गुरुवार, 30 जनवरी 2025

रचनात्मक राजनीति के प्रेरणा स्रोत: स्व. श्री रामनिवास मिर्धा

वर्तमान में जबकि हम ऐसे दौर में जी रहे हैं, जिसमें राजनीति भ्रष्टाचार, स्वार्थपरता व पदलोलुपता के कारण बदनाम हो चली है, ऐसे में सहसा पूर्व केन्द्रीय मंत्री स्वर्गीय श्री रामनिवास मिर्धा का नाम जेहन उभर आता है, जिनका पूरा जीवन सिद्धांतों के लिए समर्पित रहा। वे राजनीति में ईमानदारी और सकारात्मक व रचनात्मकता की सजीव पाठशाला थे। उनकी स्मृति आज भी नई पीढ़ी को राजनीति के जरिए जनसेवा का पाठ पढ़ाती है।

आइये 29 जनवरी को उनकी पुण्य तिथि के मौके पर उनके बारे में कुछ जानेंः-

स्वर्गीय श्री मिर्धा विलक्षण प्रतिभा व व्यक्तित्व के धनी थे। उनकी गिनती सिद्धांतवादी राजनीतिज्ञों, चिंतकों, दार्शनिकों के रूप में होती है। एक किसान परिवार में जन्म लेने के बाद ईमानदारी व कर्मठता के दम पर उन्होंने लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ तक अपने बौद्धिक, राजनीतिक व प्रशासनिक कौशल का लोहा मनवाया। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि ये मानी जाती है कि अनेकानेक उच्च पदों पर रहते हुए भी वे सौम्य व शांत स्वभाव के बने रहे और उनका पूरा जीवन निष्कलंक रहा।

उनका जन्म मूल रूप से राजस्थान के नागौर जिले के कुचेरा गांव निवासी जाने-माने किसान नेता श्री बलदेवराम मिर्धा के घर 24 अगस्त, 1924 को बाड़मेर जिले के जसोल गांव में हुआ, जबकि वे पुलिस अधिकारी थे। स्व. श्री मिर्धा ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय, लखनऊ विश्वविद्यालय और जिनेवा-स्विट्जरलैंड के ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज में एमए व एलएलबी की उच्च शिक्षा हासिल की। उन्होंने अपना कैरियर राजस्थान प्रशासनिक सेवा के अधिकारी के रूप में शुरू किया, मगर जल्द ही इस्तीफा दे कर सक्रिय राजनीति में आ गए। वे सन् 1953 से 1967 तक राजस्थान विधानसभा के सदस्य रहे और इस दरम्यान 1954 से 1057 तक कृषि, सिंचाई व यातायात विभाग के मंत्री और 1957 से 1967 तक विधानसभा के अध्यक्ष का महत्वपूर्ण दायित्व निर्वहन किया। इसके बाद 1967 में वे राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए और 1970 से 1980 के दौरान केन्द्र सरकार के मंत्री रहे और विदेश, संचार, कपड़ा, सिंचाई, स्वास्थ्य व परिवार कल्याण सहित अनेक विभागों के मंत्रालयों का कामकाज देखा। वे 1977 से 1980 तक राज्यसभा के उपसभापति भी रहे। वे 1991 से 1996 तक बाड़मेर से लोकसभा सदस्य भी रहे। वे सिक्यूरिटी व बैंकिंग ट्रांजेक्शन में अनियमितता के लिए गठित संयुक्त संसदीय समिति के अध्यक्ष भी रहे। उन्होंने भारत-अमेरिकी संस्कृति और शिक्षा पर उप आयोग के सह अध्यक्ष के रूप में काम किया और 1993 से 1997 तक यूनेस्को के एक्जीक्यूटिव बोर्ड के सदस्य भी रहे। वे इंडियन हैरिटेज सोसायटी के संस्थापक अध्यक्ष, इंडियन फेडरेशन ऑफ यूएन एसोसिएशन के अध्यक्ष, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र के ट्रस्टी और संगीत नाटक अकादमी व ललित कला अकादमी के अध्यक्ष भी रहे। उन्होंने अनेक स्थानों पर नृत्य केन्द्रों की स्थापना करवाई। पैंतीस वर्ष से कम आयु के कलाकारों को युवा पुरस्कार देने की योजना उन्हीं के दिमाग की उपज थी। उन्हीं के कार्यकाल में संगीत नाटक अकादमी की झांकी को गणतंत्र दिवस समारोह में प्रथम पुरस्कार हासिल हुआ। गत 29 जनवरी 2010 को वे इस फानी दुनिया को सदा के लिए अलविदा कर गए।

स्वर्गीय श्री मिर्धा की धर्मपत्नी का नाम श्रीमती इंदिरा मिर्धा था। उनके घर-आंगन में तीन पुत्र व एक पुत्री ने जन्म लिया। उनके एक पुत्र श्री हरेन्द्र मिर्धा वर्तमान में राजस्थान के प्रमुख कांग्रेस नेताओं में शुमार हैं, जिनका विवाह राजस्थान विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष रहे श्री परसराम मदेरणा की पुत्री रतन मिर्धा के साथ हुआ। उन्होंने राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई और 1998 से 2004 तक काबीना मंत्री के रूप में सार्वजनिक निर्माण विभाग का काम देखा। वे वर्तमान में नागौर से कांग्रेस विधायक हैं। उनके एक पुत्र व एक पुत्री हैं। पुत्र श्री रघुवेन्द्र मिर्धा की गिनती उभरते हुए कांग्रेस नेताओं में होती है। नागौर जिले का युर्वा वर्ग उनमें अपना भविष्य तलाशता है।

-तेजवानी गिरधर

7742067000


मंगलवार, 28 जनवरी 2025

एक दूसरे के पर्याय डॉ. रशिका महर्षि - दिलीप महर्षि

एक कहावत है कि हर सफल आदमी की कामयाबी में, उसके वजूद के पीछे औरत का हाथ होता है। यह मीडिया फोरम की उपाध्यक्ष डॉ. रशिका महर्षि के पति स्वर्गीय श्री दिलीप महर्षि पर सटीक बैठती है। कहावत का उलट भी इस दंपति पर फिट बैठता है। डॉ. रशिका महर्षि की सफलता में दिलीप महर्षि के संबल ने ही अपनी भूमिका अदा की है।

दिलीप महर्षि आयुर्वेद विभाग में काम करते थे। स्वाभाविक रूप से नौकरी के अतिरिक्त सार्वजनिक जीवन में उनकी भागीदारी कम ही नजर आई, मगर सच यह है कि नौकरी से पहले वे अजमेर व पुश्कर के पुराने घरानों से संबंद्ध रहे। शहर की धडकन पर उनकी पकड थी। बिंदास व्यक्तित्व। दंबग पर्सनेलिटी। बडा रुतबा था। सिद्धांत के पक्के। इसी वजह से उनके चेहरे पर दृढता चमकती थी, मगर नारियल की तरह भीतर से कोमल, सहृदय। बहुत सूझबूझ। कूल माइंडेड। विलक्षण व्यक्तित्व। 

चंद साल पहले डॉ. रशिका महर्षि ने पति श्री दिलीप महर्षि को अपनी किडनी दान की थी। और अपना जीवन सार्थक कर लिया। यूं समझें कि दिलीप के शरीर में रशिका की किडनी नहीं, बल्कि उनके प्राण प्रतिस्थापित थे। एक दूसरे के बीच अटूट स्नेह। एक दूसरे के पूरक। बहादुर औरत ने पोस्ट ऑपरेटिव समस्याओं का किस प्रकार हिम्मत से मुकाबला किया, वह सभी शुभचिंतकों के संझान में है। पति की सेवा का अनूठा उदाहरण। साथ में बच्चों की बेहतरीन परवरिश में कोई कमी नहीं। इस शख्सियत का रोचक पहलु ये कि दैनंदिन पारीवारिक व्यस्तताओं के बाद भी सार्वजनिक जीवन में भरपूर सक्रियता उनके अदम्य उत्साह का प्रमाण है। संघर्ष में भी उत्सव तलाशने की अद्भुत कीमिया। ऊर्जा से लबरेज इस महिला से सकारात्मकता की किरणें फूटती हैं। ऐसी सफल नारी का संबल थे दिलीप महर्षि। हर कदम पर उनके साथ खडे नजर आए। पूर्णतः खिले इस पुष्प को जीवनी शक्ति मिलती रही जड में मौजूद दिलीप महर्षि से। अब मलाल सिर्फ इतना कि अपनी किडनी दान देकर जीवन देने के बाद प्रकृति ने दूसरे मार्ग से हठात जीवन छीन लिया। अफसोस। अफसोस इस बात का भी कि पारीवारिक जिम्मेदारियों, व्यस्तताओं के चलते डॉ. रशिका महर्षि में अध्यात्म और पत्रकारिता के क्षेत्र में जिन नए आयामों और उंचाइयों को छूने की संभाव्यता थी, वह भ्रूण अवस्था में ही रह गई। उम्मीद है कि बिंदास रशिका वज्राघात से उबर कर नए प्रतिमान स्थापित करने में कामयाब होंगी।

सोमवार, 27 जनवरी 2025

अजमेर के विकास पर अंग्रेजी हुकूमत की छाप

दरगाह और पुष्कर को छोड़ कर अगर अजमेर कुछ है तो उसमें अंग्रेज अफसरों का योगदान है। सीपीडब्ल्यूडी, सेन्ट्रल बोर्ड ऑफ सेकंडरी एज्युकेशन, कलेक्ट्रेट बिल्डिंग, सेन्ट्रल जेल, पुलिस लाइन, टीचर्स ट्रेनिंग कॉलेज, लोको-केरिज कारखाने, डिविजन रेलवे कार्यालय बिल्डिंग, मार्टिन्डल ब्रिज, सर्किट हाउस, अजमेर रेलवे स्टेशन, क्लॉक टावर, गवर्नमेन्ट हाई स्कूल, सोफिया कॉलेज व स्कूल, मेयो कॉलेज बिल्डिंग, लोको ग्राउण्ड, केरिज ग्राउण्ड, मिशन गर्ल्स स्कूल, अजमेर मिलिट्री स्कूल, नसीराबाद छावनी, सिविल लाइंस, तारघर, आर.एम.एस., गांधी भवन, नगर निगम भवन, जी.पी.ओ., विक्टोरिया हॉस्पिटल, मदार सेनीटोरियम, फॉयसागर, भावंता से अजमेर की वाटर सप्लाई, पावर हाउस की स्थापना, रेलवे हॉस्पिटल, दोनों रेलवे बिसिट आदि का निर्माण ब्रिटिश सरकार के अधिकारियों के विजन का ही परिणाम था, जिससे अजमेर के विकास की बुनियाद पड़ी। आज अजमेर का जो स्वरूप है, उस पर अंग्रेजों की छाप स्पष्ट देखी जा सकती है। अजमेर में शिक्षा के विकास में आर्य समाज का महत्वपूर्ण योगदान है, लेकिन ईसाई मिशनीज की भूमिका भी कम नहीं है। सच्चाई तो ये है कि ऊंचे-ऊंचे ओहदों पर पहुंचे अनेक लोगों की शिक्षा में ईसाई मिशनरीज की स्कूलों का रोल रहा है। आज भी हालत ये है कि अधिसंख्य संपन्न घराने अपने बच्चों को मिशनरीज में पढ़ाने के लिए एडी-चोटी का जोर लगा देते हैं। मोटा-मोटा चंदा देने तक को राजी रहते हैं। यहां तक कि महान भारतीय संस्कृति के झंडाबरदार और मिशनरीज के खिलाफ समय-समय पर आंदोलन छेडने वाले नेताओं के बच्चे भी मिशनरी स्कूलों में ही पढ़ते हैं।


रविवार, 26 जनवरी 2025

जाने-माने फोटो जर्नलिस्ट श्री मोती माखीजा नहीं रहे

चंद दिन पहले अजमेर ने सुपरिचित वरिष्ठ फोटो जर्नलिस्ट श्री महेश नटराज उर्फ महेश मूलचंदानी को खोया है। इहलोक से उनकी विदाई की पीडा अभी ताजा है कि एक और जाने-माने वरिष्ठ फोटो जर्नलिस्ट श्री मोती नीलम उर्फ मोती माखीजा हमको अलविदा कह गए। वे सोनी जी की नसिंया से नया बाजार जाने वाले रास्ते पर नीलम स्टूडियो के नाम से व्यवसाय करते थे, इसी कारण उन्हें लोग मोती नीलम के नाम से जानते थे। अस्सी-नब्बे के दशक में उनका नाम अजमेर के टॉप के फोटो जर्नलिस्ट्स में हुआ करती थी। उस दौर में शायद की कोई ऐसा ईवेंट हो, जो उन्होंने कवर नहीं किया हो। लंबे समय तक दैनिक नवज्योति से जुडे रहे। उन्होंने अपने करियर में कई ऐतिहासिक और यादगार क्षणों को अपने कैमरे में कैद किया। उनकी खींची हुई तस्वीरें न केवल समाचारों की गहराई को दर्शाती थीं, बल्कि समाज के संवेदनशील मुद्दों को भी उजागर करती थीं। पिछले कुछ सालों से अस्वस्थ थे। श्री मोती माखीजा का निधन फोटोग्राफी और पत्रकारिता जगत के लिए एक बड़ी क्षति है। उनका योगदान फोटोजर्नलिज्म के क्षेत्र में हमेशा याद किया जाएगा। उनके ही पदचिन्हों पर चलते हुए उनके सुपुत्र श्री जय माखीजा ने आज फोटो जर्नलिस्म के क्षेत्र में खासा नाम कमाया है। वे राजस्थान पत्रिका से जुडे हुए हैं। अजमेरवासी उन्हें आए दिन फेसबुक लाइव पर देखते रहते हैं। अजमेरनामा न्यूज पोर्टल उनके उज्ज्वल जीवन की कामना करता है। स्वर्गीय श्री मोती नीलम के निधन से जो स्थान रिक्त हुआ है, उसकी पूर्ति असंभव है। अजमेरनामा न्यूज पोर्टल उनको भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है।


मंगलवार, 21 जनवरी 2025

अजयपाल जोगी, काया राख निरोगी

अनेक इतिहासकार मानते हैं कि अजमेर के प्रथम शासक अजयराज ही अजयपाल जोगी थे, जिनके नाम लेने मात्र से लोग स्वस्थ हो जाया करते थे। प्रसंगवश बाबा अजयपाल के बारे में और अधिक जानकारी भी ले लें।

अजयपाल बाबा का स्थान फॉयसागर से छह किलोमीटर दूर अजयसर गांव में है। इतिहासविद श्री शिव शर्मा के अनुसार विख्यात पत्रिका कल्याण् (सन् 1967) में पृ. 387 पर उल्लेख मिलता है कि पुष्कर में सृष्टि यज्ञ के समय प्रजापति ब्रह्मा ने भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने के लिए चार शिवलिंग स्थापित किए थे। उनमें एक अजगंध महादेव यहां प्रतिष्ठित किया था। संभवत इस अज नाम से ही अजयसर गांव बसाया गया। अब इस शिवलिंग का कोई अवशेष नहीं मिलता है। बारहवीं सदी में चौहान राजा अर्णाेराज ने यहां जो शिव मंदिर बनवाया, वह आज भी विद्यमान है। बाद में यह स्थान अजयपाल बाबा के नाम से विख्यात हुआ। गांव के लोग बताते हैं कि सपादलक्ष के राजा अजयपाल चौहान ने छठी सदी में बीठली पहाड़ी (अजयमेरू) पर एक सैनिक चौकी स्थापित की और अजयसर गांव बसाया। अपनी वृद्धावस्था में यह राजा सन्यासी के रूप में इसी स्थान पर रहा। वह तपस्या के बल पर सिद्ध जोगी हो गया था और इसीलिए अजयपाल बाबा कहा जाने लगा। किंतु कुछ इतिहासकार इस मान्यता को गलत मानते हैं क्योंकि उस समय तक नाथ पंथ का आरंभ नहीं हुआ था। बारहवीं सदी में मच्छेन्द्र नाथ (मत्स्येन्द्र) ने इस साधना पद्धति का आरंभ किया था। इसके बाद ही यह स्थान नाथ बाबा या नाथ जोगियों के साधना स्थल के रूप में विख्यात हुआ होगा। चौहान राजा अजयराज द्वितीय का समय बारहवीं सदी था वह भी आयु के अंतिम प्रहर में सन्यासी हो गया था। लेकिन हो सकता है कि वह यहां इस घाटी में रहा हो और उसी के नाम पर यह स्थान विख्यात हो गया हो। उधर अजमेर का गुर्जर समाज का मानना है कि अजैपाल गुर्जर जाति का एक सिद्ध पुरुष था। वह पक्का शिवभक्त एवं नाथ पंथ में दीक्षित था। उसके पास उच्च कोटि की तांत्रित सिद्धियां थीं। वह बकरी चराया करता था। उसके तपोबल से ही यह घाटी साधना स्थली बनी और उसी के नाम पर विख्यात हुई। इस संदर्भ में कहावत भी प्रचलित है- अजयपाल जोगी, काया राखे निरोगी। मुस्लिम समाज में इसी जोगी को अब्दुल्ला बियाबानी, भूखे को रोटी, प्यासे को पानी कहा गया है। इस अजयपाल बाबा की यहां एक सोटाधारी प्रतिमा है। प्रतिवर्ष भाद्रपद माह में दूसरे पखवाड़े के छठे दिन यहां बाबा का मेला लगता है, जिसमें दूर-दूर से कनफटे जोगी आते हैं। 

अजयसर में बाबा अजयपाल के सिर की समाधि स्थापित है और धड़ की समाधि गुजरात के भुज कच्छ जिले के अंजार में स्थित है। अजयसर पर मुसलमानों की विशाल सेना का आक्रमण होने पर अजयपाल ने देखा कि संख्या बल ज्यादा होने से बचना मुश्किल है, तब विर्धमी के हाथों मरने के बजाय उन्होंने अपने हाथों अपना ही सिर काटकर आक्रमणकारियों पर हमला किया। बिना सिर के अजयपाल को लड़ते देखकर मुस्लिम सेना भाग खड़ी हुई। भागती सेना का पीछा करते हुए अजयपाल अंजार तक जा पहुंचे, जहां उनका धड़ निष्प्राण होकर गिर पड़ा। अंजार में बाबा अजयपाल का समाधि स्थल बना हुआ है।

अजयपाल बाबा की आध्यात्मिक शक्ति को व्यक्त करने वाली एक लोककथा बहुत प्रचलित है। रावण के सिपाही उनसे कर मांगने आए। उन्होंने सैनिकों को कहा- रावण की लंका का नक्शा इस जमीन की मिट्टी पर बनाओ। सैनिकों ने वैसा ही किया। तब बाबा ने उंगली से लंका के महल का एक कंगूरा मिटा दिया और उधर वास्तव में ही लंका में रावण के महल का एक कंगूरा टूट गया था। सैनिक उनका रूहानी रूप देखकर डर गए और यहां से लौट गए। इस लोककथा की सच्चाई कुछ और ही है- अजमेर के चौहान राजा सोमेश्वर ने लंकेश की उपाधि धारण की थी और उसके साथ अजयपाल जोगी की तकरार हो गई थी। उसका अहंकार दूर करने के लिए बाबा ने अपनी रूहानी ताकत के सहारे तारागढ़ का एक कंगूरा तोड़ दिया था। यह जोगी ख्वाजा साहब का भी समकालीन था। इस प्रसंग से संकेत मिलता है कि यह स्थान शक्ति साधना का केन्द्र भी था।

-तेजवाणी गिरधर 774206700