गुरुवार, 5 दिसंबर 2024

सर्द मौसम में अजमेर शहर की कांग्रेस गर्म

राजस्थान विधानसभा चुनाव हुए एक साल बीत गया। चुनावी सरगरमी थम चुकी है। मौसम भी सर्द है। बावजूद इसके अजमेर की कांग्रेस में व्याप्त गरमाहट साफ महसूस की जा सकती है। एक ओर जहां राजस्थान पर्यटन विकास निगम के पूर्व अध्यक्ष धर्मेन्द्र सिंह राठौड ने हलचल मचा रखी है, वहीं वरिश्ठ कांग्रेस नेता महेन्द्र सिंह रलावता भी अपना वजूद कायम रखने कवायद जारी रखे हुए हैं। षहर जिला कांग्रेस अध्यक्ष की अपेक्षित नियुक्ति के इंतजार में दावेदार भी हाथ पैर मार रहे हैं। नैपथ्य में आगामी नगर निगम चुनाव का ताना बाना बुना जा रहा है। देखिये, यह रिपोर्टः-

राजस्थान पर्यटन विकास निगम के पूर्व अध्यक्ष धर्मेन्द्र सिंह राठौड को भले ही पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का टिकट न मिला हो, मगर वे कत्तई निराष या हतोत्साहित नहीं हैं। वे जमीन पर षनैः षनैः पकड मजबूत करने में लगे हुए हैं। आए दिन अजमेर आते हैं और छोटे छोटे कार्यक्रमों में षिकरत कर रहे हैं। किसी के यहां षोक संवेदना व्यक्त करने को पहुंच रहे हैं तो किसी के यहां षिश्टाचार भेंट करते हुए मेल मिलाप बढा रहे हैं। यहां तक कि भवन निर्माण के लिए हो रहे भूमि पूजन कार्यक्रम तक को अटैंड रहे हैं। पिछले दिनों कांग्रेस पार्शदों के धरना कार्यक्रम में भी उनकी अहम भूमिका थी। साफ दिखाई दे रहा है कि वे आगामी चुनाव की चादर बिछा रहे हैं। विषेश रूप से अजमेर उत्तर में महेन्द्र सिंह रलावता के लगातार दो बार हारने के कारण उन्हें वैक्यूम नजर आ रहा है। सौभाग्य से अजमेर उत्तर की दोनों ब्लॉक इकाइयों पर उनकी पकड हैं। दक्षिण की ब्लॉक इकाइयां भी पिछला चुनाव लड चुकी सुश्री दोपदी कोली के जरिए उनके अनुकूल हैं। उनकी जयपुर दिल्ली में पकड इसी बात से साबित होती है कि पिछले दिनों जब राहुल गांधी जयपुर आए तो उनकी अगुवानी करने वाले चंद नेताओं में वे भी षामिल थे।

राजनीति के पंडित समझ रहे हैं कि वे आगामी नगर निगम चुनाव में भी अपना पूरा दखल रखेंगे। हालांकि यह इस पर निर्भर करेगा कि नया षहर अध्यक्ष कौन बनेगा? वह जल्द ही क्लीयर हो जाएगा।

दूसरी ओर पिछला चुनाव हारे महेन्द्र सिंह रलावता ने भी अपनी जमीन नहीं छोडी है। वे भी अपना ऑफिस नियमित रूप से खोल रहे हैं और स्थानीय ज्वलंत मसलों पर मुखर हैं। हाल ही दरगाह मंदिर विवाद पर प्रेस कॉन्फ्रेंस की। फिर उर्स की व्यवस्थाओं को लेकर जिला कलेक्टर से मिले। कार्यकर्ताओं के पारीवारिक कार्यक्रमों में गर्मजोषी से षिकरत कर रहे हैं। मोटे तौर पर भले ही यह समझा जाए कि उन्हें तीसरी बार टिकट नहीं मिल पाएगा, मगर राजनीति में कुछ भी संभव है। इसकी नजीर भी है। यह कहना कि उन्हें फिर मौका मिलना नामुमकिन है, उचित नहीं होगा। वजह यह कि विपरीत परिस्थितियों के बावजूद पिछले चुनाव में मतातंर कम करने में कामयाब रहे। उनकी अतिरिक्त सक्रियता पर्दे के पीछे का सच बयां कर रही है कि वे अपने छोटे भाई पार्शद गजेन्द्र सिंह रलावता व पुत्र षक्ति सिंह रलावता का राजनीतिक भविश्य भी सुरक्षित रखना चाहते होंगे।

कुल जमा कांग्रेस की सक्रियता तब परवान पर होगी, जब षहर जिला अध्यक्ष की नियुक्ति हो जाएगी। 


बुधवार, 4 दिसंबर 2024

कौन थे दीवान रायबहादुर हरबिलास शारदा?

इन दिनों दीवान राय बहादुर हरबिलास शारदा का नाम चर्चा में है। इसलिए कि उनकी पुस्तक में लिखी बात को आधार बना कर दरगाह के नीचे शिव मंदिर होने का दावा किया गया है। उन्होंने अजमेर: ऐतिहासिक और वर्णनात्मक Ajmer: Historical and Descriptive पुस्तक लिखी। इसी के कुछ अंश को बतौर सबूत पेश किया गया है।

कानून से उनका गहरा नाता था। वे रजिस्ट्रार, सब जज व अजमेर-मारवाड़ के स्थानापन्न जज के रूप में काम करने के बाद 1924 में सेवा से निवृत्त हुए। उन्होंने बाल विवाह प्रथा रोकने के लिए कानून बनाया, जिसे शारदा एक्ट के नाम से जाना जाता है। दिलचस्प बात ये है कि वे खुद बाल विवाह की चपेट में आए थे। इतिहास में दर्ज यह तथ्य कई साल पहले दैनिक भास्कर में वरिष्ठ पत्रकार श्री सुरेश कासलीवाल ने उजागर किया था। अपनी स्टोरी में उन्होंने खुलासा किया था कि शारदा की पहली शादी मात्र साढ़े नौ साल की उम्र में 16 नवंबर 1876 को श्री लालचंद की पुत्री काजीबाई के साथ हुई थी। कम उम्र में ही काजीबाई का निधन हो गया। इस पर उन्होंने 1889 में दूसरी शादी की, मगर दूसरी पत्नी की भी कुछ समय बाद निधन हो गया। इस पर उन्होंने 1901 में तीसरी शादी की। उन्होंने अपनी पुस्तक री कलेक्शंस एंड रेमीनीसेंसेज में लिखा कि कम उम्र में ही शादी हो जाने के कारण लड़कियों की कम उम्र में ही मृत्यु हो जाती है क्यों कि वे शारीरिक रूप से परिपक्व नहीं हो पातीं।

कुछ वर्ष पहले राजस्थान पत्रिका ने इस विषय पर काम किया और वे शारदा के प्रपौत्र की बहू ममता शारदा का साक्षात्कार लेने में कामयाब हो गया। ममता शारदा ने बताया कि हरबिलास शारदा की पत्नी पार्वती गांव की थी। इसलिए उनका गांव में आना-जाना लगा रहता था। गांव में बालक बालिकाओं की कम उम्र में शादी को देखते हुए उन्होंने कुछ करने की ठान ली। उन्होंने कई पुस्तकों का अध्ययन कर वैज्ञानिक आधार पर शारीरिक और मानसिक रूप से परिपक्वता की उम्र के अनुसार विवाह का एक प्रस्ताव बनाया। वे इसे लेकर तत्कालीन ब्रिटिश अधिकारियों के पास गए। ब्रिटिश अधिकारियों को वह प्रस्ताव बहुत पसंद आया। तत्कालीन ब्रिटिश भारत में 1 अक्टूबर 1929 को को शारदा एक्ट पारित किया गया। एक अप्रैल 1930 को यह कानून लागू हो गया। इसके बाद बाल विवाह एक अपराध की श्रेणी में आ गया। इसके बाद लड़की की 18 वर्ष एवं लड़के के विवाह की आयु 21 वर्ष रखी गई। हरविलास शारदा ने अभियान चलाकर बाल विवाह का विरोध किया। समाज सुधार के विशेष प्रयास के लिए ब्रिटिश सरकार ने उन्हें दीवान राय बहादुर की उपाधि प्रदान की। हरविलास शारदा का जन्म 3 जून, 1867 को राजस्थान के अजमेर शहर में हुआ था। उनके पिता धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे, जिसका प्रभाव उनके जीवन पर पड़ा। उन्होंने आगरा कॉलेज से स्नातक की डिग्री प्राप्त की। शिक्षा पूरी करने के बाद वे अदालत में अनुवादक के पद पर कार्य करने लगे। वे राजस्थान में जैसलमेर के राजा के अभिभावक रहे और 1902 में अमजेर के कमिश्नर के कार्यालय में वर्नाक्यूलर सुपरिटेंडेट के पद पर कार्य किया। रजिस्ट्रार, सब जज और अजमेर-मारवाड़ के स्थानापन्न जज के रूप में काम करने के बाद 1924 में वे इस सेवा से निवृत्त हुए।

वर्ष 1924 में हरबिलास शारदा अजमेर-मेरवाडा से केंद्रीय विधानसभा के सदस्य निर्वाचित हुए। वे पुनः इस क्षेत्र से 1930 में निर्वाचित हुए थे। उनका 20 जनवरी, 1952 को निधन हो गया।

रविवार, 1 दिसंबर 2024

अजमेर में अमन को भंग नहीं किया जा सकेगा

सबके हित जुड़े होने के कारण है अजमेर में सांप्रदायिक सौहार्द्र

महान सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती का सालाना उर्स एक माह बाद ही है। इस बीच दरगाह शरीफ में शिव मंदिर होने का दावा करते हुए कोर्ट में अर्जी पेश होने के कारण पूरा देश उद्वेलित है। सारे न्यूज चैनल्स पर गरमागरम बहस हो रही है। आशंका के बादल छाये हुए हैं। मगर जानकार मानते हैं कि बहस-मुबाहिसा कितना भी हो, यहां के अमन-चौन को भंग नहीं किया जा सकेगा। 

वस्तुतः दरगाह पूरी दुनिया में सांप्रदायिक सौहार्द्र की मिसाल है। जाहिर तौर पर उसमें ख्वाजा साहब की शिक्षाओं की भूमिका है। साथ ही हिंदुओं की उदारता, कि वे अपने धर्म के प्रति कट्टर नहीं और अन्य धर्मों के प्रति भी पूरा सम्मान भाव रखते हैं। यदि वजह है कि इस दरगाह में साल भर में आने वाले जायरीन में हिंदुओं की तादाद भी काफी है। ऐसे में यह संदेश जाना स्वाभाविक है कि यह मरकज सांप्रदायिक सौहार्द्र का समंदर है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण ये है कि जब जब भी देश भर में किसी वजह से सांप्रदायिक सौहार्द्र बिगड़ा और दंगे हुए, अजमेर शांत ही बना रहा।

असल में सुकून की बड़ी वजह है, सभी धर्मों व वर्गों के लोगों का हित साधन। उर्स मेले में आने वाले लाखों जायरीन यहां के अर्थ तंत्र की धुरि हैं। मेला ही क्यों, अब तो साल भर यहां जायरीन का तांता लगा रहता है। भरपूर खरीददारी के कारण आम दुकानदार की अच्छी कमाई होती है। सैकड़ों होटलों का साल भर का खर्चा अकेले उर्स मेले के दौरान निकल जाता है। छोटी छोटी मजदूरी करने वाले भी इस दौरान खूब कमाते हैं। रहा सवाल खादिमों का तो वे सूफी मत को मानने वाले होने के कारण उदार प्रवृत्ति के हैं, मगर साथ ही उनकी आजीविका ही जायरीन पर टिकी हुई है। हालांकि अब खादिम भी अन्य व्यवसाय करने लगे हैं, फिर भी उनकी मुख्य आजीविका का जरिया खिदमत से होने वाली अच्छी आय ही है। स्वाभाविक रूप से जब वे दिल खोल कर खर्च करते हैं तो उसका लाभ आम दुकानदार को होता है। दरगाह शरीफ में लाखों रुपए का गुलाब चढ़ता है, जिसकी खेती पुष्कर में अधिसंख्य हिंदू करते हैं। समझा जा सकता है कि जिस शहर में जायरीन या पर्यटक कह लीजिए, के आगमन से अर्थ चक्र घूमता हो, वहां स्वाभाविक रूप से सभी का हित इसमें जुड़ा हुआ है कि यहां शांति कायम रहे। यहां शांति रहेगी तो बाहर से आने वाला भी बेखौफ आएगा। इसका यहां हर वर्ग को ख्याल रहता है। जब भी कोई छुटपुट घटना होती है तो सभी की कोशिश रहती है कि विवाद जल्द निपटा लिया जाए।

इन सबके बावजूद अजमेर को सांप्रदायिक तौर पर संवेदनशील माना जाता है, उसकी वजह है अंतरराष्ट्रीय व राष्ट्रीय स्तर का आंतकवाद। इसी कारण दरगाह की अतिरिक्त सुरक्षा की जाती है। एक बार तो दरगाह में बम ब्लास्ट भी हो चुका है, जिसके आरोपियों को हाल ही सजा सुनाई गई है। इस घटना के बाद अब यहां सुरक्षा पर ज्यादा ध्यान दिया जाने लगा है। उससे आभास ये होता है कि यहां खतरा है, मगर सच्चाई ये है कि अजमेर का नागरिक आम तौर पर शांति पसंद है। वह किसी उद्वेग में नहीं बहता। शहर के ऐसे शांत मिजाज के कारण एक बार अजमेर आ चुके अधिकारी सेवानिवृत्ति के बाद अजमेर में ही बसना पसंद करते हैं।

बहरहाल, चाहे जिस वजह से अजमेर सुकून भरी जगह हो, मगर इसी वजह से यह सांप्रदायिक सौहार्द्र की मिसाल बना हुआ है।

शनिवार, 30 नवंबर 2024

कौन होगा एडीए अध्यक्ष?

राजस्थान में विधानसभा उपचुनाव में सफलता से उत्साहित भाजपा में सरकारी राजनीतिक नियुक्तियों की कवायद आरंभ हो गई है। कुछ नियुक्तियां बजट सत्र से पहले हो सकती हैं। कानाफूसी है कि अजमेर विकास प्राधिकरण में अध्यक्ष के लिए दावेदारों ने एक्सरसाइज तेज कर दी है। समझा जाता है कि अजमेर में अनुसूचित जाति की एक विधायक श्रीमती अनिता भदेल व सिंधी समुदाय से दूसरे विधायक वासुदेव देवनानी के रहते सामान्य वर्ग के वेश्य, ब्राह्मण व राजपूत का तरजीह मिलेगी। वणिक वर्ग में पूर्व जिला प्रमुख पुखराज पहाडिया का नाम सबसे उपर है। उन्होंने नागौर जिले के खींवसर विधानसभा क्षेत्र में उन्होंने पूरी गंभीरता से एडी चोटी का जोर लगा दिया। सफलता के श्रेय उनके खाते में भी दर्ज हो गया है। उन्हें लंबे समय से राजनीतिक लाभ नहीं मिल पाया है, इस कारण इस बार मौका मिल सकता है। वे साधन संपन्न भी हैं, जिसकी प्राधिकरण अध्यक्ष बनने में बहुत जरूरी है। दूसरे हैं पूर्व संघ महानगर प्रमुख सुनिल दत्त जैन। तीसरे हैं, प्रवीण जैन, जिन पर केन्द्रीय राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी का वरद हस्त है। कुछ लोग अजमेर नगर सुधार न्यास के पूर्व अध्यक्ष धर्मेश जैन का नाम भी ले रहे हैं। पिछला अधूरा कार्यकाल उन्हें आज तक सालता है। आरएसएस पदाधिकारियों से उनके अच्छे संबंध हैं। विकल्प के रूप में वे अपने पुत्र अमित जैन का नाम आगे कर सकते हैं। इसी प्रकार नगर निगम के पूर्व मेयर धमेन्द्र गहलोत भी प्रबल दावेदार है, मगर देवनानी से ताजा नाइत्तफाकी बाधा बन सकती है।

राजपूत वर्ग में अजमेर नगर परिषद के पूर्व सभापति सुरेन्द्र सिंह शेखावत का नाम चल रहा है, जो ताजा बदले समीकरण में विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी के नजदीक जा चुके हैं। ब्राह्मण समुदाय में भाजपा छोड चुके पार्षद ज्ञान सारस्वत की गिनती है, मगर पिछले विधानसभा चुनाव में बगावत करने के कारण बडी बाधा बनी हुई है। संघ का एक धडा आगामी निगम चुनाव से पहले उनकी पार्टी में दमदार वापसी चाहता है। केन्द्रीय मंत्री भूपेन्द्र यादव के करीबी जे के शर्मा भी लाइन में हैं, मगर वे पार्टी से निलंबित हैं। आरएसएस पृष्ठभूमि के वकील जगदीश राणा के नाम पर भी विचार चल रहा है। हालांकि किसी सिंधी के प्राधिकरण का अध्यक्ष बनने की बहुत कम संभावना है, मगर कोई साधन संपन्नता के दम पर बाजी मार भी सकता है। अजमेरशहर भाजपा अध्यक्ष रमेश सोनी की लॉटरी लग सकती है। महिलाओं में डॉ कमला गोखरू व भारती श्रीवास्तव के नाम हैं। जो भी बने, मगर उसमें देवनानी की स्वीकृति जरूर ली जाएगी।

 

गुरुवार, 28 नवंबर 2024

आजादी के बाद अजमेर के पहले कांग्रेस अध्यक्ष थे स्व श्री जीतमल लूनिया

अजमेर में 15 नवम्बर, 1905 को जन्मे श्री जीतमल लूनिया ने एम.ए. तक शिक्षा अर्जित की। वे सन् 1914 में इंदौर गए और स्वर्गीय श्री हरिभाऊ उपाध्याय के साथ मिल कर मालवा मयूर नामक मासिक पत्र का प्रकाशन शुरू किया। सन् 1916 में हिंदी साहित्य मंदिर की स्थापना की। सन् 1922 में उसका कार्यालय बनारस स्थानांतरित हो गया। इसके बाद स्व. श्री अर्जुन लाल सेठी के सुझाव पर सन् 1925 में अजमेर आ गए। यहां सस्ता साहित्य मंडल के नाम से प्रकाशन कार्य शुरू किया। उन्होंने अहसहयोग आंदोलन में भाग लिया और कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष चुने गए। सरकार ने उसे गैर कानूनी घोषित कर दिया और उन्हें एक साल तक कारावास में रखा गया। इसके बाद पत्नी श्रीमती सरदार बाई के साथ सत्याग्रह में भाग लिया और छह-छह माह तक कारावास भोगा। सन् 1933 में अजमेर सेवा भवन नामक संस्था की स्थापना की और अछूतोद्धार व राष्ट्रोत्थान के कामों में लग गए। सन् 1940 में फिर सत्याग्रह में भाग लिया और 1942 में फिर एक साल का कारावास भोगा। सन् 1947 में शहर कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए और 15 अगस्त को देश की आजादी पर नया बाजार स्थित राजकीय संग्रहालय पर तिरंगा झंडा फहराया। वे 1948 में नगर परिषद के अध्यक्ष चुने गए। सन् 1970 में दिल्ली में स्वतंत्रता सेनानी प्रशस्ति एवं ताम्रपत्र से सम्मानित किए गए। सन् 1973 में शराबबंदी सत्याग्रह में भाग लिया और जेल गए।

अजमेर एट ए ग्लांस से साभार