मंगलवार, 23 जुलाई 2019

चिन्मयी गोपाल जिंदाबाद का नारा लगते लगते रह गया

पिछले कुछ दिनों से अजमेर नगर निगम की आयुक्त चिन्मयी गोपाल सुर्खियों में हैं। कदाचित जिला प्रशासन के पूरे बेड़े में वे एक मात्र ऐसी अफसर हैं, जिनके बारे में आम ठेेले वाला भी चर्चा करता दिखाई दे सकता है। सरकारी कामकाज को लेकर उनके सख्त रवैये की वजह से ढर्ऱे पर व्यवस्था चलाने में रुचि रखने वालों का जहां बहुत तकलीफ हो रही है, वहीं जन सामान्य इस कड़क आईएएस से बेहद प्रभावित है। उनकी तुलना स्टील लेडी की उपमा से अलंकृत पूर्व जिला कलेक्टर श्रीमती अदिति मेहता से होने लगी है। ऐसे में कोई कैसे कल्पना कर सकता है कि वे बेहद सहज व सरल भी हो सकती हैं। उनका यह रूप मंगलवार को आनासागर चौपाटी के सामने रीजनल कॉलेज की दीवार के सहारे पूर्वांचल जन चेतना समिति की ओर से आयोजित वृक्षारोपण कार्यक्रम में नजर आया।
हुआ यूं कि समिति के महासचिव शिव कुमार बंसल ने कार्यक्रम में मौजूद नगर पालिका सेवा के सेवानिवृत्त अधिकारी डा. सुरेश गर्ग का परिचय कराया तो यकायक वे बोलीं, अरे हां, आपका नाम तो सुना है, कई बार आपकी चर्चा होती है। डॉ. गर्ग तो गद्गद् हो गए। वे कुछ बोलते इससे पहले ही चिन्मयी गोपाल ने उनसे आग्रह किया कि आप कभी नगर निगम आइये। मुझे आपके अनुभव का लाभ लेना है, आपसे मार्गदर्शन लेना है। वहां मौजूद सभी लोग चकित रह गए कि आम तौर पर रिजर्व रहने वाले आईएएस अधिकारी इस प्रकार आमजन के बीच अपने कठोर आवरण से फूट कर भी बाहर आ सकते हैं। बेशक डॉ. गर्ग बहुत अनुभवी अधिकारी रहे हैं, मगर चिन्मयी गोपाल भी कोई छोटी-मोटी अफसर नहीं, आईएएस हैं, फिर भी इस प्रकार मुक्त हृदय से सीखने की ललक वाकई काबिले तारीफ है।
वहां मौजूद जिन लोगों ने अदिति मेहता को देख रखा है, उन्हें चिन्मयी में उनकी झलक दिखाई देने लगी। वैसी ही खूबसूरत लंबोतरा चेहरा, तीखे नाक-नक्श, बड़ी-बड़ी चमकदार आंखें, तनिक बड़े दांत, चेहरे पर पसरी सुखद ताजगी, लंबा कद, चपल बॉडी लैंग्वेज, सहज और सरल। चंद दिनों में ही उन्होंने अजमेर वासियों का दिल कैसे जीत लिया है, इसका नजारा भी साक्षात उतर आया। वहां मौजूद कार्यकर्ताओं में उनके साथ सैल्फी लेने की होड़ मच गई। एक ही बुके से बार-बार अलग-अलग प्रशंसक के सेल्फी लेने पर भी वे झुंझलाई नहीं। हर छोटा-बड़ा कार्यकर्ता उनको अपना परिचय दे रहा था, हालांकि ऐसे परिचय की उम्र कितनी होती है, सबको पता है, फिर भी वे सभी से ऐसे मिल रही थीं, मानो या तो पहले से परिचित हों, या फिर उसको आगे भी याद रखने वाली हों। फोटा खिंचवाने में कम दिलचस्पी ले रहे समिति के मैनेजिंग ट्रस्टी रजनीश वर्मा की हैसियत को जानते हुए उन्होंने पूरी तवज्जो दी और आगे आने को कहा। अजमेर के हित में मौजूदा जज्बे के साथ काम करते रहने की अपील करते हुए कांग्रेस नेता अतुल अग्रवाल ने हिप-हिप हुर्रे का नारा लगाया तो अचानक ऐसा माहौल बन गया मानो चिन्मयी जिंदाबाद के नारे न लगने लग जाएं। चंद लम्हों पर सवार हो कर गुजरा यह मंजर आपसे साझा करने का मन हुआ तो ये पंक्तियां खुद-ब-खुद  लिपिबद्ध हो गईं।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

सोमवार, 22 जुलाई 2019

रजनीश वर्मा को साधुवाद

सार्वजनिक समारोहों में अमूमन हर कोई यह चाहता है कि फोटो खिंचते समय वे केमरे के दायरे में हो। असल में यह लोकेषणा कही जाती है। कई लोग तो इसके लिए धक्का-मुक्की तक कर बैठते हैं। सीनियर्स को धकेल कर आगे आने की जूनियर्स की प्रवृत्ति खूब भी देखी गई है। कुछ लोग नकटे हो कर जबरन बीच में घुस जाते हैं। कुछ लोगों को पता होता है कि किस एंगल पर खड़े होना है, ताकि उनकी पूरी फोटो आ जाए। केमरा ऑन होने के साथ ही वे अपनी जगह तलाश लेते हैं। ऐसे में अगर कोई अपनी फोटो आने अथवा न आने के प्रति गंभीर न हो तो उसकी मनोवृत्ति चौंकाती है।
यहां हम जिक्र कर रहे हैं पूर्वांचन जन चेतना समिति के मैनेजिंग ट्रस्टी रजनीश वर्मा की। सोमवार को समिति की ओर से पौधा वितरण का कार्यक्रम आयोजित किया गया था। जाहिर तौर पर उसकी फोटोज भी ली गईं। हमारे पास समाचार के साथ आई लगभग सभी फोटोज में वे फ्रंट में नहीं थे। यद्यपि वे ही समिति के अजमेर में सर्वेसर्वा हैं, उनका पहला हक आगे रहने का, मगर उन्हें इस बात की चिंता ही नहीं थी, कि उनका भी ढ़ंग का फोटो आ जाए। वे ऐसे खड़े थे, मानो सामान्य कार्यकर्ता हों। या तो इस मामले में वे बिलकुल भोले हैं, अवेयर नहीं हैं, या फिर ऐसा वे जान कर ऐसा करते हैं। चलो यह मान भी लिया जाए कि इसमें उनकी विशेष रुचि नहीं रही हो, मगर समिति के अन्य पदाधिकारियों को भी इसका भान नहीं रहा कि वे फ्रंट की बजाय पीछे खड़े हैं। और उनसे आग्रह करें कि वे आगे आ जाएं। 
ऐसा प्रतीत होता है कि वर्मा जिस मकसद से भीलवाड़ा से यहां आ कर समिति की गतिविधियां संचालित कर रहे हैं, उनकी सिर्फ इसी में रुचि है, कि वे सकुशल पूरी हो जाएं। उनके साथ जुड़ कर समिति में काम करने वालों को आगे आने का मौका मिले, ताकि उनका उत्साहवद्र्धन हो। वे जानते हैं कि फोटो में भले ही कोई भी आगे आ जाए, कार्यक्रम का सारा क्रडिट उनको ही मिलना है। आखिरकार वे मुख्य आयोजक हैं। अजमेर में समिति गठित करने के पीछे उनका व उनके आका, लोकसभा चुनाव में अजमेर संसदीय क्षेत्र से चुनाव हार चुके रिजु झुंझुनवाला का एजेंडा क्या है, ये तो वे ही जानें, मगर ऐसा करके कम से कम से ये संदेश तो देने में कामयाब हो ही गए हैं कि वे सिर्फ यहां चुनाव लडऩे ही नहीं आए थे, बल्कि वादे के मुताबिक अजमेर को अपनी कर्मस्थली बना रहे हैं। इसकी तारीफ की ही जानी चाहिए। अपुन तो विशेष रूप से वर्मा को छपास पीडि़त न होने की प्रवृत्ति के लिए साधुवाद देना चाहते हैं।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

रविवार, 21 जुलाई 2019

चिन्मयी गोपाल ने याद दिला दी अदिति मेहता की

अजमेर नगर निगम की आयुक्त चिन्मयी गोपाल जिस स्टाइल से काम कर रही हैं, उससे यकायक पूर्व जिला कलेक्टर श्रीमती अदिति मेहता की याद ताजा हो रही है। वे भी अजमेर के हित में बिना किसी राजनीतिक दबाव के अपने अधिकारों का पूरा उपयोग करती थीं। आपको याद होगा कि उन्होंने अतिक्रमण हटाने के सबसे दुरूह काम को खुद खड़े रह कर करवाया, जिसकी वजह से उन्हें स्टील लेडी की उपमा दी जाने लगी। ऐसा नहीं है कि उनको निहित स्वार्थी नेताओं व तत्वों का विरोध नहीं सहना पड़ा, मगर वे धुन की पक्की थीं और जो ठान लिया वह कर के रहती थीं। हां, इतना जरूर है कि उन्हें तत्कालीन मुख्यमंत्री स्वर्गीय भैरोंसिंह शेखावत का वरदहस्त था, इस कारण किसी की परवाह नहीं करती थीं। चिन्मयी को किसका वरदहस्त है, ये पता नहीं, मगर ऐसी दबंग अधिकारी की ही जरूरत है अजमेर को। बेशक एक समूह उनके निर्णयों व कदमों का किसी न किसी रूप में विरोध कर रहा है या फिर मीनमेख निकाल रहा है, मगर जनता का एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है, जो उनका शाबाशी दे रहा है। दुआ यही कीजिए कि कोई बड़ी ताकत उन्हें यहां से डिस्टर्ब न करे।
आनासागर में नावों के संचालन के लिए हुए ई-टेंडर का मामला ही लीजिए। उन्होंने संबंधित ठेकेदार के सुझाव पर अमल करते हुए टेंडर की शर्तों में संशोधन किया है। प्रत्यक्षत: व तर्क के लिहाज ऐसा लगता है कि उन्होंने ठीक नहीं किया, मगर मामले की तह में जाने से लगता है कि उन्होंने अजमेर के हित को ध्यान में रखते हुए अपने अधिकारों का पूरा इस्तेमाल किया है। उन्होंने उदयपुर की वाटर स्पोट्र्स फर्म यश एम्युजमेंट के सुझाव पर ठेके की अवधि को दो वर्ष से बढ़ा कर तीन वर्ष कर दिया गया। ठेका राशि वर्ष भर में चार किश्तों में जमा कराने की छूट दी गई। साथ ही मोटर बोट, स्पीड बोट, वाटर स्कूटर आदि को चलाने के आरटीओ का तीन वर्ष का लाइसेंस टेंडर खुलने के बाद 15 दिन में जमा कराने की छूट दी गई। अब यश एम्युजमेंट आनासागर में विभिन्न प्रकार के 34 मोटर वाहन चलाने की एवज में प्रति वर्ष एक करोड़ 60 लाख रुपए का भुगतान निगम को करेगी।  सबसे बड़ी बात ये है कि अब शहर वासियों को पहले से बेहतर सुविधाएं मिलेंगी, जिसका अनुभव अब तक उदयपुर वासी किया करते हैं।
चिन्मयी गोपाल के निर्णय का विरोध करने वालों का कहना है कि पूर्व ठेके की अवधि 31 मार्च 2019 को समाप्त हो रही थी, ऐसे में निगम को 31 मार्च से पहले वाटर स्पोट्र्स का ठेका कर देना चाहिए था, लेकिन लापरवाही की वजह से ऐसा नहीं हो सका। यदि एक अप्रैल 2019 से एक करोड़ 60 लाख रुपए वाला ठेका हो जाता तो निगम को 43 लाख रुपए का घाटा नहीं होता है। इसके विपरीत चिन्मयी गोपाल का कहना है कि नियमों के तहत उन्हें टेंडर में संशोधन करने का अधिकार है। पूर्व में निगम ने जो ठेका मात्र 55 लाख रुपए प्रतिवर्ष में दे रखा था, उसे अब एक करोड़ 60 लाख रुपए प्रतिवर्ष कर दिया गया है। ऐसे में निगम को नुकसान के बजाए लाभ ही हुआ है।
ज्ञातव्य है कि निगम आयुक्त चिन्मयी गोपाल ने गत दिवस एक संवाददाता सम्मेलन आयोजित करके घोषणा कर दी कि निगम में अब छह प्रमुख सेवाओं का लाभ आम आदमी ऑनलाइन ही प्राप्त कर पाएगा। इनमे जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र, ठेकों का आवंटन, नक्शे ऑनलाइन पास करवाना शामिल है। ऑनलाइन सिस्टम से आए 35 आवेदनों में से तीन नक्शे तुरंत पास कर दिए गए। स्वाभाविक सी बात है कि ऑन लाइन सिस्टम से एक ओर जहां कामकाज में पारदर्शिता रहेगी, वहीं आम लोगों को निगम के चक्कर लगाने से भी निजात मिलेगी।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

शनिवार, 20 जुलाई 2019

सोच समझ कर पश्चिम बंगाल भेजा गया है धनखड़ को

पूर्व केन्द्रीय मंत्री जगदीप धनखड़ को सोची समझी रणनीति के तहत पश्चिम बंगाल भेजा गया है। वे बेहद शातिर व तेज-तर्रार हैं। पश्चिम बंगाल की खुर्रांट मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर नकेल कसने के लिए उनके जैसा ही नेता चाहिए था। वे सुप्रीम कोर्ट के वकील होने के कारण कानून के गहरे जानकार तो हैं ही, लंबी राजनीतिक यात्रा की वजह से राजनीति के दाव-पेच भी भलीभांति जानते हैं। हां, एक बात ये जरूर है कि वे कट्टर हिंदूवादी नहीं हैं। उनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि कांग्रेस विचारधारा की रही है।
ज्ञातव्य है कि उनकी राजनीतिक यात्रा 1989 में झुंझुनूं से जनता दल सांसद के रूप में हुई थी। पहली बार में ही वी पी सिंह सरकार में संसदीय कार्य राज्य मंत्री बनाए गए। 1991 में जनता दल छोड़ कर कांग्रेस की सदस्यता ले ली। कांग्रेस टिकट पर अजमेर से लोकसभा चुनाव लड़ा, मगर भाजपा के प्रो. रासासिंह रावत से हार गए। उसके बाद 1993 में अजमेर जिले की किशनगढ़ विधानसभा सीट से कांग्रेस टिकट पर लड़ कर विजयी हुए। 1998 में झुंझुनू से कांग्रेस टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ा, मगर तीसरे स्थान पर रहे थे। 2003 में पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बनने पर भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर ली थी। गत विधानसभा चुनावों में उनके कांग्रेस में शामिल होने की चर्चा होती रहती थी. मगर उन्होने भाजपा नहीं छोड़ी।
अजमेर से नाता रहने के कारण स्थानीय कांग्रेसी उन्हें अच्छी तरह से जानते हैं। कंप्यूटर की माफिक तेजी से दायें-बायें चलती उनकी आंखें बयां करती हैं कि वे बेहद तेज दिमाग हैं। चाल में गजब की फुर्ती है। बॉडी लैंग्वेज उनके ऊर्जावान होने का सबूत देती है। हंसमुख होने के कारण कभी वे बिलकुल विनम्र नजर आते हैं तो मुंहफट होने के कारण सख्त होने का अहसास करवाते हैं। जब अजमेर में लोकसभा चुनाव लडऩे को आये स्वर्गीय श्री माणक चंद सोगानी शहर जिला कांग्रेस अध्यक्ष थे। नया बाजार में सोगानी जी के सुपुत्र के दफ्तर में हुई पहली परिचयात्मक बैठक में ही उनका विरोध हो गया, चूंकि उन्हें यहां कोई नहीं जानता था। प्रचार का समय भी बहुत कम था। फिर भी उन्होंने प्रोफेशनल तरीके से चुनाव लड़ते हुए सारे संसाधन झोंक दिए। टेलीफोन डायरेक्टरी लेकर सुबह छह बजे से आठ बजे तक आम लोगों से वोट देने की अपील करते थे। हालांकि उन्होंने चुनाव बड़ी चतुराई व रणनीति से लड़ा, मगर सारा संचालन अपने साथ लाए दबंगों के जरिए करवाने के कारण स्थानीय कांग्रेसियों को नाराज कर बैठे। वे जीत जाते, मगर स्थानीय कांग्रेस नेताओं को कम गांठा और सारी कमान झुंझुनूं से लाई अपनी टीम के हाथ में ही रखी। यही वजह रही कि स्थानीय छुटभैये उनसे नाराज हो गए और उन्होंने ठीक से काम नहीं किया। हारने के बाद पलट कर अजमेर का रुख नहीं किया।
हालांकि अजमेर व किशनगढ़ वासियों के लिए यह सुखद हो सकता है कि अब वे पश्चिम बंगाल के राज्यपाल हो गए हैं, मगर वे हाई-फाई और सेलिब्रिटी स्टाइल के नेता होने के कारण गिनती के कांग्रेसियों से उनके संपर्क हैं। हां, इतना जरूर है कि जाट समाज में उनकी खासी प्रतिष्ठा है। उनकी राज्यपाल पद पर नियुक्ति करके जाट वोट बैंक को साधा गया है। रहा सवाल पश्चिम बंगाल को तो समझा जाता है कि वे कानूनी दावपेच में ममता को अडऩे नहीं देंगे।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

बुधवार, 17 जुलाई 2019

देवनानी की उछल-कूद के मायने?

दो बार मंत्री रह चुकने के बाद विपक्ष का अदद विधायक रहने की पीड़ा क्या होती है, इसके अहसास से इन दिनों अजमेर उत्तर के भाजपा विधायक प्रो. वासुदेव देवनानी गुजर रहे होंगे। बावजूद इसके वे खामोश हो कर घर नहीं बैठ गए। उछल-कूद मचाए हुए हैं। विधानसभा में अपनी उपस्थिति खम ठोक कर दर्शा रहे हैं। यहां तक कि सदस्यता अभियान के साथ-साथ जनसुनवाई भी कर रहे हैं। उनकी इस व्यस्तता को देख कर लगता ही नहीं कि वे अपने दिल में सत्ता सुख के अभाव का दर्द भी संजोये हुए हैं। उनकी यह हालत देख कर यकायक ये फिल्मी गाना याद आ गया:- तुम इतना जो मुस्करा रहे हो, क्या गम है जिसको छिपा रहे हो।
देवनानी की सक्रियता में इसलिए भी अतिरिक्त सक्रियता नजर आती है, क्यों उनकी ही साथी विधायक श्रीमती अनिता भदेल कुछ खास चर्चा मे नहीं हैं। गर सक्रिय भी हैं तो कम से कम अखबारों में तो नजर नहीं आ रहीं।
खैर, देवनानी की सक्रियता में दिलचस्प बात ये है कि वे अजमेर के उन्हीं चिरपरिचित मुद्दों को फिर से जोर-शोर से उठा रहे हैं, जो पिछले कई सालों से पतंग के मांझे की तरह उलझे हुए हैं। चाहे पानी की बात या बिजली की या फिर यातायात की, सारी समस्याएं उनके पिछले कार्यकाल में भी मौजूद थीं, जब वे मंत्री थे। वे समस्याएं उनके उससे भी पिछले विधायकी कार्यकाल में यथावत थीं। बेशक विपक्ष में रहते उनका फर्ज है कि अजमेर की आवाज विधानसभा में उठाएं, मगर सवाल उठता है कि आज जिन मुद्दों को लेकर वे सरकार को घेर रहे हैं, उनका समाधान वे अपने मंत्रित्व कार्यकाल में क्यों नहीं करवा पाए। वे भी जानते होंगे कि अजमेर की समस्याओं का समाधान आखिर हो क्यों नहीं पाता? एक विधायक के रूप में उनका ये चौथा टर्म है। अजमेर वासी वर्षों से इस अनुभव से गुजर रहे हैं कि यहां का जिला प्रशासन आमतौर पर राजनीतिक दबाव में नहीं रहता। समस्याओं को लेकर तय शिड्युल से बार-बार बैठकें होती हैं। समीक्षा होती है। वादे होते हैं। घोषणाएं होती हैं। मगर नतीजा वही ढ़ाक के तीन पात। और आम जन भी सहनशीलता भी काबिले गौर है। तभी तो इस शहर को टायर्ड और रिटायर्ड लोगों का शहर कहा जाता है। कोई इलायची बाई की गद्दी से प्रभावित बताता है तो मुर्दा शहर की संज्ञा देता है।
बात देवनानी जी की चल रही थी। लगातार सक्रिय रहना उनकी आदत में आ गया है या इसका कोई प्रयोजन है। जानकार लोगों का मानना है कि उनकी महत्वाकांक्षा अभी समाप्त नहीं हुई है। हाल ही उन्होंने यह शगूफा छोड़ कर राजनीतिक हलके में तूफान लाने की कोशिश की सरकार ज्यादा दिन की मेहमान नहीं है। कहीं उनको ये उम्मीद तो नहीं कि जब भाजपा सरकार को गिराने की षड्यंत्र में कामयाब हो गई तो उनके भाग्य का भी छींका फूटेगा। या फिर ये सोचते होंगे कि राजस्थान में हंगामा करूंगा तो  मोदी जी की नजर में रहूंगा। पता नहीं किसी दिन स्टार चमकें और दिल्ली में किसी महत्वपूर्ण काम के लिए बुला लिए जाएं। उधर श्रीमती भदेल को पता है कि यदि देवनानी का भाग्य चेता तो वे भी फालतू नहीं रहने दी जाएंगी। गुटबाजी को बैलेंस करने के लिए उनको भी दूसरे पलड़े में बैठाया जा सकता है।
-तेजवानी गिरधर
7742067000