शुक्रवार, 29 सितंबर 2017

नए अवतार में आएंगे लाला बन्ना?

अजमेर नगर परिषद के पूर्व सभापति सुरेन्द्र सिंह शेखावत उर्फ लाला बन्ना की भाजपा में वापसी से ऐसा प्रतीत होता है कि सब कुछ पहले जैसा सामान्य हो जाएगा, मगर जिस घटनाक्रम के बाद वे लौटे हैं, उससे इस बात की संभावना अधिक है कि वे लाला बन्ना का दूसरा संस्करण या दूसरा अवतार होंगे।
वस्तुत: कोई ये कह सकता है कि किसी भी राजनीतिक व्यक्ति के लिए अंतत: मूल धारा में आना मजबूरी होता है, अत: वह हालात से समझौता कर लेता है, मगर जिस प्रकार का लाला बन्ना का व्यक्तित्व है, वे भाजपा में लौटने मात्र के लिए नहीं लौटे हैं। सब जानते हैं कि वे कितने ऊर्जावान और महत्वाकांक्षी हैं। भाजपा में ही ऐसे बहुत से हैं, जो भाजपा में रहते हुए भी मृतप्राय: हैं, मगर लाला बन्ना भाजपा से बाहर रहते हुए भी अपने वजूद को जिंदा रखे हुए रहे। उनकी अपनी फेन्स फॉलोइंग है, जिसने उन्हें विस्मृत नहीं होने दिया। इस बीच संजीदगी व गंभीरता भी बढ़ी है, लिहाजा पक्का मान कर  चलिए कि इस बार बड़ी चतुराई से मोहरे खेलेंगे। और उसकी वजह भी है, वे केवल स्थानीय स्तर पर जिंदा नहीं है, बल्कि ऊपर भी उनके तार बहुत मजबूत हैं। यानि कि अब लाला बन्ना का नया अवतार सामने आना वाला है।
रहा सवाल स्थानीय समीकरणों का, तो कुछ लोग यह मान कर चल सकते हैं कि चूंकि वे पूर्व में महिला व बाल विकास राज्य मंत्री श्रीमती अनिता भदेल के खास सिपहसालार रहे, इस कारण अब भी शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी विरोधी सेना के सेनापति होंगे ही, ये पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता। कहते हैं न कि रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो छिटकाय, टूटे से फिर न ना जुड़े, जुड़े गांठ पड़ जाय। इसकी वजह ये है कि भाजपा में औपचारिक तौर पर भले ही वापसी अब जा कर हुई, मगर वास्तविक सुलह तो नगर निगम के महापौर धर्मेन्द्र गहलोत से हाथ मिला कर हो गई थी। तभी ये तय हो गया था कि वे देर-सवेर भाजपा में शामिल होंगे, अन्यथा सुलह की जरूरत ही क्या थी? बाद में जिस प्रकार भाजपा के दिग्गज नेता ओम प्रकाश माथुर के अजमेर आगमन पर उनकी जो जिंदादिल मौजूदगी थी, वह इस बात का प्रमाण थी कि वापसी सुनिश्चित है। खैर, गहलोत के साथ सुलह राजगढ़ भैरोंधाम के मुख्य उपासक चंपालाल जी महाराज की पहल पर हुई या फिर दोनों सुलह चाहते थे, किसका इनीशियेटिव था पता नहीं, मगर इतना तय है कि सुलह के साथ उन दोनों के बीच कुछ तो तय हुआ ही होगा। ऐसे में यह सुनिश्चित तौर पर नहीं कह सकते कि लाला बन्ना फिर पुराने समीकरणों में समाहित हो जाएंगे। असल में भाजपा से बाहर रह कर उन्हें इस बात का भी ठीक अनुमान हो गया होगा कि उनकी राजनीतिक भलाई कैसा रोल अदा करने में है? कौन अपना और कौन पराया है? सबसे बड़ी बात ये है कि नीचे से ऊपर वे जिस लॉबी के हिस्से रहे हैं, वह कोई कमजोर लॉबी नहीं है। और उसमें भी वे कमजोर स्थिति में नहीं हैं। ऐसे में उम्मीद की जानी चाहिए कि वे किसी नई रणनीति के सूत्रधार होंगे। चूंकि उनमें पहले से अधिक परिपक्वता आई होगी, इस कारण लगता नहीं कि वे भावावेश में गैर सिंधीवाद की मुहिम का हिस्सा होंगे या मेयर बनने के लिए विरोधियों से हाथ मिलाने जैसा कदम उठाएंगे। बेशक अजमेर में गैर सिंधी व गैर अनुसूचित जाति के नेताओं के लिए सीमित संभावनाएं हैं, मगर उन सीमित संभावनाओं में भी वे अपने लिए स्थान सुनिश्चित कर लेंगे, ये मान कर चला जा सकता है।
-तेजवानी गिरधर
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मंगलवार, 26 सितंबर 2017

लाना बन्ना, सारस्वत, जैन व पहाडिय़ा का भी नाम उछल रहा है

राज्य किसान आयोग के अध्यक्ष व अजमेर सांसद रहे प्रो. सांवरलाल जाट के निधन से खाली हुई अजमेर लोकसभा सीट के लिए होने वाले उपचुनाव में भाजपा की ये मजबूरी है वह प्रो. जाट के ही परिवार से किसी को टिकट दे। अगर नहीं तो भी भाजपा किसी गैर जाट को टिकट देकर पूरी जमात को अपने खिलाफ नहीं कर सकती। अर्थात उसे किसी जाट को ही टिकट देनी होगी, चाहे वह अजमेर डेयरी अध्यक्ष रामचंद्र चौधरी हों या फिर सी बी गैना या कोई और। बावजूद इसके गैर जाटों में भी कई दावेदार उभर कर सामने आ रहे हैं। कदाचित वे भी जानते होंगे कि टिकट मिलना मुश्किल है, मगर कम से कम चर्चित होने का लाभ तो वे ले ही रहे हैं।
अजमेर उत्तर विधानसभा सीट की भाजपा टिकट के लिए सर्वाधिक चर्चित रहे अजमेर नगर परिषद के पूर्व सभापति सुरेन्द्र सिंह शेखावत उर्फ लाला बन्ना का नाम सोशल मीडिया पर खूब उछल रहा है। उनके समर्थक बाकायदा उनकी फोटो के साथ पोस्टें डाल रहे हैं। इसी प्रकार युवा भाजपा नेता व मसूदा की विधायक श्रीमती सुशील कंवर के पति भंवर सिंह पलाड़ा के नाम का भी सोशल मीडिया पर खूब हल्ला है। उनके समर्थक उन्हें भावी सांसद के रूप में देख रहे हैं। देहात जिला भाजपा अध्यक्ष प्रो. बी. पी. सारस्वत का नाम भी सुर्खियां पा रहा है। उनके लिए तो राजनीतिक पंडित एडवोकेट राजेश टंडन ने बाकायदा एक लंबी-चौड़ी पोस्ट फेसबुक पर डाली है। उनमें लिखा है कि भाजपा लोकसभा अजमेर उप चुनाव में प्रोफेसर सारस्वत को प्रत्याशी बनाने का बहुत गहनता से विचार कर रही है। सारस्वत को टिकट देने संघ लॉबी पूरी तरह साथ लग जायेगी, यह तो निश्चित है, भाजपा की अजमेर देहात जिला की कार्यकारिणी भी साथ लग जायेगी। उनकी जीत की संभावनाओं पर ग्राउंड से रिपोर्टें मंगवाई जा रही हैं। साथ ही उन्होंने यह आशंका भी जताई है कि सारस्वत के लड़ते ही जाट वोट नहीं मिलेगा। पूरे का पूरा प्रोफेसर सावंरलाल का खानदान चुनाव लडऩे को तैयार बैठा है।
इसी प्रकार पिछले दिनों प्रदेश के जाने-माने पत्रकार अनिल लोढ़ा ने इलैक्ट्रॉनिक मीडिया पर एक विश्लेषण में हालांकि कहा यही कि प्रो. जाट के पुत्र रामस्वरूप लांबा को इशारा कर दिया गया है, मगर साथ ही उन्होंने अजमेर नगर सुधार न्यास के पूर्व अध्यक्ष धर्मेश जैन का भी नाम लिया। यह वीडियो क्लीपिंग सोशल मीडिया पर खूब चली। ज्ञातव्य है कि जैन पूर्व में भी दावेदारी जता चुके हैं। जब जैन का नाम आता है कि लोग उनके साथ पूर्व जिला प्रमुख पुखराज पहाडिय़ा का नाम भी जोडऩे से नहीं चूकते।
-तेजवानी गिरधर
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सोमवार, 25 सितंबर 2017

प्रतिष्ठापूर्ण शिक्षा बोर्ड पर अनोखा सवालिया निशान

गोपनीयता व निष्पक्षता के मामले में राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड  का नाम पूरे देश में अव्वल है। यहां के परीक्षा सिस्टम को पूरे देश के शिक्षा बोर्डों में सर्वाधिक लीक प्रूफ माना जाता है। इसी वजह से देश के अनेक बोर्डों के प्रतिनिधिमंडल यहां आ कर यहां की कार्यप्रणाली जानने-समझने आ चुके हैं। देशभर के शिक्षा बोर्डों की संस्था कोब्से की अध्यक्षता करने का सौभाग्य स्थानीय बोर्ड अध्यक्ष को मिलने की वजह आदर्श परीक्षा पद्धति ही है। हालांकि समय-समय पर कर्मचारियों की लापरवाही व बदमाशी के कारण कुछ आर्थिक गड़बडिय़ां उजागर हुई हैं। इसके अतिरिक्त पेपर लीक के मामले भी सामने आए हैं, मगर उनमें अमूमन बोर्ड के बाहर की अधिक घटनाएं हैं। कुल मिला कर ऐसा माना जाता है कि इस बोर्ड में अंकों को लेकर घपलेबाजी या सेटिंग नहीं हो सकती। ऐसे प्रतिष्ठापूर्ण बोर्ड पर एक अनोखा सवालिया निशान अंकित हो गया है।
यह मामला अनोखा इस कारण है कि इसमें परीक्षक ने सेटिंग करके अंक बढ़ाए नहीं हैं, बल्कि घटाए हैं। अंक घटने के कारण सात परीक्षार्थियों को जब नुकसान हुआ तो उन्होंने मामला उजागर किया। असल में हुआ ये है कि कम अंक मिलने और अपने परिणाम से असंतुष्ट विद्यार्थियों ने बोर्ड से अपनी अंग्रेजी विषय की उत्तर पुस्तिकाओं की स्कैन प्रति निकलवाईं तो इन उत्तर पुस्तिकाओं की स्कैन प्रति को देख कर विद्यार्थियों के होश उड़ गए। शिक्षक ने सात विद्यार्थियों को पहले कुछ और अंक दिए और बाद में उन्हें व्हाइटनर से मिटा कर कम कर दिए। हालांकि इस प्रकरण को शिक्षक की लापरवाही करार दिया जा रहा है, मगर यह मामला साफ तौर पर सायास किया गया लगता है। लापरवाही तो तब होती जब शिक्षक उत्तर पुस्तिका को ठीक से नहीं जांचता, अथवा अंकों में योग में सावधानी नहीं रखता। व्हाइटनर से पुराने अंक छिपा कर नए अंक देने से यह साफ है कि यह जानबूझ कर किया गया है। ठीक से पड़ताल होने पर ही पता लग पाएगा कि परीक्षक ने बाद में जो अंक दिए हैं, वे सही हैं या गलत। इस प्रकरण के पीछे कोई साजिश है, यह तो जांच से ही सामने आ पाएगा, मगर संभावना इस बात की भी है कि पहले शिक्षक ने असावधानी के कारण कुछ अंक दिए, मगर जब उसे अपनी गलती का अहसास हुआ तो उसने व्हाइटनर से पुराने अंक छिपा कर नए अंक दे दिए। जहां तक व्हाइटनर लगाने का प्रश्र है तो केवल ऐसा करने मात्र से मामले को संगीन नहीं माना जा सकता। सुधार के लिए वह व्हाइटनर का उपयोग कर सकता है। मगर यदि उसने किसी दुश्मनी के भाव से अथवा किसी के कहने से इस प्रकार की कारसतानी की है तो यह वाकई गंभीर बात है।
हालांकि बोर्ड अध्यक्ष बी एल चौधरी ने जो प्रतिक्रिया दी है, वह अपेक्षित और सीधी-सपट भी है कि शिक्षक ने उत्तर पुस्तिका की जांच में लापरवाही बरती है और जांच के बाद इसकी पुष्टि हो जाएगी। बोर्ड ऐसे शिक्षक के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करेगा और उसे डीबार कर दिया जाएगा। मगर चूंकि बोर्ड की अपनी बड़ी प्रतिष्ठा है, इस कारण इस मामले को गंभीरता से लिया जाना चाहिए।
-तेजवानी गिरधर
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शनिवार, 23 सितंबर 2017

नगर निगम को अब कैसे नजर आ गई रेलवे की बिल्डिंग?

पिछले काफी समय से गांधी भवन चौराहे पर रेलवे स्टेशन परिसर में एक बहुमंजिला इमारत का निर्माण चल रहा है। संभवत: उसका ढ़ांचा बन कर पूरा हो गया है और अब उसे अंतिम रूप दिया जाना शेष है। मगर चंद कदम दूर ही स्थित नगर निगम को अचानक यह निर्माण खटक गया और उसने इस बहुमंजिला व्यावसायिक निर्माण को अवैध निर्माण बताते हुए काम बंद करने का नोटिस दिया है। इतना ही नहीं उसे अवैध निर्माण मानते हुए तोडऩे तक की आवश्यक कानूनी कार्यवाही करने को चेताया गया है। यह कैसी अंधेरगर्दी है?
हालांकि इस मामले में दोनों पक्षों की दलीलों पर गौर करें तो यह विभागीय तालमेल के अभाव अथवा नियमों की अस्पष्टता का मामला लगता है, मगर सवाल ये है कि जब बिल्डिंग इतनी ऊंचाई तक बन चुकी है, तब जा कर निगम को होश कैसे आया? एक के बाद एक मंजिल का निर्माण होता गया और अब यह विशालकाय हो चुकी है, तब जा कर ख्याल कैसे आया कि यह नियम विरुद्ध बन रही है? हालांकि निगम का यह रवैया नया नहीं है और गली-मोहल्लों में हो रहे निर्माण पूरे होने के करीब आने पर ही निगम को होश आता है, मगर ये निर्माण तो शहर की छाती पर हो रहा है, जिस पर गांधी भवन चौराहे से गुजरने वाले हर नागरिक की कई कई बार नजर पड़ चुकी है। बेहद अफसोसनाक बात है कि निगम के जिम्मेदार अधिकारियों की तंद्रा अब जा कर खुली है। स्मार्ट सिटी बनने जा रहे अजमेर में यदि ऐसे गैरजिम्मेदार व लापरवाह अधिकारी बैठे हैं तो इस शहर का भगवान ही मालिक है।
जहां तक विवाद का सवाल है, निगम का कहना है कि यह अगर रेलवे का कार्यालय होता तो कोई बात नहीं, कॉमर्शियल निर्माण के लिए तो अनुमति जरूरी है। दूसरी ओर निर्माण करवाने वाले हरसद तलेदा की तरफ से रेल भूमि विकास प्राधिकरण के जनरल मैनेजर वीरेंद्र कुमार ने तर्क दिया कि उक्त भूमि पर आरएलडीए यानी रेलवे भूमि विकास प्राधिकरण द्वारा निविदाएं आमंत्रित कर 45 वर्ष की लीज पर भूमि लेकर एमएफसी यानी मल्टी फंक्शन कॉम्पलेक्स के निर्माण के लिए दिया गया है। चूंकि एमएफसी रेलवे का संचालित भवन है, इसलिए रेल्वे अधिनियम के अंतर्गत इसके निर्माण की स्वीकृति स्थानीय नगरीय निकाय अथवा राज्य सरकार से लिए जाने की आवश्यकता नहीं है। यानि कि कुल मिला कर यह मामला नियमों की पेचीदगी का है। ऐसे में अगर यह प्रकरण कोर्ट में गया और निर्माण अवैध माना गया तो उसे तोडऩे से होने वाला नुकसान क्या देश का नुकसान नहीं होगा?
वैसे, लनता ये है कि आखिरकार इसका कोई न कोई रास्ता निकल आएगा, मगर तब तक यह विशालकाय भवन निगम को मुंह चिढ़ता रहेगा और आम जनता की जिज्ञासा बढ़ती ही जाएगी।
अंधेरगर्दी का दूसरा संगीन मामला
अजमेर नगर निगम की लापरवाही का दूसरा संगीन मामला भी गौर फरमाइये, जिसकी वजह से आम आदमी फोकट ही परेशान हो रहा है:-
नगर निगम द्वारा जलदाय विभाग के सहयोग से इस माह से सीवरेज सरचार्ज लिया जा रहा है, मगर कई उपभोक्ता ऐसे हैं, जिनके क्षेत्र में सीवरेज लाइन डाली ही नहीं गई और उनसे भी वसूली की जा रही है। असल में हुआ ये है कि निगम ने सीवरेज कनेक्शन लेने के लिए नोटिस जारी किए हैं, इस पर लोगों ने निगम में 600 रुपए की रसीद कटवा ली है। हालांकि अनेक आवेदकों के घरों के सीवरेज कनेक्शन या तो हुए नहीं हैं और या फिर सीवरेज कनेक्शन चालू किए नहीं गए हैं, लेकिन निगम ने सभी आवेदकों के नाम जलदाय विभाग को भिजवा दिए हैं, नतीजतन विभाग ने पानी के बिल के साथ सरचार्ज की राशि भी जोड़ दी गई है। ऐसे में जनता का परेशान होना स्वाभाविक ही है। जब उनका सीवरेज कनेक्शन चालू ही नहीं हुआ है तो वे काहे का सरचार्ज दें।
इस मामले में निगम के एक्सईएन केदार शर्मा का हास्यास्पद बयान देखिए कि इस त्रुटि का जल्द ही समाधान कर दिया जाएगा। वे कह रहे है कि ऐसे उपभोक्ता परेशान होने के बजाए निगम की योजना शाखा में आकर प्रार्थना पत्र मय मोबाइल नंबर दे सकते हैं। इसके लिए निगम स्तर पर एक कार्मिक को जिम्मेदारी भी सौंप दी गई है। अजी महाराज, गलती आपकी और जनता निगम को चक्कर काटे, क्या वह फालतू है? आपको केवल उनके  के नाम जलदाय विभाग को भेजने चाहिए थे ना, जिनके सीवरेज कनेक्शन हो चुके हैं।
शर्मा कह रहे हैं कि उपभोक्ताओं की परेशानी को देखते हुए जलदाय विभाग के अधिकारियों से चर्चा की गई है। यदि पानी के बिल की अंतिम तिथि करीब ही है तो उक्त बिल को जमा करवा दें। अगले माह में आने वाले पानी के बिल में उक्त राशि को समायोजित कर लिया जाएगा। अरे प्रभु, पहले बिल में राशि जोडऩे और फिर समायोजित करने की मशक्कत क्यों करवाई? इस प्रकार की बेगारी करवाने के लिए कौन जिम्मेदार है? क्या कानून को उसकी गर्दन नहीं नापनी चाहिए?
-तेजवानी गिरधर
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लाचार शहर के लाचार मंत्री

गत दिवस स्वायत्त शासन मंत्री श्रीचंद कृपलानी की मौजूदगी में स्थानीय जनप्रतिनिधियों, जो कि राज्य सरकार में मंत्री भी हैं, ने जिस प्रकार स्मार्ट सिटी में काम न होने का रोना रोया, उससे एक ओर तो यह आभास कराया गया कि उन्हें अजमेर की बड़ी चिंता है, दूसरी ओर यह भी साबित हो गया कि टायर्ड-रिटायर्ड लोगों के इस लाचार शहर के मंत्री भी कितने लाचार हैं।
शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी का तो यहां तक कहना था कि स्मार्ट सिटी केवल चर्चाओं में है, काम नहीं हो रहे। स्मार्ट सिटी पर काम कम, बातें ज्यादा हो रही हैं। जिस प्रकार काम चल रहा है, इसमें सालों लग जाएंगे। हम जब जनता के बीच जब जाएंगे तो उन्हें क्या जवाब देंगे। हालत ये थी कि मंत्री की हैसियत रखने वाले देवनानी को भी पूछना पड़ा कि स्मार्ट सिटी योजना के तहत अब तक कितना पैसा खर्च हो चुका है। अफसोसनाक बात देखिए कि बैठक के आखिर तक अधिकारी भी ये नहीं बता पाए कि दिल्ली से कितना आ बजट चुका है।
महिला एवं बाल विकास राज्यमंत्री अनिता भदेल की लाचारी देखिए कि उन्हें यह तक कहना पड़ा कि अमृत योजना में क्या चल रहा है, इसकी उनके पास जानकारी नहीं है। बैठक में उन्हें बुलाया ही नहीं जाता है। उनके विधानसभा क्षेत्र में सीवरेज की लाइनें जाम हो चुकी हैं, गंदा पानी ओवर फ्लो होकर सड़कों पर रहा है। निगम अधिकारियों को कई बार कहा, लेकिन उनकी समस्या का समाधान नहीं हो रहा है। अब जब हम जनता के बीच जाएंगे तो उन्हें क्या जवाब दें? शहर जिला भाजपा अध्यक्ष अरविंद यादव तक की स्थिति भी कमोबेश ऐसी ही थी। उन्हें यहां तक कहना पड़ा कि लेपटॉप लेकर आने से बैठक पूरी नहीं हो जाती। जनता को हमें जवाब देना है। आचार संहिता लग जाएगी तब बजट का उपयोग किया जाएगा क्या?
देवनानी सहित अन्य जनप्रतिनधियों ने स्ट्रीट लाइट जैसी मूलभूत सुविधा को लेकर हो रही लापरवाही का रोना रोया, जिसका संचालन ईएसएल कंपनी करती है।
समझा जा सकता है कि हमारे जनप्रतिनिधि कितने लाचार हैं। जब वे ही संतुष्ट नहीं हैं तो जनता की क्या हालत होगी, इसकी कल्पना सहज ही की जा सकती है।
रहा सवाल जनप्रतिनधियों का तो वे समझ रहे हैं कि वे वैसा परफोरमेंस नहीं दे पाए हैं, जिसकी जनता अपेक्षा कर रही है। चार साल पूरे होने को हैं। बाकी एक साल बचा है। अगर ही हाल रहा तो जनता पलटी भी खिला सकती है। बस इसी बात की उन्हें चिंता सता रही है। विधानसभा चुनाव की छोड़ो, दो माह बाद लोकसभा उपचुनाव होने हैं। उन्हें डर है कि जनता का असंतोष भारी न पड़ जाए। ऐसे में जाहिर तौर पर हाईकमान कान उमेड़ेगा, इस कारण इस महत्वूपूर्ण बैठक में अपना असंतोष जाहिर कर दिया ताकि बाद में कहा जा सके वे तो पहले ही कह रहे थे कि जनता के काम ठीक से नहीं हो रहे।
एक ही पार्टी के जनप्रतिनिधियों के बीच तालमेल की हालत ये है कि वे एक-दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगा रहे हैं। काम न होने की शिकायत का ठीकरा अजमेर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष शिव शंकर हेडा पर फोडऩे की कोशिश की गई। अजमेर नगर निगम के मेयर धर्मेन्द्र गहलोत का कहना था कि एडीए एवं आवासन मंडल की कई योजनाएं हैं, लेकिन उन्हें निगम को ट्रांसफर नहीं किया है, जबकि इन क्षेत्रों में साफ सफाई एवं लाइट की जिम्मेदारी निगम प्रशासन की रहती है।
-तेजवानी गिरधर
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