गुरुवार, 29 मई 2025

अग्रणी समाजसेवी थे श्री सुनील भुटानी

अजमेर में सिंधी समाज के सर्वाधिक सक्रिय व अग्रणी समाजसेवी थे स्वर्गीय श्री सुनील वीरूमल भुटानी। हाल ही उनका देहावसान हो गया। उन्होंने 1992 में समाजसेवा के लिए सिंधु समिति का गठन किया था। उस जमाने के चंद एनर्जेटिक युवकों में उनकी गिनती हुआ करती थी। उनके साथ एक मजबूत टीम सक्रिय थी। गजब की संगठन क्षमता थी उनमें। उन्हीं के अन्य साथियों ने बाद में अन्य सामाजिक संस्थाओं का गठन किया। वे सिंधियत के लिए समर्पित रहे। उनकी परिकल्पना अजमेर के समूचे सिंधी समाज को जोडने वाले सिंधियत मेले के रूप में साकार हुई। हालांकि पिछले कुछ सालों से स्वास्थ्यगत और व्यावयायिक कारणों से वे अधिक सक्रिय नहीं रह पाए, मगर अनेक आयोजनों में उनका मार्गदर्शन लिया जाता रहा। उनमें कमाल की पॉजिटिव एनर्जी थी और अस्वस्थता को उन्होंने कभी हावी नहीं होने दिया। वे सिंधी कौंसिल ऑफ इंडिया के राजस्थान चैप्टर के सुप्रीम काउंसलर भी थे। इसके अतिरिक्त आदर्श विद्या समिति व एचकेएच विद्या समिति के संयुक्त सचिव रहे। पुष्कर झूलेलाल घाट विकास समिति से भी जुडे रहे। उनकी दिलचस्पी राजनीति में भी रही। वे भूतपूर्व केबीनेट मंत्री स्वर्गीय श्री किशन मोटवानी के करीबी थे। अजमेर नगर परिषद के चुनाव में अजमेर नगर सुधार न्यास के पूर्व अध्यक्ष श्री नरेन शहाणी के बहुत अनुनय व आग्रह पर कांग्रेस के एक मात्र सिंधी प्रत्याशी बनाए गए, मगर भाजपा मानसिकता के सिंधियों ने उनका साथ नहीं दिया। कांग्रेस के इस प्रयोग से यह लगभग स्पष्ट हो गया कि भाजपा से जुडे सिंधी कांग्रेस के सिंधी प्रत्याशी का समर्थन नहीं किया करते।

वे सुपरिचित कर कानून सलाहकार थे। उनका जन्म 5 फरवरी 1962 को हुआ। उनके पूर्वज सिंध के सेवण में रहते थे। उन्होंने 1985 में एम कॉम की डिग्री जीसीए से हासिल की और अपने मामा जाने-माने समाजसेवी श्री मोतीलाल ठाकुर के साथ टैक्स प्रैक्टिस आरंभ की। 2002 से उन्होंने अपना ऑफिस आरंभ किया। उनके पास अच्छा क्लाइंटेज था। प्रमुख व्यवसायी उनसे सलाह लिया करते थे। उनके चार भाई व चार बहिनें हैं। उनका विवाह 24 मार्च 1996 को हुआ। उनके एक पुत्र व एक पुत्री है। ज्ञातव्य है कि उनके जीजाजी श्री जगदीश वच्छानी समाज के एक स्तम्भ हैं। स्वामी श्री हिरदाराम जी के आशीर्वाद से प्रशासन पर गहरी पकड और एनआरआई से घनिष्ठ संबंधों के चलते समाजसेवा के अनेक प्रकल्प संचालित कर रहे हैं। स्वर्गीय श्री भुटानी के निधन से समाज को जो क्षति हुई है, उसकी पूर्ति असंभव है। अजमेरनामा न्यूज पोर्टल उन्हें अश्रुपूरित श्रद्धांजलि अर्पित करता है।


शुक्रवार, 23 मई 2025

जियारत व पूजा भी कोई खबर है?

किसी भी व्यक्ति का दरगाह जियारत करना अथवा तीर्थराज पुश्कर की पूजा अर्चना करना उसका पूर्णतः वैयक्तिक कृत्य है। यह उसकी व्यक्तिगत आस्था का मामला है, जिससे आम जनता का कोई सरोकार नहीं होता। बावजूद इसके लंबे अरसे से वीवीआईपी, वीआईपी, नेता-अभिनेता आदि जियारत करता है अथवा पुश्कर सरोवर की पूजा करता है तो उसकी विस्तृत खबर छपती है। क्या उस खबर की कोई उपयोगिता है?

उसमें किसने जियारत करवाई, किसने तवरूख भेंट किया, किसने पूजा करवाई, कौन कौन मौजूद थे, आदि का जिक्र होता है। सवाल उठता है कि आम पाठक की क्या इसको जानने में रूचि होती है। वह हैडिंग पढ कर उसे छोड देता है या पूरी खबर पढता है। हां, अगर जियारत व पूजा के दौरान वह कोई बयान देता है तो वह जरूर खबर है, मगर केवल जियारत व पूजा खबर कैसे हो सकती है। होता अमूमन ये है कि जब भी कोई दरगाह षरीफ में आता है या तीर्थराज पुश्कर की पूजा करता है तो मीडिया उसे घेर लेती है और संबंधित व ताजा मामलों में उसका बयान लेती है, जो कि खबर बन जाती है। मुझे ख्याल आता है कि दैनिक भास्कर अजमेर के तत्कालीन स्थानीय संपादक श्री जगदीष षर्मा ने एक व्यवस्था बनाई थी कि जियारत व पूजा की कोई खबर नहीं जाएगी। यदि जाएगी भी तो दो तीन लाइन में, जानकारी मात्र के लिए। ताकि यह पता रहे कि अमुक विषिश्ट व्यक्ति यहां आया था। खबर तभी बनाई जाए जब वह कुछ बयान दे। उसमें भी जियारत व पूजा की जानकारी दो तीन लाइन में होनी चाहिए। यह व्यवस्था काफी दिन चली। 

अब बात करते हैं कि जियारत व पूजा की खबर बनाने की परंपरा कैसे षुरू हुई। ऐसा प्रतीत होता है कि आरंभ में अखबार वालों ने विषिश्ट व्यक्ति के दरगाह व पुश्कर आने पर जियारत व पूजा करवाने वालों से खबर ली। बाद में इसका उलट हो गया। खबर अखबार के दफ्तर में भी आने लगी। यह ठीक वैसा ही है कि अमुक वकील ने अमुक मामले में अमुक को जमानत दिलवाई या बरी करवाया, और उसकी खबर बन जाए। अब तो जियारत व पूजा करने वाले स्वयं भी खबर लगवाने में रूचि लेते हैं।

https://www.youtube.com/watch?v=vvHkmnZ2HJ0


शनिवार, 17 मई 2025

आजादी के बाद अजमेर नगर पालिका से निगम के मुखिया

1947-48ः श्री हेमचंद सोगानी

1948-49ः श्री कृष्णगोपाल गर्ग

1949-51ः श्री कृष्णगोपाल गर्ग

1951ः श्री विशम्बरनाथ भार्गव

1951-52ः श्री ज्वाला प्रसाद शर्मा

1952ः श्री जे. के. भगत

1953 व 54 में प्रशासकों ने व्यवस्था संभाली

1954-55ः श्री दुर्गादत्त उपाध्याय

1955-57ः श्री कृष्णगोपाल गर्ग

1957-58ः श्री ज्वालाप्रसाद शर्मा

1959-60ः श्री देवदत्त शर्मा

1960-61ः श्री माणकचंद सोगानी

1961 से 69 तक प्रशासकों ने व्यवस्थाएं संभाली

1970ः श्री एम.के. नाथूसिंह तंवर

1971ः श्री माणकचंद सोगानी

1973ः डॉ. एम. एल. बाघ

1973 से 90 तक प्रशासकों ने काम संभाला

1990-95ः श्री रतनलाल यादव

1995-2000 श्री वीरकुमार

24.1.2000-9.4.2000: श्रीमती विद्या कमलाकर जोशी (कार्यवाहक)

10.4.2000-28.8.2000: श्री सुरेन्द्र सिंह शेखावत

28.8.2000-22.12.2003ः श्रीमती अनिता भदेल

22.12.2003-31.12.2005ः श्रीमती सरोज देवी जाटव

2005-10ः            श्री धर्मेन्द्र गहलोत

सन् 2008 में भाजपा शासनकाल में तत्कालीन मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे की पहल पर नगर परिषद को नगर निगम का दर्जा दे दिया गया। इसकी घोषणा उन्होंने अजमेर में ही की। वे यहां राज्य स्तरीय गणतंत्र समारोह में शिरकत करने आई थीं। इस लिहाज से श्री धर्मेन्द्र गहलोत को पहला मेयर बनने का गौरव हासिल हुआ। हालांकि जनसंख्या संबंधी औपचारिकता बाद में कुछ गांव मिला कर की गई।

अगस्त 2010 में करीब बीस साल भाजपा का कब्जा रहने के बाद पहली बार कांग्रेस के नए चेहरे वरिष्ठ स्वतंत्रता सेनानी व पूर्व पार्षद स्वर्गीय श्री हरिशचंद जटिया के पुत्र श्री कमल बाकोलिया अजमेर नगर निगम के पहले निर्वाचित मेयर बने। उन्होंने भाजपा के डॉ. प्रियशील हाड़ा को पराजित किया।

2015 में नई व्यवस्था के तहत मेयर का चुनाव पार्षदों में से किया गया और एक बार फिर धर्मेन्द्र गहलोत मेयर बने

2020 में भाजपा की श्रीमती ब्रजलता हाडा मेयर चुनी गई

गुरुवार, 15 मई 2025

आज भी जिंदा हैं सबा खान

सुर्खी पढ़ कर आपका चौंकना लाजिमी है। मगर मेरी कलम की कोख से यह सुर्खी इसलिए पैदा हुई, क्योंकि मेरी नजर में वे आज भी जिंदा हैं। चार साल बीत गए। एक मर्द औरत कोरोना से जंग हार गईं थीं। मगर वे आज भी लोगों के जेहन में जिंदा हैं। फेसबुक अटा पडा है, उनको याद किया जा रहा है। उनका जिक्र करते हुए उनके नाम के साथ मरहूम इसलिए नहीं जोडूंगा, चूंकि उनके भीतर जो जज्बा था, वो शहर में गिनती के जिंदा लोगों के जेहन में धड़क रहा है। वह कभी नहीं मरा करता। सबा ने जो पहचान बनाई, वह उनके अलविदा होने के बाद भी जिंदा है। मेरी नजर में वे मर्द औरत थीं। बिंदास। उनके कांधे पर चस्पा उन तमगों का जिक्र करना बेमानी सा है, जिसके बारे में हर किसी को पता है कि वे राजस्थान प्रदेश महिला कांग्रेस की प्रदेश महासचिव थीं, अजमेर शहर जिला महिला कांग्रेस की अध्यक्ष रहीं, सामाजिक सरोकार के क्षेत्र में अग्रणी संस्था प्रिंस सोसाइटी के संस्थापक अध्यक्ष और जवाहर फाउंडेशन की मजबूत स्तंभ थीं। हां, इतना जरूर कहना पड़ेगा कि वे एक जिंदादिल इंसान, हरदिल अजीज और खुश मिजाज थीं। हर किसी से बड़े खुलूस के साथ मिला करती थीं, मानों बरसों जी जान-पहचान हो। असल में वे भरपूर सेहतमंद थीं। गर कोरोना के शिकंजे में नहीं आतीं तो खूब जीतीं। क्या यह सरासर नाइंसाफी नहीं है कि कोरोना ने कम उम्र में ही जबरन उनकी सांसें रोक दीं? बिना यह सोचे कि ऐसे इंसानों की अजमेर को कितनी दरकार है?

फोटो कांग्रेस नेता सौरभ यादव ने अपनी फेसबुक वाल पर साझा की है। कदाचित सबा खान की यह आखिरी फोटो है।

अब जरा, उनकी शख्सियत के बारे में। उनमें गजब की फुर्ती थी, चुस्ती थी। यानि बिजली जैसी चपलता। तभी तो उनकी साथिनें पूछा करती थीं कि कौन सी चक्की का आटा खाती हो। कांग्रेस में तकरीबन दस साल शहर महिला अध्यक्ष रहीं। इस दौरान शायद ही कोई ऐसा दिन रहा हो कि वे कहीं नजर न आई हों। राजनीति से इतर भी वे आम अवाम के हर काम के लिए जुटी दिखाई देती थीं। उनके पास शहर का जो भी मसला आता था, जो भी फरियादी आता था, वे तत्काल आला अफसरान के चेंबर में बेधड़क घुस कर पैरवी करती थीं। सियासत उनकी रोजमर्रा की जिंदगी बन गई थी। कांग्रेस और भाजपा, दोनों में इस किस्म के नेता कम ही हैं। अफसोस, एक मर्द औरत कोरोना से जंग हार गईं। और इसी के साथ अपार संभावनाओं का अंत हो गया। शहर वासियों केलिए भी, परिवार वालों के लिए भी।

अल्लाह उन्हें जन्नतुल फिरदोस में आला मुकाम अता फरमाए। गमजदा परिवार वालों को सब्र जमील अता फरमाए। अजमेरनामा न्यूज पोर्टल उनको भावभीन श्रद्धांजलि अर्पित करता है।


मंगलवार, 13 मई 2025

प्रेत बाधा से मुक्ति मिलती है सुधाबाय में

हर मंगला चौथ पर भरता है मेला

तीर्थराज पुष्कर के ही निकट सुधाबाय में हर मंगला चौथ अर्थात मंगलवार व चतुर्थी तिथी का संगम होने पर मेला भरता है। यहां श्रद्धालु अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए अनुष्ठान करते हैं। अनेक वे लोग, जो आर्थिक अथवा अन्य कारणों से अपने पितरों के पिंड भरने गया नहीं जा पाते, वे यहां यह अनुष्ठान करवाते हैं। बताया जाता है कि भगवान राम ने अपने पिता दशरथ का श्राद्ध इसी कुंड में किया था। मान्यता है कि यहां कुंड में स्नान से प्रेत-बाधा से मुक्ति मिलती है। इस कारण कथित ऊपरी हवा से पीड़ित लोगों को उनके परिजन यहां लाते हैं और कुंड में डुबकी लगवा कर राहत पाते हैं।

जानकारों का कहना है कि पुष्कर से करीब 4 किलोमीटर दूर व बूढा पुश्कर के पास स्थित सुधाबाय कुंड में शुक्ल पक्ष चतुर्थी मंगलवार के त्रि-संयोग के अवसर पर गया माता स्वयं विराजमान रहती है। इस मौके पर नारायण बली की पूजा भी यहां पर करवाई जाती है। आसानी से देखा जा सकता है कि महिला पुरुषों में कुंड में स्नान करने के साथ ही अदृश्य आत्माएं स्वयं अपनी भाषा बोलती है। अपना नाम पता बोलती है तथा उसका शरीर से निकल जाने की सौगंध लेती हैं। स्नान करने के बाद कुछ समय में ही प्राणी हंसता हुआ स्नान करता है तथा कुंड से बाहर आता है। 

पद्मपुराण के पृष्ठ संख्या 104 में लिखा है कि मर्यादा पर्वत यज्ञ पर्वत के बीच सतयुग के तीन कुंड बताए गए हैं, जिन्हें ज्येष्ठ पुष्कर, मध्य पुष्कर ओर कनिष्ठ पुष्कर के नाम से जाना जाता है। मध्य पुष्कर के समीप अवियोगा नामक एक चोकोर बावड़ी है, जिसके मध्य मे जल से युक्त एक कुआं है, जिसे सौभाग्य कूप कहते हैं। यहां पिंड दान करने से भटकती आत्माओं को मुक्ति मिलती है। 


https://www.youtube.com/watch?v=Q1g4_2z08PU