शनिवार, 3 सितंबर 2016

नहीं आई धर्मेन्द्र गहलोत की सफाई

हाल ही आनासागर चौपाटी पर निर्धारित ऊंचाई से बड़ी गणेश प्रतिमाओं पर ऐतराज जताने गए नगर निगम के मेयर धर्मेन्द्र गहलोत पर एक संगीन आरोप ये लग रहा है कि एक गणेश प्रतिमा को उन्होंने स्वयं ने लात मार कर तोड़ा। बेशक इस बारे में प्रिंट मीडिया ने अपनी मर्यादा और रीति-नीति के तहत खबर छापी, मगर पूरे सोशल मीडिया पर उनकी जो छीछालेदर हुई है, वह बहुत ही शर्मनाक है। सच क्या है ये या तो वे जानते हैं और या फिर प्रत्यक्षदर्शी, मगर अफवाह तो यही फैली या फैलाई गई कि प्रतिमा को उन्होंने तोड़ा। हां, ये बात ठीक है कि इस प्रकार का आरोप प्रतिमा बनाने वाले लगा सकते हैं, लगाया भी है, क्योंकि जिसका नुकसान हुआ, वे मामले को संगीन बनाने के लिए कुछ भी आरोप लगा सकते हैं, मगर जिस प्रकार मूर्ति टूटने के बाद हिंदूवादी गुस्सा हो कर मौके पर आए, उससे ही माहौल गरमाया। और आग में घी डालने का काम किया नए जमाने के वाट्स एपी और फेसबुकिये पत्रकारों ने। बताने की जरूरत नहीं कि वाट्स ऐप और फेसबुक पर कुछ भी लिखने की आजादी है और लिखने के शौकीन, जिन्हें अखबारों में पत्रकार बनने का मौका नहीं मिला, वे जम कर भड़ास निकालने से नहीं चूकते। कुछ ने तो साफ तौर पर यही मान कर गहलोत की आलोचना की कि मूर्ति खुद उन्होंने ही तोड़ी। तोड़ी कि नहीं, इसका प्रमाण किसी के पास नहीं, मगर उन्हें तो मौका चाहिए था, इस कारण इसकी आड़ में हिंदूवादी भावनाएं भड़काने में कसर नहीं छोड़ी।
हो सकता है कि इस घटना से हिंदुओं की भावनाएं आहत हुई हों, सो कुछ ने समाज का प्रतिबिंब बनते हुए बड़ा ऐतराज उठाया कि अक्सर हिंदुओं के साथ ही ऐसा क्यों होता है? उनका ऐतराज था कि होली आती है तो कहते हैं कि पानी काम में मत लो, दीवाली आती है तो कहते हैं कि आतिशबाजी मत करो। इन नेताओं का बस चले तो हिंदुओं के सभी त्यौहारों पर रोक लगा दें। एक ने इस तर्क को खारिज करते हुए कि मूर्ति की कोई प्राणप्रतिष्ठा थोड़े ही हुई थी, प्रतितर्क दिया कि ये तर्क उस देश में दिया जा रहा है, जिस देश की संस्कृति में पत्थर पर सिन्दूर लगा कर उसे ही भैरव मान कर उसकी उपासना की जाती है। यहां की संस्कृति में कंकर को भी शंकर माना जाता है। एक के इस तर्क में दम था कि यदि मूर्ति को हटाना ही था तो और भी विकल्प हो सकते थे, सत्ता की मदहोशी का प्रदर्शन क्यों किया। एक का कहना था कि अगर यही कृत्य कोई गैर हिंदूवादी करता तो बवाल हो जाता, मगर चूंकि हिंदवादी नेता के हाथों हुआ, इस कारण कोई कुछ नहीं बोला। कुल जमा लिखने वालों का सारा जोर इस बात पर था कि यही नेतागण अब गणपति महोत्सव में जाकर उन्हीं गणपति की आरती उतार कर उनके भक्त बनने का स्वांग करते भी नजर आएंगे, क्योंकि उस वक्त इन्हीं नेताओं को गणपति के भक्तों में अपने वोट बैंक नजर आएंगे।
बहरहाल, जो कुछ हुआ, अच्छा नहीं हुआ। भले ही आधिकारिक रूप से किसी भी रिपोर्टिंग में यह बात सामने नहीं आई कि मूर्ति स्वयं गहलोत ने तोड़ी, मगर जिस प्रकार सोशल मीडिया पर उबाल नजर आया, उसे गहलोत को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ये कह कर भी बात को टाला जा सकता है कि सोशल मीडिया में कुछ भी आता रहता है, हर बात का जवाब देते फिरेंगे क्या, मगर जो अफवाह फैली, उसका निस्तारण होना ही चाहिए था। चाहे गहलोत की ओर से चाहे निगम की आधिकारिक विज्ञप्ति में कि मूर्ति कैसे खंडित हुई। अब ये तो गहलोत व निगम प्रशासन ही बेहतर समझ सकते हैं कि अफवाह का खंडन किया जाना चाहिए या नहीं, मगर जनमानस में ऐसी अपेक्षा रही कि वस्तुस्थिति सामने आनी चाहिए। गहलोत जैसे मुखर नेता से तो ये उम्मीद थी कि वे सीना तान कर पूछेंगे कि कौन कहता है कि मूर्ति उन्होंने तोड़ी, साबित करके दिखाएं, मगर वे इस मसले पर चुप्पी साध गए। कदाचित पद की गरिमा का मसला हो। या फिर स्पष्टीकरण देने की जरूरत ही नहीं समझी, क्योंकि उन्होंने इसे नोटिस में ही नहीं लिया। कोई बात नहीं। मगर जनमानस के सबकॉन्शस में जो चला गया, उसका परिणाम अभी नहीं बाद में उभर कर आ सकता है।
क्या आपको गाबदू गहलोत चाहिए?
इस मसले का एक पहलु और भी है। वो ये कि क्या ऐसे मामलों में गहलोत को स्वयं मौजूद रह कर कार्यवाही करवानी चाहिए? यह सवाल तब भी उठा था, जब पिछले कार्यकाल के दौरान उन्हें ठेले वालों को खुद हटाते देखा गया था। कुछ लोग ऐसी सीख दे रहे हैं कि गहलोत को ऐसे मामलों से बचना चाहिए। यह एक विचारणीय विषय हो सकता है। सवाल उठता है कि क्या आपको पूर्व सांसद प्रो. रासासिंह रावत जैसा अतिविनम्र गहलोत चाहिए, जो हर जगह हाथ जोड़ कर काम चला ले। ऐसे जनप्रतिनिधि अजमेर को क्या दे पाएं हैं, ये किसी से छिपा नहीं है। बेशक विवादित मसलों पर मेयर जैसे जनप्रतिनिधि का मौके पर होना उन्हें विवादित बना सकता है, मगर साथ ही इससे जनहित के मुद्दों के प्रति उसका जज्बा भी साफ नजर आता है। भूतपूर्व नगर परिषद सभापति स्वर्गीय श्री वीर कुमार का भी यही स्टाइल था। इतिहास के झरोखे से थोड़ा पीछे देखें। श्रीमती अदिति मेहता तो जिला कलेक्टर थीं, मगर अतिक्रमण हटाओ अभियान का नेतृत्व खुद कर रही थीं। आपको याद होगा कि अभियान के दौरान दरगाह इलाके में पत्थरबाजी के बाद भी टीम की हौसला अफजाई के लिए पालथी मार कर बैठ गई थीं। उनके कार्यकाल के परिणामों को आज भी याद किया जाता है। खैर, आप ही विचार कीजिए कि आपको गाबदू गहलोत चाहिए या फिर मुखर गहलोत?
-तेजवानी गिरधर
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सोमवार, 29 अगस्त 2016

मारोठिया की जीत हेमंत भाटी के लिए एक बड़ी उपलब्धि

छात्र संघ चुनाव में एनएसयूआई को मिली सफलता से कांग्रेस को तो लाभ मिला है, वह जग जाहिर है, मगर विशेष रूप से पृथ्वीराज चौहान राजकीय महाविद्यालय में अध्यक्ष पद पर हनीश मारोठिया की जीत से अजमेर दक्षिण के प्रबल संभावी प्रत्याशी हेमंत भाटी को बंपर लाभ होगा।
वस्तुत: मारोठिया माली समाज के जाने माने व्यवसायी परिवार से हैं और यह भी सब जानते हैं कि माली समाज आम तौर पर भाजपा की ओर रुझान रखता है। इसी का फायदा पिछले तीन चुनाव में महिला व बाल विकास राज्य मंत्री श्रीमती अनिता भदेल को मिलता रहा है। हालांकि पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की वजह से या पारंपरिक रूप से माली समाज के कुछ लोग कांग्रेस से जुड़े हुए हैं, मगर अधिसंख्य माली भाजपा के खाते में ही गिने जाते हैं। सच तो ये है कि भाजपा के लिए माली समाज एक तगड़े वोट बैंक की तरह रहा है। श्रीमती भदेल को टिकट भले ही कोली वोट बैंक की वजह से मिलता है, मगर उनकी जीत होती माली व सिंधी वोटों से है।
जैसी कि जानकारी है, मारोठिया की उम्मीदवारी से लेकर जीतने तक माली समाज के प्रभावशाली लोगों का समूह हेमंत भाटी के संपर्क में रहा। जाहिर है उन्होंने टिकट दिलवाने से लेकर समर्थन की एवज में आगे चल कर समर्थन देने का वायदा किया ही होगा। इस लिहाज से भाटी ने चुनाव से काफी पहले ही भाजपा के वोट बैंक में सेंध मार दी है।  राजनीतिक क्षेत्रों में यह एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। हनीश मारोठिया के जीतने से कांग्रेस का जनाधार बढऩे का सामान्य संकेत तो मिलता ही है, मगर उससे भी अधिक इस घटना का सीधा सीधा लाभ कांग्रेस के प्रबल संभावी उम्मीदवार हेमंत भाटी को ही मिलेगा।
-तेजवानी गिरधर
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बढ़ा विजय जैन का कद, मगर पड़ा रंग में भंग

विजय जैन
छात्र संघ चुनाव में एनएसयूआई को मिली सफलता से शहर जिला कांग्रेस अध्यक्ष विजय जैन का कद बढ़ा है, मगर साथ ही परिणाम वाले दिन पत्थरबाजी व लाठीचार्ज के चलते कांग्रेस में जो खुशी की लहर थी, उसके रंग में भंग पड़ गया है।
यूं तो आमतौर पर एनएसयूआई अपने स्तर पर ही चुनावी रणनीति बनाती रही है और कांग्रेस संगठन से फौरी मार्गदर्शन ही लेती है, मगर इस बार शहर कांग्रेस की भी सक्रियता के कारण जीत का श्रेय विजय जैन के खाते में भी गया है। चुनाव को लेकर कांग्रेस कितनी उत्साहित थी, इसका अनुमान इसी बात से लग जाता है कि लाठीचार्ज में कई कांग्रेसी नेता भी चोटिल हुए। स्वाभाविक सी बात है कि वे घटनास्थल पर मौजूद थे। हालांकि जैन जब अध्यक्ष बने थे तो उन्हें अपेक्षाकृत कम अनुभव का मान कर यह आशंका जताई जा रही थी कि क्या वे दिग्गज नेताओं की गुटबाजी के रहते इस बेड़े को चला भी पाएंगे या नहीं, मगर लगातार धरना-प्रदर्शन और आयोजनों में लगभग सभी बड़े नेताओं की भागीदारी और बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं की शिरकत से संगठन को गति मिली। जाहिर तौर पर इससे जैन को ठीक से स्थापित होने में सुविधा रही। एनएसयूआई के चुनाव में कामयाब होने से जैन का कद और बढ़ा है। हालांकि कुछ लोगों का मानना है कि उनका असली वजूद शहर जिला कार्यकारिणी घोषित होने के बाद ही पता लग पाएगा कि वे कितनी मजबूती से संगठन को चला पाते हैं, मगर फिलवक्त तो यही लग रहा है कि वे सौभाग्यशाली हैं। एनएसयूआई की सफलता का जश्न और भी रंगीन होता, मगर परिणाम वाले दिन किसी शरारती तत्व के पत्थरबाजी करने और पुलिस ने अतिरिक्त जोश दिखाते हुए लाठीचार्ज करने से रंग में भंग पड़ गया।  कांग्रेस का यह आरोप कि लाठीचार्ज भाजपा नेताओं व सरकार की शह पर हुआ, अपनी जगह है, मगर निष्पक्ष राय रखने वालों का भी मानना है कि पुलिस ने अतिरिक्त बहादुरी इसी वजह से दिखाई कि उसे पता था कि सामने कांग्रेस के कार्यकर्ता हैं। अगर दो-चार के हाथ पैर टूटे तो भी कुछ खास बात नहीं है। कांग्रेस ने ज्यादा ही विरोध जताया तो उसके कार्यकर्ताओं पर मुकदमे दर्ज करवा कर उन्हें दबा दिया जाएगा। लाठीचार्ज के बाद जिस प्रकार सोशल मीडिया पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं गुस्सा फूटा उससे लग रहा था विरोध प्रदर्शन तगड़ा होगा, मगर दूसरे ही दिन जन्माष्ठमी होने के कारण कांग्रेस ज्ञापन दे कर औपचारिक विरोध ही कर पाई। इसका दूसरा पक्ष ये भी है कि अगर कांग्रेस ज्यादा उग्र होती तो भी पुलिस व प्रशासन दमनात्मक कदम उठा सकते थे।
कुल मिला कर जीत की खुशी काफूर हो गई है। मगर दूसरी और ये भी तय है कि इन चुनावों ने भाजपा का जनाधार खिसकने के संकेत दे दिए हैं।  और यही वजह है कि यह आम धारणा बनने लगी है कि आगामी विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए बड़ी चुनौती ले कर आएंगे। छात्रों अर्थात युवाओं का इस प्रकार का प्रदर्शन जाहिर करता है कि भाजपा की एबीवीपी के माध्यम से युवाओं पर जो पकड़ होनी चाहिए थी, वह कमजोर हुई है। इसको भाजपा ने कितनी गंभीरता से लिया, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भाजपा के नेता कह रहे हैं कि इस चुनाव में हार को जनाधार खिसकने से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।
-तेजवानी गिरधर
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मंगलवार, 23 अगस्त 2016

प्रकाश जेठरा जाएंगे अब राजनीति में?

कानाफूसी है कि कृषि विभाग से आगामी 31 अगस्त को सेवानिवृत्त होने जा रहे प्रकाश जेठरा अब राजनीतिक क्षेत्र में काम करना चाहते हैं। इस आशय की मंशा वे अपने कुछ मित्रों के समक्ष जाहिर भी कर चुके हैं।
ज्ञातव्य है कि जेठरा सरकारी नौकरी में रहते हुए सामाजिक कार्यों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते रहे हैं। वे अजमेर सिंधी सेंट्रल महासमिति के प्रचार सचिव पद पर काफी समय से हैं और चोरसियावास रोड स्थित झूलेलाल मंदिर कमेटी के प्रमुख कर्ताधर्ता हैं। अन्य कई संस्थाओं व मंदिर-दरबारों से भी जुड़े हुए हैं और कई संस्थाओं में मीडिया का काम भी देखते हैं। नौकरी के दौरान वे स्थानीय राजनीतिक गुटबाजी का शिकार भी हुए हैं, जिसके चलते उनका तबादला हुआ, मगर उन्होंने दूसरे गुट का सहारा लेकर तबादला रद्द करवा दिया। कदाचित इसी वजह से सेवानिवृत्ति के बाद स्वयं राजनीति में आना चाहते हैं। उनकी पकड़ विशेष रूप से वैशाली नगर में है। इसके अतिरिक्त वे सिंधी समाज का जाना पहचाना चेहरा हैं। समझा जाता है कि वे आगामी विधानसभा चुनाव में अजमेर उत्तर से भाजपा टिकट के लिए दावेदारी का मानस बना रहे हैं। वैसे जानकारी ये भी है कि वे बहुजन समाज पार्टी के संपर्क में भी हैं। ऐन चुनाव के वक्त क्या करेंगे, कुछ कहा नहीं जा सकता।

शनिवार, 13 अगस्त 2016

अपने गढ़ में ही है भाजपा की हालत खस्ता

जिले के आठ में से सात विधानसभा क्षेत्रों, लोकसभा सीट, जिला परिषद व नगर निगम पर काबिज भाजपा यूं तो बहुत मजबूत दिखाई देती है, है भी, मगर  मात्र ढ़ाई साल में ही उसका ग्राफ जिस तरह से गिरने लगा है, उससे प्रतीत होता है कि यहां भाजपा की जो भी पकड़ नजर आती है, वह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे की लोकप्रियता के कारण बनी, जिसे कि स्थानीय नेता संभाल नहीं पा रहे।
वस्तुत: इन नेताओं में आपसी तालमेल का कितना अभाव है, इसकी बानगी उस वक्त नजर आ गई, जब केन्द्र व राज्य में भाजपा का झंडा बुलंद होने के बाद भी नसीराबाद विधानसभा उपचुनाव में खुद प्रो. सांवरलाल जाट अपनी इस सीट से खड़ी हुई सरिता गेना को नहीं बचा पाए। ज्ञातव्य है कि वे यहां से विधायक और प्रदेश के केबीनेट मंत्री थे। उन्होंने ने बड़ी अनिच्छा के बाद इस सीट का मोह छोड़ लोकसभा का चुनाव लड़ा था। एक सांसद का अपने ही इलाके में पार्टी की साख न बचा पाना गंभीर संकेत था। चटकारे लेने वाले तो यहां तक कहते हैं कि खुद उनकी रुचि ही सरिता को जिताने में नहीं थी, क्योंकि अगर वे जीत जातीं तो इस सीट पर उनके पुत्र रामस्वरूप लांबा का भविष्य समाप्त हो जाता। समझा जा सकता है कि स्वार्थ के आगे पार्टी हित की क्या अहमियत है? वरना ऐसा हो नहीं सकता था कि उनके खुद के इलाके में ही पार्टी की भद पिट जाती। उनका कद पार्टी से कितना ऊंचा है, इसकी बानगी हाल ही पार्टी की फीडबैक बैठक के दौरान उनके समर्थकों द्वारा उन्हें मंत्रीमंडल से हटाए जाने के विरोध में जम कर हंगामा करने के दौरान मिली थी। अगर ये कहा जाए कि उनकी मथुरा तीन लोक से न्यारी है तो गलत नहीं होगा। वे जो कुछ हैं, अपने दम पर हैं, संगठन से उनका कोई खास वास्ता नहीं। यहां यह उल्लेख करना लाजिमी है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को वे फूटी आंख नहीं सुहाते, फिर भी वे वसुंधरा राजे की पसंद होने के कारण जिले व राज्य दिग्गज नेता हैं।
अब चर्चा करते हैं लगातार तीन बार दोनों विधानसभा सीटों पर भाजपा को जीत दिलाने वाले अजमेर शहर की, जिसमें पिछले दिनों हुए नगर निगम चुनाव ने पार्टी नेताओं की फूट को चौराहे पर ला खड़ा किया था। पार्टी एकजुट हो कर नहीं लड़ पाई। संगठन मूक दर्शक सा खड़ा था। अजमेर दक्षिण के वार्ड श्रीमती अनिता भदेल ने संभाले तो उत्तर के प्रो. वासुदेव देवनानी ने। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि पूरे शहर के चुनाव न हो कर दो हिस्सों में बंटे इलाकों के चुनाव हो रहे थे। इतना ही नहीं, जिसका जितना बस चल रहा था, उसने उतना ही दूसरे के इलाके में भीतरघात की। नतीजा सामने आ गया। भाजपा के इस कथित गढ़ में बोर्ड बनाना ही कठिन हो गया। मेयर बनने को आतुर पूर्व नगर परिषद सभापति सुरेन्द्र सिंह शेखावत कांग्रेस का समर्थन लेकर बागी हो गए। यद्यपि धर्मेन्द्र गहलोत विजयी घोषित हुए, मगर आरोपित रूप से गड़बड़ करके। शेखावत कोर्ट चले गए। संगठन की मर्यादाओं से इतर दो धुर विरोधियों की हठधर्मिता देखिए कि देवनानी ने सामान्य सीट पर फिर गहलोत के रूप में ओबीसी को मेयर बनवा दिया तो भदेल ने भी अपने चहेते, ओबीसी के संपत सांखला को डिप्टी मेयर पद पर आसीन करवा दिया। सामान्य वर्ग के नेता ठगे से रह गए। उनकी कुंठा आगे चल कर कुछ गुल खिला सकती है। पार्टी को एक बड़ा नुकसान ये हुआ कि उसने सामान्य वर्ग का प्रतिनिधित्व कर रहे शेखावत को खो दिया। संभवत: वे आगामी विधानसभा चुनाव में पार्टी का एक बड़ा सिरदर्द साबित हो जाएं।
बात ताजा घटनाक्रम की करते हैं। केन्द्र व राज्य में बहुमत वाली सरकारों के होते हुए पंचायती राज उपचुनाव में पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा। एकजुटता का अभाव समझने के लिए इतना ही काफी है कि स्थानीय नेता इस चुनाव को मैनेज नहीं कर पाए। या तो सत्ता के नशे में चूर नेताओं ने लापरवाही बनती, या फिर उनकी रुचि ही नहीं थी।
हालांकि उपचुनाव और अगर वे विशेष रूप से पंचायतीराज व स्थानीय निकाय के हों, तो उसके नतीजे किसी पार्टी को पूरी तरह से नकार दिए जाने अथवा किसी को नवाजने का सीधा-सीधा संकेत तो नहीं देते, मगर वे ये इशारा तो करते ही हैं कि राजनीतिक बयार कैसी बह रही है या बहने जा रही है। इसे साफ तौर पर भले ही आम जनादेश की संज्ञा नहीं दी जा सकती, मगर इतना तय है कि सत्तारूढ़ भाजपा को आम जनता ने खतरे की घंटी तो सुना ही दी है। यद्यपि विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं, मगर ये छोटे व स्थानीय चुनाव अनाज की बोरी में लगाए जाने वाली परखी की तरह हैं, जो बयां कर रही है कि वर्तमान में भाजपा की हालत क्या है?
अजमेर के विशेष संदर्भ में बात करें तो भाजपा के लिए यह हार इस कारण सोचनीय है क्योंकि जिले के 8 में से 7 विधायक भाजपा के हैं। इनमें से दो राज्यमंत्री व एक संसदीय सचिव हैं। जिला परिषद और स्थानीय निकाय में भी भाजपा का कब्जा है। भाजपा के लिए यह शर्मनाक इस वजह से भी हो गया है, क्योंकि उसने सत्तारूढ होने के हथकंडे इस्तेमाल करके भी पराजय का मुंह देखा। इन चुनावों पर कदाचित ज्यादा गौर नहीं किया जाता, मगर भाजपा ने खुद ही मंत्रियों व विधायकों से लेकर नगर पालिका अध्यक्षों आदि को जोत कर इसे प्रतिष्ठा का प्रश्र बना दिया। रही सही कसर मीडिया ने पूरी कर दी, जो कि आजकल कुछ ज्यादा ही संवदेनशील हो गई है। यह संवेदना इस वजह से है कि भाजपा ने जिस सुराज का सपना दिखा कर आम जन का जबदस्त समर्थन हासिल किया, वह सपना धरातल पर कहीं उतरता नजर नहीं आया। इस चुनाव ने साफ कर दिया है कि अच्छे दिन के नारे यदि धरातल पर नहीं उतरे तो जनता पलटी भी खिलाना जानती है।
इन उपचुनावों ने देहात जिला भाजपा अध्यक्ष प्रो. बी. पी. सारस्वत सहित कुछ अन्य भाजपा नेताओं को मुंह दिखाने के काबिल नहीं छोड़ा है, क्योंकि चंद दिन बाद ही 15 अगस्त को अजमेर में आयोज्य राज्य स्तरीय स्वतंत्रता दिवस समारोह में मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे आने वाली हैं। कभी सफल सदस्यता अभियान चला कर भाजपा हाईकमान के चहेते बने प्रो. बी. पी. सारस्वत को दुबारा देहात जिला अध्यक्ष बनाया ही इसलिए गया था कि उनसे बेहतर संगठनकर्ता नहीं मिल रहा था, मगर ताजा चुनाव परिणाम ने उनकी कलई खोल दी है। हालांकि पार्टी प्रत्याशियों की हार के अनेक स्थानीय कारण हैं, मगर चूंकि उनके नेतृत्व में रणनीति बनी, इस कारण हार की जिम्मेदारी से वे बच नहीं सकते। अब तो ये भी गिना जा रहा है कि नसीराबाद विधानसभा क्षेत्र में आने वाली 9 ग्राम पंचायतों को मिला कर बनाये गए जिला परिषद के वार्ड नंबर 5 में सारस्वत का गांव बिड़कच्यावस भी आता है, लेकिन उनके गांव में भी भाजपा को जबरदस्त हार का सामना करना पड़ा। इस चुनाव से जिला प्रमुख वंदना नोगिया को महज आभूषणात्मक जिला प्रमुख साबित कर दिया है, जिनकी धरातल पर कोई पकड़ नहीं है। उनके अतिरिक्त पुष्कर विधायक सुरेश रावत व किशनगढ़ विधायक भागीरथ चौधरी पर भी हार की जिम्मेदारी आयद होती है। हार की एक वजह जाटों की बेरुखी भी बताई जा रही है, जो कि अजमेर के सांसद प्रो. सांवरलाल जाट को केन्द्रीय मंत्रीमंडल से हटाए जाने से नाराज हैं।
असल में अजमेर जिले में पार्टी संगठन का ढ़ांचा कुछ खास मजबूत नहीं है। धरातल पर जरूर पार्टी समर्थक दमदार हैं, मगर उन्हें एक सूत्र में बांधने वाला कोई नहीं है। कुछ साफ तौर पर गुटों में बंटे हैं तो तटस्थ कार्यकर्ताओं की स्थिति पैंडुलम सी है। अगर ये कहें कि संगठन तो नाम मात्र का है, चंद नेता अपने-अपने हिसाब से पार्टी कार्यकर्ताओं को हांक रहे है, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। यूं तो मोटे तौर पर पार्टी कई गुटों में बंटी हुई है, मगर बड़ी गुटबाजी शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी और महिला व बाल विकास राज्य मंत्री श्रीमती अनिता भदेल के बीच है। हालांकि वरिष्ठ नेता और राजस्थान पुरा धरोहर प्रोन्नति प्राधिकरण के अध्यक्ष औंकार सिंह लखावत स्थानीय पचड़ों से दूर हैं, मगर जयपुर में बैठ कर देवनानी की कब्र खोदते रहते हैं। श्रीमती भदेल के गॉड फादर वे ही हैं। अजमेर के खाते में गिने जाने वाले राज्यसभा सदस्य भूपेन्द्र यादव का कद इतना ऊंचा है कि उनको कोई छू भी नहीं सकता। वे स्थानीय चंद नेताओं पर वरदहस्त रखे हुए हैं। स्थानीय मसलों में कुछ खास दखल नहीं करते।
कुल मिला कर इससे समझा जा सकता है कि शहर जिला अध्यक्ष अरविंद यादव और देहात जिला अध्यक्ष प्रो. भगवती प्रसाद सारस्वत कितनी कमजोर स्थिति में हैं। दोनों संगठन के प्रमुख तो हैं, मगर उनका बड़े नेताओं पर कोई जोर नहीं चलता। अजमेर देहात में कई क्षत्रप हैं तो अजमेर शहर में पार्टी दो हिस्सों में विभाजित है।
पिछले पंद्रह साल से संगठन की हालत ये ही है। न तो पूर्व अध्यक्ष व पूर्व सांसद प्रो. रासासिंह रावत की कोई सुनता था और न ही अजमेर विकास प्राधिकरण के मौजूदा अध्यक्ष शिव शंकर हेड़ा के शहर अध्यक्ष होने के दौरान उनकी कुछ खास अहमियत रही। नगर निकाय के चुनाव में केवल और केवल देवनानी व भदेल की ही चलती आई है। अगर ये कहा जाए कि इन दोनों का जब से अभ्युदय हुआ है, तब से संगठन नाम मात्र का रह गया है तो गलत नहीं होगा। संयोग से दोनों लगातार तीन बार जीत गए, मगर पार्टी कार्यकर्ता इतना पीडि़त है कि उसे बयां करना मुश्किल है। केडर बेस पार्टी की ये हालत वाकई अजीबोगरीब है।

-तेजवानी गिरधर
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