानी के बारे में आकलन करना कठिन है कि वे कितने वोट झटकेंगी। वजह ये कि निर्दलीय प्रत्याशी को आसानी से वोट नहीं मिलते। अगर मिलते भी हैं तो खुद के व्यवहार और बलबूते पर। यूं सामाजिक कार्यकर्ता के नाते जमीन पर पकड़ तो है, मगर वह वोटों में कितनी तब्दील होती है, कुछ कहा नहीं जा सकता।
जहां तक भाजपा प्रत्याषी मोहन लालवानी का सवाल है, उनको देवनानी खेमे के कुछ कार्यकर्ताओं से था, मगर बताया जाता है कि वे वार्ड में टिके ही नहीं और वार्ड 18 में जा कर पार्टी का काम करने लगे, इस कारण वे नुकसान नहीं पहुंचा पाए। ज्ञातव्य है कि उनको 1700 वोट मिले, जबकि कांग्रेस की रष्मि हिंगोरानी कडी टक्कर देते हुए 1539 पर आ कर अटक गईं। बात अगर रष्मि हिंगोरानी की करें, तो उनके लिए यह हार दुखद रही। मीडिया उन्हें कांग्रेस की ओर से मेयर पद की दावेदार गिन रहा था, न जाने किस एंगल से। ज्ञातव्य है कि उन्होंने पिछले विधानसभा चुनाव में टिकट मांगा था। ताजा हार से उनका दावा अगली बार के लिए कमजोर हो जाएगा।

अजमेर का मेयर कौन होगा?

अजमेर नगर निगम में हालांकि 60 में से 31 सीटों पर जीत से भाजपा का बोर्ड बनना तय है, मगर अब एक ही सवाल हर अजमेर वासी के जुबान पर है कि अजमेर का मेयर कौन होगा। जहां तक आंकडों का सवाल है शिक्षा राज्य मंत्री वासुदेव देवनानी खेमे के दावेदार धर्मेन्द्र गहलोत ही भारी पड रहे हैं। इसकी वजह ये है कि अजमेर उत्तर में भाजपा को 28 में से 19 सीटें मिली हैं, जो कि देवनानी के खाते में गिनी जा रही हैं। दूसरी ओर महिला एवं बाल विकास राज्य मंत्री श्रीमती अनिता भदेल की पसंद सुरेन्द्र सिंह शेखावत कमजोर इस कारण पड गए क्योंकि दक्षिण विधानसभा क्षेत्र के 32 वार्डों में से भाजपा को मात्र 12 वार्डों में ही जीत मिली है। अगर दक्षिण में सीटें ज्यादा आतीं तो अनिता षेखावत के लिए अड जातीं, मगर अब वह तो संभव नहीं, इस कारण गहलोत का विरोध इस आधार पर किया जा रहा है कि वे ओबीसी से हैं, जबकि मेयर की सीट सामान्य है। भाजपा के लिए खतरा ये है कि अगर उसने षेखावत को राजी किए बगैर गहलोत का नाम फाइनल कर दिया तो एक बडा खेल हो सकता है। वो ये कि दक्षिण के 12 भाजपा पार्षदों के अतिरिक्त कांग्रेस के सहयोग से षेखावत पर दाव खेल दिया जाए। अजमेर की कई ताकतें इस समीकरण पर माथापच्ची कर रही हैं। कदाचित कांग्रेस इस पर विचार कर भी ले क्योंकि उसका मेयर तो वैसे भी नहीं बन रहा और भाजपा में फूट पडती है तो उसका लाभ क्यों न उठा लिया जाए। वैसे गहलोत को आसानी से मेयर बनाने के लिए निर्दलीय रूप से चुने गए बागियों के अतिरिक्त कांग्रेसियों से भी संपर्क साधा जा रहा है।
भाजपा के बडे नेता पार्टी में फूट की आषंका से भलीभांति वाकिफ हैं, इस कारण सारा जोर एकराय बनाने पर लगाया जा रहा है।
पुष्कर स्थित पुष्कर बाघ पैलेस में हो रही मषक्कत का एक रास्ता ये भी निकाला जा सकता है कि दोनों प्रमुख दावेदारों में किसी एक को मेयर बनाया जाए तो दूसरे को अन्य बडा राजनीतिक लाभ वाला पद देने का वायदा किया जाए। एक रास्ता ये है कि दोनों को ही दरकिनार कर जे.के. शर्मा, ज्ञान सारस्वत, भागीरथ जोशी, नीरज जैन आदि में से किसी एक का नाम तय किया जाए।

जनता चाहती है कि ज्ञान सारस्वत बनें मेयर

हालांकि भाजपा में मेयर को लेकर मूल रूप से पूर्व मेयर धर्मेन्द्र गहलोत व पूर्व नगर परिषद सभापति सुरेन्द्र सिंह षेखावत का नाम ही टॉप पर है और सारी खींचतान इन दोनों को लेकर हो रही है, मगर आम जनता में मेयर की पहली पसंद वार्ड तीन से जीते भाजपा पार्षद ज्ञान सारस्वत ही नजर आ रहे हैं। ये पक्का है कि मेयर किसे बनाना है, यह भाजपा हाईकमान को तय करना है, मगर सोषल मीडिया पर लगातार इसी बात पर जोर दिया जा रहा है कि ज्ञान को मेयर बनाना चाहिए। उसके पीछे उनका सामान्य वर्ग से होना भी बताया जा रहा है। ज्ञातव्य है कि इस बार मेयर का पद सामान्य है।
ज्ञान सारस्वत की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लग जाता है कि वे 3481 वोट ले कर जीते हैं, जबकि कांग्रेस के प्रत्याषी राजेष लखवानी मात्र 436 वोट ही हासिल कर पाए हैं। यानि कि ज्ञान रिकार्ड वोटों के अंतर से जीते हैं। उनकी लोकप्रियता एक सच्चे समाजसेवी और ईमानदार राजनीतिक नेता के रूप में है। लोग उनको कितना चाहते हैं, उसकी बानगी आप इस पोस्ट में देख सकते हैं, जो वाट्स ऐप व फेसबुक पर चल रही हैः-
चुनाव के आंकड़े देखें,अजमेर के बड़े  नामी नेताओं का जीत का वोट प्रतिशत नगण्य या कुछ अधिक है। एक शख्स है बड़े ही साधारण और आम परिवार से ताल्लुक रखने वाले श्री ज्ञान जी भाईसाहब , उनकी जीत ने सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए हर बार की तरह। ज्ञान जी का काम करने का तरीका बहुत Creative है, निष्ठा पूर्ण उन्होंने अपने वार्ड में कई नए काम कराए, ईमानदारी इनका सबसे बड़ा गुण हैं।  उनकी जीत देख वीर कुमार जी की याद आ गई। मित्रों अजमेर को भी ऐसा ही मेयर चाहिए जो जनता से जुड़ा हुआ हो , उनकी बात सुनता हो। ऐसा में नहीं ज्ञान जी के वार्ड का हर व्यक्ति कह रहा है। अजमेर को ऐसा मेयर नहीं चाहिए जो सिर्फ अपनी संपत्ति बनाए और सत्ता लोलूप हो। मित्रों इस आवाज को इतना उठाओ की भाजपा के शीर्ष तक पहुंच जाए। मित्रों जो भी नेतागण  मेयर पद की दावेदारी कर रहे हैं उन्हें हम पहले परख चुके हैं, उन्होंने कुछ खास प्रयास अजमेर के लिये नहीं किये । मित्रों अजमेर को भ्रष्टाचार से मुक्त करना है। आज अजमेर की सबसे प्रमुख परेशानी निगम का भ्रष्टाचार हैं और हमें एक ईमानदार मेयर चाहिए, जिसके प्रबल दावेदार ज्ञान जी हैं। आपकी आवाज़ इस शहर को एक ईमानदार मेयर दे सकती हैं। आम नागरिक

बेटी को जितवा ही दिया भारती श्रीवास्तव ने

जिद पर अडी भाजपा पार्षद भारती श्रीवास्तव ने आखिर सारे दाव पेच खेल कर अपनी बेटी रूचि श्रीवास्तव को जितवा कर दिखा ही दिया।
ज्ञातव्य है कि षिक्षा राज्य मंत्री प्रो वासुदेव देवनानी की पहली पसंद भारती श्रीवास्तव का टिकट ऐन वक्त पर पूर्व सांसद रासासिंह रावत की जिद के कारण काट कर सलोनी जैन को दे दिया गया। इस पर भारती ने बागी हो कर निर्दलीय के रूप में नामांकन पत्र भरा, मगर वह तकनीकी खामी की वजह ये रद्द हो गया। कदाचित इस बात का भान भारती को था, इस कारण उन्होंने ये चतुराई की कि अपनी बेटी रुचि का भी निर्दलीय का नामांकन पत्र भरवा दिया। उसके बाद भारती ने बेटी को जितवाने के लिए पूरा जोर लगा दिया। वस्तुतः भाभी जी के नाम से प्रसिद्ध भारती ने इलाके में काम भी खूब काम करवाया था। इस कारण उनकी जमीन पर अच्छी पकड़ थी। भारती ने कुल 2019 वोट हासिल कर जता दिया कि वाकई वे इलाके में लोकप्रिय हैं, जबकि सलोनी मात्र 883 वोट ही हासिल कर पाई। कांग्रेस की रितु गोयल 691 वोटों पर ही सिमट गई।
अपन ने पहले ही बता दिया था कि सलोनी की पारिवारिक पृष्ठभूमि राजनीतिक थी, मगर जमीन पर पकड़ कुछ कमजोर थी। हालांकि उसके लिए पूरा जैन समाज लामबंद हो गया, मगर जितवा नहीं पाया। रहा सवाल रितु गोयल का तो उन्हें तो टिकट ही भारी विवाद के बीच मिला। पहले निर्मला खंडेलवाल का टिकट फाइनल था, ऐन वक्त पर रितु को दिया गया, जिससे निर्मला खेमा बुरी तरह से नाराज हो गया। उसने तो आसमान सिर पर उठा लिया। यहां तक की प्रदेष कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट का पुतला तक फूंका। बाद में बडी मुष्किल से उन्हें मनाया तो गया, मगर आखिर तक उनका रवैया नहीं सुधरा। इसका नुकसान रितु को उठाना ही पडा। कदाचित निर्मला खेमे ने रूचि श्रीवास्तव का साथ दिया। कुल मिला कर भारती अपनी जिद पूरी करने में कामयाब हो गई।