रविवार, 19 सितंबर 2021

जीवन के 88 वसंत पूर्ण किए वरिष्ठ पत्रकार आर.डी. कुवेरा ने


राज्य के वरिष्ठ पत्रकार श्री आर. डी. कुवेरा का जीवन संघर्ष के बाद सफलता की सजीव कहानी है। आज 88 साल की उम्र में भी वे पूर्ण स्वस्थ हैं और लेखन कार्य सतत जारी रखे हुए हैं। उनका जन्म 19 सितम्बर 1933 को किशनगढ़ में स्वगीय श्री रतनलाल कुवेरा के घर हुआ। सन् 1953 में मैट्रिक पास करने के तुरंत बाद उन्होंने इंडियन इंश्योरेंस कंपनी में एजेंट का कार्य शुरू किया। इसके बाद किशनगढ़ में न्यू सुमेर टॉकीज के मैनेजर रहे। बाद में जोधपुर के जॉर्ज टॉकीज सर्किट की ओर से फिल्म प्रतिनिधि के रूप में काम किया। इसी प्रकार मैसर्स हुकमचंद संचेती एंड संस के विक्रय प्रतिनिधि के रूप में भी काम किया। सन् 1958 में टेरिटोरियल आर्मी के प्रशिक्षण शिविर में सर्वश्रेष्ठ केडेट का पुरस्कार प्राप्त किया। उन्होंने सेना प्रमुख की ओर से सर्टिफिकेट ऑफ मेरिट भी हासिल है। उन्होंने 1959 में 105 इन्फेंट्री बटालियन में रह कर नई दिल्ली में गणतंत्र दिवस की परेड में भाग लिया। इसके बाद किशनगढ़ विधानसभा क्षेत्र के उपचुनाव के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री स्वर्गीय जयनारायण व्यास के संपर्क में आए। उन्हीं के आदेश पर उन्हें शिक्षा विभाग में क्लर्क की नौकरी करने का मौका मिला। बाद में ग्रेड बदलवा कर ब्यावर के सनातन धर्म हायर सेकंडरी स्कूल और पटेल हायर सेकंडरी स्कूल में शिक्षण कार्य किया।

तकरीबन 12 वर्ष तक सरकारी नौकरी करने के बाद उन्होंने निजी व्यवसाय शुरू कर दिया और अजमेर में बुक सेंटर के नाम से दुकान खोली एवं लाइब्रेरी सप्लाई व प्रकाशन का कार्य शुरू किया। वे अजमेर गांधी शांति प्रतिष्ठान के कार्यालय प्रभारी और श्री गोकुलभाई भट्ट के शराबबंदी आंदोलन के कार्यालय प्रभारी भी रहे हैं। दिलचस्प बात ये है कि उन्होंने ब्यावर में स्वर्गीय श्री घनश्याम जी से कत्थक का विधिवत दो साल प्रशिक्षण लिया है और प्रदेश के अनेक स्थानों पर लोकनृत्य सहित कई सांस्कृतिक प्रदर्शन किए हैं। सन् 1974 में उनकी रुचि पत्रकारिता में हुई और साप्ताहिक लगन एक्सप्रेस व जिला कांग्रेस कमेटी के मुखपत्र कांग्रेस समाचार का संपादन किया। सन् 1975 से 81 तक दैनिक नवज्योति के लिए पूरे राजस्थान का भ्रमण कर अनेक स्थानों पर संवाददाता व एजेंट नियुक्त किए। अजमेर नगर सुधार न्यास के भूतपूर्व अध्यक्ष स्वर्गीय श्री माणकचंद सोगानी के साथ न्यास के लिए जनसंपर्क प्रभारी का कार्य किया। उन्होंने जयपुर में कांग्रेस शताब्दी समारोह के अवसर पर स्वर्गीय श्री मथुरादास माथुर के साथ विशाल प्रदर्शनी का संयोजन किया और एक्जीबीशन एट ए ग्लांस का संपादन किया। 

सन् 1985 से 2009 तक दैनिक आधुनिक राजस्थान के बीकानेर व जयपुर ब्यूरो प्रमुख रहे। वे संत श्री रामचंद्र डोंगरे, श्री रामसुखदास महाराज व श्री मुरारी बापू के अजमेर व सलेमाबाद में आयोजित प्रवचन कार्यक्रमों के मीडिया प्रभारी भी रहे हैं। इसी प्रकार सामाजिक क्षेत्र में मग ब्राह्मण समाज के वैवाहिक परिचय सम्मेलनों के मीडिया प्रभारी और अखिल भारतीय सर्वाेदय सम्मेलन में मीडिया व वालेंटियर सेवा के संयुक्त संयोजक रहे हैं।  वर्तमान वे राज्य सरकार के अधिस्वीकृत स्वतंत्र पत्रकार हैं। वे जयपुर में पिंक सिटी प्रेस क्लब के संस्थापक सदस्य हैं और राजस्थान श्रमजीवी पत्रकार संघ में अनेक पदों रहे हैं। 

उन्होंने दैनिक नवज्योति के प्रधान संपादक श्री दीनबंधु चौधरी के जीवन पर रचित गौरव ग्रंथ के सामग्री संकलन, संपादन व प्रकाशन में अहम भूमिका निभाई है। इस ग्रंथ का विमोचन मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत ने जयपुर में आयोजित एक भव्य समारोह में किया।

उनके जीवन की सफलता का दूसरा पहलु ये है कि उनके प्रयासों से ही आज उनके दोनों सुपुत्र प्रतिष्ठित फर्म कुवेरा कार्ड्स एंड गिफ्ट व न्यू कुवेरा गिफ्ट आइटम्स का संचालन कर रहे हैं।


अजमेरनामा आपके शतायु होने की कामना करता है।

रविवार, 18 जुलाई 2021

एडीए अध्यक्ष पद पर नियुक्ति को लेकर रहस्य गहराया


अजमेर स्मार्ट सिटी लिमिटेड में पूर्व विधायक डॉ. श्रीगोपाल बाहेती और डॉ. राजकुमार जयपाल को स्वंतत्र डायरेक्टर बनाए जाने के साथ ही अजमेर विकास प्राधिकरण में अध्यक्ष पद पर नियुक्ति को लेकर को लेकर रहस्य गहरा गया है। सिक्के का एक पहलु तो ये है कि इन दोनों के अलावा अन्य सभी दावेदारों में उम्मीद जगी है। ऐसा माना जा रहा है कि मौजूदा राजनीतिक समीकरणों में इन दोनों की राजनीतिक नियुक्ति के साथ ही अन्य दावेदारों के लिए एडीए में जाने का रास्ता खुल गया है। ऐसा माना जा रहा है कि इन दोनों नेताओं को चूंकि समायोजित किया जा चुका है, लिहाजा इन में से कोई भी एडीए अध्यक्ष नहीं बन पाएगा। हालांकि यह बहुत जरूरी नहीं है कि ऐसा ही हो, मगर मोटे तौर पर यही माना जा रहा है। सिक्के का दूसरा पहलु ये है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि अब एडीए अध्यक्ष बनाया ही न जाए।

बहरहाल सवाल ये खड़ा होता है कि क्या ये दोनों नेता इन नियुक्तियों से खुश हैं। कहते हैं न कि अंधे मामा से काणा मामा अच्छा, इस कहावत के लिहाज से देखें तो दोनों ने संतोष कर लिया होगा कि चलो कुछ तो मिला। लेकिन इतना पक्का है कि ये नियुक्तियां उनके बहुत सुखद नहीं हैं। विषेश रूप से डॉ. बाहेती के लिए। वो इसलिए कि अब तक के सारे मीडिया आकलन में माना जा रहा था कि एडीए के लिए वे ही नंबर वन दावेदार हैं। उसकी वजह भी साफ  है कि वे मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के सर्वाधिक करीब हैं। हालांकि बीच में कुछ लोगों ने कहना आरंभ कर दिया था कि अब पहले जैसी करीबी नहीं रही। उसका क्या आधार था, पता नहीं फिर भी वे नंबर वन पर ही माने जा रहे थे। मौजूदा नियुक्ति को देखते हुए तो लगता है कि कुछ लोगों का जो अनुमान था, कहीं वह सही तो नहीं था। बाहेती को एडीए अध्यक्ष बनाने की बजाय स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट से जोडने से तो यही अर्थ निकलता है। आपको याद होगा कि किसी समय बाहेती को मिनी सीएम माना जाता था। उसी वजह से उनका रुतबा आज तक बना हुआ है। अगर यह सही है कि स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट से जोडने के बाद उनकी एडीए सदर बनने की संभावना समाप्त हो गई है तो यह उनके लिए अच्छा नहीं हुआ। एक अर्थ में इसे अन्याय की संज्ञा भी दी जा सकती है कि जीवन भर गहलोत की वफादारी का अपेक्षित इनाम नहीं मिल पाया। कहां एडीए अध्यक्ष और कहां स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट का डायरेक्टर। वहां वे कुछ नहीं कर सकते क्योंकि अधिसंख्य योजनाओं को अंतिम रूप दिया जा चुका है और एमओयू भी हो चुके हैं। वे भले ही निजी कारणों से प्रोजेक्ट मीटिंग में नहीं जा पाए हों, मगर कुछ का मानना है कि वे नाराजगी के चलते नहीं गए। कुछ लोग केवल इसी कारण माला व गुलदस्ते के साथ बधाई देने से बचे कि कहीं वे बुरा न मान जाएं कि किस बात की बधाई देने आए हो।

कुछ लोगों का अनुमान है कि बाहेती व जयपाल को स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट में जोडऩे के बाद एडीए अध्यक्ष बनाए जाने की संभावना समाप्त हो गई है। हो सकता है सरकार अब बिना नियुक्ति के ही काम चला ले। यूं भी इस पद के लिए कम से कम गहलोत खेमे में कोई दमदार दावेदार नहीं है। जो हैं वे सचिन पायलट खेमे के हैं। उनका नंबर आएगा या नहीं कुछ कहा नहीं जा सकता।

मुख्यमंत्री की मंशा क्या है किसी को पता नहीं फिर भी मीडिया में अन्य दावेदारों के नाम उछल रहे हैं। उनमें कुछ वास्तविक दावेदार हैं तो कुछ हवाई। नियुक्ति कब होगी होगी भी या नहीं मगर मीडिया में जिन दावेदारों के नाम उछल रहे हैं वे खुशफहमी में जीने लगे हैं।


तेजवानी गिरधर

7742067000

सोमवार, 28 जून 2021

एडीए अध्यक्ष की नियुक्ति के बिना विकास की उम्मीद बेमानी


यह एक दुर्भाग्य ही है कि अजमेर जैसा ऐतिहासिक शहर और विश्व मानचित्र पर अंकित जाने-माने पर्यटन स्थल का विकास पहले नगर सुधार न्यास व बाद में अजमेर विकास प्राधिकरण में अमूमन देर से अध्यक्ष की नियुक्ति होने के कारण बार-बार बाधित हुआ है। आज भी स्थिति ये है कि नई सरकार तकरीबन ढ़ाई साल पूरे कर रही है, मगर अब तक अध्यक्ष की नियुक्ति नहीं हो पाई है।

यह सर्वविदित ही है कि पहले यूआईटी हो या अब एडीए, शहर के विकास के नए आयाम स्थानीय राजनीतिक व्यक्ति के अध्यक्ष रहने पर स्थापित हुए हैं। जब भी प्रशासनिक अधिकारी के हाथों में कमान रही है, विकास की गति धीमी हुई है। इसके अनेक उदाहरण हैं। वजह ये है कि जिला कलेक्टर या संभागीय आयुक्त के पास अध्यक्ष का भी चार्ज होने के कारण वे सीधे तौर पर कामकाज पर ध्यान नहीं दे पाते। वैसे भी उनकी कोई विशेष रुचि नहीं होती। वे तो महज औपचारिक रूप से नौकरी को अंजाम देते हैं। उनके पास अपना मूल दायित्व ही इतना महत्वपूर्ण होता है कि वे टाइम ही नहीं निकाल पाते। निचले स्तर के अधिकारी ही सारा कामकाज देखते हैं। इसके विपरीत राजनीतिक व्यक्ति के पास अध्यक्ष का कार्यभार होने पर विकास के रास्ते सहज निकल आते हैं। एक तो उसको स्थानीय जरूरतों का ठीक से ज्ञान होता है। इसके अतिरिक्त जनता के बीच रहने के कारण यहां की समस्याओं से भी भलीभांति परिचित होता है। वह किसी भी विकास के कार्य को बेहतर अंजाम दे पाता है। प्रशासनिक अधिकारी व जनता के प्रतिनिधि का आम जन के प्रति रवैये में कितना अंतर होता है, यह सहज ही समझा जा सकता है। राजनीतिक व्यक्ति इस वजह से भी विकास में रुचि लेता है, क्योंकि एक तो उसकी स्थानीय कामों में दिलचस्पी होती है, दूसरा उसकी प्रतिष्ठा भी जुड़ी होती है। उनका प्रयास ये रहता है कि ऐसे काम करके जाएं ताकि लोग उन्हें वर्षों तक याद रखें और उनकी राजनीतिक कैरियर भी और उज्ज्वल हो। 

इस बात के प्रमाण हैं कि जब भी न्यास के अध्यक्ष पद पर कोई राजनीतिक प्रतिनिधि बैठा है, शहर का विकास हुआ है। चाहे कांग्रेस की सरकार हो या भाजपा की। हर न्यास अध्यक्ष ने चाहे शहर के विकास के लिए, चाहे अपनी वाहवाही के लिए, काम जरूर करवाया है। पृथ्वीराज चौहान स्मारक, सिंधुपति महाराजा दाहरसेन स्मारक, लवकुश उद्यान, झलकारी बाई स्मारक, वैकल्पिक ऋषि घाटी मार्ग, अशोक उद्यान, राजीव उद्यान, गौरव पथ, महाराणा प्रताप स्मारक सहित अनेक आवासीय योजनाएं उसका साक्षात प्रमाण हैं।

सरकारों की अरुचि अथवा कोई अन्य मजबूरी हो सकती है, मगर अध्यक्ष की नियुक्ति समय पर न होना अजमेर शहर के लिए नुकसानदेह है। महत्वपूर्ण ये नहीं है कि नियुक्ति के दावेदारों को इंतजार करना पड़ रहा है, बल्कि महत्वपूर्ण ये है कि शहर के विकास में अहम भूमिका अदा कर सकने वाली इस विशेष संस्था की निष्क्रियता से शहर का विकास अवरुद्ध हो रहा है। ये उतना महत्वपूर्ण नहीं है कि दावेदारों की अपेक्षा पूरी हो, बल्कि जरूरी ये है कि अजमेर वासियों की अपेक्षाएं पूरी हों।

वर्तमान में प्राधिकरण तकरीबन ढ़ाई साल से प्रशासनिक अधिकारियों भरोसे ही चल रहा है। ऐसे में विकास तो दूर रोजमर्रा के कामों की हालत भी ये है कि जरूरतमंद लोग चक्कर लगा रहे हैं और किसी को कोई चिंता नहीं। नियमन और नक्शों के सैंकड़ों काम अटके पड़े हैं। स्पष्ट है कि विकास अवरुद्ध हुआ है।

यहां यह बताना महत्वपूर्ण है कि प्राधिकरण गठित होने की वजह से भविष्य में विकास की रफ्तार तेज होने की आशा बलवती हुई थी। वजह ये कि प्राधिकरण का क्षेत्र काफी बड़ा हो गया था। इसके तहत किशनगढ़ और पुष्कर शहर के अतिरिक्त 119 गांव भी इसका हिस्सा बन गए। यानि कि प्राधिकरण यूआईटी की तुलना में एक उच्च शक्ति वाली संस्था बन गई। न्यास अध्यक्ष को 25 लाख रुपए और सचिव को दस लाख रुपए के वित्तीय अधिकार थे, मगर अध्यक्ष और कमिश्नर (सचिव) दोनों के वित्तीय अधिकार एक-एक करोड़ रुपए हो गए। इसमें सरकार की ओर से घोषित एक चेयरमैन के अलावा एक सचिव और 19 सदस्यों का प्रावधान है। 19 सदस्यों में से 12 सदस्य अधिकारी और 7 सदस्य राजनीतिक नियुक्तियों के रखने का प्रावधान है। जैसे ही प्राधिकरण का गठन हुआ तो सभी समाचार पत्रों में यह शीर्षक सुर्खियां पा रहा था कि अब लगेंगे अजमेर के विकास को पंख। उम्मीद जताई गई थी कि सही योजनाएं बनीं और तय समय में काम पूरे हुए तो एक दशक में ही अजमेर महानगर में तब्दील हो सकता है। इसके ठोस आधार भी हैं। प्राधिकरण की सीमाएं किशनगढ़ औद्योगिक क्षेत्र तक हैं, यानि केंद्रीय विद्यालय तक हमारी पहुंच हो गई है। बाड़ी घाटी अब प्राधिकरण का हिस्सा है, यानि विदेशी पर्यटकों की पहली पसंद बने पुष्कर तीर्थ को हम विकास की दृष्टि से अंतरराष्ट्रीय सुविधाएं दे सकते हैं। ब्यावर रोड पर सराधना और नारेली तीर्थ हमारी सीमा में आ जाने से हम कई दृष्टि से विकसित हो जाएंगे। हवाई अड्डा तो गेगल निकलते ही हम छू लेंगे। कुल मिला कर अजमेर विकास प्राधिकरण का गठन अजमेर के विकास में मील का पत्थर साबित हो सकता था। मगर वह इस कारण नहीं हो पा रहा कि पिछली बार भी नियुक्ति में देरी हुई, इस बार भी हो रही है।

कुल मिला कर जब तक प्राधिकरण के सदर पद पर किसी राजनीतिक व्यक्ति की नियुक्ति नहीं होती, तब तक अजमेर का विकास यूं ही ठप पड़ा रहेगा।

-तेजवानी गिरधर

7742067000

अजमेर पर गीत

 


पिछले दिनों सोशल मीडिया पर अजमेर शहर पर कुछ गीत खूब धूम मचाए हुए थे। चूंकि रचनाओं के साथ उनके लेखकों का नाम नहीं था, इस कारण यह पता नहीं लग पाया कि इनकी रचना किसने की है? अजमेर का परिचय कराने वाले इन गीतों को लिखने वाले अज्ञात रचनाकारों का बहुत बहुत साधुवाद। इनमें वर्तनी व व्याकरण की त्रुटियां थीं, जिन्हें दुरुस्त कर दिया गया है।



अजमेर की जो धरा है थोड़ा हटके जरा है

शहर ये खूबियों और रस-स्वादों से भरा है

स्टेशन के नए गेट से निकलते ही गांधी मार्केट दिखता है

जहां बिक्किलाल का शरबत बिकता है

मदार गेट में घुसते ही पुरानी मंडी नजर आती है

इस संकड़ी गली को देख रूह कांपती है

एक बात दिमाग को बरबस छील जाती है

कैसे इस गली में औरतें दोने चाटती हैं

ये गली प्राचीन अजमेर की याद दिलाती है

बुद्धामल के सोन हलवे से मिलवाती है

नया बाजार भी अपने दो रूप दिखाता है

दिन में ये सोने चांदी का गढ़ कहलाता है

शाम ढ़लते ही चौपाटी सा नजर आता है

सर्दी में चरी चाय और सूप लीजिये जनाब

गर्मी में मिल्क बादाम, फालूदा है लाजवाब

कड़ी कचोरी में अजमेर का नहीं है कोई तोड़

नया बाजार चौपड़ या केसरगंज के मोड़

बरसात का मौसम अलग मजा लाता है

बिसिट के दाल पकौड़ों में आनंद आता है

लोग कहते हैं, समझ समझ का फेर है 

इसीलिए इस नगरी का नाम अजमेर हैै


लीजिए, एक और गीत सुनिये

वाह रे अजमेर

तेरे शहर में 

जहां गली तो है तो

कड़क्का चौक भी है

नया बाजार की चमक के साथ

पुरानी मंडी भी है।

श्रीनगर तो कश्मीर में है

पर श्रीनगर रोड यहां है

आदर्श नगर का आदर्श है

पर मामले उलझने पर

कचहरी रोड भी यहीं है

हाथीभाटा में कोई हाथी या भाटा नहीं

तो लोहागल में भी कोई लोहा गलता नहीं

चूनपचान गली में कोई हो हल्ला नहीं

तो झूला मोहल्ला में भी कोई झूला नहीं

नला बाजार में नाले के

पानी का बहाव है

प्यास बुझाने के लिये

गोल प्याऊ का ठहराव है

नवाब का बेड़ा से नवाबी तो गयी

पर साथ में ठठेरा चौक की ठक ठक भी गयी 

आशाओं भरा आशा गंज तो है

पर बगैर किसी रंज के

सिर्फ गंज भी यहीं है।

डिग्गी तलाब तो तलाव न रहा

साथ में खारी कुई पता नहीं

अब भी खारी है कि नहीं 

इमाम बाड़ा शांत तो

तोपदड़ा में भी कोई तोप का शोर नहीं

पूराने शहर के बाहर 

दिल्ली गेट, आगरा गेट भी है

शहर के भीतर

अंदर कोट भी है

घसेटी और चूनपचान

जैसी गलियों में पेट न भरे तो

लंगर खाना गली भी है

चलते चलते अब थका हूं

ठहराव के लिये

पड़ाव आया हूं

पता नहीं कौन आ कर पड़ाव करते थे

अब तो आवाजाही, गहमा रही है।


तेजवानी गिरधर

7742067000

शुक्रवार, 25 जून 2021

अजमेर नगर निगम में लिफाफा सिस्टम सेट नहीं हो पा रहा


कानाफूसी है कि नगर निगम में वर्षों से कथित रूप से चल रहा लिफाफा सिस्टम इस बार के बोर्ड में ठीक से इम्प्लीमेंट नहीं हो पाया है। स्वाभाविक रूप से व्यवस्था बदलने पर नई व्यवस्था को सेट होने में थोड़ा टाइम तो लगता ही है। वैसे भी मौजूदा मेयर श्रीमती बृजलता हाड़ा राजनीति में नई-नई हैं। इस कारण उन्हें सिस्टम को समझने में टाइम लग रहा है। वे फूंक-फूंक कर कदम रख रही हैं। उनके पतिदेव डॉ. प्रियशील हाड़ा भी कुल मिला कर सीधे-सादे व ईमानदार हैं। इसे यूं भी कहा जा सकता है कि इस दंपति को लिफाफा संस्कृति व सिस्टम की ठीक से जानकारी नहीं है। अगर जानकारी है भी तो अनुभव की कमी है। ऐसे में घाघ अधिकारियों से इस बारे में चर्चा करना खतरे से खाली नहीं है। राजनीतिक रूप से भी खतरा कम नहीं है। श्रीमती हाड़ा के आगामी विधानसभा चुनाव में प्रमुख दावेदार बनने की पूरी संभावना है। जाहिर तौर पर उनका एक नया शक्ति केन्द्र बनना जिनको नागवार गुजर रहा है, वे घात लगा कर बैठे हैं कि कहीं चूक हो तो फिश प्लेट गायब करवा दें। उससे भी बड़ी बात ये कि राज्य में सरकार कांग्रेस की है। ऐसी स्थिति में किसी प्रकार की रिस्क नहीं ली जा सकती।

हालांकि जानकारी है कि कुछ एक अनुभवी व तेज-तर्रार ने अपना हिसाब-किताब बना लिया है, लेकिन कई अभी वंचित हैं। सिस्टम सेट नहीं हो पा रहा। ऐसे में स्वाभाविक रूप से वंचित वर्ग में असंतोष व निराशा व्याप्त है। उन्हें उम्मीद है कि कभी तो सिस्टम सेट होगा। ज्ञातव्य है कि पिछले बोर्ड में सभी संतुष्ट थे। किसी को कोई शिकायत नहीं थी। बिना किसी राजनीतिक भेद के सभी तत्कालीन मेयर धर्मेन्द्र गहलोत के पैर छूते थे।

खैर, असल में समस्या ये भी है कि कोटा तो पहले जितना ही है, जबकि हिस्सेदारों की संख्या बढ़ गई है। अगर राजनीतिक नियुक्तियां हुईं तो यह संख्या और बढ़ जाएगी। ऐसे में लिफाफे का वजन कम हो जाएगा।

वैसे शहर वासियों के लिए यह सुखद है कि लिफाफा सिस्टम कायम नहीं हो पा रहा। हालांकि समझा जाता है कि देर-सवेर सिस्टम लागू तो हो जाएगा, मगर यदि वह लागू नहीं हो पाता तो हाड़ा दंपति की साफ-सुथरी छवि पर कोई कीचड़ नहीं उछाल पाएगा। फिलहाल उनके लिए यही अच्छा है। सिक्के का दूसरा पहलु ये है कि अगर उन्होंने इस ओर ध्यान नहीं दिया तो कहीं निचले स्तर पर सेटिंग न शुरू हो जाए, वह और भी घातक होगी। 


-तेजवानी गिरधर

7742067000

tejwanig@gmail.com