मंगलवार, 26 मार्च 2013

नरेन शहाणी भगत के घर डाला एसीबी ने छापा

आय से अधिक संपत्ति के मामले में एंटी करप्शन ब्यूरो ने नगर सुधार न्यास के अध्यक्ष नरेन शहाणी भगत के घर पर छापा मारा है। अचानक हुई इस कार्यवाही से भगत सकते में आ गए, वहीं यह खबर जंगल में आग की तरह पूरे शहर में फैलने से सनसनी पसर गई। हालांकि ब्यूरो ने इस कार्यवाही को पूरी तरह से गोपनीय रखा है, मगर सुविज्ञ सूत्रों के अनुसार भगत के घर बड़ी मात्रा में नकदी मिली है, जिसे गिनने के लिए स्टेट बैंक ऑफ बीकानेर एंड जयपुर से नोट गिनने की चार मशीनें लगाई गई हैं। यद्यपि यह कहना अभी मुश्किल है कि नकद मिली राशि कितनी है, मगर समझा जाता है कि यह करीब दस करोड़ रुपए से अधिक होनी चाहिए। यह जांच के बाद ही पता लगेगा कि इतनी बड़ी धन राशि उनके पास कहां से आई। समझा जाता है कि भगत ने यह राशि आगामी विधानसभा चुनाव में खर्च के लिए जमा कर रखी थी। ब्यूरो के सूत्रों ने बताया कि भगत के धुर विरोधी एडवोकेट अशोक मटाई की शिकायत पर यह कार्यवाही की गई है। बुरा न मानो होली है।

ज्ञान सारस्वत होंगे वसुंधरा का तुरप का पत्ता

अजमेर नगर निगम के वार्ड दो के निर्दलीय पार्षद ज्ञान सारस्वत अजमेर उत्तर विधानसभा क्षेत्र में भी निर्दलीय ही चुनाव लड़ेंगे। जैसे वार्ड चुनाव में तुलसी सोनी को पटखनी दे कर देवनानी को झटका दिया था, वैसे ही विधानसभा चुनाव में खुद देवनानी को ही निपटा देंगे।
असल कहानी ये है कि यूं तो ज्ञान की खुद ही ये इच्छा रही कि वे देवनानी को हराने के लिए निर्दलीय खड़े होंगे, मगर कुछ समझदार मित्रों ने समझाया कि इससे देवनानी तो हार जाएंगे, मगर उन्हें क्या मिलेगा। बात उनके समझ में आई। उन्होंने सोचा कि पिछले तीन साल में भाजपा की ओर से वैसे भी कोई मनुहार न की गई है, ऐसे में बेहतर ये है कि कांग्रेस ज्वाइन कर ली जाए। इसी सिलसिले में उन्होंने हाल ही अजमेर के कांग्रेस सांसद व केन्द्रीय कंपनी मामलात राज्य मंत्री सचिन पायलट के हाथों अपनी वेबसाइट और निर्माण कार्यों का शुभारंभ करवाया। जैसे ही वसुंधरा को ये पता लगा, उन्होंने तुरंत एक मैसेंजर भिजवा कर ज्ञान को जयपुर बुलवा लिया। उन्होंने समझाया कि अगर वे कांग्रेस में शामिल हो गए तो उनका भाजपा मानसिकता वाला जनाधार समाप्त हो जाएगा। ऐसे में बेहतर ये है कि फिलहाल ऐसा कोई निर्णय न लें। हां, इतना जरूर है कि जैसे ही भाजपा की सरकार बनेगी, उन्हें कोई बड़ा इनाम दे दिया जाएगा। इसके एवज में एक काम उन्हें करना होगा। वो ये कि उन्हें देवनानी के खिलाफ खड़ा होना पड़ेगा, ताकि वे हार जाएं और सरकार बनने पर उन्हें मंत्री बनाए जाने की मजबूरी समाप्त हो जाए। अर्थात वे देवनानी को टिकट देने में आनाकानी भी नहीं करेंगी और उनका कांटा भी निकाल लेंगी। ज्ञान को यह बात ठीक से समझ में आ गई है। इसके लिए वसुंधरा ने उन्हें चुनाव से दो माह पहले बीस लाख रुपए भिजवाने का विश्वास दिलाया है। बुरा न मानो होली है।

रविवार, 24 मार्च 2013

कोठारी की नियुक्ति से बढा अजमेर का मान

राजस्थान के लोकायुक्त पद पर रिटायर जज सज्जन सिंह कोठारी की नियुक्ति से अजमेर का मान बढा है। जस्टिस कोठारी का जन्म 10 अक्टूबर,1950 को अजमेर में हुआ। उन्होंने 1970 में गवर्नमेंट कॉलेज अजमेर से स्नातक और 1973 में वहीं से एल.एल.बी. किया। ज्ञातव्य है कि हाईकोर्ट के रिटायर जज सज्जन सिंह कोठारी का चयन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, नेता प्रतिपक्ष गुलाबचंद कटारिया और हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश अमिताव रॉय की सहमति से हुआ। यह पद जस्टिस जीएल गुप्ता के मई 2012 में सेवानिवृत्ति के बाद से खाली था। हाई कोर्ट ने सरकार को 28 मार्च तक लोकायुक्त नियुक्त करने के आदेश दिए थे। कोठारी 2000 से 2008 तक टोंक, कोटा और राजसमंद में जिला व सत्र न्यायाधीश रहे। 12 मई 2008 से 23 मई 2010 विधि विभाग के प्रमुख सचिव रहे। 24 मई 2010 को राजस्थान हाईकोर्ट में अतिरिक्त जज बने, 9 सितंबर 2011 को उन्हें स्थायी जज बनाया गया। जस्टिस कोठारी 9 अक्टूबर, 2012 को हाईकोर्ट जज के पद से सेवानिवृत्त हुए। जानकारी के अनुसार लोकायुक्त पद पर नियुक्ति के लिए एक पैनल बनाया गया था। अनुसार मुख्यमंत्री की ओर से जो नाम भेजे गए, उनमें अशोक परिहार, सुनील कुमार गर्ग, शिवकुमार शर्मा, सज्जन सिंह कोठारी, और भंवरू खान के नाम थे। उनमें से कोठारी का चयन किया गया, जो कि अजमेर के लिए गौरव की बात है। कोठारी की नियुक्ति पर जिला बार एसोसिएशन ने हर्ष जाहिर किया है। बार अध्यक्ष राजेश टंडन ने कहा कि मूलत: अजमेर के निवासी जस्टिस कोठारी का बार एसोसिएशन से गहरा नाता रहा है। उनकी नियुक्ति अजमेर के लिए गौरव की बात है।

इतना डर क्यों है बोर्ड कर्मचारियों में?

Rajasthan Board 2बताया जा रहा है कि राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड में वित्तीय सलाहकार नरेंद्र तंवर के एसीबी के शिकंजे में फंसने के कारण हर साल बोर्ड में मनाया जाने वाला होली महोत्सव इस बार नहीं मनाया जा रहा है। अकेले एक अधिकारी के भ्रष्टाचार के मामले में उलझने मात्र की वजह से पूरे बोर्ड कर्मचारियों की हंसी-खुशी का कार्यक्रम रद्द किया जाना वाकई आश्चर्यजनक है। वो इस कारण और भी ज्यादा कि तंवर बोर्ड के स्थाई कर्मचारी नहीं, बल्कि राज्य सरकार के अधिकारी हैं और यहां डेपुटेशन पर नियुक्त हैं। अगर बोर्ड के ही किसी साथी के साथ कोई पारिवारिक अनहोनी हुई होती तो कार्यक्रम रोकना समझ में भी आता, मगर एसीबी के शिकंजे मात्र में आने की वजह से खुशी के मौके पर मातम चौंकाने वाला ही है।
असल में तंवर एक ऐसी महत्वपूर्ण पोस्ट पर रहे, जिसके तार बोर्ड की लगभग हर शाखा से जुड़े हुए हैं। घपला भले ही तंवर ने किया हो, मगर उसका संबंध किसी न किसी रूप में अन्य से भी रहा होगा। भुगतान संबंधी फाइलों के संबंध अन्य विभागों की फाइलों से भी निकल कर आ सकते हैं। पता नहीं कौन सी फाइल के तार तंवर की कारगुजारी से जुड़े नजर आएं। मामला अभी गरमागरम है। एसीबी लगातार नई सूचनाएं मांग रही है। जब तक तंवर के खिलाफ पूरा चालान कोर्ट में पेश न हो जाए, कहा नहीं जा सकता कि जांच का दायरा केवल तंवर तक ही सीमित है या उसका दायरा और बढ़ेगा। ऐसे में कहा नहीं जा सकता कि जांच आगे बढऩे पर कौन-कौन और लपेटे में आ जाएगा। ऐसे में बोर्ड कर्मचारियों में घबराहट होना स्वाभाविक है। भला ऐसे में खुशी मनाने की इच्छा कैसे हो सकती है?
बोर्ड के पुराने कर्मचारियों को ख्याल है कि इससे पहले शायद ही ऐसा कोई मौका रहा हो कि होली का रंगीन कार्यक्रम रोकना पड़ा हो।
यहां आपको बता दें कि बोर्ड में हर साल होली के मौके पर हास्य, व्यंग्य और संगीत से भरा मनोरंजक रंगारंग कार्यक्रम होता आया है, जिसकी गिनती शहर के प्रमुख होली महोत्सवों में होती है। इसमें बोर्ड अध्यक्ष से लेकर अधिकारी और छोटे-छोटे से कर्मचारी भी शिरकत करते हैं। इसकी तैयारी भी कुछ दिन पहले से शुय हो जाती है। सभी में बहुत उत्साह होता है। अफसोस कि अकेले तंवर की करतूत के कारण पूरे बोर्ड परिसर में मातम सा पसरा हुआ है।
-तेजवानी गिरधर

शनिवार, 23 मार्च 2013

दो राहे पर खड़े हैं नरेन शहाणी भगत

राजस्थान सरकार के वर्ष 2013-14 के बजट में अजमेर नगर सुधार न्यास में पुष्कर और किशनगढ़ औद्योगिक क्षेत्र समाहित कर अजमेर विकास प्राधिकरण का गठन करने की घोषणा पर जैसे ही अमल की कवायद शुरू हुई है, न्यास सदर नरेन शहाणी भगत दो राहे पर आ गए हैं, जहां उन्हें अपनी आगे की राह तय करनी होगी।
बताया जाता है कि अजमेर विकास प्राधिकरण का गठन जोधपुर विकास प्राधिकरण की तर्ज पर किया जाएगा। अर्थात अजमेर में भी उसका अध्यक्ष जनप्रतिनिधि ही होगा। ऐसे में स्वाभाविक रूप से मौजूदा न्यास सदर भगत को ही अपग्रे्रड कर उसका अध्यक्ष बनाया जा सकता है। ऐसे में उनके लिए धर्म संकट ये होगा कि वे अजमेर उत्तर विधानसभा सीट के लिए टिकट मांगें या नहीं। अगर टिकट मांगते हैं तो उन्हें इस बड़े पद से इस्तीफा देना होगा। टिकट मिल गया तो जीत-हार दोनों की संभावना होगी। और अगर इसी पद पर बने रहते हैं तो वर्षों से विधायक बनने की आस अधूरी ही रह जाएगी। हां, अगर सरकार फिर कांग्रेस की बनी तब जरूर वे एक ऐसे ओहदे का सत्ता सुख भोगेंगे, जिसकी शायद उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की होगी। उसमें भी एक रिस्क है। वो यह कि अगर इसी पद पर बने रहे और सरकार भाजपा की आ गई तो उनकी तो छुट्टी हो जाएगी, यानि कि ये भी एक जुआ होगा। तभी तो कहते हैं कि राजनीति एक जुआ ही है, जिसमें कुछ भी हो सकता है और उसके लिए तैयार रहना ही होता है। एक बात और भी हो सकती है। वो यह कि प्राधिकरण का अध्यक्ष बना दिए जाने के बाद संभव है कांग्रेस हाईकमान उन्हें टिकट देने से इंकार कर सकती है। यह कह कर कि पार्टी की सेवा के बदले में उन्हें प्राधिकरण का अध्यक्ष बना दिया गया है। इनाम बार-बार थोड़े ही दिया जाएगा। देखते हैं होता है क्या?
-तेजवानी गिरधर