रविवार, 27 जनवरी 2019

किशनगढ़ के निर्दलीय विधायक टाक के सामने है धर्मसंकट

हाल ही संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा से बगावत करके निर्दलीय रूप में जीते किशनगढ़ के विधायक सुरेश टाक, भले ही खुश हो लें कि उनकी विधायक बनने की इच्छा पूरी हो गई, मगर सरकार कांग्रेस की बनने के कारण वे धर्मसंकट में हैं। अगर आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा का साथ देते हैं तो किशनगढ़ के विकास के लिए सरकार का अपेक्षित सहयोग नहीं ले पाएंगे और अगर कांग्रेस का साथ देते हैं तो उनका खुद का भाजपाई जनाधार ही खो जाएगा।
भले ही वे निर्दलीय रूप से चुने गए हैं, मगर यह सच है कि उन्हें अधिसंख्य वोट भाजपा मानसिकता के ही मिले होंगे। जीत इस कारण गए क्योंकि पूरा शहर लगभग एकजुट सा हो गया। कांग्रेस विचारधारा के शहरी वोटर ने भी उनका साथ दिया ही होगा। किशनगढ़ वासियों की लंबे समय से यह इच्छा रही कि कोई गैर जाट जीत कर आए, मगर दोनों ही दल जातीय समीकरण के तहत जाट को ही प्रत्याशी बनाते रहे। ऐसे में हर बार जाट ही जीत कर आता, कभी कांग्रेस का तो कभी भाजपा का। चूंकि विधायक देहात पृष्ठभूमि के होते थे, इस कारण उनकी उतनी रुचि शहर में नहीं होती थी, जितना कि शहर वासी अपेक्षा करते थे।
इस बार कांग्रेस व भाजपा, दोनों ने जाट को ही टिकट दिया तो टाक को निर्दलीय रूप में मैदान में उतर कर त्रिकोण बनाने का मौका मिल गया।  संयोग ऐसा हुआ कि पूर्व कांग्रेस विधायक नाथूराम सिनोदिया भी बागी बन गए और मुकाबला चतुष्कोणीय हो गया। टाक ने 17452 मतों से जीत दर्ज की। टाक को 82678, भाजपा के विकास चौधरी को 65226, निर्दलीय नाथूराम सिनोदिया को 22851, कांग्रेस के नन्दाराम को 15157 वोट मिले।  यदि सिनोदिया व नंदाराम के वोटों को जोड़ लिया जाए तो भी आंकड़ा टाक व चौधरी को मिले वोटों से कम बैठता है। उसकी वजह साफ है कि शहर की हवा के साथ बहे कांग्रेसी वोट भाजपा मानसिकता के टाक की झोली में पड़ गए।
खैर, अब टाक के सामने धर्मसंकट ये है कि वे करें क्या? एक ओर विधानसभा क्षेत्र के विकास की समस्या है तो दूसरी ओर भाजपा मानसिकता के मतदाताओं की नाराजगी का खतरा। हालांकि होना ये है कि लोकसभा चुनाव में वे जो कुछ करें, मगर वोटों का बंटवारा विशुद्ध रूप से पार्टी के आधार पर हो जाएगा। जिन शहरी कांग्रेसी मतदाताओं ने टाक को वोट दिए, वे अब वापस कांग्रेस का रुख करेंगे। वो तो शहर के नाम पर टाक के साथ हुए थे, मगर अब वे स्वतंत्र हैं।
हालांकि जब टाक जीते तो मतगणना के तुरंत बाद उनसे पूछा गया कि वे किसका साथ देंगे तो उन्होंने डिप्लोमेटिक जवाब दिया कि परिस्थिति के अनुसार देखा जाएगा। परिस्थिति ऐसी बनी कि कांग्रेस को सरकार बनाने के लिए निर्दलियों की उतनी जरूरत नहीं रही। अगर आंकड़ा कुछ कम होता तो कदाचित कांग्रेस का साथ दे कर कुछ हासिल कर सकते थे, जैसे पिछली बार ब्रह्मदेव कुमावत ने किया और संसदीय सचिव बन गए। उनके लिए तो फिर भी आसान रहा क्योंकि वे कांग्रेस पृष्ठभूमि से थे और सरकार भी कांग्रेस की ही बनी। लेकिन टाक के लिए यह आसान नहीं, क्योंकि उन्हें तो ऐसा करने के लिए पाला ही बदलना पड़ेगा। पिछले दिनों अन्य निर्दलियों के साथ जब वे सरकार से मिले तो सवाल उठा कि क्या वे कांग्रेस की ओर झुकाव रखने जा रहे हैं, इस पर उन्हें साफ करना पड़ा कि उनकी रुचि क्षेत्र के विकास में है और चूंकि सरकार कांग्रेस की है तो उनसे तो मिलना ही पड़ेगा।
बहरहाल, जब सरकार बनाने वाली पार्टी के पास बहुमत का आंकड़ा कम होता है तो निर्दलियों की बल्ले-बल्ले हो जाती है, मगर यदि ज्यादा गरज नहीं हो तो निर्दलियों का हाल वैसा ही हो जाता है, जैसा कि सुरेश टाक का।

भाजपा में बाहरी प्रत्याशी लाए जाने की चर्चा

राजनीतिक हलके में खुसर-फुसर है कि आगामी लोकसभा चुनाव में अजमेर सीट के लिए टिकट की दावेदारी कर रहे नेता भले ही अपने आपको मजबूत प्रत्याशी मान और बता रहे हैं, मगर उनमें से किसी पर भी इतना भरोसा नहीं किया जा पा रहा है कि वे जिताऊ हैं।
फिलहाल चर्चा में सबसे प्रबल नाम देहात जिला भाजपा अध्यक्ष प्रो. बी. पी. सारस्वत का नाम है। उनके अतिरिक्त अजमेर नगर निगम के मेयर धर्मेन्द्र गहलोत, युवा भाजपा नेता भंवर सिंह पलाड़ा, पूर्व यूआईटी चेयरमैन धर्मेश जैन, पूर्व जिला प्रमुख पुखराज पहाडिय़ा, पूर्व जिला प्रमुख श्रीमती सरिता गैना, पूर्व विधायक भागीरथ चौधरी आदि की भी दावेदारी सामने आई है। अजमेर लोकसभा सीट से पांच बार जीते प्रो. रासासिंह रावत भी दावा ठोक रहे हैं। हालांकि भाजपा हाईकमान जानता है कि इस संसदीय क्षेत्र में तकरीबन ढ़ाई लाख जाट मतदाता हैं, इस कारण जाट प्रत्याशी ही सबसे मजबूत रहेगा, मगर उसके पास दमदार जाट नेता नहीं है, जिसे जिताऊ मान लिया जाए।
ज्ञातव्य है कि भूतपूर्व मंत्री स्वर्गीय प्रो. सांवर लाल जाट ने पिछले चुनाव में कांग्रेस के सेलिब्रिटी केंडीडेट सचिन पायलट को हरा दिया था। इसमें उस वक्त चली मोदी लहर के साथ उनका जाट होना प्रमुख कारक माना जाता है। उनके निधन के बाद हुुए उपचुनाव में हालांकि भाजपा ने प्रो. जाट के निधन से उपजी सहानुभूति व जाट फैक्टर को ख्याल में रखते हुए उनके ही पुत्र रामस्वरूप लांबा पर दाव खेला, मगर वे कांग्रेस के डॉ. रघु शर्मा से हार गए। हार के कारणों में एंटी इन्कंबेंसी, लांबा की कमजोर प्रस्तुति, भाजपा संगठन में एकजुटता का अभाव आदि को प्रमुख कारणों में गिना गया। बावजूद इसके यह तथ्य स्थापित हो गया कि ब्राह्मण प्रत्याशी भी जीत सकता है। इसी कारण प्रो. सारस्वत सबसे प्रबल दावेदार बन कर उभरे हैं। इसके पीछे उनकी जिले भर में अब तक की मेहनत और संगठन पर मजबूत पकड़ को गिना जा रहा है। फिर भी समझा जा रहा है कि सारस्वत पूरी तरह से जीत का घोड़ा नहीं है। रघु शर्मा की जीत के समीकरण अलग थे। उनको उदाहरण मान कर सारस्वत को टिकट देना गलत कदम भी हो सकता है। तत्कालीन परिस्थितियों में कदाचित ब्राह्मण वोट लामबंद हो गया हो, मगर इस बार भी ऐसा ही होगा, यह पक्के तौर पर नहीं माना जा सकता। रघु शर्मा को एंटी इन्कंबेंसी का लाभ मिला था, जबकि सारस्वत को एंटी इन्कंबेंसी का सामना करना होगा। अगर उन्हें टिकट दिया जाता है तो जाट वोट बैंक का क्या किया जाएगा, यह भी सबसे बड़ा विचारणीय बिंदु है। सारस्वत के अतिरिक्त अन्य दावेदारों की बात करें तो जाटों में भागीरथ चौधरी व श्रीमती सरिता गैना को जिला स्तर पर सर्वमान्य जाट नेता नहीं माना जा रहा। गैर जाट दावेदारों में पलाड़ा, गहलोत, जैन व पहाडिय़ा हैं तो अच्छे दावेदार, मगर उन्हें पक्के तौर पर जिताऊ नहीं माना जा रहा। आज जब कि भाजपा का ग्राफ गिरा है तो यह बात प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी जानते हैं कि इस बार पूरी पच्चीस की पच्चीस सीटें तो मिलनी हैं नहीं। ताजा माहौल में भाजपा तकरीबन दस से पंद्रह सीटें खो सकती है। ऐसे में मोदी की पूरी कोशिश रहेगी कि एक-एक सीट पर ठोक बजा कर प्रत्याशी उतारे जाएं। स्थानीय दबाव की वजह से किसी भी सशंकित दावेदार पर दाव नहीं खेला जा सकता है। यदि नागौर के मौजूदा सांसद सी. आर. चौधरी का नाम चर्चा में है तो इसी कारण कि उन्हें अन्य सभी स्थानीय दावेदारों की तुलना में अपेक्षाकृत मजबूत माना जा रहा है। नाथूसिंह गूजर का नाम भी चर्चा में है, मगर गूजर नेता के रूप में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट के रहते वे कितने गूजरों को अपनी ओर खींच पाएंगे, इसका अनुमान नहीं लगाया जा पा रहा। हालांकि हाल ही संपन्न विधासभा चुनाव में भाजपा ने आठ में से पांच पर जीत दर्ज की है, मगर लोकसभा चुनाव के समीकरणों को ध्यान में रखते हुए किसी सेलिब्रिटी को आयातित किए जाने की भी चर्चा है।

मंगलवार, 22 जनवरी 2019

बहुत दिलचस्प है अजमेर संसदीय क्षेत्र का चुनावी मिजाज

तेजवानी गिरधर
अरावली पर्वत शृंखला के दामन में पल रहे अजमेर संसदीय क्षेत्र मेवाड़ और मारवाड़ की संस्कृतियों को मिला-जुला रूप है। नजर को और विहंगम करें तो इसकी तस्वीर में अनेक संस्कृतियों के रंग नजर आते हैं। और यही वजह है कि न तो इसकी कोई विशेष राजनीतिक संस्कृति हैं और न ही विशिष्ट राजनीतिक पहचान बन पाई। राजनीतिक लिहाज से यदि ये कहा जाए कि ये तीन लोक से मथुरा न्यारी है, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
सन् 1952 से शुरू हुआ अजमेर का संसदीय सफर काफी रोचक रहा है। राजस्थान में शामिल होने से पहले अजमेर एक अलग राज्य था। सन् 1952 में हुए प्रथम लोकसभा चुनाव में अजमेर राज्य में दो संसदीय क्षेत्र थे-अजमेर उत्तर व अजमेर दक्षिण।
तेजवानी गिरधर
राजस्थान में विलय के बाद 1957 में यहां सिर्फ एक संसदीय क्षेत्र हो गया।
चुनावी मिजाज की बात करें तो कभी यह राष्ट्रीय लहर में बह कर मुख्य धारा में एकाकार हो गया तो कभी स्थानीयतावाद में सिमट कर बौना बना रहा। और यही वजह है कि लंबे अरसे तक यहां कभी सशक्त राजनीतिक नेतृत्व उभर कर नहीं आया। जब कभी नेतृत्व की बात होती तो घूम-फिर कर बालकृष्ण कौल, पं. ज्वाला प्रसाद शर्मा या मुकुट बिहारी लाल भार्गव जैसे ईन, बीन और तीन नामों पर आ कर ठहर जाती। नतीजतन आजादी के बाद राजस्थान की राजधानी बनने का दावा रखने वाला अजमेर राजनीतिक उपेक्षा का शिकार रहा। हां, अलबत्ता सचिन पायलट के यहां से जीत कर केन्द्र में राज्य मंत्री बनने पर जरूर इसका कद बना।

दो दलों का ही रहा वर्चस्व
जहां तक राजनीतिक विधारधारा का सवाल है तो यहां प्राय: दो राजनीतिक दलों का ही वर्चस्व रहा है। आजादी के बाद सन् 1952 से 1977 तक इस इलाके में कांग्रेस का ही बोलबाला रहा। लेकिन इसके बाद कांग्रेस के खिलाफ चली देशव्यापी आंधी ने इस गढ़ को ढ़हा दिया और जनता पार्टी के श्रीकरण शारदा ने बदलाव का परचम फहरा दिया। सन् 1980 में जैसे ही देश की राजनीति ने फिर करवट ली तो कांग्रेस के आचार्य भगवानदेव ने कब्जा कर लिया। भगवान देव ने जनता पार्टी के श्रीकरण शारदा को 53 हजार 379 मतों से पराजित किया था। देव को 1 लाख 68 हजार 985 और शारदा को 1 लाख 25 हजार 606 मत मिले थे। उसके बाद सन् 1984 में विष्णु मोदी ने यह सीट कांग्रेस की झोली मे ही बनाए रखी। मोदी ने भाजपा के कैलाश मेघवाल को 56 हजार 694 वोटों से पराजित किया। मोदी को 2 लाख 16 हजार 173 और मेघवाल को 1 लाख 59 हजार 479 मत मिले थे। 1989 में लंबे अरसे के लिए यह सीट भाजपा की झोली में चली गई। भाजपा मानसिकता के डेढ़ लाख रावत वोटों का समीकरण ऐसा बैठा कि प्रो. रासासिंह रावत ने इस पर कब्जा कर लिया और पांच बार जीते। केवल एक बार 1998 में डॉ. प्रभा ठाकुर ने उन्हें हराया। रावत के सामने सन् 1989 में सवा लाख गुर्जरों के दम उतरे कांग्रेस के बाबा गोविंद सिंह गुर्जर 1 लाख 8 हजार 89 वोटों से हारे। गुर्जर को 1 लाख 86 हजार 333 व रावत को 2 लाख 11 हजार 676 वोट मिले। सन् 1991 में रावत ने डेढ़ लाख जाटों के वोट बैंक को आधार पर चुनाव मैदान में उतरे जगदीप धनखड़ को 25 हजार 343 वोटों से हराया। सन् 1996 में एक लाख सिंधी मतदाताओं का कार्ड खेलते हुए किशन मोटवानी मैदान में आए, मगर 38 हजार 132 वोटों से पराजित हो गए। सन् 1998 के मध्यावधि चुनाव में सोनिया गांधी राजनीति में सक्रिय हुईं तो एक लहर चली और उस पर सवार हो कर डॉ. प्रभा ठाकुर ने रासासिंह के लगातार चौथी बार लोकसभा में जाने पर ब्रेक लगा दिया। जीत का अंतर सिर्फ 5 हजार 772 मतों का रहा। उसके बाद 1999 में रासासिंह ने प्रभा ठाकुर को 87 हजार 674 मतों से हरा दिया। सन् 2004 में रासासिंह ने कांग्रेस के हाजी हबीबुर्रहमान को 1 लाख 27 हजार 976 मतों के भारी अंतर से हराया। हबीबुर्रहमान को 1 लाख 86 हजार 812 व रावत को 3 लाख 14 हजार 788 वोट मिले थे। इसके बाद 2009 में चूंकि परिसीमन के कारण संसदीय क्षेत्र का रावत बहुल मगरा-ब्यावर इलाका कट कर राजसमंद में चला गया तो रावत का तिलिस्म टूट गया। भाजपा ने उन्हें टिकट नहीं दिया। उनके स्थान पर श्रीमती किरण माहेश्वरी आईं, मगर वे कांग्रेस के सचिन पायलट से 76 हजार 135 वोटों से हार गईं। कुल 14 लाख 52 हजार 490 मतदाताओं वाले इस संसदीय क्षेत्र में पड़े 7 लाख 70 हजार 875 मतों में सचिन को 4 लाख 5 हजार 575 और किरण को 3 लाख 29 हजार 440  मत मिले। सन् 2014 में मोदी लहर में पूरे राजस्थान में कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया। भारतीय जनता पार्टी के सांवर लाल जाट ने निकटतम प्रतिद्वंदी इण्डियन नेशनल कांग्रेस के सचिन पायलट को एक लाख 71 हजार 983 मतों से पराजित किया। जाट को 6 लाख 37 हजार 874 मत मिले, जबकि पायलट को 4 लाख 65 हजार 891 मत मिले। प्रो. जाट के निधन के बाद 2018 में हुए उपचुनाव में इण्डियन नेशनल कांग्रेस के रघु शर्मा विजयी रहे। उन्होंने भाजपा के रामस्वरूप लाम्बा को 84414 मतों से हराया। रघु शर्मा को 611514 एवं रामस्वरूप लाम्बा को 527100 मत मिले।

जातिवाद के दम पर पांच बार कब्जा रहा भाजपा का
असल में राजनीति का प्रमुख कारक जातिवाद यहां 1984 तक अपना खास असर नहीं डाल पाया था। अत्यल्प जातीय आधार के बावजूद यहां से मुकुट बिहारी लाल भार्गव तीन बार, विश्वेश्वर नाथ भार्गव दो बार व श्रीकरण शारदा एक बार जीत चुके हैं। आचार्य भगवान देव की जीत में सिंधी समुदाय और विष्णु मोदी की विजय में वणिक वर्ग की भूमिका जरूर गिनी जा सकती है। लेकिन सन् 1989 में डेढ़ लाख रावत वोटों को आधार बना कर रासासिंह को उतारा तो यहां का मिजाज ही बदल गया। कांग्रेस ने भी बदल-बदल कर जातीय कार्ड खेले मगर वे कामयाब नहीं हो पाए। रावत के सामने सन् 1989 में बाबा गोविंद सिंह गुर्जर, सन् 1991 में जगदीप धनखड़, सन् 1996 में किशन मोटवानी को उतारा गया, मगर वे हार गए। सन् 1998 के मध्यावधि चुनाव में प्रभा ठाकुर ने रासासिंह को लगातार चौथी बार लोकसभा  में जाने रोक दिया। फिर 1999 में रासासिंह ने प्रभा ठाकुर को हरा दिया। सन् 2004 में रासासिंह ने कांग्रेस के हाजी हबीबुर्रहमान को हराया। सन् 2009 के चुनाव में इस सीट की तस्वीर जातीय लिहाज से बदल गई। जहां रावत बहुल मगरा क्षेत्र की ब्यावर सीट राजसमंद में चली गई तो दौसा संसदीय क्षेत्र की अनुसूचित जाति बहुल दूदू सीट यहां जोड़ दी गई है। कुछ गांवों की घट-बढ़ के साथ पुष्कर, नसीराबाद, किशनगढ़, अजमेर उत्तर, अजमेर दक्षिण, मसूदा व केकड़ी यथावत रहे, जबकि भिनाय सीट समाप्त हो गई। परिसीमन के साथ ही यहां का जातीय समीकरण बदल गया। रावत वोटों के कम होने के कारण समझें या फिर सचिन जैसे दिग्गज की वजह से, रासासिंह रावत का टिकट पिछली बार काट दिया गया और श्रीमती किरण माहेश्वरी को पटखनी दे कर सचिन जीते तो यहां कांग्रेस का कब्जा हो गया। उसके बाद 2014 में एक तो मोदी लहर और दूसरा ढ़ाई लाख जाट वोटों के दम पर प्रो. सांवरलाल जाट ने विकास पुरुष माने जाने वाले पायलट को हरा दिया। प्रो. जाट के निधन के बाद 2018 में हुए उपचुनाव में हालांकि सहानुभूति वोट हासिल करने की गरज से भाजपा ने प्रो. जाट के पुत्र रामस्वरूप लांबा को मैदान में उतारा, मगर वे कांग्रेस के रघु शर्मा से हार गए।

रावत जीत-हार दोनों में अव्वल
मौजूदा सांसद रासासिंह रावत संसदीय इतिहास में ऐसे प्रत्याशी रहे हैं, जिन्होंने सर्वाधिक मतांतर से जीत दर्ज की है तो एक बार हारे भी तो सबसे कम मतांतर से।  रावत ने सन् 2004 में कांग्रेस की हबीबुर्रहमान को 1 लाख 27 हजार 976 मतों से हराया, जो कि एक रिकार्ड है। इसी प्रकार सन् 1998 में वे मात्र 5 हजार 772 मतों  से ही हार गए, वह भी एक रिकार्ड है। सर्वाधिक मत हासिल करने का रिकार्ड भी रावत के खाते दर्ज है। सन् 1999 में उन्होंने 3 लाख 43 हजार 130 मत हासिल किए। सर्वाधिक बार जीतने का श्रेय भी रावत के पास है। वे यहां से कुल पांच बार जीते, जिनमें से एक बार हैट्रिक बनाई। यूं हैट्रिक मुकुट बिहारी लाल भार्गव ने भी बनाई थी। सर्वाधिक छह बार चुनाव लडऩे का रिकार्ड रावत के साथ निर्दलीय कन्हैयालाल आजाद के खाते में दर्ज है। चुनाव लडऩा आजाद का शगल था। वे डंके की चोट वोट मांगते थे और आनाकानी करने वालों को अपशब्द तक कहने से नहीं चूकते थे।

सबसे कम कार्यकाल प्रभा का
सबसे कम कार्यकाल प्रभा ठाकुर का रहा। वे फरवरी, 1998 के मध्यावधि चुनाव में जीतीं और डेढ़ साल बाद सितंबर, 1999 में फिर चुनाव हो गए। उनका कार्यकाल केवल 16 माह ही रहा, क्योंकि जून में लोकसभा भंग हो गई।

सर्वाधिक प्रत्याशी 1991 में
अजमेर के संसदीय इतिहास में 1991 के चुनाव में सर्वाधिक 33 प्रत्याशियों ने अपना भाग्य आजमाया। सबसे कम 3 प्रत्याशी सन् 1952 के पहले चुनाव में अजमेर दक्षिण सीट पर उतरे थे।

अब तक ये रहे हैं अजमेर से सांसद
1951 से 57 तक कांग्रेस के ज्वाला प्रसाद शर्मा
1957 से 67 तक (लगातार 2 बार) कांग्रेस के मुकुट बिहारी भार्गव
1967 से 77 तक (लगातार 2 बार) कांग्रेस के बीएन भार्गव
1977 से 80 तक जनता पार्टी के श्रीकरण शारदा
1980 से 84 तक कांग्रेस के भगवानदेव आचार्य
1984 से 89 तक कांग्रेस के विष्णुकमार मोदी
1989 से 98 तक (लगातार 3 बार) भाजपा के रासासिंह रावत
1998 से 99 तक कांग्रेस की प्रभा ठाकुर
1999 से 2009 तक (लगातार 2 बार) भाजपा के रासासिंह रावत
2009 से 2014 तक कांग्रेस के सचिन पायलट
2014 से 2017 तक भाजपा के सांवरलाल जाट
2017 से 2018 तक कांग्रेस के रघु शर्मा

सिंधी क्यों नहीं हो सकता लोकसभा चुनाव का प्रत्याशी?

जिस सिंधी समाज को कांग्रेस ने लगातार तीसरी बार अजमेर उत्तर से विधानसभा का टिकट नहीं दिया, उसी की प्रतिनिधि संस्था सिंधु जागृति मंच ने हाल ही जब दोनों राजनीतिक दलों से सिंधी समाज के किसी व्यक्ति को लोकसभा का टिकट देने मांग की, तो सभी का चौंकना स्वाभाविक था। आम धारणा यही है कि अजमेर संसदीय क्षेत्र में सिंधी वोट बैंक इतना भी बड़ा भी नहीं कि उसे गंभीरता से लेते हुए टिकट दे दिया जाए। इस सिलसिले में जब मंच के समन्वयक हरी चंदनानी से पूछा गया कि आपकी मांग अथवा दावे का आधार क्या है तो वे बोले कि मांग हवा में नहीं की गई है।
उन्होंने बताया कि भाजपा ने अपना वोट बैंक होते हुए भी भले ही सिंधी को टिकट नहीं दिया हो, मगर कांग्रेस ने दो बार सिंधी पर दाव खेला है। सन् 1980 में कांग्रेस ने आचार्य भगवानदेव को टिकट दिया था और वे जीते भी। भगवान देव ने जनता पार्टी के श्रीकरण शारदा को 53 हजार 379 मतों से पराजित किया था। देव को 1 लाख 68 हजार 985 और शारदा को 1 लाख 25 हजार 606 मत मिले थे। इसके बाद 1996 में कांग्रेस ने किशन मोटवानी को टिकट दिया और वे मात्र 38 हजार 132 वोटों से पराजित हुए।
उन्होंने बताया कि छह लोकसभा चुनावों में, 1998 को छोड़ कर, पांच में रासासिंह रावत ने विजय पताका फहराई। कांग्रेस ने भी बदल-बदल कर जातीय कार्ड खेले, मगर वे कामयाब नहीं हो पाए। रावत के सामने सन् 1989 में सवा लाख गुर्जरों के दम पर उतरे बाबा गोविंद सिंह गुर्जर 1 लाख 8 हजार 89 वोटों से हारे। सन् 1991 में रावत ने डेढ़ लाख जाटों के दम पर उतरे जगदीप धनखड़ 25 हजार 343 वोटों से हराया। धनखड़ को 1 लाख 86 हजार 333 व रावत को 2 लाख 11 हजार 676 वोट मिले थे। सन् 1998 के मध्यावधि चुनाव में सोनिया गांधी के राजनीति में सक्रिय होने के साथ चली हल्की लहर पर सवार हो कर सियासी शतरंज की नौसिखिया खिलाड़ी प्रभा ठाकुर ने रासासिंह को लगातार चौथी बार लोकसभा में जाने रोक दिया था। हालांकि इस जीत का अंतर सिर्फ 5 हजार 772 मतों का रहा, लेकिन 1999 में आए बदलाव के साथ रासासिंह ने प्रभा ठाकुर को 87 हजार 674 मतों से पछाड़ कर बदला चुका दिया। इसके बाद 2004 में रासासिंह ने कांग्रेस के बाहरी प्रत्याशी हाजी हबीबुर्रहमान को 1 लाख 27 हजार 976 मतों के भारी अंतर से कुचल दिया। हबीबुर्रहमान को 1 लाख 86 हजार 812 व रावत को 3 लाख 14 हजार 788 वोट मिले थे। इस हिसाब से देखा जाए तो कांग्रेस के सिंधी प्रत्याशी का प्रदर्शन कमजोर नहीं रहा है, उलटे गुर्जर व मुसलमान की तुलना में काफी बेहतर रहा है। वह भी तब जब कि सिंधियों में आरएसएस का कट्टर समर्थक वर्ग कांग्रेस के साथ नहीं आया। तब काको आडवाणी, मामो मोटवाणी का नारा चला था। अर्थात आरएसएस ने यह कह कर सिंधी वोट बैंक को टूटने से बचाने की कोशिश की कि मामा की बजाय काका का साथ दो।
चंदनानी ने कहा कि भाजपा शायद एक तो इस कारण सिंधी को लोकसभा का प्रत्याशी नहीं बनाती कि वह हर बार अजमेर उत्तर से सिंधी को प्रत्याशी बनाती आई है, दूसरा ये कि उसे पता है कि सिंधी वोट बैंक तो उसकी जेब में है, चाहे किसी भी गैर सिंधी को टिकट दो, सिंधी तो भाजपा को ही वोट देगा। दूसरी ओर कांग्रेस के लिए किसी सिंधी को टिकट देने का प्रयोग मुफीद है, क्योंकि उसका सिंधी प्रत्याशी जितने भी सिंधी वोट खींच सकता है, उसका दुगुना नुकसान भाजपा को हो सकता है।
खैर, अपुन को लगता है कि भाजपा यूं तो किसी सिंधी को टिकट देने वाली है नहीं, फिर भी अगर मानस बना तो पूर्व शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी का नंबर आ सकता है। कदाचित इसमें देवनानी रुचि भी हो, क्योंकि वे लंबी छलांग लगाने के मूड में हैं। रहा सवाल कांग्रेस का तो पहला सवाल ही यही उठता है कि जब विधानसभा का टिकट ही नहीं दिया तो लोकसभा के टिकट की उम्मीद कैसे की जा सकती है। देखते हैं मंच की मांग पर दोनों पार्टियां गौर करती हैं या नहीं?

एडीए में स्थानीय राजनीतिक अध्यक्ष के बिना विकास मुश्किल

एक ओर जहां कांग्रेस सरकार बनने के बाद कांग्रेसी नेता अजमेर विकास प्राधिकरण का अध्यक्ष बनने का सपना संजो रहे हैं, वहीं इस आशय की चर्चा सामने आने से कि जयपुर विकास प्राधिकरण की तर्ज पर अजमेर व जोधपुर विकास प्राधिकरणों में भी स्वायत्त शासन मंत्री को ही अध्यक्ष बनाए जाने पर विचार हो रहा है, उनकी आशाओं पर तुषारापात होता दिख रहा है। इतना ही नहीं इस प्रकार की खबर से विकास की बाट जोह रही जनता भी चिंतित है, क्योंकि अगर स्वायत्त शासन मंत्री प्राधिकरण के अध्यक्ष हुए तो प्राधिकरण के स्थानीय सारे कामकाज पर अफसरशाही ही हावी रहेगी और उनकी सुनवाई ठीक से नहीं होगी। स्वायत्त शासन मंत्री केवल महत्वपूर्ण विषय के लिए ही वक्त दे पाएंगे। हर काम के लिए मंत्री महोदय का ही मुंह ताकना पड़ेगा। हमारे यहां सरकार कामकाज का ढर्ऱा कैसा होता है, सब जानते हैं। हर फाइल स्वीकृति के लिए जयपुर जाएगी तो विकास की रफ्तार कितनी धीमी होगी, कल्पना की जा सकती है।
यह सर्वविदित ही है कि पहले यूआईटी हो या अब एडीए, शहर के विकास के नए आयाम स्थानीय राजनीतिक व्यक्ति के अध्यक्ष के रहने पर स्थापित हुए हैं। जब भी प्रशासनिक अधिकारी के हाथों में कमान रही है, विकास की गति धीमी रही है। इसके अनेक उदाहरण हैं। उसकी वजह ये है कि जिला कलेक्टर या संभागीय आयुक्त के पास अध्यक्ष का भी चार्ज होने के कारण वे सीधे तौर पर कामकाज पर ध्यान नहीं दे पाते। वैसे भी उनकी कोई रुचि नहीं होती। वे तो महज औपचारिक रूप से नौकरी को अंजाम देते हैं। उनके पास अपना मूल दायित्व ही इतना महत्वपूर्ण होता है कि वे टाइम ही नहीं निकाल पाते। निचले स्तर के अधिकारी ही सारा कामकाज देखते हैं। इसके विपरीत राजनीतिक व्यक्ति के पास अध्यक्ष का कार्यभार होने पर विकास के रास्ते सहज निकल आते हैं। एक तो उसको स्थानीय जरूरतों का ठीक से ज्ञान होता है। इसके अतिरिक्त जनता के बीच रहने के कारण यहां की समस्याओं से भी भलीभांति परिचित होता है। वह किसी भी विकास के कार्य को बेहतर अंजाम दे पाता है। प्रशासनिक अधिकारी व जनता के प्रतिनिधि का आम जन के प्रति रवैये में कितना अंतर होता है, यह सहज ही समझा जा सकता है। राजनीतिक व्यक्ति इस वजह से भी विकास में रुचि लेता है, क्योंकि एक तो उसकी स्थानीय कामों में दिलचस्पी होती है, दूसरा उसकी प्रतिष्ठा भी जुड़ी होती है। उनका प्रयास ये रहता है कि ऐसे काम करके जाएं ताकि लोग उन्हें वर्षों तक याद रखें और उनकी राजनीतिक कैरियर भी और उज्ज्वल हो। आपको ख्याल होगा कि राजनीतिक व्यक्तियों के अध्यक्ष रहने पर बने पृथ्वीराज स्मारक, सिंधुपति महाराजा दाहरसेन स्मारक, लवकुश उद्यान, झलकारी बाई स्मारक, वैकल्पिक ऋषि घाटी मार्ग, अशोक उद्यान, गौरव पथ, महाराणा प्रताप स्मारक, सांझा छत  इत्यादि आज भी सराहे जाते हैं। कुल मिला कर बेहतर यही है कि प्राधिकरण का अध्यक्ष कोई राजनीतिक व्यक्ति ही हो।