शुक्रवार, 17 दिसंबर 2021

दोनों विधायकों के आगे फिर उपेक्षित हुए अध्यक्ष


लगातार चार बार जीत कर और अधिक मजबूत हो चुके अजमेर उत्तर के विधायक वासुदेव देवनानी व अजमेर दक्षिण की विधायक श्रीमती अनिता भदेल के सामने एक बार फिर षहर भाजपा संगठन उपेक्षा का षिकार हो गया है। यह साजिषन हुआ या इत्तेफाक से, कुछ पता नहीं, लेकिन अजमेर नगर निगम की मेयर ब्रजलता तो यही आरोप लगा रही हैं कि उनके साथ ऐसा जान बूझकर किया गया।

ज्ञातव्य है कि राज्य सरकार की नीतियों के खिलाफ भाजपा की ओर से हल्ला बोल के लिए कलेक्ट्रेट पर प्रदर्षन किया गया। इस दौरान हुई वारदात ने एक बार फिर जता दिया है कि देवनानी व भदेल ने जाने-अनजाने षहर जिला भाजपा अध्यक्ष पद पर बैठे डॉ प्रियषील हाडा की उपेक्षा कर दी, जिसका षिकार उनकी धर्मपत्नी श्रीमती ब्रजलता हाडा भी हुईं।

सवाल ये उठता है कि जब यह पहले से तय था कि प्रदर्शन के बाद कलेक्टर को ज्ञापन देने के लिए सभी विधायक, शहर व देहात के जिलाध्यक्ष सहित महापौर को जाना था तो फिर देवनानी व भदेल षहर जिला अध्यक्ष व महापौर को साथ लिए बिना ही कलेक्टर के चैंबर में कैसे चले गए। उन्हें यह तो ख्याल रखना ही चाहिए था कि हाडा दंपति को भी साथ रखते। यूं नेताओं का आगे पीछे हो जाना कोई खास बात नहीं, मगर असल में विवाद इस कारण उत्पन्न हो गया कि विधायक तो अंदर पहुंच गए, जबकि हाडा दंपती को पुलिस वालों ने रोक दिया। स्वाभाविक रूप से उन्हें अपमान महसूस हुआ होगा। सच में देखा जाए तो यह चूक पुलिस के स्तर पर हुई। प्रष्न उठता है कि क्या वहां तैनात पुलिस कर्मी हाडा दंपति को नहीं जानते थे।   

इस घटना का गंभीर पहलु ये है कि महापौर साफ तौर पर आरोप लगा रही हैं कि पुलिसकर्मियों ने उन्हें कहा कि दोनों विधायक मना करके गए हैं कि किसी को अंदर नहीं आने दें। दूसरी ओर देवनानी ने सफाई दी कि अगर हमने यदि मना किया होता तो वह कैसे आते। हाड़ा दंपती पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं। अगर वाकई यह बयान सही है तो यह और भी गंभीर बात उजागर हो गई कि हाडा दंपति व विधायकों के बीच पूर्वाग्रह हैं। 

महापौर हाडा की आपत्ति बिलकुल जायज है कि वे अजमेर षहर की प्रथम नागरिक हैं और उनके पतिदेव षहर जिलाध्यक्ष, जिनके नेतृत्व में ज्ञापन दिया जाना था, तो विधायक पहले कैसे चले गए।

घटना का रोचक पहलु ये रहा कि विधायक व अन्य पदाधिकारी जिला कलेक्टर के पास पहुंच गए, जबकि ज्ञापन हाडा के पास था और वे बिना ज्ञापन के वहां बैठे रहे। तकरीबन 15 मिनट बाद जब हाडा दंपति आए तभी जा कर औपचारिक तौर पर ज्ञापन दिया गया। चलो, विधायक पहले अंदर चले गए लेकिन महापौर को कम से कम इस पर संतुस्ट हो जाना चाहिए था कि उनके पतिदेव के आने पर ही ज्ञापन देने की रस्म अदा हुईं मगर वे गुस्से में एक कदम और आगे निकल गईं, जिससे इस वीडियो के आरंभ में गई पंक्तियों पर ठप्पा लग गया कि विधायकों के आगे संगठन कमतर रहा है। 

ब््रजलता हाडा ने कहा कि सारी व्यवस्था उन्होंने की है। बीते एक सप्ताह से लगातार तैयारियों में जुटे हुए हैं। तय था कि जिलाध्यक्ष के नेतृत्व में सभी विधायक ज्ञापन देंगे, लेकिन यहां क्रेडिट दोनों विधायक ले रहे हैं। यह परिपाटी गलत है। वाकई यही परिपाठी है। इन दोनों विधायकों के आगे संगठन अध्यक्ष सदैव बौना ही रहा है। अध्यक्ष कोई भी रहा हो, मगर कार्यकारिणी में अधिकतर पदाधिकारी इन दोनों विधायकों की पसंद के रहे हैं। रिकार्ड उठा के देख लीजिए कि नगर निगम के चुनावों में सदैव अधिकतर टिकट दोनों विधायक तय करते रहे हैं। असल में उसकी वजह ये कि ग्राउंड पर असल पकड विधायकों की है। वे ही कार्यकर्ताओं के काम करवाते हैं। इस कारण संगठन के अधिकतर पदाधिकारी व कार्यकर्ता विधायकों के व्यक्तिगत फॉलोअर हैं। यह असलियत भाजपा हाईकमान अच्छी तरह से जानता हैं मगर चूंकि वह जानता है कि पकड तो विधायकों की ही है इस कारण वह स्थिति को नजरअंदाज कर जाता है।

हाड़ा ने इस मामले को लेकर प्रदेश नेतृत्व को शिकायत भेजे जाने की बात कही है। हालांकि होना जाना कुछ नहीं है, मगर इस वारदात से यह साफ हो चुका है कि अध्यक्ष संगठन के मुखिया भले ही हों मगर चलती विधायकों की ही है।


मंगलवार, 14 दिसंबर 2021

ओवैसी की नजर अजमेर पर भी


राजनीतिक गलियारे से यह खबर छन कर आ रही है कि जिस प्रकार ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के राष्ट्रीय अध्यक्ष असदुद्दीन ओवेसी उत्तर प्रदेष विधानसभा चुनाव में दखल देने के बाद दो साल बाद राजस्थान में होने वाले विधानसभा चुनाव का रुख करेंगे। बताया जाता है कि उन्होंने अपने संपर्कों के माध्यम से राज्य की मुस्लिम बहुल सीटों पर नजर रखना आरंभ कर दिया है। अजमेर जिले की बात करें तो पुस्कर के अतिरिक्त मसूदा और अजमेर उत्तर में उनकी पार्टी के उम्मीदवार मैदान में उतर सकते हैं। ज्ञातव्य है कि दरगाह ख्वाजा साहब व तीर्थराज पुष्कर की वजह से अजमेर दुनियाभर में अपनी पहचान रखता है। पुष्कर के अतिरिक्त अजमेर उत्तर व मसूदा में मुस्लिम मतदाता अच्छी तादाद में हैं। वैसे यह प्रत्याषियों की व्यक्तिगत छवि और दमखम पर निर्भर करेगा कि उनकी परफोरमेंस कैसी रहेगी क्योंकि फिलवक्त ओवेसी का यहां कोई प्रभाव नहीं है, लेकिन समझा जाता है कि मुस्लिम समुदाय का युवा वर्ग उनकी ओर आकर्षित हो सकता है। अगर ऐसा होता है तो इन सीटों पर चुनाव लडने वाले कांग्रेस उम्मीदवारों को सावचेत रहना होगा। उन्हें जीतने के लिए अतिरिक्त मेहनत करनी होगी व नए जातीय समीकरण तलाषने होंगे। अगर ओवेसी सच में गंभीरता दिखाते हैं तो कांग्रेस पार्टी को भी प्रत्याषियों के चयन में अतिरिक्त सावधानी बरतनी होगी। बेषक चुनाव दो साल बाद हैं, मगर ये दो साल देखते देखते कब गुजर जाएंगे, पता नहीं नहीं चलेगा।


गुरुवार, 9 दिसंबर 2021

न चाहते हुए भी देवनानी ने रलावता को दी भरपूर तवज्जो

 कांग्रेस के वरिश्ठ नेता महेन्द्र सिंह रलावता व अजमेर उत्तर के भाजपा विधायक वासुदेव देवनानी के बीच जुबानी जंग जारी है। आए दिन एक दूसरे पर टीका टिप्पणी करते रहते हैं। गुरुवार को भी देवनानी ने पलटवार करते हुए बयान जारी किया है। हालांकि देवनानी का कहना है कि जब रलावता को कांग्रेस व जनता ही गंभीरता से नहीं लेती, तो मैं भी नहीं लेता, लेकिन बयान जितना लंबा और प्रहारक है, वह साबित करता है कि देवनानी ने रलावता को काफी गंभीरता से लिया है और उन्हें भरपूर तवज्जो दे रहे हैं।

बयान हालांकि उनके कार्यालय प्रभारी ने जारी किया है लेकिन चूंकि वह देवनानी की अधिकत ईमेल आईडी के जरिए आया है, इसलिए यही माना जाएगा कि कार्यालय प्रभारी ने देवनानी को बयान का मजमून दिखा कर ही मेल किया होगा। ऐसा भी संभव है कि देवनानी ने कार्यालय प्रभारी को प्रतिक्रिया देने को कहा हो और उन जनाब ने अति उत्साह में लंबा चौडा बयान टाइप कर दिया हो।

बयान में रलावता को हवाई बातें करने वाले व बडबोले नेता की संज्ञा दी गई है। उन्होंने रलावता के बयान के प्रत्युत्तर में कहा है कि जहां तक मेरी याददाश्त कमजोर होने और च्यवनप्राश खाने की बात है, वह तो पिछले चार चुनाव में जनता देख चुकी है और अब भी देख रही है। दरअसल, याददाश्त रलावता की कमजोर है और उन्हें च्यवनप्राश खाना चाहिए। जनता उन्हें विधानसभा चुनाव में नकार चुकी है। देवनानी ने कहा कि रलावता द्वारा उनके लिए च्यवनप्राश भेजने संबंधी दिया गया बयान रलावता की घटिया सोच और ओछी मानसिकता का द्योतक है। चलो इस आरोप प्रत्यारोप से यह तो पता लगा कि याददाष्त बढाने के लिए च्यवनप्राथ खाना चाहिए। वैसे एक बात है, देवनानी अमूमन निम्न स्तरीय बयान देने के आदी नहीं हैं, लेकिन ऐसा प्रतीता होता है कि उन्होंने रलावता के बयान को कुछ ज्यादा ही गंभीरता से ले लिया है।

देवनानी ने एक बात तो पते की की है। वो यह कि सारे विधायक सरकार की ओर से दिए जाने वाले धन से ही

विकास कार्य करवाते हैं न कि अपनी जेब से। कांग्रेसी विधायक भी। उनकी बात में दम है, मगर जब कुछ विधायक विकास कार्यों का षुभारंभ इस तरह से करते और उसका प्रचार करते हैं मानो अपनी जेब से करवा रहे हों तो जनता में यह जुमला सुना जा सकता है कि कौन सा अपनी जेब से करवा रहे हैं। सिक्के का दूसरा पहलु ये है कि यदि षुभारंभ की खबरें जारी नहीं करेंगे तो जनता को पता कैसे लगेगा कि उनके विधायक ने कितने काम करवाए हैं, भले ही वे विधायक फंड से अर्थात सरकारी खजाने से हो रहे हैं।

बात ही बात में देवनानी केन्द्र सरकार के योगदान को बयां करने से नहीं चूके कि जल वितरण व्यवस्था सुधारने और मेडिकल कॉलेज सहित शहरभर में सैकड़ों विकास कार्य स्मार्टसिटी योजना के तहत कराए जा रहे हैं, जिसके लिए अरबों रूपए केंद्र सरकार दे रही है। 

उन्होंने कहा कि दरअसल रलावता आए दिन इस तरह के बयान चर्चाओं में बने रहने के लिए देते हैं। इसमें कोई दोराय नहीं कि नेता लोग चर्चा में रहने के लिए ही बयान दिया करते हैं। मगर इस सच से भी इंकार नहीं किया जाना चाहिए कि बयान पर पलट बयान से रलावता और ज्यादा चर्चा में आ जाएंगे।

अपन इस बयानी कुष्ती को इस रूप में लेते हैं। देवनानी का बयान जारी करना इसलिए जायज बनता है कि वे अगले चुनाव में भी मैदान में उतरेंगे, क्योंकि लगातार चार बार जीतने के बाद पांचवीं बार उनका टिकट कटने का कोई कारण नजर नहीं आता। रहा सवाल रलावता का तो उनकी गतिविधियों से यह साफ झलकता है कि वे दुबारा चुनाव लडने की तैयारी कर रहे हैं।  

दोनों महानुभावों के बीच में अपना टांग फंसाना इसलिए गैर वाजिब नहीं माना जाना चाहिए क्योंकि ये तो अपनी ड्यूटी है कि जनता को बयान वार की निश्पत्ति से तो वाकिफ करवाया जाए। वैसे यह अच्छी बात है, वही लोकतंत्र खूब फलता फूलता है, जिसमें चैक एंड बैलेंस होता हो। इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए। ऐसी खींचतान से ही तो विकास का मार्ग प्रषस्त होता है।


शनिवार, 27 नवंबर 2021

बदलते समीकरणों में सुरेष टाक एडीए चेयरमेन के प्रबल दावेदार


हालांकि जब से एडीए चेयरमेन पर नियुक्ति को लेकर चर्चा चल रही है, तब से किषनगढ के निर्दलीय विधायक सुरेष टाक का नाम भी दावेदारों की फेहरिष्त में षामिल है। हालांकि वे बहुत गंभीर नहीं माने जा रहे थे। लेकिन बदले समीकरणों में उनको प्रबल दावेदार माना जा रहा है। असल में राज्य मंत्रीमंडल विस्तार के साथ यह चर्चा आम है कि वे विधायक जिन्होंने मुख्यमंत्री अषोक गहलोत को सरकार बचाने में मदद की, उन्हें मंत्री पद न दे पाने के बाद किसी और तरीके से उपकत करने पर विचार किया जा रहा है। ऐसे विधायकों को या तो संसदीय सचिव बनाया जाएगा या किसी बोर्ड या आयोग की जिम्मेदारी दी जाएगी। इस लिहाज से टाक को अजमेर विकास प्राधिकरण का सदर बनाए जाने की प्रबल संभावना बताई जा रही है। बताते हैं कि खुद उनकी रुचि भी इस नियुक्ति में है, ताकि अपने विधानसभा क्षेत्र की बेहतर सेवा कर सकें। ज्ञातव्य है कि प्राधिकरण के क्षेत्र में किषनगढ भी षामिल है। उसका एक लाभ ये होगा कि इस माध्यम से वे अपने राजनीतिक भविष्य का ताना बुनने में कामयाब हो सकेंगे।

हालांकि अब तक राजस्थान स्टेट सीडृस कारपोरेषन लिमिटेड के पूर्व अध्यक्ष धर्मेन्द्र राठौड को ही नंबर वन दावेदार माना जाता रहा है लेकिन न जाने यह चर्चा कहां से आई है कि एडीए चेयरमेन का पद उनके कद के अनुरूप नहीं है। वे किसी राज्य स्तरीय आयोग या बोर्ड की जिम्मेदारी चाहते हैं इस कारण एडीए में रुचि नहीं ले रहे। 

यदि मुख्यमंत्री चाहेंगे तो टाक को अध्यक्ष बनाने में कोई दिक्कत नहीं आने वाली है लेकिन मुख्यमंत्री के ही करीबी पूर्व विधायक नाथूराम सिनोदिया को यह नागवार गुजरेगा। अगर एडीए के जरिए टाक मजबूत होते हैं तो उसे भला सिनोदिया व अन्य प्रमुख कांग्रेसी नेता कैसे बर्दाष्त कर सकते हैं। 

एक पहलु ये भी है कि टाक को ऑब्लाइज करने से कांग्रेस को आगे चल कर क्या फायदा होने वाला है। वे मूलतः भाजपा मानसिकता के हैं। इस कारण कांग्रेस में तो षामिल होंगे नहीं। अगले चुनाव में भाजपा का टिकट ही लेना चाहेंगे। वैसे भी उनके निजी समर्थकों में भाजपा मानसिकता के मतदाता अधिक हैं। एक बात ये भी कही जा रही है कि ताजा हालात में उन्हें किसी पद से नवाजने की कोई मजबूरी तो है नहीं। सरकार बहुत मजबूत है। यह ठीक है कि उन्होंने कांग्रेस सरकार का साथ दिया मगर उसी के साथ किषनगढ के विकास में सरकार का साथ भी तो ले लिया।

बेषक सरकार बनाते समय उनकी गरज रही मगर उससे कहीं अधिक उनकी गरज रही क्योंकि निर्दलीय रह कर सरकार से अपेक्षित लाभ नहीं उठा सकते थे।

इस मसले का एक पहलु ये भी है कि पूर्व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट के साथ समझौते के तहत उनकी पसंद के विधायकों को मंत्री पद मिल चुका है। अन्य राजनीतिक व सांगठनिक नियुक्तियों में भी उनकी हिस्सेदारी होगी। जो जिले उनके हिस्से में होंगे उनमें यदि अजमेर भी षामिल हुआ तो टाक के लिए एडीए अध्यक्ष बनना कुछ कठिन होगा।

रहा सवाल अन्य दावेदारों का तो पूर्व विधायक डॉ श्रीगोपाल बाहेती, पूर्व विधायक डॉ राजकुमार जयपाल, अजमेर दक्षिण चुनाव लड चुके हेमंत भाटी व अजमेर उत्तर से चुनाव लड चुके महेन्द्र सिंह रलावता के नाम प्रमुखता से लिए जा रहे है। पारिवारिक पश्ठभूमि के दम पर जयपाल ने अपनी पूरी ताकत झोंक रखी है। अगर पायलट की चली तो भाटी का नंबर आ सकता है। बताते हैं कि रलावता की ज्यादा रुचि अगले चुनाव में है। ऐसा भी हो सकता है कि बाहेती को अगले चुनाव में टिकट न मिलने की संभावना के चलते गहलोत उन्हें उपकत कर सकते हैं। वैसे भी सभी दावेदारों में व उनके करीबी हैं। सच बात तो ये है कि पिछले पैंतीस साल से वे ही उनके नंबर वन झंडाबरदार हैं।

खैर, इस सब बातों के बावजूद फिलवक्त माना जा रहा है कि राठौड के अतिरिक्त टाक सबसे प्रबल दावेदार बन चुके हैं। कुछ लोगों का मानना है कि जल्द की उनमें से एक की नियुक्ति का ऐलान हो जााएगा।


शुक्रवार, 19 नवंबर 2021

पेयजल समस्या का समाधान न हो पाना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण


यह बेहद षर्मनाक व अफसोसनाक है कि अजमेर में पेयजल सप्लाई व्यवस्था में सुधार के लिए पूर्व षिक्षा राज्य मंत्री व अजमेर उत्तर के मौजूदा भाजपा विधायक वासुदेव देवनानी को आंदोलन की चेतावनी देनी पड गई। वह भी तब जबकि सत्तारूढ कांग्रेस के पूर्व विधायक डा राजकुमार जयपाल के नेतत्व में इसी मसले पर ज्ञापन दिया जा चुका है। विपक्ष की भूमिका तो सहज समझ में आती है लेकिन सत्तारूढ दल को भी अगर नाराजगी जतानी पड रही है तो इससे समस्या की गंभीरता के साथ उसके प्रति प्रषासनिक अकर्मण्यता व लापरवाही जाहिर होती है। जलदाय महकमा अपने कर्तव्य के प्रति कितना बेपरवाह है, यह स्वयं सिद्ध है। जनता काफी दिन से पेयजल समस्या भोग रही है। ऐसा हो नहीं सकता कि महकमे के अधिकारी इससे अनभिज्ञ हों। बावजूद इसके अगर वे समस्या का समाधान नहीं कर रहें हैं या नहीं कर पा रहे हैं तो यह चिंताजनक है। संभव है कि अधिकारियों को पेयजल सप्लाई दुरुस्त रखने में कोई तकनीकी दिक्कत आ रही हो मगर यदि ऐसा है तो उन्हें सार्वजनिक बयान जारी करना चाहिए। और चुप हैं तो इसका मतलब है कि सिस्टम पर उनका कोई नियंत्रण ही नहीं है। उनकी विफलता का ही नतीजा है कि सत्तारूढ दल कांग्रेस तक को आवाज उठानी पड रही है। स्मार्ट सिटी की दिषा में बढ रहे अजमेर के लिए यह बहुत पीडादायक है कि जनता की मूलभूत समस्या का ही समाधान नहीं हो पा रहा। ऐसे स्मार्ट षहर में रहने से क्या फायदा जिसमें पानी सप्लाई का ना तो कोई दिन निश्चित है और ना ही समय। अनेक क्षेत्रों में तो 72 से 96 घंटे के अंतराल से पानी की सप्लाई की जा रही है। कई क्षेत्रों में जब पानी सप्लाई होता है, तो पहले दस-पन्द्रह मिनट तक तो गंदा पानी आता है। इसके बाद साफ पानी भी कम प्रेशर से बहुत कम समय के लिए सप्लाई किया जाता है, जिससे दैनिक जरूरत की पूर्ति भी नहीं हो पाती है। आजादी के बाद आठवें दषक में भी ऐतिहासिक षहर अजमेर पानी के लिए तरस रहा है तो इसका मतलब ये है कि यहां का कोई धणी धोरी नहीं है। ऐसी व्यवस्था के लिए ही तो पोपा बाई का राज जुमले का इजाद हुआ था।