मंगलवार, 14 जनवरी 2025
पान नहीं खाए अब सैंया हमार ..
सोमवार, 13 जनवरी 2025
बेहतरीन फोटो जर्नलिस्ट महेश मूलचंदानी नटराज नहीं रहे
उनके निधन से पत्रकारिता और फोटोग्राफी क्षेत्र में शोक की लहर है। उनका योगदान हमेशा याद किया जाएगा। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें और उनके परिवार को इस कठिन समय में सहनशक्ति दें। बेशक पत्रकार जगत व स्वयंसेवी संस्थाओं ने उनका सहयोग किया, मगर आजीविका के लिए उन्होंने जो कडा संघर्ष किया, उसकी पीढा सिर्फ वे ही जानते होंगे। ऐसे कलाधर्मी का निधन फोटो जर्नलिस्म में करियर तलाशने वालों के लिए एक सबक है। ऐसे कलासेवी के परिवार को संबल देने के लिए पत्रकार संगठनों व सामाजिक संस्थाओं को आगे आना चाहिए।
उपेक्षा की शिकार सोनीजी की नसियां
इतनी विपरीत परिस्थियों के बाद भी यहां हजारों देशी व विदेशी पर्यटक आते हैं और यहां की विश्व स्तरीय बेजोड़ स्वर्ण कारीगरी, चित्रकारी, बेल्जियम व ठीकरी कांच के काम की बारीकी और सुंदरता देख कर दांतों तले उंगली दबा लेते हैं। अधिकतर पर्यटकों का कहना रहता है कि हमें इस जगह की जानकारी किसी ने दी थी, इसे न देखते तो अजमेर आना सफल नहीं होता। हम अब अपने मिलने वालों को इस जगह को देखने भेजेंगे। इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि बहुत से अजमेर वासियों ने ही इसे नहीं देखा है। पर्यटन विभाग को इस स्थान के विकास और पर्यटन की संभावनाओं को देखते हुए उचित कदम उठाना चाहिए।
ज्ञातव्य है कि लाल पत्थरों से बनी ऊंचे शिखरों वाली यह इमारत जैन तीर्थंकर भगवान आदिनाथ का मंदिर है। इसका निर्माण राय बहादुर सेठ मूलचंद सोनी ने 1864-65 में करवाया। सन् 1885 में इसमें प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव की प्रतिमा स्थापित करवाई। यह दो मंजिला इमारत सुंदर रंगों से पुती हुई है। इसके प्रांगण में 26 मीटर ऊंचा धवल मानस्तम्भ दर्शनीय है। पीछे की ओर पर्यटकों के लिए बने दो मंजिला भवन में जैन तीर्थंकरों के कल्याणक, तेरह द्वीप, सुमेरू पर्वत, भगवान की जन्म स्थली - अयोध्या नगरी आदि की सुंदर रचना शोभायमान है। यह संपूर्ण रचना स्वर्णखचित वर्काे से ढकी है। इसे ‘स्वर्ण नगरी‘ भी कहते है। यहॉं दीवारों व छत पर की गई पच्चीकारी व कॉंच का कार्य भी दर्शनीय है। इसे लाल मंदिर, सोने का मंदिर व कांच का मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।
-तेजवानी गिरधर 7742067000
शनिवार, 11 जनवरी 2025
अजमेर में धार्मिक पर्यटन की अपार संभावना
आनासागर बहुत सुरम्य झील है, लेकिन वह अरसे से उपेक्षा का शिकार है। झील की दुर्दशा देख कर तो रोना आता है। कभी यह नियमित सफाई के अभाव में बदबू मारती है तो कभी जलकुंभी अपने पांव पसार लेती है। झील के किनारे सेवन वंडर्स पर्यटकों को आकर्षित करने की दिशा में एक अच्छा कदम है, वहां जायरीन की आवक देखी जा सकती है। यह बात अलग है कि उसे आनासागर की जमीन को पाट कर बनाने के कारण वह विवाद में है और उसे तोडने के आदेश हो रखे हैं।
आनासागर से भी अधिक आकर्षक है तारागढ़, मगर उसे एक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने पर कोई ध्यान नहीं दिया गया है। वहां आमतौर पर दरगाह जियारत को आने वाले जायरीन ही आते हैं, जब कि वह बहुत खूबसूरत पर्यटन स्थल बनाया जा सकता है। सच तो यह है कि अनेक अजमेर वासियों तक नहीं देखा होगा। वह ऐतिहासिक दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण है। तारागढ संपर्क सडक पर सम्राट पृथ्वीराज चौहान स्मारक बना तो दिया गया, मगर उसे देखने इक्का दुक्का लोग ही जाते हैं। साल में दो बार जरूर वहां कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जिनमें आयोजकों को ही भीड जुटानी होती है। तारागढ पर यदि भोजन व ठहरने की पर्याप्त सुविधाएं हों तो पर्यटक उस सुरम्य दर्शनीय स्थल को देखे बिना नहीं लौटेगा। कम से कम एक दिन तो बिताना चाहेगा। तारागढ़ से ढ़ाई दिन के झौंपड़े तक रोप-वे बनाने से भी पर्यटक आकर्षित हो सकता है। पिछली कांग्रेस सरकार के दौरान राजस्थान पर्यटन विकास निगम के अध्यक्ष धर्मेन्द्र सिंह राठौड ने तारागढ पर स्थित रेलवे के एक भवन को होटल के रूप में विकसित करने का प्रस्ताव रखा था, मगर वह राजनीति की भेंट चढ गया।
यदि पर्यटकों को कम से कम एक दिन ठहरने के लिए आकर्षित करना है तो अजमेर व पुष्कर में हर आय वर्ग के लिए बजट होटल विकसित किए जाने चाहिए। सरकार को इसके लिए सबसीडी की घोषणा कर निजी क्षेत्र को प्रोत्साहित करना चाहिए।
एक बात और। ऐतिहासिक अकबर के किले और महाराणा प्रताप स्मारक पर लाइट एंड साउंड शो आरंभ तो किए गए, पर न जाने क्यों वे पर्यटकों को आकर्षित करने में कामयाब नहीं हुए। शायद ठीक से प्रचार-प्रसार न करने की वजह से।
देसी-विदेशी पर्यटकों की सुविधा के लिए किशनगढ के पास हवाई अड्डा तो बना दिया गया, मगर उसकी अपेक्षित उपयोगिता साबित नहीं हो पाई। बीच बीच में उसकी ओर आकर्षित करने के छिटपुट प्रयास तो हुए हैं, मगर नतीजा ढाक के तीन पात।
-तेजवाणी गिरधर 7742067000
गुरुवार, 9 जनवरी 2025
किसी जमाने में अजमेर में कुत्ताशाला हुआ करती थी
बहरहाल, सवाल ये कि क्या कुत्ताशाला दुबारा नहीं खोली जानी चाहिए?

