शुक्रवार, 1 नवंबर 2019

अजमेर के पत्रकारों-साहित्यकारों की लेखन विधाएं

भाग उन्नीस
*श्री गजेन्द्र के. बोहरा*
पत्रकारिता व समाजसेवा के क्षेत्र में श्री गजेन्द्र के. बोहरा का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। पत्रकारिता में तो उन्होंने लंबा सफर तय किया ही है, सामाजिक व स्वयंसेवी संगठनों के साथ काम करने का भी उनका अच्छा खासा अनुभव है। विद्यार्थी जीवन से ही राजनीति में भी दखल रखते हैं। एनएसयूआई से आरंभ राजनीतिक सफर अब उन्हें अजमेर शहर जिला कांग्रेस कमेटी में सक्रिय सदस्य तक ले आया है। सक्रिय राजनीति में भले ही किसी बड़े मुकाम तक न पहुंचे हों, मगर दिग्गज मंत्रियों से निजी रसूखात के चलते स्थापित नेताओं तक के कान कतरते हैं। यदि चंद शब्दों में उनके व्यक्तित्व को समेटने की कोशिश करूं तो इतना ही काफी है कि वे हरफनमौला इंसान हैं। मजाक में मित्र मंडली उन्हें अजमेर की 'दाई' की उपमा देती है। आप समझे, ऐसा कोई क्षेत्र नहीं, जिसमें उनका दखल न हो। जानकारियों का खजाना भी कह सकते हैं उन्हें। दैनिक न्याय से आरंभ उनकी पत्रकारिता दैनिक भास्कर तक पहुंची। इतना ही नहीं, इलैक्ट्रॉनिक मीडिया में पैर पसारते हुए उन्होंने भास्कर टीवी में बतौर प्रभारी काम किया। जीवट से काम करने की प्रवृत्ति के दम पर उन्होंने बेरोजगार मित्र नामक अपने पाक्षिक समाचार पत्र को राज्य स्तर पर पहचान दिलाई है। उनकी अपनी खुद की प्रिटिंग यूनिट भी है। क्वालिटी प्रिटिंग में भी उन्होंने अपनी अच्छी साख कायम की है।
शहर के विभिन्न प्रतिष्ठित सामाजिक संगठनों में भी अपने मधुर व्यहवार व कार्यकुशलता के चलते अलग पहचान है। सेवा को समर्पित महावीर इंटरनेशनल में उत्कृष्ट सेवाओं के फलस्वरूप ही उन्हें अंतरराष्ट्रीय सचिव पद से नवाजा गया। हाल ही में महात्मा गांधी की 150वीं जयंती के उपलक्ष्य में 02 अक्टूबर को 44वीं बार रक्तदान किया। स्वेच्छिक रक्तदान के चलते राज्य स्तर पर भी सम्मानित किया जा चुका है। सजगता के चलते अब तक चार देहदान करवाने का श्रेय भी इनके खाते में दर्ज हैं। आज भी अनवरत कई सामाजिक संस्थाओं से सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं। 
अब बात करते हैं, उनकी भाषा-शैली की। संयोग से मेरे पास उनका वह आलेख है, जो उन्होंने दैनिक नवज्योति के प्रधान संपादक श्री दीनबंधु चौधरी के जीवन पर रचित गौरव ग्रंथ में प्रकाशित होने आया था, मगर प्रकाशन की आपाधापी में गंभीर त्रुटिवश वह रह गया। इस आलेख को पढ़ कर आप सहज ही अनुमान लगा सकते हैं कि भाषा-शैली पर उनकी कितनी गहरी पकड़ है। इस बहाने उनका वह आलेख भी सार्वजनिक हो जाएगा, जिसे उन्होंने बड़े मनोयोग से तैयार किया था।
*पेश है वह आलेख :*
'वह दिन' जिसने जीवन का लक्ष्य तय कर दिया...
मैं अपनी रोजमर्रा की डाक देख रहा था, तभी वह पत्र मेरे सामने आया, जिसमें मुझे स्थानीय लेकिन देश की पत्रकारिता जगत में अग्रणी स्थान पर स्थापित दैनिक समाचार पत्र 'दैनिक नवज्योति' के प्रधान सम्पादक दीनबन्धु चौधरी से संबंधित संस्मरण, आलेख के रूप में उपलब्ध कराने का स्नेहिल आमंत्रण दिया गया था। आलेख को श्री दीनबंधु चौधरी गौरव ग्रंथ में स्थान दिए जाने का उल्लेख भी पत्र में था।
इस स्नेहिल आमंत्रण ने मुझे इतना अभिभूत कर दिया कि मेरा दृष्टि-पटल अश्रु ओस कणों से अवरुद्ध हो गया। इन्हीं अश्रु ओस कणों से बने झीने पर्दे पर वह दृश्य उभरने-मिटने लगे, जिन्होंने मेरे जीवन का लक्ष्य निर्धारित कर दिया था...
अजमेर रेलवे स्टेशन का प्लेटफॉर्म संख्या एक, स्थानीय समाजसेवियों, पत्रकारों और राजनेताओं के साथ कर्मचारी संगठनों और व्यवसायिक संस्थानों के प्रमुख व्यक्तियों से जैसे भर गया था। 1986 के जुलाई माह के उस दिन, दोपहर दस्तक देने लगी थी। सभी की उत्सुक निगाहें उस तरफ टकटकी लगाए थीं, जिधर दिल्ली से आने वाली उस ट्रेन को आना था, जिस ट्रेन से 'दैनिक नवज्योति' के प्रबन्ध सम्पादक वरिष्ठ पत्रकार दीनबंधु चौधरी, अपना सोवियत रूस का प्रवास पूरा कर लौट रहे थे।
वे उस मीडिया टीम के विशेष आमंत्रित सदस्य थे, जो भारत के प्रधानमंत्री के साथ सोवियत रूस के दौरे पर जाने के लिए चुनी गई थी। निश्चित रूप से शहरवासियों के लिए वह दिन अजमेर के गौरवशाली इतिहास में एक पृष्ठ और संकलित करने वाला दिन था, इसका प्रमाण अजमेर रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म एक पर अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा, शहरवासियों का वह हुजूम था जिसका मैं भी एक हिस्सा था।
मेरी उत्सुक और कौतुहल भरी निगाहें, कभी उस हुजूम में मौजूद जाने-पहचाने चेहरों के इर्द-गिर्द जायजा लेती थीं और फिर उसी दिशा में जा टिकती थीं, जिधर से दिल्ली से आने वाली ट्रेन एक नए सूर्य की तरह उदित होने वाली थी। मैं देख रहा था, समझ रहा था कि उस हुजूम में मौजूद हर शख्स की हालत लगभग मेरे जैसी ही थी। उन सभी में और मुझ में या मेरी सोच में, शायद एक फर्क जरूर था। वह फर्क था कि सभी को इंतजार था ट्रेन के आने का, जबकि मेरी आंखों में एक सपना तैरने लगा था। मैं उस सपने में खो गया। दूर से आ रहा और ट्रेन को ला रहा इंजन धीरे-धीरे नजदीक आ रहा था। कुछ सौ मीटर की दूरी से दिखाई देने वाली ट्रेन की रफ्तार इतनी धीमी थी, जैसे वह सैकड़ों मील की दूरी तय कर थक गई हो। दूसरी तरफ मेरे दिल की धड़कनों की रफ्तार इतनी बढ़ गई थी, जैसे वह उछल कर सीने से बाहर आ जाएगी। खून की रफ्तार इस कदर बढ़ गई थी, कि कनपटियों में फड़क रही नसों की धमक मेरे कानों में हथौड़े की तरह गूंज रही थी। धीरे-धीरे ट्रेन का इंजन मेरे सामने से गुजरा और ट्रेन के डिब्बे एक के बाद एक मेरे सामने से गुजरने लगे। फिर वह डिब्बा मेरे सामने आकर रुक गया, जिसके दरवाजे पर मैं अपने आपको खड़ा देख रहा था। स्टेशन के प्लेटफार्म पर हुजूम हाथ हिला-हिला कर मेरा अभिवादन कर रहा था। मैं भी मुस्कुराते हुए उनका अभिवादन स्वीकार कर रहा था। उस हुजूम ने ट्रेन के उस डिब्बे के उस दरवाजे को इस तरह घेर लिया था कि मुझे दरवाजे से उतरना मुश्किल हो गया था। कुछ ही पलों में मुझे कुछ लोगों ने कंधों पर उठा कर ट्रेन के डिब्बे से नीचे उतारा और प्लेटफार्म पर ही मुझे कंधों पर लेकर नाचने लगे। बड़ी मुश्किल से मेरे पैरों ने प्लेटफार्म की जमीन को छुआ। मैं कह नहीं सकता कि कंधों से उतरने में मेरी भूमिका कितनी थी और हुजूम की कितनी। उसके बाद दौर शुरू हो गया गले मिलने, बधाई और शुभकामनाओं के साथ माला पहनाने का सिलसिला। मुझे इतना मौका भी नहीं मिल रहा था कि मैं मालाओं में निरंतर डूबते जा रहे चेहरे को अपने हाथों से निजात दिला सकूं। मैं कुछ भी देख पाने में असमर्थ था और मेरी नाक फूलों की सुगंध से भर रही थी। तभी अचानक मेरे कानों में मेरे ही नाम की गूंज सुनाई दी। मैं अपने सपने से उबरने लगा। अब मेरे सामने जो चेहरा फूलों से ढका जरूर था, लेकिन वह चेहरा मेरा नहीं, दीनबंधु चौधरी साहब का था। उन्होंने मुझसे पूछा 'गजेन्द्र कैसे हो...?'
मैं चौंक कर अपने आप में लौटा। मैंने मुस्कराते हुए अपने हाथों में ली हुई माला उन्हें आदरपूर्वक पहनाते हुए कहा- मैं ठीक हूं 'सर'। मैंने झुक कर चरण स्पर्श कर मन ही मन फैसला किया कि 'मैं भी अपने आपको पत्रकारिता के उस मुकाम तक पहुंचाने के लिए कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ूगा।' निश्चित रूप से वह दिन मेरी जिन्दगी का अहम दिन बन गया। सच कहूं तो उस पूरे कार्यक्रम के दौरान और क्या कुछ होता रहा, मुझे सिलसिलेवार याद नहीं रहा। याद रहा तो बस इतना कि मुझे अपने आपको पत्रकारिता के प्रति इस कदर समर्पित कर देना है कि ज्यादा नहीं तो उस पायदान तक तो मुझे पहुंचना ही है, जहां मुझे, मेरे परिजन और मित्र मुझे पत्रकार के रूप में एक पहचान दे सकें। आज मैं अपने आपको गौरवान्वित महसूस करता हूं कि मेरी समर्पित भावना ने मुझे इस लायक बना दिया कि आज मेरे परिजन और मित्र मुझे किसी बिजनेसमैन के रूप से ज्यादा पत्रकार के रूप में मान्यता देते हैं।
सच कहूं तो मुझे पत्रकारिता के क्षेत्र में यह स्थान दिलाने मेें मेरे श्रम और समर्पण से ज्यादा, वह स्मरणीय दिन है, जो मेरे लिए उस दिन अनुकरणीय बन गया और आज भी है।
मैं समझता हूं कि यह आलेख उन लोगों से उनको रूबरू करवाने के लिए काफी है, जो कि उन्हें परिपूर्ण पत्रकार में रूप में नहीं जानते हैं।
- तेजवानी गिरधर
7742067000

मंगलवार, 22 अक्टूबर 2019

एडीए अध्यक्ष का पद अब सामान्य को मिलेगा?

हालांकि राजनीति में कुछ भी संभव है, मगर अब जब कि अजमेर नगर निगम के मेयर का पद अनुसूचित जाति की महिला के लिए आरक्षित हो गया है, मोटे तौर पर माना जा रहा है कि अब अजमेर विकास प्राधिकरण  के अध्यक्ष का पद सामान्य वर्ग के किसी नेता को मिलेगा। पक्के तौर पर इसलिए नहीं कहा जा सकता क्योंकि इससे पहले सामान्य की सीट पर ओबीसी के धर्मेन्द्र गहलोत को मेयर बना दिया गया, जिसका भारी विरोध भी हुआ, मगर उसके तुरंत बाद डिप्टी मेयर का पद भी ओबीसी के संपत सांखला को दे दिया गया।
अगर ये माना जाता है कि एडीए अध्यक्ष पद किसी सामान्य वर्ग के नेता की नियुक्ति होगी तो उसमें सबसे पहले नंबर पर पूर्व विधायक डॉ. श्रीगोपाल बाहेती का नाम आता है। असल में वे मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बेहद करीबी माने जाते हैं। यद्यपि वे लगातार दो बार अजमेर उत्तर विधानसभा क्षेत्र से हारे और तीसरी बार उन्हें टिकट नहीं दिया गया, मगर गहलोत से नजदीकी उनके दावे को मजबूत बनाए हुए है। दूसरा दावा है प्रदेश कांग्रेस के सचिव व अजमेर शहर जिला कांग्रेस के अध्यक्ष रह चुके महेन्द्र सिंह रलावता का, जो पिछले विधानसभा चुनाव में अजमेर उत्तर से हार गए। अजमेर में वे काफी सीनियर नेता हैं, इस कारण हाईकमान तक पकड़ है। उनकी पकड़ का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब यह लगभग तय था कि इस बार कांग्रेस किसी सिंधी को टिकट देगी, फिर भी वे टिकट ले कर आ गए। ज्ञातव्य है कि मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का उन पर वरद हस्त है।
शहर जिला कांग्रेस के अध्यक्ष विजय जैन का भी दावा बनता है। उन्होंने विपरीत हालात में भी संगठन को मजबूत किया। अपने खास सिपहसालार मुजफ्फर भारती व बिपिन बेसिल के सहयोग से वार्ड व बूथ स्तर पर संगठनात्मक ढ़ांचा खड़ा किया। कामयाब धरने-प्रदर्शन किए। संगठन का वजूद तो रलावता के समय भी था, लेकिन इस बार चूंकि कांग्रेस की सरकार बनने की पूरी उम्मीद थी, उसी के चलते उनकी टीम ने अपेक्षाकृत बेतहर काम किया। टीम में कई नए कार्यकर्ता भी जुड़े। यह बात दीगर है कि मोदी लहर के चलते अजमेर की दोनों सीटें कांग्रेस हार गई। वे प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट की पसंद हैं। देहात जिला कांग्रेस के अध्यक्ष भूपेन्द्र सिंह राठौड़ भी प्रमुख दावेदार हैं, वे भी पायलट की पसंद से देहात अध्यक्ष बने थे।
सामान्य वर्ग से अन्य कई और भी दावा कर सकते हैं, जिनमें राजू गुप्ता का नाम लिया जाता है। सचिन पायलट के करीबी किशनगढ़ निवासी राजू गुप्ता किशनगढ़ विधानसभा सीट के प्रबल दावेदार थे, मगर उन्हें टिकट नहीं मिली। हो सकता है, उनकी लॉटरी लग जाए। यहां उल्लेखनीय है कि अजमेर विकास प्राधिकरण के कार्य क्षेत्र में किशनगढ़ भी है, इस कारण उन पर बाहरी होने का ठप्पा नहीं लगेगा।
अपुन ने शुरू में ही लिखा कि राजनीति में कोई फाइनल फार्मूला नहीं होता, इस कारण अनुसूचित जाति के नेता यथा अजमेर दक्षिण से हारे हेमंत भाटी, उनके बड़े भाई पूर्व उप मंत्री ललित भाटी, पूर्व विधायक डॉ. राजकुमार जयपाल, पूर्व मेयर कमल बाकोलिया, शहर जिला कांग्रेस के उपाध्यक्ष प्रताप यादव भी नाउम्मीद नहीं हैं। वैसे जातीय संतुलन बनाने के लिए सामान्य वर्ग के किसी नेता को एडीए का अध्यक्ष बनाने का कयास लगाया जा रहा है। 
-तेजवानी गिरधर
7742067000

रविवार, 20 अक्टूबर 2019

मेयर पद के लिए अनुसूचित जाति महिला वर्ग में दावेदारों को लेकर कयासबाजी शुरू

संशोधित एवं परिवद्र्धित
सामान्य व ओबीसी दावेदारों की उम्मीदों पर फिरा पानी
अजमेर। आगामी नगर निकाय चुनाव में अजमेर नगर निगम का मेयर पद अनुसूचित जाति की महिला के आरक्षित होने के साथ एक ओर जहां सामान्य व ओबीसी के दावेदारों की उम्मीदों पर पानी फिर गया है, वहीं अनुसूचित जाति महिला वर्ग में दावेदारों को लेकर कयासबाजी शुरू हो गई है। जैसा कि हाल ही राज्य सरकार ने नई व्यवस्था लागू करते हुए आम मतदाता के लिए भी मेयर का चुनाव लडऩे का रास्ता खोल दिया है, इस कारण उन संभावित दावेदारों पर नजर है, जो कि पार्षद का चुनाव न लड़ कर सीधे मेयर पद का टिकट हासिल करने की कोशिश करेंगी। उनमें वे प्रमुख रूप से उभर कर आएंगी, जो कि पहले से शहर स्तर पर स्थापित नेताओं की पत्नियां हैं। मेयर पद नजर रखने वाली महिलाओं में से जिनको टिकट मिलने की कोई खास उम्मीद नहीं है, वे पार्षद का चुनाव जरूर लडऩा चाहेंगी। उनके लिए भी मेयर पद की दावेदारी का विकल्प तो खुला हुआ रहेगा ही।
कांग्रेस में अजमेर दक्षिण से विधानसभा चुनाव हारे प्रमुख उद्योगपति व समाजसेवी हेमंत भाटी की पत्नी की दावेदारी सबसे प्रबल हो सकती थी, लेकिन चूंकि वे क्रिश्चियन परिवार से हैं, इस कारण उनको आरक्षण का लाभ नहीं मिल सकेगा। उनकी भाभी भी सामान्य वर्ग से हैं, इस कारण उनको भी मौका नहीं मिलेगा। पूर्व उप मंत्री ललित भाटी अपनी पत्नी को राजनीति में लाना चाहेंगे या नहीं, कुछ कहा नहीं जा सकता। राजनीति व नगर निगम में कामकाज के अनुभव के लिहाज से सबसे तगड़ी दावेदारी शहर जिला कांग्रेस के उपाध्यक्ष व पूर्व पार्षद प्रताप यादव की पत्नी श्रीमती तारा देवी यादव, जो कि स्वयं भी पार्षद भी रह चुकी हैं, की बनती दिख रही है। मौजूदा पार्षदों में चंचल बेरवाल, द्रोपदी कोली, उर्मिला नायक व रेखा पिंगोलिया भी दावा ठोकने की पात्रता रखती हैं। पूर्व विधायक डॉ. राजकुमार जयपाल की पत्नी श्रीमती रंजू जयपाल, पूर्व मेयर कमल बाकोलिया की पत्नी श्रीमती लीला बाकोलिया, पार्षद सुनील केन की पत्नी श्रीमती नीता केन के भी खुल कर सामने आने की पूरी उम्मीद है। डॉ. जयपाल की बहिन, राजस्थान लोक सेवा आयोग, अजमेर की सचिव आईएएस अधिकारी रेणु जयपाल ने यूं तो कभी राजनीति में रुचि नहीं दिखाई, मगर चूंकि लंबे समय से अजमेर में ही विभिन्न पदों पर रही हैं, इस कारण सुपरिचित चेहरा हैं। ज्ञातव्य है कि उनके पिता जसराज जयपाल शहर कांग्रेस के अध्यक्ष रहे हैं और माताजी स्वर्गीय श्रीमती भगवती देवी मंत्री रही हैं।
इसी प्रकार पूर्व पार्षद विजय नागौरा अपनी पत्नी का नाम चला सकते हैं। इसी कड़ी में प्रदेश महिला कांग्रेस में सक्रिय मंजू बलाई व रेणु मेघवंशी भी भाग्य आजमाने का आग्रह कर सकती हैं। ज्ञातव्य है कि मंजू बलाई के पिताश्री जोधपुर जिले से विधायक थे। हाल के चुनाव में वे हार गए थे। उन पर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का हाथ था।
भाजपा में जिला प्रमुख वंदना नोगिया प्रबल दावेदार हो सकती हैं।  जिला प्रमुख का कार्यकाल समाप्त होने के बाद राजनीतिक कैरियर बरबरार  रखने के लिए आगे आने की कोशिश करेंगी। वे हाल के विधानसभा चुनाव में भी अजमेर दक्षिण से प्रबल दावेदार थीं। संभावना ये भी है कि मौजूदा विधायक व नगर परिषद के पूर्व सभापति श्रीमती अनिता भदेल के नाम पर भी विचार हो। हालांकि उनका विधायक पद का कार्यकाल चार साल से भी ज्यादा बाकी पड़ा है, मगर विपक्ष में होने के कारण उसका कोई आकर्षण नहीं। दूसरा ये कि कार्यक्षेत्र के लिहाज से मेयर का पद विधायक से कहीं अधिक बड़ा है। कहने की जरूरत नहीं कि अजमेर में स्मार्ट सिटी के तहत अभी बहुत कुछ काम होना बाकी है। हालांकि वे आनाकानी कर रही बताईं, मगर हो सकता है कि यह उनकी एक चाल हो। अभी दावेदारी में नहीं आना, और बाद में ऐन वक्त पर दावा ठोकना। पूर्व राज्य मंत्री श्रीकिशन सोनगरा की बहू यानि विकास सोनगरा की पत्नी श्रीमती इंदु सोनगरा के लिए भी प्रयास हो सकते हैं। श्रीकिशन सोनगरा की पुत्री का नाम भी चर्चा में है। नगर परिषद की पूर्व सभापति श्रीमती सरोज जाटव तो निश्चित रूप से दावेदारी करेंगी, चूंकि वे नगर परिषद का स्वाद चख चुकी हैं। वे वर्तमान पार्षद धर्मपाल जाटव की पत्नी हैं। इसी प्रकार पार्षद वंदना नरवाल, बीना सिंगारिया, भाजपा नेता हीरालाल जीनगर की पत्नी के दावे सामने आने की उम्मीद है। अजमेर नगर सुधार न्यास की पूर्व ट्रस्टी भगवती रूपाणी भी प्रयास कर सकती हैं।
मेयर के चुनाव की उल्लेखनीय बात ये है कि साधन संपन्न व्यक्ति ही दमदार दावेदारी कर सकेगा, क्योंकि पार्षद प्रत्याशियों को उससे सहयोग की उम्मीद होगी। वही मैदान में डट सकेगा, जिसने पार्षद प्रत्याशियों को चुनाव लडऩे में मदद की होगी। इस चुनाव की अहम बात यही है। इक्का-दुक्का को छोड़ कर अधिसंख्य उतनी साधन संपन्न नहीं, जितने की जरूरत है। ऐसे में हो सकता है कि वे अपना-अपना आका तलाशें, जो कि उन पर इन्वेस्ट कर सके। चंचल बेरवाल, द्रोपदी कोली व रेखा पिंगोलिया प्रमुख उद्योगपति व अजमेर दक्षिण से हारे हेमंत भाटी का वरदहस्त पाना चाहेंगी। यह तो भाटी पर निर्भर करता है कि वे इसमें रुचि ले या नहीं और लें भी तो किस में। लोकसभा चुनाव हारने के बाद भी समाजसेवा में सक्रिय रिजु झुंझुंनवाला सक्रिय हो सकते हैं और किसी पर हाथ रख कर जितवाने की गारंटी ले सकते हैं।
ज्ञातव्य है कि सामान्य व ओबीसी वर्ग के अनेक दावेदार चांस मिलने की सोच रहे थे, उनके मंसूबों पर पूरी तरह से पानी फिर गया है। इनमें कांग्रेसी दावेदारों में गत विधानसभा चुनाव में उत्तर क्षेत्र के प्रत्याशी रहे महेन्द्र सिंह रलावता व दक्षिण क्षेत्र के प्रत्याशी रहे हेमंत भाटी, शहर कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष विजय जैन, कांग्रेस के प्रदेश महासचिव ललित भाटी, पूर्व विधायक और नगर सुधार न्यास के अध्यक्ष रह चुके डॉ. श्रीगोपाल बाहेती, नौरत गुर्जर, प्रताप यादव, समीर शर्मा, श्रवण टोनी, सुरेश गर्ग के नाम थे। इसी प्रकार भाजपा में मौजूदा मेयर धर्मेन्द्र गहलोत, शहर भाजपा अध्यक्ष शिव शंकर हेड़ा, युवा भाजपा नेता भंवर सिंह पलाड़ा, नगर सुधार न्यास के अध्यक्ष रहे धर्मेश जैन, पूर्व शहर जिलाध्यक्ष अरविंद यादव, मेयर का चुनाव हार चुके डॉ. प्रियशील हाड़ा, आनंद सिंह रजावत, सुभाष काबरा, एडवोकेट गजवीर सिंह चूंडावत, सुरेन्द्र सिंह शेखावत, सोमरत्न आर्य, पार्षद जे के शर्मा, रमेश सोनी, नीरज जैन आदि की चर्चा थी।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

गुरुवार, 17 अक्टूबर 2019

अजमेर के पत्रकारों-साहित्यकारों की लेखन विधाएं

भाग अठारह
श्री ओम माथुर
अजमेर के प्रतिष्ठित व स्थापित पत्रकारों में शुमार श्री ओम माथुर यहां के पत्रकार जगत में अपनी किस्म के अनूठे पत्रकार हैं। अन्य पत्रकारों की तरह उन्हें भी अच्छे ऑफर मिले, लेकिन उन्होंने अपनी उस जमीन को नहीं छोड़ा, जिसने उन्हें स्थापित किया और आज पत्रकारों की शीर्ष पंक्ति में हैं।  पत्रकारिता का आरंभ उन्होंने दैनिक रोजमेल से किया। कुछ समय दैनिक न्याय में भी रहे, मगर बाद में दैनिक नवज्योति से जुड़े तो वहीं के हो कर रह गए। आज वे नवज्योति के स्थानीय संपादक हैं। उन्होंने काफी समय तक रिपोर्टिंग की है। अब तक अनगिनत एक्सक्लूसिव स्टोरीज कर चुके हैं। काफी समय से संपादन का काम भी बखूबी कर रहे हैं। वे लंबे समय तक आकाशवाणी के संवाददाता भी रहे हैं। वर्तमान में सोशल मीडिया पर स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय स्तर के ज्वलंत विषयों पर बेबाकी से लिख रहे हैं।
उनकी छवि एक सख्त पत्रकार के रूप में है। केवल काम से काम। हालांकि हैं सुमधुर व व्यवहार कुशल, मगर खबर के मामले में कोई समझौता नहीं। न किसी अधिकारी के दबाव में आते हैं और न ही किसी राजनेता के। इसे यूं भी कह सकते हैं कि मानसिक रूप से पूरे पत्रकार हैं। कोई कितना भी बड़ा लाट साब हो, उनकी कलम जब चलती है तो नश्तर ही भांति पूरा पोस्टमार्टम करके ही चैन लेती है। यही वजह है कि कई बार सार्वजनिक जीवन से वास्ता रखने वाले उनसे नाराज हो जाते हैं, लेकिन बाद में अहसास करते हैं कि उन्होंने तो अपने धर्म का पालन किया है, प्रयोजन विशेष से उनके खिलाफ नहीं लिखा है। पत्रकारिता को धर्म की भांति धारण किए हुए श्री माथुर अमूमन जनसामान्य में मिक्सअप नहीं होते। मगर इसका अर्थ ये भी नहीं कि उनके मित्र नहीं हैं। बहुतेरे मित्र हैं, और मित्रता के नाते दुनियादारी वाला सारा व्यवहार भी पूरा निभाते हैं, यानि कि सभी की गमी-खुशी में आते-जाते हैं, लेकिन खबर लिखते समय संबंधों को ताक पर रख देते हैं। और यही खासियत उन्हें खांटी पत्रकार की श्रेणी में खड़ा करती है। उनके एक राजनीतिक मित्र ने एक बार मुझे बताया कि श्री माथुर हैं तो बहुत अच्छे मित्र, मार्गदर्शन भी अच्छा करते हैं, सही सलाह देते हैं, लेकिन बात ही बात में दी गई जानकारी को मौका लगने पर पत्रकारिता में उपयोग करने से नहीं चूकते। लेकिन साथ ही ये भी बताया कि श्री माथुर ने गोपनीय जानकारियों का कभी दुरुपयोग नहीं किया।
जहां तक नवज्योति संस्थान का सवाल है, एक इंचार्ज के रूप में वे सहयोगियों को पूरे अनुशासन में रखते हैं, लेकिन बाद में सभी से छोटे भाई सा व्यवहार करते हैं।
यह भी एक संयोग की बात है कि जिस मिजाज के पत्रकार वे हैं, उन्हें उसी के अनुरूप दैनिक नवज्योति का मंच मिला। दैनिक नवज्योति के प्रधान संपादक श्री दीनबंधु चौधरी के जीवन पर प्रकाशित गौरव ग्रंथ में अपने मन्तव्य में वे स्वयं लिखते हैं कि लगातार एक ही संस्थान में तीस साल तक काम करना कोई मामूली बात नहीं है। दैनिक नवज्योति, अजमेर में करीब तीस साल तक काम करने के बाद जब मैं पुनरावलोकन करता हूं, तो अहसास होता है कि अपनी बात कहने और लिखने की जो आजादी मुझे नवज्योति में मिली, शायद कहीं और होता, तो नहीं मिलती। वे लिखते हैं कि जब मैंने नवज्योति में प्रवेश किया था, तब वहां अजमेर की पत्रकारिता के दिग्गज काम कर रहे थे। उस समय ऐसा लगता था कि उनके बीच काम करते हुए शायद अपनी पहचान बनाना ही मुश्किल होगा। लेकिन खुद पर यकीन और दीनूजी के विश्वास के चलते न सिर्फ पत्रकारिता में पहचान बनाई, बल्कि पहली बार जिसे नवज्योति का स्थानीय संपादक बनाया गया, वह मैं ही था।
वे लिखते हैं कि जहां दूसरे अखबारों में खबर लिखने की कई पाबंदियां हैं, वहीं नवज्योति में दीनूजी ने कभी किसी के हाथ नहीं बांधे। मैंने नवज्योति में सालों तक इधर-उधर कॉलम लिखा है, जिसमें राजनीतिज्ञों व अफसरशाही से लेकर समाज के हर वर्ग से जुड़े लोगों पर कड़ी टिप्पणियां कीं। इसमें कई लोग ऐसे भी थे, जिनके दीनूजी से अच्छे रिश्ते थे। लेकिन उन्होंने कभी मुझे ये नहीं कहा कि मैंने फलां व्यक्ति के लिए क्यों लिख दिया। इसके उलट ऐसा कई बार हुआ है कि जब किसी ने उन्हें इस बात का उलाहना दिया कि वे मालिक के दोस्त हैं, फिर उनके अखबार में उनके खिलाफ लिखा जा रहा है। तो दीनूजी ने उन्हें ही उलाहना देते हुए कहा कि, अगर ओम ने गलत लिखा है, तो बताओ और अगर सही है, तो उसका काम ही ये है।
एक किस्सा बताना चाहूंगा। अजमेर से सांसद रहे एक राजनीतिज्ञ को इधर-उधर में उनके बारे में लिखने पर बहुत तकलीफ होती थी। उन्होंने पांच साल तो जैसे-तैसे मेरे लेखन की बर्दाश्त किया, लेकिन जब अगला चुनाव भी अजमेर से ही लडऩा पड़ा, तो दीनूजी से मिलने गए और उनसे आग्रह किया कि वे मुझे ये निर्देश दें कि मैं चुनाव तक उनके बारे में कुछ नहीं लिखूं। इस पर दीनूजी का जवाब था, मैं तो उससे नहीं कहूंगा। अगर आप कह सकते हो, तो कह दो। जाहिर है दीनूजी का रूख देख कर वे नेता खामोश लौट गए। इसी तरह एक बार मेरे लेखन से पीडि़त एक व्यक्ति ने दीनूजी को चि_ी भेजकर मुझ पर भ्रष्टाचार और दूसरे आरोप लगाए। तो उन्होंने चि_ी को मेरे समक्ष इस टिप्पणी के साथ भेजा, कि जब हाथी निकलता है, कुत्ते ऐसे ही भौंकते हैं। तुम अपना लेखन और धारदार करो। आज के दौर में शायद ही कोई अखबार मालिक इस तरह अपने स्टाफ के लिए खड़ा होता होगा।
श्री माथुर के शब्दों से ही उनके व्यक्तित्व व कृतित्व का शब्द चित्र खड़ा हो रहा है। पत्रकार जगत में नव प्रवेशियों को श्री माथुर से प्रेरणा लेनी चाहिए।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

सोमवार, 14 अक्टूबर 2019

पुष्कर पालिका अध्यक्ष पद का चुनाव सीधे लडऩे वालों के मनसूबों पर फिरा पानी

राजस्थान में स्थानीय निकाय चुनाव में नगरपालिकाओं, निगमों के प्रमुखों का चुनाव अप्रत्यक्ष प्रणाली से ही करवाए जाने के निर्णय के साथ पुष्कर नगर पालिका में सीधे चुनाव के जरिए पालिका अध्यक्ष बनने के सपने देख रहे दावेदारों के मनसूबों पर पानी फिर गया है।
असल में सरकार ने पहले ये घोषणा की थी कि निकाय प्रमुख का चुनाव प्रत्यक्ष मतदान प्रणाली से होगा। हालांकि पुष्कर नगर पालिका के अध्यक्ष पद के लिए लॉटरी नहीं निकलने के कारण ये भी पता नहीं था कि अध्यक्ष किस कैटेगिरी का होगा, बावजूद इसके संभावनाओं के इस दंगल में शिरकत करने के लिए तकरीबन सात दावेदारों ने तो खुल्लम खुल्ला दावेदारी जताने का मानस बना लिया, वहीं तकरीबन नौ ने सपने संजो रखे थे कि लॉटरी निकलेगी, उसी के अनुरूप निर्णय लेंगे। दिलचस्प बात ये है कि कई नेताओं ने तो गुट बना कर हर विकल्प खुला छोड़ रखा था। जैसे ही लॉटरी खुलती, वे अपना पत्ता खोलते।
ज्ञातव्य है कि यदि लॉटरी सामान्य पुरुष के लिए निकलने की स्थिति में सबसे पहले व प्रबल दावेदार स्वाभाविक रूप से मौजूदा अध्यक्ष कमल पाठक होते। मगर वे अपना मन नहीं बना पा रहे थे। उसकी वजह कदाचित ये रही होगी कि पिछली बार तो पार्टी हाईकमान की सरपरस्ती में पार्षदों के बहुमत के आधार पर अध्यक्ष बन गए, लेकिन सीधे चुनाव में जीत का गणित क्या होगा, उसको ले कर संशय था। खैर, अब ये देखना होगा कि अध्यक्ष पद सामान्य पुरुष के लिए आरक्षित होता है तो उस स्थिति में वे दुबारा अध्यक्ष बनने के लिए पार्षद पद के लिए दावेदारी करते हैं या नहीं।
अध्यक्ष पद के प्रबल दावेदार भी वार्ड का चुनाव लडऩे का मानस तभी बनाएंगे, जबकि अध्यक्ष पद सामान्य पुरुष के लिए आरक्षित होगा। इसी प्रकार अरुण वैष्णव अध्यक्ष बनने को बेहद आतुर हैं, इस कारण वे भी किसी न किसी वार्ड से तैयारी करेंगे। वार्ड नंबर 2 की पार्षद रही मंजू डोलिया यूं तो नवनिर्मित वार्ड 17 या 15 से पार्षद का चुनाव लडऩे का मन बना चुकी हैं। बाबूलाल दगदी व जयनारायण को भी अपने लिए वार्ड तलाशने होंगे।
नेता प्रतिपक्ष के रूप में भी अपनी उपस्थिति दर्ज करवा चुके शिवस्वरूप महर्षि 5-6 पार्षदों का जाल बिछा कर अपनी दावेदारी सुनिश्चित कर चुके थे। बदली परिस्थिति में दुबारा वार्ड चुनाव लडऩे की तैयारी करेंगे।
सीधे चुनाव में अध्यक्ष पद की दौड़ में शामिल पुष्कर नारायण भाटी व वार्ड नंबर 15 के पार्षद कमल रामावत भी सारा ध्यान वार्ड चुनाव पर देंगे। इसी सिलसिले में रामजतन चौधरी, जगदीश कुर्डिया, गोपाल तिलोनिया, राजेंद्र महावर आदि भी लॉटरी निकलने का इंतजार कर रहे हैं, तभी आगे की रणनीति बनाएंगे।