गुरुवार, 19 नवंबर 2020

अफसरशाही के आगे जनप्रतिनिधि इतने मजबूर क्यों?


पिछले दिनों स्वामी न्यूज फेसबुक लाइव में कांग्रेस व भाजपा के विभिन्न प्रमुख नेताओं से हुई बातचीत से एक बात खुल कर सामने आई है कि जनहित के लिए किए जा रहे विकास कार्यों में जनप्रतिनिधियों की ही नहीं चलती, सारे निर्णय प्रशासन ही करता है। विशेष रूप से ताजा तरीन स्मार्ट सिटी योजना में। जनप्रतिनिधियों की राय भले ही ली जाती हो, मगर होता वही है जो प्रशासन चाहता है। अर्थात जिला प्रशासन के आगे जनप्रतिनिधि मजबूर हैं। यह बात जनप्रतिनिधियों ने स्वयं स्वीकार की है कि प्रशासन मनमानी करता है। यह वाकई दुर्भाग्यपूर्ण है। लोकतंत्र में लोक का प्रतिनिधित्व करने वाले ही कमजोर हैं तो इसका अर्थ ये है कि सिस्टम में कोई गड़बड़ी है। 

सवाल उठता है कि आखिर जनप्रतिनिधि मजबूर क्यों हैं? इसकी एक वजह ये है कि जैसे ही सरकार बदलती है तो उसी के साथ नेताओं के प्रति प्रशासन का नजरिया बदल जाता है। लेकिन ऐसे भी उदाहरण हैं कि सत्तारूढ़ पार्टी के नेताओं को भी कई बार प्रशासन ने नहीं गांठा है। कुछ नेता मानते हैं कि ऐसा इस कारण भी है कि जनहित के कार्यों में दोनों राजनीतिक दलों के नेताओं में एकजुटता नहीं होती। एकराय न होने के कारण ही शासन-प्रशासन पर राजनीतिक दबाव कम हो जाता है और वह मनमानी करता है।  यातायात की बेहद कष्टदायक समस्या के समाधान के लिए एलिवेटेड रोड बनाने की योजना इसी कारण लंबी खिंच गई कि सरकारें बदलने के साथ स्थानीय नेताओं की स्थिति भी बदल गई। कांग्रेस व भाजपा नेताओं की एकजुटता की बात तो फिर भी सपना है, मगर इसको लेकर भाजपा नेताओं तक में एकराय नहीं बनी। एक प्रमुख नेता सरकार पर मंजूरी का दबाव बनाए हुए थे तो दूसरे इसका विरोध करते रहे। वे आज भी सहमत नहीं हैं।

विकास योजनाओं की बात करें तो सीवरेज योजना का हश्र हम देख चुके हैं। कांग्रेस व भाजपा की सरकारें दो बार एक के बाद दूसरे की बनी, मगर आज तक वह ठीक से लागू नहीं पाई है। सात सौ छियांसीवें उर्स के मौके पर बनी छोटी सीवरेज योजना बेकार ही हो गई। स्मार्ट सिटी योजना का हाल भी किसी से छुपा हुआ नहीं है। प्रशासन अपने हिसाब से काम करवा रहा है और जनप्रतिनिधि अपने आप को ठगा सा महसूस कर रहे हैं। दोनों दलों के नेता एक स्वर से कह रहे हैं कि उनकी राय तो ली जाती है, मगर उस अमल नहीं किया जाता। कैसी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि आजीवन अजमेर में रहने वाले नेताओं को स्थानीय समस्याओं व जरूरतों की गहरी समझ है, उनकी राय ताक पर रख दी जाती है, जबकि मात्र दो-तीन साल के लिए यहां पदस्थापित होने वाले अधिकारी ही अंतिम फैसला करते हैं, जिनका अजमेर से कोई लगाव नहीं होता। 

प्रशासनिक कामकाज की समझ रखने वाले बुद्धिजीवी मानते हैं कि एक्जीक्यूशन का काम बेशक तकनीकी रूप से समृद्ध विभागीय अधिकारी ही करते हैं, मगर उन पर निगरानी के लिए जरूरी समझ जनप्रतिनिधियों को नहीं होती। वे तकनीकी अध्ययन करने की बजाय, राजनीतिक उलझनों व दाव-पेच में ही व्यस्त रहते हैं। इसी कारण अधिकारी उन पर हावी रहते हैं और मनमानी करते हैं। अगर जननेता विकास योजनाओं की बारीकियों का ठीक से अध्ययन करें तो क्या मजाल कि प्रशासन मनमानी कर जाए। 

कमजोर राजनीतिक नेतृत्व का ही परिणाम है कि वर्षों से पानी की किल्लत झेल रहे अजमेर को बार-बार छला ही इसलिए गया कि दोनों दलों ने एकजुट हो कर दबाव नहीं बनाया। जब भाजपा की सरकार थी तो कांगे्रसी बोले, मगर भाजपाई पार्टी की मर्यादा में बंधे रहे और जब कांग्रेस सरकार रही तो भाजपाई तो चिल्लाए, मगर कांग्रेसियों ने चुप्पी साध ली। आज स्थिति ये है कि मूलरूप से अजमेर की प्यास बुझाने के लिए बनाई गई बीसलपुर परियोजना का लाभ जयपुर को दिया जाने लगा, जबकि अजमेर में अब भी नियमित व पर्याप्त जल सप्लाई नहीं हो पा रही। इसकी एक वजह ये भी है कि अपनी-अपनी सरकारों में यहां के मंत्री व विधायकों की स्थिति बौनी ही रही। वे सरकार का विरोध कर ही नहीं पाए। ज्ञातव्य है कि भूतपूर्व मंत्री स्वर्गीय प्रो. सांवरलाल जाट जैसे दबंग कहलाने वाले नेता के पास जलदाय महकमा होने के बावजूद, उनके कार्यकाल में ही सरकार ने बीसलपुर का पानी जयपुर को देने का फैसला कर दिया, मगर वे कुछ नहीं कर पाए। लब्बोलुआब परिणाम तो जनता ही भुगत रही है।

विद्युत वितरण का काम प्राइवेट कंपनी को सौंपे जाने का निर्णय भाजपा शासन काल में हुआ, तब कांग्रेसी तो खूब उबले, मगर भाजपाई मौन बने रहे। आज जब कांग्रेस सरकार है तो भाजपाई अनापशनाप बिल आने का विरोध कर रहे हैं, मगर कांग्रेसी आंदोलन करने की स्थिति में नहीं रहे। बहाना ये बनाया जा रहा है कि चूंकि बिजली कंपनी के साथ एमओयू पर साइन हो चुके हैं, इसलिए अब कुछ नहीं हो सकता। यह कारण वाजिब भी हो सकता है, मगर इसका मतलब ये तो नहीं कि बिजली कंपनी दो-तीन गुना बिलों के बारे में पारदर्शिता रखने में कोताही बरते। आज हालत ये है कि इस मसले पर आम जनता की सुनवाई करने वाला कोई नहीं है।


-तेजवानी गिरधर

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मंगलवार, 17 नवंबर 2020

आरएसएस कोई फ्रेश चेहरा सामने लाएगा मेयर पद के लिए?


हालांकि अनुसूचित जाति महिला के लिए रिजर्व मेयर पद के लिए चर्चाओं में स्थापित या चर्चित चेहरे आ रहे हैं, लेकिन अंदरखाने से यह जानकारी छन कर आ रही है कि भाजपा का मातृ संगठन आरएसएस किसी फ्रेश चेहरे को सामने ला सकता है। ठीक वैसे ही जैसे पूर्व महिला व बाल विकास राज्य मंत्री व मौजूदा अजमेर दक्षिण विधायक श्रीमती अनिता भदेल को लेकर आई थी। उस वक्त श्रीमती भदेल हालांकि आरएसएस के प्रकल्प संस्कार भारती से जुड़ी हुई थीं, लेकिन भाजपा में उनकी कोई सक्रियता नहीं थी। न ही उनकी कोई महत्वाकांक्षा थी। संघ की मंशा के अनुरूप ही भाजपा ने उन्हें पार्षद का टिकट दिया और जीतने पर तत्कालीन नगर परिषद का सभापति बनवा दिया था।

जानकारी ये भी है कि केवल अनुसूचित जाति की महिला के लिए आरक्षित वार्डों में ही नहीं, अपितु कुछ सामान्य वार्डों से भी अनुसूचित जाति की महिलाओं पर दाव खेला जा सकता है। यद्यपि आरएसएस ने अपना मन तो बना लिया है, लेकिन फिलवक्त किसी को कानों-कान खबर नहीं है कि वह करने क्या जा रहा है? भाजपा के नेताओं तक को नहीं। 

चूंकि अधिसंख्य सुरक्षित वार्ड अजमेर दक्षिण में हैं, अजमेर उत्तर में केवल दो वार्ड ही सुरक्षित हैं, इसलिए मेयर पद की दावेदार स्वाभाविक रूप से अजमेर दक्षिण से ही होगी। संगठन लाख कहे कि पार्षदों के टिकट चयन समिति करेगी, मगर यह भी तय है कि दक्षिण के अधिकतर टिकट श्रीमती भदेल ही फाइनल करने वाली हैं। उसमें गलत कुछ भी नहीं है। लगातार चार बार विधायक चुने जाने के कारण जितनी पकड़ उनकी है, उतनी भाजपा के किसी और नेता की हो भी नहीं सकती। श्रीमती भदेल चाहेंगी कि उनके क्षेत्र से एकाधिक दावेदार जीत कर आएं, मेयर किसे बनाया जाए, यह बाद में तय हो जाएगा।

महत्वपूर्ण बात ये है कि अजमेर उत्तर में केवल दो वार्ड ही आरक्षित हैं, वो भी अनुसूचित जाति के पुरुष के लिए, लेकिन समझा जाता है कि उनमें से एक पर महिला को भी चुनाव लड़ाया जा सकता है। इतना ही नहीं आरएसएस जो वर्क आउट कर रही है, उसमें यदि अनुसूचित जाति की कोई महिला सामान्य वार्ड में निवास कर रही है तो उसे वहां से ही लड़ाया जा सकता है। अर्थात यह पक्का नहीं है कि अजमेर दक्षिण से जीती हुई पार्षद ही मेयर बनाई जाएगी। ज्ञातव्य है कि नियम के मुताबिक सामान्य वार्ड में भी अनुसूचित जाति का पुरुष या महिला को चुनाव लड़वाने में कोई अड़चन नहीं है। 

मुद्दे की एक बात ये भी है कि राजनीतिक जानकार ये मानते हैं कि भाजपा अजमेर दक्षिण की तुलना में अजमेर उत्तर से अधिक पार्षद जितवा कर लाएगी, हालांकि दक्षिण में 42 व उत्तर में 38 वार्ड हैं। विधानसभा चुनाव के लिहाज से अजमेर दक्षिण भी भाजपा का गढ़ है, इस कारण श्रीमती भदेल चार बार जीत कर आई हैं। उसमें मूल रूप से सिंधी व माली जाति के वोट बैंक उनकी जीत का आधार बनते हैं। लेकिन नगर परिषद चुनाव में ऐसा नहीं है, क्योंकि कई वार्डों में कांग्रेस का वर्चस्व है।

जहां तक प्रमुख दावेदारों का सवाल है, समझा जाता है कि पूर्व जिला प्रमुख श्रीमती वंदना नरवाल केवल उसी सूरत में चुनाव लड़ेंगी, जबकि उन्हें पक्के तौर पर आश्वस्त किया जाएगा कि भाजपा का बहुमत आने पर उन्हें ही मेयर बनाया जाएगा। वे प्रबल दावेदार हैं ही इसलिए एक तो वे गैर कोली जाति से हैं और दूसरा ये कि उन पर पूर्व शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी का वरदहस्त है, लेकिन ताजा हालत में भी वह बना रहेगा, इस बारे में सुनिश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता था। ज्ञातव्य है कि जिला प्रमुख चुनाव में देवनानी ने उन्हें शतरंज की गहरी चाल से पदारूढ़ करवाया था।  बात अगर पूर्व राज्य मंत्री श्रीकिशन सोनगरा की पुत्र वधु की करें तो वे हैं तो प्रबल दावेदार, मगर बड़ा सवाल ये है कि क्या वे राजनीति का जुआ खेलने के लिए सरकारी नौकरी छोडऩे की दुस्साहस करेंगी। 

इन सब समीकरणों के अतिरिक्त हाइब्रिड फार्मूला रिजर्व में पड़ा है। अगर भाजपा के अधिक पार्षद जीत कर आए और कोई ढ़ंग की अनुसूचित जाति महिला जीत कर नहीं आई तो संभव है किसी सशक्त महिला को मेयर बनवा दिया जाए। तब किसी की भी लॉटरी लग सकती है।


-तेजवानी गिरधर

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मंगलवार, 27 अक्टूबर 2020

प्रूफ रीडर एडीटर का बाप होता है!


हाल ही मैंने एक ब्लॉग में सुरेन्द्र सिंह शेखावत की जगह गलती से सुरेन्द्र सिंह रलावता लिख दिया। ऐसा कभी-कभी हो जाता है। इसे स्लिप ऑफ पेन कहा जाता है। जैसे ही ब्लॉग प्रकाशित हुआ, दैनिक न्याय सबके लिए के ऑनर श्री ऋषिराज शर्मा और श्री राजीव शर्मा बगरू ने तत्काल मेरा ध्यान आकर्षित किया। मैने भी यथासंभव जल्द से जल्द त्रुटि संशोधन करने की कोशिश की। श्री ऋषिराज शर्मा ने एक टिप्पणी भी की। वो यह कि प्रूफ रीडर इज चीफ एडीटर। उन्होंने सभ्य तरीके से कमेंट किया, हालांकि अखबार वाले आम बोलचाल की भाषा में कहा करते रहे हैं कि प्रॅूफ रीडर एडीटर का बाप होता है। वाकई ये बात सही है। कारण ये कि एडीटोरियल सैक्शन की फाइनल अथॉरिटी एडीटर के हाथ से निकले मैटर में भी अंतिम करैक्शन प्रूफ रीड करता है। उसके बाद ही अखबार छपने को जाता है। इस लिहाज से वह एडीटर से भी ऊपर कहलाएगा।

इस प्रसंग के साथ ही मुझे यकायक दैनिक न्याय को वो जमाना याद आ गया, जब भूतपूर्व प्रधान संपादक स्वर्गीय श्री विश्वदेव शर्मा सुबह उठते ही पूरा अखबार पढ़ते थे और कॉमा व बिंदी तक की गलती पर गोला कर देते थे। जिस भी प्रूफ रीडर की गलती होती थी, उसके हर गलती के पच्चीस पैसे काट लिया करते थे। न्याय में दूसरे के बाद अगल लगता कि गतलियां अधिक हैं तो तीसरा प्रूफ लेने की भी परंपरा थी। कहने का तात्पर्य है कि न्याय में शुद्ध हिंदी पर बहुत अधिक जोर दिया जाता था। वहां दो प्रूफ रीडर्स के ऊपर उनके सुपुत्र श्री सनत शर्मा हैड प्रूफ रीडर हुआ करते थे। क्या मजाल कि कोई गलती रह जाए। मेरी त्रुटि को पकडऩे वाले श्री ऋषिराज शर्मा का भी हिंदी व अंग्रेजी पर मजबूत कमांड है। उल्लेखित सभी प्रूफ रीडर्स न केवल वर्तनी की अशुद्धि दूर करने में माहिर हैं, अपितु शब्द विन्यास भी बेहतर करने में सक्षम हैं।

बात प्रूफ रीडिंग की चली है तो आपको बताता चलूं कि दैनिक भास्कर में  जब ऑन लाइन वर्किंग शुरू हुई तो सभी रिपोर्टर्स व सब एडीटर्स ने कंप्यूटर पर खुद ही कंपोज करना शुरू किया। तब प्रूफ रीडर्स हटा दिए गए थे। प्रूफ रीडर्स की व्यवस्था इसलिए हुआ करती थी कि रिपोर्टर्स की खबर को एडिट करने के बाद कंपोजिंग में टाइप मिस्टेक की बहुत संभावना रहती थी। जब ऑन लाइन एडिटिंग शुरू हो गई तो यह मान कर चला जाता है कि उसमें एडिटर ने कोई गलती नहीं छोड़ी होगी। सभी रिपोर्टर्स व सब एडिटर की कॉपी एडिट करने के दौरान मुझे अतिरिक्त सावधानी बरतनी होती थी, क्योंकि उसके बाद तो अखबार सीधे प्रिंटिग मशीन पर चला जाता था। इतनी सधी हुई एडिटिंग के अभ्यास के बाद भी मुझ से त्रुटि हो गई और मैंने शेखावत की जगह रलावता लिख दिया तो मैने अपने आप को लानत दी। क्षमा प्रार्थी हूं। कोई कितना भी पारंगत क्यों न हो त्रुटि तो हो ही जाती है, जिसे ह्यूमन एरर कहा करते हैं।

खैर, लगे हाथ बताता चलूं कि अजमेर में प्रूफ रीडि़ंग के सिरमौर हुआ करते थे श्री आर. डी. प्रेम। उन्होंने लंबे समय तक दैनिक नवज्योति में काम किया। उनकी हिंदी, अंग्रेजी व उर्दू पर बहुत अच्छी पकड़ थी। उन्होंने राजस्थानी में कुछ गीत भी लिखे, जिनका राजस्थानी फिल्मों में उपयोग हुआ। दैनिक नवज्योति में श्री सुरेश महावर व श्री गोविंद जी ने भी बेहतरीन प्रूफ रीडिंग की। श्री विष्णु रावत की भी अच्छी पकड़ रही है। श्री वर्मा ने तो अनेक उपन्यास भी लिखे। लंबे समय से पत्रकारिता कर रहे श्री राजेन्द्र गुप्ता, जो कि वर्तमान में राजस्थान पत्रिका के हुबली संस्करण में काम कर रहे हैं, उनकी शुरुआत प्रूफ रीडिंग से ही हुई है। वे भी प्रूफ रीडिंग के मास्टर हैं। युवा प्रूफ रीडर्स की बात करें तो श्री नरेन्द्र माथुर भी प्रूफ रीडिंग के कीड़े हैं। ऐसा हो ही नहीं सकता कि उनके हाथ से निकली हुई कॉपी में कोई त्रुटि रह जाए। वे थोड़े खुरापाती स्वभाव के हैं। दैनिक भास्कर का अजमेर संस्करण शुरू हुआ तो वे पूरे अखबार में त्रुटियों को अंडर लाइन करके उसे मुख्यालय भोपाल भेज दिया करते थे। जांच के लिए वे अखबार अजमेर आते तो प्रूफ रीडर्स को बहुत डांट पड़ा करती थी। कदाचित वे यह जताना चाहते थे भास्कर जैसे बड़े अखबार के प्रूफ रीडर्स से भी बेहतर प्रूफ रीडर्स अजमेर में बसा करते हैं। उन्होंने वैदिक यंत्रालय जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में भी प्रूफ रीडिंग की है, जहां कि पुस्तकों में संस्कृतनिष्ट शब्दों का इस्तेमाल अधिक होता है। कुछ नाम मुझसे छूट रहे हैं, मेहरबानी करके वे अन्यथा न लें।

चूंकि सारा समय अखबार जगत में ही बिताया है, इस कारण केवल इसी फील्ड के प्रूफ रीडर्स के बारे जानकारी है। पुस्तकों के प्रकाशकों के यहां काम करने वालों के बारे में जानकारी नहीं है। इतिश्री।


-तेजवानी गिरधर

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रविवार, 25 अक्टूबर 2020

नगर निगम चुनाव में नई पीढ़ी दस्तक देने को आतुर


नगर निगम के चुनावों में जहां हर बार कुछ नए चेहरे पार्षद बन कर आते हैं, वहीं कुछ ऐसे भी हैं, जो दो या तीन बार पार्षद बन चुके हैं। मगर इस बार ऐसा प्रतीत होता है कि स्थापित राजनेताओं की नई पीढ़ी दस्तक देने को आतुर है।

ज्ञातव्य है कि महापौर का पद अनुसूचित जाति की महिला के लिए आरक्षित होने के बाद दो बार महापौर रह चुके धर्मेन्द्र गहलोत के लिए कम से कम पांच साल निगम की राजनीति के रास्ते बंद हो गए हैं। पांच साल बाद क्या होगा, कुछ पता नहीं। ऐसे में उन पर समर्थकों का दबाव है कि वे अपने पुत्र रनित गहलोत को आगे लाएं। जैसा कि गहलोत कह चुके हैं कि हालांकि उनकी अपने पुत्र को राजनीति में लाने की रुचि नहीं है, लेकिन पार्टी का अगर आदेश हुआ तो वे उसे रोक भी नहीं पाएंगे। इसका अर्थ ये ही है कि उनके पुत्र के चुनाव लडऩे की पूरी संभावना है। अगर वे चुनाव लड़े व जीते तथा भाजपा का बोर्ड बना हो निश्चित रूप से उप महापौर पद के दावेदार भी होंगे।

इसी प्रकार कांग्रेस के दिग्गज नेता महेन्द्र सिंह रलावता का कद निगम की राजनीति से ऊंचा हो गया है, इस कारण उनके पुत्र शक्ति सिंह रलावता का नाम उभर कर आया है। उनके समर्थकों ने आसमान सिर पर उठा रखा है और अभी से सीधे उप महापौर पद की दावेदारी ठोक रहे हैं। 

निगम जब परिषद था, तब सभापति रहे सुरेन्द्र सिंह शेखावत निवर्तमान बोर्ड में पार्षद थे। हालांकि उन्होंने सभापति बनने के लिए पार्टी से बगावत भी की, मगर सफलता हाथ नहीं लगी। अब चूंकि महापौर पद अनुसूचित जाति की महिला के लिए आरक्षित हो गया है तो इतने सीनियर लीडर के लिए अब निगम में केवल पार्षद या उप महापौर पद के लिए रुचि लेने का कोई मतलब ही नहीं है। हालांकि वे अपने पुत्र हर्षवद्र्धन सिंह शेखावत उर्फ टूटू बना को राजनीति में लाने वाले हैं या नहीं, कुछ पता नहीं, मगर अंदरखाने की खबर बताई जाती है कि उनके समर्थकों की इच्छा है कि पुत्र की राजनीतिक यात्रा आरंभ करवाई जाए। सार्वजनिक जीवन में उनकी एंट्री रग्बी फुटबॉल संघ, अजमेर का अध्यक्ष बनने के साथ हो ही चुकी है।

कांग्रेस में महापौर पद की प्रबल दावेदार पूर्व पार्षद श्रीमती तारादेवी यादव मानी जाती हैं, मगर सतह से भीतर चल रही हलचल से इशारा मिल रहा है कि इस बार उनकी पुत्री को भी आगे लाया जा सकता है। इसी प्रकार पूर्व राज्यमंत्री श्रीकिशन सोनगरा की पुत्र वधु का नाम भाजपा खेमे से महापौर पद की दावेदारी के लिए आगे आ ही चुका है। निवर्तमान जिला प्रमुख श्रीमती वंदना नोगिया भाजपा की ओर से प्रबल दावेदार के रूप में आगे आ रही हैं। हालांकि वे जिला प्रमुख पद पर रह चुकी हैं, मगर उन्हें भी नई पीढ़ी का इसलिए माना जा सकता है कि उनकी उम्र कोई ज्यादा नहीं है। चर्चा ये भी है कि पूर्व महिला व बाल विकास राज्य मंत्री श्रीमती अनिता भदेल की बहिन का नाम भी दावेदारों में शामिल किया जा रहा है। चूंकि वे अभी विधायक हैं, इस कारण उनका नाम तो दावेदारों में नहीं है, लेकिन यदि भाजपा को बहुमत मिलता है और अनुसूचित जाति की कोई पढ़ी-लिखी महिला जीत कर नहीं आती है तो हो सकता है कि उन्हें हाईब्रिड फार्मूले के तहत महापौर बनाने की कोशिश की जाए।

बात संभ्रांत लोगों के अजमेर क्लब के पूर्व विधायक डॉ. राजकुमार जयपाल की की जाए तो उनको खुद को भले ही लंबे समय से जनप्रतिनिधित्व वाली सक्रिय राजनीति में मौका नहीं मिला, मगर उनकी पत्नी के लिए जरूर रास्ता खुल गया है। इसी प्रकार पूर्व महापौर कमल बाकोलिया के लिए यही विकल्प है कि पत्नी को चुनाव मैदान में उतारें। एक नया नाम डॉ. नेहा भाटी का है। वे प्रतिष्ठित परिवार रामसिंह शंकर सिंह भाटी के परिवार से हैं। 

दो या तीन बार पार्षद बन चुके कुछ नेताओं की मजबूरी  है कि उनके प्रभाव वाले वार्ड यदि महिलाओं के लिए आरक्षित हो चुके हैं तो उन्हें पत्नियों को मैदान में उतारना होगा। यानि वे भी नए चेहरे होंगे। 

इस बार शहर को एक साथ ढ़ेर सारे नए नेता भी मिलने जा रहे हैं। पहले 60 वार्ड थे, जो बढ़ कर 80 हो गए हैं। यदि मोटे तौर पर माना जाए कि हर वार्ड में जीते, हारे व तीसरे नंबर पर रहने वाले नए नेता पैदा होने जा रहे हैं तो साठ से भी अधिक नए चेहरे उभर कर आएंगे।

कुल मिला कर आसन्न चुनाव की तस्वीर कुछ अलग ही होगी और नई पीढ़ी निगम की दहलीज पर कदम रख सकती है।

-तेजवानी गिरधर

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शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2020

...अर्थात धर्मेन्द्र गहलोत के पुत्र चुनाव लड़ेंगे ही


हमने अजमेरनामा न्यूज पोर्टल के चौपाल कॉलम में चर्चा की थी कि अजमेर नगर निगम के निवर्तमान महापौर धर्मेन्द्र गहलोत के पुत्र रनित गहलोत के आगामी निगम चुनाव में पार्षद पद का चुनाव लडऩे की संभावना है। इस बारे में कुछ का कहना था कि गहलोत स्वयं तो चुनाव लडऩे की बात से इंकार कर रहे हैं। संयोग से शुक्रवार को स्वामी न्यूज चैनल के निगम चुनाव संबंधी फेसबुक लाइव में गहलोत से साक्षात्कार हो गया। मैंने जब इस जनचर्चा पर सवाल किया तो उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि अभी तक इस तरह का कोई निर्णय नहीं किया है। कम से कम वे तो नहीं चाह रहे कि उनका पुत्र राजनीति में आए। अपनी ओर से उन्होंने ऐसी कोई मंशा भी जाहिर नहीं की है। लेकिन साथ ही जोड़ा कि यदि पार्टी ने चुनाव लड़वाने का निर्णय लिया तो वे इंकार भी नहीं करेंगे। इसका और खुलासा करते हुए उन्होंने यह भी जोड़ा कोई भी फैसला परिस्थिति पर निर्भर करता है। राजनीति में किसी भी संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। इसका उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि जैसे मुख्यमंत्री अशोक गहलोत कहते रहे कि वे अपने पुत्र को राजनीति में नहीं लाएंगे, मगर हालात ऐसे बने कि उन्हें जोधपुर लोकसभा चुनाव लड़वाना पड़ा और उसमें सफलता न मिलने पर किक्रेट बोर्ड का जिम्मा सौंपा गया। कुल जमा उनका कहना था कि वे नियति के फैसलों पर दखलंदाजी नहीं कर सकते।

उनके इस बयान से राजनीति के जानकार यह अंदाजा लगा रहे हैं कि गहलोत के पुत्र अवश्य चुनाव लड़ेंगे। दो बार महापौर रह चुके गहलोत के पुत्र के लिए एकाधिक सुरक्षित वार्ड मिल ही जाएंगे। ऐसे में पार्टी भला जिताऊ प्रत्याशी को चुनाव क्यों नहीं लड़वाना चाहेगी।

इसी से जुड़ी बात ये भी है कि अगर रनित गहलोत चुनाव लड़ कर जीतते हैं तो उप महापौर पद के लिए भी वे सशक्त दावेदार होंगे। 

उल्लेखनीय है कि रनित गहलोत के वार्ड दो से चुनाव लडऩे की संभावना है। इस बारे में उनकी ही पार्टी के एक व्यक्ति ने निजी राय के बारे में मुझे बताया कि वे वार्ड दो से चुनाव क्यों लड़ेंगे, यह वार्ड कमाई वाला वार्ड तो है नहीं। वे जरूर ऐसे वार्ड लड़ेंगे, जहां कमर्शियल गतिविधियां होती हैं और अच्छी कमाई होती है। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए गहलोत ने कहा कि ऐसी सोच गलत है। आम आदमी की ऐसी धारणा बन गई है कि उसे हर जगह भ्रष्टाचार ही नजर आता है, लेकिन कमाई वाले अथवा बिना कमाई वाले वार्ड को कोई मापदंड नहीं होता है।

समझा जा सकता है कि दो बार महापौर रह चुकने के बाद फिलहाल पांच साल तक तो उन्हें निगम की सक्रिय राजनीति से दूर रहना ही है। इसके अतिरिक्त बाद के विधानसभा या लोकसभा चुनाव में क्या होगा, कुछ नहीं कहा जा सकता। ऐसे में बेहतर ये है कि वे अपनी राजनीतिक विरासत सुनिश्चित करने के लिए पुत्र को राजनीति में लाएं।

खैर, रनित के वार्ड नंबर दो से चुनाव मैदान में आने की संभावना की वजह से भाजपा के अन्य दावेदार तनिक हतोत्साहित हैं। वार्ड दो की स्थिति ये है कि इसमें अनुसूचित जाति के काफी वोट हैं। पिछली बार भी यह वार्ड सामान्य था, फिर भी अनुसूचित जाति के वोट बैंक को देखते हुए कांग्रेस ने पूर्व पार्षद कमल बैरवा के भाई मनोज बैरवा को चुनाव लड़वाया और वे जीते भी। इस बार फिर वही स्थिति बनी है। स्वाभाविक रूप से इस बार भी कमल बैरवा के परिवार का दावा रहेगा। लोगों का मानना है कि यदि बैरवा के परिवार से किसी को टिकट नहीं मिला तो वे निर्दलीय भी लड़ सकते हैं। ऐसा होने पर कांग्रेस के प्रत्याशी के लिए चुनाव जीतना मुश्किल हो जाएगा।  एक तर्क ये भी है कि अगर बैरवा परिवार को कोई व्यक्ति निर्दलीय मैदान में उतरता है तो उसका नुकसान तो होगा, लेकिन एक फायदा ये भी हो सकता कि निर्दलीय मैदान में न उतरने पर बैरवा समाज के जो वोट अपने प्रयासों से भाजपा हासिल कर सकती है, उस पर अंकुश लग जाएगा, और सारे वोट  एक मुश्त बैरवा प्रत्याशी को मिलेंगे, जिसका अप्रत्यक्ष लाभ कांग्रेस प्रत्याशी को मिलेगा। 

जानकारी के अनुसार कांग्रेस में एकाधिक दावेदार हैं, मगर शैलेश गुप्ता व हेमंत जोधा के नाम अभी तक उभर कर आए हैं। शैलेश गुप्ता पुराने सुपरिचित कांग्रेसी नेता हैं, वहीं जोधा पर दिग्गज कांग्रेस नेता महेन्द्र सिंह रलावता का वरदहस्त माना जाता है। वे पिछले विधानसभा चुनाव में अजमेर उत्तर से हार गए थे। चूंकि हारे हुए प्रत्याशियों की राय को भी तवज्जो देने की पूरी संभावना है, इस कारण कुछ लोग मानते हैं कि अगर रलावता ने चाहा तो जोधा को टिकट मिल सकता है।

-तेजवानी गिरधर

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tejwanig@gmail.com