मंगलवार, 11 फ़रवरी 2025

ढ़ाई प्याला शराब पीती है देवी मां

ये सुनी-सुनाई बात नहीं। आंखों देखी है। काली माता की एक मूर्ति ढ़ाई प्याला शराब पीती है। यह नागौर जिले में मुख्यालय से 105 किलोमीटर दूर, रियां तहसील में, मेड़ता से जैतारण जाने वाले मार्ग पर स्थित गांव भंवाल के एक मंदिर में है। इसकी गिनती राजस्थान के प्रसिद्ध शक्तिपीठों में होती है। इसकी बहुत मान्यता है। मंदिर तक जाने के लिए मेड़ता रोड में हर वक्त वाहन उपलब्ध रहते हैं।

तकरीबन तीस साल पहले मैंने स्वयं ने इस मंदिर के दर्शन किए थे। कुछ मित्रों के साथ एक जीप में मुझे वहां जाने का मौका मिला। वहां के नियम के मुताबिक, जिन भी मित्रों के पास बीड़ी-सिगरेट या तम्बाकू था, उसे मंदिर के बाहर ही रख दिया। चमड़े के बेल्ट व पर्स भी बाहर ही रखे। हमने शराब की एक बोतल के साथ मंदिर में प्रवेश किया। जब हमारा नंबर आया तो पुजारी ने हमसे बोतल लेकर उसे खोला और उनके पास मौजूद चांदी एक प्याले में शराब भरी। वह प्याला उन्होंने मूर्ति के होठों पर रखा। देखते ही देखते प्याला खाली हो गया। फिर दूसरा प्याला पेश किया। वह भी खाली हो गया। तीसरे प्याले में से आधा ही खाली हुआ। विशेष बात ये थी कि हम तो इस नजारे को थोड़ी दूर से देख रहे थे, मगर जब भी पुजारी प्याला मूर्ति के होंठों पर रखता तो खुद का मुंह हमारी ओर कर लेता। अर्थात वह स्वयं इस दृश्य को नहीं देख रहा था। कदाचित यह परंपरा रही हो कि पुजारी इस चमत्कार को बेहद नजदीक से नहीं देखता हो। हमारे लिए यह वाकई चमत्कार ही था। हमने जब पुजारी से इस बाबत पूछा कि यह कैसा चमत्कार है, तो उसने बताया कि कुछ बुद्धिजीवी और विज्ञान के विद्यार्थियों ने इसका रहस्य जानने की कोशिश की कि कहीं कोई तकनीक तो नहीं, मगर उन्हें भी चमत्कार को देख कर दातों तले अंगुली दबाने को विवश होना पड़ा। 


ऐसा नहीं कि मूर्ति हर व्यक्ति की शराब की बोतल ग्रहण कर रही हो। कुछ ऐसे भी थे, जिनकी बोतल देवी ने स्वीकार नहीं की। उनके बारे में बताया गया कि या तो अपनी जेब में चमड़े का पर्स या तम्बाकू पदार्थ लेकर गए थे, या फिर उनकी श्रद्धा में कहीं कोई कमी थी। इसे इस रूप में भी लिया जा रहा था कि देवी मां जिनकी मनोकामना पूर्ण करना चाहती हैं, केवल उनके हाथों लाई शराब ही ग्रहण करती हैं। 

मंदिर के इतिहास के बारे में जानकारी पता करने पर बताया गया कि भंवाल माता की मूर्ति खेजड़ी के एक पेड़ के नीचे प्रकट हुई थी। बताया जाता है कि इस स्थान पर राजा की फौज ने लूट के माल के साथ डाकुओं की घेराबंदी कर ली थी। इस पर उन्होंने काली मां को याद किया तो मां ने स्वयं प्रकट हो कर डाकुओं को भेड़-बकरियों के झुंड में तब्दील कर दिया। इस तरह से डाकू बच गए। उन्होंने ही लूट के माल से यहां मंदिर बनवाया था। वहां मौजूद शिलालेख के अनुसार मंदिर का निर्माण विक्रम संवत 1119 में हुआ था। यह पुरातन स्थापत्य कला से पत्थरों को जोड़ कर बनाया गया था। यात्रियों के विश्राम के लिए बैंगाणी परिवार ने मंदिर के पास ही एक धर्मशाला बनवा रखी है।

इस मंदिर की एक और खासियत है कि तकरीबन 800 साल पुराने इस मंदिर को किसी धर्मात्मा या सज्जन ने नहीं, बल्कि डाकुओं ने बनवाया था।

मंदिर के गृभगृह में माता की दो मूर्तियां हैं। दायीं ओर ब्रह्माणी माता, जिन्हें मीठा प्रसाद चढ़ाते हैं। यह लड्डू या पेड़े या श्रद्धानुसार कुछ भी हो सकता है। बायीं ओर दूसरी प्रतिमा काली माता की है, जिनको शराब चढ़ाई जाती है।

-तेजवाणी गिरधर

7742067000


सोमवार, 10 फ़रवरी 2025

प्रखर साहित्यकार हैं श्री मंगलसेन सिंगला

रेलवे में राजभाषा अधिकारी के पद से सेवानिवृत्त अधिकारी मंगलसेन सिंगला अंग्रेजी के साथ-साथ साहित्यिक हिंदी के विद्वान एवं समालोचक हैं। हिंदी भाषा के मूर्धन्य विद्वान हैं। हिंदी के अतिरिक्त अंग्रजी पर भी उनकी गहरी पकड है। वे कुछ समय तक दैनिक न्याय में अनुवादक के रूप में सेवाएं दे चुके हैं। 

वे स्वभाव से दार्शनिक हैं। उनका एक स्वरचित काव्य संग्रह और श्री गीतमृत पद्मावली नामक पुस्तक प्रकाशित हो चुकी है। अर्थशास्त्र का भी उन्होंने गहन अध्ययन किया है। उनकी सोच है कि आयकर को पूरी तरह से समाप्त कर दिया जाना चाहिए। उन्होंने इस विषय की विस्तृत व्याख्या करते हुए समझाया है कि आयकर खत्म कर देने से अर्थव्यवस्था कैसे और मजबूत होगी। बाकायदा एक पुस्तिका बना कर उसे सरकार को भेज कर उस पर गौर करने का आग्रह किया है। वे अग्रवाल समाज, अजमेर, लोक स्वराज्य मंच, अम्बिकापुर (छत्तीसगढ़), सेवानिवृत्त रेल अधिकारी संस्था, अजमेर और सीनियर सिटिजंस सोसाइटी, अजमेर से जुड़े हुए हैं। उनका जन्म 13 फरवरी 1932 को श्री रामानंद के घर हुआ। उन्होंने विशारद (अंग्रेजी), बी.ए. (अंग्रेजी) और एम.ए. (हिंदी) की डिग्रियां हासिल की हैं।

उनकी तीक्ष्ण समालोचना का उदाहरण देखिए। उनसे जब अजमेर एट ए ग्लांस पुस्तक के लिए अपना परिचय भेजने का आग्रह किया तो उन्होंने अपने परिचय के साथ एक टिप्पणी भेज कर इस गाइड बुक के अंग्रेजी नामकरण को अरुचिकर बताया। साथ ही इसे भाषा, संस्कृति व इतिहास जैसे गंभीर विषयों के साथ खिलवाड़ की संज्ञा भी दी है। अजमेरनामा न्यूज पोर्टल उनकी दीर्घायु व स्वास्थ्य की कामना करता है। 

शनिवार, 8 फ़रवरी 2025

भूख भी एक यज्ञ है, समय पर आहुति दीजिए

बात तकरीबन 1990 की है। दैनिक न्याय में एक लेख प्रकाशित होने पर तत्कालीन प्रबंध संपादक स्वर्गीय श्री विश्वविभूति विदेह के विरुद्ध मुकदमा दर्ज हुआ। जैसा कि अखबार मालिकों के साथ कई बार हो जाता है। पुलिस उन्हें हिरासत में लेने को आई। शाम कोई सात बजे का समय था। हालांकि अखबार जगत के लिए इस प्रकार के मुकदमे व गिरफ्तारी कोई खास बात नहीं, मगर परिवार की महिलाओं के लिए तो यह बड़ी बात थी। महिलाएं रुआंसी थी। प्रधान संपादक स्वर्गीय बाबा श्री विश्वदेव शर्मा के भोजन का समय हो गया था। उसमें विलंब होने लगा तो वे बोले, अरे भाई भोजन परोस दो। बाबा की धर्मपत्नी, जिन्हें सब अम्मा जी कहा करते थे, बोलीं कि मेरे बेटे को गिरफ्तार करके ले जा रहे हैं और आपको लगी है खाने की। इस पर बाबा बोले के ये महज भूख व खाने की बात नहीं है। भोजन करना एक यज्ञ ही है। आमाशय में प्रकृति प्रदत्त अग्नि प्रज्ज्वलित है और उसे आहुति देना जरूरी है। अन्यथा विकृति उत्पन्न होगी। गिरफ्तारी व जमानत पर रिहाई आदि एक सामान्य घटनाक्रम है, मगर पेट का यज्ञ ज्यादा जरूरी है। वह समय पर ही होना चाहिए। ऐसे थे बिंदास व नियम के पक्के थे बाबा। कहने की जरूरत नहीं है कि वे पक्के आर्य समाजी थे। जिन्होंने उन्हें निकट से देखा है, वे मेरी बात की ताईद करेंगे। उस वक्त मुझ सहित अन्य को भी लगा कि क्या बाबा कुछ वक्त भूख पर नियंत्रण नहीं कर सकते, मगर बाद में विचार करने पर लगा कि वे सही कह रहे थे।

चलो, भोजन करना भी एक यज्ञ है, यह बाबा का नजरिया हो सकता है, मगर यदि स्वास्थ्य के लिहाज से भी देखें तो जिस नियत वक्त पर भूख लगती है, तब आमाशय में भोजन को पचाने वाले रसायनों का स्राव शुरू हो जाता है। भूख लगती ही उन रसायनों के कारण है। अगर हम भोजन नहीं करते तो वे रसायन आमाशय को नुकसान पहुंचाते हैं। हो सकता है कि हम यह कह कर उपहास उड़ाएं कि क्या भूख पर काबू नहीं कर सकते? बेशक काबू कर सकते हैं, मगर फिर हमें उसके शरीर पर पडने वाले दुष्प्रभाव के लिए भी तैयार रहना चाहिए।

मैने देखा है कि सरकारी कर्मचारी तो लंच टाइम होने पर समय पर भोजन कर लेते हैं, मगर व्यापारियों को ऐसी कोई सुविधा नहीं। लंच टाइम पर भी ग्राहकी लगी रहती है। मैने ऐसे कई व्यापारी देखे हैं, जो भोजन की नियमितता का पूरा ख्याल रखते हैं और कितनी भी ग्राहकी हो, टाइम पर ही भोजन करते हैं। गुजरात में तो कई व्यापारी लंच टाइम पर दुकान मंगल कर घर जा कर भोजन करते हैं और तनिक आराम करने के बाद दुकान खोलते हैं।

 

शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2025

अजमेर के वजूद में है रेलवे का अहम किरदार

माना जाता है कि अजमेर का वजूद दरगाह, पुष्कर और कुछ राज्य स्तरीय दफ्तरों के साथ रेलवे की वजह से है। इनके सिवाय अजमेर कुछ भी नहीं। उसमें भी यहां की अर्थव्यवस्था का एक केन्द्र यदि रेलवे को कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। रेलवे में काम कर रहे तकरीबन दस हजार कर्मचारियों का करीब सत्तर करोड़ रुपए का सालाना वेतन यहां की अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा है। जाहिर तौर पर बाजार पर इसका असर दिखाई देता है। इतना ही नहीं रेलवे के कबाड़ ने भी यहां की आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित किया है। कई लोगों ने रेलवे के कबाड़ को खरीदने के धंधे को अपनाया और आज वे करोड़पति हैं। वही पैसा अन्य व्यवसायों में खर्च होने के कारण यहां की आर्थिक प्रगति का हिस्सा बना है। देश की राजनीतिक राजधानी दिल्ली और आर्थिक राजधानी मुुंबई को जोडऩे वाली यहां की रेलवे लाइन जाहिर तौर पर यहां के व्यापार की रीढ़ की हड्डी है। 

सब जानते हैं कि अजमेर में रेलवे का सफर काफी पुराना है। आजादी से पहले राजनीतिक गतिविधियों का केन्द्र रहे अजमेर में अंग्रेजों ने रेलवे के विकास पर विशेष ध्यान दिया। अजमेर में रेलवे का इतिहास कितना पुराना है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अजमेर सबसे पहले आगरा से रेल मार्ग से सन् 1875 में जोड़ा गया और सन् 1876 में ही बॉम्बे बड़ौदा एंड सेंट्रल इंडियन रेलवे कंपनी ने यहां मीटरगेज सिस्टम के लोकोमोटिव वर्कशॉप की स्थापना कर दी थी। इसको वर्कशॉप पश्चिम रेलवे का प्रमुख व उत्तर पश्चिम रेलवे का सबसे बड़ा कारखाना होने का गौरव हासिल है। भारतीय रेलवे के करीब एक सौ साठ साल के इतिहास में सन् 1885 को स्वर्णाक्षरों में लिखा गया, जब यहां देश का पहला लोकोमोटिव (इंजन) बनाया गया। अब यह नई दिल्ली में नेशनल रेल म्यूजियम में अजमेर का नाम रोशन कर रहा है। इसी वर्कशॉप से पहले व दूसरे विश्व युद्ध में कलपुर्जे व युद्ध सामग्री अफ्रीका व ऐशियाई देशों में भेजी गई। यह वर्कशॉप बाद में वक्त की रफ्तार के साथ बदला और 1979 में यहां पहला डीजल इंजन रखरखाव के लिए अजमेर आया। भाप के आखिरी इंजन सन् 1985 में दुरुस्त कर भेजा गया। इसी प्रकार मई 1997 में पहला ब्रॉडगेज वैगन यहां दुरुस्त कर भेजा गया और अप्रैल 2000 में पहली मीटरगेज ड्यूमेटिक ट्रैक मशीन व जून 2001 में ब्रॉडगेज यूनिमेट ट्रेक मशीन की मरम्मत की गई। 

केरिज व लोको कारखाने के ढ़लाईखाने भारतीय रेल की शान रहे हैं। उसे लोकोमोटिव सेंट्रल वर्कशॉप ऑफ दी राजपूताना-मालवा रेलवे, अजमेर कहा जाता था। केरिज कारखाने में स्टील ढ़ालने का विशाल ढ़लाईखाना भिलाई के इस्पात कारखाने के समकक्ष माना जाता था। केरिज का ढ़लाईखाना तो वर्षों पहले बंद हो गया, लोको का ब्रेक ब्लॉक्स बनाने वाला ढ़लाई कारखाना भी सिमटता चला गया। हालांकि यहां स्थापित रेलवे मंडल कार्यालय जोन मुख्यालय बनने की सर्वाधिक पात्रता रखता था, परंतु राजनीतिक कारणों से इसे वह दर्जा हासिल नहीं हो पाया और जोन मुख्यालय जयपुर में स्थपित हो गया। 

-तेजवाणी गिरधर 7742067000

अजमेर एट ए ग्लांस से साभार

गुरुवार, 6 फ़रवरी 2025

अजमेर को राष्ट्रीय जैन तीर्थ स्थल बनाने की मांग के मायने?

सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती की दरगाह के दीवान हजरत जैनुल आबेदीन अली खान ने जैसे ही अजमेर को राष्ट्रीय स्तर पर जैन तीर्थ स्थल घोषित करने की मांग प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से की है, एक नई बहस छिड गई है। उसके अनेक पहलु हैं। जहां तक निरपेक्ष रूप से मांग का सवाल है तो लोकतंत्र में अपनी राय जाहिर करने अथवा मांग रखने का सभी को अधिकार है। दूसरा यह मांग सकारात्मक है, नकारात्मक नहीं। इसमें कोई दोराय नहीं है कि किसी समय में अजमेर में जैन संस्कृति का बोलबाला था। उसके बाकायदा प्रमाण मौजूद हैं। बेशक दीवान साहब की मांग को सद्भाव बढाने की दिशा में एक बडा कदम कहा जा सकता है। अगर जैन समाज मांग करे तो उसमें कुछ भी अनूठा नहीं होता, लेकिन ख्वाजा साहब के वंशज ऐसा प्रस्ताव रखें तो वह चौंकाता तो है। अब लोग कयास लगा रहे हैं कि या तो दीवान साहब ने जैन समाज के प्रतिनिधियों के सामने सद्भाव स्वरूप ऐसा कह दिया होगा, या फिर बहुत सोच समझ कर ऐसा किया। उनकी इस मांग के गहरे निहितार्थ होने ही चाहिएं। वो इसलिए कि वे बहुत महत्वपूर्ण पद पर बैठे हैं। जो लोग उन्हें नजदीक से जानते हैं, उनको पता है कि वे कितने तीक्ष्ण बुद्धि हैं और विवेकपूर्ण व तर्कसंगत बात करते हैं। एक अर्थ में कानून की किताब ही हैं। उन्हें यह निश्चित की ख्याल में होगा कि वे जिस पद पर बैठ कर ऐसी बात कर रहे हैं, उसे किस अर्थ में लिया जाएगा? उसकी प्रतिध्वनि क्या हो सकती है? उनके दिमाग में चल रही कुकिंग का फिलवक्त अनुमान लगाना मुश्किल है। हो सकता है, अजमेर में सांप्रदायिक सौहार्द्र कायम रखने के लिए सर्वे भवंतु सुखिनः के भाव से उनकी कोई दूरदृष्टि हो। हो सकता है कि वे मौजूदा गरमाहट को डाइल्यूट करना चाहते हों। दिलचस्प बात ये रही कि हिंदू सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष विष्णु गुप्ता ने इस बॉल को तुरंत लपक लिया। विष्णु गुप्ता ने अपने बयान में दरगाह दीवान की मांग का स्वागत किया है। उन्होंने कहा कि दरगाह दीवान कम से कम यह मानने को तैयार हो गए कि यह जैनियों का तीर्थ स्थल है। हमने भी दावे में शिव मंदिर होने के साथ जैन मंदिर होने का दावा किया था। इस घोषणा से हमारे केस को मजबूती मिलेगी। एक दिन यह भी सामने आएगा कि दरगाह में भगवान शिव का संकट मोचन मंदिर तोड़कर दरगाह बनाई गई है। अगर अजमेर जैन तीर्थ स्थल घोषित होता है तो मैं चाहता हूं कि सभी हिंदू उसका स्वागत करें। यानि उन्हें इस बात से संतुष्टि है कि गाडी पटरी पर आधी तो आ गई। जाहिर है उनके दिमाग में होगा कि भले ही जैन अलग धर्म है, मगर जैनी सांस्कृतिक दृष्टि से हिंदुओं के करीब हैं, लिहाजा अजमेर को जैन तीर्थ क्षेत्र घोषित करने पर हिंदुओं को कोई बडा ऐतराज नहीं होगा, क्योंकि सनातनी बहुत सहिष्णु हैं। अब तक सभी को आत्मसात करते आए हैं। फिलवक्त खुद्दाम हजरात, मुस्लिम जमात, सनातन धर्मियों आदि की ओर से कोई मजबूत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हो सकता है कि उनको लगता हो कि मांग पूरी होने की उम्मीद है नहीं, लिहाजा उसे तूल दिया ही क्यों जाए? कदाचित किंकर्तव्यविमूढता हो या मौन स्वीकृति।

इस प्रकरण को पिछले दिनों जैन संत सुनील सागर जी महाराज के ससंघ तीस साधु संतों के साथ ढाई दिन के झोंपडे का विहार करने से जोड कर देखा जा सकता है। उनके साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिन्दू परिषद के कार्यकर्ता भी उपस्थित थे। एक चबूतरे पर बैठ कर आचार्य सुनील सागर ने कहा कि जिसकी विरासत है, उसे मिलनी चाहिए, लेकिन इसमें कोई विवाद या झगड़ा फसाद न हो। उन्होंने कहा कि यहां संस्कृत पाठशाला व मंदिर के साथ जैन मंदिर भी रहा होगा। मैने नसियांजी में कुछ मूर्तियां देखी तो बताया गया कि वे अढाई दिन का झौंपडा में खुदाई के दौरान मिली थीं। उनके इस बयान का यह अर्थ निकाला गया कि उनके मार्गदर्शन में ढाई दिन के झोपड़े को लेकर कोई व्यूह रचना की जाएगी। दीवान साहब का बयान उनकी मंशा के अनुकूल भी है।

बहरहाल, इस मामले में एक सोच यह भी है कि अजमेर तो दरगाह ख्वाजा साहब व तीर्थराज पुष्कर की वजह से पहले से तीर्थ स्थल है। यहां हिंदू श्रद्धा के साथ व मुस्लिम अकीदत के साथ आते हैं। यानि वे पर्यटक नहीं, बल्कि तीर्थयात्री हैं। अजमेर को विभिन्न संस्कृतियों का संगम बताते हुए अब तो पुष्कर व दरगाह के साथ नारेली तीर्थ, साईं बाबा मंदिर, गिरिजाघर व गुरूद्वारे का नाम भी लिया जाता है। अर्थात यह सभी धर्मों का संयुक्त तीर्थस्थल है। तो इसे अलग से जैन तीर्थ स्थल घोषित करने की जरूरत क्या है?

वैसे एक बात पक्की है कि अजमेर का फैब्रिक मौलिक रूप से ऐसा है कि तमाम आशकाओं के बावजूद यहां का सांप्रदायिक सौहार्द्र का तानाबाना सदैव कायम रहने वाला है।

-तेजवाणी गिरधर

7742067000