गुरुवार, 14 फ़रवरी 2019

गहलोत की दावेदारी को खत्म करने के संकेत

आगामी लोकसभा चुनाव के लिए हाल ही प्रदेश भाजपा के महामंत्री भजन लाल शर्मा की ओर से जारी एक आदेश से संकेत मिलते हैं कि भाजपा हाईकमान ने अजमेर मेयर धर्मेन्द्र गहलोत की अजमेर लोकसभा सीट के लिए हो रही दावेदारी को समाप्त किया जा रहा है। लोकसभा संयोजक, सह संयोजक व प्रभारी पदों के लिए जारी इस संशोधन आदेश में गहलोत को सह संयोजक बनाया गया है। इसी आदेश में संयोजक की जिम्मेदारी पुष्कर विधायक सुरेश रावत को दी गई है और एक अन्य संयोजक निवर्तमान शहर जिला भाजपा अध्यक्ष अरविंद यादव को सह संयोजक बनाया गया है।
ज्ञातव्य है कि पिछले दिनों संगठन स्तर पर दावेदारियां पंजीबद्ध की गई तो गहलोत की दावेदारी प्रबल रूप से उभरी थी। हालांकि गहलोत का कोई बहुत सशक्त जातीय दावा नहीं है, लेकिन उनका व्यक्तित्व व कृतित्व उनके दावे को मजबूत बनाए हुए थे। अब जबकि उन्हें संगठन ने लोकसभा चुनाव में काम का जिम्मा दिया है, उससे प्रतीत होता है कि उन्हें साइड लाइन कर दिया गया है।
जहां तक अरविंद यादव का सवाल है तो वे हाल ही शहर जिला भाजपा अध्यक्ष के पद से निवृत्त किए गए थे, इस कारण उनका सम्मान रखने के लिए कहीं न कहीं एडजस्ट किए जाने थे। वैसे उन्हें जिस मौके पर हटाया गया, वह काफी अपमानजनक रहा। उनके अध्यक्ष रहते हुए भाजपा ने अजमेर शहर की दोनों सीटें विधानसभा चुनाव में जीतीं थीं, फिर भी पार्टी ने कड़ा कदम उठाया। हालांकि उन्हें एक साल पहले ही हटाया जाना था, मगर स्थानीय गुटबाजी के चलते तब निर्णय नहीं हो पाया और तब जा कर हटाया, जबकि उनके खाते में जीत दर्ज हो गई। असल में पार्टी की मजबूरी ये थी कि उसे वेश्यों को साधने के लिए अध्यक्ष पद किसी वेश्य को सौंपना था, उसी के तहत पूर्व एडीए चेयरमैन शिवशंकर हेडा को यह जिम्मेदारी दे दी गई। इसी के साथ वेश्यों की लोकसभा चुनाव में दावेदारी को ग्रहण लग गया है। अब खुद हेडा सहित पूर्व जिला प्रमुख पुखराज पहाडिय़ा, पूर्व यूआईटी चेयरमैन धर्मेश जैन व युवा नेता सुभाष काबरा का दावा कमजोर हो गया है।
ऐसा प्रतीत होता है कि भाजपा इस जाट बहुल सीट पर किसी जाट पर ही दाव खेलना चाहती है। इसके तहत अब तक पूर्व किशनगढ़ विधायक भागीरथ चौधरी, पूर्व जिला प्रमुख सरिता गैना, किशनगढ़ में हाल हारे विकास चौधरी व डॉ. दीपक भाकर की दावेदारी चल रही है।
वैसे जानकारी ये है कि गुर्जरों के करीब डेढ़ लाख वोटों के आधार पर पूर्व मंत्री नाथूसिंह गुर्जर टिकट की जुगाड़ में हैं। उन्होंने अपने कुछ निकटस्थों के जरिए नाम चलाने की कोशिश की है।
तेजवानी गिरधर
७७४२०६७०००

शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2019

भाजपा में होता है नेता को उसकी हैसियत दिखाने काम

लोकसभा चुनाव की तैयारियों के सिलसिले में गत चार फरवरी को संसदीय क्षेत्र के भाजपा कार्यकर्ताओं की बैठक के दौरान हुए एक वाकये ने एक बार फिर से यह साबित कर दिया है कि भाजपा में नेता की निजी कोई हैसियत नहीं होती। होती भी है तो उसे नकार दिया जाता है। असल में उसके पीछे सोच यही है कि नेता अपने आप में कुछ नहीं होता। जो कुछ होता है वह संगठन के दम पर होता है।
हुआ यूं कि जब पूर्व शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी को मंच पर नहीं बैठाया तो उन्होंने अपनी आपत्ति दर्ज करवाई। उनका तर्क था कि वे तीन लोकसभा क्षेत्रों के प्रभारी हैं और अजमेर में चौथी बार विधानसभा का चुनाव जीते हैं। मगर हाल ही शहर जिला भाजपा के अध्यक्ष बने शिव शंकर हेडा ने उनके तर्क को यह कह कर नकार दिया कि हाईकमान के निर्देशों के तहत उन्हें मंच पर नहीं बैठाया जा सकता। इस बारे में कुछ लोगों का मानना है कि अगर देवनानी को मंच पर बैठाया जाता तो भी कोई पहाड़ नहीं टूटने वाला था, मगर हेडा ने प्रदेश के निर्देशों की आड़ में देवनानी को उनकी हैसियत दिखाने की कोशिश की। दोनों के बीच नाइत्तफाकी सर्वविदित ही है।
खैर, बात भाजपा की रवायत की। इस संगठन में किसी भी नेता की हैसियत संगठन ही तय करता है। लाल कृष्ण आडवाणी के इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं। जिसने पूरी जिंदगी संगठन को सौंप दी और संगठन को फर्श से अर्श तक लाए, आज उसे हाशिये पर धकेल दिया गया है। ऐसा ही भूतपूर्व उपराष्ट्रपति व भूतपूर्व मुख्यमंत्री भैरोंसिंह शेखावत के साथ हुआ। कभी राजस्थान के एक ही सिंह कहलाने वाले शेखावत जब उपराष्ट्रपति पद से रिटायर हो कर राजस्थान लौटे तो उनकी जमीन खिसका दी गई। वसुंधरा का खौफ इतना था कि भाजपा नेता उनका औपचारिक स्वागत करते तक से कतराते थे। बात अगर स्थानीय स्तर की करें तो पांच बार सांसद रहे प्रो. रासासिंह रावत, पूर्व विधायक नवलराय बच्चानी, पूर्व विधायक हरीश झामनानी की आज क्या हालत है, किसी से छिपी नहीं है।

विष्णु मोदी होंगे कांग्रेस टिकट के प्रबल दावेदार?

कानाफूसी है कि आगामी लोकसभा चुनाव में अजमेर सीट के लिए पूर्व सांसद विष्णु मोदी कांग्रेस टिकट के प्रबल दावेदार होंगे। यूं तो अजमेर  लोकसभा क्षेत्र जाट बहुल होने के कारण अजमेर डेयरी चेयरमैन रामचंद्र चौधरी की ही प्रबल दावेदारी मानी जा रही है, मगर वेश्य समाज को राजी करने के लिए मोदी पर भी विचार हो सकता है।
ज्ञातव्य है कि मोदी इससे पूर्व मसूदा से भाजपा के विधायक रह चुके हैं। वे चुनाव मैनेजमेंट में माहिर माने जाते हैं, अर्थात इतने सिद्धहस्त हैं कि हारी हुई बाजी भी जीतने का माद्दा रखते हैं। यद्यपि उन्होंने खुल कर दावेदारी नहीं की है, मगर राजनीति के गलियारे से आ रही हवाएं ये पैगाम ला रही हैं कि वे टिकट के लिए पूरी ताकत लगाने वाले हैं। यहां यह बताना भी प्रासंगिक होगा कि वे हाल ही संपन्न विधानसभा चुनाव में भी ब्यावर सीट के दावेदार माने जा रहे थे।

शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2019

देवनानी-अनिता को कैसे साधेंगे हेडा?

लोकसभा चुनाव के मद्देनजर शहर भाजपा अध्यक्ष बनाए गए पूर्व एडीए चेयरमैन शिवशंकर हेडा भले ही जातीय समीकरण को साधने में कामयाब हो जाएं, मगर यह सवाल हर भाजपाई के दिमाग में कौंध रहा है कि वे लगातार चार बार विधानसभा चुनाव जीते अजमेर उत्तर के प्रो. वासुदेव देवनानी व अजमेर दक्षिण की श्रीमती अनिता भदेल को कैसे साधेंगे? यह सवाल इस कारण मौजूं बन पड़ा है क्योंकि आम भाजपा कार्यकर्ता इस अनुभव से गुजर चुका है कि चाहे कोई भी तीसमारखां अध्यक्ष आ जाए, इन दोनों के प्रभाव को कम नहीं कर पाया है।
पहले बात जातीय समीकरण की। परंपरागत रूप से भाजपा मानसिकता के बहुसंख्यक सिंधियों पर देवनानी ने पकड़ बना रखी है। अनुसूचित जाति  का प्रतिनिधित्व अनिता भदेल कर रही हैं। रहा भाजपा विचारधारा के करीब रहने वाले वैश्य समुदाय तो उसे लामबंद रखने के लिए किसी वैश्य नेता को मजबूत रखना जरूरी है। इसी को ख्याल में रखते हुए ही तो हेडा को एडीए चेयरमैन बनाया गया था। अब सरकार रही नहीं, तो एक मात्र चारा यही बचा था कि उन्हें संगठन का मुखिया बना दिया जाए। लोकसभा चुनाव का टिकट देने का भी विकल्प है, मगर ऐसा प्रतीत होता है कि अब इसकी संभावना कम हो गई है।
बात अब भाजपा के अंदरूनी समीकरण की। दरअसल देवनानी व भदेल ने पिछले पंद्रह साल में दो बार सत्ता में रहते हुए अपनी-अपनी इतनी फैन फॉलोइंग खड़ी की है कि उसे साधना कत्तई नामुमकिन है। ये दोनों भाजपा के इतने बड़े क्षत्रप हो चुके हैं कि उन पर संगठन का जोर चलता ही नहीं। स्वाभाविक सी बात है कि इन दोनों ने जिन-जिन कार्यकर्ताओं के निजी काम किए हैं, वे उनके परम भक्त बन चुके हैं। इसके विपरीत हेड़ा के पास ऐसी कोई छड़ी नहीं थी, जिसका जादू वे कार्यकर्ताओं पर चला पाते। हां, एडीए चेयरमैन बनने के बाद जरूर उन्होंने जिन चंद कार्यकर्ताओं के निजी काम किए हैं, वे एक लॉबी की शक्ल अख्तियार कर सकते हैं। अर्थात अब भाजपा में दो की बजाय तीन लॉबियां हो सकती हैं, मगर तुलनात्मक रूप से हेड़ा की लॉबी कमजोर ही रहने वाली है। वैसे अंदर की बात ये है कि यदि हेडा को संगठन ठीक से चलाना है तो चतुराई बरतनी होगी। देवनानी से तो उनका छत्तीस का आंकड़ा सर्वविदित है। एडीए के कार्यों व विधायक कोष से हुए कामों के शिलान्यास या उद्घाटन को लेकर आए दिन खींचतान होती रही। यहां तक कि शिकायतें तत्कालीन स्वायत्त शासन राज्यमंत्री श्रीचंद कृपलानी तक भी गईं, मगर वे भी सुलह नहीं करवा पाए। असल में हेडा व देवनानी के बीच झगड़े की जड़ सिंधी-गैर सिंधीवाद रही है। विशेष रूप से एडीए चेयरमैन बनने के बाद भाजपा की गैर सिंधी लॉबी हेडा के इर्दगिर्द जमा होना शुरू हुई थी। उसने देवनानी का टिकट कटवाने के लिए एडी-चोटी का जोर लगा दिया, मगर न केवल देवनानी टिकट ले कर आए, अपितु जीत कर भी दिखा दिया। रहा सवाल अनिता भदेल का तो उनके साथ जरूर संबंधों में उतनी कड़वाहट नहीं है, जितनी कि देवनानी के साथ है। यानि कि देवनानी को बैलेंस करने के लिए उन्हें अनिता से हाथ मिलाना होगा। जाहिर तौर पर अनिता भी चाहेंगी कि देवनानी पर चैक लगाने के लिए हेडा का साथ दिया जाए। दोनों के हाथ किस हद मिलेंगे, यह भाजपा के भीष्म पितामह रहे औंकार सिंह लखावत की अनुमति पर निर्भर करेगा। वे अजमेर में भाजपाई राजनीति के चाणक्य रहे हैं। चाहे कितने भी नेता उनके रहते उभरे हों, मगर हर समस्या का आखिरी पड़ाव वे ही रहे हैं। इसका मतलब ये कि हेडा को लखावत को भी पटा कर चलना होगा। लखावत की पकड़ केवल अजमेर में ही नहीं है, जयपुर में भी उन ठीयों पर उनकी बैठक है, जहां से प्रदेशभर की कठपुतलियों के तार जुड़े होते हैं।
खैर, हेडा के लिए नई चुनौती है। हो सकता है कि अपने पिछले अध्यक्षीय कार्यकाल के अनुभव तथा एडीए की चेयरमैनी संभाल चुकने के बाद वे कुछ कुशल हुए हों। देखते हैं कि उम्र की ढ़लान पर वे उपचुनाव में ढ़ल चुकी भाजपा को कैसे थाम पाते हैं। विपक्ष में रहते हुए संगठन का काम करना आसान नहीं होता। आए दिन का खर्चा माथे आता है। वैसे, उसकी कोई परवाह नहीं। एडीए चेयरमैन रहते इतने तो मजबूत हुए ही होंगे। दफ्तर की जरूर दिक्कत है, तो उसके लिए कई लंगियां हैं इस शहर में।

बुधवार, 30 जनवरी 2019

दोनों सीटें जितवाईं, फिर भी हटा दिया अरविंद यादव को?

हाल ही हुए विधानसभा चुनाव में अजमेर शहर की दोनों सीटें अजमेर उत्तर व अजमेर दक्षिण जितवाने के बाद भी शहर जिला भाजपा अध्यक्ष अरविंद यादव को हटा दिया गया। भाजपा हाईकमान का यह फैसला चौंकाने वाला है। भाजपा की अंदरूनी गुटबाजी के लिहाज से भी यह बदलाव चकित करता है। एक ओर जहां माना जाता है कि प्रदेश भाजपा में संघ लॉबी हावी हो गई है और पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के युग का अवसान हो गया, वहीं राजे लॉबी के शिवशंकर हेडा को अध्यक्ष बना दिया गया है, जबकि संघ लॉबी के यादव हटा दिए गए हैं। यादव को न केवल राज्यसभा सदस्य भूपेद्र यादव का करीबी माना जाता है, अपितु संघ पृष्ठभूमि के दिग्गज नेता ओम प्रकाश माथुर व श्रीकिशन सोनगरा के करीबी रहे हैं। उनको हटाए जाने का कारण क्या है, यह भाजपाइयों की समझ से बाहर है। यदि उन्हें हटा कर किसी और युवा व ऊर्जावान को अध्यक्ष बनाते तो भी समझ में आ सकता था कि आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर बदलाव किया गया है।
फिलहाल यही समझा जा रहा है कि लोकसभा चुनाव में वैश्य समुदाय को राजी करने के लिए नई नियुक्ति हुई है, लेकिन इससे यह भी आशय निकलता है कि लोकसभा चुनाव में वैश्य समुदाय के दावेदारों, जिनमें स्वयं हेडा भी शामिल है, की आशाओं पर तुषारापात हो गया है। अर्थात जाट बहुल इस सीट पर भाजपा किसी जाट को ही प्रत्याशी बनाने के मूड में है।
रही संगठन के और सक्रिय होने की तो कम से कम हेडा से यह उम्मीद गलत ही की जा रही है। वे पूर्व में भी 2006 से लेकर 2011 तक शहर अध्यक्ष रहे हैं। तब के हालात से सब वाकिफ हैं। उनकी हालत ये थी कि नगर निगम चुनाव में सारी टिकटें अजमेर शहर के दोनों विधायकों प्रो. वासुदेव देवनानी व श्रीमती अनिता भदेल ने आपस में बांट ली थीं। लुंजपुंज नेता गिने जाने वाले हेडा की सिफारिश पर किसी को टिकट नहीं मिल पाई थी। यही वजह रही कि उनकी लॉबी के कुछ लोग समानांतर कार्यक्रम कर रहे थे। पिछले भाजपा शासनकाल में पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने जनवरी 2016 में एडीए अध्यक्ष पद उनकी ताजपोशी की और राज्यमंत्री का दर्जा भी दिया गया, मगर वे अपने खाते में कुछ खास उपलब्धि दर्ज नहीं करवा पाए। उनका कार्यकाल ढ़ीलाढ़ाला ही रहा। ऐसे में अब वे कोई नौ की तेरह कर पाएंगे, उसकी उम्मीद कैसे की जा सकती है।
रहा सवाल अरविंद यादव का तो उनके लिए यह झटका वाकई तगड़ा है। फिलहाल उनको कोई नयी जिम्मेदारी नहीं दी गई है। यह सही है कि लोकसभा उप चुनाव में उत्तर विधानसभा क्षेत्र में करीब सवा छह हजार और दक्षिण विधानसभा क्षेत्र से करीब 12 हजार वोटों से पार्टी पिछड़ी थी, लेकिन हाल ही हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा दोनों सीटें जीत गई। बावजूद इसके उन्हें हटाये जाने से भाजपा कार्यकर्ता चकित हैं। विशेष रूप से युवा कार्यकर्ताओं में गलत संदेश गया है। सवाल उठता है कि क्या दोनों सीटें जीतने में उनकी कोई भूमिका नहीं रही, देवनानी व भदेल अपने-अपने दम पर जीते?
ज्ञातव्य है कि शहर अध्यक्ष बदले जाने की चर्चा काफी समय से चल रही थी, मगर लोकसभा उपचुनाव व बाद में विधानसभा चुनाव के कारण बदलाव नहीं किया गया। आनंद सिंह राजावत का नाम लगभग फाइनल हो चुका था, मगर देवनानी ने उन्हें नहीं बनने दिया। इसी प्रकार भूपेन्द्र यादव के खासमखास पार्षद जे. के. शर्मा का नाम भी चला, जिनके संबंध देवनानी व भदेल से समान थे, मगर उनकी आशाओं पर भी पानी फिर गया है।
आखिर में एक बात और। पिछले पंद्रह साल में शहर भाजपा देवनानी व भदेल लॉबी में ही बंटी रही है। उन पर किसी अध्यक्ष का जोर नहीं चला। यहां तक कि पांच बार सांसद रहे प्रो. रासासिंह रावत तक को वे नहीं गांठते थे। अब देखने वाली बात ये होगी कि हेडा अपनी नई पारी कैसे खेलते हैं।