शनिवार, 4 जनवरी 2025

केन्द्र सरकार दरगाह कमेटी व नाजिम को लेकर गंभीर नहीं

ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती की दरगाह की अंदरूनी व्यवस्थाओं को देखने वाली दरगाह कमेटी और उसके प्रशासनिक मुखिया नाजिम को लेकर गंभीर नहीं है। दरगाह ख्वाजा साहब एक्ट के तहत गठित इस कमेटी को एक ढर्रे की तरह चलाया जा रहा है, जबकि इसमें सदस्यों से लेकर नाजिम तक की नियुक्ति में अतिरिक्त सावधानी की जरूरत है। 

सरकार की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कमेटी के प्रशासनिक मुखिया व कमेटी के सदस्यों की नियुक्ति में अत्यधिक लेटलतीफी बरती जाती है। ऐसे अनेक मौके रहे हैं, जबकि नाजिम की अनुपस्थिति में कार्यवाहक नाजिम से ही काम चलाया गया है। स्थिति यह आ गई कि 813वां उर्स नाजिम व कमेटी के अभाव में संपन्न होने जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ओर से पेश की गई चादर के दौरान कमेटी की ओर से इस्तकबाल करने वाला कोई नहीं था। अल्पसंख्यक मंत्रालय के अधिकारी ने उपस्थित हो कर औपचारिकता निभाई।  

सरकार की मनमर्जी देखिए कि जब अब तक यहां नौकरी कर रहे सरकारी अधिकारी की नियुक्ति का नियम है और यही परंपरा भी रही है, उसके बावजूद इस पद पर सेवानिवृत्त आईएएस को नियुक्त कर दिया जाता है। जबकि यहां पूर्णकालिक अधिकारी की जरूरत है। जरूरत इसलिए है कि यह उस दरगाह का प्रबंध देखने वाली कमेटी का प्रशासनिक मुखिया है, जो पूरी दुनिया में सूफी मत मानने वालों का सबसे बड़ा मरकज है। इतना ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद के चलते अत्यंत संवेदनशील स्थान है। आतंकियों के निशाने पर है और एक बार तो यहां बम ब्लास्ट तक हो चुका है।

बेशक प्रतिदिन आने वाले जायरीन की सुविधा के मद्देनजर सरकार गंभीर रहती है, उसके लिए बजट भी आवंटित होता है, मगर दरगाह कमेटी व नाजिम को लेकर सरकार एक ढर्रे पर ही चल रही है। वस्तुस्थिति ये है कि यह कमेटी, विशेष रूप से नाजिम न केवल दरगाह की दैनिक व्यवस्थाओं को अंजाम देते हैं, अपितु खादिमों व दरगाह दीवान के बीच आए दिन होने वाले विवाद में भी मध्यस्थ की भूमिका उन्हें निभानी होती है। यह काम कोई पूर्णकालिक अधिकारी ही कर सकता है। होना तो यह चाहिए कि इस पद पर नियुक्ति ठीक उसी तरह से की जाए, जिस तरह आरएएस व आईएएस अधिकारियों तबादला नीति के तहत की जाती है। उसमें विशेष रूप से यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि वह दबंग हो। एक सेवानिवृत्त अधिकारी में कितनी ऊर्जा होती है, यह बताने की जरूरत नहीं है, जबकि यहां ऊर्जावान अधिकारी की जरूरत है। ऐसा अधिकारी ही यहां की व्यवस्थाओं को ठीक ढ़ंग से अंजाम दे सकता है।

अफसोसनाक बात है कि इस ओर केन्द्रीय अल्पसंख्यक मंत्रालय कत्तई गंभीर नहीं है। यही वजह है कि जब भी कोई नाजिम अपना कार्यकाल पूरा करके जाता है या इस्तीफा दे देता है तो लंबे समय तक यह पद खाली ही पड़ा रहता है। कार्यवाहक नाजिम से काम चलाया जाता है, जिसके पास न तो प्रशासनिक अनुभव होता है और न ही उतने अधिकार होते हैं।

शुक्रवार, 3 जनवरी 2025

ख्वाजा साहब ने की भारत में सूफी मत की शुरुआत

सुपरिचित इतिहासविद् व पत्रकार श्री शिव शर्मा ने दरगाह शरीफ व ख्वाजा साहब के जीवन और सूफी मत पर गहन अध्ययन किया है। कुछ साल पहले उन्होंने सूफी मत विषय पर एक आलेख भेजा था। वह अजमेरनामा में प्रकाशित किया गया था। इन दिनों ख्वाजा साहब का उर्स चल रहा है। प्रसंगवश आप भी पढियेः- अजमेर स्थित सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर रोज हजारों की तादाद में उनके अकीदतमंद तशरीफ लाते हैं। ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती किसी एक समाज और जाति के न होकर हर जाति और समुदाय के बीच शांति और एकता के दूत के रूप में माने जाते हैं। ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के चाहने वाले उनको हिंदल वली व गरीब नवाज जैसे नामों से भी पुकारते हैं। मान्यता के अनुसार ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती का जन्म ईरान में 536 हिजऱी संवत् अर्थात 1141 ईस्वी पूर्व पर्शिया के सीस्तान में हुआ। रिवायतों में कहा गया है कि ईरान के चश्त शहर से चिश्तिया शब्द निकला है।

चिश्तिया जिसे (सूफी) तरीका भी कहा जाता है, उसकी शुरुआत अबू इसहाक ने की थी। लेकिन भारत में इस तरीके की शुरुआत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती ने की थी। ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती ने भारत में आकर अजमेर को अपनी कर्मस्थली बनाया। कहा जाता है पीर, मुरीदी का सिलसिला ख्वाजा साहब के जमाने से ही आगे बढ़ा। बताया जाता है कि रजब की 6 तारीख 633 हिजरी 1233 ईस्वी को आपका विसाल हुआ। ख्वाजा साहब के पोते ख्वाजा हुसैन चिश्ती अजमेरी ने सज्जादानशीन व मुतवल्ली का सिलसिला जारी रखा। बताया जाता है कि ख्वाजा मोइनुद्दीन साहब के तकरीबन एक हज़ार खलीफ़ा और लाखों मुरीद थे। कई पंथो के सूफ़ी भी इनसे आकर मिलते और चिश्तिया तरीके से जुड़ जाते और शांति का एकता का संदेश देते। उनके मुरीदों में कुतबुद्दीन बख्तियार काकी, बाबा फरीद, निज़ामुद्दीन औलिया, हजऱत अहमद अलाउद्दीन, साबिर कलियरी, अमीर खुसरो नसीरुद्दीन चिराग दहलवी, बन्दे नवाज़, अशरफ जहांगीर सिम्नानी और अता हुसैन फ़ानी जैसी हस्तियां थीं।

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गुरुवार, 2 जनवरी 2025

अनेक शहंशाहों ने हाजिरी दी ख्वाजा के दरबार में

ख्वाजा गरीब नवाज के 813वें उर्स के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 4 जनवरी को चादर भेजेंगे। केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू उनकी तरफ से चादर लेकर दरगाह आएंगे। इस मौके पर ख्याल आता है कि दुनिया में कितने ही राजा, महाराजा, बादशाहों के दरबार लगे और उजड़ गए, मगर ख्वाजा साहब का दरबार आज भी शान-ओ-शोकत के साथ जगमगा रहा है। उनकी दरगाह में मत्था टेकने वालों की तादात दिन-ब-दिन बढ़ती ही जा रही है। गरीब नवाज के दर पर न कोई अमीर है न गरीब। न यहां जात-पात है, न मजहब की दीवारें। हर आम-ओ-खास यहां आता है। हिंदुस्तान के अनेक शहंशाहों ने बार-बार यहां आ कर हाजिरी दी है।

बादशाह अकबर शहजादा सलीम के जन्म के बाद सन् 1570 में यहां आए थे। अपने शासनकाल में 25 साल के दरम्यान उन्होंने लगभग हर साल यहां आ कर हाजिरी दी। बादशाह जहांगीर अजमेर में सन् 1613 से 1616 तक यहां रहे और उन्होंने यहां नौ बार हाजिरी दी। गरीब नवाज की चौखट पर 11 सितंबर 1911 को  विक्टोरिया मेरी क्वीन ने भी हाजिरी दी। इसी प्रकार देश के अनेक राष्ट्रपति और प्रधानमंत्रियों ने यहां जियारत कर साबित कर दिया है कि ख्वाजा गरीब नवाज शहंशहों के शहंशाह हैं। 

ख्वाजा साहब के दरगार में मुस्लिम शासकों ने सजदा किया तो हिंदू राजाओं ने भी सिर झुकाया है।

हैदराबाद रियासत के महाराजा किशनप्रसाद पुत्र की मुराद लेकर यहां आए और आम आदमी की तरह सुबकते रहे। ख्वाजा साहब की रहमत से उन्हें औलाद हुई और उसके बाद पूरे परिवार के साथ यहां आए। उन्होंने चांदी के चंवर भेंट किए, सोने-चांदी के तारों से बनी चादर पेश की और बेटे का नाम रखा ख्वाजा प्रसाद।

जयपुर के मानसिंह कच्छावा तो ख्वाजा साहब की नगरी में आते ही घोड़े से उतर जाते थे। वे पैदल चल कर यहां आ कर जियारत करते, गरीबों को लंगर बंटवाते और तब जा कर खुद भोजन करते थे। राजा नवल किशोर ख्वाजा साहब के मुरीद थे और यहां अनेक बार आए। मजार शरीफ का दालान वे खुद साफ करते थे। एक ही वस्त्र पहनते और फकीरों की सेवा करते। रात में फर्श पर बिना कुछ बिछाए सोते थे। उन्होंने ही भारत में कुरआन का पहला मुद्रित संस्करण छपवाया। जयपुर के राजा बिहारीमल से लेकर जयसिंह तक कई राजाओं ने यहां मत्था टेका, चांदी के कटहरे का विस्तार करवाया। मजार के गुंबद पर कलश चढ़ाया और खर्चे के लिए जागीरें भेंट कीं। महादजी सिंधिया जब अजमेर में शिवालय बनवा रहे थे तो रोजाना दरगाह में हाजिरी देते थे। अमृतसर गुरुद्वारा का एक जत्था यहां जियारत करने आया तो यहां बिजली का झाड़ दरगाह में पेश किया। इस झाड़ को सिख श्रद्धालु हाथीभाटा से नंगे पांव लेकर आए। जोधपुर के महाराज मालदेव, मानसिंह व अजीत सिंह, कोटा के राजा भीम सिंह, मेवाड़ के महाराणा पृथ्वीराज आदि का जियारत का सिलसिला इतिहास की धरोहर है। बादशाह जहांगीर के समय राजस्थानी के विख्यात कवि दुरसा आढ़ा भी ख्वाजा साहब के दर पर आए। जहांगीर ने उनके एक दोहे पर एक लाख पसाव का नकद पुरस्कार दिया, जो उन्होंने दरगाह के खादिमों और फकीरों में बांट दिया।

गुरु नानकदेव सन् 1509 में ख्वाजा के दर आए। मजार शरीफ के दर्शन किए, दालान में कुछ देर बैठ कर ध्यान किया और पुष्कर चले गए।

अंग्रेजों की खिलाफत का आंदोलन चलाते हुए महात्मा गांधी सन् 1920 में अजमर आए। उनके साथ लखनऊ के फिरंगी महल के मौलाना अब्दुल बारी भी आए थे। मजार शरीफ पर मत्था टेकने के बाद गांधीजी ने दरगाह परिसर में ही अकबरी मस्जिद में आमसभा को संबोधित किया था। उनके भाषण एक अंश था- हम सब भारतीय हैं, हमें अंग्रेजों की गुलामी से देश को आजाद कराना है, लेकिन शांति से, अहिंसा से। आप संकल्प करें... दरगाह की पवित्र भूमि पर आजादी के लिए प्रतिज्ञा करें... ख्वाजा साहब का आशीर्वाद लें। इसके बाद वे खादिम मोहल्ले में भी गए। स्वतंत्र भारत के प्रथम गवर्नर जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने भी दरगाह की जियारत की और यहां दालान में सभा को संबोधित किया। देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू व उनकी बहिन विजय लक्ष्मी पंडित और संत विनोबा भावे भी यहां आए थे।

देश की पहली महिला प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी भी कई बार दरगाह आईं। उनके साथ राजीव गांधी व संजय भी आए, मगर बाद में राजीव गांधी अकेले भी आए। इसी प्रकार सोनिया गांधी भी दरगाह जियारत कर चुकी हैं। देश के अन्य प्रधानमंत्री, राज्यपाल व मुख्यमंत्री आदि भी यहां आते रहते हैं। पाकिस्तान व बांग्लादेश के प्रधानमंत्री भी यहां आ कर दुआ मांग चुके हैं।

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बुधवार, 1 जनवरी 2025

अजमेर नगर निगम के चुनाव कब होंगे?

राज्य में सभी स्वायत्तशासी संस्थाओं व पंचायतों के चुनाव एक साथ करवाने की कवायद के बीच यह कौतुहल बना हुआ है कि अजमेर नगर निगम के चुनाव कब होंगे? कुछ लोगों का मानना है कि अगर अन्य निकायों के साथ चुनाव करवाए गए तो जुलाई-अगस्त में ही चुनाव हो जाएंगे, जबकि निगम का कार्यकाल दिसम्बर तक है। यानि छह माह पहले ही चुनाव हो जाएंगे। दुबारा चुनाव लडने के इच्छुक पार्षद व नए दावेदार इसी के तहत तैयारियां कर रहे हैं। लॉटरी की वजह से वार्डों में आरक्षण परिवर्तन होता है तो उसका विकल्प तलाश रहे हैं। दूसरी ओर कुछ जानकारों का अनुमान है कि मौजूदा निगम बोर्ड का कार्यकाल कम नहीं किया जाएगा, क्योंकि अगर कार्यकाल घटाया गया तो कुछ पार्षद कोर्ट चले जाएंगे कि वे तो पूरे पांच साल के लिए चुन कर आए थे। सरकार नहीं चाहेगी कि इस प्रकार की कोई स्थिति आए। यानि चुनाव नियत समय पर ही होंगे। अलबत्ता, इस बात की भी संभावना है कि चुनाव कुछ और विलंब से हों। ऐसे में मौजूदा बोर्ड का कार्यकाल समाप्त होने पर चुनाव होने तक प्रशासक नियुक्त किया जाएगा।

इसके अतिरिक्त इस बात की संभावना है कि पार्षदों का मनोनयन नहीं होगा। भला साल भर के लिए मनोनीत पार्षद कौन बनना चाहेगा। क्यों कि मनोनीत पार्षद का कार्यकाल बोर्ड के कार्यकाल तक होता है। अर्थात उन नेताओं को एक साल इंतजार करना होगा, जो मनोनीत पार्षद बनना चाहते हैं। जानकारी है कि मनोनयन के प्रस्ताव सरकार को भेजे जा चुके हैं। वैसे यह बात तर्कपूर्ण लगती है कि चुनाव हो जाने के बाद ही स्थिति साफ होगी कि कौन कौन नेता पार्षद बनने से वंचित रह गए हैं, उन्हें मनोनीत पार्षद बनाया जाएगा।

जहां तक अजमेर विकास प्राधिकरण का सवाल है, उसके बारे में भी यही कयास है कि फिलवक्त अध्यक्ष की नियुक्ति नहीं होगी। हालांकि इसके लिए पैनल बन चुका है, मगर नियुक्ति को लेकर संशय बना हुआ है। संभव है कि परिस्थिति विशेष ऐसी बन जाए कि प्राधिकरण अध्यक्ष की घोषणा निगम चुनाव से पहले हो जाए।

शनिवार, 28 दिसंबर 2024

जन्नती दरवाजे से मुतल्लिक हुआ था दिलचस्प वाकया

झंडे की रस्म के साथ षनिवार को ख्वाजा साहब का सालाना उर्स आरंभ हो गया। इस मौके पर दरगाह षरीफ स्थित जन्नती दरवाजे के मुतल्लिक एक दिलचस्प वाकया ख्याल में आ गया।

हुआ यूं कि जब पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति मुशर्रफ भारत दौरे पर थे और उनका आगरा के बाद अजमेर आने का कार्यक्रम था तो एक खबर ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरी थी। वो यह कि मुशर्रफ के आने पर उनके स्वागत में दरगाह स्थित जन्नती दरवाजा नहीं खोला जाएगा। उन दिनों दोनों देशों के बीच संबंध भी कुछ गड़बड़ चल रहे थे, इस कारण इस खबर का अर्थ ये निकाला गया था कि मुशर्रफ के प्रति असम्मान के चलते ही जन्नती दरवाजा नहीं खोलने का निर्णय किया गया है। हालांकि तब उनका अजमेर दौरा रद्द हो गया था और वे आगरा से ही लौट गए थे। उनके अजमेर न आ पाने को इस अर्थ में लिया गया कि ख्वाजा साहब के यहां उनकी हाजिरी मंजूर नहीं थी। तभी तो कहते हैं कि वहीं अजमेर आते हैं, जिन्हें ख्वाजा बुलाते हैं।

असल में उनके प्रति असम्मान जैसा कुछ नहीं था। हुआ यूं कि मुशर्रफ के आगमन पर पत्रकार अंजुमन पदाधिकारियों से तैयारियों बाबत जानकारी हासिल कर रहे थे। हिंदुस्तान टाइम्स के तत्कालीन अजमेर ब्यूरो चीफ एस एल तलवार, जिन्हें कि दरगाह की रसूमात के बारे में कुछ खास जानकारी नहीं थी, उन्होंने यह सवाल दाग दिया कि क्या मुशर्रफ के आने पर जन्नती दरवाजा खोला जाएगा। इस पर अंजुमन पदाधिकारियों ने कहा कि नहीं। नतीजा ये हुआ कि यह एक खबर बन गई और विशेष रूप से दिल्ली के अखबारों में प्रमुखता से छपी कि मुशर्रफ के आने पर जन्नती दरवाजा नहीं खोला जाएगा। दरअसल अंजुमन पदाधिकारियों ने सवाल का जवाब देते वक्त केवल नहीं शब्द का इस्तेमाल किया। वे अगर कहते कि किसी भी वीवीआईपी के आने पर जन्नती दरवाजा नहीं खोला जाता है तो यह वाकया नहीं होता। यहां ज्ञातव्य है कि यह साल में चार बार खोला जाता है, उर्स हजरत ख्वाजा गरीब नवाज पर यानि 29 जमादिस्सानी से छह रजब तक, हजरत गरीब नवाज के पीर-ओ-मुर्शद के उर्स की तारीख पर यानि छह शबाकुल मुकर्रम पर और ईद उल फितर यानि मीठी ईद व ईद उल जोहा यानी बकरा ईद के दिन।