शनिवार, 15 फ़रवरी 2014

आयोग का विखंडन रुकना मुश्किल, बोर्ड मुख्यालय अजमेर में रह सकता है

हालांकि कांग्रेस के अग्रिम संगठन युवक कांग्रेस ने एडीसी को ज्ञापन दे कर राजस्थान लोक सेवा आयोग का विखंडन कर अधीनस्थ एवं मंत्रालयिक सेवा चयन बोर्ड अलग से गठित करने का कड़ा विरोध जताया है, मगर जैसा की अजमेर जिले के सभी आठों भाजपा विधायकों का रुख है, लगता नहीं है कि यह विखंडन अब रुक पाएगा। युवक कांग्रेस ने आंदोलन की चेतावनी दी है, मगर लगता नहीं की अजमेर की जनता में इतनी जागरूकता है कि वह अजमेर की महत्ता से जुड़े इस मसले में अपनी भागीदारी निभाएगी।
असल में यह मसला इसलिए कमजोर प्रतीत होता है, क्योंकि जिस कांग्रेस पर विपक्ष की भूमिका निभाने का दायित्व है, वह विधानसभा चुनाव में बुरी तरह से पराजित होने के बाद खुद को संभालने में जुटी हुई है। इसके अतिरिक्त लोकसभा चुनाव भी नजदीक हैं। उसकी सरगरमी शुरू भी हो चुकी है। रहा सवाल भाजपा विधायकों का तो उनमें इतनी हिम्मत नहीं कि अपनी ही पार्टी की मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा के फैसले का विरोध कर सकें। वे इसे विखंडन ही मानने को तैयार नहीं हैं। हां, अलबत्ता वे इतना जरूर कह रहे हैं कि सरकार पर दबाव बनाएंगे कि बोर्ड का मुख्यालय अजमेर में ही हो, ताकि अजमेर अहमियत बरकरार रहे। अजमेर दक्षिण की विधायक अनिता भदेल, अजमेर पश्चिम के विधायक वासुदेव देवनानी, मसूदा विधायक सुशील कंवर पलाड़ा और पुष्कर विधायक सुरेश रावत ने साफ तौर पर कहा है कि वे मुख्यमंत्री से आग्रह करेंगे कि मुख्यालय अजमेर में ही रखा जाए।
पूर्व कांग्रेसी विधायकों का ज्यादा जोर भी इसी बात है कि बोर्ड को अजमेर से बाहर न ले जाया जाए। पूर्व शिक्षा राज्य मंत्री श्रीमती नसीम अख्तर का कहना है कि देश में आयोग ने साख बनाई है। इसका विखंडन नहीं होना चाहिए था। सरकार को नए बोर्ड का मुख्यालय आयोग में ही रखना चाहिए। पूर्व मुख्य सचेतक डॉ. रघु शर्मा ने भी इसी बात पर जोर दिया है कि मुख्यालय अजमेर में ही हो। उनका कहना है कि यदि अधीनस्थ बोर्ड का मुख्यालय अजमेर से बाहर किया गया, तो विरोध करेंगे। इसी प्रकार नसीराबाद के पूर्व विधायक महेन्द्र गुर्जर का कहना है कि राव कमेटी के फैसले से आयोग अजमेर को मिला। अब आयोग का विखंडन कर इसे बाहर ले जाया जा रहा है। इसका विरोध करेंगे। यानि कि उन्हें ज्यादा ऐतराज इस बात पर रहेगा कि बोर्ड का मुख्यालय अजमेर को छोड़ कर कहीं और हो।
कुल मिला कर ऐसा प्रतीत होता है कि विखंडन तो हो कर रहेगा, बस बोर्ड का मुख्यालय अजमेर में ही रहने पर संतुष्ट रहना होगा। देखना ये होगा कि कहीं सरकार अभी लोकसभा चुनाव तक इस मामले में चुप रहे और बाद में बोर्ड का मुख्यालय कहीं और न ले जाए।
जहां तक तकनीकी पहलु का सवाल है, यह स्पष्ट है कि सरकार का कदम विखंडनकारी ही है। यह बात सही है कि आयोग का गठन राजपत्रित पदों के लिए किया गया था, मगर अस्सी के दशक में एक बार अराजपत्रित अर्थात लिपिक पदों पर भर्ती का काम आयोग से कराया गया। इसके लिए नियमों में संशोधन किए गए। पिछली भाजपा सरकार ने तो ग्रेड थर्ड शिक्षकों और पटवारियों की भर्ती का काम भी कराया। इनके लिए भी नियमों में बदलाव किया गया। मगर अब जिन पदों को कानून बदलकर आयोग के क्षेत्राधिकार में लाया गया अब उन्हें कानून बदल कर वापस छीना जा रहा है।
इस सिलसिले में आयोग कर्मचारी संघ के अध्यक्ष दयानंद शर्मा के तर्क भी गौर करने योग्य हैं। वो ये कि आयोग सीमित संसाधन और स्टाफ की कमी के बाद भी चार महीने में 21 लाख अभ्यर्थियों की परीक्षा आयोजित कर चुका है। आयोग में कुछ और संसाधन बढ़ाए जाएं, तो अधीनस्थ एवं मंत्रालयिक सेवा चयन बोर्ड की आवश्यकता ही नहीं होगी। यदि मौजूदा स्टाफ का 50 प्रतिशत कार्मिक और उपलब्ध कराएं तो राजस्व हानि से बच सकती है।

गुरुवार, 13 फ़रवरी 2014

अजमेर से ही चुनाव लड़ेंगे सचिन पायलट

विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी हार के बाद प्रदेश कांग्रेस की कमान अजमेर के सांसद व केन्द्रीय कंपनी मामलात राज्य मंत्री सचिन पायलट को सौंपने के बाद हालांकि कई लोग चर्चा कर रहे हैं कि वे अजमेर से चुनाव नहीं लड़ेंगे, मगर सुविज्ञ सूत्र बताते हैं कि वे अजमेर से ही चुनाव लडऩे की तैयारी कर रहे हैं। इसके लिए उन्होंने बाकायदा ग्राउंड लेवल पर काम भी शुरू कर दिया है। उनकी इस तैयारी के संकेत हाल ही उनके अजमेर प्रवास के दौरान भी मिले। वे कांग्रेस पार्षदों व पदाधिकारियों से तफसील से मिले और उनके गिले शिकवे दूर करने की कोशिश की।
असल में सचिन से नाइत्तफाकी रखने वाले स्थानीय कांग्रेस नेता यही अफवाह फैला रहे हैं कि सचिन अजमेर को छोड़ कर भीलवाड़ा अथवा जयपुर ग्रामीण या किसी और सीट से चुनाव लडऩे पर विचार कर रहे हैं। उनका तर्क ये है कि चूंकि कई स्थानीय नेता नाराज हैं, इस कारण उन्हें विधानसभा चुनाव में भाजपा से तकरीबन दो लाख वोटों से पिछड़ी कांग्रेस की नैया पार लगाना कठिन होगा, इस कारण वे अजमेर सीट छोडऩे को मजबूर हैं। सचिन के प्रदेश अध्यक्ष बनने से पहले तो कई नेता खुल कर विरोध करने को उतारू थे, मगर प्रदेश की कमान सौंपे जाने के बाद अब उनके मुंह सिल गए हैं। अब वे बगावत करने से भी बचेंगे। जानते हैं कि अगर थोड़ी सी भी गड़बड़ की तो सचिन उन्हें बाहर का रास्ता दिखा देंगे, जिसके लिए कि वे प्रदेश अध्यक्ष होने के नाते अधिकृत भी हैं। सचिन भी फिलहाल सभी को साथ लेकर चलने पर जोर दे रहे हैं। इस कारण संगठन में कोई बड़ा फेरबदल करने के मूड में नहीं हैं। अलबत्ता लोकसभा चुनाव के बाद जरूर परफोरमेंस के आधार पर नए सिरे से जाजम बिछाएंगे।
वैसे राजनीति के जानकारों का मानना है कि भले ही सचिन की तैयारी अजमेर से ही चुनाव लडऩे की है, मगर समीकरण अथवा हालात बदलने की स्थिति में ऐन वक्त पर सीट बदलने अथवा चुनाव ही नहीं लडऩे की संभावनाएं बरकरार हैं। समझा जाता है कि हाईकमान भी उन्हें प्रदेश अध्यक्ष होने के नाते पूरी लिबर्टी देगी।

मंगलवार, 11 फ़रवरी 2014

वसुंधरा ने फिर किया आरपीएससी को दोफाड़

राजस्थान अधीनस्थ एवं मंत्रालयिक सेवा चयन बोर्ड गठन
प्रदेश की मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे ने एक बार फिर राजस्थान लोक सेवा आयोग को दोफाड़ करने की दिशा में कदम बढ़ा दिया है। अब सभी प्रकार की अधीनस्थ व मिनिस्ट्रियल कर्मचारियों की भर्ती पुनर्गठित राजस्थान अधीनस्थ एवं मंत्रालयिक सेवा चयन बोर्ड के जरिये होगी। इसके लिए नोटिफिकेशन जारी कर दिया गया है। पिछली बार भी वसुंधरा राजे ने अपने कार्यकाल के आखिरी दौर में चुनाव से ठीक पहले 2008 में इसका गठन किया था। बाद में कांग्रेस सरकार ने मामले को काफी दिन ठंडे बस्ते में रखा और अंतत: इसे भंग कर दिया था। वसुंधरा ने सत्तारूढ़ होते ही फिर से इसके गठन का नोटिफिकेशन जारी कर दिया।
सरकार के इस कदम का राजस्थान लोक सेवा आयोग कर्मचारी संघ ने विरोध शुरू कर दिया है। कर्मचारी संघ ने इसे आयोग के विखंडन की संज्ञा देते हुए इसे अजमेर की अस्मिता का सवाल बता कर जिले के जनप्रतिनिधियों से इस मामले में दखल की मांग की है। अजमेर के वजूद को बरकरार रखने के लिए कई बार आवाज उठाने वाले पूर्व विधायक डॉ. श्रीगोपाल बाहेती ही एक मात्र ऐसे नेता हैं, जिन्होंने फिर सवाल उठाया है कि  अजमेर राज्य के राजस्थान में विलय के वक्त राव कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर स्थापित राज्य स्तरीय आयोग को क्यों दोफाड़ किया जा रहा है।
उल्लेखनीय है कि राजस्थान अधीनस्थ एवं मंत्रालयिक सेवा चयन बोर्ड के गठन के बाद आयोग के पास केवल 40% भर्तियों की जिम्मेदारी ही रहेगी। करीब 60% भर्तियां चयन बोर्ड को मिल सकती हैं। इसके पुनर्गठन के बाद 150 से 200 कर्मचारियों-अधिकारियों की जरूरत पड़ेगी। वर्तमान में आरपीएससी राजपत्रित, मेडिकल सेवा, इंजीनियरिंग सेवा, शिक्षक भर्ती, पीटीआई भर्ती, एलडीसी समेत विभिन्न भर्ती परीक्षाएं आयोजित कर रहा है। अधीनस्थ बोर्ड गठन होने के बाद आयोग के पास आधा ही काम रह जाएगा। सूत्रों के मुताबिक एलडीसी, थर्ड ग्रेड टीचर भर्ती, सेकंड ग्रेड टीचर्स भर्ती, पीटीआई समेत विभिन्न भर्तियां नए बोर्ड को मिल जाएंगी।
इस बारे में आयोग कर्मचारी संघ के अध्यक्ष दयाकर शर्मा का कहना है कि आयोग में मात्र 250 ही कार्मिक स्वीकृत हैं, लेकिन हर साल 18 से 20 लाख अभ्यर्थियों की परीक्षा आयोजित की जाती है, जबकि राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड में 853 का स्टाफ स्वीकृत है और बोर्ड करीब 18 लाख विद्यार्थियों की परीक्षा आयोजित करता है। राज्य सरकार नया चयन बोर्ड गठित करने पर जो संसाधन जुटाएगा, उससे आधे संसाधन भी आयोग को मिल जाएं, तो सरकार का आर्थिक बोझ कम होगा। नया बोर्ड गठित होने पर नए भवन के साथ ही नया स्टाफ भी लगाना पड़ेगा। इससे आर्थिक भार और बढ़ेगा। आयोग कर्मचारी संघ के पूर्व अध्यक्ष पूरण मीणा ने भी सरकार की इस कवायद का विरोध किया है। उन्होंने कहा कि नए बोर्ड से अभ्यर्थियों को भी नुकसान होगा। आयोग की विश्वसनीयता अभ्यर्थियों में बनी हुई है।
ज्ञातव्य है कि पिछली बार विधानसभा चुनाव की अधिसूचना जारी होने से ठीक पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने अपने कुछ नेताओं को एडजस्ट करने और एसी चैंबर्स में बैठ कर धरातल के निर्णय करने वाले अधिकारियों के षड्यंत्र के चलते बोर्ड का गठन कर दिया। जल्दबाजी में उप सचिव स्तर के अधिकारी राकेश राजोरिया को सचिव तो बना दिया, मगर उन्हें भवन और कर्मचारी नहीं दे पाई। अध्यक्ष के रूप में आयोग के सदस्य एच. एल. मीणा और सदस्यों के रूप में डॉ. सुभाष पुरोहित, भैरोंसिंह गुर्जर, उदयचंद बारूपाल व एच. सी. डामोर की नियुक्ति कर दी। बाद में मीणा की जगह भरतपुर के तत्कालीन सांसद विश्वेन्द्र सिंह को खुश करने के लिए उनकी पत्नी दिव्या सिंह को कार्यभार सौंपा गया। सरकार आगे कुछ कार्यवाही करती, इससे पहले चुनाव आ गए। तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को विश्वास था कि वे फिर सत्ता में आएंगी और तब उसे विधिवत काम सौंपेंगीं। मगर दुर्भाग्य से चुनाव में तख्ता पलट गया और कांग्रेस सरकार काबिज हो गई। नतीजतन राजनीतिक लाभ के लिए गठित यह बोर्ड कांग्रेस सरकार के लिए गले की हड्डी बन गया। न तो वह उगल पा रही थी और न ही निगल पा रही थी। ऐसी स्थिति में बोर्ड के सभी पदाधिकारी भी लटक गए। न तो उनको बैठने के लिए जगह दी गई और न ही उनकी उपस्थिति दर्ज करने की कोई व्यवस्था कायम की गई। वेतन मिलने का तो कोई सवाल ही पैदा नहीं था। उधर बोर्ड में सरकारी प्रतिनिधि के रूप में नियुक्त राजेश राजोरिया की स्थिति भी अजीबोगरीब हो गई। उन्होंने बोर्ड को किराये के भवन में स्थापित करने के लिए दो बार विज्ञापन भी जारी किए, लेकिन किसी भी भवन मालिक ने रुचि नहीं दिखाई। दूसरी ओर अराजपत्रित पदों की भर्ती का जो काम बोर्ड को कराना था, वह आयोग करवाता जा रहा है। ऐसे में इस बोर्ड के वजूद पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा हुआ था।
 सरकार की उहापोह का चाहे जो कारण हो, मगर सरकार की इस किंकर्तव्यविमूढ़ता के चलते हाईकोर्ट में एक याचिका तक दायर कर दी गई, जिसमें सवाल खड़ा किया गया कि इस बोर्ड को अब तक काम और कर्मचारी क्यों नहीं दिए गए हैं। इस पर हाईकोर्ट ने सरकार से जवाब मांगा। हालांकि यह पहले से ही लग रहा था कि सरकार इस बोर्ड को अस्तित्व में नहीं रखना चाहती, मगर जब हाईकोर्ट का डंडा पड़ा तो आखिर सरकार को निर्णय करना ही पड़ा।
बहरहाल, इस बार जैसे ही भाजपा की सरकार काबिज हुई है, उसने एक बार फिर बोर्ड के गठन का काम शुरू कर दिया है। इसका विरोध भी हो रहा है, मगर लगता यही है कि सरकार किसी दबाव में नहीं आएगी।
वस्तुत: भाजपा सरकार ने केन्द्र की तरह अखिल भारतीय सेवाओं और अन्य सेवाओं के लिए अलग-अलग भर्ती दफ्तर होने को आधार बना कर यह कदम उठाया है, जबकि इसकी कोई आवश्यकता ही नहीं थी। सरकार चाहती तो मौजूदा आयोग में ही कुछ नए सदस्य नियुक्त कर देती और लंबे-चौड़े आयोग परिसर  में कुछ और भवन बनवा देती। यह सही है कि आयोग का जब गठन किया गया तो उसके पास गजटेड व फस्र्ट क्लास अधिकारियों की भर्ती का ही काम था, लेकिन बाद में जिस तरह अन्य सेवाओं की भी भर्तियां होने लगीं तो यहां के कर्मचारियों ने अपने आपको उसी के अनुरूप ढाल लिया। यहां तक कि तृतीय श्रेणी शिक्षकों की बड़ी भर्ती के काम को भी बखूबी अंजाम दिया।
पिछली बार सत्तारूढ़ दल के विधायक सरकार के साथ सुर में सुर मिला कर गीत गा रहे थे और इकलौते विपक्षी विधायक डॉ.श्रीगोपाल बाहेती की आवाज नक्कारखाने में तूती की माफिक दब कर रह गई। इस बार तो जिले के आठों विधायक भाजपा के हैं, फिर भी डॉ. बाहेती ने आवाज उठाई है। उनका कहना है कि यदि सरकार राव कमीशन की सिफारिशों को दरकिनार कर आयोग का विखंडन करना चाहती है तो उससे बेहतर है अजमेर को फिर से राज्य का दर्जा दे दिया जाए।
-तेजवानी गिरधर

सोमवार, 27 जनवरी 2014

क्या रलावता का विकल्प तलाशा जाएगा?

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद पर अजमेर के सांसद व केन्द्रीय कंपनी मामलात राज्य मंत्री सचिन के काबिज होने के बाद अजमेर शहर जिला कांग्रेस में भी बदलाव की सुगबुगाहट शुरू हो गई है। हालांकि मौजूदा अध्यक्ष महेन्द्र सिंह रलावता उनकी ही पसंद के हैं और उन्हें अध्यक्ष भी उन्होंने ही बनवाया था, इस कारण कई लोग यह मानते हैं कि कम से कम लोकसभा चुनाव तक तो उन्हें नहीं हटाया जाएगा, मगर शहर कांग्रेस की चरम पर पहुंची गुटबाजी के कारण शहर की दोनों सीटों पर कांग्रेस प्रत्याशियों की बुरी तरह से हार के बाद सचिन पर दबाव बन सकता है कि वे संगठन को दुरुस्त करने के लिए अध्यक्ष को बदलें।
बताया जाता है कि हालांकि रलावता सचिन की पसंद रहे हैं, मगर विधानसभा चुनाव में अजमेर उत्तर की सीट के टिकट के लिए अडऩा सचिन को अच्छा नहीं लगा बताया। सचिन किसी सिंधी को ही टिकट देना चाहते थे, मगर खींचतान के चलते पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के करीबी पूर्व विधायक डॉ. श्रीगोपाल बाहेती टिकट पाने में कामयाब हो गए। इसका परिणाम ये रहा कि कांग्रेस ने उत्तर की तो सीट खोयी ही, दक्षिण में भी सचिन की पसंद के हेमंत भाटी हार गए। बेशक कांग्रेस विरोधी लहर के कारण हार का अंतर ज्यादा रहा, मगर कांग्रेस के दोनों प्रत्याशियों की शिकायत है कि उन्हें संगठन का साथ नहीं मिला।
चर्चा है कि पायलट अपनी पसंद के ही किसी नए चेहरे को शहर अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी दे सकते हैं। पूर्व विधायक डॉ. श्रीगोपाल बाहेती व पूर्व विधायक ललित भाटी से उनकी नाइत्तफाकी जगजाहिर है और पूर्व विधायक डॉ. राजकुमार जयपाल पर भी दाव खेले जाने की संभावना कम बताई जा रही है। ऐसे में पायलट के करीबी शहर कांग्रेस उपाध्यक्ष कैलाश झालीवाल का नंबर आ सकता है। वे तकरीबन तीस साल पुराने सक्रिय व जुझारू नेता हैं, मगर सवाल ये है कि क्या उनके लिए आम स्वीकार्यता बन पाएगी। इसी प्रकार विजय जैन के नाम की भी चर्चा है। अजमेर दक्षिण के कांग्रेस प्रत्याशी रहे हेमंत भाटी का नाम भी उभर कर आया है। वे पुराने दिग्गज कांग्रेसी स्वर्गीय सेठ श्री शंकर सिंह भाटी के परिवार के होने के कारण प्रतिष्ठित व्यवसायी व समाजसेवी तो हैं ही साधन संपन्न भी हैं। यदि सभी कांग्रेसी उन्हें स्वीकार कर लें तो संगठन चलाने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं आएगी। नया और ऊर्जावान चेहरा तो हैं ही। यूं पूर्व उपाध्यक्ष डॉ. सुरेश गर्ग भी एक विकल्प हो सकते थे और उन्हें सरकारी नौकरी से सेवामुक्त होने के बाद सचिन ने ही उपाध्यक्ष बनवाया था, मगर अज्ञात गलतफहमियों के कारण उन्हें रलावता वाली कार्यकारिणी में नहीं रखा गया। ऐसे में सचिन से उनकी दूरी हो गई। दावेदार नगर निगम मेयर कमल बाकोलिया भी हो सकते थे, उनका संगठन के नेताओं को साथ ले कर चलने का उनका परफोरमेंस नजर नहीं आता। नगर सुधार न्यास के पूर्व अध्यक्ष नरेन शहाणी भी एक विकल्प हो सकते थे, मगर लैंड फॉर लैंड मामले में फंसने के बाद संभावना शून्य हो गई। सचिन से भी उनकी दूरी बताई जाती है। कुल मिला कर सचिन के लिए रलावता के मुकाबले नया चेहरा तलाशना कुछ मुश्किल काम है।

सचिन से भिडने को तैयार भाजपाई दावेदार

हालांकि अजमेर संसदीय क्षेत्र से मौजूदा कांग्रेस सांसद व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट के दुबारा यहीं से चुनाव लडऩे अथवा केवल प्रदेश कांग्रेस की कमान संभालने का निर्णय होना बाकी है, मगर भाजपा के सभी दावेदार यही मान कर कि सचिन ही सामने होंगे, टिकट मिलने पर चुनाव लड़ कर जीतने के आत्मविश्वास से भरे हुए हैं। ज्ञातव्य है कि पिछली बार सचिन के सामने उपयुक्त स्थानीय दावेदार नहीं मिलने पर भाजपा ने भाजपा महिला मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीमती किरण माहेश्वरी को चुनाव मैदान में उतारा था और वे 76 हजार 135 मतों के भारी अंतर से हार गई थीं। इस कारण इस बार भाजपा के सामने सशक्त दावेदार तलाशने की समस्या थी, मगर विधानसभा चुनाव में चली कांग्रेस विरोधी लहर में अजमेर जिले के ब्यावर विधानसभा क्षेत्र को छोड़ कर अजमेर संसदीय क्षेत्र में शामिल सभी सातों विधानसभा क्षेत्र और जयपुर जिले के दूदू विधानसभा क्षेत्र में भाजपा की जीत ने भाजपा के हर किसी दावेदार में सचिन को हरा देने का उत्साह भर दिया है। अब किसी भी दावेदार को सचिन से भिडऩे में कोई डर नहीं है। उलटे वे यह सोच रहे हैं कि टिकट मिलने पर न केवल उनकी जीत सुनिश्चित है, अपितु प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पर काबिज सचिन जैसे दिग्गज कांग्रेसी नेता को हराने का श्रेय अलग हासिल होगा। यह सोच इसलिए तर्कसंगत नजर आती है क्यों कि संसदीय क्षेत्र के सभी आठों विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा व कांग्रेस को मिले मतों में 1 लाख 91 हजार 943 का भारी अंतर है। इस खाई को पाटना आसान काम नहीं। यही वजह है कि लोकसभा चुनाव को लेकर भाजपा खेमे में सरगरमी तेज है।
उधर कांग्रेस खेमे में हलचल इसलिए नहीं है कि उसमें यही माना जा रहा है कि उनकी ओर से प्रत्याशी सचिन ही होंगे, तो दिमाग काहे को लगाएं। यूं भी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी हार के बाद अन्य दावेदारों में कोई उत्साह नहीं है। हां, अगर सचिन के पास जर्जर हो चुकी कांग्रेस का जीर्णोद्धार करने का जिम्मा है और उन्हें प्रदेश की सभी पच्चीस सीटों पर कांग्रेस को जिताने की मशक्कत करनी होगी, इस कारण यदि यह विचार बना कि वे लोकसभा चुनाव न लड़ें, उसी स्थिति में ही दावेदार उभर कर सामने आएंगे, यूं दावा भले ही कोई भी जताता रहे।
भाजपा के पास हैं कई विकल्प, जाट प्रत्याशी पर हो रहा है विचार
बात अगर भाजपा की करें तो उसके पास दावेदारों की कमी नहीं है। उसके पास सबसे दमदार विकल्प है किसी जाट को चुनाव मैदान में उतारना। इसकी वजह ये है कि परिसीमन के बाद इस संसदीय क्षेत्र में जाटों के वोट तकरीबन दो लाख माने जाते हैं। हालांकि यह विकल्प भाजपा के पास पिछली बार भी था, मगर चूंकि नसीराबाद विधानसभा क्षेत्र से हारे दिग्गज भाजपा नेता व तत्कालीन जलदाय मंत्री प्रो. सांवरलाल जाट, जो कि वर्तमान में भी जलदाय मंत्री हैं, का मानस बना नहीं और सचिन के मुकाबले कोई अन्य जाट नेता मिला नहीं, इस कारण इस हाई प्रोफाइल चुनाव में भाजपा ने भी अपनी दिग्गज श्रीमती माहेश्वरी को उतार दिया। भाजपा खेमा यह मान कर चलता है कि इस बार जाट प्रत्याशी सचिन को टक्कर देने की स्थिति में हो सकता है। इसका आधार ये है कि दो लाख जाटों के अतिरिक्त भाजपा मानसिकता के दो लाख वैश्य, सवा लाख रावत, एक लाख सिंधी व एक लाख राजपूत मतदाता जाट प्रत्याशी को जितवा सकते हैं। इसी संभावना के मद्देनजर कुछ रिटायर्ड जाट अधिकारी भाग्य आजमाने की सोच रहे हैं। इनमें प्रमुख रूप से राजस्थान लोक सेवा आयोग के पूर्व अध्यक्ष सी. आर. चौधरी व अजमेर में कलेक्टर रह चुके महावीर सिंह का नाम सामने आ रहा है। पूर्व जिला प्रमुख श्रीमती सरिता गैना के ससुर सी. बी. गैना का नाम भी चर्चा में है। एक अन्य जाट सज्जन भी बताए जा रहे हैं, जिन्होंने वसुंधरा राजे की सुराज संकल्प यात्रा के दौरान अहम भूमिका निभाई बताई।
फिर मैदान में आ सकती हैं किरण माहेश्वरी
भाजपा चाहे तो एक बार फिर वैश्य पर दाव लगा सकती है। हालांकि पिछली बार श्रीमती माहेश्वरी हार गई थीं, मगर इस बार स्थिति उलट है, इस कारण साहस जुटा सकती हैं। यदि उन्हें राज्य मंत्रीमंडल में स्थान नहीं मिलता तो कदाचित वे कोरा विधायक रहना पसंद न करें। उनके हाईकमान तक रसूखात भी हैं, इस कारण टिकट लाना उनके लिए कठिन नहीं होगा।
बात अगर अन्य वैश्य दावेदारों की करें तो इस सिलसिले में स्थानीय वैश्य दावेदारों का मानना है कि वे स्थानीयता के नाम पर बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं। इनमें पूर्व जिला प्रमुख पुखराज पहाडिय़ा, नगर सुधार न्यास के पूर्व अध्यक्ष धर्मेश जैन व पूर्व शहर भाजपा अध्यक्ष शिवशंकर हेड़ा के नाम शामिल हैं। पहाडिय़ा ने गुपचुप तैयारी भी शुरू कर दी थी, मगर उन्हें टोंक-सवाईमाधोपुर का लोकसभा चुनाव प्रभारी बनाए जाने के बाद संभावना कम हो गई है। कारण ये है कि प्रदेश अध्यक्ष वसुंधरा राजे ये स्पष्ट कर चुकी हैं कि लोकसभा चुनाव प्रभारी चुनाव नहीं लड़ेंगे, क्योंकि उनके जिम्मे लोकसभा क्षेत्र में सारा समन्वय, सम्मेलन, बूथ मैनेजमेंट सिस्टम आदि का काम रहेगा।
पूर्व सांसद रासासिंह रावत भी करेंगे दमदार दावेदारी
अजमेर के पूर्व सांसद प्रो. रासासिंह रावत भी दावेदारी के पक्के मूड में हैं। उन्हें पुष्कर से विधानसभा चुनाव का टिकट नहीं मिला तो यह सोच कर चुप रह गए थे कि लोकसभा चुनाव में दावेदारी करेंगे। दावा तो उनका पिछली बार भी था, मगर परिसीमन की वजह से अजमेर संसदीय क्षेत्र का रावत बहुल मगरा इलाका कट जाने पर उन पर पार्टी ने दाव खेलना मुनासिब नहीं समझा। रावतों के वोट कम होने के बाद भी तकरीबन सवा लाख रावत तो हैं ही, जिनके दम पर वे दावा ठोकेंगे। उनके पास कहने को ये तर्क भी है कि वे यहां से पांच बार सांसद रहे हैं, इस कारण उनकी पकड़ अच्छी है। साथ ही उन्हें स्थानीयता व सहज उपलब्धता का भी लाभ मिलेगा। जिले में पुष्कर व ब्यावर से रावत प्रत्याशियों के जीतने से उत्साहित रावत महासभा राजस्थान की ओर से अजमेर संसदीय क्षेत्र से समाज के योग्य व्यक्ति को टिकट देने की मांग से भी उनको बल मिला है।
वसुंधरा की पुत्रवधु पर भी है कयास
बताया जाता है कि मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे की पुत्रवधू व झालावाड़ के भाजपा सांसद दुष्यंत सिंह की धर्म पत्नी श्रीमती निहारिका राजे को भी दावेदार माना जाता है। इसके पीछे एक तर्क ये है कि अजमेर संसदीय क्षेत्र में तकरीबन डेढ़ लाख गुर्जर मतदाता हैं और श्रीमती निहारिका भी गुर्जर समाज की बेटी हैं। जातीय समीकरण के लिहाज से वे परंपरागत रूप से कांग्रेस के साथ रहने वाले गुर्जर समुदाय में सेंध मार सकती हैं।
युवा नेता पलाड़ा कर चुके हैं अघोषित दावेदारी
आगामी चुनाव के लिए एक और सशक्त दावेदार भी उभर कर आए हैं। वे हैं युवा भाजपा नेता भंवर सिंह पलाड़ा, जो कि पूर्व जिला प्रमुख व मौजूदा मसूदा विधायक श्रीमती सुशील कंवर पलाड़ा के पति हैं। पिछले दिनों उनकी पहल पर आयोजित पंचायतीराज सशक्तिकरण सम्मेलन में हालांकि उन्होंने खुल कर दावेदारी तो नहीं की, मगर उनके हाव-भाव और मिजाज ऐसा ही नजर आ रहा था। श्रीमती पलाड़ा के विदाई समारोह का रूप लिए इस समारोह में विधानसभा चुनाव में भाजपा की ऐतिहासिक जीत का जिक्र करते हुए पलाड़ा ने अपनी हुंकार में कहा कि अभी तो लोकसभा का फाइनल बाकी है, उसे उनकी भाजपा के लिए खाली पड़ी लोकसभा सीट की दावेदारी के रूप में लिया गया। असल में इसकी तैयारी उन्होंने अपनी जिला प्रमुख पत्नी के कार्यकाल में बेहतरीन कार्य करवा कर कर ली थी। जहां तक टिकट लाने का सवाल है, उनके पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह से संबंध जगजाहिर हैं, इस कारण ज्यादा दिक्कत नहीं आएगी। सचिन के मुकाबले साधन-संपन्नता के मामलें में भी वे कमजोर नहीं पड़ेंगे।
अजमेर जिले के भाजपा सदस्यता प्रभारी रहे प्रो. बी. पी. सारस्वत भी इस बार दावेदारी करने के मूड में हैं, मगर पहले उन्हें नागौर का लोकसभा प्रभारी बनाया गया और फिर देहात जिला भाजपा अध्यक्ष का जिम्मा भी सौंप दिया गया। ऐसे में उनकी दावेदारी में रोड़ा पड़ गया है।
ऐसी चर्चा भी है कि अजमेर उत्तर के भाजपा विधायक प्रो. वासुदेव देवनानी या निम्बाहेड़ा के भाजपा विधायक श्रीचंद कृपलानी को लोकसभा चुनाव लड़ाने पर पार्टी हाईकमान विचार कर रहा है। इसकी प्रमुख वजह ये बताई जा रही है कि सिंधी कोटे में ये दोनों ही मंत्री बनने की कतार में हैं। दोनों की दावेदारी मजबूत है, मगर दोनों को मंत्री बनाया नहीं जा सकता। पिछली बार सिंधी विधायक के रूप में अकेले देवनानी जीते थे, इस कारण उन्हें मंत्री बनाने में दिक्कत नहीं आई। इस बार देवनानी के अतिरिक्त कृपलानी व ज्ञानदेव आहूजा भी जीत कर आ गए। इसी कारण समस्या उत्पन्न हुई है। ऐसे में देवनानी व कृपलानी में से किसी एक को मंत्री बना कर दूसरे को लोकसभा में भेजना की बेहतर विकल्प होगा।
पिछली बार दावेदारी चुके अजमेर नगर निगम के पूर्व महापौर धर्मेन्द्र गहलोत, मगरा विकास बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष मदनसिंह रावत, अजमेर नगर परिषद के पूर्व सभापति सुरेन्द्र सिंह शेखावत, पूर्व केकड़ी प्रधान रिंकू कंवर आदि के भी दावा ठोकने के आसार हैं।
बात अगर कांग्रेस की करें तो फिलहाल यही माना जाता है कि यहां से सचिन ही चुनाव लड़ेंगे, मगर यदि प्रदेश अध्यक्ष का महत्वपूर्ण दायित्व निभाने की वजह से मानस बदला तो पूर्व जिला प्रमुख रामस्वरूप चौधरी, पूर्व विधायक डॉ. श्रीगोपाल बाहेती आदि दावा कर सकते हैं। दावा अजमेर डेयरी के अध्यक्ष रामचंद्र चौधरी भी करते, मगर उन्होंने विधानसभा चुनाव में बगावत कर चैप्टर क्लॉज सा कर लिया है। वैसे भी सचिन के खिलाफ चुनाव लडऩे के उनके ऐलान के बाद उन पर कोई विचार होना असंभव सा है। विशेरू रूप से अब जब कि सचिन प्रदेश अध्यक्ष के नाते टिकट निर्धारण में अहम भूमिका निभाने वाले हैं।
-तेजवानी गिरधर