बुधवार, 13 सितंबर 2017

रावत समाज ने ठोकी ताल, भाजपा की बढ़ी मुसीबत

अजमेर जिले के रावत समाज ने आगामी नवंबर-दिसंबर में अजमेर संसदीय क्षेत्र के संभावित चुनाव के लिए ताल ठोक दी है। समाज किसी रावत को टिकट देने की मांग कर रहा है। भाजपा के लिए यह मुसीबत का सबब है। वह इस चुनौती से कैसे निपटेगी, यह आने वाला वक्त ही बताएगा।
असल में भाजपा की लगभग मजबूरी सी है कि वह किसी जाट को ही टिकट दे। एक तो इस वजह से कि यह सीट प्रो. सांवरलाल जाट के निधन से खाली हुई है, दूसरा ये कि अजमेर संसदीय क्षेत्र अब जाट बहुल माना जाता है। हालांकि रावत मतदाताओं की संख्या भी कम नहीं है, जिनका रुझान भाजपा की ओर रहता आया है। ज्ञातव्य है कि पांच बार लोकसभा का चुनाव प्रो. रासासिंह रावत ने समाज के वोटों के दम पर ही जीता था। हर एक चुनाव को छोड़ कर पांच बार अस्सी से नब्बे प्रतिशत मतदान करने वाले रावतों और पार्टी के जनाधार वाले वोटों के योग से प्रो. रावत को जीतने में दिक्कत नहीं होती थी। केवल एक बार डॉ. प्रभा ठाकुर उन्हें हरा पाई, वो भी इसलिए कि उन्होंने भाजपा के राजपूत वोट बैंक में सेंध मारी थी। खैर, रासासिंह रावत का अवसान तब जा कर हुआ, जब परिसीमन में इस संसदीय क्षेत्र का रावत बहुल इलाका मगरा कट गया। अकेले इसी वजह से भाजपा ने प्रो. रावत को टिकट नहीं दिया गया। उनके स्थान पर भाजपा महिला मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीमती किरण माहेश्वरी को लाया गया और वे मौजूदा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट से हार गईं। इसके बाद में हुए चुनाव में भाजपा ने प्रो. जाट पर दाव खेला और जाटों की बहुलता व विशेष रूप से मोदी लहर के कारण वह प्रयोग सफल रहा। लहर इतनी प्रचंड थी कि लोग सचिन पायलट के कराए गए कामों को ही भूल बैठे। अब जबकि प्रो. जाट का निधन हो गया है, ऐसे में भाजपा पर दबाव है कि वह किसी जाट को और विशेष रूप से प्रो. जाट के परिवार से किसी को टिकट दे। हालांकि प्रो. रावत के पांच बार सांसद बनने से रावत भाजपा मानसिकता के ही माने जाते हैं, मगर जिस प्रकार उन्होंने ताल ठोकी है, वह भाजपा के लिए चिंता का कारण है। एक ओर वह किसी गैर जाट को टिकट दे कर जाटों की नाराजगी मोल नहीं लेना चाहेगी, दूसरी ओर वर्षों से कायम अपने रावत वोट बैंक को भी नहीं खोना चाहेगी। ऐसा नहीं है कि रावतों का जिले में प्रतिनिधित्व नहीं है। पुष्कर के विधायक सुरेश रावत हैं। इसके अतिरिक्त संसदीय क्षेत्र से ही सटे और जिले के ब्यावर से भी शंकर सिंह रावत विधायक हैं। ऐसे में रावतों का टिकट के लिए अडऩा अटपटा है, मगर लोकतंत्र में कुछ न कुछ हासिल करने के लिए समाज अड़ते ही हैं। अब देखना ये होगा कि भाजपा रावतों के कितने दबाव में आती है।
रहा कांग्रेस का सवाल तो उसके लिए रावत एक बेहतरीन कार्ड के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। गुर्जरों, अनुसूचित जाति व मुस्लिमों के वोट तो बहुतायत में कांग्रेस को मिलने ही हैं। कांग्रेस के पास एक और कार्ड राजपूतों का भी है। वे भी भाजपा मानसिकता के माने जाते हैं, मगर कुख्यात आनंदपाल मामले के बाद भाजपा से रुष्ठ हैं। ऐसे में कांग्रेस राजपूत कार्ड भी खेल सकती है, जो कि एक बार प्रभा ठाकुर के रूप में सफल हो चुका है।  इस लिहाज से कांग्रेस सुविधानजक स्थिति में है। उसके पास बहुत विकल्प हैं। गुर्जर कार्ड के अतिरिक्त वह किसी दिग्गज जाट को भी मैदान में उतार सकती है। इस सिलसिले में राजस्थान के दिग्गज जाट नेता स्वर्गीय परसराम मदेरणा की पोती दिव्या मदेरणा का नाम चर्चा में आया है। बहरहाल, जैसे जैसे चुनाव नजदीक आएंगे कई नाम उभरेंगे व डूबेंगे। प्रत्याशियों का फैसला नामांकन पत्र भरने की तिथी से एक-दो दिन पहले ही हो पाएगा। तब तक चर्चाओं की जुगाली चलती रहेगी।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

टंडन साहब, क्या अनादि सरस्वती जी को चुनाव लड़वा कर ही मानोगे?

लंबी चुप्पी के बाद साध्वी अनादि सरस्वती एक बार फिर चर्चा में हैं। राजनीति के पंडित एडवोकेट राजेश टंडन ने फिर उनका नाम उछाला है। वे गईं तो थीं अविनाश माहेश्वरी स्कूल में आयोजित अश्विनी कुमार जी के सुंदरकांड पाठ में शिरकत करने और टंडन साहब ने उनका फोटो फेसबुक पर यह कह कर चिपका दिया कि वे अजमेर उत्तर से भाजपा की भावी विधायक हैं। यूं फोटो तो खुद अनादि जी ने भी शाया किया है, मगर उसका मकसद महज इतना सा दिखता है, जितना आम तौर पर फेसबुकियों का अपनी दिनचर्या को सार्वजनिक करने का होता है। इसमें कुछ खास बुराई भी नहीं है, क्योंकि इस बहाने व्यक्ति अपने समर्थकों या मित्रों के बीच लाइव रहता है। मगर टंडन साहब को इसमें भी कुछ खास अर्थ दिखाई दिया। उन्हें लग रहा है कि अनादि सरस्वती इस प्रकार हर सामाजिक, धार्मिक व राजनीतिक कार्यक्रम में शिरकत कर अपना जनाधार बढ़ा रही हैं।
अगर ये मान भी लिया जाए कि टंडन साहब का इशारा कपोल कल्पित है या अनादि सरस्वती ने भी कभी इस दिशा में सोचा तक न हो, मगर कानाफूसियों के बाजार में चर्चा तो हो ही रही है। बहरहाल, साध्वी अनादि सरस्वती का इस रूप में चर्चित होना कदाचित शिक्षा राज्य मंत्री व अजमेर उत्तर के विधायक प्रो. वासुदेव देवनानी को तकलीफ दे रहा होगा। वो इसलिए लिए कि उनके पासंद एक भी दावेदार उन्हें नजर नहींं आता, लिहाजा चौथी बार भी पक्के तौर टिकट हासिल करने का विश्वास रखते हैं। अगर संघ की बात करें तो वह क्या सोचता है और क्या करने वाला है, किसी को भनक तक नहीं लगने देता। वह एक साथ कई प्रयोग कर रहा होता है। कुछ गुप्त तो कुछ सार्वजनिक। हो सकता है कि अनादि सरस्वती को आगे लाने का उसका विचार हो, मगर जिस प्रकार वे हेडा के साथ एकाधिक कार्यक्रमों में नजर आई हैं, उससे जरूर प्रतीत होता है कि वे उन्हें देवनानी के मुकाबले में प्रमोट करना चाहते होंगे। कहने की जरूरत नहीं कि वे गैर सिंधीवाद के नाम पर टिकट चाहते हैं। कदाचित उन्हें लगता हो कि इसमें कामयाब नहीं हो पाएंगे तो बेहतर है विकल्प के तौर पर अनादि सरस्वती को ही आगे लाया जाए, जो कि सिंधी समुदाय की हैं। यहां इस बात को ख्याल में रखना ही चाहिए कि टिकट लाने की कलाकारी देवनानी में है, वो तो एक बात है, मगर विकल्प का अभाव भी कहीं न कहीं उनकी दावेदारी को कमजोर नहीं होने देता। अगर अनादि सरस्वती इस प्रकार उभर कर आती हैं तो वह बात तो खत्म हो ही जाएगी कि देवनानी का विकल्प ही नहीं है।
अब पता नहीं खुद अनादि सरस्वती की रुचि राजनीति में है या नहीं, मगर मौका अच्छा है। अगर देवनानी टिकट लाने में कहीं कमजोर होते हैं तो चांंस बनता है। ज्ञातव्य है कि पिछली बार जब टंडन साहब ने खोज खबर ला कर दी थी कि आरएसएस उनको चुनाव लड़वाने के मूड में है। आरआरएस के एक प्रमुख कार्यक्रम के बाद वे कई बार अजमेर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष शिव शंकर हेडा के साथ कार्यक्रमों में नजर आईं। इससे यह संदेश गया कि या तो उन्हें प्रोजेक्ट किया जा रहा है, या फिर वे स्वयं राजनीतिक व सामाजिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेकर राजनीतिक जमीन तलाश रही हैं। हालांकि उन्होंने कभी इसका खंडन नहीं किया कि उनकी राजनीति में कोई रुचि नहीं है। उनकी चुप्पी को मौन स्वीकृति भी माना जा सकता है, मगर ऐसा भी हो सकता है कि उन्होंने प्रतिक्रिया जाहिर कर व्यर्थ विवाद में पडऩा उचित नहीं समझा हो। इसी प्रकार की नीति संघ की रहती है। हो सकता है कि उनका नाम इस प्रकार राजनीति में घसीटे जाने पर उनको गुस्सा भी हो, चूंकि एक साध्वी के तौर पर उनका जो सम्मान है, वह एक राजनीतिक व्यक्ति की तुलना में कई गुना अधिक है। इसे यूं समझा जा सकता है कि साध्वी के रूप में हर राजनीतिज्ञ उनके आगे नतमस्तक हो रहा है, जो कि राजनीति में आने पर कम हो जाने वाला है। मगर संभावना इसकी भी कम नहीं है कि सुर्खियों में रहने की चाह में वे भी इस प्रकार की खबरों में रस ले रही हों, जो कि एक मानव स्वभाव है। वैसे उन्हें चर्चाओं को अन्यथा नहीं लेना चाहिए, क्योंकि वे तो फिर भी एक आइकन हैं, जिनकी हर गतिविधि पर नजर रहती है, हालत तो ये है कि अगर कोई सामान्य व्यक्ति भी थोड़ा सा सामाजिक कार्यों में रुचि बढ़ाता है तो यही कयास लगाया जाता है कि वह आगे चल कर राजनीति की पगडंडी पकड़ेगा।
-तेजवानी गिरधर
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रविवार, 10 सितंबर 2017

आखिकार गौरी लंकेश पत्रकार थी

इन दिनों पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या को लेकर सोशल मीडिया पर जम कर बवाल हो रहा है। खासकर इसलिए कि जैसे ही यह तथ्य सामने आया कि वह वामपंथी विचारधारा की थी, इसी कारण दक्षिपंथियों ने उसकी हत्या कर दी तो अब दक्षिणपंथी लगे हैं यह साबित करने में कि उसकी हत्या नक्सलपंथियों ने की। बेशक, यह कोर्ट को ही तय करना है कि आखिर उसकी हत्या किसने की, मगर जिस प्रकार दक्षिणपंथी पत्रकार मामले को ट्विस्ट दे रहे हैं, तर्क के निम्नतम स्तर पर जा रहे हैं, उससे लगता है कि वे अपने मौलिक पत्रकार धर्म को छोड़ कर विचारधारा मात्र को पोषित करने में लगे हुए हैं। यह ठीक है कि वे हत्या पर दुख भी जता रहे हैं, मगर उनकी भाषा में हमदर्दी तनिक मात्र भी नजर नहीं आती। कुछ तो इंसानियत की सारी मर्यादाएं तोड़ कर इस हत्याकांड पर खुशी तक जता रहे हैं।
गौरी लंकेश आखिरकार पत्रकार थीं। उनकी कलम के बारे में कहा जा रहा है कि वह संयमित नहीं थी, तो इसका मतलब ये नहीं है कि कानून तोड़ कर कुछ लोग उसकी हत्या कर दें। किसी को अधिकार नहीं की कलम के विरोध स्वरूप गोली मार दे, यदि आपको किसी की लेखनी से नाराजगी है तो अदालत और कानून है। अगर इस प्रकार विचारधारा विशेष के लोग सजा देने का अधिकार अपने हाथ में ले लेंगे तो फिर कानून की जरूरत ही क्या है? तो फिर इस लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का क्या होगा? तो फिर असहिष्णुता का सवाल उठाया जाता है, वह पूरी तरह से जायज है।
चलो, इस मसले को अब जबकि पूरा राजनीतिक रंग मिल चुका है, तो इससे हट कर भी विचार कर लें। फेसबुक पर एक पत्रकार ने अपना दर्द बयान करते हुए लिखा है कि अगर किसी पत्रकार पर हमला होता है तो पत्रकार संघ इसके विरोध में मात्र ज्ञापन देने एवं आलोचना की खबर प्रकाशित करने के अलावा कुछ भी नहीं करते हैं। अति महत्वाकांक्षा के इस दौर में खबर एवं विज्ञापन के लालच में हम स्वयं ही एक दूसरे के विरोधी बन जाते हैं। प्रशासन के वो ही अधिकारी जो अन्य मामलों में पत्रकारों से सहयोग की अपील करते हुए देखे जाते हैं, वो ही ऐसे मामलों में पत्रकारों से कभी सहयोग नहीं करते। जनता भी कभी पत्रकार के फेवर में देखी नहीं गई। जब फोटो या नाम छपवाना हो तो पत्रकारजी होते हैं, वरना वो कभी भी पत्रकार के दु:ख दर्द में साथी नहीं होती। उनकी बात में दम है।
एक पत्रकार साथी ने तो और खुल कर लिखा है कि किस प्रकार पत्रकार की सेवाएं तो पूरी ली जाती हैं, मगर जब उस पर विपत्ति आती है तो उसकी सेवाओं को पूरी तरह से नकार दिया जाता है:-
लड़ाई हो तो पत्रकारों को बुलाओ
सड़क नहीं बनी पत्रकारों को बुलाओ
पानी नहीं आ रहा पत्रकारों को बुलाओ
नेतागिरी में हाईलाइट होना है तो पत्रकारों को बुलाओ
नेतागिरी चमकानी हो तो पत्रकरों को बुलाओ
पुलिस नहीं सुन रही तो पत्रकारों को बुलाओ
प्रशासन के अधिकारी नहीं सुन रहे पत्रकारों को बुलाओ
जनता की हर छोटी मोटी समस्या के लिए पत्रकार हमेशा हाजिर हो जाते हैं और अपने कर्तव्यों का निर्वहन बखूबी करते हैं, पर जब पत्रकारों पर हमला होता है, उनकी हत्या की जाती है, तब आमजन क्यों नहीं पत्रकारों का साथ देने आगे आते हैं? जरा सोचिए, पत्रकार भी आपके समाज का हिस्सा है, फिर पत्रकारों पर हमले का विरोध सिर्फ पत्रकार ही करते हैं, बाकी क्यों नहीं करते?
कुल जमा बात ये है कि किसी पत्रकार की हत्या को जायज ठहराने अथवा किसी और पर आरोप मढऩे से भी अधिक महत्वपूर्ण ये है कि गौरी लंकेश आखिरकार पत्रकार थी। इस प्रकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अगर छीनी जाती रहेगी तो इस देश में लोकतंत्र को बचाना मुश्किल हो जाएगा।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

इतनी पोल है जिला परिषद में?

अजमेर जिला परिषद का सरकारी तंत्र कैसा काम कर रहा है, इसकी पोल तब खुली, जब एक फर्जी पत्र के आधार पर झारखंड के जिला कोडरमा के गांव चंदवारा के विनोद प्रसाद गुप्ता द्वारा राष्ट्रीय स्वच्छता मिशन के नाम पर गांवों में तकरीबन दो हजार परिवारों के घरों के बाहर एल्यूमिनियम की प्लेटें लगा कर हर एक से तीस-तीस रुपए वसूल लेने का मामला उजागर हुआ।
दैनिक भास्कर ने इस चौंकाने वाले मामले के हर पहलु पर प्रकाश डाला है, जिससे साफ जाहिर होता है कि गारेखधंधा करने वाले ने बड़ी चतुराई से फर्जी पत्र जिला परिषद से जारी करवा लिया। अगर वह अपने स्तर पर ही ऐसा फर्जी पत्र बना कर लोगों को चूना लगाता तो समझ आ सकता था कि इसमें जिला परिषद का कोई दोष नहीं है, मगर उसने जिस तरह उस पत्र को बाकायदा स्वच्छता मिशन शाखा के रजिस्टर से ही डिस्पैच  करवाया, वह साफ दर्शाता है कि इसमें जिला परिषद के ही किसी कर्मचारी की मिलीभगत है। अगर मिलीभगत नहीं है तो भी इतना तो तय है कि गोरखधंधा करने वाले ने परिषद में चल रही लापरवाही का फायदा उठाया है। आम तौर ये देखा गया है कि कोई पत्र एक सीट से दूसरी सीट तक पहुंचाने में कर्मचारी मुस्तैदी नहीं दिखाते, तो संबंधित व्यक्ति ही इस काम को अंजाम दे देता है। यह एक ढर्रा सा बन गया है। ऐसा प्रतीत होता कि आरोपी ने इसी पोल का फायदा उठाया है।
हालांकि अभी यह पता नहीं है कि उस फर्जी पत्र पर तत्कालीन मुख्य कार्यकारी अधिकारी निकया गोहाएन के हैं या नहीं, मगर संदेह तो होता ही है कि उस शातिर ने कहीं गुडफेथ का लाभ उठा कर तो हस्ताक्षर नहीं करवा लिए। जांच का एक बिंदु ये भी होगा कि कहीं मुख्य कार्यकारी अधिकारी ने आरोपी को लाभ पहुंचाने के लिए नियमों से परे जा कर इस प्रकार के पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए। कदाचित उनके हस्ताक्षर देख कर ही डिस्पैच करने वाले बाबू ने गुडफेथ में यकीन कर लिया हो कि पत्र मुख्य कार्यकारी अधिकारी की ओर से ही जारी हुआ है। इसका अर्थ ये है कि कारगुजारी करने वाले को पता था कि जिला परिषद में कितनी पोल है, तभी तो उसने उसका फायदा उठाते हुए बाकायदा पत्र डिस्पैच करवाया।
हालांकि अभी ये पता नहीं है कि एल्यूमिनियम प्लेट की लागत कितनी है और फर्जीवाड़ा करने वाले को कितना मुनाफा हो रहा था, मगर जिस प्रकार का श्रमसाध्य काम उसने हाथ में लिया, उससे इतना तो अनुमान होता ही है कि पत्र जारी करवाने के बाद वह बेखौफ हो कर यह काम अंजाम दे रहा था। इस से संदेह होता है कि कहीं पत्र पर हस्ताक्षर असली तो नहीं। हालांकि जांच होगी तो निश्चित रूप से तत्कालीन मुख्य कार्यकारी अधिकारी मुकर ही जाने वाले हैं। वैसे जिला कलेक्टर गौरव गोयल का कहना है कि विकास अधिकारियों को भेजे पत्र पर मुख्य कार्यकारी अधिकारी एवं सदस्य सचिव जिला स्वच्छता मिशन जिला परिषद के दस्तखत सही है या नहीं इसकी भी जांच करवाई जाएगी।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

शुक्रवार, 11 अगस्त 2017

कौन होगा प्रो. सांवरलाल जाट का उत्तराधिकारी?

अजमेर लोकसभा सीट से सांसद प्रो. सांवर लाल जाट के निधन से रिक्त हुई सीट के लिए आगामी छह माह के भीतर उप चुनाव कराना संभावित है। ऐसे में भाजपा के लिए उनके जितना ही सशक्त उत्तराधिकारी तलाशना कठिन होगा। उधर कांग्रेस में भी चूंकि यहां के पूर्व सांसद व केन्द्रीय राज्य मंत्री सचिन पायलट प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष हैं और मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट किए जा रहे हैं, इस कारण वहां भी नया प्रत्याशी तलाशना कठिन टास्क होगा।
जहां तक भाजपा का सवाल है, उसके पास इस वक्त अजमेर जिले से दो राज्य मंत्री, दो संसदीय सचिव, एक प्राधिकरण के अध्यक्ष होने के कारण ऐसा प्रतीत होता है कि उसके पास जिला स्तरीय नेताओं की कोई कमी नहीं है, मगर सच्चाई ये है कि प्रो. जाट के निधन के बाद आगामी संभावित लोकसभा उपचुनाव के लिए सशक्त प्रत्याशी का अभाव है। यह अभाव तब भी था, जब भाजपा ने जाट को नजरअंदाज कर किरण माहेश्वरी को बाहर से ला कर चुनाव लड़वाया था।
ज्ञातव्य है कि स्वर्गीय जाट की रुचि अपने बेटे रामस्वरूप लांबा को नसीराबाद विधानसभा सीट से चुनाव लड़वाने थी, मगर भाजपा ने पूर्व जिला प्रमुख श्रीमती सरिता गेना को मैदान में उतारा, मगर वे हार गईं। उन्हें भी आगामी उपचुनाव में एक दावेदार माना जा सकता है, मगर चूंकि वे विधानसभा चुनाव हार चुकी हैं, इस कारण लगता नहीं कि भाजपा उन पर दाव खेलेगी। अजमेर डेयरी अध्यक्ष व प्रमुख जाट नेता रामचंद्र चौधरी जरूर भाजपा के खेमे में हैं, मगर अभी उन्होंने भाजपा ज्वाइन नहीं की है। वे एक दमदार नेता हैं, क्योंकि डेयरी नेटवर्क के कारण उनकी पूरे जिले पर पकड़ है। शायद ही ऐसा कोई गांव-ढ़ाणी हो, जहां उनकी पहचान न हो। यदि संघ सहमति दे दे तो वे भाजपा के एक अच्छे प्रत्याशी हो सकते हैं। यूं पूर्व जिला प्रमुख व मौजूदा मसूदा विधायक श्रीमती सुशील कंवर पलाड़ा के पति युवा भाजपा नेता भंवर सिंह पलाड़ा प्रयास कर सकते हैं, मगर भाजपा राजपूत का प्रयोग कितना कारगर मानती है, इस बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता।
बहरहाल, अब जबकि प्रो. जाट का स्वर्गवास हो गया है, संभव है भाजपा सहानुभूति वोट हासिल करने के लिए उनके पुत्र रामस्वरूप लांबा को चुनाव मैदान में उतारे।
जरा पीछे जाएं तो पूर्व सांसद प्रो. रासासिंह रावत लंबे समय तक स्थानीय प्रत्याशी के रूप में जीतते रहे। वे पांच बार जीते व एक बार हारे। रावत के सामने कांग्रेस ने भूतपूर्व राजस्व मंत्री किशन मोटवानी, पुडुचेरी के उपराज्यपाल बाबा गोविंद सिंह गुर्जर, जगदीप धनखड़ व हाजी हबीबुर्रहमान को लड़ाया गया था, जो कि हार गए। पूर्व राज्यसभा सदस्य डॉ. प्रभा ठाकुर एक बार उनसे हारीं और एक बार जीतीं। इनमें से मोटवानी व बाबा का निधन हो चुका है, जबकि धनखड़ ने राजनीति छोड़ दी है और हाजी हबीबुर्रहमान भाजपा में जा चुके हैं। डॉ. प्रभा ठाकुर अभी हयात हैं। स्थानीय सशक्त प्रत्याशी के अभाव में कांग्रेस ने सचिन पायलट को उतारा, और वह प्रयोग कारगर साबित हुआ। उन्होंने जिले में जितने कार्य करवाए, उतने तो पूर्व सासंद पच्चीस साल में भी नहीं करवा पाए, मगर मोदी लहर के चलते वे दूसरी बार नहीं जीत पाए। अब जब कि उपचुनाव की नौबत आ गई है तो एक बार फिर उनके नाम पर नजर अटकती है, मगर वे प्रदेश अध्यक्ष हैं और उन्हें यह दायित्व मुख्यमंत्री के रूप में ही प्रोजेक्ट करने के लिए ही दिया गया तो समझा जाता है कि वे विधानसभा चुनाव ही लड़ेंगे। ऐसे में कांग्रेस के लिए फिर लोकसभा चुनाव का प्रत्याशी तलाशना कठिन होगा। यदि जातीय समीकरण की बात करें तो कांग्रेस के पास सचिन के अतिरिक्त उनके जितना कोई दमदार गुर्जर नेता जिले में नहीं है। चूंकि यह सीट अब जाट बहुल हो गई है, उस लिहाज से सोचा जाए तो पूर्व जिला प्रमुख रामस्वरूप चौधरी व पूर्व विधायक नाथूराम सिनोदिया को दावेदार माना जा सकता है। गुर्जर प्रत्याशी के रूप में महेन्द्र गुर्जर का नाम लिया जा सकता है।
यदि जाट-गुर्जर से हट कर बात करें तो कांग्रेस के पास बनियों में पूर्व विधायक डॉ. श्रीगोपाल बाहेती हैं, जिनका नाम पूर्व में भी उभरा था। एक बार इस सीट पर जीत चुकी प्रभा ठाकुर के नाम पर भी विचार हो सकता है। उनके अतिरिक्त पूर्व विधायक रघु शर्मा व सेवादल के प्रदेशाध्यक्ष राजेश पारीक के भी नाम भी सामने आ सकते हैं। उधर भाजपा के पास पूर्व जिला प्रमुख पुखराज पहाडिय़ा हैं, हालांकि नगर सुधार न्यास के पूर्व अध्यक्ष धर्मेश जैन भी अपने आप को इस योग्य मानते रहे हैं। प्रयोग करने के लिए मौजूदा अजमेर नगर निगम मेयर धर्मेन्द्र गहलोत की विचारे जा सकते हैं।
बहरहाल, चूंकि इस साल के आखिर में गुजरात में विधानसभा चुनाव होने हैं, ऐसे में संभव है कि इसके साथ ही अजमेर का उपचुनाव भी करवा लिया जाए। कुल मिला कर यह तय है कि अजमेर लोकसभा का चुनाव कांग्रेस हो या भाजपा दोनों के लिए ही 2018 में होने वाले विधानसभा चुनावों के सेमीफाइनल की तरह होगा।
-तेजवानी गिरधर
7742067000