मंगलवार, 18 मई 2021

सबा खान : एक जिंदा औरत का इंतकाल


सुर्खी पढ़ कर आपका चौंकना लाजिमी है। इंतकाल तो किसी जिंदा इंसान का होता है, भला मरा हुआ कैसे इस फानी दुनिया को छोड़ सकता है? वह तो पहले ही अलविदा कर चुका होता है। आपके दिमाग में उठा यह सवाल बिलकुल वाजिब है। मगर मेरी कलम की कोख से यह सुर्खी इसलिए पैदा हुई, क्योंकि मेरी नजर में यह शहर गिनती के जिंदा लोगों की बस्ती है।   इसका कत्तई मायने ये नहीं कि बाकी के सारे लोग मरे हुए हैं। वे भी जिंदा हैं, मगर उतने नहीं, जितने सबा खान जैसे गिनती के लोग होते हैं। मायने ये कि शहर के सारे वाशिंद जिंदा तो हैं, मगर जिस्मानी तौर पर। दिमागी या रूहानी तौर पर नहीं। या तो वे दिमाग सिरहाने रख कर सो रहे हैं या फिर उनकी रूह मर चुकी है। कुछ दोस्तों को ऐसा कहना नागवार गुजर सकता है, मगर जरा मेरे अंदाज-ए-बयां पर गौर फरमाइये। यदि आपने ये जुमला सुना हो कि अजमेर टायर्ड और रिटायर्ड लोगों का शहर है, तो बड़ी आसानी से आपको मेरी बात गले उतर जाएगी। अजमेर के बारे में यह जुमला मेरी मखलूक नहीं। जब मेरी समझदानी अभी ठीक से काम करना भी शुरू नहीं हुई थी, तब से समझदार लोगों से सुनता आया हूं। नहीं पता कि ये जुमला किसके मुंह से निकला, मगर जमीनी हकीकत यही है। किसी शायर ने यूं ही नहीं कहा कि अजीब लोगों का बसेरा है इस शहर में, सब कुछ सहन करते हैं, मगर चूं तक नहीं करते। ये चंद अल्फाज अजमेर और अजमेर वासियों की फितरत को बयां करते हैं।

बहरहाल सबा खान का जिक्र करते हुए उनके नाम के साथ मरहूम इसलिए नहीं जोडूंगा, चूंकि उनके भीतर जो जज्बा था, वो शहर में गिनती के जिंदा लोगों के जेहन में धड़क रहा है। वह कभी नहीं मरा करता। सबा ने जो पहचान बनाई, वह उनके अलविदा होने के बाद भी जिंदा है। और नाम के साथ श्रीमती इसलिए नहीं जोडूंगा कि मेरी नजर में वे मर्द औरत थीं। बिंदास। उनके कांधे पर चस्पा उन तमगों का जिक्र करना बेमानी सा है, जिसके बारे में हर किसी को पता है कि वे राजस्थान प्रदेश महिला कांग्रेस की प्रदेश महासचिव थीं, अजमेर शहर जिला महिला कांग्रेस की अध्यक्ष रहीं, सामाजिक सरोकार के क्षेत्र में अग्रणी संस्था प्रिंस सोसाइटी के संस्थापक अध्यक्ष और जवाहर फाउंडेशन की मजबूत स्तंभ थीं। हां, इतना जरूर कहना पड़ेगा कि वे एक जिंदादिल इंसान, हरदिल अजीज और खुश मिजाज थीं। हर किसी से बड़े खुलूस के साथ मिला करती थीं, मानों बरसों जी जान-पहचान हो।

जैसे ही उनके इंतकाल की खबर आई तो वाट्सऐप और फेसबुक के जरिए पूरे शहर में आग की तरह फैल गई। सुनने वाले हर शख्स की सांसें चंद लहमात के लिए ठहर सी गई। हजारों की आंखों में पानी तैरने लगा। किसी को यकीन ही नहीं हुआ। मगर यह कड़वी हकीकत थी। असल में वे भरपूर सेहतमंद थीं। गर कोरोना के शिकंजे में नहीं आतीं तो खूब जीतीं। क्या यह सरासर नाइंसाफी नहीं है कि कोरोना ने कम उम्र में ही जबरन उनकी सांसें रोक दीं? बिना यह सोचे कि ऐसे इंसानों की अजमेर को कितनी दरकार है?

अब जरा, उनकी शख्सियत के बारे में। उनमें गजब की फुर्ती थी, चुस्ती थी। यानि बिजली जैसी चपलता। तभी तो उनकी साथिनें पूछा करती थीं कि कौन सी चक्की का आटा खाती हो। कांग्रेस में तकरीबन दस साल शहर महिला अध्यक्ष रहीं। इस दौरान शायद ही कोई ऐसा दिन रहा हो कि वे कहीं नजर न आई हों। राजनीति से इतर भी वे आम अवाम के हर काम के लिए जुटी दिखाई देती थीं। उनके पास शहर का जो भी मसला आता था, जो भी फरियादी आता था, वे तत्काल आला अफसरान के चेंबर में बेधड़क घुस कर पैरवी करती थीं। सियासत उनकी रोजमर्रा की जिंदगी बन गई थी। कांग्रेस और भाजपा, दोनों में इस किस्म के नेता कम ही हैं। बावजूद इसके नगर निगम के लगातार दो चुनावों में कांग्रेस ने उन्हें टिकट नहीं दिया। असल में टिकट बांटने का गणित ही कुछ और है। हां, चंद महीनों के लिए जरूर मनोनीत पार्षद बनाया गया, मगर इतने समय में वे कर भी क्या सकती थीं? असल में उनका सपना था कि चाहे अजमेर से चाहे पुष्कर से, विधायक बनें और जनता की सेवा करें।

अफसोस, एक मर्द औरत कोरोना से जंग हार गईं। और इसी के साथ अपार संभावनाओं का अंत हो गया। शहर वासियों केलिए भी, परिवार वालों के लिए भी।

इन्ना लिल्लाही व इन्ना इलेही राजऊन

अल्लाह उन्हें जन्नतुल फिरदोस में आला मुकाम अता फरमाए। गमजदा परिवार वालों को सब्र जमील अता फरमाए।

-तेजवानी गिरधर

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मंगलवार, 11 मई 2021

अजमेर ने पांच बार सांसद रहे जनप्रिय नेता प्रो. रासासिंह रावत को खो दिया


भाजपा के वरिष्ठ नेता और अजमेर से पांच बार भाजपा के सांसद रहे प्रो. रासासिंह रावत का निधन हो गया। प्रो. रावत सहज सुलभता और अपनी विशेष भाषण शैली और धाराप्रवाह उद्बोधन के कारण लोकप्रिय थे। उनका जन्म सन् 1 अक्टूबर 1941 को श्री भूरसिंह रावत के घर हुआ। उन्होंने बी.ए. व एल.एल.बी. और हिंदी व संस्कृत में एम.ए. की शिक्षा अर्जित की और अध्यापन कार्य से अपनी आजीविका शुरू की। उन्हें 25 साल तक अध्यापन का अनुभव था। उल्लेखनीय सेवाओं के कारण उन्हें शिक्षक दिवस, 5 सितम्बर 1989 को राज्य सरकार की ओर से सम्मानित किया गया। अध्यापन कार्य के दौरान स्काउटिंग में विषेश सेवाएं देने के कारण उन्हें राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित किया जा गया। सामाजिक संगठन आर्य समाज अजमेर से उनका गहरा नाता रहा और पूर्व में इसके अध्यक्ष रहे व बाद में संरक्षक रहे। समाजसेवा से उनका कितना गहरा रिश्ता है, इसका अनुमान उनके दयानंद बाल सदन के प्रधान, भारतीय रेड क्रॉस सोसायटी के प्रधान व राजस्थान रावत राजपूत महासभा के पूर्व प्रधान व हाल तक संरक्षक का दायित्व निभाने से हो जाता है। वे सामाजिक, धार्मिक व सांस्कृतिक कार्यों में विशेष रुचि रखते थे। भाजपा की नई चुनावी रणनीति के चलते उन्हेंं राजसमंद से लड़ाया गया, लेकिन इसमें कामयाबी नहीं मिली। बाद में उन्हें अजमेर शहर भाजपा का अध्यक्ष बनाया गया। 

भाजपा में जाने से पहले रासासिंह रावत ने दो बार कांग्रेस के टिकट पर भीम विधानसभा सीट से चुनाव भी लड़ा था, लेकिन वे हार गए। बाद में भाजपा में शामिल हो गए। वे विरजानंद स्कूल के प्रधानाचार्य रहे। बाद में उन्हें डीएवी स्कूल का प्राचार्य बना दिया गया, फिर वे आर्य समाज क प्रधान भी बने। आर्य स्कूलों में शिक्षा का स्तर सुधारने में उनका महत्त्वपूर्ण योगदान भी रहा है।

सांसद के रूप में उन्होंने सभी पांचों कार्यकालों में उन्होंने लोकसभा में अपनी शत-प्रतिशत उपस्थिति दर्ज करवाई। अजमेर से जुड़ा शायद ही कोई ऐसा मुद्दा रहा होगा, जो उन्होंने लोकसभा में नहीं उठाया। यह अलग बात है कि दिल्ली में बहुत ज्यादा प्रभावी नेता के रूप में भूमिका न निभा पाने के कारण वे अजमेर के लिए कुछ खास नहीं कर पाए। एक बार उनके मंत्री बनने की स्थितियां निर्मित भी हुईं, लेकिन चूंकि तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी के सोलह सहयोगी दलों के साथ मिल कर सरकार बनाने के कारण वे दल आनुपातिक रूप में मंत्री हासिल करने में कामयाब हो गए और प्रो. रावत को एक सांसद के रूप में ही संतोष करना पड़ा। उनकी सबसे बड़ी विशेषता ये थी कि वह सहज उपलब्ध हुआ करते थे। बेहद सरल स्वाभाव और विनम्रता उनके चारित्रिक आभूषण थे। 

रासा सिंह रावत के निधन पर भाजपा शहर जिला अध्यक्ष डॉ. प्रियशील हाड़ा, राज्यसभा सांसद भूपेंद्र यादव, अजमेर लोकसभा सांसद भागीरथ चौधरी, विधायक वासुदेव देवनानी, विधायक अनिता भदेल, राजस्थान धरोहर संरक्षण एवं प्रोन्नति प्राधिकरण के पूर्व अध्यक्ष ओंकारसिंह लखावत, महापौर ब्रजलता हाड़ा, धर्मेश जैन, अरविंद यादव, शिव शंकर हेड़ा, धर्मेंद्र गहलोत, सुरेंद्र सिंह शेखावत, नीरज जैन, रमेश सोनी, जयकिशन पारवानी, संपत सांखला, संजय खंडेलवाल, आनंद सिंह राजावत, दीपकसिंह राठौड़, सीमा गोस्वामी, रमेश मेघवाल, हेमंत सुनारीवाल, देवेन्द्र सिंह शेखावत आदि ने दुख व्यक्त किया है।

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रविवार, 7 फ़रवरी 2021

क्या ब्रिजलता हाडा अपने जेठ स्वर्गीय राजेन्द्र हाडा का स्मार्ट सिटी का सपना साकार करेंगी?


अब जब कि अजमेर नगर निगम के मेयर पद पर भाजपा की ब्रिजलता हाडा काबिज हो गई हैं, तो यकायक उनके जेठ स्वर्गीय वकील श्री राजेन्द्र हाडा बाबत लिखे एक आलेख का स्मरण हो आया। अजमेर को स्मार्ट सिटी बनाने को लेकर उन्होंने एक सपना देखा था। मगर धरातल पर स्मार्ट सिटी का कामकाज  बहुत धीमी गति से चल रहा है। इस पर मैने ’स्मार्ट सिटी की कछुआ चाल पर कितनी विह्वल होगी स्वर्गीय श्री राजेन्द्र हाड़ा की आत्मा’ हैडिंग से लिखा था। अब जब कि उनकी ही भाभी ब्रिजलता हाडा धर्मपत्नी डॉ प्रियषील हाडा मेयर बन गई हैं तो यह उम्मीद की जानी चाहिए कि वे स्मार्ट सिटी की दिषा में बहुत  गंभीरता से काम करेंगी। यह न केवल अजमेर के हित में होगा, अपितु स्वर्गीय राजेन्द्र हाडा को असली श्रद्धांजलि होगी। 

प्रसंगवष वह आलेख हूबहू पेष हैः-


स्मार्ट सिटी की कछुआ चाल पर कितनी विह्वल होगी स्वर्गीय श्री राजेन्द्र हाड़ा की आत्मा


गुरुवार, 19 दिसंबर 2019। आज से ठीक चार साल पहले अजमेर के एक ऐसे लाल को काल के क्रूर हाथों ने हमसे छीन लिया, जिसने स्मार्ट सिटी बनने वाले अजमेर को एक सपना दिया था। वह सपना कितना कीमती था, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनको उस सपने के लिए बाकायदा पुरस्कृत किया गया। 

आपको याद होगा कि मौजूदा प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने अपने पिछले कार्यकाल में अमेरिका यात्रा के दौरान वहां के राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ मिल कर अजमेर सहित दो शहरों को स्मार्ट सिटी बनाने की घोषणा की थी। इसी सिलसिले में 2 अक्टूबर 2015 को अजमेर नगर निगम ने ऑन लाइन सुझाव मांगे थे। तब शहर के जाने-माने वकील व पत्रकार स्वर्गीय श्री राजेन्द्र हाड़ा ने दस पेज का एक सुझाव सौंपा था कि कैसे इस पुरानी बसावट वाले शहर को स्मार्ट किया जा सकता है। उनके सुझाव को सर्वश्रेष्ठ मानते हुए निगम ने 29 नवंबर 2015 को उन्हें एक समारोह में प्रमाण पत्र के साथ पंद्रह हजार रुपए का नकद पुरस्कार दिया, जिसमें तत्कालीन शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी, मेयर धर्मेन्द्र गहलोत व आयुक्त एच. गुईटे मौजूद थे। समझा जा सकता है कि उन्होंने कितने महत्वपूर्ण सुझाव दिए होंगे। आज जब हम स्मार्ट सिटी की कछुआ चाल को देखते हैं तो स्वर्गीय श्री हाड़ा की पांचवीं पुण्यतिथी पर बरबस उनकी याद आ जाती है। अगर वे हयात होते तो अपनी आंखों से देखते कि उन्होंने जो सपना नगर निगम को सौंपा था, उसका हश्र क्या हो रहा है? बेशक उनकी आत्मा विह्वल होगी कि उन्होंने जो सुझाव दिए, जिन्हें कि सराहा भी गया, उस पर अमल में कितनी कोताही बरती जा रही है।

प्रसंगवश बता दें कि स्वर्गीय श्री राजेन्द्र हाड़ा पेशे से मूलत: वकील थे, मगर पत्रकारिता में भी उनको महारत हासिल थी। लंबे समय तक दैनिक नवज्योति में कोर्ट की रिपोर्टिंग की। बाद में दैनिक भास्कर से जुड़े, जहां उनके भीतर का पत्रकार व लेखक पूरी तरह से पुष्पित-पल्लवित हुआ। उन्होंने पत्रकारिता में आए नए युवक-युवतियों को तराश कर परफैक्ट पत्रकार बनाया। वे एक संपूर्ण संपादक थे, जिनमें भाषा का पूर्ण ज्ञान था, समाचार व पत्रकारिता के सभी अंगों की गहरी समझ थी। अजयमेरू प्रेस क्लब का संविधान बनाने में उनकी अहम भूमिका थी। उनकी अंत्येष्टि के समय पार्थिव शरीर से उठती लपटों ने मेरे जेहन में यह सवाल गहरे घोंप दिया कि क्या कोई कड़ी मेहनत व लगन से किसी क्षेत्र में इसलिए पारंगत होता है कि वह एक दिन इसी प्रकार आग की लपटों के साथ अनंत में विलीन हो जाएगा? खुदा से यही शिकवा कि यह कैसा निजाम है, आदमी द्वारा हासिल इल्म और अहसास उसी के साथ चले जाते हैं। वे अब हमारे बीच नहीं हैं, मगर मुझ सहित अनेक लोगों के जेहन में जिंदा हैं। चलो, वे बहुत सारा अर्जित ज्ञान अपने साथ ले गए, लेकिन संतोष है कि नगर निगम को अपना सपना जरूर सौंप गए। मगर साथ ही अफसोस भी है कि उस सपने को पूरा होने पर नौ दिन चले, अढ़ाई कोस वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। 

स्वर्गीय श्री हाड़ा की पुण्यतिथी पर उनकी धर्मपत्नी श्रीमती चांदनी हाड़ा के अहसासात को जानने की कोशिश की तो उन्होंने कुछ इस तरह अपना अनुभव बांटा:- उन्होंने पुरस्कार स्वरूप मिली राशि से अपने पिता, बहिन, पत्नी, पुत्र व छोटे भाई के दोनों बच्चों को रणथंभोर की यात्रा करवाई। उन्होंने करीब आठ सौ सीढिय़ां चढ़ कर गणेश जी की प्रतिमा से क्या कुछ मांगा था, समझ में नहीं आया। मगर उसका परिणाम ये हुआ कि पिताश्री का गणेश जी पर से विश्वास उठ गया। आज वे कहते हैं कि मैं गणेश जी को नहीं मानता। स्वाभाविक है कि जिस पिता ने वृद्धावस्था में अपने जवान बेटे खोया होगा, उसकी आस्था तो टूटेगी ही। मेरे व परिवार के सपने तो विधाता ने छीन लिए मगर मेरे पति को असली श्रद्धांजलि यही होगी कि उनके सपने को हम अजमेर वासी साकार होता हुआ देखें।

-तेजवानी गिरधर

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सोमवार, 21 दिसंबर 2020

नगर निकाय चुनाव में भी रहेगा पलाड़ा का दखल?

 


युवा नेता व समाजसेवी भंवर सिंह पलाड़ा ने कांग्रेस के सहयोग से जिस प्रकार भाजपा को पटखनी खिला कर अपनी धर्मपत्नी श्रीमती सुशील कंवर पलाड़ा को जिला प्रमुख बनवा लिया, उसे देखते हुए राजनीतिक हलकों में यह सवाल कुलबुला रहा है कि क्या वे अपने बढ़ते वर्चस्व का दायरा बढ़ाते हुए अजमेर, किशनगढ़ व केकड़ी के नगर निकाय चुनाव में भी दखल देंगे? हालांकि उन्होंने फिलवक्त कांग्रेस में शामिल होने के कयास पर विराम लगा दिया है, मगर भाजपा से दूरी और कांग्रेस से नजदीकी के चलते विशेष रूप से कांग्रेस खेमे में यह सुगबुगाहट है कि वे अपनी पसंद के दावेदारों को टिकट दिलवाने की कोशिश कर सकते हैं। जहां तक कांग्रेस हाईकमान का सवाल है, वह भी यह जरूर चाहेगा कि उनसे नजदीकी और बढ़ाई जाए और निकाय चुनाव में उनकी ताकत का इस्तेमाल किया जाए। 

हालांकि उनकी धर्मपत्नी श्रीमती पलाड़ा ने पिछले जिला प्रमुख कार्यकाल व मसूदा विधायक रहते हुए ग्रामीण राजनीति में अपना डंका बजाया है, लेकिन अजमेर शहर में भी उनकी अच्छी फेन फॉलोइंग है। उनकी शहरी टीम निकाय चुनाव में काफी उलटफेर करने का माद्दा रखती है। ऐसे में यह समझा जा रहा है कि वे इस मौके को नहीं चूकना चाहेंगे। जाहिर सी बात है कि स्थानीय राजनीति में दखल बढऩे का फायदा उन्हें आगामी विधानसभा व लोकसभा चुनाव में भी मिलेगा। हालांकि अभी यह दूर की कोड़ी है कि आगामी विधानसभा चुनाव में वे क्या रणनीति अपनाएंगे, मगर कांग्रेसियों को ऐसा लगता है कि वे अजमेर उत्तर के प्रबल दावेदार बन कर उभरेंगे। अगर ऐसा होता है तो यह वरिष्ठ कांग्रेस नेता डॉ. श्रीगोपाल बाहेती व महेन्द्र सिंह रलावता के लिए मुश्किलात पैदा करेगा। विशेष रूप से  कांग्रेस से नजदीकी रखने वाले दमदार राजपूत नेता के रूप में पलाड़ा की मौजूदगी रलावता के लिए प्रतिद्वंद्विता खड़ी कर देगी। 

ऐसा नहीं कि वे अकेले कांग्रेस की राजनीति में दखल दे सकते हैं, अपितु अपने समर्थकों के दम पर भाजपा में भी सेंध मार सकते हैं। खैर, जो कुछ होगा, वह बहुत दिलचस्प होगा। उल्लेखनीय बात ये है कि अपने दम पर जिस प्रकार अजमेर की राजनीति पर हावी हुए हैं, उसने राजनीतिक पंडितों को भी चकित कर दिया है।

-तेजवानी गिरधर

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गुरुवार, 19 नवंबर 2020

अफसरशाही के आगे जनप्रतिनिधि इतने मजबूर क्यों?


पिछले दिनों स्वामी न्यूज फेसबुक लाइव में कांग्रेस व भाजपा के विभिन्न प्रमुख नेताओं से हुई बातचीत से एक बात खुल कर सामने आई है कि जनहित के लिए किए जा रहे विकास कार्यों में जनप्रतिनिधियों की ही नहीं चलती, सारे निर्णय प्रशासन ही करता है। विशेष रूप से ताजा तरीन स्मार्ट सिटी योजना में। जनप्रतिनिधियों की राय भले ही ली जाती हो, मगर होता वही है जो प्रशासन चाहता है। अर्थात जिला प्रशासन के आगे जनप्रतिनिधि मजबूर हैं। यह बात जनप्रतिनिधियों ने स्वयं स्वीकार की है कि प्रशासन मनमानी करता है। यह वाकई दुर्भाग्यपूर्ण है। लोकतंत्र में लोक का प्रतिनिधित्व करने वाले ही कमजोर हैं तो इसका अर्थ ये है कि सिस्टम में कोई गड़बड़ी है। 

सवाल उठता है कि आखिर जनप्रतिनिधि मजबूर क्यों हैं? इसकी एक वजह ये है कि जैसे ही सरकार बदलती है तो उसी के साथ नेताओं के प्रति प्रशासन का नजरिया बदल जाता है। लेकिन ऐसे भी उदाहरण हैं कि सत्तारूढ़ पार्टी के नेताओं को भी कई बार प्रशासन ने नहीं गांठा है। कुछ नेता मानते हैं कि ऐसा इस कारण भी है कि जनहित के कार्यों में दोनों राजनीतिक दलों के नेताओं में एकजुटता नहीं होती। एकराय न होने के कारण ही शासन-प्रशासन पर राजनीतिक दबाव कम हो जाता है और वह मनमानी करता है।  यातायात की बेहद कष्टदायक समस्या के समाधान के लिए एलिवेटेड रोड बनाने की योजना इसी कारण लंबी खिंच गई कि सरकारें बदलने के साथ स्थानीय नेताओं की स्थिति भी बदल गई। कांग्रेस व भाजपा नेताओं की एकजुटता की बात तो फिर भी सपना है, मगर इसको लेकर भाजपा नेताओं तक में एकराय नहीं बनी। एक प्रमुख नेता सरकार पर मंजूरी का दबाव बनाए हुए थे तो दूसरे इसका विरोध करते रहे। वे आज भी सहमत नहीं हैं।

विकास योजनाओं की बात करें तो सीवरेज योजना का हश्र हम देख चुके हैं। कांग्रेस व भाजपा की सरकारें दो बार एक के बाद दूसरे की बनी, मगर आज तक वह ठीक से लागू नहीं पाई है। सात सौ छियांसीवें उर्स के मौके पर बनी छोटी सीवरेज योजना बेकार ही हो गई। स्मार्ट सिटी योजना का हाल भी किसी से छुपा हुआ नहीं है। प्रशासन अपने हिसाब से काम करवा रहा है और जनप्रतिनिधि अपने आप को ठगा सा महसूस कर रहे हैं। दोनों दलों के नेता एक स्वर से कह रहे हैं कि उनकी राय तो ली जाती है, मगर उस अमल नहीं किया जाता। कैसी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि आजीवन अजमेर में रहने वाले नेताओं को स्थानीय समस्याओं व जरूरतों की गहरी समझ है, उनकी राय ताक पर रख दी जाती है, जबकि मात्र दो-तीन साल के लिए यहां पदस्थापित होने वाले अधिकारी ही अंतिम फैसला करते हैं, जिनका अजमेर से कोई लगाव नहीं होता। 

प्रशासनिक कामकाज की समझ रखने वाले बुद्धिजीवी मानते हैं कि एक्जीक्यूशन का काम बेशक तकनीकी रूप से समृद्ध विभागीय अधिकारी ही करते हैं, मगर उन पर निगरानी के लिए जरूरी समझ जनप्रतिनिधियों को नहीं होती। वे तकनीकी अध्ययन करने की बजाय, राजनीतिक उलझनों व दाव-पेच में ही व्यस्त रहते हैं। इसी कारण अधिकारी उन पर हावी रहते हैं और मनमानी करते हैं। अगर जननेता विकास योजनाओं की बारीकियों का ठीक से अध्ययन करें तो क्या मजाल कि प्रशासन मनमानी कर जाए। 

कमजोर राजनीतिक नेतृत्व का ही परिणाम है कि वर्षों से पानी की किल्लत झेल रहे अजमेर को बार-बार छला ही इसलिए गया कि दोनों दलों ने एकजुट हो कर दबाव नहीं बनाया। जब भाजपा की सरकार थी तो कांगे्रसी बोले, मगर भाजपाई पार्टी की मर्यादा में बंधे रहे और जब कांग्रेस सरकार रही तो भाजपाई तो चिल्लाए, मगर कांग्रेसियों ने चुप्पी साध ली। आज स्थिति ये है कि मूलरूप से अजमेर की प्यास बुझाने के लिए बनाई गई बीसलपुर परियोजना का लाभ जयपुर को दिया जाने लगा, जबकि अजमेर में अब भी नियमित व पर्याप्त जल सप्लाई नहीं हो पा रही। इसकी एक वजह ये भी है कि अपनी-अपनी सरकारों में यहां के मंत्री व विधायकों की स्थिति बौनी ही रही। वे सरकार का विरोध कर ही नहीं पाए। ज्ञातव्य है कि भूतपूर्व मंत्री स्वर्गीय प्रो. सांवरलाल जाट जैसे दबंग कहलाने वाले नेता के पास जलदाय महकमा होने के बावजूद, उनके कार्यकाल में ही सरकार ने बीसलपुर का पानी जयपुर को देने का फैसला कर दिया, मगर वे कुछ नहीं कर पाए। लब्बोलुआब परिणाम तो जनता ही भुगत रही है।

विद्युत वितरण का काम प्राइवेट कंपनी को सौंपे जाने का निर्णय भाजपा शासन काल में हुआ, तब कांग्रेसी तो खूब उबले, मगर भाजपाई मौन बने रहे। आज जब कांग्रेस सरकार है तो भाजपाई अनापशनाप बिल आने का विरोध कर रहे हैं, मगर कांग्रेसी आंदोलन करने की स्थिति में नहीं रहे। बहाना ये बनाया जा रहा है कि चूंकि बिजली कंपनी के साथ एमओयू पर साइन हो चुके हैं, इसलिए अब कुछ नहीं हो सकता। यह कारण वाजिब भी हो सकता है, मगर इसका मतलब ये तो नहीं कि बिजली कंपनी दो-तीन गुना बिलों के बारे में पारदर्शिता रखने में कोताही बरते। आज हालत ये है कि इस मसले पर आम जनता की सुनवाई करने वाला कोई नहीं है।


-तेजवानी गिरधर

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